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अरावली मुद्दे पर SC का फैसला: 100 मीटर नियम पर रोक और अवैध खनन के खिलाफ कड़ा कदम

  नई दिल्ली    अरावली क्षेत्र में खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम सुनवाई करते हुए साफ कहा कि अवैध खनन एक गंभीर अपराध है और इसके पर्यावरणीय असर भयानक और अपूरणीय हो सकते हैं. कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद तय की है और तब तक केंद्र व संबंधित राज्यों को अपनी-अपनी रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. शुरुआती चिंता के बिंदु सामने आए: CJI सुनवाई की शुरुआत में मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) से कहा कि कोर्ट ने प्रथम दृष्टया कुछ गंभीर चिंता के क्षेत्र चिन्हित किए हैं और इन पर केंद्र सरकार की सहायता की आवश्यकता है. CJI ने स्पष्ट किया कि यह कोई विरोधात्मक मुकदमा नहीं है, बल्कि उद्देश्य समस्या की जड़ तक पहुंचना है. इसी क्रम में कोर्ट ने एमिकस क्यूरी को एक विस्तृत नोट दाखिल करने को कहा और स्पष्ट किया कि तब तक पहले से लागू व्यवस्थाएं जारी रहेंगी. राजस्थान में अब भी कट रहे पेड़, दिए जा रहे खनन पट्टे राजस्थान के किसानों की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि जस्टिस ओका की 2024 की पीठ के आदेशों के बावजूद राज्य में खनन पट्टे दिए जा रहे हैं और पेड़ों की कटाई जारी है. इस पर CJI ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हमारे आदेश बिल्कुल साफ हैं. दुर्भाग्य से अवैध खनन और भ्रष्टाचार मौजूद है. राज्य को अपनी मशीनरी हरकत में लानी होगी. अवैध खनन हर हाल में रोका जाना चाहिए, यह एक अपराध है. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि यदि कहीं अवैध खनन की जानकारी है तो उसकी प्रतिनिधि शिकायत ASG कार्यालय में दी जाए. साथ ही कोर्ट ने साफ किया कि जब मामला पहले ही सुओ मोटो लिया जा चुका है, तो नई रिट याचिकाओं से बचा जाए ताकि सुनवाई भटके नहीं. स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति बनाने की जरूरत ASG ने कोर्ट को बताया कि केंद्रीय सशक्त समिति (CEC), एमिकस क्यूरी की सहायता करेगी. इस पर CJI ने कहा कि अब जरूरत है कि वन, खनन, पर्यावरण और अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञ एक साथ काम करें. कोर्ट ने संकेत दिया कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष विशेषज्ञ समिति बनाई जाएगी, जो इस पूरे मसले पर कोर्ट की सीधी निगरानी में काम करेगी, ताकि सभी पहलुओं पर समग्र दृष्टि से विचार हो सके. 100 मीटर नियम पर रोक जारी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अरावली को लेकर पहले दिए गए उस आदेश पर लगी रोक जारी रहेगी, जिसमें 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली मानने की बात कही गई थी. कोर्ट ने दोहराया कि अरावली जैसे संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्र में किसी भी तरह की लापरवाही भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों पर सीधा असर डालती है. अरावली की परिभाषा पर उठे कानूनी सवाल सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि अरावली पर्वतमाला को सख्ती से परिभाषित नहीं किया जा सकता, क्योंकि भूगर्भीय रूप से इसमें उप-टेक्टॉनिक संरचनाएं भी शामिल हैं. उन्होंने इस मुद्दे पर प्रारंभिक सुनवाई की मांग की. इस पर CJI ने कहा कि यदि एमिकस या केंद्र से कोई अहम पहलू छूट गया है, तो उस पर सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश सभी पक्ष विस्तृत नोट दाखिल करें एमिकस और सरकार पर्यावरण, वन और खनन विशेषज्ञों के नाम सुझाएं प्रस्तावित विशेषज्ञ समिति कोर्ट की सीधी निगरानी में काम करेगी राजस्थान सरकार यह सुनिश्चित करे कि अवैध खनन तुरंत रोका जाए दिसंबर में दिया गया पिछला आदेश अगले निर्देश तक लागू रहेगा कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ‘वन’ और ‘अरावली’ की परिभाषाओं को अलग-अलग रखा जाएगा. जहां ‘वन’ की परिभाषा व्यापक होगी, वहीं ‘अरावली’ को संकीर्ण दायरे में देखा जाएगा.  एमिकस क्यूरी के. परमेश्वर को चार हफ्तों में विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है. मामले की अगली सुनवाई अब चार सप्ताह बाद होगी. सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया कि अवैध खनन को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसके पर्यावरणीय प्रभाव को पलटना लगभग असंभव होता है.

