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अयोध्या श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के दान में हेराफेरी मामले में पहली प्राथमिकी दर्ज

यूपी सरकार का कड़ा रुख, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र दान प्रकरण में दर्ज हुई पहली एफआईआर  अयोध्या श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के दान में हेराफेरी मामले में पहली प्राथमिकी दर्ज सीएम योगी के निर्देश पर गठित एसआईटी ने प्रारंभिक प्रतिवेदन में की हैं कठोर संस्तुतियां ट्रस्ट के सदस्य कृष्णमोहन की शिकायत पर श्रीराम जन्मभूमि थाने में दर्ज किया गया मामला एफआईआर में 8 नामजद के अलावा अज्ञात आरोपियों का भी उल्लेख आरोपियों से जारी है पूछताछ लखनऊ/अयोध्या  यूपी सरकार के सख्त रुख की वजह से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र दान प्रकरण में 8 नामजद व अन्य अज्ञात आरोपियों के खिलाफ पहली एफआईआर दर्ज कर ली गई है। तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अनुरोध पर सीएम योगी द्वारा गठित एसआईटी के प्रारम्भिक प्रतिवेदन में कठोर संस्तुतियां की गई हैं। फिलहाल आरोपियों से पूछताछ की जा रही है। ट्रस्ट के सदस्य कृष्णमोहन की लिखित शिकायत पर  श्रीराम जन्मभूमि थाने में दर्ज की गई इस एफआईआर (अपराध संख्या 90/2026) में अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पाण्डेय, रमाशंकर मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव, श्री राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू को नामजद तथा अन्य अज्ञात व्यक्तियों को अभियुक्त बनाया गया है। आरोपियों के खिलाफ धारा 305, 306, 316(5), 317(4), 317(5), 61, 3(5) बीएनएस व 13(1)(a) पीसी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है। दरअसल, अयोध्या राम मंदिर में बीते दिनों दान चोरी का मामला सामने आया. यह चंदा चोरी का मामला मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए नकद दान और अन्य चढ़ावे में कथित गड़बड़ी से जुड़ा है. उत्तर प्रदेश सरकार की एसआईटी की प्रारंभिक जांच के बाद मंदिर ट्रस्ट की शिकायत पर आठ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई. आरोप है कि दान की राशि में हेराफेरी, आपराधिक साजिश और भरोसे का उल्लंघन किया गया. कितने का गबन है और कौन-कौन इसके मास्टरमाइंड हैं, इसकी जांच जारी है।  राम मंदिर चंदा चोरी मामले में गुरुवार को बड़ा एक्शन बहरहाल, राम मंदिर चंदा चोरी मामले में गुरुवार देर रात तक हलचल थी. गुरुवार देर रात तक सबकी गिरफ्तारी हो गई. ट्रस्ट के सदस्य कृष्णमोहन की लिखित शिकायत पर श्रीराम जन्मभूमि थाने में एफआईआर दर्ज की गई. इस एफआईआर (अपराध संख्या 90/2026) में अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पाण्डेय, रमाशंकर मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव, श्री राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू को नामजद और अन्य अज्ञात व्यक्तियों को अभियुक्त बनाया गया है।  एफआईआर में किस-किसका नाम, कौन-कौन अरेस्ट?     रमाशंकर यादव उर्फ टिन्नू (चम्पत राय का करीबी और ड्राइवर)     अनुकल्प मिश्र     अविनाश शुक्ला     करुणेश पांडेय     मनीष यादव     लवकुश मिश्र     रमा शंकर मिश्र     सुभाष श्रीवास्तव (गणना इंचार्ज और रिटायर्ड बैंक कर्मी)   करुणेश पांडेय का क्या रोल था राम मंदिर में चंदा चोरी में गिरफ्तार करुणेश पांडेय का काम मंदिर में चढ़ाए जाने वाले चढ़ावों का गणना कक्ष तक पहुंचाने का रोल था. श्रीराम मंदिर में जो भी चढ़ाया जाया करता था, उस चढ़ावे को गणना कक्ष सिर्फ ले जाने का ही नहीं बल्कि गेनने का काम था.  करुणेश पर आरोप है कि इन्होंने दानराशि चुराकर संपत्ति अर्जित की है।  रमाशंकर यादव उर्फ टिन्नू  श्रीराम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के करीबी रमाशंकर यादव उर्फ टिन्नू को गिरफ्तार किया गया. राम मंदिर में उनका काम व्यवस्थापक, मंदिर में श्रद्धालुओं के दर्शन कराने से लेकर जनसुविधाओं का ध्यान रखता था. टुन्नू यादव अकेला ऐसा शख्स था, जो बेरोकटोक मंदिर में कही आ जा सकता है. टुन्नू यादव की गाड़ी बुलेट मंदिर के अंदर जाकर खड़ी होती थी. इनका काम दानपात्रों की देखरेख करना और उन्हें बेसमेंट तक पहुंचाने का था।    सुभाष चंद्र श्रीवास्तव  राम मंदिर चंदा चोरी में फंसे सुभाष चंद्र श्रीवास्तव एसबीआई से रिटार्ड बैंक कर्मी है. राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे वाले नोट गिनने की पूरी प्रक्रिया के इंचार्ज थे.  कैश काउंटिंग सेंटर के स्टाफ की निगरानी करना था. सुभाष कैश काउंटिंग सेंटर के स्टाफ का प्रभारी था।  लवकुश मिश्रा  अयोध्या के राम मंदिर में आने वाले तमाम चढ़ावा और नकदी को गिनने वाली टीम में लवकुश मिश्रा शामिल थे.  लवकुश मिश्र मंदिर में आने वाले चढ़ावे को गिनने का काम करता था. लवकुश मिश्र के घर से करीब 10 लाख रुपए बरामद हुए थे।  अनुकल्प मिश्रा  राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे को गणना कक्ष में गिनने की जिम्मेदारी अनुकल्प मिश्रा के पास थी. मंदिर में चढ़ावे वाले रुपये को गिनने के काम से लगभग दो साल से कर रहा था. श्रद्धालुओं की मदद के लिए बने सुविधा सेंटर में तैनात था, लेकिन वह नोट गिनने की प्रक्रिया में शामिल था. उस पर ऊपर चढ़ावा के वाउचर में गड़बड़ी करने का आरोप है. लवकुश मिश्रा का रिश्ते में साला लगता है।  मनीष यादव  मनीष यादव पर राम मंदिर के दानपात्रों में चढ़ाए गए चढ़ावे में नकली नोट निकालने और उसे गिनकर अलग रखने की जिम्मेदारी थी. मनीष पर भी चढ़ावा चोरी का आरोप है।  अविनाश शुक्ला राम मंदिर में चढ़ावे वाले पैसे और नकदी को दान पात्रों से निकालने और धनराशि को गणना कक्ष तक ले जाने का काम अविनाश शुक्ला करता था. वहां गिनती करने वाली टीम में शामिल था. अविनाश शुक्ला पर आरोप है कि इन्होंने दान राशि चुराने का काम किया है।  किन-किन धाराओं में केस दर्ज? आरोपियों के खिलाफ धारा 305, 306, 316(5), 317(4), 317(5), 61, 3(5) बीएनएस व 13(1)(a) पीसी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है।  एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट कब सौंपी? इस प्रकरण की जांच कर रही एसआईटी के प्रमुख सदस्य लखनऊ मंडल के आयुक्त विजय विश्वास पंत ने बीते मंगलवार को टीम के अन्य दो सदस्यों के साथ शासन को प्रारंभिक प्रतिवेदन सौंपा था, जिसमें कठोर अनुशंसा हैं।  क्यों हुआ था एसआईटी का गठन इसके बाद ही गुरुवार को एफआईआर दर्ज किए जाने की कार्रवाई अंजाम दी गई है. श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के भेंट/चढ़ावा में चोरी का मामला सामने आने के बाद ट्रस्ट ने विशेष जांच का अनुरोध किया था. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर प्रकरण की जांच के लिए ट्रस्ट का गठन हुआ था।  एफईआईर में चंपत राय का नाम है या नहीं राम मंदिर दान चोरी मामले में जिन आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की … Read more

