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चौंकाने वाले आंकड़े! शादी के बाद पुरुषों की आत्महत्या के मामले ज्यादा, NCRB रिपोर्ट में कई कारण उजागर

नई दिल्ली देश में शादीशुदा पुरुषों की खुदकुशी के आंकड़े तेजी से बढ़ रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक 2015 से अब तक यह आंकड़ा करीब दोगुना हो गया है। 10 साल पहले 2015 में एक साल में 2497 पुरुषों ने शादी से संबंधित मामलों या फिर पत्नी से विवाद को लेकर खुदकुशी की थी। वहीं 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 4536 हो गया। इस रेट में 82 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है। 2022 में पलट गए आंकड़े रिकॉर्ड के मुताबिक पहले पुरुषों की तुलना में शादी संबंधित मामलों को लेकर महिलाएं ज्यादा खुदकुशी करती थीं। वहीं 2022 में यह आंकड़ा ही पलट गया। 2024 में लगातार ऐसा देखा गया कि शादीशुदा जीवन में कलह को लेकर पुरुष महिलाओँ की तुलना में ज्यादा खुदकुशी कर रहे हैं। 2024 की बात करें तो शादी संबंधित मामलों में कुल 8524 लोगों ने खुदकुशी की। इनमें से 4536 यानी करीब 53 फीसदी पुरुष थे औ 3986 यानी करीब 46 फीसदी महिलाएं थीं। 2015 में खुदकुशी करने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में 61 फीसदी थी। हालांकि 2023 की तुलना में 2024 में शादी से जुड़े विवादों को लेकर खुदकुशी का आंकड़ा कम हुआ है। 2024 में खुदकुसी करने वाली महिलओं में से करीब दो तिहाई 30 साल से कम उम्र की थीं। वहीं पुरुषों की बात करें तो आधे से ज्यादा लोग 30 से ज्यादा की उम्र के थे। 40 फीसदी खुदकुशी करने वाले लोग 30 से 45 की उम्र के थे। कम उम्र में महिलाएं ज्यादा करती हैं खुदकुशी रिपोर्ट के मुताबिक 18 से 30 की उम्र में खुदकुशी करने के मामले में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। वहीं 30 से 40 की उम्र में पुरुष ज्यादा खुदकुशी करते हैं। रोज 24 लोग कर लेते हैं खुदकुशी रिपोर्ट के मुताबिक शादी या फिर पति-पत्नी के बीच विवाद को लेकर रोज करीब 23 लोग खुदकुशी करते हैं। इनमें से 12 पुरुष और 11 महिलाएं होती हैं। रोज होने वाली मौतों के औसत पर गौर करें तो रोज 30 से कम की उम्र के 5 पुरुष और 30 से ज्यादा उम्र वाले 6 पुरुष खुदकुशी करते हैं। 2019 से 2024 तक पांच साल में ऐसे खुदकुशी करने वालों की कुल संख्या 24335 थी। क्यों खुदकुशी करते हैं शादीशुदा लोग शादी या पति-पत्नी के बीच विवाद और खुदकुशी की मुख्य वजहों में दहेज, विवाहेतर संबंध, तलाक जैसे मुद्दे शामिल हैं। 2019 से 2024 तक कुल खुदकुशी के आंकड़ों को देखों तो करीब 18359 पुरुषों और 20485 महिलाओं ने खुदकुशी की है। 2024 में खुदकुशी के 8534 मामलों में से 3052 ऐसे थे जिनमें शादी के बाद सामंजस्य नहीं बन पाया। उत्तर प्रदेश में होती हैं सबसे ज्यादा ऐसी खुदकुशी उत्तर प्रदेश में लोग शादी संबंधित मामलों को लेकर सबसे ज्यादा खुदकुशी करतेहैं। 2024 में उत्तर प्रदेश में शादी के बाद सामंजस्य ना बनने की वजह से कुल 764 लोगों ने खुदकुशी की थी और इनमें से 394 पुरुष और 370 महिलाएं थीं। उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा नंबर महाराष्ट्र का आता है जहां 421 लोगों ने खुदकुशी की थी। विवाहेतर संबंधों को लेकर होने वाली खुदकुशी की दर काफी बढ़ गई है। 2014 में ऐसे मामले को लेकर 1624 लोगों ने खुदकुशी की थी।

