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केंद्रीय बजट को लेकर किरेन रिजिजू का बयान, कहा– भविष्य की जरूरतों का रखा जाएगा ध्यान

मुंबई बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) समेत महाराष्ट्र के दूसरे नगर निगमों में भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति ने शानदार कामयाबी हासिल की है। इस जीत पर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन मजबूती के साथ काम कर रही है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने मीडिया से बात करते हुए कहा, "महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना की जीत प्रधानमंत्री मोदी और राज्य में देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई है। अब अजित पवार के भी शामिल होने से इस गठबंधन को लोगों ने खूब पसंद किया है।” बता दें कि महाराष्ट्र में बीएमसी समेत 29 नगर निगमों के चुनाव परिणामों में भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने जीत हासिल की है। अगर सिर्फ बीएमसी चुनाव की बात करें तो यहां कुल 227 सीटें हैं। महायुति (भाजपा और शिंदे गुट) ने कुल 118 सीटें जीती हैं, जो बीएमसी में बहुमत के आंकड़े से चार सीटें ज्यादा हैं। शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट और एमएनएस का गठबंधन बुरी तरह पिछड़ गया। उन्होंने केंद्रीय बजट 2026 पर कहा, "संसद सत्र 28 जनवरी से शुरू होगा और बजट 1 फरवरी को पेश किया जाएगा। पीएम मोदी के नेतृत्व में हर बजट खास होता है, जो समाज, देश और उसके भविष्य का ख्याल रखता है। किसी भी तरह के सरकारी काम में कोई कमी नहीं है। हर फैसला सोच-समझकर लिया जाता है और लागू किया जाता है।” किरेन रिजिजू ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं तब से सरकार हर फैसला सोच समझकर लेती है। इसमें कोई दो राय नहीं है। चाहे आप बजट देखें या कोई योजना देखें, हर चीज पर सरकार सोच समझकर फैसला लेती है। हालांकि, उन्होंने पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया पर कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा कि अभी हम इस पर कुछ नहीं बोलना चाहते हैं। समय आने दीजिए, तब इसका जवाब दिया जाएगा।

होली स्पेशल ट्रैवल प्लान: दिल्ली और पंजाब से बिहार के लिए 200 अतिरिक्त बसें, जानें बुकिंग डेट

पटना होली के रंग में सराबोर होने के लिए अपने घर बिहार लौटने की तैयारी कर रहे प्रवासियों के लिए राज्य सरकार ने इस साल बड़ा तोहफा दिया है। बिहार राज्य पथ परिवहन निगम (BSRTC) ने होली के त्योहार पर ट्रेनों में होने वाली भारी भीड़ और वेटिंग लिस्ट की समस्या को देखते हुए 200 विशेष फेस्टिवल बसों के परिचालन का निर्णय लिया है। ये बसें न केवल आरामदायक होंगी, बल्कि दिल्ली, पंजाब और हरियाणा जैसे दूरदराज के राज्यों से आने वाले यात्रियों के लिए किफायती भी साबित होंगी। 15 फरवरी से शुरू होगा परिचालन इन विशेष बसों का परिचालन 15 फरवरी से शुरू होकर 15 मार्च 2026 तक जारी रहेगा, जिससे यात्रियों को आने और वापस लौटने, दोनों ही समय सुविधा मिल सके। यात्रियों की सुविधा के लिए टिकट बुकिंग की प्रक्रिया 1 फरवरी से आधिकारिक वेबसाइट https://bsrtc.bihar.gov.in/ पर शुरू कर दी जाएगी। सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया है कि निजी ऑपरेटरों की मनमानी को रोकने के लिए इन बसों के किराए में विशेष छूट दी जाए, जिससे गरीब प्रवासियों पर आर्थिक बोझ न पड़े। भुगतान के लिए डिजिटल माध्यम जैसे यूपीआई, डेबिट और क्रेडिट कार्ड की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है।   पांच राज्यों के प्रमुख रूटों पर संचालन ये बसें उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, दिल्ली, पंजाब और हरियाणा के प्रमुख शहरों के लिए चलाई जाएंगी। ये बसें पीपीपी (PPP) मोड पर संचालित होंगी और इनमें एसी डीलक्स व नॉन-एसी डीलक्स दोनों तरह के विकल्प मौजूद रहेंगे। बसों की क्षमता 50 से 60 सीटों की होगी, जिससे अधिक से अधिक लोगों को सफर का मौका मिल सके। विभाग वर्तमान में रूटों के अंतिम निर्धारण और समय-सारणी को अंतिम रूप देने में जुटा है ताकि 1 फरवरी से बिना किसी बाधा के बुकिंग शुरू हो सके। होली पर आरामदायक होगी यात्रा: मंत्री परिवहन मंत्री श्रवण कुमार ने इस संबंध में कहा कि त्योहारों के समय ट्रेनों में पैर रखने तक की जगह नहीं होती, जिससे प्रवासियों को काफी कठिनाई होती है। इसी समस्या के समाधान के लिए विभाग लगातार सकारात्मक योजनाओं पर काम कर रहा है। इन बसों के माध्यम से यात्री न केवल आरामदायक सफर कर सकेंगे, बल्कि समय पर अपने घर भी पहुंच पाएंगे। इसके अलावा, यात्रियों की बुनियादी सुविधाओं का ध्यान रखते हुए बस पड़ावों पर महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग स्वच्छ शौचालयों की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है।   पिछले साल ढाई लाख यात्रियों ने किया था सफर पिछला रिकॉर्ड देखें तो बिहार राज्य पथ परिवहन निगम की यह रणनीति काफी सफल रही है। पिछले साल भी निगम ने 220 बसों का सफल संचालन किया था, जिससे लगभग 2.50 लाख यात्रियों को लाभ मिला था। उस दौरान औसतन रोजाना 107 बसें चलाई गई, जिसमें 81 प्रतिशत सीटें भरी रही थीं। इस साल भी वैसी ही सफलता की उम्मीद की जा रही है।

