samacharsecretary.com

सुप्रीम कोर्ट ने दिया अहम निर्णय: शादी के आधार पर संपत्ति से बेदखल करने का पिता का कदम रद्द

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के अधिकार को लेकर एक अहम फैसला दिया है. उसने टेस्टेटर (वसीयत करने वाले) की इच्छा को सर्वोपरि मानते हुए एक पिता की वसीयत को वैध ठहराया है, जिसमें उन्होंने अपनी बेटी शैला जोसेफ को समुदाय से बाहर के लड़के से शादी करने के कारण संपत्ति से वंचित कर दिया था. यह मामला लैंगिक समानता के कई ऐतिहासिक फैसलों के बावजूद वसीयत की स्वतंत्रता को अहमियत देता है. जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने केरल हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसलों को पलट दिया, जिन्होंने वसीयत को दरकिनार करते हुए एनएस श्रीधरन की संपत्ति को नौ बच्चों में बराबर बांटने का आदेश दिया था. रिपोर्ट के मुताबिक श्रीधरन के नौ बच्चे थे, लेकिन 1988 में बनाई गई उनकी रजिस्टर्ड वसीयत में शैला को छोड़कर बाकी आठ बच्चों को संपत्ति सौंप दी गई थी. वजह थी शैला का समुदाय से बाहर शादी करना. जजमेंट लिखते हुए जस्टिस चंद्रन ने कहा कि वसीयत स्पष्ट रूप से साबित हो चुकी है, इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता. हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले रद्द किए जाते हैं. शैला जोसेफ का अपने पिता की संपत्ति पर कोई दावा नहीं है, क्योंकि वसीयत से यह संपत्ति अन्य भाई-बहनों को सौंप दी गई है. कोर्ट में शैला की ओर से सीनियर एडवोकेट पीबी कृष्णन ने तर्क दिया कि उनकी क्लाइंट को कम से कम 1/9 हिस्सा मिलना चाहिए, जो संपत्ति का नगण्य हिस्सा है. लेकिन बेंच ने स्पष्ट किया कि संपत्ति के बंटवारे में व्यक्ति की इच्छा के मामले में समानता का सवाल उठता ही नहीं. हम इक्विटी (न्यायसंगत बंटवारे) पर नहीं हैं. टेस्टेटर की इच्छा सर्वोपरि है. उसकी अंतिम वसीयत से विचलन या उसे निरस्त नहीं किया जा सकता. वसीयत लिखने वाली की इच्छा सर्वोपरि कोर्ट ने यह भी कहा कि वसीयत के कंटेंट पर सावधानी का नियम लागू नहीं होता, क्योंकि यह व्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है कि वह अपनी संपत्ति कैसे बांटे. अगर वसीयत से सभी वारिसों को वंचित किया जाता, तभी कोर्ट सावधानी बरत सकता था. लेकिन यहां केवल एक बेटी को बाहर किया गया है और इसके लिए स्पष्ट वजह बताई गई है. बेंच ने टिप्पणी की कि वंचित करने की वजह बताई गई है, लेकिन उसकी स्वीकार्यता हमारे लिए सावधानी का नियम नहीं तय करती. हम टेस्टेटर की जगह खुद को नहीं रख सकते. हम अपनी राय थोप नहीं सकते; उनकी इच्छा उनकी अपनी वजहों से प्रेरित है. फैसले में सिविल अपीलों को मंजूर करते हुए शैला की पार्टिशन सूट को खारिज कर दिया गया. मामला केरल का है, जहां श्रीधरन की मौत के बाद 1990 में भाई-बहनों ने इंजेक्शन सूट दाखिल किया था और वसीयत की कॉपी पेश की थी. शैला ने उसमें हिस्सा नहीं लिया, जिसे कोर्ट ने बाद में उनके खिलाफ माना.

