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सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी की दलीलें बेअसर, SIR पर चीफ जस्टिस की दो-टूक राज्यों को चेतावनी

नई दिल्ली देश के कई राज्यों में चल रहे SIR के खिलाफ देश की शीर्ष अदालत में वकील बनकर पहुंचीं ममता बनर्जी को करारा झटका लगा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने साफ कर दिया है कि SIR की प्रक्रिया में किसी तरह की रोक लगाने की मंजूरी नहीं दी जा सकती। इसमें कोई बाधा भी पैदा करने की परमिशन अदालत नहीं देगी। चीफ जस्टिस ने कहा कि सभी राज्यों को इस बात को समझ लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस संबंध में जो कुछ भी स्पष्टता चाहिए, वह सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने नीट पीजी Cut Off को लेकर जताई चिंता, कम Cut Off पर किया सवाल

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने नीट पीजी 2025 के क्वालिफाइंग कटऑफ को शून्य और नेगेटिव वैल्यू किए जाने पर चिंता जताई है. SC का कहना है कि माइनस 40 क्राइटेरिया तय करना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है. सीटें खाली रहने के कारण इस तरह का क्राइटेरिया सेट करना सही नहीं है. जजों ने जताई चिंता इस मामले की सुनवाई जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अराधे की बेंच कर रही थी. जजों ने कहा कि खाली सीटें बेकार नहीं जानी चाहिए, लेकिन सिर्फ कैंडिडेट्स की कमी के कारण कटऑफ इतना घटाना सही नहीं है. इससे एलिजिबिलिटी का जो क्राइटेरिया सेट किया जा रहा है, उसके कमजोर होने का डर है. याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट सत्याम सिंह राजपूत थे. NBEMS ने घटाया था परसेंटाइल दरअसल, नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन्स इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने कुछ समय पहले NEET PG 2025 एडमिशन के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल में बदलाव किया है. सीट खाली रह जाने का हवाला देते हुए NBEMS ने परसेंटाइल घटाया. NBEMS ने बताया था कि राउंड 2 काउंसलिंग पूरी हो गई है और उसके बाद भी सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों की 18,000 से ज्यादा PG सीटें खाली रह गई थीं. ऐसे में परसेंटाइल घटाया गया. EWS वर्ग के उम्मीदवारों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल 50 से घटाकर 7 परसेंटाइल कर दिया गया था. वहीं जनरल PwBD कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए 45 की जगह केवल 5 परसेंटाइल का मानक तय किया गया था. इसके अलावा SC, ST और OBC वर्ग के उम्मीदवारों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल 40 से घटाकर शून्य (0) परसेंटाइल कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में क्या-क्या हुआ? केंद्र सरकार की ओर से सीटें खाली रह जाने का तर्क दिया गया. इस पर SC ने कहा कि आखिरी बैलेंस बनाने के लिए मानकों को कितनी हद तक गिराया जा सकता है. जजों ने केंद्र के उस तर्क पर भी विचार किया जिसमें कहा गया था कि जिन उम्मीदवारों को ढील के तहत दाखिला दिया जा रहा है, उनके पास पहले से MBBS की डिग्री है. हालांकि याचिकाकर्ताओं ने उनकी योग्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि सिर्फ MBBS होना पर्याप्त नहीं है. अगर वे NEET PG परीक्षा पास नहीं कर पाए हैं. कितनी हैं नीट पीजी की सीटें? इससे पहले देशभर के अलग-अलग हिस्सों में नीट परसेंटाइल घटाए जाने पर बवाल मचा था. भारत में हर साल करीब 2.4 लाख स्टूडेंट्स नीट पीजी परीक्षा देते हैं. इनमें से करीब 1 लाख स्टूडेंट्स पास होते हैं. फिलहाल देश में लगभग 80,000 नीट पीजी सीट्स हैं. समय-समय पर सीट में बदलाव होता रहता है. साल 2021 से 2025 सीटों की संख्या बढ़ाई गई है.

सुप्रीम कोर्ट में SIR केस की चर्चा, ममता बनर्जी ने रखीं दलीलें, CJI ने उठाए अहम मुद्दे

