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सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्देश: BLO से संबंधित सभी नियम पूरे देश में लागू

नई दिल्ली एसआईआर के कार्य में लगे बीएलओ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा निर्देश दिया है. शीर्ष अदालत ने कहा है कि BLO से जुड़े सभी निर्देश पूरे देश में लागू होंगे. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं में बीएलओ की सुरक्षा और प्रशासनिक निर्देश पूरे देश में लागू होंगे, ये सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं हैं. मामले की सुनवाई कर रहे सीजेआई की बेंच ने कहा कि प्रभावित कर्मचारी को स्वतंत्रता होगी कि वे राज्य के चुनाव आयोग, जिले के जिला निर्वाचन अधिकारी से संपर्क करें. जिला अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि राज्य सरकार आवश्यक अनुपालन करें. पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ये निर्देश दिए गए. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश अलग-अलग राज्यों की याचिकाओं को अलग-अलग श्रेणी में विभाजित किया जाए, ताकि मुख्य मुद्दे पर सुनवाई सुचारू रूप से हो सके. तीन अलग-अलग राज्यों से संबंधित SIR मामलों को अगले हफ्ते तीन अलग-अलग तारीखों पर सूचीबद्ध किया जाए. सुनवाई के दौरान उठे मुद्दे वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि यूपी जैसा बड़ा राज्य तय टाइमलाइन में SIR पूरा नहीं कर पाएगा. इस पर CJI ने यूपी की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए कहा कि अगले मंगलवार को सुनवाई होगी. CJI ने फिर दोहराया, “आप लोग इसी तरह नई-नई याचिकाएं लाते रहेंगे, तो मुख्य केस की सुनवाई कैसे होगी?” तमिलनाडु का पक्ष तमिलनाडु SIR मुद्दे पर एक वकील ने कहा कि राज्य के प्रवासी मजदूर पोंगल के बाद ही लौटते हैं, इसलिए अदालत को इसे ध्यान में रखना चाहिए. अदालत ने स्पष्ट किया कि वह पहले बिहार मामले को प्राथमिकता देगी, क्योंकि उसमें होने वाला निर्णय सभी राज्यों को प्रभावित करेगा. बीएलओ की सुरक्षा पर चिंता चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जमीनी स्तर पर बीएलओ को मिल रही धमकियां गंभीर मुद्दा बन सकती हैं. इनकी सुरक्षा नजरअंदाज नहीं की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है. उसने कहा कि बीएलओ से जुड़े निर्देश देश भर में लागू होंगे. इस सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने कहा कि बीएलओ की सुरक्षा राज्य पुलिस के सहयोग पर निर्भर है. जरूरत पड़ी तो केंद्रीय बल तैनात किए जा सकते हैं. प्रभावित कर्मचारी राज्य ECI और जिला निर्वाचन अधिकारी से सुरक्षा के लिए संपर्क कर सकेंगे. मतदाता नामांकन और नागरिकता से जुड़े मामलों की अगली सुनवाई 17 तारीख को होगी.