अरावली की ढलान पर खनन को हरी झंडी! SC के फैसले से पर्यावरण पर मंडराया बड़ा खतरा

अरावली देश में पिछले कुछ वर्षों से खनन के जरिए पहाड़ों को काटने का सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले ने पर्यावरण से जुड़े बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने खनन से जुड़ा एक अहम फैसला सुनाया, जिसके तहत 100 मीटर तक ऊंचाई वाले पहाड़ों पर खनन की अनुमति दी गई है। यह फैसला खासतौर पर राजस्थान और अरावली पर्वतमाला के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह फैसला पूरी तरह लागू हुआ, तो राजस्थान में रेगिस्तान का क्षेत्र बढ़ सकता है। अरावली पर्वतमाला पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला अरावली पर्वतमाला को राजस्थान की लाइफ लाइन कहा जाता है, लेकिन अब यह लाइफ लाइन खतरे में नजर आ रही है। पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अरावली पर्वत का क्षेत्र तेजी से सिकुड़ रहा है। कोर्ट के अनुसार, अरावली का लगभग 90% हिस्सा अब 100 मीटर से कम ऊंचाई का रह गया है, 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले क्षेत्र को अब पर्वत नहीं, सिर्फ भूभाग माना जाएगा,  इसका सीधा मतलब यह है कि इन इलाकों में खनन के रास्ते खुल सकते हैं। क्या राजस्थान में बढ़ेगा रेगिस्तान? पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट में बताया गया कि अरावली पर्वतमाला अब पहले जैसी ऊंची नहीं रही। अरावली मरुस्थल के विस्तार को रोकने में प्राकृतिक दीवार का काम करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अरावली में खनन बढ़ा, तो: मरुस्थल का विस्तार तेजी से होगा, मानसून की हवाएं कमजोर पड़ेंगी, प्रदेश में बारिश कम होगी। अरावली की ऊंचाई घटने से मानसून सिस्टम भी प्रभावित हो रहा है, जिससे राजस्थान के मौसम में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। राजस्थान की पहचान है अरावली पर्वतमाला अरावली पर्वतमाला को दुनिया की सबसे पुरानी वलित पर्वतमालाओं में से एक माना जाता है। अरावली की कुल लंबाई: 692 किलोमीटर राजस्थान में हिस्सा: करीब 550 किलोमीटर सबसे ऊंची चोटी: गुरु शिखर (माउंट आबू) – ऊंचाई 1727 मीटर अरावली तीन राज्यों—दिल्ली, राजस्थान और गुजरात—से होकर गुजरती है। राजस्थान की अधिकांश नदियों का उद्गम भी अरावली पर्वतमाला से ही होता है, इसलिए इसे प्रदेश की लाइफ लाइन कहा जाता है। अरावली कमजोर होने से क्या होंगे नुकसान अगर अरावली पर्वतमाला का क्षरण इसी तरह जारी रहा, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं: राजस्थान में मरुस्थल का तेजी से विस्तार गर्म हवाओं का असर और बढ़ेगा बंगाल की खाड़ी से आने वाला मानसून कमजोर पड़ेगा भूकंप के झटकों का असर बढ़ सकता है अरावली से निकलने वाली नदियां सूख सकती हैं खेती और फसलों पर बुरा असर पड़ेगा प्रदेश की जलवायु और भौगोलिक संतुलन बिगड़ जाएगा बारिश का सिस्टम हो रहा है प्रभावित पर्यावरण विशेषज्ञ और राजस्थान विश्वविद्यालय की भूगोल विभाग की वरिष्ठ प्रोफेसर के अनुसार, अरावली की ऊंचाई कम होने से राजस्थान का वर्षा तंत्र बिगड़ रहा है। पहले मानसून की हवाएं अरावली से टकराकर पूर्वी राजस्थान में बारिश करती थीं, लेकिन अब अरावली कमजोर होने के कारण हवाएं पश्चिमी राजस्थान की ओर निकल जा रही हैं। इससे पूरे प्रदेश का वर्षा संतुलन गड़बड़ा रहा है, जो बेहद चिंताजनक स्थिति है। कैसे शुरू हुआ अरावली का क्षरण अरावली पर्वतमाला के क्षरण की शुरुआत 1990 के दशक में हुई। इसके मुख्य कारण बताए जा रहे हैं: तेजी से शहरीकरण दिल्ली और राजस्थान में बड़े निर्माण कार्य पत्थर और खनिजों के लिए अंधाधुंध खनन पेड़ों की कटाई स्थिति बिगड़ने पर 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली में अवैध खनन पर रोक लगाई थी, लेकिन अब नए फैसले के बाद एक बार फिर पर्यावरण को लेकर चिंता बढ़ गई है।  