नई दिल्ली पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को लेकर जारी विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. सीएम ममता बनर्जी ने खुद अदालत में अपनी बात रखने की कोशिश की. हालांकि, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने बीच में ही उन्हें टोकते हुए कहा कि उनकी ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और श्याम दीवान पहले ही सभी दलीलें रख चुके हैं. बता दें कि इस मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी सोमवार को होगी. चुनाव आयोग पर ममता के आरोप बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी ने कहा कि वह न्याय के लिए अदालत आई हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि उन्होंने चुनाव आयोग को तमाम फैक्ट्स बताए थे, लेकिन उन्हें नहीं सुना गया. इस पर CJI ने साफ किया कि आपकी नई याचिका में कुछ नए मुद्दे जरूर हैं, लेकिन जो बातें आप कह रही हैं, वे आपके वकील पहले ही अदालत के सामने रख चुके हैं. वोटर्स के नाम हटाए जा रहे हैंः ममता बनर्जी सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने रवींद्रनाथ टैगोर की स्पेलिंग में बदलावों का जिक्र करते हुए लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की बात कही. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव से ठीक पहले पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है और राज्य में बड़े पैमाने पर वोटर्स के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं. वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत को बताया कि फाइनल वोटर लिस्ट के लिए अब सिर्फ 11 दिन बचे हैं और यह प्रक्रिया 14 फरवरी तक पूरी होनी है, जबकि इस मामले की सुनवाई के लिए केवल चार दिन का समय बचा है. उन्होंने कहा कि राज्य में करीब 32 लाख ‘अनमैप्ड वोटर्स’ हैं और लगभग 3.26 करोड़ नामों में ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ पाई गई है, जो कुल मतदाताओं का करीब 20 प्रतिशत है. श्याम दीवान ने मांग की कि चुनाव आयोग को ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लिस्ट’ में शामिल हर मतदाता का नाम सार्वजनिक करना चाहिए. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों के बावजूद कई मामलों में केवल नाम, उम्र और लिंग दर्ज हैं, लेकिन यह नहीं बताया गया कि मतदाता का नाम सूची से क्यों हटाया गया. लोगों को यह जानने का अधिकार है कि वे वोटर लिस्ट में क्यों नहीं हैं. इस पर CJI ने कहा कि उन्हें बताया गया था कि यह प्रक्रिया सिर्फ एक सामान्य सूचना नहीं है, बल्कि संबंधित लोगों को व्यक्तिगत नोटिस भी दिए जा रहे हैं. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यह समय कृषि और त्योहारों का है, ऐसे में कई लोग अपने गृह जनपद से बाहर हैं. CJI ने सवाल किया कि जब बंगाल में बीएलओ पर दबाव और मौतों की बातें सामने आ रही हैं, तो असम जैसे राज्यों में ऐसा क्यों नहीं हो रहा. 'बंगाल को टारगेट किया जा रहा है' ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि अन्य राज्यों में चुनाव आयोग सभी दस्तावेज स्वीकार कर रहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल के मामले में उन्हें खारिज किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि यह सब ऐसे समय हो रहा है, जब त्योहार और फसल कटाई का मौसम है और बड़ी संख्या में लोग राज्य से बाहर हैं. इस दौरान ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को ‘व्हाट्सऐप कमीशन’ तक कह दिया. उन्होंने कहा, “इलेक्शन कमीशन… सॉरी, व्हाट्सऐप कमीशन यह सब कर रहा है. लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं. बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है.” सुनवाई के अंत में CJI ने कहा कि अदालत समय बढ़ाने का निर्देश दे सकती है. उन्होंने ममता बनर्जी से कहा कि अदालत को उनके वकील श्याम दीवान की काबिलियत पर पूरा भरोसा है और उन्होंने अपने लिए श्रेष्ठ वकील चुने हैं. अदालत ने मामले की अगली सुनवाई सोमवार को तय की है. CJI ने कहा कि चुनाव आयोग आज उठाए गए मुद्दों पर निर्देश लेकर अदालत के समक्ष आए. वहीं, पश्चिम बंगाल सरकार को उपलब्ध ग्रुप-बी अधिकारियों की सूची पेश करने को कहा गया है. सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग की ओर से अधिकारियों के प्रति ‘होस्टिलिटी’ को लेकर लिखित आशंका जताई गई है. अदालत में क्या-क्या हुआ, यहां देखें ECI के वकील: 'मेरी इंस्ट्रक्शन यह थी कि सिर्फ स्पेलिंग की मामूली गलती पर नोटिस जारी नहीं किया जाएगा.' CJI: 'राज्य का एग्जीक्यूटिव हेड भी आज यहां मौजूद है. क्या यह संभव नहीं कि राज्य बंगला भाषा के विशेषज्ञ उपलब्ध कराए, जो समिति के साथ बैठकर स्थानीय उच्चारण और स्पेलिंग पर सलाह दें?' ममता बनर्जी: 'मैं इस पर सफाई दे सकती हूं, क्योंकि मैं उसी राज्य से हूं.' CJI: 'इसमें कोई संदेह नहीं कि आप वहीं से हैं.' ममता बनर्जी: 'बेंच का धन्यवाद कि मुझे बोलने की अनुमति दी गई. 'समस्या यह है कि वकील तब लड़ते हैं, जब सब कुछ खत्म हो चुका होता है. जब हमें न्याय नहीं मिलता, तब न्याय दरवाजों के पीछे रोता रहता है. मैंने चुनाव आयोग को छह पत्र लिखे, लेकिन एक का भी जवाब नहीं आया.'  'मैं कोई खास व्यक्ति नहीं हूं. मैं एक बंधुआ मजदूर जैसी हूं. मैं अपनी पार्टी के लिए नहीं लड़ रही हूं, मैं एक साधारण नागरिक हूं.' CJI: 'पश्चिम बंगाल सरकार ने भी याचिका दायर की है. सुप्रीम कोर्ट के सर्वश्रेष्ठ वकील राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं—कपिल सिब्बल, गोपाल और श्याम दीवान. हमारी मदद के लिए सर्वश्रेष्ठ लीगल टीम मौजूद है. 19 जनवरी को जब मामला आया था, तब श्री सिब्बल ने पश्चिम बंगाल सरकार और नागरिकों की समस्याएं बहुत स्पष्टता से रखी थीं. सभी मुद्दे चिन्हित हो चुके हैं. हर समस्या का समाधान होता है. हमें यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी निर्दोष नागरिक बाहर न रह जाए. 'सिर्फ तीन आधार ऐसे हैं, जिन पर किसी को आपत्ति नहीं होगी— पहला, दोषसिद्ध व्यक्ति. दूसरा, जो राज्य या देश से बाहर जा चुके हैं. तीसरा, गैर-नागरिक.'  लेकिन बंगाल में नामों का उच्चारण अलग तरीके से होता है. आजकल AI-आधारित रिकॉर्डिंग हो रही है. ऐसी तकनीकी या भाषाई गलती के कारण किसी असली नागरिक को बाहर नहीं किया जाना चाहिए. ECI: 'हमें अभी तक याचिका की कॉपी नहीं मिली है. हमें यह भी नहीं पता कि असली समस्या क्या है. हमें जवाब देने के लिए एक हफ्ते का समय दिया जाए.' CJI: 'आपको कॉपी इसलिए नहीं दी गई क्योंकि यह मामला पहली … Read more