यात्री सुरक्षा को लेकर योगी सरकार का बड़ा कदम, 30 दिन चलेगा विशेष जांच अभियान

लखनऊ अग्निकांड के बाद परिवहन विभाग अलर्ट, बसों में फायर सेफ्टी की होगी सघन जांच यात्री सुरक्षा को लेकर योगी सरकार का बड़ा कदम, 30 दिन चलेगा विशेष जांच अभियान अग्निशमन यंत्र नहीं तो नहीं मिलेगा फिटनेस सर्टिफिकेट, परिवहन विभाग का सख्त निर्देश 23 जुलाई तक चलेगा विशेष अभियान, परिवहन मुख्यालय को देनी होगी रिपोर्ट लखनऊ  लखनऊ अलीगंज अग्निकांड के बाद योगी सरकार लोगों को सुरक्षा को लेकर बेहद सतर्क हो गई है। विभिन्न विभागों ने ऐसे हादसों को रोकने के लिए तैयारी शुरू कर दी है। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग ने यात्री सुरक्षा को लेकर बड़ा कदम उठाया है। परिवहन आयुक्त उत्तर प्रदेश के निर्देश पर प्रदेशभर में अगले 30 दिनों तक विशेष अभियान चलाकर स्लीपर बसों, स्कूल बसों, स्टेज कैरिज बसों और कॉन्ट्रैक्ट कैरिज बसों में अग्निशमन यंत्रों की उपलब्धता और उनकी कार्यशीलता की सघन जांच की जाएगी। परिवहन आयुक्त आशुतोष निरंजन द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि लखनऊ अग्निकांड ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि किसी भी आपातकालीन स्थिति में अग्नि सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता और उनकी प्रभावशीलता जनजीवन की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी को ध्यान में रखते हुए सभी संभागीय और सहायक संभागीय परिवहन अधिकारियों को विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। अभियान के तहत फिटनेस जांच के समय वाहनों में लगे अग्निशमन यंत्रों की उपलब्धता, क्षमता, वैधता, कार्यशीलता तथा उनके उचित स्थान पर स्थापित होने की विशेष रूप से जांच की जाएगी। अधिकारियों को यह भी सुनिश्चित करने को कहा गया है कि अग्निशमन यंत्र निर्धारित अवधि के भीतर रिफिल अथवा सर्विस किए गए हों और उनकी वैधता समाप्त न हुई हो। फिटनेस प्रमाणपत्र जारी करने को लेकर शर्तें निर्देशों के अनुसार जिन वाहनों में अग्निशमन यंत्र उपलब्ध नहीं पाए जाएंगे, अथवा उपकरण कार्यशील स्थिति में नहीं होंगे या उनकी वैधता समाप्त हो चुकी होगी, ऐसे वाहनों को कमियां दूर होने तक फिटनेस प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जाएगा। साथ ही आवश्यक प्रवर्तन कार्रवाई भी की जाएगी। विशेष अभियान के दौरान प्रवर्तन अधिकारी बस अड्डों, प्रमुख मार्गों, टोल प्लाजा, जनपद सीमाओं और अन्य उपयुक्त स्थानों पर वाहनों की सघन जांच करेंगे। स्लीपर बसों की जांच में आपातकालीन निकास, हैमर, विद्युत वायरिंग और अन्य सुरक्षा उपकरणों की भी पड़ताल की जाएगी। वहीं स्कूल बसों में अग्निशमन यंत्रों के साथ अन्य निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुपालन का सत्यापन भी किया जाएगा। जांच अभियान की मुख्यालय को देनी होगी रिपोर्ट परिवहन विभाग ने वाहन स्वामियों, बस संचालकों, परिवहन कंपनियों और विद्यालय प्रबंधन को अग्नि सुरक्षा के प्रति जागरूक करने, अग्निशमन यंत्रों के नियमित अनुरक्षण और समयबद्ध परीक्षण सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। यह 30 दिवसीय विशेष अभियान 23 जुलाई 2026 तक संचालित किया जाएगा। सभी क्षेत्रीय अधिकारियों को अभियान के दौरान की गई जांच और प्रवर्तन कार्रवाई का विस्तृत विवरण परिवहन मुख्यालय को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।

आज से बदल गए LPG के नियम! कच्चे तेल की कीमत घटते ही सरकार का बड़ा ऐलान, जानिए क्या बदला