हादसों पर जवाब से नाखुश सुप्रीम कोर्ट, NHAI से की तीखी टिप्पणी

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की ओर से दायर हलफनामे पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि हलफनामे में ठेकेदारों और स्थानीय अधिकारियों पर कीचड़ उछालने का प्रयास किया गया है। सड़क हादसे के लिए कौन जिम्मेदार है? सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि वह जानना चाहता है कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की शक्तियां क्या हैं और इसके लिए कौन जिम्मेदार है? सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल से सवाल किया कि इस मामले का सही उपाय क्या हो सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह की घटनाएं भविष्य में न दोहराई जाएं और सर्दियों में कोहरे के कारण होने वाली दुर्घटनाओं पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने कहा कि हाईवे पर भारी अतिक्रमण है, खासकर जब वे शहरों और कस्बों से गुजरते हैं। कई हाईवे का इस्तेमाल शहर की सड़कों के तौर पर भी किया जाता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के पास गति सीमा और सुरक्षा संबंधित नियम हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राजमार्गों पर ढाबे अवैध हैं और उन्हें हटाना एनएचएआई के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन इसका कार्यान्वयन स्थानीय जिला मजिस्ट्रेट और नगर निगमों पर निर्भर है। इस वजह से भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि यदि शहरों से होकर गुजरने वाले राजमार्गों पर भारी अतिक्रमण होता है तो एनएचएआई को इसके समाधान के लिए गंभीर कदम उठाने चाहिए। कोर्ट ने यह भी पूछा कि एनएचएआई की ओर से बनाए गए नियमों का पालन क्यों नहीं किया जा रहा और किसकी जिम्मेदारी है। इसके साथ ही बेंच ने यह सुझाव दिया कि एक एडवोकेट कमिश्नर को इस क्षेत्र का निरीक्षण करने के लिए भेजा जाए और वहां की स्थिति का वीडियो तैयार किया जाए। कोर्ट ने एनएचएआई से विस्तृत रिपोर्ट की मांग की और कहा कि केवल नियमों का ड्राफ्ट प्रस्तुत करने से काम नहीं चलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजमार्गों पर अतिक्रमण और सुरक्षा संबंधी मुद्दे हर जगह एक जैसे हैं, और इसका समाधान जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह पूरे भारत में हाईवे सुरक्षा के लिए व्यापक आदेश जारी करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से मौजूदा अतिक्रमण की स्थिति बताने वाली गूगल इमेज भी शेयर करने को कहा है ताकि उचित कदम उठाए जा सकें। बता दें कि राजस्थान के फालौदी और तेलंगाना-बीजापुर हाईवे पर हुए भीषण सड़क हादसे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिए गए स्वतः संज्ञान मामले पर सुनवाई हुई।

‘कुछ तो गलत है’—SC ने मद्रास हाई कोर्ट की कार्यवाही पर जताई गंभीर आपत्ति

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने मामलों की लिस्टिंग और सुनवाई में अपनाए जा रहे नियमों पर मद्रास हाई कोर्ट पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने करूर भगदड़ के बाद हाई कोर्ट की भूमिका पर अपनी जांच तेज कर दी है और कहा है कि जिस तरह से हाई कोर्ट ने इस त्रासदी से जुड़े मामलों को संभाला, उसमें कुछ गड़बड़ है। इस घटना में एक्टर से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कजगम (TVK) के एक राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान 41 लोगों की जान चली गई थी।   जस्टिस जेके माहेश्वरी और विजय बिश्नोई की बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा सब्मिट की गई एक रिपोर्ट की जांच करने के बाद यह टिप्पणी की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर में मांगा था। सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल उठाया था कि करूर मदुरै बेंच के अधिकार क्षेत्र में आने के बावजूद हाई कोर्ट की चेन्नई बेंच ने इस मामले को कैसे हैंडल किया। रिपोर्ट को पार्टियों के बीच सर्कुलेट करने का आदेश दिया गया, और बेंच ने उनसे जवाब मांगा। रजिस्ट्रार जनरल की एक्सप्लेनेशन को देखने के बाद, बेंच ने कमेंट किया: "हाई कोर्ट में कुछ गलत हो रहा है। यह सही बात नहीं है जो हाई कोर्ट में हो रही है… रजिस्ट्रार जनरल ने एक रिपोर्ट भेजी है।" सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई सवाल उठाए थे, जिनमें यह भी शामिल था कि चेन्नई बेंच ने करूर से जुड़े मामले में दखल क्यों दिया, उसने एक ऐसी याचिका पर पूरी तरह से तमिलनाडु पुलिस अधिकारियों की एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) का गठन कैसे किया, जिसमें सिर्फ राजनीतिक रैलियों के लिए गाइडलाइंस मांगी गई थीं और हाई कोर्ट की दो बेंचों से विरोधाभासी आदेश क्यों आए, जबकि मदुरै बेंच ने उसी दिन जांच को सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) को ट्रांसफर करने से मना कर दिया था। तमिलनाडु की ओर से पेश हुए सीनियर वकील पी. विल्सन ने कोर्ट से कहा, "हमारे हाई कोर्ट में, जो भी मामला कोर्ट के सामने आता है, उससे जुड़ी हर बात पर वे आदेश देते हैं…" इस पर जस्टिस माहेश्वरी ने जवाब दिया, "अगर कोई प्रैक्टिस गलत है।" बेंच ने 13 अक्टूबर के अपने आदेश के एक हिस्से में बदलाव करने की मौखिक रिक्वेस्ट को भी ठुकरा दिया, जिसमें निर्देश दिया गया था कि सीबीआई जांच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज अजय रस्तोगी की अध्यक्षता वाली तीन-सदस्यीय समिति करेगी। आदेश के अनुसार, जस्टिस रस्तोगी को तमिलनाडु कैडर के दो सीनियर आईपीएस अधिकारियों को चुनना होगा जो उस राज्य के मूल निवासी न हों।  