यूजर प्राइवेसी पर SC का आदेश, व्हॉट्सऐप को मेटा से डेटा साझा न करने की हिदायत

 नई दिल्ली व्हाट्सएप और मेटा की प्राइवेसी पॉलिसी मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है. कोर्ट ने साफ किया कि डेटा शेयरिंग की ये प्रक्रिया भारतीय यूजर्स के निजता के अधिकार के खिलाफ है.  हालांकि, सीसीआई के वकील ने एनसीएलएटी (NCLAT) के कुछ निष्कर्षों पर आपत्ति जताई है. सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने व्हाट्सएप को निर्देश देते हुए कहा, 'हम आपको मेटा के साथ एक भी जानकारी साझा करने की अनुमति नहीं देंगे. हम आपको इस देश की नीतियों की गोपनीयता के साथ खेलने की इजाजत कतई नहीं देंगे.'  इस पूरे प्रकरण में कोर्ट के सामने तीन मुख्य अपीलें थीं, जो मेटा, व्हाट्सएप और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की ओर से दायर की गई थीं. सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने इन अपीलों का पक्ष रखा. सुनवाई के दौरान मेटा के वकील ने दलील दी कि कोर्ट के आदेश के मुताबिक 213 करोड़ रुपये के जुर्माने का भुगतान पहले ही किया जा चुका है. मेटा की नई प्राइवेसी पॉलिसी पर सवाल सुप्रीम कोर्ट ने व्हाट्सएप और मेटा की नई प्राइवेसी पॉलिसी पर सुनवाई करते हुए बेहद कड़े सवाल उठाए और कंपनी को डेटा साझा करने से साफ मना कर दिया. CJI ने व्हाट्सएप की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि आपने इसे इतनी चालाकी से तैयार किया है कि इसे समझना नामुमकिन है. उन्होंने पूछा कि क्या देश का आम आदमी, जैसे घर में काम करने वाले नौकर, निर्माण मजदूर या छोटे विक्रेता, इस जटिल नीति को समझ पाएंगे? कोर्ट ने साफ कहा कि उपभोक्ताओं को इस ऐप की 'लत' लगा दी गई है और अब उनकी मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है. यूजर्स के डेटा का गलत इस्तेमाल हो रहा- SC सीजेआई ने कहा कि लोगों के डेटा का इस्तेमाल व्यावसायिक लाभ के लिए किया जा रहा है और अब तक लाखों यूजर्स के डेटा का गलत इस्तेमाल हो चुका है. इस दौरान मेटा के वकील अखिल सिबल ने दलील दी कि व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए सीमित डेटा शेयरिंग की अनुमति है. इस पर सीजेआई ने कहा, 'अगर आपको डेटा का कोई हिस्सा बेचने लायक लगेगा, तो आप उसे बेच देंगे! सिर्फ इसलिए कि भारतीय उपभोक्ता मूक हैं और उनके पास आवाज नहीं है, आप उन्हें शिकार नहीं बना सकते.' सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कहा कि व्हाट्सएप यूजर्स को सिर्फ दो ही विकल्प दे रहा है- 'या तो पॉलिसी स्वीकार करो या ऐप का इस्तेमाल बंद कर दो.' इस पर अदालत ने कहा कि बिहार के दूरदराज इलाकों या तमिलनाडु के गांवों में रहने वाले लोग, जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती, वे इस नीति के खतरनाक परिणामों को कभी नहीं समझ पाएंगे. डेटा शेयर करने की इजाजत से SC का साफ इनकार सीजेआई ने साफ शब्दों में कहा, 'जब तक आप हमें यह विश्वास नहीं दिला देते कि आपको ऐसा करने का कोई दैवीय अधिकार हासिल है, तब तक हम आपको डेटा शेयर करने की अनुमति नहीं देंगे.'  3 जजों की बेंच के सामने होगी अपीलों पर सुनवाई व्हाट्सएप के वकील ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उनकी नीतियां दूसरे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्राधिकारों के स्टैंडर्ड्स के मुताबिक ही हैं. लेकिन इन दलीलों को सुनने को बाद सीजेआई ने बताया कि एनसीएलएटी के सामने जनवरी 2025 के आदेश की स्थिति अभी भी अहम है. मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब सभी पक्षों को नोटिस जारी किया है. अब इन अपीलों पर विस्तृत सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच के सामने होगी.