 नई दिल्‍ली एलपीजी को लेकर सरकार ने बड़ा ऐलान किया है. अभी तक जो भी नियम कायदे और पाबंदियां लागू थीं, उसे अब खत्‍म कर दिया गया है. लेकिन यह सिर्फ इंडस्ट्रियल और कमर्शियल LPG ग्राहकों के लिए ही है. सरकार ने नॉन-डोमेस्टिक पैक्ड LPG की सप्लाई पर लगी सभी सेक्टर-वाइज पाबंदियां हटा दी हैं और सप्लाई को वेस्ट एशिया संकट से पहले के स्तर पर बहाल कर दिया है।  पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कहा कि संकट की शुरुआत में रोकी गई बल्क LPG की सप्लाई में भी ढील दी गई है. इसे संकट से पहले की खपत के स्तर का 50% कर दिया गया है, जिससे कमर्शियल और इंडस्ट्रियल कस्‍टमर्स को काफी राहत मिली है. यह बहाली LPG सप्लाई की स्थिति में हाल ही में हुए सुधार के बाद की गई है.  सरल शब्‍दों में कहें तो 50 फीसदी एलपीजी की सप्‍लाई अब कमर्शियल और इंडस्‍ट्री कस्‍टमर्स को की जाएंगी।  वेस्ट एशिया संकट के दौरान, घरेलू LPG उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार ने 'आवश्यक वस्तु अधिनियम' के तहत आदेश जारी किए थे. इन आदेशों के तहत C3-C4 स्ट्रीम्स का इस्तेमाल सिर्फ़ LPG उत्पादन के लिए करना जरूरी कर दिया गया था और उन्हें पेट्रोकेमिकल व अन्य डाउनस्ट्रीम इस्तेमाल से हटाकर LPG उत्पादन में लगाया गया था।  C3-C4 स्ट्रीम्स को लेकर बदलाव पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कहा कि घरेलू LPG उत्पादन में सुधार और इम्पोर्टेड LPG कार्गो की अनुमानित उपलब्धता को देखते हुए, सरकार ने LPG पूल में C3/C4 स्ट्रीम्स के डायवर्जन को कम करने का भी फैसला किया है. नॉन-LPG इस्तेमाल के लिए C3-C4 स्ट्रीम्स का बढ़ा हुआ आवंटन लागू किया जाएगा, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि घरेलू LPG की उपलब्धता पर कोई असर न पड़े।  घरेलू एलपीजी पर कोई असर नहीं सरकार ने साफ किया है कि पेट्रोकेमिकल सेक्टर के लिए C3-C4 गैसों का आवंटन बढ़ाने के बावजूद आम जनता के लिए घरेलू एलपीजी की उपलब्‍धता को कम नहीं किया जाएगा. सरकार यह तय करेगी कि घरेलू एलपीजी का उत्‍पादन कम से कम 40 टीएमटी हर दिन बना रहे. इसका मतलब है कि रसोई एलपीजी गैस की सप्‍लाई बनी रहेगी। कच्‍चे तेल के दाम में बड़ी गिरावट  जंग शुरू होने से पहले कच्‍चा तेल जिस लेवल पर पहुंचा था, अब उससे भी नीचे आ चुका है. ब्रेंट क्रूड की कीमत अब 72 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रही है. तेल की कीमतों में यह गिरावट तब आई है, जब होर्मुज को फिर से खोल दिया गया है और जहाज तेजी से होर्मुज पार कर रहे हैं। 

ईरान के ड्रोन अटैक से दहला होर्मुज जलडमरूमध्य, 11,000 नाविक फंसे, वैश्विक शिपिंग पर मंडराया बड़ा खतरा

 नई दिल्ली होर्मुज स्ट्रेट में ड्रोन हमले के बाद एक बार फिर तनाव बढ़ गया है. यह हमला तब हुआ जब यूनाइटेड नेशन की टीम इस क्षेत्र में रेस्क्यू अभियान में जुटी थी. ओमान के तट के पास एक कार्गो शिप पर हुए हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र (UN) की समुद्री एजेंसी इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गेनाइजेशन (IMO) ने इस रेस्क्यू अभियान को रोक दिया है. इस फैसले से करीब 11 हजार नाविकों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है, जो अभी भी फारस की खाड़ी में फंसे जहाजों पर मौजूद हैं।  पिछले कुछ दिनों से संयुक्त राष्ट्र, ओमान और कई सदस्य देशों की मदद से फारस की खाड़ी में फंसे जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालने का अभियान चला रहा था. इस मिशन का मकसद उन जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट पार कराना था, जो युद्ध और सुरक्षा प्रतिबंधों की वजह से कई दिनों से फंसे हुए थे।  इसी दौरान ओमान के तट के पास सिंगापुर के झंडे वाले कार्गो शिप एवर लवली पर ड्रोन हमला हो गया. हमले में जहाज के ब्रिज को नुकसान पहुंचा. हालांकि किसी नाविक की मौत या गंभीर चोट की खबर नहीं है. इसके तुरंत बाद IMO ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पूरे रेस्क्यू अभियान को अस्थायी रूप से रोक दिया।  UN ने रेस्क्यू क्यों रोक दिया? IMO के महासचिव आर्सेनियो डोमिंगेज ने कहा कि जब तक इवैक्युएशन लिस्ट में शामिल जहाजों की सुरक्षा की गारंटी नहीं मिल जाती, तब तक अभियान आगे नहीं बढ़ाया जाएगा. हालांकि जिस जहाज पर हमला हुआ, वह UN के रेस्क्यू मिशन का हिस्सा नहीं था. लेकिन घटना ने यह साफ कर दिया कि समुद्री रास्ता अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।  IMO के मुताबिक इस पूरे इलाके में करीब 20 हजार से ज्यादा नाविक अलग-अलग जहाजों पर फंसे हुए हैं. इनमें से लगभग 11 हजार नाविकों को निकालने के लिए विशेष इवैक्युएशन प्लान तैयार किया गया था. अब रेस्क्यू अभियान रुकने के बाद ये नाविक फिर से बीच समंदर में फंस गए हैं. उन्हें नहीं पता कि वे कब सुरक्षित तरीके से होर्मुज स्ट्रेट पार कर पाएंगे।  यूनाइटेड नेशन ने पहले ही जहाजों को स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि बिना इजाजत किसी भी तरह की आवाजाही न करें. इसके साथ ही IMO ने भी चेतावनी दी थी कि निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है. जहाजों की आवाजाही तभी शुरू की जानी थी, जब IMO, UKMTO और MICA सेंटर के कोऑर्डिनेटेड सिस्टम के जरिए सभी वेसल्स से संपर्क स्थापित हो जाए. इसके बाद संबंधित कोस्टल लाइन्स से बातचीत के बाद ही आगे बढ़ने की इजाजत थी।  ईरान ने हमला क्यों किया? ईरान ने कुछ दिन पहले ही चेतावनी दी थी कि उसकी इजाजत के बिना कोई भी जहाज संयुक्त राष्ट्र और ओमान द्वारा तैयार किए गए नए समुद्री मार्ग का इस्तेमाल न करे. ड्रोन हमले के कुछ घंटों बाद ईरान की नई पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी (PGSA) ने बयान जारी कर कहा कि जो जहाज ईरान द्वारा तय किए गए आधिकारिक रास्ते के बजाय दूसरे मार्ग का इस्तेमाल करेंगे, उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होगी।  होर्मुज से गुजरने वाले सभी जहाजों के लिए ईरान की तरफ से एक समुद्री कॉरिडोर तय किया गया है. जहाजों को सिर्फ लारक आईलैंड (Larak Island) के पास बनाए गए आधिकारिक मार्ग से ही गुजरने की इजाजत दी गई है. इस रूट के अलावा किसी भी रूट से गुजरने पर सख्त चेतावनी दी गई थी. ईरान ने एक नोटिफिकेशन में स्पष्ट कहा था कि, किसी भी उल्लंघन की स्थिति में होने वाले नुकसान, जुर्माने या दुर्घटना की पूरी जिम्मेदारी संबंधित जहाज के मालिक और कप्तान (मास्टर) की होगी।  यानी ईरान साफ संदेश देना चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों को उसके नियम मानने होंगे. ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने ओमान की तरफ से दक्षिणी रास्ते को खतरनाक बताकर खारिज कर दिया था और जहाजों को चेतावनी दी थी कि वे सिर्फ तेहरान से मंजूर रास्तों का ही इस्तेमाल करें।  आखिर विवाद किस रास्ते को लेकर है? इस समय होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने के लिए दो अलग-अलग समुद्री कॉरिडोर मौजूद हैं. पहला रास्ता ईरान के समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरता है. इस मार्ग पर जहाजों को ईरान की नई एजेंसी PGSA से पहले इजाजत लेनी होती है. बिना परमिट किसी जहाज को प्रवेश नहीं दिया जाता. ईरान का कहना है कि सिर्फ एक यही रूट ही जिससे जहाज को सुरक्षित पासेज दिया जाएगा।  दूसरा रास्ता ओमान के समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरता है. इसी मार्ग को संयुक्त राष्ट्र और ओमान मिलकर सुरक्षित निकासी के लिए इस्तेमाल कर रहे थे. दर्जनों जहाजों को इस रास्ते से पार भी कराया गया है. 24 जून को ही 60 से ज्यादा विमानों को पार कराया गया था. ईरान का कहना है कि उसके तय रास्ते को छोड़कर दूसरे कॉरिडोर का इस्तेमाल करना नियमों का उल्लंघन है।  होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे अहम ऊर्जा कॉरिडोर माना जाता है. दुनिया के करीब 20 फीसदी कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में एलएनजी-एलपीजी की सप्लाई इसी रास्ते से होती है. भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप के कई देशों की ऊर्जा जरूरतें इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर हैं. अगर यहां लंबे समय तक तनाव बना रहता है तो पूरी दुनिया में तेल और गैस की कीमतें फिर से बढ़ सकती हैं।  अब आगे क्या होगा? फिलहाल IMO, ओमान, ईरान और अन्य सदस्य देशों के साथ बातचीत कर रहा है ताकि जहाजों की सुरक्षित आवाजाही फिर शुरू की जा सके. IMO ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती, तब तक हजारों नाविक समुद्र में फंसे रह सकते हैं. यानी अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के बीच होर्मुज स्ट्रेट में हुए ड्रोन हमले ने पूरी वैश्विक शिपिंग व्यवस्था और हजारों नाविकों की सुरक्षा को फिर से संकट में डाल दिया है. अगर जल्द कोई समाधान नहीं निकला तो इसका असर सिर्फ समुद्री व्यापार ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में तेल की सप्लाई और कीमतों पर भी पड़ सकता है। 