इंडिगो विवाद में सुप्रीम दखल नहीं होगा: कोर्ट ने सरकार पर छोड़ा मामला

नई दिल्ली इंडिगो संकट पर सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने से इनकार कर दिया है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अभी सरकार कदम उठा रही है। हम फिलहाल मामले में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। सीजेआई ने कहा कि हम समझते हैं कि लाखों लोग इस समस्या का सामना कर रहे हैं, लेकिन सरकार मामले को देख रही है। उन्हें ही इसे संभालने दें। दरअसल पिछले 7 दिन से देशभर के एयरपोर्ट्स पर इंडिगो की फ्लाइट लगातार कैंसिल हो रही है। इससे लाखों यात्रियों को काफी परेशानी हो रही है। इंडिगो संकट को लेकर देश के शीर्ष न्यायालय में याचिका दायर की गई थी। मामले की सुनवाई करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि अभी सरकार कदम उठा रही है। हालत जस के तस होते तो अलग बात थी। उन्हें ही इसे संभालने दें। वहीं याचिकाकर्ता ने वकील ने कहा कि 2500 उड़ानें विलंबित हैं और 95 हवाई अड्डे प्रभावित हैं। सुप्रीम कोर्ट के वकील नरेंद्र मिश्रा ने जनहित याचिका दायर कर पूरे संकट पर कोर्स से स्वतः संज्ञान लेने और तुरंत हस्तक्षेप की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर प्रभावित यात्रियों के लिए वैकल्पिक यात्रा और मुआवजे की मांग की गई है। कोर्ट में दायर याचिका में यात्रियों को भारी परेशानी और मानवीय संकट पैदा होने का दावा किया और इस पर त्वरित हस्तक्षेप की मांग की गई। 6 दिसंबर को सीजेआई के घर पहुंचे थे याचिकाकर्ता के वकील 6 दिसंबर को याचिकाकर्ता के वकील CJI सूर्यकांत के घर पहुंचे और उनसे इस मामले में तत्काल सुनवाई करने की मांग की। फ्लाइट के कैंसिल होने पर सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल की गई। वकील नरेंद्र मिश्रा ने कहा कि जस्टिस सूर्यकांत ने हमारी याचिका देखी और स्टाफ को इस मामले के लिए निर्देश दिया है। उन्होंने बताया कि सीजेआई के स्टाफ ने ओएसडी कुंतल शर्मा पाठक का नंबर मुझे दिया है। सीजेआई की ओर से आश्वासन दिया गया था कि मामले पर जल्द सुनवाई की जाएगी। ऐसे में आज याचिका को लेकर सुनवाई होनी है। याचिका में यात्रियों को भारी परेशानी और मानवीय संकट पैदा होने की बात कही गई है। 7वें दिन भी 350 से अधिक फ्लाइट कैंसिल इधर यात्रियों पर इंडिगो का टॉर्चर जारी है। केंद्र सरकार के अल्टीमेटम के बाद भी देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो की उड़ान सेवाएं सोमवार को भी पटरी पर नहीं लौट सकीं हैं। आज (8 दिसंबर) सातवें दिन भी सुबह 10 बजे तक 350 से अधिक फ्लाइट कैंसिल हो चुकी है। दिल्ली, श्रीनगर, हैदराबाद, बेंगलुरु एयरपोर्ट से 350 से ज्यादा फ्लाइट कैंसिल हो चुकी हैं। दिल्ली (IGI) और मुंबई दोनों ही प्रमुख हवाई अड्डों पर IndiGo के यात्री सोमवार को भी भी फ्लाइट रद्द होने होने से परेशान दिखे। दरअसल देश की सबसे बड़ी एयरलाइन ने रविवार को 650 से अधिक उड़ानें रद्द कर दी थी, हालांकि यह संख्या दो दिन पहले के 1000 से अधिक कैंसिलेशन से कम है। दिल्ली एयरपोर्ट (IGI) ने यात्रियों को सलाह दी है कि वे एयरपोर्ट आने से पहले अपनी उड़ानों की ताजा स्थिति चेक कर लें। एयरपोर्ट ने कहा कि उनकी टीमें दिक्कतों को कम करने के लिए सभी हितधारकों के साथ मिलकर काम कर रही हैं।

इंडिगो फ्लाइट विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का रुख, याचिकाकर्ता ने मांगी तुरंत सुनवाई

