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UN पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: शरणार्थी मुद्दे पर आलोचना और सख्त आदेश

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी द्वारा भारत में प्रवासियों को 'शरणार्थी कार्ड' जारी करने की प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी की है। जस्टिस कांत ने कहा, “उन्होंने यहां शोरूम खोल रखा है और प्रमाणपत्र बांट रहे हैं।” यह टिप्पणी उस समय आई जब न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ सूडान के एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो वर्ष 2013 से भारत में रह रहा है। ऑस्ट्रेलिया में शरण की कोशिश लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने बताया कि उसकी पत्नी और बच्चे को संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) द्वारा 'शरणार्थी कार्ड' जारी किए गए हैं। उसका कहना था कि वह ऑस्ट्रेलिया में शरण लेने की प्रक्रिया में है और इस दौरान भारत में उसे अस्थायी सुरक्षा प्रदान की जाए। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने दलील दी कि जिन व्यक्तियों को UNHCR से 'शरणार्थी कार्ड' मिले हैं, उन्हें गृह मंत्रालय और विदेशी नागरिक पंजीकरण कार्यालय (FRO) द्वारा अलग तरीके से देखा जाता है। मुरलीधर ने यह भी बताया कि रिफ्यूजी कार्ड जारी करने से पहले कड़ी जांच की जाती है और यह प्रक्रिया कई वर्षों तक चलती है। उन्होंने कहा, "इसके लिए दस्तावेज और फॉर्म भरे जाते हैं, जो रिफ्यूजी स्थिति को कुछ महत्व देते हैं।" उन्होंने यहां शोरूम खोल रखा है- जस्टिस सूर्य कांत हालांकि, इस पर न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “उन्होंने (संयुक्त राष्ट्र एजेंसी) यहां शोरूम खोल रखा है, वे प्रमाणपत्र जारी कर रहे हैं… हम उन पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते।” न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने यह भी कहा कि भारत ने अभी तक शरणार्थियों के अधिकारों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय संधि यानी 'रिफ्यूजी कन्वेंशन' पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया, “हमारे देश के आंतरिक कानून में शरणार्थियों के लिए कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।” मुरलीधर ने स्वीकार किया कि भारत ने उस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, लेकिन उन्होंने अदालत को बताया कि पिछले दो महीनों से दिल्ली में अफ्रीकी मूल के लोगों को बिना वजह हिरासत में लिया जा रहा है। उन्होंने कहा, “यह वास्तविक भय और आशंका का विषय है… हम ऑस्ट्रेलिया में शरण पाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं और इसी बीच यह कार्रवाई शुरू हो गई है।” “सीधे ऑस्ट्रेलिया क्यों नहीं चला जाता” इस पर न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि याचिकाकर्ता सीधे ऑस्ट्रेलिया क्यों नहीं चला जाता। मुरलीधर ने उत्तर दिया कि वह ऐसा करना चाहता है, लेकिन तब तक अदालत से अस्थायी संरक्षण की उम्मीद रखता है। हालांकि, पीठ इस पर सहमत नहीं हुई। जस्टिस कांत ने अंतरिम राहत देने में अनिच्छा जताते हुए कहा, "हमें बहुत सावधानी बरतनी होगी। लाखों लोग यहां बैठे हैं। अगर कोई इस तरह का प्रयास करता है, तो…" जब मुरलीधर ने बताया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी इस मामले पर संज्ञान लिया है, तब अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वह आयोग से किसी भी आगे की दिशा में राहत (जैसे, ‘नो कोर्सिव एक्शन’) की मांग कर सकता है। यह उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष मई माह में न्यायमूर्ति दिपांकर दत्ता की पीठ ने भी रोहिंग्या शरणार्थियों से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि भारत में UNHCR कार्ड के आधार पर कोई राहत नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह कानूनी रूप से मान्य दस्तावेज नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण मामले में कहा- हाईकोर्ट को वापस भेजने का फैसला कल हो सकता है

