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ईरान के राष्ट्रपति ने अल्लाह के खिलाफ युद्ध बताकर दी सजा-ए-मौत की चेतावनी

तेहरान. ईरान में आर्थिक तंगी और दमनकारी नीतियों के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शन अब अपने दूसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुके हैं। इस बीच, ईरानी अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को कुचलने के लिए बेहद सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। शनिवार को ईरान के अटॉर्नी जनरल ने प्रदर्शनकारियों को 'अल्लाह का शत्रु' घोषित करते हुए उन्हें फांसी की सजा देने की धमकी दी है। ईरान के अटॉर्नी जनरल मोहम्मद मोवहेदी आजाद ने सरकारी टेलीविजन पर बयान देते हुए कहा कि जो कोई भी इन प्रदर्शनों में शामिल है या दंगाइयों की मदद कर रहा है, उसे 'मोहारेबेह' (अल्लाह के खिलाफ युद्ध) का दोषी माना जाएगा। ईरानी कानून के तहत इस अपराध की सजा सिर्फ मौत है। उन्होंने निर्देश दिए कि बिना किसी देरी और दया के इन लोगों के खिलाफ मुकदमे चलाए जाएं। सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने भी संकेत दिए हैं कि देशव्यापी स्तर पर अब बड़ा क्रैकडाउन शुरू किया जा सकता है। ईरान ने बाहरी दुनिया से संपर्क काटने के लिए इंटरनेट और अंतरराष्ट्रीय फोन लाइनों को पूरी तरह बंद कर दिया है। इसके बावजूद, मानवाधिकार संस्थाओं से मिली जानकारी के अनुसार हालात बेहद चिंताजनक हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ता समाचार एजेंसी (HRANA) के अनुसार, अब तक कम से कम 72 लोग मारे गए हैं। प्रदर्शनों के दौरान 2,300 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है। ईरानी मीडिया के अनुसार, गचसरन में बासिज बल के 3 सदस्य मारे गए हैं और हमदान, बंदर अब्बास, गिलान और मशहद में भी सुरक्षा अधिकारियों की मौत की खबरें हैं। ट्रंप सरकार की ईरान को सख्त चेतावनी अमेरिका ने ईरान के प्रदर्शनकारियों का खुला समर्थन किया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा, "अमेरिका ईरान के बहादुर लोगों के साथ खड़ा है।" वहीं, अमेरिकी विदेश विभाग ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि वह राष्ट्रपति ट्रंप के साथ खेल न खेलें। जब वे कुछ कहते हैं, तो उसका मतलब होता है। क्या है इस गुस्से की वजह? प्रदर्शनों की शुरुआत 28 दिसंबर 2025 को ईरान की गिरती अर्थव्यवस्था के कारण हुई थी। ईरानी मुद्रा रियाल अब तक के सबसे निचले स्तर 1.4 मिलियन (14 लाख) प्रति डॉलर पर पहुंच गई है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और परमाणु कार्यक्रम की वजह से आम जनता दाने-दाने को मोहताज है। अब यह आर्थिक गुस्सा सीधे तौर पर देश की धार्मिक सत्ता को चुनौती देने वाले राजनीतिक विद्रोह में बदल गया है।

‘दुनिया के सबसे अमीर बच्चे’ को बुला रहा पूरा ईरान?