नई दिल्ली इंडिगो एयरलाइन के लगातार उड़ान रद्द होने और यात्रियों को हो रही भारी परेशानियों के बीच मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है। यात्रियों के हित में दाखिल की गई जनहित याचिका में मांग की गई है कि एयरलाइन संकट पर तुरंत सुनवाई की जाए। CJI से हुई मुलाकात याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी. वाई. सूर्यकांत से उनके निवास पर मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने विशेष बेंच की स्थापना और मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की। संकटग्रस्त इंडिगो और DGCA की भूमिका DGCA ने एयरलाइन को कुछ छूट प्रदान करके परिचालन सामान्य करने में मदद की। इसके बावजूद इंडिगो की उड़ानें लगातार चौथे दिन बाधित रहीं। शुक्रवार को एयरलाइन ने 1,000 से अधिक उड़ानें रद्द की, जिससे यात्रियों को गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ा। दूसरी एयरलाइन्स ने किराए बढ़ा दिए, वहीं ट्रेनों में भी भीड़ बढ़ गई। DGCA ने इस मामले की जांच और आकलन के लिए चार सदस्यीय समिति गठित की है। इसमें शामिल हैं: ➤ संयुक्त महानिदेशक संजय के ब्रम्हाने ➤ उप महानिदेशक अमित गुप्ता ➤ वरिष्ठ उड़ान संचालन निरीक्षक कैप्टन कपिल मांगलिक ➤ उड़ान संचालन निरीक्षक कैप्टन रामपाल याचिका में दावा: मानवीय संकट और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन याचिका में कहा गया है कि पायलटों के FDTL नियमों की योजना में गड़बड़ी के कारण यात्रियों को मानवीय संकट का सामना करना पड़ा है। याचिकाकर्ता ने अनुच्छेद 21 के तहत यात्रियों के अधिकारों का उल्लंघन बताया और वैकल्पिक यात्रा तथा मुआवजे की मांग की। स्पेशल ट्रेने और उड़ानों से संकट दूर करने में मिलेगी मदद ➤ इस संकट को कम करने के लिए अन्य उपाय भी किए जा रहे हैं: ➤ SpiceJet ने 100 अतिरिक्त उड़ानें शुरू की हैं। ➤ रेलवे ने कई स्पेशल ट्रेनों की घोषणा की है। ➤ 37 ट्रेनों में 116 अतिरिक्त कोच लगाए जा रहे हैं। ➤ नागर विमानन मंत्रालय 24 घंटे कंट्रोल रूम से फ्लाइट ऑपरेशन, अपडेट और किराए की निगरानी कर रहा है।  

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराज़गी: बीएलओ सुरक्षा पर राज्यों से मांगी जवाबदेही

नई दिल्ली  मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) की मौतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने साफ कहा कि बीएलओ पर बढ़ते काम के बोझ को कम करना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है और इसके लिए अतिरिक्त कर्मचारियों की तैनाती तुरंत की जानी चाहिए। तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टी टीवीके द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी तब आई जब कोर्ट को बताया गया कि देशभर में अब तक 35-40 बीएलओ की मौत अत्यधिक काम के दबाव के कारण हो चुकी है। याचिकाकर्ता ने पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने की मांग भी रखी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि एसआईआर प्रक्रिया एक वैध प्रशासनिक कार्रवाई है जिसे समय पर पूरा किया जाना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा, "अगर कहीं स्टाफ की कमी है, तो अतिरिक्त कर्मचारी नियुक्त करना राज्य का कर्तव्य है।" कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बीमार, असमर्थ या अत्यधिक दबाव में काम कर रहे अधिकारियों को लेकर राज्य सरकारें संवेदनशील रवैया अपनाएं और तुरंत वैकल्पिक स्टाफ तैनात करें। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया है कि अतिरिक्त कर्मचारियों की नियुक्ति करें ताकि बीएलओ के कार्य घंटे कम किए जा सकें। जहां 10,000 कर्मचारी मौजूद हैं, वहां आवश्यकता पड़ने पर 20,000 से 30,000 कर्मियों की तैनाती भी की जा सकती है। यदि कोई बीएलओ या कर्मचारी व्यक्तिगत कारणों, बीमारी या गंभीर परिस्थिति में ड्यूटी से छूट चाहता है, तो सक्षम अधिकारी केस-टू-केस आधार पर राहत दे सकते हैं। छूट मिलने पर उसकी जगह तुरंत किसी अन्य कर्मचारी को नियुक्त किया जाए। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि कई राज्यों से ऐसे मामले सामने आए हैं जहां बीएलओ ने काम के अत्यधिक दबाव, लंबी ड्यूटी और संसाधनों की कमी के कारण आत्महत्या कर ली। इस पर सीजेआई ने कहा, "यह बेहद गंभीर मामला है। जिस भी राज्य में ऐसा हो रहा है, वहां प्रशासन को तुरंत कार्रवाई करनी होगी।" तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टी टीवीके ने एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाने या इसे संशोधित करने की मांग करते हुए कहा कि बीएलओ पर इतना अधिक बोझ डाला जा रहा है कि कई लोग तनाव में आकर जान गंवा रहे हैं। याचिका में कोर्ट से बीएलओ परिवारों को मुआवजा दिलवाने का अनुरोध भी किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने दिया कड़ा संदेश: हुनर गोल्ड के पीड़ितों के लिए पहले 200 करोड़ जमा करना अनिवार्य