फिरौती के लिए अपहरण तथा डकैती के मामलों में यूपी देश में सबसे निचले पायदान पर

एनसीआरबी रिपोर्ट: अपराध के मामलों में यूपी की स्थिति काफी बेहतर फिरौती के लिए अपहरण तथा डकैती के मामलों में यूपी देश में सबसे निचले पायदान पर महिलाओं के प्रति अपराधियों को सजा दिलाने में उत्तर प्रदेश देश में नंबर-1 लखनऊ  राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के वर्ष 2024 के आंकड़ों ने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की बेहतर स्थिति को दर्शाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2024 में देश में कुल 35,44,608 आपराधिक मामले दर्ज किए गए। राष्ट्रीय क्राइम रेट 252.3 के सापेक्ष उत्तर प्रदेश का क्राइम रेट 180.2 रहा। कुल अपराधों में उत्तर प्रदेश का देश में 18वां स्थान है, जबकि देश की 17 फीसदी जनसंख्या यूपी में निवास करती है। गौरतलब है कि किसी भी राज्य में अपराध की स्थिति को समझने के लिए क्राइम रेट सबसे बेहतर एवं विश्वसनीय माध्यम है। प्रति एक लाख जनसंख्या के सापेक्ष अपराधों की संख्या को अपराध दर (Crime Rate) के रूप में परिभाषित किया जाता है। यह एक स्थापित वास्तविक संकेतक है, जो राज्य के आकार और जनसंख्या में वृद्धि के प्रभाव को संतुलित करता है। क्राइम रेट ही अपराधों की सही स्थिति समझने के लिए प्रामाणिक संकेतक है। एनसीआरबी रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 28 राज्यों एवं 8 केन्द्रशासित प्रदेशों में उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की मजबूत स्थिति इस प्रकार समझी जा सकती है। हत्या के मामलों में देश में यूपी का स्थान 29वां है, जबकि हत्या के प्रयास के मामलों में यह 26वें स्थान पर है। शीलभंग के मामलों में प्रदेश 20वें स्थान पर है, जबकि फिरौती हेतु अपहरण के मामलों में राज्य पूरे देश में सबसे नीचे 36वें नंबर पर है। दुष्कर्म के मामलों में यूपी देश में 24वें स्थान पर है, जो राज्य में बेहतर कानून-व्यस्था को इंगित करता है। इसी प्रकार बलवे के मामलों में उत्तर प्रदेश 19वें स्थान पर है। इसी प्रकार डकैती के मामलों में उत्तर प्रदेश देश में सबसे निचले पायदान यानी 36वें स्थान पर है। लूट के मामलों में प्रदेश 28वें स्थान पर और पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में यूपी का स्थान 23वां है। महिलाओं के प्रति अपराधों में यूपी 17वें नंबर पर है, जबकि बच्चों के विरुद्द अपराध के मामले में प्रदेश का स्थान 27वां है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि देश के अन्य राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की तुलना में उत्तर प्रदेश की स्थिति अपराध नियंत्रण के मामले में काफी बेहतर है। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि योगी सरकार लगातार अपराध व अपराधियों के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति पर चल रही है, जिसके ठोस परिणाम भी सामने आ रहे हैं। महिला न्याय (Conviction Rate): यूपी देश का शीर्ष राज्य अपराधियों को सजा दिलाने (दोषसिद्धि) में उत्तर प्रदेश पूरे देश के लिए एक मानक स्थापित कर चुका है। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में अदालतों द्वारा सजा सुनाने की दर इस प्रकार है- उत्तर प्रदेश: दोषसिद्धि दर 76.6% (शीर्ष) पश्चिम बंगाल: यहां दर मात्र 1.6% है। कर्नाटक: यहां मात्र 4.8% मामलों में सजा होती है। तेलंगाना: यहां दर 14.8% है। केरल: यहां दर मात्र 17.0% है। पंजाब: यहां दर 19.0% है। तमिलनाडु: यहां दर 23.4% है। उपरोक्त आंकड़े बताते हैं कि यूपी में महिला अपराध करने वाले अपराधी के बचने की संभावना न्यूनतम है, जबकि अन्य राज्यों में अपराधियों के छूटने की दर 75% से 98% तक है। इसी प्रकार राज्य में मर्यादा भंग के अपराधों की दर मात्र 18.6 है, जबकि तेलंगाना में 52.8, पश्चिम बंगाल में 39.5, केरल में यह 23.9 है। गंभीर अपराधों पर नियंत्रण यूपी में हत्या के मामलों की दर प्रति लाख जनसंख्या मात्र 1.3 है, जो तेलंगाना (2.7),  झारखण्ड (3.7) और पंजाब (2.5) की तुलना में काफी कम है। यूपी के महानगर जांच पूरी करने में देश के अन्य बड़े मेट्रो शहरों से कहीं अधिक तेज हैं। कानपुर में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में चार्जशीट दर 84.4%, लखनऊ में 83.7% है। जेलों में क्षमता और अनुशासन के मामले में भी यूपी का प्रशासन अन्य राज्यों से बेहतर है। यूपी में महिला जेलों में अधिभोग दर (Occupancy Rate) मात्र 36.7% है, जो महिला कैदियों को सुव्यवस्थित वातावरण प्रदान करता है। यूपी की केंद्रीय जेलों की अधिभोग दर 74.3% है, जो पंजाब (118.4%) और केरल (149.9%) की तुलना में बहुत बेहतर है। एनसीआरबी रिपोर्ट का सांख्यिकीय डेटा स्पष्ट करता है कि उत्तर प्रदेश न केवल महिलाओं के प्रति अपराध करने वालों को दंडित करने (76.6% दोषसिद्धि) में देश में अग्रणी है, बल्कि गंभीर अपराधों (हत्या, धोखाधड़ी) और महिला सुरक्षा के मानकों पर दक्षिण भारतीय राज्यों और पंजाब/पश्चिम बंगाल की तुलना में कहीं अधिक बेहतर स्थिति में है।

डीजीपी ने एनसीआरबी आंकड़ों को बताया यूपी की मजबूत कानून-व्यवस्था का प्रमाण

एनसीआरबी के आंकड़े यूपी की मजबूत कानून-व्यवस्था की गवाही: डीजीपी राष्ट्रीय क्राइम रेट से काफी कम रहा यूपी का क्राइम रेट अपराध के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति धरातल पर उतरी लखनऊ  पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण ने कहा है कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की वर्ष 2024 रिपोर्ट निर्विवाद रूप से स्थापित करती है कि क्राइम रेट ही विभिन्न राज्यों के बीच अपराध की तुलना का एकमात्र वैज्ञानिक और सांख्यिकीय दृष्टि से उचित आधार है। राष्ट्रीय क्राइम रेट 252.3 के मुकाबले उत्तर प्रदेश का क्राइम रेट मात्र 180.2 है। यह सुधार सतत और सुविचारित प्रयासों का प्रतिफल है। यह साबित करता है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व में अपराध व अपराधियों के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति कागज़ों से निकलकर धरातल पर उतरी है।  कठोर कार्रवाई से स्थापित किया कानून-व्यवस्था का राज पुलिस महानिदेशक ने कहा कि गत 9 वर्षों में आधुनिक पुलिस स्टेशन, सतर्क एंटी-रोमियो स्क्वॉड, हर थाने पर समर्पित महिला हेल्प डेस्क, कमज़ोर वर्गों को त्वरित न्याय दिलाने वाले फास्ट-ट्रैक कोर्ट और संगठित अपराधों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई ने उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था का राज स्थापित किया है। एनसीआरबी के आंकड़े इसी की गवाही देते हैं। छोटी से छोटी शिकायत का संज्ञान लेती है यूपी पुलिस पुलिस महानिदेशक ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कोई भी व्यक्ति