तेहरान. एक हाथ में रईसी थी, दूसरे में तन्हाई… और साथी था सिर्फ एक कुत्ता। 1970 के दशक की उस वायरल खबर का नायक आज ईरान की सड़कों पर गूंज रहे नारों का केंद्र बन गया है। आज ईरान की सड़कें एक बार फिर आग उगल रही हैं। दिसंबर 2025 के आखिर से शुरू हुए ये विरोध प्रदर्शन अब एक राष्ट्रीय क्रांति में बदलते प्रतीत हो रहे हैं। आर्थिक संकट, महंगाई, रियाल की रिकॉर्ड गिरावट और इस्लामिक रिपब्लिक की दमनकारी नीतियों से तंग आकर लोग सड़कों पर उतर आए हैं। लेकिन इस बार सबसे ज्यादा गूंज रहा है एक नाम- रजा पहलवी का। वे ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बड़े बेटे और ईरान के 'क्राउन प्रिंस' हैं। तो सवाल ये है कि वो शख्स, जिसे बचपन में दुनिया का सबसे अमीर बच्चा कहा जाता था और जिसका सबसे करीबी दोस्त सिर्फ एक कुत्ता था, वह आज 47 साल के निर्वासन के बाद भी ईरान के दिलों में क्यों जिंदा है? वह पुरानी तस्वीर और 'सोने का पिंजरा' 31 अक्टूबर 1960 को तेहरान में जन्मे रजा पहलवी को जन्म से ही क्राउन प्रिंस का दर्जा मिला। उनके पिता मोहम्मद रजा शाह उस वक्त ईरान के शक्तिशाली शासक थे- तेल की कमाई से देश अमीर हो रहा था और शाह का निजी साम्राज्य अरबों डॉलर का था। रजा को फ्रेंच गवर्नेस ने पाला, निजी पैलेस स्कूल में पढ़ाई हुई, बॉडीगार्ड्स 24/7 साथ रहते थे। लेकिन ये वैभव अकेलेपन के साथ आया। हाल ही सोशल मीडिया पर ईरान की एक पत्रिका की कटिंग वायरल हो रही है। यह 1978 के आसपास की है। उस समय रजा पहलवी की उम्र महज 17 साल थी। हेडलाइन में लिखा है- दुनिया का सबसे अमीर बच्चा, जिसका दोस्त सिर्फ उसका कुत्ता है। उस दौर में रजा पहलवी के पास वह सब कुछ था जो एक इंसान सपने में भी नहीं सोच सकता। अपना हवाई जहाज, कस्टम मेड कारें, महलों में सुरक्षा गार्ड और बेहिसाब दौलत। लेकिन उस रिपोर्ट के मुताबिक, उनके पास जो नहीं था, वह था- 'सच्चा दोस्त'। उनका सबसे करीबी साथी उनका स्पैनियल कुत्ता 'जूडी' था। यह उस दौर की बात है जब ईरान को मिडिल-ईस्ट का पेरिस कहा जाता था और रजा पहलवी उसके भविष्य के बादशाह थे। 1979 की क्रांति और सब कुछ खो जाना इस तस्वीर के छपने के कुछ ही समय बाद, रजा पहलवी की किस्मत ने ऐसा पलटा खाया कि किसी फिल्मी कहानी को भी मात दे दी। 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई। उनके पिता, शाह मोहम्मद रजा पहलवी को देश छोड़ना पड़ा। वह लड़का, जो 'दुनिया का सबसे अमीर बच्चा' था, अचानक 'दुनिया का सबसे हाई-प्रोफाइल रिफ्यूजी' बन गया। महलों की जगह निर्वासन ने ले ली। जिस देश पर उन्हें राज करना था, वहां उनके परिवार के लिए मौत के फरमान जारी हो गए। रजा पहलवी ने अपनी जवानी अमेरिका में एक निर्वासित राजकुमार के रूप में बिताई, अपने देश को दूर से जलते हुए देखते रहे। आज पूरा ईरान उन्हें क्यों बुला रहा है? कहानी का सबसे अहम मोड़ अब, यानी 2023-2025 के बीच आया है। आज ईरान की सड़कों पर, हिजाब विरोधी प्रदर्शनों में और सरकार विरोधी रैलियों में एक नारा अक्सर गूंजता है- रजा शाह, रूहता शाद (रजा शाह, तुम्हारी आत्मा को शांति मिले) और ए शहजादे, वापस आओ। ईरान