 नई दिल्ली देश के विभिन्न राज्यों में सोना और ज्वेलरी की कथित हेराफेरी के मामलों में घिरे हुनर गोल्ड कंपनी के संचालक ललित सोनी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. सोनी ने देशभर में दर्ज सभी आपराधिक मामलों को एक ही राज्य में स्थानांतरित करने के लिए शीर्ष अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था, लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका सुनने से ही साफ इनकार कर दिया. CJI की कड़ी टिप्पणी: पूरे देश को ठगा और अब राहत चाहते हैं? मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने सुनवाई के दौरान बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कहा, 'आपने इतने लोगों को ठगा है… पूरे देश को ठगा है… और अब यहां आकर मामलों के एकीकरण की मांग कर रहे हैं? क्या आप चाहते हैं कि जिसे आपने सिलिगुड़ी में धोखा दिया, वो ट्रायल के लिए मुंबई आए?'  कोर्ट ने आगे कहा कि यदि सोनी को अपनी याचिका पर सुनवाई चाहिए तो पहले वे 200 करोड़ रुपये सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करें. CJI ने स्पष्ट किया कि जब तक यह राशि जमा नहीं होती, तब तक याचिका पर कोई विचार नहीं किया जाएगा. देशभर में कई FIR, सोने की बड़ी हेराफेरी का आरोप ललित सोनी पर आरोप है कि उन्होंने अपनी कंपनी हुनर गोल्ड के ज़रिए कई राज्यों में लोगों और कॉरपोरेट संस्थाओं से सोना, ज्वेलरी और निवेश लेकर भारी पैमाने पर धोखाधड़ी की. विभिन्न राज्यों के पुलिस थानों में उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं. सोनी की तरफ से दलील दी गई कि दर्जनों FIR और मुकदमों के चलते ट्रायल में व्यावहारिक दिक्कतें पैदा हो रही हैं, इसलिए सभी केस एक ही राज्य में स्थानांतरित कर दिए जाएं. लेकिन कोर्ट ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ कोर्ट ने दो टूक कहा कि पीड़ितों को ट्रायल के लिए एक ही जगह बुलाना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा. साथ ही ये भी संकेत दिया कि गंभीर आर्थिक अपराधों में आरोपी व्यक्ति 'सुविधा' के नाम पर राहत नहीं पा सकता.

SC का बड़ा आदेश: डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी पर CBI जांच, बैंकों की संलिप्तता की होगी पड़ताल

नई दिल्ली  देश भर में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बहुत सारे फ्रॉड हुए हैं। कभी दारोगा, कभी कमिश्नर तो कभी सीबीआई, ईडी जैसी एजेंसियों के नाम पर डराकर लोगों को डिजिटल अरेस्ट करने की धमकियां दी गई हैं और उससे बचाने के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये ट्रांसफर करा लिए गए। ऐसे मामलों को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट सख्त हुआ है और उसने सीबीआई से ऐसे सारे मामलों की जांच करने का आदेश दिया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि एजेंसी देश भर में हुए डिजिटल फ्रॉड के केसों की जांच करे। यही नहीं अदालत ने एजेंसी को बैंकों की भूमिका की जांच करनी होगी। इसके लिए एजेंसी को फ्रीहैंड है।

वक्फ संपत्तियों पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी चेतावनी—‘UMEED’ पर डेटा न अपलोड किया तो भुगतनी पड़ेगी सजा

नई दिल्ली  वक्फ की संपत्तियों की डीटेल 'UMEED' पोर्टल पर अपलोड करने की समय सीमा बढ़ाने से सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा है कि वे संबंधित ट्राइब्यूनल में जाकर अपनी बात रखें। बता दें कि समय सीमा बढ़ाने वाली याचिकाओं में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोल्ड (AIMPLB) और AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी की याचिका भी शामिल थी। वक्फ संपत्तियों का ब्यौरा पोर्टल पर अपलोड करने के लिए 5 दिसंबर तक का समय दिया गया है। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो संबंधित व्यक्ति या संस्था को सजा भी हो सकती है।   इससे पहले 15 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 को पूरी तरह से स्थगित करने से इनकार कर दिया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कुछ प्रावधानों पर रोक लगाई थी। नियमों के मुताबिक वक्फ संपत्ति ना अपलोड करने वालों को छह माह की सजा और 20 हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। जो लोग संपत्तियों को पोर्टल पर दर्ज नहीं करवाएंगे उनकी संपत्ति का दर्जा खत्म कर दिया जाएगा और बाद में केवल वक्फ ट्राइब्यूनल के आदेश पर ही दोबारा पंजीकरण किया जा सकेगा।  

