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3.5 अरब लोगों के लिए गूगल का चेतावनी अलर्ट, ‘जीरो डे’ संकट से बचने के लिए करें ये जरूरी कदम

नई दिल्ली टेक्नोलॉजी जगत की दिग्गज कंपनी Google का क्रोम ब्राउजर दुनियाभर में पॉपुलर है और भारत समेत दुनियाभर में इसके 3.5 अरब से ज्यादा यूजर हैं. अब अधिकतर यूजर्स पर एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है, जो असल में दो कमजोरियों हैं, जिनको गूगल ने जीरो डे कैटेगरी की कमजोरियों में रखा है. हैकर्स इनका फायदा उठाकर क्रोम ब्राउजर यूजर्स को शिकार बना सकते हैं. ये जानकारी फॉर्ब्स ने अपनी रिपोर्ट में दी है। खतरे को भांपते हुए क्रोम की तरफ से इमरजेंसी सिक्योरिटी अपडेट जारी किया है और यूजर्स को तुरंत ब्राउजर को अपडेट करने की जानकारी शेयर की है. ब्राउजर को अपडेट करने के बाद यूजर्स अपने डिवाइस और डेटा को सुरक्षित कर सकते हैं। वल्नरेबिलिटी को लेकर ज्यादा डिटेल्स नहीं दी वल्नरेबिलिटी को लेकर अभी बहुत ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई है. कंपनी का मानना है कि जब तक अधिकतर यूजर्स लेटेस्ट अपडेट के साथ ब्राउजर की कमजोरियों को फिक्स नहीं कर लेते हैं तब तक इनकी डिटेल्स को सीमित रखा जाएगा, जिससे हैकर्स इनका फायदा ना उठा सकें. इन कमजोरियों को CVE-2026-3909 और CVE-2026-3910 के नाम से ट्रैक किया जा रहा है। क्यों ब्राउजर्स को निशाना बना रहे हैं हैंकर्स ?  इंटरनेट यूजर्स किसी भी इंफॉर्मेशन को सर्च करने के लिए ब्राउजर पर ही सर्चिंग करते हैं. हर एक स्मार्टफोन और पीसी यूजर्स के पास ब्राउजर होता है, जिसमें क्रोम सबसे ज्यादा मार्केट शेयर वाला ब्राउजर है. ऐसे में हैकर्स ब्राउजर को निशाना बनाते हैं ताकि वह यूजर्स कि डिटेल्स को आसानी से हैकर कर सकें। यहां एक पुरानी रिपोर्ट के बारे में बताते हैं, Omdia की 2025 की रिपोर्ट है, जो Palo Alto Networks के लिए तैयार की गई थी. रिपोर्ट के मुताबिक, एक साल में 95 परसेंट ऑर्गनाइजेसन को एक ऐसा साइबर सिक्योरिटी का सामना करना पड़ा, जिसकी शुरुआत कर्मचारियों के कंप्यूटर से हुई थी। ब्राउजर हैकिंग पर साइबर एक्सपर्ट का क्या कहना ब्राउजर हैकिंग को लेकर साइबर एक्सपर्ट का कहना है कि अब हैकर्स सीधा ब्राउजर को निशाना बनाते हैं. इसमें हैकर्स चोरी हुए टोकन के जरिए सेशन हाइजेकिंग और ऐसे एजवांस्ड एडवांस्ड फिशिंग अटैक शामिल हैं, जो लंबे समय से चले आ रहे मल्टी फैक्टर ऑथेंटिकेशन को भी बायपास कर सकते हैं।  