CJI सूर्यकांत की कड़ी टिप्पणी: ‘ऐसी याचिकाएं लेना बंद कीजिए’, आखिर क्या था मामला?

नई दिल्ली  देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच आज भी मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इस मामले में लगातार दायर हो रही याचिकाओं पर सीजेआई ने नाराजगी जताते हुए कहा कि ये सब पब्लिसिटी पाने के लिए किया जा रहा है। CJI सूर्यकांत ने कहा कि हमें सिर्फ SIR जैसे बड़े मामलों पर फोकस न रहकर बल्कि आम आदमी से जुड़े मुकदमों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। इस दौरान उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा, “रेलवे एक्सीडेंट का मामला देख लीजिए… एक व्यक्ति की ट्रैक पर मौत हो गई… हमने कुछ मुआवजा दिया फिर भी वारिसों को कुछ नहीं मिला। मुआवजा न मिलने पर वे कहीं गायब हो गए। अब हमने उन्हें ढूँढ़ निकाला और फिर पक्का किया कि उन्हें पैसे मिलें.. सोचिए उस विधवा के चेहरे पर मुस्कान कैसी होगी?”   इसी बीच, CJI सूर्यकांत ने कहा, "अब हर मामले में बार के सदस्यों को एक टाइमलाइन देनी होगी क्योंकि कुछ मामले जो ज़रूरी लगते हैं, वे कोर्ट का सारा समय ले लेते हैं और कई जरूरी खासकर MACT मामले में याचिकाकर्ताओं को समय नहीं मिल पाता है।" उन्होंने कहा, “मैं इस कोर्ट में सभी मामलों के लिए समय का बराबर बंटवारा चाहता हूँ, SIR जैसे जरूरी मामलों में पूरा दिन लग जाता है, जो पिटीशनर मुआवज़े के मामलों वगैरह के लिए आते हैं, वे आखिरी लाइन में बैठे रहते हैं और शाम 4 बजे बिना सुनवाई के घर वापस चले जाते हैं, वे नहीं जानते कि उनका नंबर कब आएगा?”   इसके बाद CJI सूर्यकांत ने कहा, "मैं रजिस्ट्री को इस मामले में (SIR केस में) कोई और नई याचिका स्वीकार न करने का निर्देश दे रहा हूँ। कई लोग अब सिर्फ़ पब्लिसिटी के लिए आ रहे हैं। अब किसी नए मामले की ज़रूरत नहीं है। मुझे ऐसा कहते अफसोस हो रहा है।" इसके बाद जस्टिस सूर्यकांत ने SIR के मुद्दे पर दायर अलग-अलग राज्यों के मामलों की अलग-अलग सुनवाई करने का फैसला करते हुए सभी राज्यों के लिए अलग-अलग तारीखें भी तय कर दीं। UP, केरल के मामले 18 दिसंबर को सुने जाएंगे CJI ने कहा कि तमिलनाडू का मामला 16 तारीख को सुना जाएगा। इस बीच सिब्बल बोले, पश्चिम बंगाल का मामला 17 तारीख तक के लिए टाल दिया गया है। CJI ने बिना उस पर ध्यान देते हुए आगे कहा कि बिहार के सभी मामले आज सुने जाएंगे, जबकि असम के मामले 16 को, WB के मामले भी 16 को और UP, केरल के मामले 18 दिसंबर को सुने जाएंगे।  

