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सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालय की 100 मीटर अरावली परिभाषा ठुकराई, बताया कि इससे अरावली की पहचान खतरे में

 नई दिल्ली अरावली पर्वतमाला की परिभाषा को लेकर केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट और उसके द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के बीच गंभीर मतभेद सामने आए हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित 100 मीटर ऊंचाई आधारित अरावली परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया, जबकि अदालत की अपनी ही संस्था सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC)ने इस परिभाषा का समर्थन नहीं किया था। 13 अक्टूबर को मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अरावली की नई परिभाषा पेश की थी। इसके ठीक अगले दिन, 14 अक्टूबर को सीईसी ने पीठ की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी के परमेश्वर को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि इस परिभाषा की न तो जांच की गई है और न ही इसे सीईसी की मंजूरी प्राप्त है। इसके बावजूद, 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालय की 100 मीटर परिभाषा को स्वीकार कर लिया। CEC को सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में पर्यावरण और वन संबंधी आदेशों के अनुपालन की निगरानी के लिए गठित किया था। इसने साफ तौर पर कहा कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) द्वारा तैयार की गई परिभाषा को ही अपनाया जाना चाहिए, ताकि अरावली की पारिस्थितिकी और भौगोलिक अखंडता की रक्षा हो सके। FSI ने वर्ष 2010 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अरावली का विस्तृत सर्वे किया था। इसमें राजस्थान के 15 जिलों में 40,481 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अरावली के रूप में चिह्नित किया गया था। इस परिभाषा में कम से कम 3 डिग्री ढलान और न्यूनतम ऊंचाई वाले क्षेत्रों को शामिल किया गया था, जिससे छोटी और निचली पहाड़ियां भी संरक्षित रहतीं। 100 मीटर परिभाषा पर गंभीर आपत्तियां एमिकस क्यूरी के परमेश्वर ने अदालत में प्रस्तुत एक पावरपॉइंट प्रेज़ेंटेशन में मंत्रालय की 100 मीटर परिभाषा को अस्पष्ट और खतरनाक बताया। उन्होंने कहा कि इस परिभाषा से अरावली की भौगोलिक पहचान टूट जाएगी। कई छोटी पहाड़ियां अरावली के दायरे से बाहर हो जाएंगी। इन क्षेत्रों को खनन के लिए खोला जा सकेगा। इसका सीधा असर पारिस्थितिकी पर पड़ेगा और थार मरुस्थल का विस्तार पूर्व की ओर हो सकता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि 100 मीटर की सीमा लागू होने पर अरावली की निरंतरता समाप्त हो जाएगी और इसे संरक्षित भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं बचाया जा सकेगा। CEC ने मंत्रालय के दावे को बताया भ्रामक CEC अध्यक्ष और पूर्व महानिदेशक (वन) सिद्धांत दास ने 14 अक्टूबर के पत्र में कहा कि मंत्रालय द्वारा दायर हलफनामे में जिन विचारों को CEC का बताया गया है वे वास्तव में CEC सदस्य डॉ. जे.आर. भट्ट के व्यक्तिगत विचार हैं, न कि समिति के। पत्र में यह भी कहा गया कि समिति की बैठक (3 अक्टूबर) के मसौदा कार्यवृत्त CEC को कभी सौंपे ही नहीं गए। मंत्रालय की रिपोर्ट पर CEC ने कोई औपचारिक समीक्षा नहीं की। मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट हस्ताक्षरित भी नहीं थी। CEC ने दोहराया कि उसकी स्पष्ट राय है कि FSI की परिभाषा को ही अपनाया जाना चाहिए। FSI का आंतरिक आकलन और विरोधाभास FSI ने एक ट्वीट में मीडिया रिपोर्ट्स का खंडन किया कि 90% अरावली पहाड़ियां असुरक्षित हो जाएंगी, लेकिन एक आंतरिक आकलन के अनुसार, 20 मीटर या उससे ऊंची 12,081 अरावली पहाड़ियों में से 91.3% और कुल 1,18,575 पहाड़ियों में से 99% से अधिक 100 मीटर की परिभाषा में शामिल ही नहीं होंगी। 20 मीटर ऊंचाई की पहाड़ियां भी प्राकृतिक विंड बैरियर के रूप में अहम भूमिका निभाती हैं। मंत्री का दावा और सवाल पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि अरावली क्षेत्र के केवल 0.19% हिस्से (278 वर्ग किमी) में ही खनन की अनुमति है। लेकिन मंत्रालय के अपने आंकड़े बताते हैं कि यह क्षेत्र पहले से ही राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में खनन के अंतर्गत है। अब तक मंत्रालय यह स्पष्ट नहीं कर पाया है कि 100 मीटर परिभाषा लागू होने के बाद निचले अरावली क्षेत्रों में भविष्य में खनन और विकास को कैसे रोका जाएगा। इसके अलावा, जमीन पर सीमांकन अभी हुआ भी नहीं है, ऐसे में यह भी सवाल बना हुआ है कि मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को कैसे आश्वस्त किया कि 100 मीटर परिभाषा से अधिक क्षेत्र अरावली में आएगा, जबकि FSI की 3 डिग्री ढलान वाली परिभाषा पहले से ही व्यापक थी।

सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश: नियम तोड़ने वालों को कोई राहत नहीं, अवैध निर्माण गिराने के आदेश में नहीं होगा हस्तक्षेप

 नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने हाल में कर्ज वसूली और अवैध निर्माण से जुड़े दो मामलों में सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि नियम तोड़ने वालों को कैसी भी राहत नहीं दी जा सकती. पहले मामले में कर्ज वसूली से जुड़े एक आरोपी को राहत देने से कोर्ट ने इनकार कर दिया. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत में ऐसे कई मामले आ रहे हैं, जहां बेईमान लोग आखिरी तारीख तक इंतजार करते हैं और फिर याचिका दायर कर राहत मांगने लगते हैं. CJI ने साफ शब्दों में कहा कि आपने पैसा हड़प लिया और फिर वापस नहीं किया. ऐसे मामलों में किसी तरह की राहत नहीं दी जा सकती. दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कैंटोनमेंट इलाके में बिना अनुमति बनाए गए निर्माण को गिराने के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया. इस मामले में भी CJI ने कड़ी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि लोग क्रेजी हो गए हैं, दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कोर्ट का तात्पर्य ये रहा कि लोग अब हद से ज्यादा चालाक हो गए हैं. अगर उन्हें एक कमरा कंपाउंड करने की अनुमति दी जाती है, तो वे सीढ़ी बना लेते हैं, फिर छत पर कब्जा कर लेते हैं. इसके बाद 30 साल तक अदालतों में अधिकारियों को घसीटते रहते हैं और कहते हैं कि यह कंपाउंडेबल है, वह कंपाउंडेबल है. CJI ने सीधे सवाल किया जब आपको पता था कि निर्माण की अनुमति नहीं है, तो आपने बिना इजाजत कमरा क्यों बनाया? कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में वह हस्तक्षेप नहीं करेगा. सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों से साफ संकेत मिलता है कि चाहे कर्ज न चुकाने का मामला हो या अवैध निर्माण का, नियम तोड़ने वालों के प्रति अदालत अब कोई नरमी दिखाने के मूड में नहीं है.    

कोर्ट सख्त: नियम तोड़ने वाले राजस्थान के 10 डेंटल कॉलेजों को ₹10-10 करोड़ भरने का आदेश

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने बीडीएस (बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी) में दाखिले के नियमों का उल्लंघन करने पर राजस्थान के 10 निजी डेंटल कॉलेजों पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इन सभी कॉलेजों पर 10-10 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने कहा कि इन कॉलेजों ने जानबूझकर नियमों की अनदेखी की, जिससे मेडिकल शिक्षा के मानकों को नुकसान पहुंचा। न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई और न्यायमूर्ति जेके महेश्वरी की पीठ ने कॉलेजों के साथ-साथ राज्य सरकार की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने बीडीएस दाखिले (शैक्षणिक सत्र 2016-17) में कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने पर राजस्थान सरकार को 10 लाख रुपये राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (आरएसएलएसए) में जमा करने का आदेश दिया। क्या था मामला? बीडीएस में दाखिले के लिए एनईईटी परीक्षा में न्यूनतम प्रतिशत तय है। राजस्थान सरकार ने बिना अधिकार के इस न्यूनतम प्रतिशत में पहले 10 प्रतिशत और फिर पांच प्रतिशत की अतिरिक्त छूट दे दी। इस छूट के कारण कई ऐसे छात्रों को दाखिला मिल गया, जो तय पात्रता पूरी नहीं करते थे। इतना ही नहीं, कुछ कॉलेजों ने इस 10+5 प्रतिशत की छूट से भी आगे जाकर छात्रों को दाखिला दे दिया, जो पूरी तरह नियमों के खिलाफ था। छात्रों को राहत, कॉलेजों पर सख्ती सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर 2016-17 में दाखिला पाए छात्रों को राहत दी। अदालत ने अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उनकी बीडीएस डिग्री को वैध (रेग्युलराइज) कर दिया। हालांकि, जिन छात्रों को राहत मिली है, उन्हें निर्देश दिया गया है कि वे राजस्थान हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल करेंऔर राज्य में आपदा, महामारी या किसी आपात स्थिति में निःशुल्क सेवा देने के लिए तैयार रहें। जुर्माने की रकम कहां जाएगी? सभी कॉलेजों को जुर्माने की राशि आठ सप्ताह के भीतर आरएसएलएसए में जमा करनी होगी। यह पैसा वन स्टॉप सेंटर, नारी निकेतन, वृद्धाश्रम और बाल देखभाल संस्थानों जैसे सामाजिक कल्याण के कार्यों में इस्तेमाल किया जाएगा।