बिना किसी भय-संकोच के पुलिस थाने जाकर शिकायत दर्ज करा सकता है। उत्तर प्रदेश पुलिस इसके प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। हम डिजिटल माध्यमों पर भी आई छोटी से छोटी शिकायत का संज्ञान लेते हैं और जहां भी उचित हो, उसे एफआईआर में परिवर्तित करते हैं। अधिक पंजीकरण एक अधिक संवेदनशील, सुलभ और पारदर्शी पुलिस बल की पहचान है। यही वह संस्कृति है, जिसका निर्माण उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विज़न के तहत कर रही है।

NCRB रिपोर्ट: दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराध लगातार 4 साल सबसे अधिक

नई दिल्ली भारत की राजधानी दिल्ली एक बार फिर सबसे असुरक्षित महानगरों की सूची में पहले नंबर पर आ गई है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ‘क्राइम इन इंडिया 2024’ रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली लगातार चौथे वर्ष देश के सबसे असुरक्षित महानगर के रूप में उभरी है. रिपोर्ट बताती है कि अन्य मेट्रो शहरों के मुकाबले दिल्ली में सबसे ज्यादा महिलाओं के खिलाफ अपराध किए गए हैं।  एनसीआरबी के आंकड़ों में भले ही दिल्ली में कुल आईपीसी और बीएनएस अपराधों में 15.1% की उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई और 2023 के 3.2 लाख से ज्यादा मामलों की तुलना में 2024 में यह संख्या लगभग 2.8 लाख रह गई लेकिन महिलाओं के खिलाफ अपराध में यह अभी भी बाकी मेट्रो शहरों से आगे निकल गई है. राजधानी में महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के खिलाफ अपराधों की गंभीरता और उनकी तीव्रता चिंता का विषय बनी हुई है।  महिलाओं के खिलाफ अपराध दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या 7,827 मामलों में पहुंच गई है. सबसे ज्यादा परेशान करने वाला आंकड़ा बलात्कार का है, जब दिल्ली में करीब 1,058 मामले दर्ज हुए हैं. यह आंकड़ा अन्य महानगरों जयपुर (497) और मुंबई (411) की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा है. 6 मामलों के साथ गैंग रेप या रेप के बाद हत्या जैसे जघन्य अपराधों में भी दिल्ली टॉप पर है. POCSO मामलों में भी दिल्ली (1,553) ने मुंबई (1,416) को पीछे छोड़ दिया है. ये आंकड़े दर्शाते हैं कि राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।  रेप के मामले कम हुए लेकिन बाकी शहरों से ज्यादा 2024 में दिल्ली में 1,058 बलात्कार के मामले दर्ज हुए. यह संख्या जयपुर (497) और मुंबई (411) से दोगुनी से भी ज्यादा है. हालांकि पिछले वर्षों की तुलना में मामलों में मामूली कमी आई है. 2023 में 1,094 और 2022 में 1,212 मामले दर्ज हुए थे. लेकिन यह कमी इसलिए मामूली है क्योंकि दिल्ली इन सभी से आगे है. NCRB के अनुसार दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ कुल 13,396 मामले दर्ज हुए, जो अन्य महानगरों से कहीं ज्यादा हैं।  अपहरण और घरेलू हिंसा की स्थिति भी गंभीर दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में अपहरण और अपहरण के 3,974 मामले दर्ज हुए. इनमें पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के 4,647 मामले, छेड़छाड़ के 755 मामले, यौन उत्पीड़न के 316 मामले और स्टॉकिंग के 178 मामले सामने आए. सात मामले बलात्कार के साथ हत्या के भी दर्ज किए गए. दिल्ली पुलिस के पास 31,000 से अधिक मामले जांच के अधीन हैं, जो देश के 19 बड़े शहरों के कुल मामलों का लगभग एक-तिहाई है।  