Chrome में अब Gemini का फीचर, Google ब्राउजर करेगा यूजर की मदद खुद

नई दिल्ली इंटरनेट ब्राउज़िंग का तरीका धीरे-धीरे बदल रहा है. ब्राउजर में एजेंटिक फीचर्स मिल रहे हैं. Perplexity Comet हो या या OpenAI का ATLAS ब्राउजर, ये सभी एजेंटिक AI देते हैं. यानी ब्राउजर खुद ही आपका काम कर देता है।Google ने अपने ब्राउज़र Google Chrome में Google Gemini AI को भारत में रोलआउट करना शुरू कर दिया है। इसके साथ ही यह फीचर कनाडा और न्यूज़ीलैंड के यूज़र्स को भी दिया जा रहा है. गूगल ने इस फीचर का ऐलान पहले ही कर दिया था और तब से यूजर्स को इसका इंतजार था। क्रोम में ऐसे यूज होगा गूगल जेमिनी अब तक Gemini का इस्तेमाल अलग ऐप या वेबसाइट के जरिए किया जाता था. लेकिन इस अपडेट के बाद यह सीधे Chrome के अंदर काम करेगा. यानी अगर आप कोई खबर पढ़ रहे हैं, किसी प्रोडक्ट के बारे में जानकारी देख रहे हैं या किसी टॉपिक पर सर्च कर रहे हैं, तो उसी पेज पर AI से सवाल पूछ सकते हैं. इसके लिए अलग से नया टैब खोलने की जरूरत नहीं होगी। साइड पैनल में जुड़ा Gemini Chrome में यह फीचर एक साइड पैनल के रूप में दिखेगा. यूज़र इसे खोलकर Gemini से चैट कर सकते हैं. अगर कोई आर्टिकल बहुत लंबा है तो AI से उसका समरी पूछा जा सकता है। अगर किसी वेबसाइट पर दी गई जानकारी थोड़ी मुश्किल है तो Gemini उसे आसान भाषा में समझा सकता है. उदाहरण के तौर पर अगर कोई टेक्नोलॉजी या फाइनेंस से जुड़ा आर्टिकल पढ़ रहा है, तो AI से पूछा जा सकता है कि इसका मतलब क्या है या इसका छोटा सार क्या है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समझेगा कॉन्टेक्स्ट इस फीचर की एक और खास बात यह है कि AI एक से ज्यादा टैब को भी समझ सकता है. मान लीजिए आपने किसी स्मार्टफोन या लैपटॉप के बारे में अलग-अलग वेबसाइट खोल रखी हैं। ऐसे में Gemini उन टैब्स में दी गई जानकारी को देखकर तुलना करने में मदद कर सकता है. इससे यूज़र को अलग-अलग साइट पढ़ने में ज्यादा समय नहीं लगाना पड़ेगा। डेस्क्टॉप यूजर्स को पहले मिलेगा ये फीचर रिपोर्ट्स के मुताबिक यह फीचर अभी धीरे-धीरे रोलआउट किया जा रहा है. सबसे पहले इसे डेस्कटॉप यूज़र्स के लिए लाया गया है. यानी Windows और Mac पर Chrome इस्तेमाल करने वाले यूज़र्स को यह फीचर मिलने लगा है. आने वाले समय में इसे और ज्यादा यूज़र्स तक पहुंचाया जा सकता है। भारत को ध्यान में रखते हुए इसमें कई भाषाओं का सपोर्ट भी दिया गया है. इससे यूज़र अपनी भाषा में भी AI से सवाल पूछ सकेंगे. यानी अगर कोई हिंदी में सवाल पूछता है तो AI उसी भाषा में जवाब दे सकता है। दरअसल पिछले कुछ समय से टेक कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स में AI को तेजी से जोड़ रही हैं. गूगल पहले ही Gemini को अपने कई प्रोडक्ट्स में ला चुका है. अब Chrome में इसका इंटीग्रेशन दिखाता है कि कंपनी चाहती है कि यूज़र्स को ब्राउज़र के अंदर ही एक AI असिस्टेंट मिल जाए, जो इंटरनेट इस्तेमाल करते समय तुरंत मदद कर सके।  

Nano Banana 2 लॉन्च: Google AI से मिनटों में तैयार करें 4K फोटो, जानें कैसे और कहां होगा इस्तेमाल

गूगल के नैनो बनाना टूल का इस्‍तेमाल करके तस्‍वीरें बनवाने वाले तमाम लोगों के लिए बड़ी खबर है। गूगल ने Nano Banana 2 (Gemini 3.1 Flash Image) नाम से अपना नया इमेज मॉडल लॉन्‍च कर दिया है। कंपनी ने पिछले साल अगस्‍त में नैनो बनाना को पेश किया था। उसका इस्‍तेमाल करके लोगों ने खूब फोटो बनवाईं। साड़ी ट्रेंड भी काफी सुर्खियों में रहा। अब Nano Banana 2 आ गया है। गूगल ने बताया है कि इसकी मदद से लोग 4K फोटो एआई से बनवा पाएंगे। टूल को रोलआउट किया जा रहा है, आइए जानते हैं इसे कहां इस्‍तेमाल किया जा सकेगा। Nano Banana 2 क्‍या है? गूगल ने पिछले साल अगस्‍त में Nano Banana को पेश किया था। फिर नवंबर में Nano Banana Pro को रिलीज किया। अब कंपनी ने Nano Banana 2 (Gemini 3.1 Flash Image) को उतारा है। कहा है कि यह उसका सबसे नया इमेज मॉडल है। दावा है कि इसकी मदद से ज्‍यादा बेहतर क्‍वॉलिटी वाली फोटोज को तेजी से बनवाया जा सकता है। कंपनी के सीईओ सुंदर पिचाई ने कहा है कि यह गूगल का अबतक का सबसे बेस्‍ट इमेज जेनरेशन मॉडल है। Nano Banana 2 के प्रमुख फीचर्स तस्‍वीरें ज्‍यादा रियल: गूगल ने बताया है कि Nano Banana 2 मॉडल, Gemini के रियल-वर्ल्ड नॉलेज का इस्‍तेमाल करके किसी इमेज को ज्‍यादा रियल बनाता है। अब लोग इन्‍फ्रोग्राफ‍िक्‍स तैयार करवा सकते हैं। नोट्स को डायग्राम में बदल सकते हैं। डेटा विजुअलाइजेशन भी इससे कर सकते हैं। टेक्‍स्‍ट को इमेज में लगाने और ट्रांसलेशन में माहि‍र: गूगल ने बताया है कि Nano Banana 2 किसी टेक्‍स्‍ट को सही तरीके से इमेज में लगाने और ट्रांसलेशन में माहि‍र हो गया है। दावा है कि किसी तस्‍वीर में टेक्‍स्‍ट लगवाना अब इसके बायें हाथ का खेल है। दावा है कि यह हाई-क्‍वॉलिटी और सच लगने वाली तस्‍वीरें बनाता है। जैसा कहा, वैसा बनाएगा: Nano Banana 2 अपने यूजर के प्रॉम्‍प्‍ट्स को बारीकी से समझकर इमेज बनाता है। दावा है कि यह वैसी ही तस्‍वीर बनाने में सक्षम है जैसा किसी यूजर ने सोचा था। हाई-क्‍वॉलिटी इमेज: नैनो बनाना2 की मदद से लोग 4K तक अलग-अलग आस्पेक्ट रेशियो और रेजॉलूशन में फोटोज बनवा सकेंगे। दावा है कि यूजर्स को वाइब्रेंट लाइटिंग, बेहतर टेक्सचर और शार्प डिटेल मिलेंगी। Nano Banana 2 कौन कर पाएगा इस्‍तेमाल? Nano Banana 2 को गूगल के सभी प्रमुख प्रोडक्‍ट्स से जोड़ा जा रहा है। Gemini ऐप: जेमिनी ऐप में यह नैनो बनाना के अबतक आए मॉडलों की जगह लेगा। कंपनी ने कहा है कि Google AI Pro और Ultra सब्सक्राइबर इसे इस्‍तेमाल कर पाएंगे।