रिटायरमेंट से पहले खुद जान सकेंगे लीव इनकैशमेंट की राशि, 4.50 लाख कर्मचारियों को मिलेगा लाभ

भोपाल  मध्य प्रदेश सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए लीव इनकैशमेंट राशि को लेकर आदेश जारी किया है। अब कर्मचारी रिटायरमेंट या ड्यूटी के दौरान मौत की स्थिति में मिलने वाली छुट्टी लीव इनकैशमेंट राशि का अनुमान खुद लगा सकेंगे। वित्त विभाग ने सभी विभागों, कार्यालयों और संबंधित अधिकारियों को निर्देश जारी किया है। सरकार के फैसले को कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, क्योंकि लंबे समय से अवकाश नकदीकरण की गणना को लेकर अलग-अलग विभागों में भ्रम और विवाद की स्थिति बनती रही है। नए निर्देशों के बाद पूरे प्रदेश में एक समान प्रक्रिया लागू होगी। अर्जित अवकाश का रिकॉर्ड रखने के निर्देश वित्त विभाग के आदेश में सभी विभागों को यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि अवकाश नकदीकरण की गणना निर्धारित नियमों के अनुसार ही की जाएगी। विभागों को निर्देश दिए गए हैं कि कर्मचारियों के अर्जित अवकाश का रिकॉर्ड सही तरीके से रखा जाए। भुगतान के समय एक समान प्रक्रिया अपनाई जाए। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी कर्मचारी को भुगतान में देरी न हो और गणना में गलतियां न हों। अधिकतम 300 दिन के अवकाश का मिलेगा भुगतान राज्य सरकार के नियमों के अनुसार किसी भी कर्मचारी को अधिकतम 300 दिनों के अर्जित अवकाश का नकदीकरण लाभ दिया जाएगा। अगर किसी कर्मचारी के खाते में 300 दिनों से अधिक अर्जित अवकाश मौजूद है, तब भी भुगतान केवल 300 दिनों तक ही सीमित रहेगा। पहले लाभ लिया है तो घटेंगे उतने दिन वित्त विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी पहले किसी अवसर पर अर्जित अवकाश नकदीकरण का लाभ ले चुका है, तो जितने दिनों का लाभ पहले लिया गया है, उसे 300 दिनों की अधिकतम सीमा में से घटा दिया जाएगा। कर्मचारी को कुल मिलाकर 300 दिनों से अधिक अर्जित अवकाश नकदीकरण का लाभ नहीं मिल सकेगा। कर्मचारियों को क्या होगा फायदा?     नए आदेश के बाद सरकारी कर्मचारियों को कई तरह के लाभ मिलने की उम्मीद है।     कर्मचारी पहले से अपनी संभावित लीव इनकैशमेंट राशि का अनुमान लगा सकेंगे।     विभागों में गणना को लेकर होने वाली गलतियों में कमी आएगी।     भुगतान संबंधी विवाद कम होंगे।     सभी विभागों में एक समान नियम और प्रक्रिया लागू होगी।     रिटायरमेंट के समय कर्मचारियों को मिलने वाले लाभों की पारदर्शिता बढ़ेगी। ईएल इनकैशमेंट पर पारदर्शी लाना राज्य सरकार का कहना है कि इस आदेश का मुख्य उद्देश्य अर्जित अवकाश नकदीकरण की प्रक्रिया को पारदर्शी, सरल और एकरूप बनाना है। अलग-अलग विभागों में अपनाई जा रही अलग-अलग प्रक्रियाओं के कारण कई बार कर्मचारियों को परेशानी का सामना करना पड़ता था। अब वित्त विभाग के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बाद सभी विभागों में एक जैसी व्यवस्था लागू होगी। क्या होता है लीव इनकैशमेंट सरकारी सेवा के दौरान कर्मचारियों के खाते में अर्जित अवकाश (ईएल) जमा होते रहते हैं। कई कर्मचारी अपने पूरे अर्जित अवकाश का उपयोग नहीं कर पाते, जिसके कारण उनके खाते में बड़ी संख्या में छुट्टी बचे रह जाते हैं। जब कर्मचारी रिटायर होता है या सेवा के दौरान उसकी मौत हो जाती है, तब उसके खाते में बचे हुए ईएल के बदले सरकार नकद भुगतान करती है। इसी भुगतान को अवकाश नकदीकरण या लीव इनकैशमेंट कहा जाता है। यह राशि कर्मचारियों के रिटायरमेंट लाभों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। कई मामलों में यह लाखों रुपए तक पहुंच सकती है।