चंबल से अरावली तक खनन माफिया का तांडव, राजस्थान और एमपी में लोग खौफ में, कानून नाकाम

श्योपुर/जयपुर देश में अवैध रेत खनन का जिन्न एक बार फिर पूरी ताकत से बाहर आ चुका है. राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में रेत माफिया का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि अब न सिर्फ आम लोग, बल्कि पुलिस और वन विभाग के अधिकारी भी सुरक्षित नहीं हैं.  जांच में सामने आया है कि बीजेपी शासित दोनों राज्यों में रेत माफिया खुलेआम दिनदहाड़े अवैध खनन और परिवहन कर रहा है. हालात इतने गंभीर हैं कि बीते एक हफ्ते में दो लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें एक वनकर्मी ड्यूटी पर तैनात था. कई जिलों में अधिकारी कार्रवाई करने से डर रहे हैं और स्थानीय लोग पर्यावरण तबाही को लेकर दहशत में जी रहे हैं. राजस्थान के धौलपुर जिले से सबसे चौंकाने वाला मामला सामने आया. यहां चंबल नदी क्षेत्र में अवैध बजरी खनन रोकने गए वन रक्षक जितेंद्र सिंह शेखावत को बजरी से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉली ने कुचल दिया. घटना 8 जनवरी की रात की है, जब वन विभाग की टीम चंबल वन्यजीव क्षेत्र में गश्त कर रही थी. ट्रैक्टर-ट्रॉली चालक ने भागने के दौरान वनकर्मी को टक्कर मार दी. गंभीर हालत में उन्हें पहले करौली और फिर जयपुर रेफर किया गया, जहां पैर काटना पड़ा, लेकिन 10 जनवरी की रात उनकी मौत हो गई. वन विभाग के मुताबिक, आरोपी माफिया मौके से फरार हो गया था. बाद में पुलिस ने बजरी माफिया रामसेवक उर्फ चालू को गिरफ्तार किया. इसके बाद प्रशासन ने जेसीबी से अवैध रास्तों को खोदकर बंद किया, लेकिन सवाल यही है कि क्या ये कार्रवाई स्थायी है? अजमेर: अलर्ट मोड पर प्रशासन, सख्त चेतावनी धौलपुर की घटना के बाद अजमेर प्रशासन हरकत में आया. जिला कलेक्टर लोकबंधु ने अवैध खनन के खिलाफ विशेष अभियान शुरू करने के निर्देश दिए. खनिज, पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त टीमें बनाई गईं. पुष्कर, केकड़ी और सीमावर्ती इलाकों में नाकेबंदी की गई. कई ट्रैक्टर-ट्रॉलियों को जब्त कर लाखों का जुर्माना लगाया गया और दोबारा पकड़े जाने वालों पर एफआईआर दर्ज की गई. प्रशासन का कहना है कि अब किसी भी कीमत पर अवैध खनन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे उलट नजर आती है. अलवर: अरावली की पहाड़ियां हो रहीं खत्म अलवर जिले में अरावली की पहाड़ियों को रेत और पत्थर माफिया खोखला कर रहे हैं. राजगढ़ क्षेत्र के मूनपुर गांव में बालाजी मंदिर के पास खुलेआम पत्थर खनन चल रहा है. आजतक की टीम ने देखा कि सुबह होते ही ट्रैक्टर-ट्रॉलियां खनन में जुट जाती हैं. भारी वाहन सड़कों से गुजरते हैं, लेकिन न पुलिस रोकती है और न वन विभाग. जब पुलिस ने पीछा किया तो माफिया ने एक घर की नींव तक तोड़ दी, जिससे तीन बकरियों की मौत हो गई. स्थानीय लोगों का कहना है कि माफिया को कानून का कोई डर नहीं है और पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है. बारां: अवैध बजरी मंडी पर छापा बारां शहर में पुलिस ने अंबेडकर सर्किल के पास अवैध बजरी बाजार पर बड़ी कार्रवाई की. 