आम आदमी पार्टी को सुप्रीम कोर्ट से झटका, बिक्रम मजीठिया को मिली जमानत

चंडीगढ़   इस समय सबसे बड़ी खबर सामने आई है।  सुप्रीम कोर्ट ने आज बिक्रम मजीठिया को जमानत दे दी है। मजीठिया को 25 जून 2025 को गिरफ्तार किया गया था और तब से वह नाभा जेल में बंद थे। बता दें कि बिक्रम मजीठिया की आमदन से ज्यादा संपत्ति मामले में  गिरफ्तारी हुई थी  जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने राहत दी है।   सूत्रों के अनुसार, जमानत मिलने के बाद थोड़ी देर पहले डेरा ब्यास प्रमुख गुरिंदर सिंह ढिल्लों ने नाभा जेल जाकर बिक्रम मजीठिया से मुलाकात की। इस दौरान डेरा प्रमुख ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि मजीठिया पर लगे सभी आरोप झूठे हैं। बिक्रम मजीठिया को जमानत मिलने के बाद अब उनके पक्ष में राजनीतिक और सामाजिक हलचल भी तेज हो गई है। इसी बीच ये भी चर्चाएं तेज हो गई हैं आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा है।  सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने का समय देते हुए मामले को स्थगित करते हुए कहा था कि मजीठिया की अंतरिम जमानत पर अगली सुनवाई पर विचार किया जाएगा। गौरतलब है कि पंजाब विजिलेंस ब्यूरो ने मजीठिया पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी। इसी प्राथमिकी से राहत के लिए श्री मजीठिया ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में जमानत के लिए याचिका दायर की थी, लेकिन अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। फिर मजीठिया ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया था। प्राथमिकी सात जून, 2025 को मजीठिया के खिलाफ पिछले एनडीपीएस मामले की जांच कर रही विशेष जांच टीम (एसआईटी) की रिपोर्ट के आधार पर दर्ज की गई थी। एसआईटी ने आरोप लगाया कि मजीठिया और उनकी पत्नी ने घरेलू और विदेशी संस्थाओं के नेटवर्क के माध्यम से अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से 540 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जमा की थी। ये आरोप 2007 और 2017 के बीच की अवधि से संबंधित हैं, जब मजीठिया पंजाब में विधानसभा सदस्य और बाद में कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्यरत थे। आरोप लगाया है कि मजीठिया दंपति ने सराया इंडस्ट्रीज लिमिटेड और उसकी सहायक कंपनियों सहित कई कंपनियों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण रखा। उन्होंने इन कंपनियों का उपयोग बेनामी संपत्ति हासिल करने के लिए किया। इसके साथ ही, उन्होंने साइप्रस और सिंगापुर स्थित संस्थाओं के माध्यम से विदेशी निवेश और विभिन्न कंपनियों के बीच लेनदेन का उपयोग किया गया। यह भी आरोप लगाया गया कि श्री मजीठिया ने अपने परिवार के सदस्यों और नकली संस्थाओं के माध्यम से शराब, परिवहन और विमानन क्षेत्रों में व्यावसायिक फायदे के लिए अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग किया। मजीठिया ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया था कि भ्रष्टाचार का मामला उसी एनडीपीएस मामले का परिणाम है जिसमें उन्हें अगस्त 2022 में जमानत दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में उस जमानत को रद्द करने की राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी थी।