जल संकट से बाढ़ तक: सिंधु नदी पर भारत के कदम के बाद पाकिस्तान का बदला सुर, समझिए नया खेल

नई दिल्ली पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को स्थगित करने का फैसला लिया. इसके बाद पाकिस्तान में भयंकर पानी का संकट खड़ा हो गया. जिसकी गूंज उसके सरकारी दफ्तरों से लेकर सड़कों तक सुनाई देने लगी. पाकिस्तान के जल प्रबंधन से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि 2025 के खरीफ सीजन की शुरुआत में वहां के अधिकारी 21 फीसदी तक पानी की कमी का अनुमान लगा रहे थे. झेलम और चिनाब नदी में पानी के कम फ्लो को लेकर चिंता बढ़ रही थी. पंजाब और सिंध जैसे कृषि प्रधान प्रांतों में आशंका थी कि सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलेगा. हालात ऐसे बन रहे थे कि पाकिस्तान को अपने जलाशयों का इस्तेमाल बेहद सावधानी से करना पड़ सकता था. लेकिन तभी प्रकृति ने ऐसा मोड़ लिया जिसने पूरी तस्वीर बदल दी।  दिलचस्प बात यह है कि जिस संकट की तैयारी पाकिस्तान कर रहा था, वह आखिरकार आया ही नहीं. भारत के फैसले के बाद जल संकट का डर लगातार बढ़ रहा था. पाकिस्तान के अधिकारियों ने अपनी बैठकों में ‘चिनाब नदी में भारत की ओर से कम जल आपूर्ति के कारण पैदा हुए संकट’ का भी जिक्र किया. लेकिन कुछ महीनों बाद ऊपरी इलाकों में बर्फ तेजी से पिघली और अगस्त 2025 में आई भीषण बाढ़ ने पाकिस्तान की जल स्थिति को पूरी तरह बदल दिया. जो देश पानी की कमी से जूझने की तैयारी कर रहा था, उसके जलाशय कुछ ही महीनों में लगभग पूरी क्षमता तक भर गए. हालांकि यह राहत स्थायी नहीं मानी जा रही, क्योंकि अब एक नया और कहीं बड़ा खतरा सामने खड़ा दिखाई दे रहा है।  जल संकट की तैयारी में जुटा था पाकिस्तान पाकिस्तान की आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक खरीफ सीजन शुरू होने से पहले देश के दो सबसे बड़े जलाशय टरबेला और मंगला लगभग डेड स्टोरेज स्तर के करीब पहुंच चुके थे. पिछले सीजन का बचा हुआ पानी भी बेहद कम था. ऐसे में अधिकारियों ने पूरे सिस्टम में करीब 21 फीसदी जल कमी का अनुमान लगाया था. हालात को देखते हुए पूरे सीजन के लिए जल वितरण योजना को भी टाल दिया गया था. सबसे ज्यादा असर पंजाब और सिंध पर पड़ने की आशंका जताई गई थी, क्योंकि पाकिस्तान की सिंचित कृषि का बड़ा हिस्सा इन्हीं क्षेत्रों पर निर्भर करता है।      पाकिस्तानी अधिकारियों की चिंताओं की वजह भी थी. रिपोर्ट के अनुसार कई बैठकों में झेलम-चिनाब नदी प्रणाली में कम जल प्रवाह को लेकर गंभीर चर्चा हुई. एक बैठक में अधिकारियों ने साफ तौर पर कहा कि ‘चिनाब नदी में भारत की ओर से कम आपूर्ति के कारण पैदा हुए संकट’ से निपटने के लिए जलाशयों का संचालन बेहद सावधानी से करना होगा ताकि सभी प्रांतों को निर्धारित हिस्से का पानी मिल सके।  फिर बदली किस्मत, बाढ़ बनी वरदान सीजन के दूसरे हिस्से में मौसम ने अप्रत्याशित करवट ली. ऊपरी सिंधु बेसिन में तापमान बढ़ने से बर्फ तेजी से पिघलने लगी. इससे नदी में पानी का प्रवाह बढ़ गया. इसके बाद अगस्त 2025 के आखिर में चिनाब और पूर्वी नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश हुई. इस बारिश ने बड़े पैमाने पर बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी. रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने खरीफ सीजन के लिए 104.03 मिलियन एकड़ फीट (MAF) जल प्रवाह का अनुमान लगाया था. लेकिन वास्तविक जल प्रवाह 122.36 MAF दर्ज किया गया, जो अनुमान से करीब 18 फीसदी अधिक था. इससे पाकिस्तान का पूरा जल संतुलन बदल गया. जहां पहले कमी की आशंका थी, वहीं बाद में जरूरत से ज्यादा पानी मिलने लगा।  99 फीसदी तक भर गए जलाशय बाढ़ और बर्फ पिघलने से मिले अतिरिक्त पानी का असर बहुत जल्दी दिखाई देने लगा. सितंबर 2025 तक पाकिस्तान के प्रमुख जलाशय लगभग 99 फीसदी क्षमता तक भर चुके थे. सीजन की शुरुआत में जो जलाशय डेड स्टोरेज के करीब थे, वे कुछ ही महीनों में पानी से लबालब हो गए. रिपोर्ट में कहा गया है कि कोटरी बैराज के नीचे बहने वाले अतिरिक्त पानी की मात्रा 30.85 MAF तक पहुंच गई थी. यह अनुमानित मात्रा से तीन गुना अधिक और पिछले पांच सालों के औसत से लगभग 71 फीसदी ज्यादा थी. यानी जिस संकट से पाकिस्तान डर रहा था, उसे प्रकृति ने अस्थायी तौर पर टाल दिया।  लेकिन अब सामने है टरबेला डैम का बड़ा संकट हालांकि पाकिस्तान को बाढ़ ने तत्काल संकट से राहत दिला दी, लेकिन उसकी जल व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी अब भी बरकरार है. रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंता टरबेला जलाशय की घटती क्षमता को लेकर जताई गई है. टरबेला पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक डैम नहीं, बल्कि उसकी कृषि और जल सुरक्षा की रीढ़ माना जाता है. जब टरबेला डैम शुरू हुआ था तब इसकी लाइव स्टोरेज क्षमता 9.68 MAF थी. लेकिन अब यह घटकर करीब 5.73 MAF रह गई है. यानी दशकों में इसमें लगभग 48 फीसदी क्षमता की कमी आ चुकी है. इसका मुख्य कारण तलछट (Sediment) का लगातार जमा होना बताया गया है।  इस्लाम भूला पाकिस्तान, सिंधु घाटी सभ्यता को क्यों कर रहा याद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने जो सिंधु जल समझौते पर भारत को जंग की धमकी दी तो भारत ने जवाब तो दे दिया. लेकिन पिछले साल से पाकिस्तान एक और बड़ा खेल खेलने लग गया है जिसपर ध्यान देने की ज़रूरत है. आज तक पाकिस्तान कभी सिंधु घाटी सभ्यता का नाम भी नहीं लेता था. वो तो अपने स्कूलों-कॉलेजों में उसके बारे में ना ज़्यादा पढ़ाता था और ना ही ज़्यादा कोई रिसर्च वगैरह करवाता था. क्योंकि पाकिस्तान ने अपनी पहचान ही इस्लाम पर खड़ी कर के रखी है. और अपना इतिहास भी वहीं से शुरू हुआ मानता है, जब साल 712 में मोहम्मिद बिन क़ासिम ने हमला कर के सिंध पर क़ब्ज़ा कर लिया था. यानी आज तक वो अपने लोगों को भी यही पढ़ाता था कि जहां से इस्लाम इस इलाक़े में आया वहीं से एक तरह से इतिहास शुरू होता है. लेकिन अब उसको अचानक सिंधु घाटि सभ्यता याद आने लग गई है. अब वो अचानक पिछले कुछ दिनों में सिंधु घाटी सभ्यता को अपनी राष्ट्रीय पहचान का बहुत बड़ा हिस्सा बताता फिर रहा है।  ये कोई … Read more