में प्रदर्शन दिसंबर 2025 में तेहरान के ग्रैंड बाजार से शुरू हुए, जहां व्यापारियों ने महंगाई के खिलाफ हड़ताल की। जल्द ही ये पूरे देश में फैल गए- तेहरान, शिराज, इस्फहान, मशहद, यहां तक कि छोटे शहरों में। सरकार ने इंटरनेट और फोन सेवाएं बंद कर दीं, लेकिन लोग नहीं रुके। मौतें सैकड़ों में हैं, हजारों गिरफ्तारियां हुई हैं, लेकिन नारे अब सिर्फ आर्थिक नहीं- पूरी तरह ब्रांडाजन के हैं। और इसी बीच रजा पहलवी ने वीडियो मैसेज जारी किए: 6 जनवरी को पहली बार उन्होंने लोगों से शाम 8 बजे एक साथ नारे लगाने को कहा। 8-9 जनवरी को फिर फ्रेश कॉल दिया- शहर के सेंटर कब्जाने, पुराना शेर और सूरज झंडा लहराने और शहरों पर कब्जा करने की अपील। उन्होंने कहा- मैं जल्द ही अपनी मातृभूमि में वापस आऊंगा। प्रदर्शनकारियों ने उनकी कॉल पर अमल किया- लाखों सड़कों पर उतरे, और नारे सिर्फ मौत बर खामनेई नहीं, बल्कि पहलवी वापस आएगा भी लगे। इसके पीछे के प्रमुख कारण: आर्थिक बदहाली: ईरान की करेंसी (रियाल) रसातल में जा चुकी है। महंगाई चरम पर है। लोगों को वह दौर याद आ रहा है जब शाह के राज में ईरान की इकोनॉमी मजबूत थी और तेल का पैसा विकास में लग रहा था। धार्मिक कट्टरता से उब चुकी जनता: महसा अमीनी की मौत के बाद शुरू हुए आंदोलनों ने यह साफ कर दिया है कि ईरान की नई पीढ़ी (Gen Z) इस्लामी गणतंत्र के सख्त नियमों (जैसे अनिवार्य हिजाब) को नहीं मानती। वे उस सेक्युलर और आधुनिक ईरान की कल्पना करते हैं, जिसका प्रतिनिधित्व पहलवी परिवार करता था। नेतृत्व का अभाव: ईरान में विपक्ष पूरी तरह बिखरा हुआ है। ऐसे में रजा पहलवी, जो अब 63 वर्ष के हैं, एक जाने-पहचाने चेहरे और 'एकता के प्रतीक' के रूप में उभरे हैं। वे लोगों के लिए उस 'खोए हुए सुनहरे दौर' की निशानी हैं। लेकिन क्या सब चाहते हैं राजशाही? नहीं। कुछ विरोधी कहते हैं कि शाह के दौर में भी दमन था (SAVAK की बदनामी), असमानता बढ़ी थी। कुछ नारे लगाते हैं: न शाह, न मुल्ला। ईरानी सेना और शासन ने प्रदर्शनों को अमेरिका और इजराइल की साजिश करार दिया है। लेकिन आज की तस्वीर में पहलवी सबसे मजबूत और सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त चेहरा हैं। दिलचस्प बात यह है कि रजा पहलवी खुद को अब 'राजा' के रूप में प्रोजेक्ट नहीं करते। हालिया इंटरव्यूज और भाषणों में उन्होंने साफ किया है कि वे राजशाही वापस लाने के लिए नहीं, बल्कि ईरान में लोकतंत्र लाने के लिए लड़ रहे हैं। वे कहते हैं- मुझे सत्ता नहीं चाहिए, मैं बस अपने लोगों को चुनने का अधिकार देना चाहता हूं। यह बदलाव उन्हें उस 17 साल के रईस बच्चे से एक परिपक्व राजनेता बनाता है।

एक दिन में बड़ी संख्या में अफगान शरणार्थियों को ईरान-पाकिस्तान द्वारा वापस भेजा गया