भोपाल  मध्य प्रदेश में 27% OBC आरक्षण के मुद्दे को लेकर राज्य सरकार ने एक नई टीम बनाई है। सरकार ने सीनियर एडवोकेट और डीएमके सांसद पी विल्सन (senior advocate P Wilson) को हटाकर अब सुप्रीम कोर्ट में सरकार का पक्ष रखने के लिए एक और टीम नियुक्त की है। पहले, विल्सन को सरकार की ओर से हर सुनवाई पर 5.5 लाख रुपए देने थे, क्योंकि वे OBC आरक्षण पर सरकार का पक्ष रख रहे थे। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने टिप्पणी की है कि क्यों न इन मामलों को अंतिम बहस के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया जाए। यह सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए एक बड़ी राहत है, जिनका प्रतिनिधित्व आज सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सांघी ने किया। इसका अर्थ है कि ओबीसी आरक्षण पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा 19/3/2019 को आशिता दुबे मामले में wp 5901/19 में दी गई ओबीसी आरक्षण बढ़ाने पर रोक जारी रहेगी। मध्य प्रदेश सरकार ने आरक्षण के प्रकरणों को फिर बहस के लिए समय के लिए निवेदन किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए प्रकरणों को 9 अक्टूबर को पुनः सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया ! सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना राज्य के 42 परसेंट रिजर्वेशन की याचिकाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि विधान सभा के बनाए गए कानून का उस राज्य की जनसंख्या,भूगोलिक,सामाजिक परिस्थितियों के अंतर्गत परीक्षण हाईकोर्ट करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समस्त अंतरिम आदेश वैकेट करके मामलो को हाईकोर्ट रिमांड करेंगे। ओबीसी वर्ग की ओर से पक्ष रखने वाले वरिष्ठ ओबीसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर व अन्य उपस्थित हुए। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होते ही सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मैटर को मेंशन किया। मेहता ने कहा- इसमें बहुत सारे टेक्निकल पक्ष हैं। इसलिए कहीं न कहीं इसकी सुनवाई में समय लग सकता है। इसके समाधान के लिए क्या तरीका निकाला जाए? क्यों न कुछ और तरह का सॉल्यूशन निकाला जाए। कोर्ट ने कहा- और वक्त मांगेंगे तो दिक्कतें बढ़ेंगी इस पर कोर्ट ने कहा कि आप फिर वक्त मांगेंगे तो और समय जाएगा। दिक्कतें बढ़ेंगी। अगले हफ्ते दीवाली है, छुट्टियां हैं। कोर्ट ने कहा, हम ये चाहते हैं कि ये मैटर हाईकोर्ट के फैसले के बाद हमारे पास आए। सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर पिटीशन पहुंची हैं। इस मामले में हाईकोर्ट का कोई फैसला नहीं हैं। छत्तीसगढ़ की तरह अंतरिम राहत दे सकता है SC सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस तरह छत्तीसगढ़ में अंतरिम लाभ दिया गया था। हो सकता है कि मप्र के मामले में भी अंतरिम राहत दे दें। इस पर याचिकाकर्ताओं ने आपत्ति जताई तो कोर्ट ने कहा कि इस मामले पर जो उपयुक्त समाधान हो सकता है उस पर कल विवेचना करके सुनवाई