‘सीनियर’ टैग का मतलब यह नहीं कि… सुप्रीम कोर्ट ने सुनाई दो-टूक हिदायत

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर वकीलों को किसी भी बेंच के समक्ष मामलों का मौखिक उल्लेख करने पर रोक लगा दी है। यह फैसला हाल के महीनों में अनौपचारिक रूप से अपनाई जा रही प्रथा को औपचारिक रूप प्रदान करने वाला है। कोर्ट ने स्थगन और तत्काल मामलों की लिस्टिंग के लिए प्रक्रिया निर्धारित करने वाला एक सर्कुलर जारी किया है। इसके अनुसार, जमानत या जमानत रद्द करने, मृत्युदंड, हेबियस कॉर्पस, विध्वंस या अंतरिम राहत से संबंधित सभी नए मामले अगले 2 कार्य दिवसों के भीतर लिस्ट किए जाएंगे। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि किसी भी कोर्ट के समक्ष मौखिक उल्लेख के लिए किसी सीनियर वकील को इजाजत नहीं दी जाएगी। इसके बजाय, युवा जूनियर वकीलों को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। अत्यंत तत्काल प्रकृति के मामले में क्या होगा अगर कोई मामला अत्यंत तत्काल प्रकृति का हो, जैसे अग्रिम जमानत, मृत्युदंड, हेबियस कॉर्पस, बेदखली या विध्वंस से जुड़ा और निर्धारित तारीख पर लिस्टिंग का इंतजार न कर सके, तो प्रोफॉर्मा के साथ एक पत्र अधिकारी को सुबह 10:30 बजे से पहले सौंपना होगा। अनावश्यक स्थगनों को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से भी कोर्ट ने निर्देश दिए। एससी की ओर से कहा गया कि मामले का स्थगन केवल परिवार में मृत्यु, अधिवक्ता या पक्षकार-व्यक्ति की चिकित्सा, स्वास्थ्य स्थिति या कोर्ट को संतुष्ट करने वाले अन्य वास्तविक कारणों के मामलों में ही स्वीकार किया जाएगा। यह कदम न्यायिक प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित और पारदर्शी बनाने की दिशा में उठाया गया है, जिससे तत्काल मामलों का निपटारा तेजी से हो सके।  

केरल में खुलेंगे नए स्कूल, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को तय समय में नीति लाने को कहा

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए केरल की स्कूल शिक्षा पर चिंता जताई। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि शत प्रतिशत साक्षरता का दावा करने वाला राज्य अगर इस स्थिति में है, तो ये बहुत चिंताजनक है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा में कोई कमी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा है कि उन सभी इलाकों में जहां पहले से कोई सरकारी लोअर प्राइमरी या प्राइमरी स्कूल नहीं है, वहां नए स्कूल खोले जाएं, जिससे हर बच्चे को पढ़ाई का मौका मिले। कोर्ट ने साफ कहा कि तीन महीने के अंदर सरकार को इसके लिए एक पॉलिसी तैयार करनी होगी।  सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जहां भी हर 1 किलोमीटर के दायरे में कोई लोअर प्राइमरी स्कूल नहीं है और हर 3 किलोमीटर के दायरे में कोई अपर प्राइमरी स्कूल नहीं है, वहां नए स्कूल खोले जाएं। अगर स्कूल के लिए कोई बिल्डिंग मौजूद नहीं है तो अस्थाई तौर पर प्राइवेट बिल्डिंग का इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही स्थायी स्कूल भवनों के लिए बजट का भी इंतजाम करना जरूरी है। इसके अलावा, कोर्ट ने ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी भी तय की।  अदालत ने कहा कि पंचायतें अपनी तरफ से उपलब्ध जमीन की जानकारी सरकार को दें ताकि नए स्कूलों के लिए जगह मिल सके। स्कूलों में टीचरों की कमी न हो, इसके लिए रिटायर्ड टीचरों को अस्थायी तौर पर नियुक्त किया जा सकता है, जब तक नए टीचरों की भर्ती पूरी नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार को स्पष्ट आदेश दिया है कि हर क्षेत्र में सरकारी स्कूल होने चाहिए, जिससे कोई भी बच्चा शिक्षा के अधिकार से वंचित न रहे। इसके लिए अब सरकार को तीन महीने के अंदर एक पॉलिसी तैयार करनी होगी। हालांकि, सरकार के लिए यह चुनौती भी है कि वह जल्दी से जल्दी योजना तैयार करे, बजट का प्रावधान करे और नए स्कूल खोलने की प्रक्रिया शुरू करे।