काबुल  ईरान और पाकिस्तान से एक ही दिन में 5,500 से अधिक अफगान शरणार्थियों को जबरन अफगानिस्तान वापस भेजा गया। यह जानकारी तालिबान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने  दी। प्रवासियों से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए गठित उच्च आयोग की रिपोर्ट को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा करते हुए तालिबान के उप प्रवक्ता मुल्ला हमदुल्लाह फ़ित्रत ने बताया कि बुधवार को कुल 863 परिवारों के 5,591 लोग अफगानिस्तान लौटे। यह जानकारी पज्हवोक अफगान न्यूज ने दी। उन्होंने बताया कि लौटने वाले शरणार्थी हेरात के इस्लाम क़िला बॉर्डर, हेलमंद के बह्रमचा, निमरोज़ के पुल-ए-अब्रेशम, नंगरहार के तोरखम और कंधार के स्पिन बोल्डक सीमा मार्गों से देश में दाखिल हुए। फ़ित्रत के अनुसार, 1,311 परिवारों के 7,165 लोगों को उनके संबंधित इलाकों में भेजा गया, जबकि 849 परिवारों को मानवीय सहायता प्रदान की गई। इसके अलावा, दूरसंचार कंपनियों ने हाल ही में लौटे शरणार्थियों को 937 सिम कार्ड भी उपलब्ध कराए। उन्होंने यह भी बताया कि  ईरान और पाकिस्तान से 3,005 अफगान शरणार्थियों को जबरन निर्वासित किया गया था।इस बीच, ईरान और पाकिस्तान से अफगान शरणार्थियों के निर्वासन का सिलसिला जारी है। काबुल के एक प्रवासी शिविर में रह रहे कई लौटे हुए शरणार्थियों ने पाकिस्तानी पुलिस द्वारा कथित दुर्व्यवहार की आलोचना की है और कहा है कि उनकी सारी संपत्ति वहीं छूट गई। अफगानिस्तान के टोलो न्यूज के अनुसार, पिछले सप्ताह लौटे शरणार्थियों ने तत्काल आश्रय, भूमि, आर्थिक सहायता और रोजगार के अवसरों की मांग उठाई थी। पाकिस्तान से निर्वासित जमालुद्दीन ने टोलो न्यूज से कहा, “हमें जबरन निकाल दिया गया। हमारी कुछ संपत्ति वहीं रह गई। यहां न पैसा है, न रहने की जगह। सर्दी बढ़ रही है और हालात बेहद कठिन हैं।” एक अन्य निर्वासित गुलज़ार ने कहा, “हमें बाहर निकाल दिया गया। वह देश हमारे लिए पराया था। अब हम अपने वतन लौटे हैं और इस्लामिक अमीरात से मदद की अपील करते हैं।” कई लौटे हुए शरणार्थियों ने कहा कि पाकिस्तान में उनकी सारी संपत्ति नष्ट या छूट गई और उन्होंने तालिबान से आश्रय, आपात सहायता और रोजगार उपलब्ध कराने की मांग की। ईरान से लौटे जन मोहम्मद ने कहा, “इस्लामिक अमीरात को इन लोगों की मदद करनी चाहिए। उनके पास रहने की कोई जगह नहीं है। मैं खुद जौज़जान प्रांत जा रहा हूं, लेकिन वहां भी ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं है।”

युद्ध के साए में इज़राइल का हथियार निर्यात, गाजा-ईरान तनाव के बीच 14 अरब डॉलर की बिक्री

तेल अवीव इजरायल दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में से एक है, लेकिन वह जंग लड़ते हुए भी बड़ा व्यापार कर रहा है. गाजा में लंबी जंग और ईरान के साथ तनाव के बावजूद, 2024 में इजरायल ने रिकॉर्ड 14.7 अरब डॉलर (करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये) के हथियार बेचे. सबसे हैरानी की बात ये है कि इनमें से आधे से ज्यादा यूरोपीय देशों ने खरीदे. इजरायल के रक्षा मंत्रालय ने जून 2025 में यह आंकड़ा जारी किया. यह चौथा साल लगातार है जब इजरायल के हथियार निर्यात ने नया रिकॉर्ड बनाया.  2024 में हथियार बिक्री का रिकॉर्ड: आंकड़े क्या कहते हैं? इजरायल के रक्षा उद्योग ने 2024 में 13% की बढ़ोतरी के साथ 14.7 अरब डॉलर का टर्नओवर किया. यह 2023 की तुलना में 1.3 अरब डॉलर से ज्यादा है. मुख्य खरीदार यूरोप था, जिसने कुल निर्यात का 54% (करीब 8 अरब डॉलर) लिया. 