बच्चों पर बढ़ता खतरा दिल्ली बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से भी बेहद चिंताजनक स्थिति में है. 2024 में बच्चों के खिलाफ 7,662 अपराध दर्ज हुए हैं. यह आंकड़ा प्रति एक लाख बच्चों पर 138.4 अपराध दर राष्ट्रीय औसत (42.3) से बहुत अधिक है. चार्जशीट दर मात्र 31.7% रही, जबकि औसत 61.4% है।  यूपी में सबसे ज्यादा महिला अपराध, शहर में दिल्ली सबसे असुरक्षित महिलाओं के मामले में दिल्ली एक बार फिर सबसे असुरक्षित शहर बनकर उभरा है. रिपोर्ट के मुताबिक देश की 19 मेट्रोपॉलिटन सिटीज में दिल्ली में सबसे ज्यादा 2024 में 13396 अपराध दर्ज किए गए हैं. इन 19 बडे शहरों में मध्य प्रदेश का इंदौर 8वें स्थान पर है. हालांकि 2023 के मुकाबले 2024 में महिला अपराधों में कमी आई है. 2023 में इंदौर में 1919 अपराध घटित हुए थे, जबकि 2024 में 1884 मामले दर्ज किए गए।  बच्चों से जुड़े अपराध में एमपी तीसरे नंबर पर बच्चों से जुड़े अपराध देश में सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में होते हैं. रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में 24 हजार 171 मामले दर्ज किए गए. दूसरे नंबर पर 22 हजार 222 अपराधों के साथ राजस्थान और मध्य प्रदेश तीसरे नंबर पर है. 2024 में मध्य प्रदेश में 21 हजार 908 प्रकरण पंजीबद्ध किए गए. इन राज्यों में जितने बच्चों से जुड़े अपराध हैं, जांच की गति भी उतनी ही धीमी है. मध्य प्रदेश में चार्जशीट प्रस्तुत करने की दर ही 55 फीसदी है. जबकि महाराष्ट्र में 52 फीसदी और राजस्थान में 49.2 फीसदी मामलों की ही चार्जशीट कोर्ट में पेश हो पाती है।  एससी-एसटी अपराध में कौन राज्य टॉप पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़े अपराधों के मामले में मध्य प्रदेश शीर्ष राज्यों में है. अनुसूचित जाति वर्ग के खिलाफ होने अपराध सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए. यूपी में 2024 में 14 हजार 642 मामले दर्ज किए गए. दूसरे नंबर पर मध्य प्रदेश है. एमपी में 7 हजार 765 और बिहार में 7 हजार 565 मामले दर्ज किए गए. जबकि राजस्थान में 7008 मामले दर्ज हुआ हैं।  वहीं अनुसूचित जनजाति यानि ST के सबसे ज्यादा मामले मध्य प्रदेश में दर्ज किए गए. एमपी में 3165, इसके बाद राजस्थान में 2 हजार 282 और 830 अपराधों के साथ महाराष्ट्र तीसरे स्थान पर है।  क्या सुधर रही है स्थिति? टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक पुलिस अधिकारियों का कहना है कि दिल्ली में अपराधों की उच्च संख्या रिपोर्टिंग और जागरूकता बढ़ने का परिणाम है. कुल अपराधों में थोड़ी कमी आई है, लेकिन महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. दिल्ली में अपराध दर 176.8 प्रति लाख है, जो अन्य महानगरों से काफी ऊंची है।  ऐसे में NCRB 2024 के आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि दिल्ली में कानून व्यवस्था और महिला-बाल सुरक्षा को मजबूत करने की तत्काल जरूरत है. मात्र आंकड़ों में कमी से सुरक्षा की भावना नहीं बढ़ती. आम नागरिकों, खासकर महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण बनाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। 

2023 में महिला अपराधों के मामले बढ़े, पिछले साल की तुलना में 0.7% अधिक रिपोर्ट