महिला वकील को थाने में अवैध रूप से रोके जाने का मामला, सुप्रीम कोर्ट सख्त, यूपी व केंद्र से जवाब तलब

नोएडा नोएडा के एक थाने में महिला वकील को कथित रूप से कई घंटे तक बंधक बनाकर यौन शोषण करने के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने गौतमबुद्ध नगर के पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया है कि घटना वाले दिन पुलिस स्टेशन में लगे कैमरों की फुटेज किसी भी स्थिति में न हटाई जाए और उसे सीलबंद लिफाफे में सुरक्षित रखा जाए। महिला वकील ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को सेक्टर-126 पुलिस स्टेशन में उस समय तैनात अधिकारियों के खिलाफ तुरंत प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। साथ ही उन्होंने मांग की है कि मामले की जांच एसआईटी या सीबीआई को सौंपी जाए, ताकि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित हो सके। जस्टिस विक्रम नाथ और एन. वी. अंजारिया की पीठ ने पीड़ित वकील की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई की। याचिका में दावा किया गया है कि तीन दिसंबर की रात उन्हें सेक्टर-126 पुलिस स्टेशन में पुलिसकर्मियों द्वारा कथित रूप से 14 घंटे तक अवैध हिरासत में रखा गया। इस दौरान उनके साथ यौन उत्पीड़न और जबरदस्ती किए जाने का आरोप लगाया गया है, जबकि वह अपने मुवक्किल से जुड़े दायित्व निभाने के लिए वहां मौजूद थीं। पीठ ने मामले में केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और गौतमबुद्ध नगर के पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी कर सात जनवरी तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। डीसीपी नोएडा यमुना प्रसाद ने कहा कि मामला दो पक्षों के बीच विवाद से संबंधित था, जिसमें एक पक्ष की ओर से महिला अधिवक्ता भी थाने पहुंची थीं। उन्होंने बताया कि अब अधिवक्ता ने आरोप लगाया है कि थाने में उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया। डीसीपी ने कहा कि पुलिस अपनी स्तर से पूरे मामले की जांच कर रही है और न्यायालय के सभी निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जाएगा। याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने पीठ के समक्ष कहा कि यह अत्यंत गंभीर मामला है, जिसमें एक महिला वकील के साथ कथित यौन दुर्व्यवहार किया गया और उन्हें अवैध रूप से हिरासत में रखा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि यह घटना दिल्ली के पास नोएडा में हो रही है, तो पूरे देश की सुरक्षा स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है। पीठ ने बताया कि आम तौर पर वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस तरह की याचिकाओं पर विचार नहीं करती और याचिकाकर्ता को संबंधित हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता देती है। हालांकि, याचिका में लगाए गए गंभीर आरोपों और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि मामला पुलिस स्टेशन में घटना के दौरान सीसीटीवी कैमरों को ब्लॉक करने से भी संबंधित है, अदालत ने इस याचिका पर विचार करने का निर्णय लिया। वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने पीड़ित महिला वकील की सुरक्षा का मुद्दा उठाया। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि इस आदेश के बाद कोई भी उसे परेशान करने की हिम्मत नहीं करेगा। सुनवाई के दौरान, वरिष्ठ अधिवक्ता सिंह ने थाने में लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज को तुरंत जब्त करने की भी मांग की। हाईकोर्ट क्यों नहीं गएः सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई की शुरुआत में सवाल किया कि याचिकाकर्ता ने अपनी शिकायत लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट से क्यों संपर्क नहीं किया। पीठ ने कहा कि उन्हें पूरी सहानुभूति है और हाईकोर्ट को उचित कार्रवाई करने देना चाहिए। इस पर महिला अधिवक्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट याचिका को हाईकोर्ट में ट्रांसफर कर सकता है। पीठ ने जवाब में कहा कि समस्या यह है कि यदि हम इस याचिका पर सुनवाई शुरू करते हैं, तो दिल्ली के आसपास के सभी मामले केवल सुप्रीम कोर्ट में ही आने लगेंगे। इसके बाद वरिष्ठ अधिवक्ता सिंह ने पीठ से अनुरोध किया कि इसे एक तरह का टेस्ट केस माना जाए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही सीसीटीवी फुटेज मामले की निगरानी कर रहा है, जो अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘गर्दन पर पिस्टल रखा गया’ महिला वकील की ओर से याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिसकर्मियों ने सरकारी पिस्तौल उनकी गर्दन पर रखकर मोबाइल फोन का पासवर्ड सौंपने के लिए मजबूर किया, जिससे उनकी जान तत्काल खतरे में पड़ गई। याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने की धमकियां दी गईं। याचिका में यह आरोप भी शामिल है कि अधिकारियों ने थाने में लगे सीसीटीवी कैमरों को दुर्भावनापूर्ण तरीके से बंद या हटा दिया, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए अनिवार्य आदेश का स्पष्ट उल्लंघन था।