BLO की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश, SIR में कोई रुकावट बर्दाश्त नहीं

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) कार्य में लगे बूथ स्तर के अधिकारियों (BLOs) को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने चेतावनी दी कि BLOs को धमकाने या उनके काम में बाधा डालने के किसी भी उदाहरण को वह गंभीरता से लेगा। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी गैर-सरकारी संगठन (NGO) सनातनी संसद की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरी के उस आरोप के बाद आई, जिसमें उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में मतदाता गणना के काम के दौरान BLOs को धमकाया जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस मुद्दे को अखिल भारतीय आयाम देते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। पीठ ने कहा, "यह केवल पश्चिम बंगाल के बारे में नहीं है, बल्कि सभी राज्यों के लिए है। चुनाव आयोग (EC) के काम में असहयोग एक गंभीर मुद्दा है। BLOs को पूरी सुरक्षा मिलनी चाहिए।" कोर्ट ने कहा, "अगर चुनाव आयोग को BLOs की सुरक्षा और संरक्षा के संबंध में राज्य के अधिकारियों या पुलिस से असहयोग की कोई शिकायत है, तो उसे सुप्रीम कोर्ट से संपर्क करना चाहिए। हम उचित आदेश पारित करेंगे।" CJI की अगुवाई वाली बेंच ने कहा, "हम BLOs की रक्षा के लिए कड़ी कार्रवाई करेंगे। उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए, अन्यथा अराजकता होगी।" कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब मांगते हुए चुनाव आयोग को सभी राज्यों में स्थिति का आकलन करने और जरूरत पड़ने पर उचित निर्देश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने को कहा। अदालत में BLOs पर काम के बोझ और तनाव पर भी चर्चा हुई, जिसका संदर्भ कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी के उस बयान से मिलता है जिसमें उन्होंने BLOs की मौत का आरोप लगाते हुए SIR को बंद करने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 4 दिसंबर के अपने आदेश का उल्लेख किया, जिसमें राज्यों को निर्देश दिया गया था कि जो BLOs तनावग्रस्त हैं या स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उन्हें SIR कार्य से हटने की अनुमति दी जाए और पर्याप्त प्रतिस्थापन प्रदान किया जाए। चुनाव आयोग ने कहा कि एक BLO को 37 दिनों में अधिकतम 1,200 मतदाताओं की गणना करनी होती है, यानी लगभग 35 मतदाता प्रति दिन। आयोग ने सवाल किया, "क्या यह बहुत अधिक काम है?" जस्टिस बागची ने कहा, "यह डेस्क जॉब नहीं है जहां 35 का कोटा आसानी से पूरा हो जाता है। एक BLO को घर-घर जाकर गणना प्रपत्रों का सत्यापन करना होता है और फिर उसे अपलोड करना होता है। इसमें तनाव और शारीरिक थकान हो सकती है। हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जमीनी स्तर पर SIR बिना किसी रुकावट के हो।" जस्टिस बागची ने पश्चिम बंगाल में BLOs के खिलाफ धमकी के आरोपों को साबित करने के लिए सनातनी संसद द्वारा प्रस्तुत सामग्री पर भी सवाल उठाया। जस्टिस बागची ने पूछा, "एकमात्र FIR के अलावा, आरोपों की पुष्टि के लिए कोई अन्य विश्वसनीय सबूत नहीं है। क्या एक अकेली घटना के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह केवल पश्चिम बंगाल में हो रहा है, अन्य राज्यों में नहीं? क्या यह एक तरफा बयानबाजी नहीं है? क्या सभी राज्यों की पुलिस को चुनाव आयोग के अधीन कर दिया जाना चाहिए?" राज्य सरकारों का विरोध: EC के वकील ने कहा कि पश्चिम बंगाल के साथ-साथ तमिलनाडु और केरल में भी समस्याएँ आ रही हैं, क्योंकि वहाँ की राज्य सरकारों ने SIR के प्रति अपना विरोध सार्वजनिक कर दिया है। यह मामला दिखाता है कि कैसे मतदाता सूची पुनरीक्षण का कार्य न केवल तकनीकी और प्रशासनिक है, बल्कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक गंभीर राजनीतिक और कानूनी विवाद का विषय बन गया है।

