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आवारा पशुओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राज्यों व एजेंसियों को कार्रवाई के आदेश

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के मामले में सुनवाई करते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अहम निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने कहा है कि सभी आवारा पशुओं को सड़कों, राज्य के हाईवे और राष्ट्रीय राजमार्गों से हटाया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे लेकर राज्यों के साथ-साथ राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और नगरपालिकाओं को भी निर्देश जारी किया है। इतना ही नहीं कोर्ट ने निर्देश दिया है कि आवारा पशुओं को हटाने के लिए हाईवे निगरानी टीमें बनाई जाएं जो उन्हें पकड़ कर सड़कों से हटाएगी और शेल्टर होम्स में रखेगी। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में आगे आवारा कुत्तों के मुद्दे पर भी आदेश जारी किया। कोर्ट ने कहा कि सभी शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों, बस और रेलवे स्टेशनों से आवारा कुत्तों को हटाया जाए और उन्हें शेल्टर होम में जगह दी जाए। साथ ही उन्हें टीकाकरण के बाद भी उसी इलाके में न छोड़े जाने के निर्देश दिए गए हैं।   सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों- जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान कुत्तों के काटने के मामलों में चौंकाने वाली बढ़ोतरी की बात कही और आदेश दिया कि अधिकारी आवारा कुत्तों को पकड़ने के बाद उन्हें शेल्टर में टीके दिए जाएं। इसके बाद उन्हें पुरानी जगहों पर न छोड़ा जाए। इसके अलावा सार्वजनिक जगहों पर आवारा कुत्तों के दोबारा न घुसने देने के इंतजाम भी तय हों। कोर्ट इस मामले में अगली सुनवाई 13 जनवरी को करेगी।  

SC ने नहीं दी राहत! अब्दुल्ला आज़म पर फर्जी दस्तावेज़ केस में होगी आगे जांच

रामपुर  समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व विधायक अब्दुल्ला आजम खान को सुप्रीम कोर्ट से करारा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज फर्जी दस्तावेज मामले में एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज कर दी है। FIR रद्द करने का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं: SC जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने कहा कि अब्दुल्ला आजम की याचिका में एफआईआर रद्द करने का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी को अपना काम करने दिया जाना चाहिए और इस स्तर पर अदालत का हस्तक्षेप उचित नहीं होगा। फर्जी दस्तावेज मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त बता दें कि अब्दुल्ला आजम पर आरोप है कि उन्होंने पासपोर्ट बनवाने के लिए गलत जन्मतिथि और फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया। इसके अलावा, उनके पास दो पैन कार्ड होने के आरोप भी हैं। इसी मामले को लेकर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एफआईआर रद्द करने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता और इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है। गौरतलब है कि अब्दुल्ला आजम पहले से ही कई मामलों का सामना कर रहे हैं, जिनमें कुछ में जांच जारी है।  

उसे ढूंढ निकालो! — महादेव बेटिंग ऐप मामले में सुप्रीम कोर्ट का ईडी को कड़ा निर्देश

नई दिल्ली महादेव बेटिंग ऐप घोटाले में फरार चल रहे सह-संस्थापक रवि उप्पल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे आरोपी कानून और जांच एजेंसियों के साथ खेल नहीं सकते। कोर्ट ने उप्पल की याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की, यह चौंकाने वाला मामला है, अदालत को अब कुछ करना ही होगा। उसे ढूंढ निकालो। दुबई से भी फरार हुआ आरोपी रवि उप्पल, जो लंबे समय से दुबई में रह रहा था, भारतीय एजेंसियों के प्रत्यर्पण प्रयासों के बीच वहां से भी फरार हो गया। अब उसकी मौजूदगी का कोई स्पष्ट सुराग नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच जस्टिस एम.एम. सुंद्रेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने ईडी को उसकी तलाश की जिम्मेदारी सौंपी है। अदालत ने कहा कि उप्पल की पहुंच काफी लंबी है, तभी वह लगातार जगह बदल रहा है। ईडी का पक्ष और कोर्ट की प्रतिक्रिया अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने अदालत को बताया कि रवि उप्पल को 2023 में दुबई में हिरासत में लिया गया था, लेकिन वह दुबई की जेल से भी फरार हो गया है। इस पर जस्टिस सुंद्रेश ने सख्त लहजे में कहा, वह हर बार भाग नहीं सकता। अंततः उसे इस प्रक्रिया का हिस्सा बनना ही पड़ेगा। साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत के सवाल पर हम नरमी बरतने को तैयार हैं, लेकिन सही समय आने पर ही उस पर विचार किया जाएगा। महादेव ऐप घोटाला महादेव बेटिंग ऐप कथित रूप से एक ऑनलाइन सट्टेबाज़ी नेटवर्क है, जिसके जरिए देशभर में हजारों करोड़ रुपए के लेन-देन किए गए। ईडी का आरोप है कि ऐप के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग, टैक्स चोरी और विदेशी निवेश नियमों का उल्लंघन किया गया। रवि उप्पल और उसका सहयोगी सौरभ चंद्राकर इस पूरे नेटवर्क के कथित मास्टरमाइंड बताए जाते हैं।

आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई, फैसले की तारीख घोषित

सुप्रीम कोर्ट ने तय की तारीख, आवारा कुत्तों के शिकार लोगों की भी सुनी जाएगी बात आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई, फैसले की तारीख घोषित सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों के मामलों की सुनवाई, पीड़ितों की सुनाई जाएगी राय नईदिल्ली  आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर संबंधित मामले के आदेशों के अनुपालन में चूक होती है तो मुख्य सचिवों को फिर से पेश होना पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि अब मुख्य सचिवों की प्रत्यक्ष उपस्थिति जरूरी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह उन लोगों की भी सुनवाई करेगा जिनको कुत्तों ने काटा है और इसके बाद सात नवंबर को आदेश पारित करेगा। वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि अधिकतर राज्यों ने अनुपालन हलफनामे दायर कर दिए हैं। कोर्ट ने केरल के मुख्य सचिव द्वारा दायर छूट के अनुरोध वाले आवेदन को अनुमति दे दी है और कहा इस बात को संज्ञान में लिया कि प्रमुख सचिव अदालत में उपस्थित हैं। इसके अलावा भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड को इस मामले में पक्षकार बनाने को कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश स पूछा कि पिछली तारीख पर अनुपान हलफानामा क्यों नहीं दाखिल किया गया? बता दें कि पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल और तेलंगाना को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को उसके समक्ष उपस्थित रहने का निर्देश दिया था। जस्टिस विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की तीन सदस्यीय विशेष पीठ को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि अधिकतर राज्यों ने अपने अनुपालन हलफनामे दाखिल कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ने 27 अक्टूबर को मामले की सुनवाई करते हुए पश्चिम बंगाल और तेलंगाना को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को तीन नवंबर को उसके समक्ष उपस्थित होकर यह बताने का निर्देश दिया था कि अदालत के 22 अगस्त के आदेश के बावजूद अनुपालन हलफनामे क्यों नहीं दायर किए गए। पीठ ने अपने आदेश का पालन नहीं करने पर नाराजगी व्यक्त की थी और कहा था कि 27 अक्टूबर तक पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) को छोड़कर किसी भी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ने अनुपालन हलफनामे दायर नहीं किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने 22 अगस्त को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियमों के अनुपालन के लिए उठाए जा रहे कदमों के बारे में पूछा था।  

देशभर की अदालतों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट नाराज, कहा– अब बनेगा आरोप तय करने का एक समान नियम

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को देशभर की अदालतों में आपराधिक मामलों में आरोप तय करने में हो रही लंबी देरी पर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि यह देरी न्याय प्रणाली की दक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। कई बार आरोपी सालों तक जेल में बंद रहते हैं, लेकिन मुकदमा शुरू ही नहीं हो पाता। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि देशभर में कई ऐसे केस हैं, जिनमें चार्जशीट दाखिल हुए 3-4 साल हो गए, लेकिन मुकदमा शुरू ही नहीं हुआ। अदालत ने साफ संकेत दिया कि वह अब इस समस्या पर पूरे देश के लिए समान दिशानिर्देश जारी करने पर विचार कर रही है, ताकि इस प्रणालीगत देरी को समाप्त किया जा सके। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा को अमाइकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) नियुक्त किया है। साथ ही भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अटॉर्नी जनरल से भी इस विषय पर न्यायालय की सहायता करने को कहा गया है। अदालत ने बिहार राज्य के वकील को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया है। पीठ एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपी करीब दो साल से जेल में था। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि चार्जशीट 2023 में दाखिल की गई थी, लेकिन अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं। इस पर जस्टिस अरविंद कुमार ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, "दीवानी मामलों में मुद्दे तय नहीं होते, आपराधिक मामलों में आरोप तय नहीं होते। आखिर कठिनाई क्या है? अगर यह स्थिति जारी रही, तो हम पूरे देश के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करेंगे।" सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 251(बी) में यह प्रावधान है कि सत्र न्यायालय के मामलों में पहली सुनवाई से 60 दिनों के भीतर आरोप तय किए जाने चाहिए, लेकिन अदालतों में इसका पालन नहीं हो रहा।