सुप्रीम कोर्ट ने दिया अहम निर्णय: शादी के आधार पर संपत्ति से बेदखल करने का पिता का कदम रद्द

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के अधिकार को लेकर एक अहम फैसला दिया है. उसने टेस्टेटर (वसीयत करने वाले) की इच्छा को सर्वोपरि मानते हुए एक पिता की वसीयत को वैध ठहराया है, जिसमें उन्होंने अपनी बेटी शैला जोसेफ को समुदाय से बाहर के लड़के से शादी करने के कारण संपत्ति से वंचित कर दिया था. यह मामला लैंगिक समानता के कई ऐतिहासिक फैसलों के बावजूद वसीयत की स्वतंत्रता को अहमियत देता है. जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने केरल हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसलों को पलट दिया, जिन्होंने वसीयत को दरकिनार करते हुए एनएस श्रीधरन की संपत्ति को नौ बच्चों में बराबर बांटने का आदेश दिया था. रिपोर्ट के मुताबिक श्रीधरन के नौ बच्चे थे, लेकिन 1988 में बनाई गई उनकी रजिस्टर्ड वसीयत में शैला को छोड़कर बाकी आठ बच्चों को संपत्ति सौंप दी गई थी. वजह थी शैला का समुदाय से बाहर शादी करना. जजमेंट लिखते हुए जस्टिस चंद्रन ने कहा कि वसीयत स्पष्ट रूप से साबित हो चुकी है, इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता. हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले रद्द किए जाते हैं. शैला जोसेफ का अपने पिता की संपत्ति पर कोई दावा नहीं है, क्योंकि वसीयत से यह संपत्ति अन्य भाई-बहनों को सौंप दी गई है. कोर्ट में शैला की ओर से सीनियर एडवोकेट पीबी कृष्णन ने तर्क दिया कि उनकी क्लाइंट को कम से कम 1/9 हिस्सा मिलना चाहिए, जो संपत्ति का नगण्य हिस्सा है. लेकिन बेंच ने स्पष्ट किया कि संपत्ति के बंटवारे में व्यक्ति की इच्छा के मामले में समानता का सवाल उठता ही नहीं. हम इक्विटी (न्यायसंगत बंटवारे) पर नहीं हैं. टेस्टेटर की इच्छा सर्वोपरि है. उसकी अंतिम वसीयत से विचलन या उसे निरस्त नहीं किया जा सकता. वसीयत लिखने वाली की इच्छा सर्वोपरि कोर्ट ने यह भी कहा कि वसीयत के कंटेंट पर सावधानी का नियम लागू नहीं होता, क्योंकि यह व्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है कि वह अपनी संपत्ति कैसे बांटे. अगर वसीयत से सभी वारिसों को वंचित किया जाता, तभी कोर्ट सावधानी बरत सकता था. लेकिन यहां केवल एक बेटी को बाहर किया गया है और इसके लिए स्पष्ट वजह बताई गई है. बेंच ने टिप्पणी की कि वंचित करने की वजह बताई गई है, लेकिन उसकी स्वीकार्यता हमारे लिए सावधानी का नियम नहीं तय करती. हम टेस्टेटर की जगह खुद को नहीं रख सकते. हम अपनी राय थोप नहीं सकते; उनकी इच्छा उनकी अपनी वजहों से प्रेरित है. फैसले में सिविल अपीलों को मंजूर करते हुए शैला की पार्टिशन सूट को खारिज कर दिया गया. मामला केरल का है, जहां श्रीधरन की मौत के बाद 1990 में भाई-बहनों ने इंजेक्शन सूट दाखिल किया था और वसीयत की कॉपी पेश की थी. शैला ने उसमें हिस्सा नहीं लिया, जिसे कोर्ट ने बाद में उनके खिलाफ माना.