नई दिल्ली  सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की तमाम कोशिशों के बावजूद साइबर अपराधियों पर लगाम नहीं लग पा रही है। साइबर अपराधों में 2022 की तुलना में 2023 में 31.2 प्रतिशत की जोरदार बढ़ोतरी हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकाॅर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2023 की रिपोर्ट में यह तथ्य उजागर हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध अपराधों में 28.8 प्रतिशत की जबरदस्त वृद्धि हुई है। अनुसूचित जातियों, महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध भी अपराध बढ़े हैं। जबकि हत्या के मामलों और वरिष्ठ नागरिकों के विरुद्ध अपराधों में मामूली कमी आई है।  2023 में ये बढ़कर 86,420 हो गए एनसीआरबी के अनुसार, 2022 में देशभर में साइबर अपराध से जुड़े 65,893 मामले दर्ज किए गए थे। 2023 में ये बढ़कर 86,420 हो गए। इनमें लगभग 70 प्रतिशत (59,526) मामले धोखाधड़ी के थे। इससे देश में साइबर अपराध के बढ़ते दायरे और अपराधियों के बढ़ते हौसले का अंदाजा लगाया जा सकता है। देश में बच्चियों से दुष्कर्म के कुल 38968 मामले दर्ज किए गए. इसमें मध्य प्रदेश में देश में महाराष्ट्र के बाद सबसे ज्यादा मामले रिकॉर्ड किए गए. मध्य प्रदेश में बच्चियों से रेप की 3876 घटनाएं हुई हैं, यानी हर दिन 10 नाबालिग बच्चियां रेप की शिकार हो रही हैं. महाराष्ट्र में नाबालिग बच्चियों से 4666 मामले दर्ज किए गए. पति, रिश्तेदार ही सबसे ज्यादा अपराध देश में महिला अपराधों के मामलों में 0.7 फीसदी बढ़ोत्तरी हुई है. साल 2023 में देश में 4 लाख 48 हजार 211मामले दर्ज किए गए, जबकि 2022 में 4 लाख 45 हजार 256 मामले दर्ज किए गए थे. देश में सबसे ज्यादा महिला अपराध उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए. महिला अपराधों के टॉप फाइव स्टेट में मध्य प्रदेश का स्थान 5 वां है. रिपोर्ट के मुताबिक, देश में महिलाओं को सबसे ज्यादा क्रूरता के जख्म अपने पति, रिश्तेदारों के द्वारा ही मिल रहे हैं. देश में कुल महिला अपराधों में 14 फीसदी मामले दुष्कर्म और 19.8 फीसदी मामले अपहरण के हैं. उत्तर प्रदेश में – 66381 महिला अपराध दर्ज हुए महाराष्ट्र में – 47101 महिला अपराध दर्ज हुए राजस्थान में – 45450 महिला अपराध दर्ज हुए पश्चिम बंगाल – 34691 मामले दर्ज हुए मध्य प्रदेश – 32342 महिला अपराध दर्ज हुए मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा महिला अपराध से जुड़े मामले भोपाल और इंदौर में दर्ज किए गए, जबकि दोनों शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू है. महिला अपराध के मामले में उज्जैन 5 वें स्थान पर है. कांग्रेस ने साधा भाजपा पर निशाना एनसीआरबी की रिपोर्ट पर कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर निशाना साधा है. पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने आरोप लगाते हुए कहा, ''भाजपा की सरकार आखिर कब तक महिलाओं के साथ मजाक करती रहेगी. एक तरफ लाड़ली बहना योजना चला रहे हैं, दूसरी तरफ मध्य प्रदेश में महिलाएं और बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं. क्या है कानून व्यवस्था क्या कर रही है सरकार. बच्चियों को बचाइये, यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है.'' शीलभंग करने के इरादे से हमले 2023 में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के 4,48,211 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2022 में 4,45,256 और 2021 में 4,28,278 मामले दर्ज हुए थे। 