मुख्य न्यायाधीश गवई ने उत्तराधिकारी के तौर पर जस्टिस सूर्य कांत का नाम आगे बढ़ाया

नई दिल्ली भारत के मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई के रिटायरमेंट के बाद अगले सीजेआई को चुने जाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। खबर है कि सीजेआई गवई ने अपने उत्तराधिकारी के तौर पर जस्टिस सूर्य कांत का नाम आगे बढ़ा दिया है। गवई 23 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उन्होंने जस्टिस संजीव खन्ना के रिटायरमेंट के बाद पद संभाला था। सीजेआई गवई ने केंद्र सरकार से जस्टिस कांत के नाम की सिफारिश की है। वरिष्ठता के आधार पर जस्टिस कांत भारत के 53वें सीजेआई बन जाएंगे। सरकार जल्द ही इसके संबंध में अधिसूचना जारी कर सकती है। जस्टिस कांत करीब 14 महीने तक इस पद पर रहेंगे और 9 फरवरी 2027 में रिटायर होंगे। रिपोर्ट के अनुसार, सीजेआई गवई जल्द ही सिफारिश पत्र की एक कॉपी जस्टिस कांत को भी सौंप देंगे। दरअसल, केंद्र सरकार ने जस्टिस गवई से अपना उत्तराधिकारी चुनने के लिए कहा था। अखबार से बातचीत में सीजेआई ने जस्टिस कांत को कमान संभालने के लिए हर मामले में उपयुक्त बताया था। दस फरवरी 1962 को जन्मे न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने 1981 में हरियाणा के हिसार स्थित सरकारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की और 1984 में महार्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने 1984 में हिसार जिला न्यायालय से अधिवक्ता के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और अगले वर्ष पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में कामकाज शुरू किया। वर्ष 2000 में वे हरियाणा के महाधिवक्ता बने और 2001 में उन्हें सीनियर एडवोकेट के रूप में नामित किया गया। उसी वर्ष वे पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने। बाद में वे 2018 में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हुए और 2019 में उन्हें उच्चतम न्यायालय में पदोन्नत किया गया। उच्चतम न्यायालय में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण निर्णयों में भूमिका निभाई, जिनमें अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण को संवैधानिक ठहराने वाले संविधान पीठ के निर्णय में उनकी भागीदारी भी शामिल है। उन्होंने संविधान, मानवाधिकार और लोकहित से जुड़े एक हजार से अधिक निर्णयों में योगदान दिया है। वर्तमान में वे राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के पदेन कार्यकारी अध्यक्ष हैं और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ, रांची के विजिटर भी हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के कानून पर जताई चिंता, धर्मांतरण पर कड़ा रुख और सेकुलरिज़्म की पुष्टि

