त्योहारों का महत्व DJ से नहीं सामाजिक उपयोगिता से तय हो: डॉ. दिनेश मिश्र
डी जे के शोर और अव्यवस्था से मुक्त हों त्यौहार. डॉ दिनेश मिश्र उत्सव का महत्व डी जे से नहीं सामाजिक उपयोगिता से तय हो बिलासपुर/रायपुर पिछले वर्ष महाराष्ट्र के सोलापुर और इस वर्ष पूना में आम नागरिकों के गणेशोत्सव में डी जे, कोलाहल, से मुक्त करने के लिए पहल की , जिसमें से सोलापुर तो पिछले वर्ष से ही डीजे मुक्त हो चुका है और इस वर्ष पूना में यह आवाज उठी है. जबकि गणेशोत्सव की परंपरा करीब 125 वर्ष पहले लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में महाराष्ट्र से ही आरंभ हुई थी ताकि लोगों में एकता बने, एक दूसरे के साथ मिलकर दुख सुख बाँटे. अंध श्रद्धा उन्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ दिनेश मिश्रा ने उक्त अपील जारी करते हुए कहा कि सांस्कृतिक कार्यक्रम, साहित्यिक प्रतियोगिताएं, कवि सम्मेलन, जैसे कार्यक्रम के बदले अब उत्सव का स्वरूप प्रति वर्ष बदलता हुआ नजर आ रहा है , जिसमें आस्था के नाम परशोरशराबे, फिल्मी गानों, मनमानी पूर्ण रोकटोक, हावी होने लगी है. क्या रायपुर बल्कि कहा जाए पूरे देश के नागरिकों को अपने इन उत्सवों की गरिमा, महत्व के सम्बन्ध में सोचने की आवश्यकता है. प्रशासन, नगरनिगम, पुलिस व्यवस्था बनाने का प्रयास करते है ,पर जनसमर्थन के बिना वे भी सफल नहीं हो पाते. हमारे त्योहार , की पहचान ,शोर, शराबे और दिखावे से नहीं, आस्था व संस्कारों से है. गणेशोत्सव हमारी धार्मिक आस्था, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक परंपराओं का महत्वपूर्ण पर्व है। गणेश जी बुद्धि, विवेक, ज्ञान और शुभारंभ के प्रतीक माने जाते हैं। इसलिए गणेशोत्सव केवल पूजा और मनोरंजन का अवसर नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और सकारात्मक संदेश देने का माध्यम भी होना चाहिए। लेकिन आज सार्वजनिक उत्सवों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। भक्ति और सामाजिक सहभागिता के स्थान पर कई बार तेज आवाज में डीजे, अत्यधिक शोर, चकाचौंध, दिखावा और अनावश्यक प्रतिस्पर्धा उत्सव का प्रमुख हिस्सा बन जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि जिस त्योहार से आनंद और शांति मिलनी चाहिए, वही आसपास रहने वाले लोगों के लिए परेशानी का कारण बन जाता है। गणेशोत्सव का अर्थ तेज आवाज में डीजे बजाना नहीं है।हमें यह विचार करना होगा कि क्या हमारी आस्था इतनी कमजोर है कि उसे व्यक्त करने के लिए अत्यधिक शोर आवश्यक हो? क्या भक्ति की गहराई डीजे की आवाज से निर्धारित होगी?निश्चित रूप से नहीं। डीजे का बढ़ता शोर और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है .आज सार्वजनिक आयोजनों में देर रात तक तेज आवाज में डीजे बजाना आम होता जा रहा है। इसका सबसे अधिक असर बुजुर्गों, छोटे बच्चों, विद्यार्थियों, बीमार व्यक्तियों और उन लोगों पर पड़ता है जिन्हें सुबह जल्दी अपने काम पर जाना होता है। अत्यधिक ध्वनि वातावरण में बेचैनी, चिड़चिड़ापन, तनाव, नींद में बाधा और एकाग्रता में कमी जैसी परेशानियां बढ़ा सकती है। लंबे समय तक अत्यधिक शोर स्वास्थ्य के लिए भी उचित नहीं माना जाता। एक चिकित्सक के रूप में मेरा मानना है कि सार्वजनिक उत्सवों में स्वास्थ्य और नागरिक सुविधा का ध्यान रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।