10वीं-12वीं की परीक्षाओं से पहले MP सरकार का बड़ा फैसला, स्कूलों में 1 फरवरी से ESMA लागू

भोपाल मप्र बोर्ड 10वीं व 12वीं की परीक्षाएं 10 फरवरी से और पांचवीं व आठवीं की बोर्ड परीक्षा 20 फरवरी से शुरू होंगी। वहीं शासन ने एसेंशियल सर्विस एंड मेंटेनेंस (एस्मा) लगा दिया है। यह एक फरवरी से 30 अप्रैल तक लागू रहेगा। तीन माह तक शिक्षक सामान्य के साथ महिला शिक्षिक भी संतान पालन अवकाश (सीसीएलई) भी नहीं ले पाएंगी। साथ ही शिक्षक आंदोलन या धरना-प्रदर्शन तक नहीं कर पाएंगे। प्रदेश के स्कूलों में एक फरवरी को एस्मा लग जाएगा। इसके पहले सभी विभिन्न विभागों में अटैच शिक्षकों को स्कूलों में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी। इसके बाद ही उन्हें फरवरी का वेतन मिलेगा। अटैच शिक्षकों की मूल स्कूलों में वापसी, भोपाल में 300 शिक्षक कार्यमुक्त इस संबंध में अभी सिर्फ भोपाल जिले के शिक्षकों को कार्यमुक्त किया गया है। भोपाल के जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) ने 300 अटैच शिक्षकों को कार्यमुक्त करने का आदेश जारी कर दिया है। वहीं कलेक्टर के आदेश से बीएलओ कार्य में लगे शिक्षकों में ड्यूटी को लेकर असमंजस की स्थिति है। राजधानी में 300 ऐसे शिक्षक हैं जो मुख्य पदांकित संस्था छोड़ अपनी पसंद की जगहों पर सालों से अटैच हैं। बता दें कि प्रदेश के करीब छह हजार शिक्षक विभिन्न विभागों में अटैच हैं। साथ ही करीब 15 हजार शिक्षक विशेष पुनरीक्षण कार्य (एसआइआर) में लगे हैं।  ई-सेवा पुस्तिका अपडेट करने की समय-सीमा 31 जनवरी तय शासन द्वारा जारी आदेश के बाद डीईओ ने आदेश जारी करते हुए कहा है कि 31 जनवरी तक शिक्षकों की ई-सेवा पुस्तिका अपडेट होगी। इस कारण सभी शिक्षकों का अटैचमेंट खत्म किया जा रहा है। सभी शिक्षक अपनी उपस्थिति अपने मूल पदांकित स्कूल में देंगे। वे 31 जनवरी तक अपनी ई-सेवा पुस्तिका में अपडेट कराएंगे। तभी फरवरी का वेतन मूल पदांकित स्कूल में उपस्थिति देने के बाद दिया जाएगा। हालांकि संभागीय संयुक्त संचालक कार्यालय और जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में ही कई शिक्षक अटैच हैं। भोपाल, डीईओ, एनके अहिरवार  ने बताया एसआइआर कार्य में लगे शिक्षकों की सूची बुलाकर उन्हें परीक्षा में ड्यूटी करने कार्यमुक्त किया जाएगा। अटैच शिक्षक अपने मूल स्कूल में उपस्थिति देंगे। तभी उनका फरवरी में वेतन जारी होगा।

झारखंड में एक हजार अभ्यर्थियों को मिलेगी सरकारी नौकरी

रांची. राज्य सरकार एक और बड़ा कार्यक्रम आयोजित कर अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र देने की तैयारी कर रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विदेश से लौटने पर इस पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। संबंधित विभागों की तैयारी के अनुसार फरवरी के पहले या दूसरे सप्ताह में रांची में बड़ा कार्यक्रम आयोजित कर झारखंड लोक सेवा आयोग तथा झारखंड कर्मचारी चयन आयोग से अनुशंसित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र दिया जा सकता है। Jharkhand Government Jobs राज्य सरकार द्वारा जिन अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र दिया जाना है, उनमें सबसे महत्वपूर्ण झारखंड लोक सेवा आयोग से बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (सीडीपीओ) पद के लिए अनुशंसित अभ्यर्थी हैं। आयोग ने इस पद पर नियुक्ति के लिए आयोजित परीक्षा का अंतिम परिणाम जारी कर दिया। इसमें 64 अभ्यर्थियों की नियुक्ति की अनुशंसा की गई है। इनमें अनारक्षित श्रेणी के 34, एससी श्रेणी के दो, एसटी श्रेणी के 21, बीसी-वन के एक तथा आर्थिक रूप से कमजाेर श्रेणी के छह अभ्यर्थी सम्मिलित हैं। हालांकि विभाग ने अभी इन अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों की जांच नहीं की है। मेडिकल कालेजों में सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी जेपीएससी ने मेडिकल कालेजों में सहायक प्राध्यापक (एनेस्थेसिया) की नियुक्ति प्रक्रिया भी पूरी कर ली है। इसके माध्यम से चयनित छह अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र मिल सकता है। JPSC के माध्यम से खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी सहित कुछ एकल पदों पर भी नियुक्ति प्रक्रिया पूरी की गई है। इन अभ्यर्थियों को भी नियुक्ति पत्र दिया जाना है। इधर, झारखंड कर्मचारी चयन आयोग ने सीजीएल परीक्षा (CGL Exam) के तहत कुछ अन्य अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया है, जिन्हें नियुक्ति पत्र दिया जाना है। इसी तरह, सहायक आचार्य नियुक्ति परीक्षा के तहत भी कुछ अन्य अभ्यर्थियों का परिणाम जारी किया गया है। स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग द्वारा इन अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र दिए जाने की तैयारी चल रही है।