रिस्की ऐप्स पर बड़ी कार्रवाई: AI की मदद से Google ने बचाए करोड़ों यूजर्स

नई दिल्ली गूगल ने गुरुवार को 2025 में एंड्रॉयड इकोसिस्टम को सिक्योर रखने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी दी है. अपने ऐनुअल सिक्योरिटी अपडेट में कंपनी ने बताया कि कैसे गूगल प्ले को सुरक्षित बनाने के लिए लाखों ऐप्स को ब्लॉक किया गया है. कंपनी ने लाखों ऐसे ऐप्स को ब्लॉक किया है जो मालवेयर फैला सकते थे.  इतना ही नहीं ये ऐप्स फाइनेंशियल फ्रॉड्स, छिपे हुए सब्सक्रिप्शन और प्राइवेसी में दखल के जरिए यूजर्स को नुकसान पहुंचा सकते थे. इससे पहले किसी यूजर को कोई नुकसान हो गूगल ने इन्हें अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया है. कंपनी ने बताया है कि उन्होंने AI टूल की मदद से ऐसे ऐप्स को पहचाना है.  17.5 लाख ऐप्स को किया ब्लॉक गूगल ने बताया कि 2025 में 17.5 लाख ऐप्स को Google Play पर पब्लिश होने से पहले ही ब्लॉक कर दिया गया है, क्योंकि उन्होंने कंपनी की पॉलिसी का उल्लंघन किया था. कंपनी ने इसकी जानकारी 19 फरवरी को रिलीज हुए ब्लॉक में दी है. साथ ही कंपनी ने 80 हजार डेवलपर्स को भी बैन किया है, जो ऐसी एक्टिविटी से जुड़े हुए थे.  दिग्गज टेक कंपनी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि उन्होंने 2,55,000 ऐप्स को यूजर के सेंसिटिव और गैरजरूरी डेटा तक पहुंचने से रोका है. गूगल ने अपनी प्राइवेसी पॉलिसी को मजबूत किया है और प्राइवेसी फॉर्वर्ड डेवलपमेंट को प्रमोट करने की बात कही है.  AI कैसे कर रहा है गूगल की मदद? ऐप डिस्कवरी में लोगों के भरोसे को बनाए रखने के लिए गूगल ने एंटी-स्पैम सिस्टम को बेहतर किया है. इसकी वजह से 16 लाख स्पैम रेटिंग और रिव्यूज को ब्लॉक किया गया है. इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड रिव्यूज भी शामिल हैं. इसके अलावा रिव्यू बॉम्बिंग कैपेन की वजह से ऐप्स को होने वाले नुकसान को भी कम किया गया है.  कंपनी का कहना है कि इससे यूजर्स और डेवलपर्स दोनों को फायदा हुआ है. कंपनी ने बताया है कि उसका जेनरेटिव AI पावर्ड रिव्यू सिस्टम किसी ऐप को कैसे एनालाइज करता है. ये सिस्टम किसी ऐप की अर्ली लाइफ साइकिल डेवपलमेंट को एनालाइज करने, मैलवेयर, स्पाईवेयर और फाइनेशियल स्कैम को डिटेक्ट करने में मदद करता है.

टेक्नोलॉजी में नया अध्याय: Jio–Google–Microsoft की Trusted Tech Alliance, भारत के डिजिटल भविष्य पर क्या होगा असर?