SC ने आवारा कुत्तों के विवाद में सुरक्षित किया फैसला, वकीलों को दिए 7 दिन

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उन याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिनमें आवारा कुत्तों के मामले में दिए गए पहले के आदेश में बदलाव की मांग की गई थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों से एक हफ्ते के अंदर अपनी लिखित दलीलें जमा करने को कहा है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सभी राज्यों के सभी पक्षों, नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) और एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया (AWBI) द्वारा दी गई दलीलों के आखिरी दौर की सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।   इससे पहले कुत्ते पालने वालों, कुत्ते के काटने की घटनाओं के पीड़ितों, पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से पेश हुए वकीलों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं। कोर्ट ने कल कुछ राज्यों द्वारा दायर किए गए अस्पष्ट हलफनामों पर नाराजगी जताई थी। बार एंड बेंच के मुताबिक, स्वतः संज्ञान मामले में कोर्ट ने आज NHAI से एक ऐप बनाने का भी आग्रह किया, जिसके ज़रिए लोग हाईवे पर आवारा जानवरों को देखने की रिपोर्ट कर सकें। कोर्ट ने कहा, "आप एक ऐप क्यों नहीं बनाते ताकि कोई भी जानवर को देखकर उसकी तस्वीर खींचकर अपलोड कर सके? आपके पास विज़ुअल्स होंगे।" इस पर NHAI के वकील ने जवाब दिया, "हम ऐसा करेंगे।" देश में सिर्फ 76 मान्यता प्राप्त स्टेरिलाइज़ेशन सेंटर खास बात यह है कि जैसे ही सुनवाई खत्म होने वाली थी, AWBI के वकील ने कोर्ट को बताया कि देश में सिर्फ 76 मान्यता प्राप्त स्टेरिलाइज़ेशन सेंटर हैं, जबकि विभिन्न राज्यों के डेटा से पता चलता है कि 883 आवारा कुत्तों के स्टेरिलाइज़ेशन सेंटर हैं। वकील ने कहा, “कुछ आवेदन पेंडिंग हैं। 250 से ज़्यादा आवेदन हैं… राज्यों द्वारा दिए गए डेटा के अनुसार 883 चल रहे हैं, लेकिन उन्हें अभी तक हमारी तरफ से मान्यता नहीं दी गई है।” कोर्ट ने आखिर में पूछा, "जिन सेंटरों को आपने (AWBI) मान्यता नहीं दी है, उनमें क्या हो रहा है?" इससे AWBI के वकील ने स्टेरिलाइज़ेशन के कुछ डेटा में विसंगति की ओर इशारा किया, जिससे शायद यह पता चलता है कि संख्या उतनी सटीक नहीं थी जितनी दावा किया गया था। इससे यह चिंता भी बढ़ी कि स्टेरिलाइज़ेशन के लिए तय फंड उन लोगों द्वारा लिया जा रहा था जो असल में ऐसा काम नहीं कर रहे थे। कई राज्यों ने इस बारे में जानकारी अभी तक उपलब्ध नहीं कराई है। जहां कुत्ते कम वहां स्टेरिलाइज़ेशन ज्यादा वकील ने कहा, "आश्चर्यजनक डेटा है। जहां कुत्तों की आबादी कम है जैसे उत्तराखंड में, वहां स्टेरिलाइज़ेशन ज़्यादा है (रिपोर्ट किए गए स्टेरिलाइज़ेशन की संख्या कुत्तों की आबादी की संख्या से ज़्यादा है)।" इस पर कोर्ट ने कहा, “कारण साफ हैं। हर कोई इसके बारे में जानता है। कितनी ग्रांट दी जाती है।” इसके बाद वकील ने कहा, "जितना कम कहा जाए, उतना अच्छा।" इस पर कोर्ट ने कहा, "हां। कम कहना ही बेहतर है।" कोर्ट ने आगे कहा, "AWBI से बस यही अनुरोध है कि जो भी आवेदन पेंडिंग हैं, आप उन्हें प्रोसेस करें, और या तो उन्हें रिजेक्ट करें या एक तय समय के अंदर उन्हें मंज़ूरी दें।"  

UGC रूल्स पर SC की दोटूक चेतावनी, लगाई रोक; बोले– देश के सामाजिक ढांचे पर पड़ेगा असर