करेंगे। मामले को वापस हाईकोर्ट भी भेज सकता है सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आप सभी लोग अपने पक्ष बताएं, हो सकता है कि अंतरिम लाभ दे दें या लाभ नहीं भी दें तो हम हाईकोर्ट को डायरेक्ट कर दें। कल आप सब लोग इस बात पर अपने तर्क दें कि इस मामले का कैसे जल्दी समाधान कर सकते हैं। हम इस मामले को हाईकोर्ट भेज दें या अंतरिम राहत देकर हाईकोर्ट भेज दें। क्योंकि हाईकोर्ट को अपने राज्य के बारे में अच्छे से जानकारी होती है। ये रिजर्वेशन का मामला है, इसमें इंदिरा साहनी की कड़ी जरूर है लेकिन ये राज्य से संबंधित मामला है। इसलिए इस मामले में जो सबसे उपयुक्त समाधान हो सकता है उस पर कल सुनवाई करेंगे। कोर्ट ने कहा हम तो चाहते हैं कि कल इस मामले को निपटा ही दें।

सुप्रीम कोर्ट का CBI को कड़ा नोटिस: गिरफ्तारी के लिए जरूरी है कोर्ट का आदेश

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में पुलिस हिरासत में एक आदिवासी शख्स की मौते के मामले में सीबीआई को फटकार लगाई है। कोर्ट ने पूछा है कि इस मामले के आरोपी दो पुलिस अफसरों को पकड़ने के लिए कोर्ट के आदेश की जररूत क्यों है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई से जवाब मांगा है। मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने राज्य सरकार से निलंबित अधिकारियों के खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई के बारे में भी जानकारी देने को कहा है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगाते हुए कहा, आप इतने दिनों में उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं कर पाए? सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन इस तरह नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि हमने कहा था कि हम मुख्य सचिव को आज उपस्थित रहने के लिए कहेंगे, इसलिए आपने कार्रवाई की। आप बताइए कि ऐसा क्यों हुआ। हम इस मामले को बंद नहीं करेंगे। ये मामला जुलाई 2024 में एक आदिवासी युवक देव पारधी की पुलिस हिरासत में मौत से जुड़ा है। मध्य प्रदेश के म्याना पुलिस स्टेशन के दो अधिकारियों पर देव पराधी प्रताड़ित कर मार डालने का आरोप है। आरोप है कि पीड़ित के चाचा, जो एकमात्र चश्मदीद गवाह थे, उन पर भी बेरहमी से हमला किया गया और कथित तौर पर उनकी गवाही को कमज़ोर करने के लिए उन्हें कई मामलों में फसाया गया। इस साल मई में, सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय जांच कई खामियां पाई थीं जिसके बाद, मामला सीबीआई को सौंप दिया और एक महीने के भीतर आरोपियों की गिरफ्तारी का आदेश दिया।चार महीने से ज़्यादा समय तक भी जब गिरफ्तारी नहीं हुई तो पीड़ित परिवार ने अदालत की अवमानना ​​की याचिका के साथ फिर से कोर्ट का रुख किया, जिसमें अदालत के 15 मई के आदेश की जानबूझकर अवज्ञा करने का आरोप लगाया गया। इससे पहले 25 सितंबर को, पीठ ने फरार पुलिस अधिकारियों का वेतन देना जारी रखने और उनको सस्पेंड करने में देरी करने के लिए राज्य की कड़ी आलोचना की थी। वहीं इसके एक दिन बाद कोर्ट ने दो पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तार न करने के लिए मध्य प्रदेश सरकार और सीबीआई को फिर से फटकार लगाई और उन्हें कोर्ट के निर्देशों का पालन करने का एक आखिरी मौका दिया। आज, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल राजा ठाकरे ने कोर्ट को सूचित किया कि दोनों अधिकारियों उत्तम सिंह और संजीव सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया है। सीबीआई की ओर से वरिष्ठ वकील ने कहा, हमने निर्देशों का पालन किया है और दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया है। उत्तम सिंह को इंदौर में गिरफ्तार किया गया था, और संजीव सिंह को 5 अक्टूबर को शिवपुरी में हिरासत में लिया गया था। हालांकि कोर्ट ने कहा कि वह इस बात का सफाई चाहता है कि कोर्ट की अवमानना ​​याचिका दायर होने के बाद ही गिरफ्तारी क्यों हुई।