लखनऊ  उत्तर प्रदेश में लागू धर्मांतरण विरोधी कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि इस कानून के माध्यम से अपना धर्म बदलने के इच्छुक लोगों की राह को कठिन बनाया गया है। इसके अलावा जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने किसी के धर्म परिवर्तन करने की प्रक्रिया में सरकारी अधिकारियों की संलिप्तता और हस्तक्षेप को लेकर भी चिंता जताई। बेंच ने कहा कि ऐसा लगता है कि कानून इसलिए बनाया गया है कि किसी के धर्म परिवर्तन करने की प्रक्रिया में सरकारी मशीनरी के दखल को बढ़ाया जा सके। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यूपी के धर्मांतरण विरोधी कानून की वैधता पर फिलहाल अदालत विचार नहीं कर सकती। बेंच ने यह भी याद दिलाया कि भारत एक सेकुलर देश है और कोई भी अपनी इच्छा के अनुसार धर्मांतरण कर सकता है। बेंच ने कहा, 'इस मामले में उत्तर प्रदेश धर्मांतरण अधिनियम के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर विचार करना हमारे दायरे में नहीं आता। फिर भी हम यह मानने से खुद को नहीं रोक सकते कि धर्मांतरण से पहले और बाद में घोषणा से संबंधित नियम जो बनाए गए हैं, वह किसी व्यक्ति की ओर से दूसरे धर्म को अपनाने की औपचारिकता कठिन करने वाले हैं। यह स्पष्ट है कि इन नियमों के माध्यम से धर्मांतरण की प्रक्रिया में अधिकारियों का दखल बढ़ा दिया गया है। यहां तक कि जिला मजिस्ट्रेट को कानूनी रूप से धर्मांतरण के प्रत्येक मामले में पुलिस जांच का निर्देश देने के लिए बाध्य किया गया है।' इसके अलावा अदालत ने धर्मांतरण के बाद घोषणा करने की अनिवार्यता पर भी सवाल उठाया। बेंच ने कहा कि कौन किस धर्म को स्वीकार कर रहा है, यह उसका निजी मामला है। इस संबंध में घोषणा करने की बाध्यता तो निजता के खिलाफ है। बेंच ने कहा, 'यह सोचने की बात है कि आखिर क्या जरूरत है कि कोई बताए कि उसने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया है और अब वह किस मजहब को मानता है। इस पर विचार करने की जरूरत है कि क्या यह नियम निजता के प्रावधान का उल्लंघन नहीं है।' अदालत ने कहा- संविधान के मूल ढांचे में धर्मनिरपेक्षता शामिल राज्य में धर्मांतरण की कठोर प्रक्रिया को लेकर बेंच ने कहा कि यह ध्यान देना जरूरी है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना और धर्मनिरपेक्ष प्रकृति क्या कहती है। अदालत ने कहा कि हमारे संविधान की प्रस्तावना अत्यंत महत्वपूर्ण है और संविधान को उसकी 'महान और दिव्य' दृष्टि के पढ़ना चाहिए। उसके अनुसार ही व्याख्या होनी चाहिए। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि यद्यपि 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द 1976 में एक संशोधन के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया था, फिर भी धर्मनिरपेक्षता संविधान के मूल ढांचे का एक अभिन्न अंग है, जैसा कि 1973 के केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के निर्णय में कहा गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट घोटाले पर खुद लिया संज्ञान, सरकारों से मांगा जवाब

नई दिल्ली देशभर में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट स्कैम के मामलों पर अब सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार (MHA सेक्रेटरी), सीबीआई, हरियाणा सरकार और अंबाला के साइबर क्राइम विभाग को नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीशों के फर्जी हस्ताक्षरों के साथ जारी किए गए फर्जी न्यायिक आदेश न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास की नींव को हिला देते हैं। यह कार्य न केवल कानून के शासन पर हमला है बल्कि न्यायपालिका की गरिमा पर सीधा प्रहार भी है। वरिष्ठ नागरिक दंपति की शिकायत से शुरू हुआ मामला यह कार्रवाई उस शिकायत के बाद हुई जिसमें एक वरिष्ठ नागरिक दंपति से पिछले महीने डिजिटल अरेस्ट स्कैम के जरिए उनकी जीवनभर की बचत ठगी गई थी। इस गंभीर घटना को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस पर संज्ञान लिया। जांच की स्थिति रिपोर्ट मांगी सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार और अंबाला साइबर क्राइम के एसपी से अब तक हुई जांच की स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के साइबर अपराधों पर सख्त कदम जरूरी हैं ताकि लोगों का भरोसा डिजिटल व्यवस्था पर बना रहे।

दिल्ली में पटाखों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, तय किए इतने दिन का समय