12 ट्रैक्टर-ट्रॉलियां पकड़ी गईं, जिनमें से 8 अवैध पाई गईं. हालांकि चार बिना रजिस्ट्रेशन वाली ट्रॉलियों को जांच के बाद छोड़ दिया गया, जिस पर सवाल उठ रहे हैं. गांव वालों का आरोप है कि खनन बस्ती से महज 100 मीटर दूर हो रहा है, ब्लास्टिंग से घरों में दरारें आ गई हैं और शिकायतों के बावजूद प्रशासन चुप है. मध्य प्रदेश: रेत माफिया बनाम कानून श्योपुर: वन विभाग पर पथराव, मां-बेटे को कुचला राजस्थान के बाद अब मध्यप्रदेश की बात करते हैं, जहां श्योपुर जिले में चंबल अभयारण्य की टीम ने एक अवैध रेत से भरा डंपर पकड़ा. डंपर जब्त कर ले जाते वक्त माफिया ने पथराव कर दिया और वाहन छुड़ाने की कोशिश की. पांच लोगों पर केस दर्ज हुआ. इसी जिले के विजयपुर इलाके में तेज रफ्तार ट्रैक्टर ने बाइक सवार बेटे को कुचल दिया, मां गंभीर रूप से घायल हो गई. आरोपी चालक फरार है और खबर लिखे जाने तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर है. रतलाम: पुलिस पर हमला, बीजेपी पार्षद गिरफ्तार रतलाम में अवैध परिवहन की सूचना पर पुलिस ने ट्रैक्टर-ट्रॉली रोकी. तभी 15 से ज्यादा बदमाश पहुंचे और पथराव शुरू कर दिया. ट्रॉली पलटने से एक पुलिसकर्मी दब गया. इस मामले में बीजेपी पार्षद जगदीश प्रजापत को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया. बाकी आरोपी फरार हैं और खबर लिखे जाने तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं. मुरैना: चंबल में चौबीसों घंटे खनन मुरैना और भिंड चंबल क्षेत्र में अवैध रेत खनन का सबसे बड़ा गढ़ बने हुए हैं. दिन-रात ट्रैक्टर-ट्रॉलियां चंबल नदी से रेत निकालकर बेच रही हैं. खनिज विभाग की कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित नजर आती है. अधिकारी कहते हैं कि शिकायत मिलने पर जांच होती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है. जबलपुर: अफसरों को कुचलने की धमकी जबलपुर में अवैध खनन की जांच करने पहुंचे तहसीलदार और खनिज विभाग की टीम को माफिया ने ट्रक से कुचलने की धमकी दी. वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ. खनन कारोबारी रोहित जैन को गिरफ्तार किया गया, लेकिन सवाल यह है कि ऐसे लोग इतने बेखौफ कैसे हैं. सवाल वही: माफिया इतना ताकतवर क्यों? आजतक की इस जांच में साफ है कि अवैध रेत खनन अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था का बड़ा संकट बन चुका है. जब अफसरों की जान सुरक्षित नहीं, तो आम लोग कैसे सुरक्षित रहेंगे. सरकारें कार्रवाई के दावे कर रही हैं, लेकिन जब तक माफिया पर स्थायी और सख्त शिकंजा नहीं कसा जाता, तब तक चंबल, अरावली और नर्मदा यूं ही लुटती रहेंगी.  