नई दिल्ली अफ्रीका, एशिया, यूरोप और नॉर्थ अमेरिका की 15 बड़ी कंपनियों ने ‘ट्रस्टेड टेक एलायंस’ (TTA) के गठन की घोषणा की है। यह एक जैसी सोच वाली इंटरनेशनल टेक कंपनियों का एक समूह है, जो कनेक्टिविटी, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर, सेमीकंडक्टर, सॉफ्टवेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए ऐसी तकनीक बनाने के लिए साथ आए हैं जिस पर दुनिया यकीन कर सके और जिसे परखा जा सके। इस एलायंस में भारत की ओर से Jio Platforms शामिल है। जर्मनी में आयोजित म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस के दौरान इस एलायंस का ऐलान किया गया। ये दिग्गज कंपनियां हैं इस एलायंस का हिस्सा एलायंस के संस्थापक सदस्यों में अमेजन, वेब सर्विसेज, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल क्लाउड, एरिक्सन, नोकिया, एसएपी और एनटीटी जैसी कुल 15 ग्लोबल टेक कंपनियां शामिल हैं। एलायंस का कहना है कि आगे और कंपनियों को इससे जोड़ा जाएगा। इसके साथ ही, देश और दुनिया के लेवल पर अपनी तकनीक को और बेहतर बनाने, दूसरी कंपनियों के साथ मुकाबले में बने रहने और एक मजबूत डिजिटल सिस्टम तैयार करने पर काम जारी रहेगा। जियो का बड़ा संकल्प लॉन्च के मौके पर जियो प्लेटफॉर्म्स के सीईओ किरण थॉमस ने कहा कि विश्व स्तर पर डिजिटल विकास को गति देने के लिए भरोसेमंद, सुरक्षित और पारदर्शी टेक्नोलॉजी जरूरी है। जियो प्लेटफॉर्म्स को गर्व है कि वह 'ट्रस्टेड टेक एलायंस' का हिस्सा बना है, ताकि टेक्नोलॉजी की दुनिया में मिलकर ऐसे नियम और तरीके बनाए जा सकें जो सुरक्षित हों और जिन पर सब भरोसा कर सकें। उन्होंने आगे बताया कि हम इस कोशिश के जरिए दुनिया भर के पार्टनर्स के साथ मिलकर आने वाले समय की इंटरनेट कनेक्टिविटी, क्लाउड और AI सिस्टम को इतना बेहतर बनाना चाहते हैं कि लोग लंबे समय तक उन पर भरोसा कर सकें। माइक्रोसॉफ्ट के वाइस चेयर और प्रेसिडेंट ब्रैड स्मिथ ने इस मौक पर कहा कि मौजूदा वैश्विक माहौल में समान सोच वाली कंपनियों का साथ आना जरूरी है, ताकि सीमाओं के पार तकनीक में भरोसा और उच्च मानक कायम किए जा सकें। वहीं एरिक्सन के सीईओ बोर्ये एकहोम ने कहा कि कोई एक कंपनी या देश अकेले सुरक्षित और भरोसेमंद डिजिटल ढांचा नहीं बना सकता, इसके लिए वैश्विक सहयोग जरूरी है। ग्लोबल मंच पर बढ़ेगी भारत की धाक इस एलायंस के तहत सदस्य कंपनियों ने पांच प्रमुख सिद्धांतों पर सहमति जताई है। इसमें कंपनियों को चलाने के ईमानदार तरीके, सुरक्षा की समय-समय पर जांच, सामान और सेवाओं की सप्लाई का मजबूत नेटवर्क, एक ऐसा सिस्टम जहां सब मिलकर काम कर सकें और कानून के हिसाब से लोगों के डेटा को सुरक्षित रखना शामिल है। इन नियमों के जरिए कंपनियां यह सुनिश्चित करेंगी कि टेक्नोलॉजी सुरक्षित, विश्वसनीय और जिम्मेदारी के साथ संचालित हो, चाहे उसका विकास या इस्तेमाल कहीं भी हो। एक्सपर्ट्स का मानना है कि जियो की भागीदारी से भारत को वैश्विक डिजिटल मानकों के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का मौका मिलेगा। इससे देश में क्लाउड, 5G और AI आधारित सर्विसेज को ग्लोबल स्तर की विश्वसनीयता मिल सकती है और डेटा सुरक्षा को लेकर ग्राहकों का भरोसा और मजबूत होगा।