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्देश: BLO से संबंधित सभी नियम पूरे देश में लागू

नई दिल्ली एसआईआर के कार्य में लगे बीएलओ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा निर्देश दिया है. शीर्ष अदालत ने कहा है कि BLO से जुड़े सभी निर्देश पूरे देश में लागू होंगे. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं में बीएलओ की सुरक्षा और प्रशासनिक निर्देश पूरे देश में लागू होंगे, ये सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं हैं. मामले की सुनवाई कर रहे सीजेआई की बेंच ने कहा कि प्रभावित कर्मचारी को स्वतंत्रता होगी कि वे राज्य के चुनाव आयोग, जिले के जिला निर्वाचन अधिकारी से संपर्क करें. जिला अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि राज्य सरकार आवश्यक अनुपालन करें. पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ये निर्देश दिए गए. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश अलग-अलग राज्यों की याचिकाओं को अलग-अलग श्रेणी में विभाजित किया जाए, ताकि मुख्य मुद्दे पर सुनवाई सुचारू रूप से हो सके. तीन अलग-अलग राज्यों से संबंधित SIR मामलों को अगले हफ्ते तीन अलग-अलग तारीखों पर सूचीबद्ध किया जाए. सुनवाई के दौरान उठे मुद्दे वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि यूपी जैसा बड़ा राज्य तय टाइमलाइन में SIR पूरा नहीं कर पाएगा. इस पर CJI ने यूपी की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए कहा कि अगले मंगलवार को सुनवाई होगी. CJI ने फिर दोहराया, “आप लोग इसी तरह नई-नई याचिकाएं लाते रहेंगे, तो मुख्य केस की सुनवाई कैसे होगी?” तमिलनाडु का पक्ष तमिलनाडु SIR मुद्दे पर एक वकील ने कहा कि राज्य के प्रवासी मजदूर पोंगल के बाद ही लौटते हैं, इसलिए अदालत को इसे ध्यान में रखना चाहिए. अदालत ने स्पष्ट किया कि वह पहले बिहार मामले को प्राथमिकता देगी, क्योंकि उसमें होने वाला निर्णय सभी राज्यों को प्रभावित करेगा. बीएलओ की सुरक्षा पर चिंता चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जमीनी स्तर पर बीएलओ को मिल रही धमकियां गंभीर मुद्दा बन सकती हैं. इनकी सुरक्षा नजरअंदाज नहीं की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है. उसने कहा कि बीएलओ से जुड़े निर्देश देश भर में लागू होंगे. इस सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने कहा कि बीएलओ की सुरक्षा राज्य पुलिस के सहयोग पर निर्भर है. जरूरत पड़ी तो केंद्रीय बल तैनात किए जा सकते हैं. प्रभावित कर्मचारी राज्य ECI और जिला निर्वाचन अधिकारी से सुरक्षा के लिए संपर्क कर सकेंगे. मतदाता नामांकन और नागरिकता से जुड़े मामलों की अगली सुनवाई 17 तारीख को होगी.