नई दिल्ली यूजीसी रूल्स को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। इन नियमों को लेकर देश भर में विवाद हो रहा था और सवर्ण समाज के लोगों ने ऐतराज जताया था। यह कहा जा रहा था कि इन नियमों में सवर्ण समाज को पहले से ही दोषी मान लिया गया है और जांच कमेटी में उनके प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित नहीं किया गया है। इसके अलावा एससी, एसटी के साथ ही ओबीसी को भी भेदभाव के दायरे में लाए जाने को लेकर भी ऐतराज था। यह मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो बेंच ने अगले आदेश तक रोक लगा दी।   अदालत ने कहा कि फिलहाल इन नियमों पर रोक लगाई जाए। कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक कमेटी के गठन की सलाह दी है, जो इन नियमों की समीक्षा करे। कोर्ट ने सरकार को सलाह दी है कि वह यूजीसी के इन नियमों की भाषा को देखे और नए सिरे से नियमों को जारी किया जाए। नए नियम आने तक 2012 वाले रेगुलेशन ही जारी रहेंगे। अदालत ने इस मामले की सुनवाई के लिए 19 मार्च की तारीख तय की है। उस दिन केंद्र सरकार और यूजीसी यह जानकारी देंगे कि वह इन नियमों में समीक्षा के लिए क्या कर रहे हैं। इस तरह सरकार के पास करीब 50 दिनों का वक्त है, जिसमें उसे इन नियमों में समीक्षा को लेकर फैसला लेना है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा, 'यदि हमने दखल नहीं दिया तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इससे समाज में बंटवारे की स्थिति पैदा होगी और उसके नतीजे खतरनाक होंगे। पृथमदृष्टया हमें लगता है कि इन रेगुलेशंस की भाषा स्पष्ट नहीं है। इसके बारे में एक्सपर्ट्स को विचार करना होगा और सही एवं स्पष्ट भाषा के साथ नए नियम जारी करने होंगे। यह भाषा ऐसी होनी चाहिए कि कोई भी इन नियमों का बेजा इस्तेमाल न कर सके।' अदालत ने कहा कि सरकार और यूजीसी हमें 19 मार्च को इस संबंध में जवाब दे। याचिका में कहा गया था- सवर्णों को सुनवाई का अधिकार क्यों नहीं दरअसल याचिका में कहा गया था कि इन नियमों में सवर्णों को किसी भी तरह के भेदभाव की स्थिति में शिकायत का मौका नहीं दिया गया है। एससी, एसटी और ओबीसी को तो भेदभाव की शिकायत का अधिकार दिया गया है, लेकिन सवर्णों को ऐसा मौका नहीं मिलेगा। इसका अर्थ यह है कि उन्हें पहले ही अपराधी मान लिया गया है। इन दलीलों के साथ प्रदर्शन हो रहे थे और इसी के साथ अदालत में अर्जी दाखिल की गई थी। इसके अलावा एक मांग यह भी थी कि यदि शिकायत झूठी पाई जाती है तो फिर गलत आरोप लगाने पर भी ऐक्शन होना चाहिए। अगर हम हस्तक्षेप नहीं करते हैं तो इसके खतरनाक परिणाम होंगे, समाज में विभाजन होगा और इसके गंभीर प्रभाव होंगे। प्रथम दृष्टया हम कह सकते हैं कि विनियमन की भाषा अस्पष्ट है और विशेषज्ञों को इसकी भाषा को संशोधित करने के लिए जांच करने की आवश्यकता है ताकि इसका दुरुपयोग न हो। चीफ जस्टिस ने कहा, ‘मान लीजिए कि एक छात्र साउथ का है और उत्तर के किसी राज्य में एडमिशन मिलता है। इसी तरह उत्तर वाले को दक्षिण में एडमिशन मिलता है। ऐसी स्थिति में जरूरी है कि कुछ टिप्पणियां दोनों को झेलनी हों। यदि दोनों की जातियों का पता ना हो तो फिर उन्हें किस नियम के तहत समाधान मिलेगा। यह भी जानकारी होनी चाहिए।’ मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हमने 75 वर्षों में जिस देश को वर्गहीन समाज बनाने के लिए इतनी सारी उपलब्धियां हासिल की हैं। क्या अब हम उसे पीछे नहीं ले जा रहे हैं। रैगिंग में सबसे बुरी बात यह है कि दक्षिण या उत्तर-पूर्व से आने वाले बच्चे अपनी संस्कृति साथ लाते हैं और कोई अनजान व्यक्ति उन पर टिप्पणी करने लगता है। फिर आपने अलग-अलग छात्रावासों की बात की। अंतरजातीय विवाह भी होते हैं और हम भी ऐसे छात्रावासों में रहे हैं, जहां सभी एक साथ रहते थे। इसका भी ध्यान रखना जरूरी है। सुनवाई के दौरान वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि हमारी आपत्ति इन रेगुलेशंस के सेक्शन 3 (सी) को लेकर है। जातिगत भेदभाव की परिभाषा में एससी, एसटी और ओबीसी को शामिल किया गया है। इसमें जनरल कैटिगरी शामिल ही नहीं है। ऐसा तो संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ है, जिसमें आप पहले ही एक वर्ग को अपराधी मान लेते हैं और उनके खिलाफ होने वाले भेदभाव की शिकायत का कोई मंच ही नहीं दिया गया है।  