झारखंड में सिविल सेवा प्री सहित सालभर में होंगी 28 परीक्षाएं

रांची. झारखंड लोक सेवा आयोग की संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2025 आठ मार्च को होगी। इस परीक्षा का अप्रैल माह में परिणाम जारी हो सकता है। इसकी मुख्य परीक्षा दो से चार मई तक संभावित है। मई अंतिम सप्ताह में इसका परिणाम जारी हो सकता है। इसके बाद 16 से 19 जून तक साक्षात्कार आयोजित होगा। इस तरह सभी परीक्षाएं समय पर आयोजित हुईं तथा परिणाम जारी हुआ तो जून माह तक यह परीक्षा पूरी हो जाएगी। हालांकि अभी इस परीक्षा के लिए विज्ञापन प्रकाशित नहीं हुआ है। आयोग ने मंगलवार को जून माह तक आयोजित होनेवाली विभिन्न प्रतियाेगिता परीक्षाओं का कैलेंडर जारी करते हुए परीक्षाओं की उक्त संभावित तिथि घोषित की। जारी कैलेंडर के अनुसार, 29 मार्च को झारखंड पात्रता परीक्षा (जेट) आयोजित हो सकती है। यह परीक्षा के तहत दो पत्रों की परीक्षा होगी, जिसमें वस्त़ुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाएंगे। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत बाल विकास परियोजना पदाधिकारियों की नियुक्ति के लिए साक्षात्कार बुधवार से शुरू होगा जो नौ जनवरी तक चलेगा। छठी सीमित उपसमाहर्ता लिखित परीक्षा 10-11 जनवरी को आयोजित होगी। इसी तरह, विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक बैकलाग नियुक्ति प्रतियोगिता के तहत सांख्यिकी, मैथिली और श्रम एवं समाज कल्याण विषय के लिए 18 जनवरी को प्रमाणपत्रों का सत्यापन होगा, जबकि साक्षात्कार 19 जनवरी को होगा। वहीं, सहायक प्राध्यापक नियमित नियुक्ति के तहत जुलाजी तथा अंग्रेेजी विषय के लिए प्रमाणपत्रों की जांच 19 से 21 जनवरी तक होगी। नियमित नियुक्ति के तहत ही हो एवं पंचपरगनिया विषय के लिए प्रमाणपत्रों की जांच तथा साक्षात्कार 10 फरवरी को निर्धारित है। आयोग ने कुल 28 प्रतियोगिता परीक्षाओं की संभावित तिथि घोषित की है, जिससे हजारों पदों पर नियुक्ति का रास्ता साफ होगा। अन्य परीक्षाओं की संभावित तिथि परीक्षा का नाम     परीक्षा की प्रकृति     संभावित तिथि वन क्षेत्र पदाधिकारी नियुक्ति     मुख्य परीक्षा     22-24 जनवरी खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी     साक्षात्कार     29-31 जनवरी यूनिवर्सिटी प्रोफेसर कम चीफ साइंटिस्ट     साक्षात्कार     12 फरवरी एसोसिएट प्रोफेसर कम सीनियर साइंटिस्ट     साक्षात्कार     13 फरवरी आयुर्वेदिक चिकित्सा पदाधिकारी     लिखित परीक्षा     05-07 मार्च होम्योपैथी चिकित्सा पदाधिकारी     लिखित परीक्षा     05-07 मार्च यूनानी चिकित्सा पदाधिकारी     लिखित परीक्षा     05-07 मार्च संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2025     प्रारंभिक परीक्षा     08 मार्च संयुक्त सिविल सेवा बैकलॉग परीक्षा-2025     प्रारंभिक परीक्षा     15 मार्च संयुक्त सिविल सेवा बैकलॉग परीक्षा-2023     प्रारंभिक परीक्षा     22 मार्च झारखंड पात्रता परीक्षा-2024     लिखित परीक्षा     29 मार्च सहायक वन संरक्षक नियुक्ति     मुख्य परीक्षा     04-07 अप्रैल प्रोजेक्ट मैनेजर एवं समकक्ष नियुक्ति     लिखित परीक्षा     18-19 अप्रैल कारखाना निरीक्षक नियुक्ति     लिखित परीक्षा     25-26 अप्रैल संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा-2025     मुख्य परीक्षा     02-04 मई संयुक्त सिविल सेवा बैकलॉग परीक्षा-2025     मुख्य परीक्षा     09-11 मई संयुक्त सिविल सेवा बैकलॉग परीक्षा-2023     मुख्य परीक्षा     16-18 मई ब्वायल इंसपेक्टर नियुक्ति     लिखित परीक्षा     29-30 मई सहायक निदेशक/सीनियर साइंटिफिक ऑफिसर बैकलॉग परीक्षा     लिखित परीक्षा     07 जून सहायक निदेशक/सीनियर साइंटिफिक ऑफिसर बैकलॉग परीक्षा     लिखित परीक्षा     14 जून संयुक्त सिविल सेवा नियमित परीक्षा-2025     साक्षात्कार     16-19 जून संयुक्त सिविल सेवा बैकलॉग परीक्षा-2025     साक्षात्कार     22-23 जून संयुक्त सिविल सेवा बैकलॉग परीक्षा-2023     साक्षात्कार     24 जून