2023 में यह हिस्सा सिर्फ 35% था. एशिया-पैसिफिक दूसरे नंबर पर रहा, लेकिन यूरोप ने सबको पछाड़ दिया. सबसे ज्यादा बिके हवाई रक्षा सिस्टम, जैसे आयरन डोम के हिस्से. इनकी बिक्री 48% रही. इसके अलावा मिसाइलें, ड्रोन, रडार और साइबर हथियार भी लोकप्रिय रहे. इजरायल एयर इंडस्ट्रीज (आईएआई), राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स और एल्बिट सिस्टम्स जैसी कंपनियों ने बड़ा योगदान दिया. जंग के बीच व्यापार कैसे फला-फूला? गाजा में 2023 से चल रही जंग ने इजरायल को भारी नुकसान दिया. हजारों सैनिक घायल हुए, लेकिन इसने इजरायली हथियारों की ताकत दिखाई. यूरोपीय देशों को लगा कि इजरायल के हथियार असली जंग में काम करते हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध से यूरोप को हथियारों की भारी जरूरत पड़ी. इजरायल ने मौका लपका और तेजी से डिलीवरी दी. ईरान के साथ तनाव ने भी मदद की. ईरान ने अप्रैल 2024 में इजरायल पर मिसाइल हमला किया, लेकिन इजरायल ने उसे रोक लिया. इससे उसके डिफेंस सिस्टम की डिमांड बढ़ी. यूरोप में भी रूस का खतरा है, इसलिए वे इजरायली तकनीक चाहते हैं. बावजूद बॉयकॉट कॉल्स के (गाजा जंग पर निंदा के कारण) बिक्री बढ़ी. यूरोपीय देश क्यों खरीद रहे? यूरोप इजरायल का सबसे बड़ा पार्टनर बन गया. जर्मनी, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन जैसे देशों ने बड़े ऑर्डर दिए. उदाहरण के लिए…     जर्मनी: आयरन डोम जैसे सिस्टम के लिए अरबों डॉलर खर्च.     पोलैंड: ड्रोन और मिसाइल सिस्टम.     रोमानिया: रडार और एयर डिफेंस. यूरोपीय संघ (ईयू) ने गाजा पर सख्त बातें कीं, लेकिन व्यापार जारी रहा. ईयू इजरायल का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है, जिसने 2024 में 45.5 अरब डॉलर का व्यापार किया. हथियारों पर दबाव है, लेकिन अभी कोई बड़ा प्रतिबंध नहीं. कुछ देशों ने कहा कि अगर गाजा जंग न रुकी, तो ट्रेड बेनिफिट्स काट देंगे. इजरायल के लिए फायदे और चुनौतियां यह बिक्री इजरायल की अर्थव्यवस्था को मजबूत करती है. रक्षा उद्योग 7% जीडीपी देता है. 50 हजार नौकरियां पैदा करता है. जंग के खर्च (करीब 60 अरब डॉलर) को पूरा करने में मदद मिलती है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय निंदा बढ़ रही है. संयुक्त राष्ट्र ने गाजा में 'नरसंहार' का आरोप लगाया. अमेरिका ने 18 अरब डॉलर की मदद दी, लेकिन यूरोप में बॉयकॉट मूवमेंट तेज हो रहा. नेतन्याहू सरकार ने कहा कि यह आत्मनिर्भरता का सबूत है. वे और निर्यात बढ़ाने की योजना बना रहे हैं, खासकर एशिया और अफ्रीका में.  दुनिया पर असर: शांति या हथियार दौड़? यह खबर दिखाती है कि जंग के बीच भी पैसा कमाया जा सकता है. लेकिन गाजा में 40000 से ज्यादा मौतें हो चुकीं हैं. ईरान तनाव बढ़ रहा है. यूरोप के हथियार खरीदने से मिडिल ईस्ट में संतुलन बिगड़ सकता है. हथियार व्यापार को नियंत्रित करने के लिए वैश्विक नियम सख्त करने चाहिए. इजरायल की यह सफलता तकनीकी ताकत दिखाती है, लेकिन नैतिक सवाल भी खड़े करती है. क्या जंग के बीच हथियार बेचना सही है?