अरावली की ढलान पर खनन को हरी झंडी! SC के फैसले से पर्यावरण पर मंडराया बड़ा खतरा

अरावली देश में पिछले कुछ वर्षों से खनन के जरिए पहाड़ों को काटने का सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले ने पर्यावरण से जुड़े बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने खनन से जुड़ा एक अहम फैसला सुनाया, जिसके तहत 100 मीटर तक ऊंचाई वाले पहाड़ों पर खनन की अनुमति दी गई है। यह फैसला खासतौर पर राजस्थान और अरावली पर्वतमाला के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह फैसला पूरी तरह लागू हुआ, तो राजस्थान में रेगिस्तान का क्षेत्र बढ़ सकता है। अरावली पर्वतमाला पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला अरावली पर्वतमाला को राजस्थान की लाइफ लाइन कहा जाता है, लेकिन अब यह लाइफ लाइन खतरे में नजर आ रही है। पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अरावली पर्वत का क्षेत्र तेजी से सिकुड़ रहा है। कोर्ट के अनुसार, अरावली का लगभग 90% हिस्सा अब 100 मीटर से कम ऊंचाई का रह गया है, 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले क्षेत्र को अब पर्वत नहीं, सिर्फ भूभाग माना जाएगा,  इसका सीधा मतलब यह है कि इन इलाकों में खनन के रास्ते खुल सकते हैं। क्या राजस्थान में बढ़ेगा रेगिस्तान? पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट में बताया गया कि अरावली पर्वतमाला अब पहले जैसी ऊंची नहीं रही। अरावली मरुस्थल के विस्तार को रोकने में प्राकृतिक दीवार का काम करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अरावली में खनन बढ़ा, तो: मरुस्थल का विस्तार तेजी से होगा, मानसून की हवाएं कमजोर पड़ेंगी, प्रदेश में बारिश कम होगी। अरावली की ऊंचाई घटने से मानसून सिस्टम भी प्रभावित हो रहा है, जिससे राजस्थान के मौसम में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। राजस्थान की पहचान है अरावली पर्वतमाला अरावली पर्वतमाला को दुनिया की सबसे पुरानी वलित पर्वतमालाओं में से एक माना जाता है। अरावली की कुल लंबाई: 692 किलोमीटर राजस्थान में हिस्सा: करीब 550 किलोमीटर सबसे ऊंची चोटी: गुरु शिखर (माउंट आबू) – ऊंचाई 1727 मीटर अरावली तीन राज्यों—दिल्ली, राजस्थान और गुजरात—से होकर गुजरती है। राजस्थान की अधिकांश नदियों का उद्गम भी अरावली पर्वतमाला से ही होता है, इसलिए इसे प्रदेश की लाइफ लाइन कहा जाता है। अरावली कमजोर होने से क्या होंगे नुकसान अगर अरावली पर्वतमाला का क्षरण इसी तरह जारी रहा, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं: राजस्थान में मरुस्थल का तेजी से विस्तार गर्म हवाओं का असर और बढ़ेगा बंगाल की खाड़ी से आने वाला मानसून कमजोर पड़ेगा भूकंप के झटकों का असर बढ़ सकता है अरावली से निकलने वाली नदियां सूख सकती हैं खेती और फसलों पर बुरा असर पड़ेगा प्रदेश की जलवायु और भौगोलिक संतुलन बिगड़ जाएगा बारिश का सिस्टम हो रहा है प्रभावित पर्यावरण विशेषज्ञ और राजस्थान विश्वविद्यालय की भूगोल विभाग की वरिष्ठ प्रोफेसर के अनुसार, अरावली की ऊंचाई कम होने से राजस्थान का वर्षा तंत्र बिगड़ रहा है। पहले मानसून की हवाएं अरावली से टकराकर पूर्वी राजस्थान में बारिश करती थीं, लेकिन अब अरावली कमजोर होने के कारण हवाएं पश्चिमी राजस्थान की ओर निकल जा रही हैं। इससे पूरे प्रदेश का वर्षा संतुलन गड़बड़ा रहा है, जो बेहद चिंताजनक स्थिति है। कैसे शुरू हुआ अरावली का क्षरण अरावली पर्वतमाला के क्षरण की शुरुआत 1990 के दशक में हुई। इसके मुख्य कारण बताए जा रहे हैं: तेजी से शहरीकरण दिल्ली और राजस्थान में बड़े निर्माण कार्य पत्थर और खनिजों के लिए अंधाधुंध खनन पेड़ों की कटाई स्थिति बिगड़ने पर 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली में अवैध खनन पर रोक लगाई थी, लेकिन अब नए फैसले के बाद एक बार फिर पर्यावरण को लेकर चिंता बढ़ गई है।  