Google का अलर्ट: 40% स्मार्टफोन में बढ़ा खतरा, अपनी सेफ्टी के लिए ये कदम उठाएं

 नई दिल्ली अमेरिकी कंपनी गूगल ने एक बड़ी वॉर्निंग दी है और बताया है कि करीब आधे एंड्रॉयड स्मार्टफोन यूजर्स पर मैलवेयर और स्पाईवेयर के खतरे में है. ये खतरा पुराने Android OS वर्जन होने की वजह से है.  ये जानकारी फॉर्ब्स ने दी है. रिपोर्ट में बताया है कि इस खतरे की वजह पुराना एंड्रॉयड ओएस वर्जन है. जो एंड्रॉयड 13 या उससे भी पुराने ओएस पर काम करते हैं. पुराने Android OS को अब सिक्योरिटी अपडेट नहीं मिलता है, जिसकी वजह से उनपर सबसे ज्यादा खतरा है. ऐसे स्मार्टफोन यूजर्स की संख्या दुनियाभर में 1 अरब से ज्यादा है.  Android 16 इतने यूजर्स के फोन में  दुनियाभर में Android 16 अभी सिर्फ 7.5% डिवाइस में ही मौजूद है, जो दिसंबर तक का डेटा है. Android 15 पर 19.3 परसेंट फोन काम करते हैं. Android 14 पर 17.9 परसेंट स्मार्टफोन काम करते हैं और Android 13 पर 13.9 परसेंट स्मार्टफोन काम करते हैं. सिर्फ इतने परसेंट लोग सिक्योरिटी अपडेट के तहत आते हैं रिपोर्ट्स में बताया है कि 58 परसेंट स्मार्टफोन ऐसे हैं, जो सिक्योरिटी सपोर्ट के अंदर आते हैं, जबकि 40 परसेंट स्मार्टफोन के लिए सिक्योरिटी अपडेट अवेलेबल नहीं है.  पुराना स्मार्टफोन चलाने वाले यूजर्स को सलाह  स्मार्टफोन यूजर्स को सलाह दी गई है कि जिनके मोबाइल पुराने OS पर काम करते हैं, उनको लेटेस्ट एंड्रॉयड ओएस के साथ अपडेट कर लेना चाहिए. साथ ही सिक्योरिटी सपोर्ट को रेगुलर अपडेट करते रहना चाहिए. iPhone को मिलते हैं सिक्योरिटी अपडेट  पुराने iPhone को समय रहते अपडेट मिल जाते हैं और कई पुराने एंड्रॉयड स्मार्टफोन में जरूरी सिक्योरिटी अपडेट नहीं मिल पाते हैं. अगर कंपनी की तरफ से सपोर्ट बंद किया जा चुका है तो नया स्मार्टफोन खरीद लेना चाहिए.   कंपनियां 4-5 साल के लिए देती हैं सिक्योरिटी अपडेट  स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरर की तरफ से अपने हैंडसेट के लिए एक फिक्स टाइम तक सिक्योरिटी अपडेट दिया जाता है. आमतौर पर कंपनियां इसे 4 साल या 5 साल के लिए देती हैं. अब Samsung और गूगल पिक्सल हैंडसेट में 7 साल से ज्यादा के लिए सिक्योरिटी अपडेट देने का ऐलान किया है.  सिक्योरिटी अपडेट क्या होता है? स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरर की तरफ से हैंडसेट की सुरक्षा के लिए सिक्योरिटी अपडेट जारी किए जाते हैं. यह अपडेट बग्स और उन खामियों को दूर करने का काम करता है, जो कई बार गलती से पुराने OS में आ जाती हैं. इन कमजोरियों और बग्स का फायदा उठाकर हैकर्स डिवाइस तक एक्सेस कर सकते हैं और डेटा चोरी कर सकते हैं. कई बार स्मार्टफोन को हैक तक किया जा सकता है.     एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम पर काम करने वाले स्मार्टफोन की संख्या दुनियाभर में बहुत ज्यादा है. वहीं iPhone के iOS का यूज सिर्फ ऐपल के स्मार्टफोन को ही मिलता है और उनकी संख्या भी बहुत कम है. Android OS के साथ मिलकर सैमसंग, रियलमी, रेडमी, ओप्पो, वनप्लस जैसे स्मार्टफोन तैयार करते हैं और उनको ग्लोबल मार्केट में सेल करते हैं.     