मध्यप्रदेश सरकार की बड़ी तैयारी, लाखों कर्मचारियों के प्रमोशन का रास्ता होगा साफ

भोपाल  मध्यप्रदेश के सरकारी सेवकों के लिए अच्छी खबर आई है। प्रदेश के अधिकारी, कर्मचारियों की 10 साल से अटकी पदोन्नति की प्रक्रिया 10-15 दिन में शुरू हो सकती है। राज्य सरकार ने इसकी पूरी तैयारी कर ली है। पदोन्नति की प्रक्रिया में बाधा बन रहे कानूनी मसले को सुलझाने के लिए अनेक वरिष्ठ अधिवक्ताओं से भी परामर्श लिया गया है। राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर जबलपुर के अलावा दिल्ली के वरिष्ठ वकीलों और विधि विशेषज्ञों की राय ली है। संबंधित अधिकारियों ने सलाह के आधार पर ही मसौदा तैयार किया है। सीएम मोहन यादव CM Mohan Yadav ने 2016 से बंद पदोन्नति चालू करने का 2025 में ऐलान किया था। सरकार के इस फैसले से प्रदेश के 4.50 लाख सरकारी सेवकों को फायदा होगा। कर्मचारियों, अधिकारियों के प्रमोशन से कई पद भी खाली होंगे जिनपर युवाओं को भर्ती के मौके मिलेंगे। सरकार ने अलग से अपर मुख्य सचिवों, प्रमुख सचिवों, सचिवों, भारसाधक सचिवों व विभागाध्यक्षों को मौखिक रूप से पदोन्नति शुरू करने को कहा है। बड़ी संख्या में कर्मचारियों, अधिकारियों के पदोन्नत होने से करीब दो लाख पद खाली होने की उम्मीद है। इससे युवाओं की नौकरी का रास्ता साफ होगा। प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन ने अधिकारियों से कहा कि वर्षों पुराने बने गैर जरूरी कानूनों को खत्म करने पर काम करें। वे गुरुवार को कलेक्टर-कमिश्नरों संग वीसी करेंगे, उसके लिए सभी विभाग प्रमुखों को तैयार रहने के लिए कहा है। प्रदेश में 10 साल से पदोन्नतियों पर रोक लगी है, 2016 मई से पदोन्नति बंद बता दें कि प्रदेश में 10 साल से पदोन्नतियों पर रोक लगी है, 2016 मई से पदोन्नति बंद है। इससे कर्मचारी, अधिकारी बिना प्रमोशन के ही रिटायर्ड हो रहे हैं। अभी तक लाखों सरकारी सेवक रिटायर्ड हो चुके हैं। सीएम मोहन यादव ने पिछले साल प्रदेश के कर्मचारियों, अधिकारियों के हित में पदोन्नतियां देने की घोषणा की थी। तब से इस संबंध में अनेक बैठकें हो चुकी हैं। 17 जून को कैबिनेट ने मप्र लोकसेवा पदोन्नति नियम- 2025 को मंजूरी दी। उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की। इसमें 20 जुलाई से शुरू होने वाले विधानसभा के मानसून सत्र की तैयारी, कोर्ट केस प्राथमिकता से निराकृत करने, केंद्र-राज्य के काम को गंभीरता से करने, सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों का निपटारा करने के लिए कहा। बताते हैं, बैठक में पदोन्नति संबंधी बात भी कही। 10 साल में ऐसे हालात 2016 मई से प्रदेश में पदोन्नति बंद है। 10 साल से बिना पदोन्नति ही रिटायर्ड हो रहे कर्मचारी 2026 मई तक लाखों सरकारी सेवक रिटायर्ड हुए सीएम यादव ने पदोन्नति देने की घोषणा की 2025 में बंद पदोन्नति चालू करने का किया ऐलान 10 दिन में शुरु करने की कवायद 4.50 लाख सरकारी सेवकों को फायदा पदोन्न्ति से दो लाख पद खाली होंगे युवाओं की नौकरी का रास्ता साफ होगा

भोपाल में आज आपातकाल दिवस कार्यक्रम, CM करेंगे 2 हजार मीसाबंदी परिवारों को सम्मानित