अरावली को लेकर कांग्रेस का एक्शन मोड, लापरवाह जिलाध्यक्षों पर गिरेगी गाज, BJP पर बढ़ाया दबाव

जयपुर अरावली क्षेत्र में अवैध खनन को लेकर कांग्रेस ने भजनलाल सरकार पर तीखा हमला बोला है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने आरोप लगाया है कि अरावली में अवैध खनन में बीजेपी के मंत्री और विधायक हिस्सेदार हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस संवेदनशील क्षेत्र को खनन माफियाओं के हवाले कर दिया है। डोटासरा ने कहा कि जब मौजूदा सरकार सत्ता में आई थी, तब अवैध खनन के खिलाफ सात दिन का अभियान चलाया गया था, लेकिन उसके बाद यह कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह गई। उन्होंने चिंता जताई कि पिछले दो वर्षों में अरावली क्षेत्र के पहाड़ तेजी से गायब हो रहे हैं। 'अरावली क्षेत्र में 52 खनन टेंडर जारी कर दिए' डोटासरा ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और खनन मंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकारी अधिकारी, बीजेपी के मंत्री और विधायक अवैध खनन में हिस्सेदारी रखते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह पहली सरकार है जिसने खनन माफियाओं को खुली छूट दी है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने मात्र एक महीने में अरावली क्षेत्र में 52 खनन टेंडर जारी कर दिए। अवैध खनन स्थलों को किया जा रहा नियमित प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि हाल के महीनों में हजारों अवैध खनन स्थलों को नियमित किया जा रहा है, जो पहले कानून के तहत बंद थे। उन्होंने विधानसभा सत्र में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा इस मुद्दे पर सरकार को कड़े कदम उठाने के लिए मजबूर करने की चेतावनी दी। प्रदर्शन नहीं करने वाले 8 जिलाध्यक्षों को नोटिस डोटासरा ने बताया कि अरावली और अवैध खनन के खिलाफ कांग्रेस के आह्वान के बावजूद प्रदेश के आठ जिलों में अब तक प्रदर्शन नहीं हुए हैं। ऐसे में संबंधित जिला कांग्रेस अध्यक्षों को नोटिस देने की तैयारी की जा रही है और उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। भाजपा का पलटवार भाजपा के प्रवक्ता रामलाल शर्मा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि डोटासरा को अवैध खनन में हिस्सेदारी का अनुभव है, क्योंकि उनके कार्यकाल में भी यह समस्या मौजूद थी। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार में पांच विभागों की संयुक्त टीमें अवैध खनन के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही हैं। रामलाल शर्मा ने यह भी बताया कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अरावली क्षेत्र में वृक्षारोपण के लिए 200 करोड़ रुपये का फंड जारी किया है।

पूर्व डीएफओ का खुलासा: अरावली में 50 हजार करोड़ का अवैध खनन, माफिया राज 15 सालों से जारी

अलवर  राजस्थान के अलवर जिले में स्थित अरावली की पहाड़ियों में सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद भिवाड़ी, टपूकड़ा, तिजारा और किशनगढ़बास क्षेत्र में अवैध खनन जारी है. लगातार हो रहे अवैध खनन से कई पहाड़ियों का नामो-निशान मिट चुका है. खनन माफिया इतने हावी हो गए हैं कि डीएफओ, पुलिस और प्रशासन की टीम पर पथराव और फायरिंग तक कर देते हैं. पूर्व में अलवर में डीएफओ रहे पी. काथिरवेल ने अपने द्वारा किए गए अवैध खनन के आकलन में बताया कि भिवाड़ी क्षेत्र में खनन माफियाओं ने पिछले 15 वर्षों में करीब 50 हजार करोड़ रुपये का अवैध खनन कर लिया है. उनके खिलाफ आज तक कोई सख्त कार्य योजना नहीं बनी है. तत्कालीन डीएफओ ने अलवर में पदस्थ रहते हुए राज्य सरकार और वन विभाग को पत्र लिखा था, जिसमें बताया गया कि जिले के टपूकड़ा क्षेत्र के