इंडिगो विवाद में सुप्रीम दखल नहीं होगा: कोर्ट ने सरकार पर छोड़ा मामला

नई दिल्ली इंडिगो संकट पर सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने से इनकार कर दिया है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अभी सरकार कदम उठा रही है। हम फिलहाल मामले में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। सीजेआई ने कहा कि हम समझते हैं कि लाखों लोग इस समस्या का सामना कर रहे हैं, लेकिन सरकार मामले को देख रही है। उन्हें ही इसे संभालने दें। दरअसल पिछले 7 दिन से देशभर के एयरपोर्ट्स पर इंडिगो की फ्लाइट लगातार कैंसिल हो रही है। इससे लाखों यात्रियों को काफी परेशानी हो रही है। इंडिगो संकट को लेकर देश के शीर्ष न्यायालय में याचिका दायर की गई थी। मामले की सुनवाई करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि अभी सरकार कदम उठा रही है। हालत जस के तस होते तो अलग बात थी। उन्हें ही इसे संभालने दें। वहीं याचिकाकर्ता ने वकील ने कहा कि 2500 उड़ानें विलंबित हैं और 95 हवाई अड्डे प्रभावित हैं। सुप्रीम कोर्ट के वकील नरेंद्र मिश्रा ने जनहित याचिका दायर कर पूरे संकट पर कोर्स से स्वतः संज्ञान लेने और तुरंत हस्तक्षेप की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर प्रभावित यात्रियों के लिए वैकल्पिक यात्रा और मुआवजे की मांग की गई है। कोर्ट में दायर याचिका में यात्रियों को भारी परेशानी और मानवीय संकट पैदा होने का दावा किया और इस पर त्वरित हस्तक्षेप की मांग की गई। 6 दिसंबर को सीजेआई के घर पहुंचे थे याचिकाकर्ता के वकील 6 दिसंबर को याचिकाकर्ता के वकील CJI सूर्यकांत के घर पहुंचे और उनसे इस मामले में तत्काल सुनवाई करने की मांग की। फ्लाइट के कैंसिल होने पर सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल की गई। वकील नरेंद्र मिश्रा ने कहा कि जस्टिस सूर्यकांत ने हमारी याचिका देखी और स्टाफ को इस मामले के लिए निर्देश दिया है। उन्होंने बताया कि सीजेआई के स्टाफ ने ओएसडी कुंतल शर्मा पाठक का नंबर मुझे दिया है। सीजेआई की ओर से आश्वासन दिया गया था कि मामले पर जल्द सुनवाई की जाएगी। ऐसे में आज याचिका को लेकर सुनवाई होनी है। याचिका में यात्रियों को भारी परेशानी और मानवीय संकट पैदा होने की बात कही गई है। 7वें दिन भी 350 से अधिक फ्लाइट कैंसिल इधर यात्रियों पर इंडिगो का टॉर्चर जारी है। केंद्र सरकार के अल्टीमेटम के बाद भी देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो की उड़ान सेवाएं सोमवार को भी पटरी पर नहीं लौट सकीं हैं। आज (8 दिसंबर) सातवें दिन भी सुबह 10 बजे तक 350 से अधिक फ्लाइट कैंसिल हो चुकी है। दिल्ली, श्रीनगर, हैदराबाद, बेंगलुरु एयरपोर्ट से 350 से ज्यादा फ्लाइट कैंसिल हो चुकी हैं। दिल्ली (IGI) और मुंबई दोनों ही प्रमुख हवाई अड्डों पर IndiGo के यात्री सोमवार को भी भी फ्लाइट रद्द होने होने से परेशान दिखे। दरअसल देश की सबसे बड़ी एयरलाइन ने रविवार को 650 से अधिक उड़ानें रद्द कर दी थी, हालांकि यह संख्या दो दिन पहले के 1000 से अधिक कैंसिलेशन से कम है। दिल्ली एयरपोर्ट (IGI) ने यात्रियों को सलाह दी है कि वे एयरपोर्ट आने से पहले अपनी उड़ानों की ताजा स्थिति चेक कर लें। एयरपोर्ट ने कहा कि उनकी टीमें दिक्कतों को कम करने के लिए सभी हितधारकों के साथ मिलकर काम कर रही हैं।

इंडिगो फ्लाइट विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का रुख, याचिकाकर्ता ने मांगी तुरंत सुनवाई