UGC के विवादित नियम पर SC की रोक, जातिगत विवादों को रोकने की कोशिश

नई दिल्ली   सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा से जुड़े यूजीसी रेगुलेशन के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की. सीजेआई ने कहा कि रेगुलेशन में जो शब्द इस्तेमाल किए गए हैं उनसे यह लगता है कि इस रेगुलेशन का दुरुपयोग किया जा सकता है. इसके साथ ही कोर्ट जाति भेदभाव की परिभाषा से जुड़े यूजीसी के नियम पर रोक लगा दी. कोर्ट ने जाति भेदभाव की परिभाषा से जुड़े नियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी किया. इस दौरान कोर्ट ने कहा, हम एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन में फ्री, बराबर और सबको साथ लेकर चलने वाला माहौल चाहते हैं. साथ ही कहा कि हम सिर्फ संवैधानिकता और वैधता की सीमा पर इसकी जांच कर रहे हैं. कोर्ट ने कहा, हम एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन में फ्री, बराबर और सबको साथ लेकर चलने वाला माहौल चाहते हैं. 2012 के नियम फिर से होंगे लागू चीफ जस्टिस ने आदेश देते हुए कहा कि 2012 के नियम फिर से लागू होंगे. शीर्ष अदालत ने कहा कि रेगुलेशन में जो शब्द इस्तेमाल किए गए हैं उनसे यह लगता है कि इस रेगुलेशन का दुरुपयोग किया जा सकता है. जस्टिस बागची ने कहा कि हम समाज में एक निष्पक्ष और समावेशी माहौल बनाने पर विचार कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि जब 3 E पहले से मौजूद है, तो 2C  कैसे प्रासंगिक हो जाता है? कोर्ट की तीखी टिप्पणी गौरतलब है कि याचिकाकर्ता के वकील विष्णु शंकर जैन ने सुनवाई के दौरान कहा कि वो हम UGC एक्ट की धारा 3( C) को चुनौती दे रहे हैं और ये असंवैधानिक है. सुनवाई के दौरान जहां चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी देश जातियों के जंजाल से नहीं निकल पाया है तो वहीं, जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने अमेरिका वाली स्थिति का जिक्र कर दिया. बागची ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि हम उस स्थिति तक नहीं पहुंचेंगे जहां अमेरिका की तरह अलग-अलग स्कूल हों जहां कभी अश्वेत और श्वेत बच्चों को अलग-अलग स्कूलों में पढ़ना पड़ता था. याचिकाकर्ता के वकील विष्णु शंकर जैन  – हम UGC एक्ट की धारा 3( C) को चुनौती दे रहे हैं  – ⁠ये असंवैधानिक है  – ⁠ये सिर्फ धारणा पर आधारित है कि सामान्य श्रेणी के छात्र भेदभाव करते हैं CJI सूर्य कांत – हम केवल प्रावधानों की कानूनी वैधता और संवैधानिकता की ही जांच कर रहे हैं विष्णु: सुप्रीम कोर्ट ने पहले जो भी आदेश दिया है ये उस भावना के खिलाफ है. इससे समाज में वैमनस्य बढ़ेगा. ये संविधान में दिए गए समानता के सिद्धांत के खिलाफ है. CJI सूर्य कांत की बड़ी टिप्पणी   – आजादी के 75 साल बाद भी  हम समाज को जातियों से मुक्त नहीं कर सके हैं याचिकाकर्ता की बड़ी मांग  याचिकाकर्ता ने यूजीसी के रेगुलेशन को रद्द किए जाने की मांग की और इस पर तुरंत रोक लगाए जाने की मांग की. याचिकाकर्ता ने कहा कि अगर हमें इजाजत मिले तो इससे बेहतर रेगुलेशन बनाकर दे सकते हैं. UGC पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणियां CJI सूर्य कांत ने कहा कि 75 साल बाद क्या हम एक वर्गहीन समाज बनने के लिए जो कुछ भी हासिल कर पाए हैं, क्या हम उससे पीछे जाते हुए प्रतिगामी समाज बनते जा रहे हैं? सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने समाज में बढ़ती वर्गीय और पहचान आधारित विभाजन की प्रवृत्तियों पर गंभीर चिंता जताई .रैगिंग पर टिप्पणी करते हुए CJI ने कहा कि रैगिंग में सबसे बुरा यह हो रहा है कि दक्षिण भारत या पूर्वोत्तर से आने वाले बच्चे अपनी संस्कृति लेकर आते हैं और जो लोग उस संस्कृति से परिचित नहीं होते, वे उन पर टिप्पणियां करने लगते हैं. इसपर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए CJI सूर्य कांत ने कहा कि  “भगवान के लिए! आज हमारे समाज में अंतर-जातीय शादियां भी हो रही हैं, हम खुद हॉस्टल में रहे हैं — जहां सभी लोग एक साथ रहते थे. चीफ जस्टिस ने कहा कि हम चाहते है कि कुछ कानूनविदों की कमेटी इसपर विचार करें.  UGC के नए नियम अस्पष्ट यूजीसी के नए नियम पर मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने चिंता जताते हुए कहा. इस तरह की स्थिति का शरारती तत्वों द्वारा दुरुपयोग किया जा सकता है. सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने यूजीसी के नियमों का बचाव कर रहीं वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह से  टिप्पणी की. हम पीछे नहीं जा सकते CJI बोले, एक कमेटी बनाने पर हो विचार CJI ने SG तुषार मेहता से कहा कुछ प्रतिष्ठित लोगों की एक कमेटी बनाने पर विचार हो, जो इस पूरे मुद्दे की समीक्षा करे ताकि समाज बिना किसी तरह के विभाजन के साथ आगे बढ़ सके और सभी मिलकर विकास कर सकें क्या है विवाद यूजीसी को लेकर नया नियम सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही बनाए गए थे. भेदभाव की शिकायतों की जांच और समता को बढ़ावा देने के लिए सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में समता समिति गठित करने को अनिवार्य करने वाले नए नियम 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए थे. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 के तहत इन समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), दिव्यांगजन और महिलाओं के प्रतिनिधियों को शामिल करना अनिवार्य किया गया था. इसमें सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व पर कुछ भी नहीं कहा गया था. याचिका में कहा गया कि नए नियमों में जाति-आधारित भेदभाव को केवल एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव तक सीमित कर दिया गया है. इन नियमों के खिलाफ विभिन्न स्थानों पर विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं, जहां छात्र समूह और संगठन इन्हें तत्काल वापस लेने की मांग कर रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को चेताया: एसिड अटैक पीड़िताओं का रिपोर्ट तुरंत प्रस्तुत करें