Google की हाई-फाई जॉब छोड़ दी बीमारी की वजह से, इंजीनियर की प्रेरक कहानी वायरल

 नई दिल्ली जिंदगी में हर इंसान की तलाश क्या होती है. जल्द से जल्द पैसा कमाना, खुद को एक इनसेक्योर जोन से सेक्योर जोन में ले जाना, लेकिन असल जिंदगी की प्राथमिकता क्या है. रेस में सबसे आगे जाना या फिर जिंदगी की बुनियादी जरूरत वो सेहत है,जिसे दरकिनार कर दिया जाता है. अमेरिका में रहने वाली टिया ली की कहानी भी इन्हीं दो चीजों के इर्द-गिर्द घूमती है. अमेरिका में रहने वाली टिया ली (Tia Lee) ने 2020 में मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी (Michigan State University) से ग्रेजुएशन किया और तभी तय कर लिया था कि उन्हें सिर्फ एक चीज चाहिए जितना हो सके उतना पैसा कमाना. इसी सोच के साथ उन्होंने अपनी करियर जर्नी शुरू की, लेकिन तीन साल बाद यही रेस उनकी सेहत पर इतना भारी पड़ी कि आज वह सफलता को पूरी तरह नए नजरिए से देखती हैं. पैसा या सेहत-जिंदगी में क्या है अहमियत 2023 के अंत तक टिया एक साथ तीन भूमिकाएं निभा रही थीं.कैलिफोर्निया में Google की Technical Program Manager, फ्रीलांस वेबसाइट डिजाइनर और अपनी क्लोदिंग लाइन की मालिक. लगातार काम और अलग-अलग शहरों की यात्राओं ने उनकी सेहत पर असर डालना शुरू कर दिया. उन्होंने CNBC Make It को बताया कि वह लगभग हर दूसरे महीने बीमार पड़ने लगी थीं. कैलिफोर्निया, मिशिगन और टेक्सास के बीच लगातार यात्रा करते-करते उन्हें लगने लगा कि बीमारी सिर्फ ट्रैवल की वजह से होती है. लेकिन कई महीनों तक यूं ही बीमार रहने के बाद डॉक्टर ने इशारा किया कि असली वजह तनाव हो सकता है. इसी बात ने टिया को सोचने पर मजबूर किया कि शायद बहुत सारी जिम्मेदारियां ही उनकी सेहत को खराब कर रही हैं. तभी उन्होंने अपने करियर को रोकने का फैसला किया. भागदौड़ में खो गई थीं… टिया ने जीवन को आसान बनाने के लिए कई बदलाव किए. फ्रीलांस काम कम किया, खर्चों में कटौती की और इतना पैसा बचाया कि वे सालों तक बिना नौकरी के रह सकें. वह मिशिगन में अपने माता-पिता के घर वापस आ गईं. उन्होंने अपनी Tesla कार बेचकर एक सस्ती Chevrolet ले ली ताकि खर्च और कम हो सके. यहां तक कि उन्होंने एक निजी शेफ से यह समझौता किया कि वह उसका वेबसाइट बना दें और इसके बदले शेफ हफ्तेभर का मील प्रेप दे दे.इससे उनका किराना खर्च भी खत्म हो गया. इन बदलावों ने टिया के लिए सफलता की परिभाषा बदल दी. उन्होंने बताया कि पहले उनके लिए कामयाबी का मतलब था पैसा, प्रमोशन और काम में पहचान, लेकिन अब सफलता का मतलब है अपनी सेहत और समय पर पूरा नियंत्रण. Google छोड़ने के बाद उन्होंने जून में नौकरी से इस्तीफा दिया और ब्रूक्लिन, न्यूयॉर्क में शिफ्ट होकर एक धीमी, संतुलित जीवनशैली अपनाई, जिसमें अच्छा खाना और खुद के साथ समय बिताना शामिल है. फिलहाल उनका कॉर्पोरेट दुनिया में वापस लौटने का कोई प्लान नहीं है.