बजट 2026 में स्वास्थ्य क्षेत्र को बड़ा फायदा? छोटे शहरों में बेहतर सेवाओं की संभावना

नई दिल्ली:  वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार एक फरवरी को संसद में केंद्रीय बजट 2026-27 पेश करने वाली हैं. इस बार स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के विशेषज्ञों को उम्मीद है कि सरकार दूरदराज के इलाकों और गांवों में बेहतर इलाज की सुविधाओं पर खास ध्यान देगी. विशेषज्ञों का मानना है कि बजट में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और नई तकनीक को बढ़ावा देने वाले फैसलों से आम आदमी के लिए अच्छा इलाज पाना और भी आसान हो जाएगा. नोएडा स्थित प्रकाश अस्पताल के कार्यकारी निदेशक आयुष चौहान ने शुक्रवार को से कहा, "अस्पतालों की कमी, डॉक्टरों और स्टाफ की किल्लत और बीमारियों की सही जांच न हो पाने की वजह से आज भी बहुत से लोगों को अच्छा इलाज नहीं मिल पाता. अगर हम अपने जिला अस्पतालों और गांव-कस्बों के छोटे स्वास्थ्य केंद्रों को बेहतर बनाएं, मोबाइल वैन और फोन पर डॉक्टरी सलाह (टेलीमेडिसिन) की सुविधा बढ़ाएं, तो बड़े शहरों के बड़े अस्पतालों में लगने वाली भीड़ कम होगी और आम लोगों को आसानी से इलाज मिल सकेगा." स्वास्थ्य सेवा केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं भारत की स्वास्थ्य प्राथमिकताओं में क्षमता निर्माण से लेकर दीर्घकालिक प्रणाली मजबूती की ओर बदलाव की उम्मीद करते हुए, चौहान ने कहा, "इस समय, जोर धीरे-धीरे होने वाले खर्च के बजाय परिणामों पर आधारित निवेश पर होना चाहिए, जो सेवा वितरण में सुधार कर सके, बुनियादी ढांचे को मजबूत कर सके और बड़े या छोटे स्तर पर तकनीक को जोड़ सके. आज के दौर में, स्वास्थ्य सेवा केवल एक सामाजिक कर्तव्य नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक आर्थिक आवश्यकता भी है जो रोजगार, उत्पादकता और राष्ट्रीय विकास से बहुत गहराई से जुड़ी हुई है." उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त बजट आवंटित किया जाना चाहिए. क्योंकि स्वास्थ्य क्षेत्र को दी जाने वाली कुल राशि को बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है. खासकर इसलिए क्योंकि भारत अभी भी अन्य देशों की तुलना में अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का बहुत छोटा हिस्सा स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करता है. स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा' (NHA) के अनुमान के अनुसार, हाल के वर्षों में भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च इसके जीडीपी के लगभग 1.8 से 2.0 प्रतिशत के आसपास ही बना हुआ है. चौहान ने कहा- "सरकारी अस्पतालों को आधुनिक बनाया जाना चाहिए, बीमा (इंश्योरेंस) के दायरे को बढ़ाया जाना चाहिए. टियर II और टियर III शहरों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और घरेलू स्तर पर चिकित्सा उपकरणों के निर्माण को भी समर्थन दिया जाना चाहिए." उन्होंने कहा कि इलाज की बढ़ती लागत, गुणवत्ता के अलग-अलग मानक, योग्य कर्मियों की कमी और बिखरा हुआ बुनियादी ढांचा जैसी कई चुनौतियां, मुख्य समस्याएं हैं. उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए नीतिगत स्थिरता, नियामक स्पष्टता, कौशल विकास और सार्वजनिक-निजी सहयोग में वृद्धि आवश्यक होगी. एक भविष्योन्मुखी बजट देश की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को अधिक सुलभ, निष्पक्ष और भविष्य के लिए तैयार बनाने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है. 2025-26 के स्वास्थ्य बजट में वृद्धि साल 2025-26 के लिए, स्वास्थ्य मंत्रालय को 99,859 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. यह 2024-25 के संशोधित अनुमानों से 11 प्रतिशत अधिक है. 2025-26 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग को मंत्रालय के कुल बजट का 96 प्रतिशत हिस्सा दिया गया है. विभाग का यह आवंटन 2024-25 के अनुमानित खर्च से 11 प्रतिशत ज्यादा है. स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग को 3,901 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो 2024-25 के इसके अनुमानित खर्च से 15 प्रतिशत अधिक है. एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (AiMed) के निदेशक राजीव नाथ के अनुसार, चिकित्सा उपकरण (मेडिकल डिवाइस) क्षेत्र आगामी केंद्रीय बजट को नीतिगत इरादों को ज़मीनी प्रभाव में बदलने के एक निर्णायक अवसर के रूप में देखता है. नाथ ने कहा, "जबकि 2025 में चिकित्सा उपकरण नीति 2023 के इर्द-गिर्द रचनात्मक जुड़ाव देखा गया, अब ध्यान निरंतर निष्पादन पर होना चाहिए. मुख्य अपेक्षाओं में अंशांकित टैरिफ सुधार और लंबे समय से चली आ रही आयात विषमताओं को दूर करने तथा घरेलू विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) का समर्थन करने के लिए मौजूदा 7.5 प्रतिशत से सीमा शुल्क को बढ़ाकर 10-15 प्रतिशत करना शामिल है." नाथ के अनुसार, बजट को गुणवत्ता और मूल्य-आधारित सार्वजनिक खरीद को भी मजबूत करना चाहिए, जिसमें 'आईसीएमईडी' (ICMED) प्रमाणित उपकरणों को प्राथमिकता दी जाए और घरेलू मूल्यवर्धन (डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन) को बढ़ावा दिया जाए. उन्होंने कहा, "ऐसे उपाय जो नियामक पूर्वानुमान (रेगुलेटरी प्रेडिक्टेबिलिटी) को मजबूत करें, एमएसएमई (MSME) की भागीदारी को प्रोत्साहित करें और नवाचार (इनोवेशन) का समर्थन करें, एक लचीला मेडटेक (MedTech) इकोसिस्टम बनाने के लिए महत्वपूर्ण होंगे. यह एक ऐसा तंत्र होगा जो सामर्थ्य, विश्वास और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रदान करेगा." स्वास्थ्य सेवा के लिए चिकित्सा उपकरण अनिवार्य नाथ ने कहा कि चिकित्सा उपकरण स्वास्थ्य सेवा वितरण के लिए अनिवार्य हैं, विशेष रूप से प्राथमिक और माध्यमिक देखभाल स्तरों पर, जहां जांच (डायग्नोस्टिक्स), निगरानी और आवश्यक उपकरण परिणामों में काफी सुधार कर सकते हैं. उन्होंने कहा-"पहुंच बढ़ाने के लिए न केवल बुनियादी ढांचे में निवेश की आवश्यकता है, बल्कि ऐसे नीतिगत ढांचे की भी जरूरत है जो सभी भौगोलिक क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण उपकरणों की किफायती उपलब्धता सुनिश्चित करें." उन्होंने कहा कि सार्वजनिक खरीद के माध्यम से घरेलू स्तर पर निर्मित और आईसीएमईडी (ICMED) प्रमाणित, किफायती चिकित्सा उपकरणों को बढ़ावा देने से आयात पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ क्षेत्रीय अंतर को पाटने में मदद मिल सकती है. नाथ ने कहा, "इसके अतिरिक्त, पारदर्शी लेबलिंग नियम जो घरेलू सामग्री का खुलासा करते हैं और स्थानीय मूल्यवर्धन (लोकल वैल्यू एडिशन) को प्रोत्साहित करते हैं, वे भरोसे और स्वीकार्यता को बढ़ा सकते हैं. देश भर में स्वास्थ्य सेवा को सुलभ, निष्पक्ष और टिकाऊ बनाने के लिए एक मजबूत घरेलू मेडटेक (MedTech) आधार होना अनिवार्य है." कई चुनौतियों का सामना कर रहा स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट आवंटन में अगले 5 वर्षों तक हर साल कम से कम 30 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वृद्धि (compounded increase) करना आवश्यक और सामयिक दोनों है. नाथ ने कहा, "जैसे-जैसे स्वास्थ्य सेवा की मांग बढ़ रही है और प्रणाली विकसित हो रही है, बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, तकनीक को अपनाने और सेवा वितरण में सुधार के लिए निरंतर सार्वजनिक निवेश आवश्यक है. बजट का बढ़ा हुआ आवंटन रणनीतिक रूप से स्वास्थ्य सुविधाओं … Read more