2023 में सबसे अधिक अपराध पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता (1.33 लाख मामले, 29.8 प्रतिशत) के थे। इसके बाद महिलाओं के अपहरण (88,605 मामले, 19.8 प्रतिशत) और शीलभंग करने के इरादे से हमले (83,891 मामले, 18.7 प्रतिशत) के थे। हालांकि, महिलाओं के विरुद्ध अपराध की दर लगभग अपरिवर्तित (66.2 प्रति लाख) रही। आत्महत्या के मामले 0.3 प्रतिशत बढ़े  बच्चों के विरुद्ध बढ़ते अपराध भी चिंताजनक हैं। 2022 में बच्चों के विरुद्ध अपराध की दर 36.6 (प्रति एक लाख बच्चे में) थी, जो 2023 में बढ़कर 39.9 हो गई। बच्चों के विरुद्ध सबसे अधिक मामले अपहरण (45 प्रतिशत) और यौन अपराधों (38.2 प्रतिशत) से जुड़े थे।  आत्महत्या के मामले 0.3 प्रतिशत बढ़े हैं। ये 1,71,418 दर्ज किए गए। इनमें महाराष्ट्र में सर्वाधिक 22,687 और तमिलनाडु में 19,483 मामले दर्ज हुए। किसानों की आत्महत्या के 10,700 मामले दर्ज हुए। महाराष्ट्र में सर्वाधिक 38 प्रतिशत और कर्नाटक में 22.5 प्रतिशत मामले दर्ज हुए।  अपहरण के मामलों में 5.6 प्रतिशत की बढ़त बुजुर्गों के विरुद्ध अपराधों के कुल 27,886 मामले दर्ज हुए। अपहरण के मामलों में 5.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। 2022 के 1,07,588 के मुकाबले 2023 में ये 1.16 लाख दर्ज किए गए। हत्या के मामलों में 2.8 प्रतिशत की कमी आई है। ये 2022 के 28,522 की तुलना में 2023 में 27,721 दर्ज हुए। किशोरों के विरुद्ध अपराधों में 2.7 प्रतिशत की वृद्धि किशोरों के विरुद्ध अपराधों में 2.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जिनकी संख्या 2023 में 31,365 रही। दिल्ली में इसकी दर प्रति एक लाख बच्चों पर 41 थी, जो देश में सबसे अधिक है। किशोर अपराध की दर भी बढ़कर 6.9 से बढ़कर 7.1 हो गई। सभी महानगरों में किशोर अपराधों की सबसे अधिक संख्या भी दिल्ली में दर्ज की गई, जहां कुल 2,278 घटनाएं हुईं। विभिन्न वर्गों के विरुद्ध अपराध वर्ग वृद्धि (%में) कमी  बुजुर्ग 2.3 0 बच्चे 9.2 0 महिला 0.7 0 किशोर 2.7 0 एसटी 28.8 0 एससी 0.4 0 (2022 की तुलना में 2023 में) बच्चियां देश में बड़ी संख्या में लैंगिक अपराध का शिकार हो रही हैं. एनसीआरबी (National Crime Records Bureau) के ताजा आंकड़े चिंता में डालने वाले हैं. देश में बच्चों से जुड़े अपराधों में 9.2 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. देश में बच्चों से जुड़े सबसे ज्यादा अपराध मध्य प्रदेश में हुए हैं. जबकि पिछले साल मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर था. मध्य प्रदेश में आंकड़ों के मुताबिक, हर दिन 10 नाबालिग लड़कियों से यौन अपराध हो रहे हैं. वहीं महिला अपराध के मामले में मध्य प्रदेश देश में पांचवे स्थान पर है. बच्चों से बढ़ रहे अपराध देश में बच्चों से जुड़े आपराध के आंकड़े चिंताजनक है. आंकड़ों के मुताबिक देश में मध्य प्रदेश बच्चों के मामले में सबसे ज्यादा असुरक्षित प्रदेश बन गया है. मध्य प्रदेश में 2023 में 22 हजार 393 मामले दर्ज किए गए. साल 2022 में मध्य प्रदेश में 20 हजार 415 मामले और साल 2021 में 19173 मामले दर्ज किए गए थे. महाराष्ट्र बाल अपराधों के मामले में दूसरे नंबर पर है. महाराष्ट्र में 22 हजार 390 मामले दर्ज किए गए. उत्तर प्रदेश … Read more