SC ने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर कहा—राज्यपाल विधेयक लंबित नहीं रख सकते, समयसीमा तय नहीं

नई दिल्ली उच्चतम न्यायालय ने प्रेसिडेंशियल रफेरेंस पर फैसला सुनाते हुए कहा गवर्नर द्वारा बिलों को मंज़ूरी देने के लिए टाइमलाइन तय नहीं की जा सकती. "डीम्ड असेंट" का सिद्धांत संविधान की भावना और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ है. कोर्ट ने कहा चुनी हुई सरकार कैबिनेट को ड्राइवर की सीट पर होना चाहिए, ड्राइवर की सीट पर दो लोग नहीं हो सकते लेकिन गवर्नर का कोई सिर्फ़ औपचारिक रोल नहीं होता. गवर्नर, प्रेसिडेंट का खास रोल और असर होता है. गवर्नर के पास बिल रोकने और प्रोसेस को रोकने का कोई अधिकार नहीं है. वह मंज़ूरी दे सकता है, बिल को असेंबली में वापस भेज सकता है या प्रेसिडेंट को भेज सकता है. बता दें प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की संविधान पीठ ने 10 दिनों तक दलीलें सुनने के बाद 11 सितंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था. गवर्नर या प्रेसिडेंट काम अपने पास लेना न्याय के दायरे में नहीं आता सुप्रीम कोर्ट ने कहा गवर्नर या प्रेसिडेंट काम अपने पास लेना न्याय के दायरे में नहीं आता. ज्यूडिशियल रिव्यू तभी होता है जब बिल एक्ट बन जाता है. तमिलनाडु फैसला  न्याय के दायरे में नहीं आता.  सबसे कठोर सिद्धांत यह है कि बिल के स्टेज पर कोई भी  मंज़ूरी को चुनौती दे सकता है.  हम यह भी साफ़ करते हैं कि जब बिल आर्टिकल 200 के तहत गवर्नर द्वारा रिज़र्व किया जाता है तो प्रेसिडेंट रिव्यू मांगने के लिए बाउंड नहीं हैं. अगर बाहरी विचार में, प्रेसिडेंट रिव्यू मांगना चाहते हैं, तो वह मांग सकते हैं, हालांकि, जो सवाल उठता है वह यह है कि जब गवर्नर मंज़ूरी नहीं देते हैं तो क्या समाधान है. जबकि कार्रवाई की मेरिट्स पर विचार नहीं किया जा सकता. कोर्ट द्वारा जांच किए जाने पर, लंबे समय तक, अनिश्चित, बिना किसी कारण के कार्रवाई न करने पर सीमित न्यायिक जांच होगी. सरकार को ड्राइवर की सीट पर होना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ के निर्णय के मुताबिक चुनी हुई सरकार यानी कैबिनेट को ड्राइवर की सीट पर होना चाहिए. ड्राइवर की सीट पर दो लोग नहीं हो सकते. लेकिन गवर्नर का कोई सिर्फ औपचारिक रोल नहीं होता. गवर्नर, प्रेसिडेंट का खास रोल और असर होता है. गवर्नर के पास बिल रोकने और प्रोसेस को रोकने का कोई अधिकार नहीं है. वह मंजूरी दे सकता है. बिल को असेंबली में वापस भेज सकता है या प्रेसिडेंट को भेज सकता है.  विधेयक के अधिनियम बनने के बाद ही न्यायिक समीक्षा लागू की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने कहा कि विधेयक के अधिनियम बनने के बाद ही न्यायिक समीक्षा लागू की जा सकती है. गवर्नर की ओर से बिलों को मंजूरी देने के लिए टाइमलाइन तय नहीं की जा सकती. 'डीम्ड असेंट' का सिद्धांत संविधान की भावना और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ है.  