भोपाल भोपाल के प्रतिष्ठित रवीन्द्र भवन में आपातकाल दिवस के अवसर पर आज  शुक्रवार को एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। इस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शामिल होंगे।कार्यक्रम में लोकतंत्र सेनानी संघ के अध्यक्ष तपन भौमिक के साथ-साथ आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले करीब दो हजार मीसाबंदी परिवारों के सदस्य शिरकत करेंगे।इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं मीसाबंदियों तथा उनके परिजनों को मंच से सम्मानित करेंगे, जो लोकतंत्र की रक्षा के लिए उनके द्वारा किए गए संघर्ष और बलिदान के प्रति सरकार की कृतज्ञता को प्रकट करेगा। मुख्यमंत्री मोहन यादव होंगे मुख्य अतिथि कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। इस दौरान वे आपातकाल के समय लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले मीसाबंदियों और उनके परिजनों को सम्मानित करेंगे। लोकतंत्र सेनानियों के संघर्ष को किया जाएगा याद समारोह में आपातकाल के दौरान जेल गए लोकतंत्र सेनानियों के योगदान और बलिदान को याद किया जाएगा। राज्य सरकार उनके संघर्ष के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए मंच से सम्मान प्रदान करेगी। 2000 परिवारों की रहेगी मौजूदगी कार्यक्रम में प्रदेशभर से करीब 2000 मीसाबंदी परिवारों के सदस्य शामिल होंगे। आयोजन का उद्देश्य लोकतंत्र की रक्षा के लिए किए गए त्याग और संघर्ष को नई पीढ़ी तक पहुंचाना तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। इंदिरा सरकार के अहंकार ने आपातकाल लगाया- सीएम  इस अवसर पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सोशल मीडिया पर लिखा कि 25 जून, 1975… देश में लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला दिन, जब इंदिरा सरकार के अहंकार ने आपातकाल लगाया। इस विभीषिका के विरुद्ध डटकर खड़े होने वाले लोकतंत्र के प्रहरियों को सादर नमन करता हूं। आइए, संकल्प लें कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए सदैव समर्पित होकर देश की सेवा करते रहेंगे।  25 जून 1975 को लगा था आपातकाल उल्लेखनीय है कि देश में 25 जून 1975 को आपातकाल लागू किया गया था। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के इस महत्वपूर्ण अध्याय के 50 वर्ष पूरे होने पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। भोपाल में आयोजित यह कार्यक्रम भी उसी श्रृंखला का हिस्सा होगा, जिसमें लोकतंत्र सेनानियों को विशेष सम्मान दिया जाएगा। 25 जून 1975 को लागू हुआ था आपातकाल भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 25 जून 1975 का दिन महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन देश में आपातकाल लागू किया गया था, जो मार्च 1977 तक प्रभावी रहा। इस अवधि में कई नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए थे और अनेक राजनीतिक नेताओं तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था। सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा हर वर्ष आपातकाल दिवस के अवसर पर लोकतंत्र सेनानियों के योगदान को याद करते हुए कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।  क्या है आपातकाल दिवस ? आपातकाल दिवस भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास के उस सबसे काले अध्याय की याद दिलाता है, जिसकी शुरुआत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान हुई थी। 25 जून 1975 की आधी रात को देश में आधिकारिक रूप से आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा की गई थी, जो 21 महीनों तक यानी 21 मार्च 1977 तक लागू रही। इस दौरान भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे, प्रेस और मीडिया पर सख्त सेंसरशिप लागू कर दी गई थी, और सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले विपक्षी नेताओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना किसी मुकदमे के जेलों में डाल दिया गया था।

भारत के AMCA प्रोजेक्ट को झटका, अमेरिकी इंजन महंगा पड़ने से बढ़ी चिंता

 नई दिल्ली भारत का महत्वाकांक्षी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोजेक्ट नई मुश्किल में फंस गया है. अमेरिका की GE एयरोस्पेस कंपनी का F414 इंजन, जो AMCA Mk-1 और तेजस Mk-2 दोनों के लिए चुना गया था, अब महंगा हो गया है. पहले एक इंजन की कीमत करीब 70-80 करोड़ रुपये थी, जो अब 200 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच गई है।  यह बढ़ोतरी DRDO और एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) के लिए बड़ी चिंता बन गई है. तकनीकी बातचीत में प्रगति हुई थी, लेकिन कीमत, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, प्रोडक्शन और निवेश जैसे व्यावसायिक मुद्दों पर गतिरोध है. GE ने भारत में F414 इंजन की असेंबली और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने का प्रस्ताव दिया है, जिसके लिए 800 मिलियन डॉलर (लगभग 6000 करोड़ रुपये) से ज्यादा निवेश की मांग की गई है।  F414 इंजन मूल रूप से तेजस Mk-2 के लिए चुना गया था. AMCA Mk-1 के शुरुआती संस्करणों के लिए अंतरिम इंजन के रूप में रखा गया है. योजना के अनुसार पहले 2-4 स्क्वॉड्रनों में यह इंजन लगेगा. बाद में ज्यादा शक्तिशाली स्वदेशी इंजन आएगा. AMCA ट्विन इंजन वाला स्टेल्थ फाइटर है, इसलिए प्रोटोटाइप में 5 प्रोटोटाइप्स के लिए करीब 15 इंजनों की जरूरत पड़ेगी।  कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी ने प्रोटोटाइप विकास के लिए 15 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा मंजूर किए हैं. उड़ान परीक्षण में 1800 सॉर्टीज और सात साल लगेंगे. इंजन की समस्या से पूरा कार्यक्रम प्रभावित हो सकता है।  GE के साथ समझौते की चुनौतियां GE F414 पर भारत और अमेरिका के बीच मोदी और बाइडेन के समय मजबूत राजनीतिक समर्थन मिला था. HAL और GE के बीच MoU को रक्षा सहयोग की बड़ी उपलब्धि माना गया. लेकिन व्यावसायिक बातचीत जटिल हो गई है. GE की फैक्ट्री न सिर्फ AMCA बल्कि तेजस Mk-2 और ट्विन इंजन डेक-बेस्ड फाइटर (TEDBF) की जरूरतें भी पूरी कर सकती है।  फिर भी कीमत में अचानक वृद्धि और निवेश की ऊंची मांग ने बातचीत को मुश्किल बना दिया है. कुछ चर्चाओं में शुरुआती इंजन खरीद की संख्या घटाने पर भी विचार हुआ, लेकिन कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।  विकल्पों की तलाश: सैफ्रान और रोल्स-रॉयस अब भारतीय एजेंसियां विकल्प देख रही हैं. फ्रांस की सैफ्रान और ब्रिटेन की रोल्स-रॉयस कंपनियां पहले भी भारत के साथ इंजन विकास में साझेदारी के लिए इच्छुक रही हैं. दोनों कंपनियां टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और औद्योगिक सहयोग का बेहतर प्रस्ताव दे सकती हैं।   हालांकि इंजन बदलना आसान नहीं है क्योंकि यह उड़ान नियंत्रण, सर्टिफिकेशन, परीक्षण और परफॉर्मेंस को प्रभावित करता है. एयरफ्रेम डिजाइन लगभग फाइनल हो चुका है, इसलिए नया इंजन अनुकूलित करना पड़ेगा, पूरी डिजाइन नहीं बदलनी होगी।  तेजस Mk-1A पहले ही इंजन सप्लाई की समस्या से देरी झेल रहा है. AMCA में भी यही समस्या समयरेखा प्रभावित कर सकती है. यह कार्यक्रम भारत की स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी की स्टेल्थ तकनीक हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।  विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को मजबूत वार्ता करनी चाहिए. अगर GE से समझौता नहीं होता तो विकल्पों को तेजी से आगे बढ़ाना होगा. AMCA की सफलता न सिर्फ वायुसेना की ताकत बढ़ाएगी बल्कि भारत को वैश्विक रक्षा निर्यातक बनाने में भी मदद करेगी।  वर्तमान में तीन निजी कंपनियों – टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, L&T-BEL और भारत फोर्ज-BEML को प्रोटोटाइप विकास के लिए RFP जारी किए गए हैं. इंजन मुद्दे का जल्द समाधान AMCA कार्यक्रम की गति बनाए रखने के लिए जरूरी है। 