हादसों पर जवाब से नाखुश सुप्रीम कोर्ट, NHAI से की तीखी टिप्पणी

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की ओर से दायर हलफनामे पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि हलफनामे में ठेकेदारों और स्थानीय अधिकारियों पर कीचड़ उछालने का प्रयास किया गया है। सड़क हादसे के लिए कौन जिम्मेदार है? सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि वह जानना चाहता है कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की शक्तियां क्या हैं और इसके लिए कौन जिम्मेदार है? सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल से सवाल किया कि इस मामले का सही उपाय क्या हो सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह की घटनाएं भविष्य में न दोहराई जाएं और सर्दियों में कोहरे के कारण होने वाली दुर्घटनाओं पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने कहा कि हाईवे पर भारी अतिक्रमण है, खासकर जब वे शहरों और कस्बों से गुजरते हैं। कई हाईवे का इस्तेमाल शहर की सड़कों के तौर पर भी किया जाता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के पास गति सीमा और सुरक्षा संबंधित नियम हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राजमार्गों पर ढाबे अवैध हैं और उन्हें हटाना एनएचएआई के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन इसका कार्यान्वयन स्थानीय जिला मजिस्ट्रेट और नगर निगमों पर निर्भर है। इस वजह से भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि यदि शहरों से होकर गुजरने वाले राजमार्गों पर भारी अतिक्रमण होता है तो एनएचएआई को इसके समाधान के लिए गंभीर कदम उठाने चाहिए। कोर्ट ने यह भी पूछा कि एनएचएआई की ओर से बनाए गए नियमों का पालन क्यों नहीं किया जा रहा और किसकी जिम्मेदारी है। इसके साथ ही बेंच ने यह सुझाव दिया कि एक एडवोकेट कमिश्नर को इस क्षेत्र का निरीक्षण करने के लिए भेजा जाए और वहां की स्थिति का वीडियो तैयार किया जाए। कोर्ट ने एनएचएआई से विस्तृत रिपोर्ट की मांग की और कहा कि केवल नियमों का ड्राफ्ट प्रस्तुत करने से काम नहीं चलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजमार्गों पर अतिक्रमण और सुरक्षा संबंधी मुद्दे हर जगह एक जैसे हैं, और इसका समाधान जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह पूरे भारत में हाईवे सुरक्षा के लिए व्यापक आदेश जारी करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से मौजूदा अतिक्रमण की स्थिति बताने वाली गूगल इमेज भी शेयर करने को कहा है ताकि उचित कदम उठाए जा सकें। बता दें कि राजस्थान के फालौदी और तेलंगाना-बीजापुर हाईवे पर हुए भीषण सड़क हादसे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिए गए स्वतः संज्ञान मामले पर सुनवाई हुई।