नई दिल्ली देश में एसिड अटैक की घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी करते हुए इस तरह की घटनाओं का वर्ष वार ब्योरा मांगा है। तेजाब हमले की घटनाओं पर न्यायालय ने राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों से उन मामलों की संख्या बताने को कहा जिनमें आरोपपत्र दायर किए जा चुके हैं। इसके अलावा यह जानकारी भी मांगी है कि कितने मामलों में फैसला हो चुका है और कितने लंबित हैं।   सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों से कहा है कि इसका पूरा विवरण दिया जाए कि एसिड अटैक से जुडडी कितनी अपील दायर की गई हैं। पीड़ियों के ब्यौरे में शैक्षणिक योग्यता, वैवाहिक स्थिति, उपचार, पुनर्वास और मुआवजे की भी पूरी जानकारी मांगी गई है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे मामलों की भी लिस्ट दी जाए जिसमें किसी पीड़िता को जबरन एसिड पिला दिया गया हो। एक बार सारे आंकड़े सामने आ जाएंगे तो आगे कदम उठाने में आसानी होगी और जल्द से जल्द पीड़ितों को न्याय दिलाने का प्रयास होगा। बता दें कि अदालत में एक एसिड अटैक पीड़िता की अपील पर सुनवाई हो रही थी।  

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्रीय कर्मचारियों पर एसीबी की जांच होगी संभव

नई दिल्ली/ जयपुर  सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) को केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों में अहम फैसला सुनाया. कोर्ट ने केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ एसीबी को जांच करने का अधिकार देते हुए 2 विशेष अनुमति याचिकाएं खारिज कर दीं. साथ ही स्पष्ट किया कि इसके लिए सीबीआई की पूर्व अनुमति जरूरी नहीं है. 'अनिल दायमा एवं अन्य बनाम राज्य राजस्थान एवं अन्य' मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जेबी पारडीवाला और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने की. याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक गौड़ उपस्थित हुए. जबकि राज्य राजस्थान की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा ने पैरवी की.  एसीबी के अधिकार क्षेत्र को दी गई थी चुनौती दरअसल, राजस्थान एसीबी ने केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज किए थे. कर्मचारियों ने एसीबी के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी थी. याचिका दायर करते हुए दलील दी गई कि एसीबी केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और जांच करने के लिए सक्षम नहीं है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है, "एसीबी द्वारा सीबीआई की पूर्व अनुमति या सहमति के बिना दायर किए गए आरोप-पत्र (चार्जशीट) विधिक रूप से अमान्य हैं. राज्य एजेंसी द्वारा संघ सरकार के अधीन कार्यरत अधिकारियों के विरुद्ध की गई जांच अवैध है. केवल सीबीआई को ही केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों की जांच करने का अधिकार है, एसीबी बिना सीबीआई की अनुमति के कोई कार्रवाई नहीं कर सकती और इस कारण पूरी जांच एवं आरोप-पत्र कानूनन शून्य हैं." हाईकोर्ट ने भी खारिज की थी याचिका इन सभी दलीलों को राजस्थान हाईकोर्ट (जयपुर पीठ) ने 3 अक्टूबर 2025 को ही खारिज कर दिया था और एसीबी की शक्तियों को वैध ठहराया था. इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिकाएं दायर कीं. केस की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट के सामने 2 मुख्य विधिक प्रश्न उठे.      क्या किसी राज्य की एंटी-करप्शन ब्यूरो को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केंद्रीय कर्मचारियों की जांच का अधिकार है? वो भी तब, जब अपराध राज्य की क्षेत्रीय सीमा के भीतर हुआ हो.      क्या सीबीआई की स्वीकृति के बिना एसीबी द्वारा दायर आरोप-पत्र वैध हैं और क्या उनके आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने एसीबी के अधिकार क्षेत्र पर कही ये बात इस संबंध में राजस्थान हाईकोर्ट के दृष्टिकोण की पुष्टि करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एसीबी को आपराधिक मामले दर्ज करने, जांच करने और आरोप-पत्र दाखिल करने का पूर्ण अधिकार है, भले ही अभियुक्त केंद्रीय सरकार का कर्मचारी ही क्यों न हो. न्यायालय ने इस तर्क को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया कि ऐसे मामलों में केवल सीबीआई ही जांच कर सकती है. अदालत ने यह भी कहा कि यह दावा करना गलत है कि अभियोजन केवल सीबीआई द्वारा ही प्रारंभ किया जा सकता है या यह कि एसीबी सीबीआई की अनुमति के बिना कार्यवाही नहीं कर सकती. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि उच्च न्यायालय ने एसीबी के अधिकार क्षेत्र को मान्यता देते हुए सही कानूनी दृष्टिकोण अपनाया था. याचिका अस्वीकार करने में संकोच नहीं- सुप्रीम कोर्ट अदालत ने टिप्पणी की, “धारा 17-A की किसी भी प्रकार से कल्पना नहीं की जा सकती कि वह अवैध रिश्वत की मांग के मामलों पर लागू हो. हमें इस प्रकार की दलीलों को प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है.” यह निर्णय इस मामने में अहम हैं कि राज्य एंटी-करप्शन ब्यूरो (जैसे राजस्थान एसीबी) केंद्रीय सरकार के अधिकारियों के विरुद्ध भी भ्रष्टाचार के मामलों की जांच कर सकती है. इसके लिए सीबीआई की स्वीकृति अनिवार्य नहीं है और एसीबी स्वतंत्र रूप से एफआईआर दर्ज कर सकती है. एजेंसी जांच कर सकती है और आरोप-पत्र दाखिल कर सकती है.