भारत में इंसानों की लंबाई क्यों घट रही है? डॉक्टर्स ने खुलासा किया, छोटे होते भारतीय बच्चे

नई दिल्ली  दुनिया जहां लंबी और बेहतर कद-काठी की ओर बढ़ रही है, वहीं भारत अपने 'रिवर्स गियर' में नजर आ रहा है. आमतौर पर जैसे-जैसे किसी देश की अर्थव्यवस्था बढ़ती है और हेल्थ सुविधाएं बेहतर होती हैं, वहां के लोगों की औसत लंबाई बढ़नी चाहिए जैसा कि चीन, जापान और दक्षिण कोरिया में हुआ है. लैंसेट और NCD रिस्क फैक्टर कोलैबोरेशन के डेटा के मुताबिक, पिछले 100 सालों में दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले भारतीयों की हाइट में वो उछाल नहीं दिखा जो चीन या जापान में दिखा है. भारत के मामले में उल्टा हो रहा है और उनकी औसत हाइट में गिरावट देखी गई है. विश्लेषण से संकेत मिलता है कि भारत में औसत हाइट में अपेक्षित बढ़त नहीं हो पाई है और कुछ उम्र व सामाजिक समूहों में लंबाई में मामूली गिरावट भी दर्ज की गई है, जिसका सबसे बड़ा कारण बचपन का कुपोषण है. 20–30 साल पहले (2005–2006) भारतीय पुरुष आज की तुलना में औसतन 1 से 1.1 सेमी लंबे थे यानी पिछले कुछ दशकों में उनकी हाइट में गिरावट आई है. अब भारतीयों की लंबाई कम होने के क्या कारण हैं, कौन-कौन से फैक्टर्स इसके लिए जिम्मेदार हैं. घटती लंबाई पर क्या कहती हैं रिसर्च? ग्लोबल हाइट स्टडी (1985-2019) के अनुसार भारतीयों की लंबाई में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हुई जिसकी उम्मीद थी. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-3 से NFHS-4, 2005-16) डेटा के विश्लेषण से पता चलता है कि 15-25 साल के पुरुषों की औसत लंबाई 1.10 सेमी और 26-50 साल उम्र वालों की लंबाई 0.86 सेमी कम हो गई है. वहीं यदि 15-25 साल की महिलाओं की बात करें तो उनकी लंबाई में 0.12 सेमी की गिरावट आई है. ट्राइबल महिलाओं में यह आंकड़ा 0.42 सेमी और गरीब तबके वाली महिलाओं की लंबाई 0.57 सेमी तक गिर गई है. PLoS One में पब्लिश भारतीयों की लंबाई घटने पर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) द्वारा की गई रिसर्च (2021) से पता चलता है कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-3 (2005-06) से नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 (2015-16) के बीच पुरुषों की लंबाई 1 से 1.1 सेमी और चुनिंदा महिला ग्रुप्स (एसटी, गरीब) में 0.4 से 0.6 सेमी तक घट गई है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5, 2019-21) के मुताबिक, बचपन और किशोरावस्था में कुपोषण ही लंबाई घटने की सबसे बड़ी वजह बना हुआ है. 5 साल से कम उम्र के 35 प्रतिशत बच्चे नाटे (स्टंटिंग) हैं. दरअसल, हर बच्चे के जेनेटिक्स में एक निश्चित लंबाई तक पहुंचने  की अधिकतम संभावना होती है लेकिन स्टंटिंग इस क्षमता को सीमित कर देता है और उनकी लंबाई पूरी नहीं बढ़ पाती.  रिपोर्ट के मुताबिक, टीम ने 1985 और 2019 के बीच की गई 2000 से अधिक स्टडीज में 5 से 19 वर्ष की उम्र के 6.5 करोड़ से अधिक बच्चों और वयस्कों के डेटा का एनालेसिस किया. सामने आया कि पिछले 35 सालों में बच्चों की औसत ऊंचाई में सबसे अधिक सुधार चीन और दक्षिण कोरिया में देखा गया है. चीन में 19 साल के लड़कों की औसत लंबाई 1985 से 2019 के बीच 8 सेमी बढ़ी पाई गई थी. 