चूहड़पुर, उधनवास, उलावट, ग्वालदा, इंदौर, सारे कलां, सारे खुर्द, खोहरी कलां, मायापुर, छापुर, नाखनौल, कहरानी, बनबन, झिवाणा और निंबाड़ी में हरियाणा के माफिया भी व्यापक स्तर पर फैले हुए हैं. विभागीय रिपोर्ट के अनुसार इस इलाके के करीब एक हजार हेक्टेयर क्षेत्र में पहाड़ समाप्त हो चुके हैं. यहां पहाड़ खत्म होने के कगार पर पहुंचने के बाद माफियाओं ने तिजारा और किशनगढ़बास में अपना कारोबार फैलाया और नीमली, बाघोर, देवता, मांछा सहित अन्य क्षेत्रों की पहाड़ियों में दिन-रात खनन शुरू कर दिया. डीएफओ अलवर वानिकी पद पर रहते हुए पी. काथिरवेल ने दिसंबर 2013 और जनवरी 2014 में राजस्थान सरकार के वन विभाग के पीसीसीएफ और सीसीएफ को पत्र लिखकर मांग की थी कि अवैध खनन से हुए नुकसान की जांच के लिए एक हाई एम्पावर्ड कमेटी का गठन किया जाए. उन्होंने कहा था कि अवैध खनन से जिले की पहाड़ियों को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. उनके व्यक्तिगत आकलन के अनुसार, भिवाड़ी क्षेत्र में ही पिछले 15 वर्षों में करीब 50 हजार करोड़ रुपये की संपदा लूटी जा चुकी है. यदि यही हाल रहा तो अगले तीन वर्षों में इस क्षेत्र की पहाड़ियां पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी और इसके बाद अलवर शहर के आसपास की पहाड़ियों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी. डीएफओ ने कार्य योजना भी तैयार की थी तत्कालीन डीएफओ के अनुसार वर्ष 1998 से 2003 के बीच प्रतिदिन करीब एक हजार वाहनों की आवाजाही के आधार पर लगभग 6 हजार करोड़ रुपये का अवैध खनन हुआ. इसी तरह 2003 से 2008 के बीच दो हजार वाहनों से करीब 12 हजार करोड़ और 2008 से 2013 के बीच पांच हजार वाहन प्रतिदिन के हिसाब से लगभग 30 हजार करोड़ रुपये का नुकसान किया गया. अरावली की पहाड़ियों को बचाने के लिए डीएफओ ने एक कार्य योजना भी बनाई थी, जिसके तहत उन्होंने उच्च अधिकारियों को लिखे पत्र में खनन माफियाओं से निपटने के लिए 11 करोड़ रुपये स्वीकृत करने की मांग की थी. नकेल कसने के लिए कड़े फैसले लेने की जरूरत इस राशि से वन विभाग की स्वतंत्र पुलिस फोर्स, वाहन, नई चेक पोस्ट, तथा पहाड़ी और खनन क्षेत्रों में पक्की दीवारें बनाने का प्रस्ताव था. तत्कालीन डीएफओ के अनुसार, अवैध खनन से जुड़े लोगों के पास भारी मात्रा में विस्फोटक, अवैध हथियार और बड़ी संख्या में मैनपावर है, जिनसे निपटना वर्तमान संसाधनों से लगभग नामुमकिन है. उन्होंने इस पर अंकुश लगाने के लिए तत्काल प्रभाव से कड़े फैसले और ठोस रणनीति अपनाने की मांग करते हुए उच्चाधिकारियों को पत्र लिखे थे.

सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालय की 100 मीटर अरावली परिभाषा ठुकराई, बताया कि इससे अरावली की पहचान खतरे में

 नई दिल्ली अरावली पर्वतमाला की परिभाषा को लेकर केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट और उसके द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के बीच गंभीर मतभेद सामने आए हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित 100 मीटर ऊंचाई आधारित अरावली परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया, जबकि अदालत की अपनी ही संस्था सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC)ने इस परिभाषा का समर्थन नहीं किया था। 