SC ने कहा- 'बिना वजह की अनिश्चित देरी न्यायिक जांच के दायरे में आ सकती है' सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में राज्यपाल के लिए समयसीमा तय करना संविधान की ओर से दी गई लचीलेपन की भावना के खिलाफ है. पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल के पास केवल तीन संवैधानिक विकल्प हैं- बिल को मंजूरी देना, बिल को दोबारा विचार के लिए विधानसभा को लौटाना या उसे राष्ट्रपति के पास भेजना. राज्यपाल बिलों को अनिश्चितकाल तक रोककर विधायी प्रक्रिया को बाधित नहीं कर सकते. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि न्यायपालिका कानून बनाने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकती, लेकिन यह स्पष्ट किया कि- 'बिना वजह की अनिश्चित देरी न्यायिक जांच के दायरे में आ सकती है.' जानें सुुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा राष्ट्रपति और राज्यपाल को अपने पास पेंडिंग बिल पर फैसला लेने के समयसीमा में बांधने के मसले पर राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए प्रेसिडेंसियल रेफरेंस पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का फैसला इस तरह है- 1. SC ने कहा गवर्नर द्वारा बिलों को मंज़ूरी देने के लिए टाइमलाइन तय नहीं की जा सकती.  2. "डीम्ड असेंट" का सिद्धांत संविधान की भावना और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ है. 3.SC ने कहा चुनी हुई सरकार- कैबिनेट को ड्राइवर की सीट पर होना चाहिए– ड्राइवर की सीट पर दो लोग नहीं हो सकते…लेकिन गवर्नर का कोई सिर्फ़ औपचारिक रोल नहीं होता. 4. आर्टिकल 142 प्रयोग कर सुप्रीम कोर्ट विधेयकों को मंजूरी नहीं दे सकता। यह राज्यपाल और राष्ट्रपति का अधिकार क्षेत्र में आता है. 5. SC ने कहा कि विधानसभा से पारित विधेयक को राज्यपाल अगर अपने पास रख लेता है, वह संघवाद के खिलाफ होगा. हमारी राय है कि राज्यपाल को विधेयक को दोबारा विचार के लिए लौटाना चाहिए. 6. सामान्य तौर पर राज्यपाल को मंत्रिमण्डल की सलाह पर काम करना होता है. लेकिन विवेकाधिकार से जुड़े मामले में वह खुद भी फैसला ले सकता है. 7. गवर्नर, प्रेसिडेंट का खास रोल और असर होता है 8. गवर्नर के पास बिल रोकने और प्रोसेस को रोकने का कोई अधिकार नहीं है। वह मंज़ूरी दे सकता है, बिल को असेंबली में वापस भेज सकता है या प्रेसिडेंट को भेज सकता है। 9. जब गवर्नर काम न करने का फैसला करते हैं, तो संवैधानिक  कोर्ट ज्यूडिशियल रिव्यू कर सकते हैं। कोर्ट मेरिट पर कुछ भी देखे बिना गवर्नर को काम करने का लिमिटेड निर्देश दे सकते हैं। कोर्ट ने कहा- समयसीमा तय करना शक्तियों के विभाजन को कुचलना होगा कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चित काल तक रोक कर नहीं रख सकते, लेकिन समयसीमा तय करना शक्तियों के विभाजन को कुचलना होगा।     कोर्ट ने कहा, "राज्यपाल अनंतकाल तक विधेयक रोककर नहीं बैठ सकते। समयसीमा लागू नहीं की जा सकती। संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 में लचीलापन रखा गया है। इसलिए किसी समयसीमा को राज्यपाल या राष्ट्रपति पर थोपना संविधान के ढांचे के खिलाफ है। यह शक्तियों के पृथक्करण के खिलाफ है।"      1. 'डीम्ड असेंट' का सिद्धांत संविधान की भावना और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ है।     2. चुनी हुई सरकार को ड्राइवर सीट पर होना चाहिए। इस सीट पर 2 लोग नहीं हो सकते। हालांकि, राज्यपाल की भूमिका केवल औपचारिक … Read more