2019 में पब्लिश हुई द लैंसेट स्टडी में बताया गया है कि 19 साल की उम्र में सबसे लंबे लड़के नीदरलैंड के थे जिनकी औसत हाइट 183.8 सेमी या 6 फीट थी और वहीं 19 साल की उम्र में सबसे कम लंबाई वाले लड़के तिमोर लेस्ते (दक्षिण पूर्व एशिया का देश) में रहते थे जिनकी औसत हाइट 160.1 सेमी या 5 फीट 3 इंच थी. पेट की बीमारी, मॉडर्न लाइफस्टाइल बच्चे की हाइट के दुश्मन बेंगलुरु के स्पर्श हॉस्पिटल के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. विक्रम बेल्लिअप्पा (MBBS, MS, DNB) ने Aajtak/.in को बताया, 'बार-बार होने वाले संक्रमण और पेट से जुड़ी बीमारियां बच्चों की ग्रोथ को प्रभावित कर सकती हैं. पेट के इंफेक्शन, दस्त या उल्टी की वजह से बॉडी जरूरी न्यूट्रिएंट्स को एब्जॉर्ब नहीं कर पाती. इसका सीधा असर बच्चे के वजन और लंबाई पर पड़ता है. लगातार पेट की खराबी न सिर्फ इम्यूनिटी कमजोर करती है, बल्कि ग्रोथ की रफ्तार को भी सुस्त कर देती है.' मॉडर्न लाइफस्टाइल के कारण बच्चों में अर्ली प्यूबर्टी (Early Puberty) देखने मिल रही है जिसका संबंध हाइट कम रह जाने से हो सकता है. दरअसल, आजकल के बच्चे जंक फूड का सेवन अधिक कर रहे हैं जिसके कारण उनमें मोटापा बढ़ रहा है जिस कारण उनमें समय से पहले हार्मोनल बदलाव (प्यूबर्टी) शुरू हो रहे हैं. डॉ. विक्रम बताते हैं, 'शुरू में तो बच्चा तेजी से लंबा होता दिखता है लेकिन हकीकत में उसकी 'ग्रोथ प्लेट्स' समय से पहले बंद हो जाती हैं. नतीजा यह कि उम्र बढ़ने पर उसकी फाइनल हाइट उम्मीद से काफी कम रह जाती है.' क्या हमारी खराब जीवनशैली और प्रदूषित वातावरण हमारे DNA में ऐसे बदलाव कर रहे हैं जो आने वाली पीढ़ियों की हाइट को परमानेंट तौर पर छोटा कर रहे हैं? बैलेंस डाइट की कमी  जयपुर के कोकून हॉस्पिटल के पीडियाट्रिशियन डॉ. जितेन्द्र जैन (MBBS, DCH, DNB) से Aajtak.in ने पूछा, क्या कारण है कि भारतीयों की नई पीढ़ी की औसत ऊंचाई पिछली पीढ़ी से कम हो रही है? उन्होंने बताया, 'लंबाई में जेनेटिक्स का अहम रोल है लेकिन केवल जेनेटिक्स ही पूरी कहानी नहीं बताते. भारतीयों की नई पीढ़ी की औसत ऊंचाई पिछली पीढ़ी से कम होने के पीछे लाइफस्टाइल, पोषण और पर्यावरण भी जिम्मेदार हैं. 'जंक फूड, कम प्रोटीन और विटामिन्स, बढ़ता मोटापा, अधिक स्क्रीन टाइम और फिजिकल एक्टिविटी में कमी बच्चों की ग्रोथ को धीमा कर रही है. 'गर्भावस्था में माताओं का खराब पोषण, बचपन में बार-बार होने वाले इंफेक्शन, पेट और आंत की बीमारियां और प्रदूषण भी हार्मोनल संतुलन और हड्डियों की ग्रोथ को प्रभावित कर रहे हैं. इसलिए केवल जेनेटिक्स पर निर्भर रहने की बजाय बैलेंस डाइट, साफ पानी, पर्याप्त नींद और एक्टिव लाइफस्टाइल बेहद जरूरी है ताकि बच्चों की लंबाई सही रहे और ओवरऑल ग्रोथ सही तरह से हो.' खराब लाइफस्टाइल और पॉल्यूशन डॉ. विक्रम ने कहा, 'खराब लाइफस्टाइल और प्रदूषण सीधे तौर पर DNA को बदलकर हाइट को स्थायी रूप से प्रभावित नहीं करते लेकिन ये एपिजेनेटिक बदलाव जरूर पैदा कर सकते हैं. लगातार जंक फूड, न्यूट्रिशन की कमी, स्ट्रेस, प्रदूषण और हार्मोन-डिसरप्टिंग केमिकल्स का असर … Read more