Iran के Oil की Shipping पड़ गई भारी, America ने लगाया Indian Citizen पर लगाया Ban

 वाशिंगटन अमेरिका ने ईरान से तेल और पेट्रोकेमिकल व्यापार में शामिल छह कंपनियों और कई जहाजों पर प्रतिबंध लगाए हैं। इनमें भारत और पाकिस्तान की एक-एक फर्म भी शामिल है। यह कार्रवाई अमेरिका की उस नीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यह जानकारी अमेरिकी विदेश मंत्रालय और ट्रेजरी विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) ने दी। पाकिस्तान के लाहौर में स्थित एलायंस एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड और नई दिल्ली में स्थित भारत की साई साबुरी कंसल्टिंग सर्विसेज पर ईरानी तेल व्यापार में उनकी कथित भूमिका के लिए प्रतिबंध लगाए गए हैं। OFAC के अनुसार, ये कंपनियां ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों को गुप्त रूप से भेजने में शामिल एक नेटवर्क का हिस्सा थीं, जो अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन करता है। प्रतिबंधों का कारण और असर ये प्रतिबंध अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की "अधिकतम दबाव" नीति का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य ईरान के तेल निर्यात को शून्य तक कम करना और उसके परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइल विकास और क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करना है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने कहा, "हम ईरान के राजस्व स्रोतों को निशाना बनाना जारी रखेंगे और उसके ऐसे वित्तीय संसाधनों तक पहुंच को बाधित करेंगे, जो उसकी अस्थिर करने वाली गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं।" पाकिस्तान की एलायंस एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड पहले भी अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के लिए ब्लैकलिस्ट हो चुकी है। इसके अलावा, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ईरान और पनामा आधारित कंपनियों और उनके संचालित जहाजों को भी निशाना बनाया गया है। साई साबुरी कंसल्टिंग सर्विसेज पर दो एलपीजी टैंकरों, बैटेलूर और नील के कॉमर्शियल मैनेजर के रूप में काम करने का आरोप है, जो ईरानी तेल के परिवहन में शामिल थे। एक अरब डॉलर के तेल व्यापार पर लगा दिए नए प्रतिबंध  अमेरिका ने ईरान के करीब एक अरब डॉलर के तेल व्यापार पर एक बार फिर प्रतिबंध लगाए हैं। ईरान के तेल व्यापार को हिजबुल्लाह से मिलने वाली आर्थिक मदद पर प्रतिबंध लगाया है। अमेरिका ने ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों की जानकारी दी। ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने बताया कि ईरान के साथ न्यूक्लियर डील पर बातचीत करने से पहले तेल व्यापार के लिए मिलने वाली आर्थिक मदद को रोकने के लिए प्रतिबंध लगाए गए हैं। अमेरिका जानता है कि ईरान को तेल व्यापार करने के लिए हिजबुल्लाह पैसा देता है, लेकिन हिजबुल्ला ईरान से तेल लेकर उसे ईराक का तेल बताकर आगे सप्लाई करता है। हिजबुल्लाह की वित्तीय संस्था ऐसे कमाती मुनाफा ट्रेजरी सचिव ने बताया कि अमेरिका को हिजबुल्लाह के कंट्रोल वाली वित्तीय संस्था अल-क़र्द अल-हसन के बारे में पता चला