जिस उत्सव के कोलाहल से किसी बीमार व्यक्ति की परेशानी बढ़े, किसी विद्यार्थी की पढ़ाई प्रभावित हो या किसी बुजुर्ग की नींद खराब हो, उसके स्वरूप पर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए। न्यायालय के निर्देशों का सम्मान जरूरी ध्वनि प्रदूषण और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े मामलों में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर ध्वनि की सीमा, समय और नागरिकों के अधिकारों के संबंध में महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। त्योहार मनाने की स्वतंत्रता सभी को है, लेकिन किसी की स्वतंत्रता दूसरे व्यक्ति के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार को प्रभावित नहीं कर सकती। इसलिए धार्मिक आयोजनों में भी निर्धारित नियमों का पालन होना चाहिए।कानून का पालन करना आस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक होने का प्रमाण है। सड़कें जाम नहीं, व्यवस्था चाहिए .सार्वजनिक गणेशोत्सव के दौरान एक और गंभीर समस्या सड़कों पर पंडाल और अन्य व्यवस्थाओं के कारण होने वाला अतिक्रमण तथा यातायात अव्यवस्था है। कई स्थानों पर सड़क का बड़ा हिस्सा घिर जाने से यातायात बाधित होता है और जाम की स्थिति बन जाती है। ऐसी स्थिति में एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और अन्य आवश्यक सेवाओं के वाहनों को भी परेशानी हो सकती है। उत्सव सार्वजनिक स्थान पर हो तो सार्वजनिक जिम्मेदारी भी साथ होनी चाहिए।पंडाल लगाने से पहले यातायात, पैदल यात्रियों और आपातकालीन सेवाओं के लिए पर्याप्त स्थान सुनिश्चित किया जाना चाहिए। लेजर की तेज रोशनी भी परेशानी का कारण है.आज सजावट के नाम पर अत्यधिक तेज और चमकदार लाइटों का उपयोग बढ़ गया है। आकर्षक सजावट अच्छी बात है, लेकिन वह सुरक्षित और मर्यादित भी होनी चाहिए।अत्यधिक चमकदार रोशनी से आसपास के लोगों को असुविधा हो सकती है और वाहन चालकों का ध्यान भी प्रभावित हो सकता है। पिछले ही वर्ष मेरे पास एक मरीज आया था जिसकी आँखों में लेसर लाइट के प्रभाव से रक्तस्राव हो गया था, इसके पहले भी अलग अलग स्थानों से हार्ट फेल होने , साँस रुकने के अनेक मामले आए हैं .उत्सव की सुंदरता ऐसी हो जो आंखों को सुख दे, परेशानी नहीं। हमारी पुरानी परंपराओं में सामाजिकता थीछत्तीसगढ़ की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं में सामूहिकता और आपसी संवाद का विशेष महत्व रहा है। पहले सार्वजनिक अवसरों पर लोग एक-दूसरे के घर और कार्यक्रमों में बैठते थे, बातचीत करते थे और सामाजिक संबंध मजबूत करते थे। रायपुर के अनेक गणेशोत्सव के पंडालों में पान-सुपारी खिलाने का कार्यकम की परंपरा केवल खान-पान से जुड़ी नहीं थी, बल्कि उसमें अपनापन और संवाद का भाव भी था। लोग बैठते थे, बातचीत करते थे और एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते थे। आज जब समाज में संवाद का समय कम होता जा रहा है, तब सार्वजनिक उत्सवों को लोगों को जोड़ने का माध्यम बनाया जाना चाहिए। साहित्य और संस्कृति को मिले मंच.गणेशोत्सव में साहित्यिक प्रतियोगिताएं आयोजित की जा सकती हैं। निबंध लेखन, भाषण, कविता पाठ, वाद-विवाद, चित्रकला, प्रश्नोत्तरी और सामान्य ज्ञान प्रतियोगिताओं के माध्यम से बच्चों और युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया जा सकता है। गणेश जी बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक हैं। इसलिए गणेशोत्सव में ज्ञान आधारित कार्यक्रमों को विशेष स्थान मिलना चाहिए। खेलकूद से स्वस्थ समाजगणेशोत्सव के दौरान कबड्डी, खो-खो, दौड़, शतरंज, कैरम, बैडमिंटन तथा अन्य खेल प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जा सकती हैं।.इससे बच्चों और युवाओं … Read more