नई दिल्ली दिवाली के त्योहार से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट  ने दिल्ली-एनसीआर  के निवासियों को एक बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने क्षेत्र में ग्रीन पटाखों की बिक्री पर लगी रोक को 25 अक्टूबर तक के लिए हटा दिया है। यह फैसला मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण की अध्यक्षता वाली पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के सुझावों पर विचार करने के बाद लिया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से सिफारिश की थी कि पटाखों के उत्पादकों और त्योहार के मद्देनजर लोगों को यह अस्थायी राहत दी जानी चाहिए। कोर्ट ने उनकी सिफारिश को मानते हुए यह आदेश जारी किया है। यह छूट विशेष रूप से ग्रीन पटाखों के लिए दी गई है जो पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण फैलाते हैं। यह आदेश 25 अक्टूबर तक प्रभावी रहेगा जिससे दिवाली के दौरान लोग ग्रीन पटाखों का इस्तेमाल कर सकेंगे। यह फैसला दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण की चिंताओं और त्योहार के मौके पर लोगों की भावनाओं के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।  

अमित शाह बोले जयपुर में: 2027 से सुप्रीम कोर्ट तक न्याय तीन साल में संभव

जयपुर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जयपुर के JECC (जयपुर एग्जिबिशन एंड कंवेंशन सेंटर) में तीन नए आपराधिक कानूनों पर आधारित राज्य स्तरीय प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लागू किए गए तीन नए आपराधिक कानूनों – भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के पूरी तरह लागू होने में अभी दो वर्ष और लगेंगे, लेकिन 2027 से देशभर में दर्ज होने वाली एफआईआर पर तीन साल के भीतर सुप्रीम कोर्ट तक न्याय मिलने की व्यवस्था इन कानूनों से सुनिश्चित की जाएगी। शाह ने कहा कि यह केवल कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि देश की न्याय व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन है। उन्होंने इसे ईज ऑफ लिविंग के साथ-साथ ईज ऑफ जस्टिस की दिशा में एक बड़ा कदम बताया। उन्होंने यह भी कहा कि पहले पुलिस द्वारा पकड़े गए 100 में से केवल 42 अपराधियों को सजा मिलती थी, जो अब बढ़कर 60 प्रतिशत हो गई है, और कानूनों के पूर्ण क्रियान्वयन के बाद यह आंकड़ा 90 प्रतिशत तक पहुंचाया जाएगा। गृह मंत्री ने डीजीपी की तारीफ की उन्होंने कहा, "हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली अब दंड से नहीं, न्याय से प्रेरित होकर काम करेगी। देश की जनता को समय पर और सुलभ न्याय मिल सके, इसके लिए गृह मंत्रालय राज्यों को मार्गदर्शन और सहयोग दे रहा है।"शाह ने राजस्थान पुलिस महानिदेशक राजीव शर्मा के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने इन कानूनों को लागू कराने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने प्रदर्शनी के विस्तार की मांग करते हुए कहा कि इसे दीपावली के बाद तक जारी रखा जाए, ताकि पुलिसकर्मी, वकील और विधि छात्र इसमें आकर नए कानूनों की जानकारी ले सकें। 9600 करोड़ के कामों का शिलान्यास इस अवसर पर गृहमंत्री ने राइजिंग राजस्थान ग्लोबल इन्वेस्टमेंट समिट 2024 के अंतर्गत मिले निवेश प्रस्तावों में से 4 लाख करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट्स की नींव रखी और करीब 9600 करोड़ रुपए के 1100 विकास कार्यों का लोकार्पण और शिलान्यास किया। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम विकास और न्याय का समन्वय है। कार्यक्रम में पीएम सूर्य घर योजना के तहत 150 यूनिट मुफ्त बिजली योजना के रजिस्ट्रेशन की भी शुरुआत की गई। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने इस मौके पर कहा कि नए कानून स्वतंत्र भारत की न्याय प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन का प्रतीक हैं और आज भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी शर्तों पर बोलता है। राजस्थान के डीजीपी राजीव शर्मा ने इसे आज़ादी के बाद देश का एक ऐतिहासिक कदम बताया और गृहमंत्री अमित शाह को देश का सबसे लंबे समय तक कार्यरत गृह मंत्री बताते हुए उनके नेतृत्व में धारा 370 और नक्सल समस्या के समाधान को रेखांकित किया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश  बोले- प्रदर्शनी से उपयोगी जानकारी मिलेगी प्रदर्शनी से आमजन को होगा फायदा राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा ने कहा- इस प्रदर्शनी से आमजन को नए कानूनों की उपयोगिता के संबंध में जानकारी प्राप्त होगी। कानून केवल दंड का माध्यम नहीं बल्कि समाज को सही दिशा देने का मजबूत आधार भी है।