Chrome में नया फीचर, Google करेगा ऑटो टिकट बुकिंग और फॉर्म फीलिंग की सुविधा

 नई दिल्ली सोचिए, आप किसी वेबसाइट पर टिकट बुक कर रहे हैं. फॉर्म भरना है, सीट चुननी है, पेमेंट करना है. अब तक ये सब आपको खुद करना पड़ता था. लेकिन अब Google एक ऐसा फीचर ला रहा है, जहां Chrome ब्राउज़र खुद ये काम करने में मदद करेगा. वेब ब्राउजिंग का तरीका बदलने वाला है. अगर आपने Perplexity का Comet ब्राउजर यूज किया है तो पता होगा. नहीं किया तो बता दें कि ये Comet एजेंटिक ब्राउजर है. इसमें एक इनबिल्ट Assistant दिया गया है. आपको सिर्फ कमांड लिखना है और ये ब्राउजर खुद से ही सबकुछ करेगा. ऐसे में आपका टाइम भी बचेगा और प्रोडक्टिविटी भी बढ़ेगी.  Perplexity के अलावा OpenAI का भी एजेंटिक ब्राउजर ATLAS चर्चा में रहता है. हालांकि ये फिलहाल एक्सपेरिमेंटल ब्राउजर है, लेकिन ये भी एजेंटि ब्राउजर है. यहां भी आपको सिर्फ कमांड डालना है और ये खुद से ही आपके लिए ब्राउजिंग करता है और तमाम जरूरी काम करता है. एजेंटिक वेब ब्राउजिंग का फ्यूचर एजेंटिक वेब ब्राउजर का बूम आने ही वाला है और गूगल इस रेस में पीछे नहीं रह सकता. गूगल ने Chrome में Gemini ऐड कर दिया है और काफी हद तक ये फीचर रोल आउट होने के बाद ये एजेंटिक ब्राउजर की तरह बन कर तैयार हो जाएगा.  Google ने Chrome में अपने Gemini AI को जोड़ना शुरू कर दिया है. इसका मतलब है कि अब ब्राउज़र सिर्फ वेबसाइट खोलने का टूल नहीं रहेगा, बल्कि एक छोटा डिजिटल असिस्टेंट बन जाएगा, जो आपकी तरफ से वेब पर काम कर सकेगा. ब्राउजर बिना आपके ही करेगा ब्राउज टेक दुनिया में इसे Auto Browse या AI एजेंट फीचर कहा जा रहा है. आसान भाषा में समझें तो, अगर आप Chrome से कहेंगे – 'इस वेबसाइट से मेरा ट्रेन टिकट बुक कर दो'… तो AI पेज को समझेगा, बटन पहचानेगा, जरूरी जानकारी भरेगा और प्रोसेस को आगे बढ़ाएगा. यानी वेबसाइट चलाने की मेहनत कम, काम ज्यादा तेज. Google की तरफ से बताया गया है कि Gemini AI अब Chrome के अंदर सीधे काम करेगा. अभी तक AI टूल सिर्फ चैट तक सीमित थे. आप सवाल पूछते थे, जवाब मिलता था. लेकिन अब Gemini वेब पेज के साथ इंट्रैक्टर भी करेगा. वो स्क्रीन पर दिख रहे टेक्स्ट, बॉक्स और बटन को पहचान सकेगा और आपके निर्देश पर काम करेगा. उदाहरण के तौर पर अगर आप इंटरनेट पर कोई रिसर्च कर रहे हैं तो आप Assistant में लिख सकते हैं. या फिर अगर शॉपिंग कर रहे हैं और आपको प्रोडक्ट समझ नहीं आ रहा है तो भी आप लिख सकते हैं. ब्राउजर खुद से ही आपके पसंद का सामान ढूंढ देगा. कोडिंग में भी ये काफी फायदेमंद होने वाला है. इसका सीधा फायदा उन लोगों को होगा, जो टेक्निकल वेबसाइट्स या ऑनलाइन फॉर्म्स से घबराते हैं. बुजुर्ग यूजर्स, पहली बार इंटरनेट चलाने वाले लोग, या जिन्हें ऑनलाइन प्रोसेस जटिल लगता है… उनके लिए ये फीचर गेमचेंजर हो सकता है. अब सवाल उठता है कि क्या ये सुरक्षित रहेगा? Google का कहना है कि AI सिर्फ तभी काम करेगा जब यूजर अनुमति देगा. यानी बिना पूछे कोई फॉर्म नहीं भरेगा, ना कोई पेमेंट करेगा. हर अहम स्टेप पर यूजर का कंट्रोल रहेगा. साथ ही कंपनी दावा कर रही है कि डेटा ब्राउज़र के अंदर ही प्रोसेस होगा और आपकी निजी जानकारी बिना इजाजत कहीं शेयर नहीं होगी. फिलहाल ये फीचर टेस्टिंग फेज में है. कुछ चुनिंदा यूजर्स के लिए इसे धीरे-धीरे रोलआउट किया जा रहा है. आने वाले महीनों में Chrome यूजर्स को इसका अनुभव मिलने लगेगा. अगर ये टेक्नोलॉजी ठीक से काम करती है, तो इंटरनेट इस्तेमाल करने का तरीका बदल सकता है. अभी हम वेबसाइट चलाते हैं. आने वाले समय में हम AI को बताएंगे क्या करना है..और ब्राउज़र खुद काम करेगा. सीधे शब्दों में कहें तो, Chrome अब सिर्फ ब्राउज़र नहीं रहेगा. वो आपका वेब वाला असिस्टेंट बन जाएगा. और यही वजह है कि टेक इंडस्ट्री में इस अपडेट को लेकर काफी चर्चा है. क्योंकि ये सिर्फ नया फीचर नहीं, बल्कि इंटरनेट इस्तेमाल करने की नई शुरुआत मानी जा रही है.

AI की रेस में चीन का Kling आगे? जानिए क्यों दुनियाभर में मचा रहा है तहलका

नई दिल्ली AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से वीडियो बनाने का ट्रैंड इन दिनों काफी चल रहा है। क्रिएटर्स के लिए AI एक जरूरी टूल बन गया है। चीन की कंपनी Kuaishou का Kling प्लेटफॉर्म भी Google के Veo और OpenAI के Sora जैसे बड़े एआई वीडियो एडिटिंग टूल को कड़ी टक्कर दे रहा है। अब इसका नाम भी टॉप एआई एडिटिंग टूल की लिस्ट में शामिल हो गया है। बता दें कि Kling को जून, 2024 में लॉन्च किया गया था। इसके बाद इसने लगभग 1.2 करोड़ मंथली एक्टिव यूजर्स का बेस बना लिया है। इसकी सालाना आय लगभग 24 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई है। इसके बारे में डिटेल में जानते हैं। वीडियो जनरेशन बेंचमार्क में बदली रैंकिंग आजकल एलियन का हमला और डिजिटल इंसानों द्वारा लाइव स्ट्रीमिंग होस्ट करना आम बात हो गई है। वीडियो जनरेशन बेंचमार्क में रैंकिंग बदल रही है। Kling, Google के Veo और OpenAI के Sora के साथ टॉप टियर में अपनी जगह बना चुका है। Kuaishou का Kling समय के साथ-साथ हिट होता जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि इसकी लोकप्रियता इतनी क्यों बढ़ रही है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2024 में ही इसने 2 करोड़ अमेरिकी डॉलर से ज्यादा की कमाई की थी। इससे इसकी साल भर की कमाई 14 करोड़ अमेरिकी डॉलर हो गई थी। जनवरी 2025 में, रोजाना की औसत कमाई पिछले महीने की तुलना में लगभग 30% बढ़ गई। तीन कारण से सफल हुआ टूल Kuaishou के अनुसार, Kling जनरेटिव-एआई युग का नया मॉडर्न अवतार बता रहा है। कंपनी ने अप्रैल 2025 में इस टूल के लिए एक अलग बिजनेस यूनिट बनाई। पिछले साल की अर्निंग कॉल्स में कंपनी के अधिकारी बार-बार इसके बढ़ते यूजर बेस और कमाई का जिक्र करते रहे। Kling के ऑपरेशन हेड Zeng Yushen के अनुसार, इस वीडियो जनरेटर की सफलता के पीछे तीन मेन कारण हैं। इसमें बेहतरीन एआई मॉडल, मजबूत इंटरैक्टिव डिजाइन और क्रिएटर्स के इकोसिस्टम के साथ जुड़ाव शामिल है।