13 अक्टूबर को मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अरावली की नई परिभाषा पेश की थी। इसके ठीक अगले दिन, 14 अक्टूबर को सीईसी ने पीठ की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी के परमेश्वर को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि इस परिभाषा की न तो जांच की गई है और न ही इसे सीईसी की मंजूरी प्राप्त है। इसके बावजूद, 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालय की 100 मीटर परिभाषा को स्वीकार कर लिया। CEC को सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में पर्यावरण और वन संबंधी आदेशों के अनुपालन की निगरानी के लिए गठित किया था। इसने साफ तौर पर कहा कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) द्वारा तैयार की गई परिभाषा को ही अपनाया जाना चाहिए, ताकि अरावली की पारिस्थितिकी और भौगोलिक अखंडता की रक्षा हो सके। FSI ने वर्ष 2010 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अरावली का विस्तृत सर्वे किया था। इसमें राजस्थान के 15 जिलों में 40,481 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अरावली के रूप में चिह्नित किया गया था। इस परिभाषा में कम से कम 3 डिग्री ढलान और न्यूनतम ऊंचाई वाले क्षेत्रों को शामिल किया गया था, जिससे छोटी और निचली पहाड़ियां भी संरक्षित रहतीं। 100 मीटर परिभाषा पर गंभीर आपत्तियां एमिकस क्यूरी के परमेश्वर ने अदालत में प्रस्तुत एक पावरपॉइंट प्रेज़ेंटेशन में मंत्रालय की 100 मीटर परिभाषा को अस्पष्ट और खतरनाक बताया। उन्होंने कहा कि इस परिभाषा से अरावली की भौगोलिक पहचान टूट जाएगी। कई छोटी पहाड़ियां अरावली के दायरे से बाहर हो जाएंगी। इन क्षेत्रों को खनन के लिए खोला जा सकेगा। इसका सीधा असर पारिस्थितिकी पर पड़ेगा और थार मरुस्थल का विस्तार पूर्व की ओर हो सकता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि 100 मीटर की सीमा लागू होने पर अरावली की निरंतरता समाप्त हो जाएगी और इसे संरक्षित भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं बचाया जा सकेगा। CEC ने मंत्रालय के दावे को बताया भ्रामक CEC अध्यक्ष और पूर्व महानिदेशक (वन) सिद्धांत दास ने 14 अक्टूबर के पत्र में कहा कि मंत्रालय द्वारा दायर हलफनामे में जिन विचारों को CEC का बताया गया है वे वास्तव में CEC सदस्य डॉ. जे.आर. भट्ट के व्यक्तिगत विचार हैं, न कि समिति के। पत्र में यह भी कहा गया कि समिति की बैठक (3 अक्टूबर) के मसौदा कार्यवृत्त CEC को कभी सौंपे ही नहीं गए। मंत्रालय की रिपोर्ट पर CEC ने कोई औपचारिक समीक्षा नहीं की। मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट हस्ताक्षरित भी नहीं थी। CEC ने दोहराया कि उसकी स्पष्ट राय है कि FSI की परिभाषा को ही अपनाया जाना चाहिए। FSI का आंतरिक आकलन और विरोधाभास FSI ने एक ट्वीट में मीडिया रिपोर्ट्स का खंडन किया कि 90% अरावली पहाड़ियां असुरक्षित हो जाएंगी, लेकिन एक आंतरिक आकलन के अनुसार, 20 मीटर या उससे ऊंची 12,081 अरावली पहाड़ियों में से 91.3% और कुल 1,18,575 पहाड़ियों में से 99% से अधिक 100 मीटर की परिभाषा में शामिल ही नहीं होंगी। 20 मीटर ऊंचाई की पहाड़ियां भी प्राकृतिक विंड बैरियर के रूप में अहम भूमिका निभाती हैं। मंत्री का दावा और सवाल पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि अरावली क्षेत्र के केवल 0.19% हिस्से (278 वर्ग किमी) में ही खनन की अनुमति है। लेकिन मंत्रालय के अपने आंकड़े बताते हैं कि यह क्षेत्र पहले से ही राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में खनन के अंतर्गत है। अब तक मंत्रालय यह स्पष्ट नहीं कर पाया है कि 100 मीटर परिभाषा लागू होने के बाद निचले अरावली क्षेत्रों में भविष्य में खनन और विकास को कैसे रोका जाएगा। इसके अलावा, जमीन पर सीमांकन अभी हुआ भी नहीं है, ऐसे में यह भी सवाल बना हुआ है कि मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को कैसे आश्वस्त किया कि 100 मीटर परिभाषा से अधिक क्षेत्र अरावली में आएगा, जबकि FSI की 3 डिग्री ढलान वाली परिभाषा पहले से ही व्यापक थी।

दिल्ली से राजस्थान तक अरावली को लेकर टकराव, आखिर किस बात का है विवाद?