‘कुछ तो गलत है’—SC ने मद्रास हाई कोर्ट की कार्यवाही पर जताई गंभीर आपत्ति

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने मामलों की लिस्टिंग और सुनवाई में अपनाए जा रहे नियमों पर मद्रास हाई कोर्ट पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने करूर भगदड़ के बाद हाई कोर्ट की भूमिका पर अपनी जांच तेज कर दी है और कहा है कि जिस तरह से हाई कोर्ट ने इस त्रासदी से जुड़े मामलों को संभाला, उसमें कुछ गड़बड़ है। इस घटना में एक्टर से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कजगम (TVK) के एक राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान 41 लोगों की जान चली गई थी।   जस्टिस जेके माहेश्वरी और विजय बिश्नोई की बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा सब्मिट की गई एक रिपोर्ट की जांच करने के बाद यह टिप्पणी की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर में मांगा था। सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल उठाया था कि करूर मदुरै बेंच के अधिकार क्षेत्र में आने के बावजूद हाई कोर्ट की चेन्नई बेंच ने इस मामले को कैसे हैंडल किया। रिपोर्ट को पार्टियों के बीच सर्कुलेट करने का आदेश दिया गया, और बेंच ने उनसे जवाब मांगा। रजिस्ट्रार जनरल की एक्सप्लेनेशन को देखने के बाद, बेंच ने कमेंट किया: "हाई कोर्ट में कुछ गलत हो रहा है। यह सही बात नहीं है जो हाई कोर्ट में हो रही है… रजिस्ट्रार जनरल ने एक रिपोर्ट भेजी है।" सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई सवाल उठाए थे, जिनमें यह भी शामिल था कि चेन्नई बेंच ने करूर से जुड़े मामले में दखल क्यों दिया, उसने एक ऐसी याचिका पर पूरी तरह से तमिलनाडु पुलिस अधिकारियों की एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) का गठन कैसे किया, जिसमें सिर्फ राजनीतिक रैलियों के लिए गाइडलाइंस मांगी गई थीं और हाई कोर्ट की दो बेंचों से विरोधाभासी आदेश क्यों आए, जबकि मदुरै बेंच ने उसी दिन जांच को सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) को ट्रांसफर करने से मना कर दिया था। तमिलनाडु की ओर से पेश हुए सीनियर वकील पी. विल्सन ने कोर्ट से कहा, "हमारे हाई कोर्ट में, जो भी मामला कोर्ट के सामने आता है, उससे जुड़ी हर बात पर वे आदेश देते हैं…" इस पर जस्टिस माहेश्वरी ने जवाब दिया, "अगर कोई प्रैक्टिस गलत है।" बेंच ने 13 अक्टूबर के अपने आदेश के एक हिस्से में बदलाव करने की मौखिक रिक्वेस्ट को भी ठुकरा दिया, जिसमें निर्देश दिया गया था कि सीबीआई जांच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज अजय रस्तोगी की अध्यक्षता वाली तीन-सदस्यीय समिति करेगी। आदेश के अनुसार, जस्टिस रस्तोगी को तमिलनाडु कैडर के दो सीनियर आईपीएस अधिकारियों को चुनना होगा जो उस राज्य के मूल निवासी न हों।  

CJI सूर्यकांत की कड़ी टिप्पणी: ‘ऐसी याचिकाएं लेना बंद कीजिए’, आखिर क्या था मामला?

नई दिल्ली  देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच आज भी मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इस मामले में लगातार दायर हो रही याचिकाओं पर सीजेआई ने नाराजगी जताते हुए कहा कि ये सब पब्लिसिटी पाने के लिए किया जा रहा है। CJI सूर्यकांत ने कहा कि हमें सिर्फ SIR जैसे बड़े मामलों पर फोकस न रहकर बल्कि आम आदमी से जुड़े मुकदमों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। इस दौरान उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा, “रेलवे एक्सीडेंट का मामला देख लीजिए… एक व्यक्ति की ट्रैक पर मौत हो गई… हमने कुछ मुआवजा दिया फिर भी वारिसों को कुछ नहीं मिला। मुआवजा न मिलने पर वे कहीं गायब हो गए। अब हमने उन्हें ढूँढ़ निकाला और फिर पक्का किया कि उन्हें पैसे मिलें.. सोचिए उस विधवा के चेहरे पर मुस्कान कैसी होगी?”   इसी बीच, CJI सूर्यकांत ने कहा, "अब हर मामले में बार के सदस्यों को एक टाइमलाइन देनी होगी क्योंकि कुछ मामले जो ज़रूरी लगते हैं, वे कोर्ट का सारा समय ले लेते हैं और कई जरूरी खासकर MACT मामले में याचिकाकर्ताओं को समय नहीं मिल पाता है।" उन्होंने कहा, “मैं इस कोर्ट में सभी मामलों के लिए समय का बराबर बंटवारा चाहता हूँ, SIR जैसे जरूरी मामलों में पूरा दिन लग जाता है, जो पिटीशनर मुआवज़े के मामलों वगैरह के लिए आते हैं, वे आखिरी लाइन में बैठे रहते हैं और शाम 4 बजे बिना सुनवाई के घर वापस चले जाते हैं, वे नहीं जानते कि उनका नंबर कब आएगा?”   इसके बाद CJI सूर्यकांत ने कहा, "मैं रजिस्ट्री को इस मामले में (SIR केस में) कोई और नई याचिका स्वीकार न करने का निर्देश दे रहा हूँ। कई लोग अब सिर्फ़ पब्लिसिटी के लिए आ रहे हैं। अब किसी नए मामले की ज़रूरत नहीं है। मुझे ऐसा कहते अफसोस हो रहा है।" इसके बाद जस्टिस सूर्यकांत ने SIR के मुद्दे पर दायर अलग-अलग राज्यों के मामलों की अलग-अलग सुनवाई करने का फैसला करते हुए सभी राज्यों के लिए अलग-अलग तारीखें भी तय कर दीं। UP, केरल के मामले 18 दिसंबर को सुने जाएंगे CJI ने कहा कि तमिलनाडू का मामला 16 तारीख को सुना जाएगा। इस बीच सिब्बल बोले, पश्चिम बंगाल का मामला 17 तारीख तक के लिए टाल दिया गया है। CJI ने बिना उस पर ध्यान देते हुए आगे कहा कि बिहार के सभी मामले आज सुने जाएंगे, जबकि असम के मामले 16 को, WB के मामले भी 16 को और UP, केरल के मामले 18 दिसंबर को सुने जाएंगे।  