अंतरिक्ष में डेटा सेंटर की तैयारी में Google, तकनीकी दुनिया में मची हलचल

नई दिल्ली दुनियाभर में AI कंपनियां अपने डेटा सेंटर्स को लेकर काम कर रही हैं. कोई धरती पर या फिर कोई समंदर के अंदर डेटा सेंटर बना रहा है. इस दिशा में Google एक कदम आगे निकलने की कोशिश कर रहा है. अब गूगल अंतरिक्ष में AI कंप्यूटिंग सिस्टम को बनाने जा रहा है, जिसको आगे डेटा सेंटर के रूप में भी यूज किया जा सकेगा. इसको लेकर Google ने एक सफल परीक्षण किया है और सीईओ सुंदर पिचाई ने पोस्ट करके इसकी जानकारी भी दी है.  सुंदर पिचाई ने बताया कि गूगल ने लो अर्थ ऑर्बिट में पाई जाने वाले रेडिएशन की कंडिशन को फॉलो करते हुए एक सफल टेस्टिंग की है. इसमें ट्रिलियम-जनरेशन टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट्स (TPUs) को टेस्ट किया है.   प्रोजेक्ट सनकैचर के लिए यह एक बड़ी सफलता है. इस प्रोजेक्ट की मदद से गूगल अपने सबसे महत्वकांक्षी योजनाओं में से एक को पूरा करना चाहते है. कंपनी इसकी मदद से अंतरिक्ष में AI कंप्यूटिंग सिस्टम का सेटअप लगाना चाहता है, जिसको सूरज की रोशनी से पावर मिलेगी.   सुंदर पिचाई ने समझाया, TPU क्या है?  गूगल सीईओ सुंदर पिचाई ने बताया कि TPU असल में खास तरह की चिप्स हैं, जिनको आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) के काम को बेहतर बनाने के लिए तैयार किया है. इन चिप्स की टेस्टिंग रेडिएशन एक्सपोजर के दौरान की गई और इन चिप्स पर डैमेज का कोई भी निशान नहीं दिखा है.     सफल टेस्टिंग से इस बात के पॉजिटिव साइन मिलते हैं कि गूगल का एडवांस्ड हार्डवेयर सिस्टम, आउटर स्पेस के खतरनाक एनवायरमेंट का भी सामना करना सकेगा. बताते चलें कि आउटर स्पेस में हाई रेडिशन और तापमान तेजी से बदलता है.  इस प्रोजेक्ट का मकसद सूर्य से आने वाली ऊर्जा को पावर में बदलने का है. इसके लिए सोलर पावर पैनल्स का यूज किया जा सकता है. इस पावर को पृथ्वी के लो ओर्बिट में स्थापित लार्ज स्केल AI कंप्यूटर सिस्टम में ट्रांसफर किया जाएगा.  इस प्रोजेक्ट की जरूरत क्यों पड़ी?  दरअसल, AI मॉडल जैसे ChatGPT, Gemini, Claude आदि को चलाने के लिए बहुत ज्यादा बिजली की जरूरत होती है. बिजली की इस जरूरत को पूरा करने के लिए अगर कोयला, गैस या डीजल का यूज होता है तो काफी ज्यादा प्रदूषण होगा. ऐसे में कंपनी इसको सोलर पावर से चलाना चाहती है, जिसके लिए लो अर्थ ऑर्बिट में पूरा सेटअप लगाने का प्लान बनाया है.   कहां से मिली है प्रेरणा  गूगल को इस प्रोजेक्ट की प्रेरणा मूनशूट प्रोजेक्ट से मिली है, जिसे अब अल्फाबेट की X डिविजन के रूप में जाना जाता है. इस डिविजन का काम अनोखी टेक्नोलॉजी तैयार करना है, जो अधिकतर लोगों की सोच से परे होती हैं. 2027 की दी है डेडलाइन  सुंदर पिचाई ने बताया कि अगर सब कुछ ठीक चला तो 2027 की शुरुआत तक Planet कंपनी के साथ मिलकर अपने दो प्रोटोटाइप सेटेलाइट लॉन्च करेगी. इसके बाद प्रोजेक्ट को आगे भी लेकर जाएंगे.