 गुरुग्राम अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा ने दिल्ली से राजस्थान तक विरोध के सुर तेज कर दिए हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं को डर है कि बदली हुई परिभाषा देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली के इकोलॉजिकल संतुलन को बिगाड़ सकती है। नई परिभाषा के अनुसार केवल उसी भू-आकृति को अरावली पहाड़ियों में शामिल किया जाएगा, जो अपने स्थानीय धरातल से कम से कम 100 मीटर ऊंची हो। अरावली रेंज ऐसी दो या दो से ज्यादा पहाड़ियों का समूह है जो एक-दूसरे से 500 मीटर की दूरी पर हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, गुरुग्राम में शनिवार को बड़ी संख्या में कार्यकर्ता, सामाजिक संगठनों के सदस्यों और स्थानीय लोगों हरियाणा के कैबिनेट मंत्री राव नरबीर सिंह के घर के बाहर एकत्रित होकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी बैनर और तख्तियां लिए हुए थे। वे "अरावली बचाओ, भविष्य बचाओ" और "अरावली नहीं तो जीवन नहीं" जैसे नारे लगा रहे थे। प्रदर्शनकारियों ने नई परिभाषा को मंजूरी देने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भी गहरी चिंता व्यक्त जताई। अरावली की नई परिभाषा के बारे में क्या कहते हैं एक्टिविस्ट? पीटीआई की एक रिपोर्ट में बताए गए एक्टिविस्ट्स के मुताबिक, नई परिभाषा से माइनिंग, कंस्ट्रक्शन और कमर्शियल एक्टिविटीज को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे अरावली रेंज की प्राकृतिक सुंदरता नष्ट होने का खतरा बढ़ जाएगा। एक प्रदर्शनकारी ने बताया कि हमारा मानना ​​है कि यह फैसला इसके इकोलॉजिकल संतुलन के लिए नुकसानदायक हो सकता है। एक्टिविस्ट्स का कहना है कि अरावली पर्वत श्रृंखला दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करती है, जो प्रदूषण, रेगिस्तान बनने और पानी के संकट को रोकने में अहम भूमिका निभाती है। उन्होंने मांग की कि सरकार अरावली को पूरी तरह से संरक्षित क्षेत्र घोषित करे और एक सख्त और स्पष्ट संरक्षण नीति लागू करे। एक अन्य प्रदर्शनकारी ने कहा, "विकास के नाम पर प्रकृति से समझौता नहीं किया जा सकता, क्योंकि अरावली का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से जुड़ा है। हवा में जहर धीरे-धीरे फैलता जा रहा है।'' राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस नेता टीकाराम जूली ने शनिवार को केंद्र सरकार के अरावली रेंज को फिर से परिभाषित करने के कदम की आलोचना की, जिससे 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों वाले इलाकों में माइनिंग की इजाजत मिल जाएगी। जूली ने चेतावनी दी कि इससे बड़े पैमाने पर इकोलॉजिकल नुकसान होने के साथ ही रेगिस्तान बन सकता है, क्योंकि अरावली रेंज रेगिस्तान बनने से रोकने और ग्राउंडवॉटर लेवल बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। जूली ने एएनआई को बताया, "एक तरफ आप 'एक पेड़ मां के नाम' नाम से कैंपेन चला रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आप अपने दोस्तों के लिए लाखों पेड़ काट रहे हैं। यह गलत है… अरावली राजस्थान की जीवनरेखा है। यह अरावली ही रेगिस्तान को रोकती है… वैज्ञानिकों ने भी माना है कि अगर अरावली पर्वत श्रृंखला नहीं होती, तो दिल्ली तक का पूरा इलाका रेगिस्तान बन गया होता।" सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत एक कमेटी की अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की परिभाषा संबंधी सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था। अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा तय किए जाने के विरोध में शानिवार को राजस्थान के उदयपुर में बड़ी संख्या में वकीलों ने विरोध प्रदर्शन किया।इन वकीलों ने अरावली पर्वतमाला की ऊंचाई पर आधारित नई परिभाषा पर चिंता जताई। वकीलों ने नारेबाजी करते हुए न्यायालय परिसर से जिला कलेक्ट्रेट तक मार्च किया। वहां उन्होंने अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट को राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन सौंपा।