महानगरों में जमीन का संकट गहराया, भविष्य में आवास को लेकर बढ़ी चिंता

 नई दिल्ली पिछले कुछ दशकों में भारत की तस्वीर तेजी से बदली है, कभी गांवों का देश कहा जाने वाले भारत की एक बहुत बड़ी आबादी रोजगार, बेहतर शिक्षा और आधुनिक जीवनशैली की तलाश में शहरों का रुख कर चुकी है, लेकिन इस सामूहिक पलायन ने एक गंभीर और डरावने सवाल को जन्म दे दिया है, जब शहरों में ज़मीन सीमित है, तो आने वाले समय में ये लोग रहेंगे कहां रहेंगे।  रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2030 तक भारत की 40% से अधिक आबादी शहरों में रह रही होगी, इतनी बड़ी आबादी का दबाव झेलने के लिए हमारे शहरों के पास पर्याप्त जगह ही नहीं बची है. ज़मीन का यह संकट अब केवल एक अंदेशा नहीं, बल्कि हकीकत बन चुका है।  देश के प्रमुख आर्थिक केंद्र इस समय ज़मीन की भारी किल्लत से जूझ रहे हैं. मुंबई भौगोलिक रूप से तीन तरफ से पानी से घिरा है. कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि मुंबई के पास अब हॉरिजॉन्टल विस्तार के लिए जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं बचा है. यही वजह है कि यहां झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या बढ़ी और रीडेवलपमेंट ही एकमात्र रास्ता रह गया. जमीन की कमी के कारण मुंबई भारत का सबसे महंगा और घना शहर बन चुका है।  नोएडा में जमीन खत्म होने के कगार पर  दिल्ली-NCR का सबसे पसंदीदा डेस्टिनेशन माना जाने वाला नोएडा भी अब इसी संकट के मुहाने पर खड़ा है. हालिया मीडिया रिपोर्ट्स और नोएडा अथॉरिटी की बैठकों से यह साफ हुआ है कि मूल नोएडा (Noida Master Plan 2031 के तहत) में अब नया अलॉटमेंट करने के लिए ज़मीन लगभग खत्म हो चुकी है. औद्योगिक, कमर्शियल और आवासीय प्लॉट्स के लिए अथॉरिटी के पास जगह नहीं बची है. यही वजह है कि अब उत्तर प्रदेश सरकार को 'न्यू नोएडा' (दादरी-नोएडा-गाजियाबाद इनवेस्टमेंट रीजन) बसाने के लिए मास्टर प्लान 2041 को मंजूरी देनी पड़ी है, जिसके तहत बुलंदशहर और गौतमबुद्ध नगर के 80 गांवों की जमीन अधिग्रहित की जा रही है।  क्या है इसका विकल्प?  जब ज़मीन खत्म हो रही हो, तो शहरों के पास फैलने का नहीं, बल्कि ऊपर उठने का ही विकल्प बचता है, आने वाले समय में शहरी आबादी पूरी तरह से हाईराइज इमारतों और वर्टिकल लिविंग पर निर्भर हो जाएगी. आने वाले समय में सरकारें FSI यानी ज़मीन के मुकाबले कितनी ऊंची इमारत बनाई जा सकती है के नियमों को और ढीला करेंगी, जहां पहले 4 से 5 मंजिला इमारतें बनती थीं, अब 40 से 50 मंजिला आवासीय टावर आम हो जाएंगे, एक ही एकड़ ज़मीन पर अब 50 परिवारों के बजाय 500 परिवार रह सकेंगे।  भविष्य के शहर हाईराइज सोसायटियों के अंदर सिमट जाएंगे. इन्हें 'वर्टिकल विलेज' कहा जाता है, जहां एक ही गगनचुंबी इमारत या परिसर के भीतर पार्क, जिम, स्विमिंग पूल, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और यहां तक कि स्कूल-अस्पताल भी मौजूद होंगे. लोगों की जमीन से निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाएगी. नोएडा की तर्ज पर अब हर बड़े शहर के पास जैसे न्यू नोएडा, नवी मुंबई, न्यू गुड़गांव बसाए जा रहे हैं. साथ ही रेलवे और मेट्रो स्टेशनों के आसपास हाई-डेंसिटी ऊंची इमारतें बनाई जा रही हैं ताकि लोग कम ज़मीन में रहकर सीधे पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल कर सकें।  क्या हैं चुनौतियां? बेशक हाईराइज इमारतें जमीन की कमी का समाधान हैं, लेकिन यह राह इतनी आसान नहीं है. 50 मंजिला इमारत में रहने वाले लोगों के लिए पानी, बिजली और सीवरेज सिस्टम का मैनेजमेंट करना बेहद जटिल होता जा रहा है. कंक्रीट के इन ऊंचे जंगलों के कारण शहरों में 'अर्बन हीट आइलैंड' बन रहे हैं, जिससे शहरों का तापमान गांवों के मुकाबले 3 से 5 डिग्री तक ज्यादा रहता है. भूकंप या आग लगने की स्थिति में इतनी ऊंची इमारतों से लोगों को सुरक्षित निकालना आज भी एक बड़ी चुनौती है।  गांवों से शहरों की तरफ बढ़ता इंसानी सैलाब रुकने वाला नहीं है और जमीन को रबर की तरह खींचा नहीं जा सकता, इसलिए भविष्य के भारत को 'आसमान' में ही अपनी जगह ढूंढनी होगी।