है, जिसके अधिकारियों ने लाखों डॉलर के लेन-देन किया है, जिससे हिजबुल्लाह का फायदा हो रहा है। यह संस्था ईराक के बिजनेसमैन सलीम अहमद सईद की कंपनियां के मुनाफा कमा रही है। हिजबुल्लाह की यह संस्था सलीम की कंपनियों को फंडिंग करती है। सलीम की कंपनियां साल 2020 से ईरान से तेल खरीद रही है और उसे ईराक के तेल में मिलाकर अरबों डॉलर का मुनाफा कमा रहा है। ईरान से कच्चे तेल की इस खरीद फरोख्त का सीधा फायदा हिजबुल्लाह को हो रहा है, लेकिन अमेरिका ऐसा होने नहीं देगा। प्रतिबंधों से ईरान को होगा यह नुकसान ट्रेजरी सचिव ने कहा कि अमेरिका ईरान के रेवेन्यू सोर्स को टारगेट करता रहेगा, ताकि ईरान के रेवेन्यू में कटौती हो और देश में क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ावा मिले। ऑयल सपलाई करने वाले कई जहाज भी प्रतिबंधित किए हैं, जो सीक्रेट तरीके से ईरान के स्मगल ऑयल को तस्करों तक तेल पहुंचाते हैं। इसलिए अमेरिका ने 16 वित्तीय संस्थाओं और समुद्री जहाजों पर कार्रवाई की है, जो, अवैध तरीके से ईरान के तेल की तस्करी में शामिल थे। क्योंकि इन संस्थाओं को तेल बेचकर मिलने वाला पैसा आतंकवादी संगठनों हिजबुल्लाह, हमास और हूती विद्रोहियों को समर्थन में देता है। इसलिए तेल व्यापार पर प्रतिबंध लगाकर इस आय को रोकने की कोशिश की गई है। बता दें कि ईरान के तेल व्यापार पर अमेरिका प्रतिबंध लगाता रहा है और समय के साथ प्रतिबंध कड़े भी किए हैं। साल 2018 में ईरान जब परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर हुआ तो अमेरिका ने ईरान के तेल व्यापार पर प्रतिबंध लगाए। इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना, उस पर न्यूक्लियर प्रोग्राम पर बातचीत करने के लिए दबाव डालना था। ईरान का 'शैडो फ्लीट' और तेल व्यापार अमेरिका का दावा है कि ईरान अपने तेल निर्यात को बनाए रखने के लिए "शैडो फ्लीट" या "डार्क फ्लीट" का उपयोग करता है, जो गुप्त रूप से तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों को ट्रांसफर करता है। ये जहाज अक्सर बंदरगाहों की क्षेत्रीय सीमाओं के बाहर जहाज-से-जहाज ट्रांसफर के जरिए तेल की उत्पत्ति को छिपाते हैं। इस तरह का व्यापार मुख्य रूप से चीन जैसे देशों को टारगेट करता है, जो ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है। वैसे ये यह पहली बार नहीं है जब भारतीय कंपनियों पर ईरानी तेल व्यापार के लिए प्रतिबंध लगाए गए हैं। इस साल फरवरी में, चार अन्य भारतीय कंपनियों पर भी इसी तरह के आरोपों में प्रतिबंध लगाए गए थे। इसके अलावा, अक्टूबर 2024 में, भारत की गब्बारो शिप सर्विसेज और दिसंबर 2024 में दो अन्य भारतीय शिपिंग कंपनियों पर भी प्रतिबंध लगाए गए थे। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से लागू हैं, लेकिन 2018 में ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान परमाणु समझौते से हटने के बाद इनमें और तेजी आई। इन प्रतिबंधों का मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को रोकना और क्षेत्रीय आतंकवादी समूहों को उसके समर्थन को कम करना है। हाल के महीनों में, इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान की परमाणु सुविधाओं पर हमलों के बाद ये प्रतिबंध और सख्त हो गए हैं।