नई दिल्ली इंडिगो एयरलाइन के लगातार उड़ान रद्द होने और यात्रियों को हो रही भारी परेशानियों के बीच मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है। यात्रियों के हित में दाखिल की गई जनहित याचिका में मांग की गई है कि एयरलाइन संकट पर तुरंत सुनवाई की जाए। CJI से हुई मुलाकात याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी. वाई. सूर्यकांत से उनके निवास पर मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने विशेष बेंच की स्थापना और मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की। संकटग्रस्त इंडिगो और DGCA की भूमिका DGCA ने एयरलाइन को कुछ छूट प्रदान करके परिचालन सामान्य करने में मदद की। इसके बावजूद इंडिगो की उड़ानें लगातार चौथे दिन बाधित रहीं। शुक्रवार को एयरलाइन ने 1,000 से अधिक उड़ानें रद्द की, जिससे यात्रियों को गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ा। दूसरी एयरलाइन्स ने किराए बढ़ा दिए, वहीं ट्रेनों में भी भीड़ बढ़ गई। DGCA ने इस मामले की जांच और आकलन के लिए चार सदस्यीय समिति गठित की है। इसमें शामिल हैं: ➤ संयुक्त महानिदेशक संजय के ब्रम्हाने ➤ उप महानिदेशक अमित गुप्ता ➤ वरिष्ठ उड़ान संचालन निरीक्षक कैप्टन कपिल मांगलिक ➤ उड़ान संचालन निरीक्षक कैप्टन रामपाल याचिका में दावा: मानवीय संकट और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन याचिका में कहा गया है कि पायलटों के FDTL नियमों की योजना में गड़बड़ी के कारण यात्रियों को मानवीय संकट का सामना करना पड़ा है। याचिकाकर्ता ने अनुच्छेद 21 के तहत यात्रियों के अधिकारों का उल्लंघन बताया और वैकल्पिक यात्रा तथा मुआवजे की मांग की। स्पेशल ट्रेने और उड़ानों से संकट दूर करने में मिलेगी मदद ➤ इस संकट को कम करने के लिए अन्य उपाय भी किए जा रहे हैं: ➤ SpiceJet ने 100 अतिरिक्त उड़ानें शुरू की हैं। ➤ रेलवे ने कई स्पेशल ट्रेनों की घोषणा की है। ➤ 37 ट्रेनों में 116 अतिरिक्त कोच लगाए जा रहे हैं। ➤ नागर विमानन मंत्रालय 24 घंटे कंट्रोल रूम से फ्लाइट ऑपरेशन, अपडेट और किराए की निगरानी कर रहा है।  

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराज़गी: बीएलओ सुरक्षा पर राज्यों से मांगी जवाबदेही

नई दिल्ली  मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) की मौतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने साफ कहा कि बीएलओ पर बढ़ते काम के बोझ को कम करना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है और इसके लिए अतिरिक्त कर्मचारियों की तैनाती तुरंत की जानी चाहिए। तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टी टीवीके द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी तब आई जब कोर्ट को बताया गया कि देशभर में अब तक 35-40 बीएलओ की मौत अत्यधिक काम के दबाव के कारण हो चुकी है। याचिकाकर्ता ने पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने की मांग भी रखी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि एसआईआर प्रक्रिया एक वैध प्रशासनिक कार्रवाई है जिसे समय पर पूरा किया जाना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा, "अगर कहीं स्टाफ की कमी है, तो अतिरिक्त कर्मचारी नियुक्त करना राज्य का कर्तव्य है।" कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बीमार, असमर्थ या अत्यधिक दबाव में काम कर रहे अधिकारियों को लेकर राज्य सरकारें संवेदनशील रवैया अपनाएं और तुरंत वैकल्पिक स्टाफ तैनात करें। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया है कि अतिरिक्त कर्मचारियों की नियुक्ति करें ताकि बीएलओ के कार्य घंटे कम किए जा सकें। जहां 10,000 कर्मचारी मौजूद हैं, वहां आवश्यकता पड़ने पर 20,000 से 30,000 कर्मियों की तैनाती भी की जा सकती है। यदि कोई बीएलओ या कर्मचारी व्यक्तिगत कारणों, बीमारी या गंभीर परिस्थिति में ड्यूटी से छूट चाहता है, तो सक्षम अधिकारी केस-टू-केस आधार पर राहत दे सकते हैं। छूट मिलने पर उसकी जगह तुरंत किसी अन्य कर्मचारी को नियुक्त किया जाए। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि कई राज्यों से ऐसे मामले सामने आए हैं जहां बीएलओ ने काम के अत्यधिक दबाव, लंबी ड्यूटी और संसाधनों की कमी के कारण आत्महत्या कर ली। इस पर सीजेआई ने कहा, "यह बेहद गंभीर मामला है। जिस भी राज्य में ऐसा हो रहा है, वहां प्रशासन को तुरंत कार्रवाई करनी होगी।" तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टी टीवीके ने एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाने या इसे संशोधित करने की मांग करते हुए कहा कि बीएलओ पर इतना अधिक बोझ डाला जा रहा है कि कई लोग तनाव में आकर जान गंवा रहे हैं। याचिका में कोर्ट से बीएलओ परिवारों को मुआवजा दिलवाने का अनुरोध भी किया गया है।