यमुना पर तीन प्रमुख बांध प्रोजेक्ट्स को मिली गति, केंद्र का फैसला दिल्ली के जलसंकट को सुलझाएगा

लखनऊ  कई दशकों से ठंडे बस्ते में पड़े यमुना और उसकी सहायक नदियों पर प्रस्तावित तीन बड़े बांध प्रोजेक्ट अब फिर से रफ्तार पकड़ने जा रहे हैं। केंद्र सरकार ने लखवार, रेणुकाजी और किशाऊ बांध परियोजनाओं की समीक्षा कर इन्हें पुनर्जीवित करने का फैसला लिया है। अधिकारियों के अनुसार, इन परियोजनाओं के पूरा होने से यमुना नदी में जल प्रवाह बेहतर होगा और राजधानी दिल्ली की पीने के पानी की जरूरतें अगले 25 वर्षों तक पूरी की जा सकेंगी। इन परियोजनाओं को लेकर हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और जल मंत्री प्रवेश वर्मा के साथ बैठक हुई थी। बैठक में यमुना के पुनर्जीवन और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में टिकाऊ जल उपलब्धता सुनिश्चित करने की व्यापक रणनीति पर चर्चा की गई। अधिकारियों का कहना है कि इन तीनों बांधों से मिलने वाला पानी दिल्ली की दीर्घकालिक जल समस्या का समाधान बन सकता है। दिल्ली में पानी की कमी, बढ़ती मांग वर्तमान में दिल्ली में औसतन 900 मिलियन गैलन प्रतिदिन (MGD) पानी का उत्पादन होता है, जबकि कुल मांग 1,113 MGD है। इसका मतलब है कि राजधानी को करीब 200 MGD पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, दिल्ली के कम से कम 10 प्रतिशत घरों में आज भी पाइप से पानी की नियमित आपूर्ति नहीं हो पा रही है। दिल्ली को कितना पानी मिलेगा      परियोजनाएं पूरी होने के बाद दिल्ली को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।     लखवार बांध से दिल्ली को लगभग 135 MGD पानी मिलेगा।     रेणुकाजी परियोजना से 275 MGD पानी मिलने की संभावना है।     किशाऊ परियोजना से 372 MGD पानी दिल्ली को उपलब्ध कराया जा सकेगा। इन तीनों परियोजनाओं से कुल मिलाकर पानी की आपूर्ति बढ़ेगी, जिससे मौसमी और अनियमित जल स्रोतों पर निर्भरता कम होगी। अधिकारियों के अनुसार, अगले 5 से 7 वर्षों में इन परियोजनाओं से दिल्ली को पानी मिलना शुरू हो सकता है। पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) में सुधार इन बांधों से केवल पानी की मात्रा ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि यमुना में ई-फ्लो (पर्यावरणीय प्रवाह) भी सुधरेगा। ई-फ्लो का मतलब नदी में पानी की वह मात्रा, समय और गुणवत्ता है, जो स्वस्थ जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और उस पर निर्भर मानव जीवन के लिए जरूरी होती है। अतिरिक्त 1,000 क्यूसेक पानी मिलने से यमुना की जल गुणवत्ता और प्रवाह की स्थिति बेहतर होने की उम्मीद है। परियोजनाओं की मौजूदा स्थिति     लखवार परियोजना (उत्तराखंड): अब तक करीब 12.6 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। इसे 2031 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।     रेणुकाजी परियोजना (हिमाचल प्रदेश): यह फिलहाल टेंडर प्रक्रिया के चरण में है और इसके 2032 तक पूरा होने की उम्मीद है।     किशाऊ परियोजना (उत्तराखंड–हिमाचल सीमा): यह अभी अंतरराज्यीय समझौते और मंजूरी के चरण में है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2033 रखा गया है। कई राज्यों को होगा फायदा इन परियोजनाओं से केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को भी लाभ मिलेगा। जल बंटवारा राज्यों की लागत भागीदारी के आधार पर किया जाएगा। इसके अलावा, इन बांधों से 760 मेगावाट से अधिक जलविद्युत उत्पादन की क्षमता भी विकसित की जाएगी। पहले क्यों रुकी थीं परियोजनाएं अधिकारियों के मुताबिक, इन परियोजनाओं के लंबे समय तक अटके रहने के पीछे कई कारण रहे:-     फंड की कमी     राज्यों के बीच विवाद     पर्यावरण और वन संबंधी मंजूरियों में देरी अब केंद्र सरकार के सक्रिय हस्तक्षेप के बाद इन बाधाओं को दूर करने की कोशिश की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये तीनों परियोजनाएं तय समयसीमा में पूरी हो जाती हैं, तो न केवल दिल्ली की जल आपूर्ति मजबूत होगी, बल्कि यमुना नदी के पुनर्जीवन की दिशा में भी यह एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।  