BLO की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश, SIR में कोई रुकावट बर्दाश्त नहीं

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) कार्य में लगे बूथ स्तर के अधिकारियों (BLOs) को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने चेतावनी दी कि BLOs को धमकाने या उनके काम में बाधा डालने के किसी भी उदाहरण को वह गंभीरता से लेगा। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी गैर-सरकारी संगठन (NGO) सनातनी संसद की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरी के उस आरोप के बाद आई, जिसमें उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में मतदाता गणना के काम के दौरान BLOs को धमकाया जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस मुद्दे को अखिल भारतीय आयाम देते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। पीठ ने कहा, "यह केवल पश्चिम बंगाल के बारे में नहीं है, बल्कि सभी राज्यों के लिए है। चुनाव आयोग (EC) के काम में असहयोग एक गंभीर मुद्दा है। BLOs को पूरी सुरक्षा मिलनी चाहिए।" कोर्ट ने कहा, "अगर चुनाव आयोग को BLOs की सुरक्षा और संरक्षा के संबंध में राज्य के अधिकारियों या पुलिस से असहयोग की कोई शिकायत है, तो उसे सुप्रीम कोर्ट से संपर्क करना चाहिए। हम उचित आदेश पारित करेंगे।" CJI की अगुवाई वाली बेंच ने कहा, "हम BLOs की रक्षा के लिए कड़ी कार्रवाई करेंगे। उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए, अन्यथा अराजकता होगी।" कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब मांगते हुए चुनाव आयोग को सभी राज्यों में स्थिति का आकलन करने और जरूरत पड़ने पर उचित निर्देश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने को कहा। अदालत में BLOs पर काम के बोझ और तनाव पर भी चर्चा हुई, जिसका संदर्भ कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी के उस बयान से मिलता है जिसमें उन्होंने BLOs की मौत का आरोप लगाते हुए SIR को बंद करने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 4 दिसंबर के अपने आदेश का उल्लेख किया, जिसमें राज्यों को निर्देश दिया गया था कि जो BLOs तनावग्रस्त हैं या स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उन्हें SIR कार्य से हटने की अनुमति दी जाए और पर्याप्त प्रतिस्थापन प्रदान किया जाए। चुनाव आयोग ने कहा कि एक BLO को 37 दिनों में अधिकतम 1,200 मतदाताओं की गणना करनी होती है, यानी लगभग 35 मतदाता प्रति दिन। आयोग ने सवाल किया, "क्या यह बहुत अधिक काम है?" जस्टिस बागची ने कहा, "यह डेस्क जॉब नहीं है जहां 35 का कोटा आसानी से पूरा हो जाता है। एक BLO को घर-घर जाकर गणना प्रपत्रों का सत्यापन करना होता है और फिर उसे अपलोड करना होता है। इसमें तनाव और शारीरिक थकान हो सकती है। हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जमीनी स्तर पर SIR बिना किसी रुकावट के हो।" जस्टिस बागची ने पश्चिम बंगाल में BLOs के खिलाफ धमकी के आरोपों को साबित करने के लिए सनातनी संसद द्वारा प्रस्तुत सामग्री पर भी सवाल उठाया। जस्टिस बागची ने पूछा, "एकमात्र FIR के अलावा, आरोपों की पुष्टि के लिए कोई अन्य विश्वसनीय सबूत नहीं है। क्या एक अकेली घटना के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह केवल पश्चिम बंगाल में हो रहा है, अन्य राज्यों में नहीं? क्या यह एक तरफा बयानबाजी नहीं है? क्या सभी राज्यों की पुलिस को चुनाव आयोग के अधीन कर दिया जाना चाहिए?" राज्य सरकारों का विरोध: EC के वकील ने कहा कि पश्चिम बंगाल के साथ-साथ तमिलनाडु और केरल में भी समस्याएँ आ रही हैं, क्योंकि वहाँ की राज्य सरकारों ने SIR के प्रति अपना विरोध सार्वजनिक कर दिया है। यह मामला दिखाता है कि कैसे मतदाता सूची पुनरीक्षण का कार्य न केवल तकनीकी और प्रशासनिक है, बल्कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक गंभीर राजनीतिक और कानूनी विवाद का विषय बन गया है।