भारत-पाक बॉर्डर से सटे इलाकों में पाकिस्तानी सिम और आवाजाही पर 2 माह तक बैन

श्रीगंगा नगर. भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे श्रीगंगानगर जिले के इलाकों में राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तानी लोकल सिम कार्ड के उपयोग पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया गया है। श्रीगंगा नगर जिला मजिस्ट्रेट डॉ. मंजू ने बताया कि सीमा से लगे पाकिस्तानी क्षेत्र में स्थापित मोबाइल टॉवरों का नेटवर्क भारतीय सीमा के भीतर तीन से चार किलोमीटर तक आ सकता है, जिससे सुरक्षा संबंधी खतरे की आशंका बनी रहती है। इसी कारण यह निर्णय लिया गया है। शाम 7 से सुबह 6 बजे तक नो-गो जोन आदेशानुसार भारत-पाक बॉर्डर सटे 3 किमी के दायरे में शाम 7 से सुबह 6 बजे तक लोगों के आवागमन पर पूरी तरह बैन रहेगा। श्रीगंगानगर, श्रीकरणपुर, पदमपुर, रायसिंहनगर, अनूपगढ़ और घड़साना उपखंड से लगती सीमा पर यह नियम लागू होगा। वहीं, सिंचाई के लिए जाने वाले किसानों को बीएसएफ या सेना के अधिकारियों से परमिशन लेनी होगी। आदेश उल्लंघन पर होगी कानूनी कार्रवाई जिला मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए आदेश जारी किया है कि जिले के किसी भी ऐसे क्षेत्र में, जहां पाकिस्तानी नेटवर्क के जरिए संपर्क संभव है। पाकिस्तानी लोकल सिम के उपयोग पर रोक कोई भी व्यक्ति पाकिस्तानी लोकल सिम का उपयोग नहीं करेगा और न ही किसी को इसकी अनुमति दी जाएगी। आदेश का उल्लंघन करने पर दोषी के खिलाफ विधि अनुसार कार्रवाई की जाएगी। यह आदेश 15 जनवरी से आगामी दो माह की अवधि तक प्रभावशील रहेगा।

डब्ल्यूईएफ 2026: ‘AI नौकरियां नहीं छिनेगा, इंसानों के साथ काम करेगा’, एक्सपर्ट्स का बयान

नई दिल्ली  दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) 2026 में शामिल तकनीकी कंपनियों के बड़े अधिकारियों ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) इंसानों की नौकरियां नहीं छीनेगा, बल्कि काम करने के तरीके को बदलेगा। एआई कई कामों को अपने आप कर सकता है, लेकिन यह पूरी नौकरी की जगह नहीं ले सकता। वर्करा के संस्थापक और सीईओ कियान कटानफोरूश ने कहा कि एआई को लेकर भाषा का सही इस्तेमाल बहुत जरूरी है। वे एआई को 'सहकर्मी' कहने के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि एआई कुछ खास काम तो अच्छी तरह कर सकती है, लेकिन इंसानों की तरह पूरी नौकरी नहीं कर सकती। उन्होंने बताया कि इंसान एक साथ सैकड़ों तरह के काम करते हैं, जबकि एआई केवल तय किए गए काम ही कर पाता है। उन्होंने यह भी कहा कि अब तक यह अनुमान गलत साबित हुआ है कि एआई बड़े पैमाने पर लोगों की नौकरियां खत्म कर देगा। हिप्पोक्रेटिक एआई के सह-संस्थापक और सीईओ मुंजाल शाह ने भी कहा कि एआई इंसानों की जगह नहीं लेगा, बल्कि बड़े स्तर पर कर्मचारियों की मदद करेगा। उन्होंने भविष्य की कल्पना करते हुए कहा कि दुनिया में '8 अरब लोग और 80 अरब एआई सिस्टम' होंगे, जो नए कामों को आसान बनाएंगे। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि एक एआई सिस्टम ने गर्मी की लहर के दौरान हजारों लोगों को फोन करके उन्हें ठंडी जगहों पर जाने की सलाह दी और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ऐसे सिस्टम को सही ढंग से लागू करने के लिए कड़े परीक्षण की आवश्यकता होती है। हमारे पास ऐसे मॉडल हैं जो अन्य मॉडल्स की जांच करते हैं और फिर वे मॉडल भी उन्हीं मॉडल्स की जांच करते हैं। अमिनी की संस्थापक और सीईओ केट कैलॉट ने कहा कि एआई अभी भी सिर्फ एक उपकरण है। यह अपने आप सही और गलत का फैसला नहीं कर सकता, क्योंकि इसमें इंसानों जैसी सोच और मूल्य समझने की क्षमता नहीं है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) के सीईओ क्रिस्टोफ श्वाइजर ने कहा कि एआई के साथ काम करने का अनुभव कभी-कभी किसी सहकर्मी के साथ काम करने जैसा लगता है। किसी कंपनी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने काम करने के तरीके को कितना बदलती है, न कि सिर्फ नई तकनीक अपनाने पर। उन्होंने यह भी कहा कि एआई को एक बड़ी प्रबंधन जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए और इसे सिर्फ तकनीकी टीम पर नहीं छोड़ा जा सकता। एचपी कंपनी के अध्यक्ष और सीईओ एनरिक लोरस ने कहा कि एआई का इस्तेमाल संतुलन के साथ होना चाहिए। एचपी के कॉल सेंटरों में कभी-कभी एआई गलत जवाब देता है, लेकिन कुल मिलाकर इसकी सटीकता पहले से बेहतर हुई है और ग्राहकों की संतुष्टि भी बढ़ी है।