महादेव सट्टा एप से जुड़े आरोपी रिहाई की राह पर, सुप्रीम कोर्ट ने दी जमानत

रायपुर महादेव सट्टा एप मामले में सभी 12 आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई है. सभी आरोपी बीते ढाई साल से रायपुर जेल में कैद हैं. महादेव ऑनलाइन सट्टा एप मामले में जेल में बंद रितेश यादव, भारत ज्योति, विश्वजीत राय, राहुल वकटे, नीतीश दीवान, भीम सिंह यादव, अर्जुन यादव, चंद्रभूषण वर्मा, सतीश चंद्राकर समेत सभी 12 आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई है. सुप्रीम कोर्ट से दस्तावेज आते ही सभी आरोपियों को जेल से छोड़ दिया जाएगा. कैसे हुई एप की शुरुआत सौरभ चंद्राकर, रवि उप्‍पल और अतुल अग्रवाल ने साल 2016 में महादेव बुक एप लॉन्‍च किया था. शुरुआत में इस एप पर ऑनलाइन सट्टेबाजी होती थी, जिस पर क्रिकेट, फुटबॉल, टेनिस, बैडमिंटन जैसे खेलों के साथ पोकर, तीन पत्‍ती, वर्चुअल गेम यहां तक की चुनाव को लेकर भी भविष्‍यवाणी पर दांव लगाया जाता था. दुबई से संचालित होने वाला यह एप जुआ गतिविधियों के लिए कुख्‍यात हो गया. कैसे बढ़ता गया कारोबार पहले तीन साल में तो एप का ग्राहक आधार 12 लाख तक पहुंचा, लेकिन साल 2020 में इसके फाउंडर्स ने हैदराबाद स्थित रेड्डी अन्ना नामक एक और सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म को 1,000 करोड़ रुपए में खरीद लिया. इसके बाद तो महादेव ऐप के यूजर्स का बेस बढ़कर 50 लाख से भी पार चला गया और कमाई में ताबड़तोड़ बढ़ोतरी होनी शुरू हो गई. एप के संचालकों ने वॉट्सऐप और टेलीग्राम जैसे प्‍लेटफॉर्म से भी अपना बिजनेस खूब बढ़ाया और हजारों करोड़ का कारोबार खड़ा कर दिया. सिंडिकेट के रूप में चलता था एप महादेव एप एक सिंडिकेट के रूप में संचालित होता था, जो विभिन्न अवैध सट्टेबाजी प्लेटफार्मों को एकत्रित करता था. यह पैनल या शाखाओं को सहयोगियों को फ्रेंचाइजी बनाकर काम करता था. इन फ्रेंचाइजी के साथ 70 और 30 के अनुपात में मुनाफा बांटा जाता था. यूजर्स को कॉन्‍टैक्‍ट करने के लिए नंबर दिए जाते जिस पर संपर्क करके आईडी प्राप्‍त कर लेते और दांव लगाने के लिए पैसे जमा करते. जीतने के बाद यूजर्स को एक अलग प्रक्रिया के जरिये पैसे नकद में निकालने की सुविधा मिलती है. कितना होता था मुनाफा यूजर बेस बढ़ने के साथ ही ऐप का मुनाफा और कमाई भी बढ़ने लगी. अनुमान है कि इस ऐप से रोजाना करीब 200 करोड़ रुपए का लाभ होता था. इसकी सफलता का श्रेय यूजर अनुकूल इंटरफेस, विविध सट्टेबाजी विकल्पों और त्वरित लाभ के वादे को जाता है. हालांकि, यूजर्स के साथ हेरफेर भी खूब होता था और जो यूजर लंबे समय तक इसे खेलते उन्‍हें नुकसान पहुंचाने के लिए हेरफेर किया जाता था, ताकि कंपनी का मुनाफा सुनिश्चित हो सके. ऐसे कसा गया शिकंजा महादेव ऐप साल 2022 तक धड़ल्‍ले से चलता रहा, लेकिन इसके बाद इनकम टैक्‍स विभाग और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की नजर पड़ी. ईडी ने बड़े पैमाने पर मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाकर जांच शुरू की और इसके ठिकानों पर छापेमारी शुरू हो गई. ईडी का आरोप था कि मनी लॉन्ड्रिंग में करीब 6,000 करोड़ रुपए शामिल हैं. जांच में हवाला नेटवर्क, शेल कंपनियों और यहां तक कि राजनीतिक संरक्षण के दावों के लिंक भी खुला.

SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ, वोटर लिस्ट से नाम कटने पर क्या है चुनाव आयोग की भूमिका

पटना   एसआईआर को लेकर सुप्रीम कोर्ट चल रही सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि मैं चाहता हूं कि कोर्ट योगेंद्र यादव को 10 मिनट का समय दें, ताकि वे SIR के कारण महिलाओं, मुसलमानों आदि के अनुपातहीन बहिष्कार की वास्तविक पृष्ठभूमि बता सकें. इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन आप आगे कैसे बढ़ना चाहते हैं? SIR की वैधता पर या…? इसके बाद वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में कहा कि जिन लोगों के नाम सूची से हटाए गए हैं, उन्हें न तो कोई नोटिस मिला, न ही कोई कारण बताया गया. उन्होंने कहा कि तीसरी बात, अपील का प्रावधान तो है, लेकिन जानकारी ही नहीं दी गई तो अपील कैसे करेंगे? वहीं, चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि जिन भी लोगों के नाम सूची से हटाए गए हैं, उन्हें आदेश की जानकारी दी गई है. इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “अगर कोई हमें सूची दे सके कि 3.66 लाख मतदाताओं में से किन लोगों को आदेश की जानकारी नहीं दी गई, तो हम चुनाव आयोग को निर्देश देंगे कि उन्हें जानकारी दी जाए. हर व्यक्ति को अपील का अधिकार है.” क्या है संविधान का अनुच्छेद 329? संविधान का अनुच्छेद 329 चुनाव आयोग को यह अधिकार देता है कि वह चुनाव प्रक्रिया को बिना बाधा के पूरा कराए. संविधान का यह अनुच्छेद एक तरह से न्यायपालिका को चुनावी प्रक्रिया में बाधा डालने से रोकता है और उससे यह उम्मीद करता है कि वह चुनाव आयोग को चुनावी प्रक्रिया पूरी करने में बाधित नहीं करेगा. अनुच्छेद के खंड (क) में कहा गया है कि सीटों के परिसीमन या आवंटन से संबंधित किसी भी कानून की वैधता पर अदालत में सवाल नहीं उठाया जा सकता है, जबकि खंड (ख) में प्रावधान है कि किसी चुनाव को केवल विधानमंडल द्वारा पारित कानून द्वारा निर्धारित तरीके से दायर चुनाव याचिका के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है. विधायी मामलों के जानकार अयोध्यानाथ मिश्र बताते हैं कि भारत में हर संवैधानिक संस्था का अपना महत्व है. किसी भी संवैधानिक संस्था को संविधान ने सुप्रीम नहीं बताया है, बल्कि सबको अलग-अलग काम दिए हैं और सभी अपने कार्यों को करने के लिए स्वतंत्र हैं. हर संवैधानिक संस्था से यह उम्मीद की जाती है कि वो दूसरे के कार्यों में दखल नहीं देगा. संविधान के अनुच्छेद 329 में इसी बात की व्यवस्था की गई है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष और बिना बाधा के चुनावी प्रक्रिया को पूरा कराए. जहां तक बात एसआईआर मामले में सुनवाई की है, तो अब चूंकि चुनाव की तिथि घोषित हो गई है, इसलिए इस बात की संभावना बहुत कम है कि सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर कोई चौंकाने वाला फैसला सुनाएगा, क्योंकि परंपरा ऐसी नहीं रही है. योगेंद्र यादव दे सकते हैं जानकारी प्रशांत भूषण ने दलील दी कि चुनाव आयोग को अपने ही नियमों के तहत प्रतिदिन प्राप्त आपत्तियों का विवरण अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करना चाहिए था. उन्होंने कहा, “इसीलिए हम कह रहे हैं कि ये सारी जानकारियां वेबसाइट पर डालनी चाहिए थीं. उनके नियमों में स्पष्ट है कि हर दिन के अंत में प्रत्येक मतदाता से जुड़ी प्राप्त आपत्तियों की जानकारी प्रकाशित की जानी चाहिए. वे कह रहे हैं कि 3.66 लाख नाम आपत्तियों के आधार पर हटाए गए हैं. योगेन्द्र यादव इस पर तथ्यात्मक जानकारी दे सकते हैं इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर हम अंधेरे में रहेंगे तो कोई समाधान नहीं निकल सकता. वहीं जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि योगेन्द्र यादव व्यक्तिगत रूप से एक हलफनामा देकर स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं. वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने भी कहा कि आज भी विस्तृत (disaggregated) डेटा उपलब्ध है, लेकिन हम अंधेरे में रखे गए हैं. चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि सब लोग हवा में कह रहे हैं कि उन्हें जानकारी नहीं है. किसी को हलफनामा दाखिल करना चाहिए. इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि किसी को तो हलफनामा दाखिल करना होगा कि वह प्रभावित व्यक्ति है. वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि ऐसा करने के लिए और जानकारी की आवश्यकता है. उन्होंने बताया कि कुल 65 लाख नाम डिलीट किए गए थे, जिनमें से 42 लाख को वापस जोड़ा गया है. शेष नाम अभी भी हटे हुए हैं. जस्टिस कांत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल अदालत संख्या पर नहीं, बल्कि कुछ संभावित उदाहरणों की पहचान पर ध्यान दे रही है. उन्होंने कहा, “अगर मुझे पता है कि संशोधित वोटर लिस्ट में मेरा नाम नहीं है, तो मैं हलफनामा दाखिल कर सकता हूं.” अगर सुप्रीम कोर्ट ने कोई बाधा डाली तो क्या होगा? संविधान का अनुच्छेद 329 चुनाव आयोग को यह विशेषाधिकार देता है कि वह निष्पक्ष ढंग से बिना बाधा के चुनाव कराए. उसकी यह जिम्मेदारी है कि चुनाव कराते वक्त वह संविधान की मूल भावना का पूरा सम्मान करे और किसी भी नागरिक को लिंग, जाति और धर्म के आधार पर मतदान से ना रोके. इसके लिए चुनाव आयोग अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा है. मतदाता सूची के पुनरीक्षण का कार्य भी उसी में शामिल है, अगर चुनाव की घोषणा के बाद सुप्रीम कोर्ट कोई ऐसा निर्णय देता है, जिससे चुनाव पर असर हो, तो क्या हो सकता है? इसपर जानकारी देते हुए अयोध्यानाथ मिश्र कहते हैं कि पहली बात तो यह कि सुप्रीम कोर्ट ऐसा कोई निर्णय नहीं करेगा, जिससे एक संवैधानिक संस्था के क्षेत्राधिकार का उल्लंघन हो, फिर भी अगर यह मान लिया जाए कि इस तरह का कोई फैसला सुप्रीम कोर्ट सुनाता है, तो अब जबकि चुनाव की घोषणा हो चुकी है, क्या हो सकता है? क्या चुनाव को रोका जाएगा? वहां किसी भी हाल में 22 नवंबर से पहले चुनाव संपन्न होने हैं, क्योंकि वर्तमान सरकार का कार्यकाल 22 नवंबर को समाप्त हो रहा है. अगर चुनाव संपन्न नहीं हुए तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का क्या होगा? इस लिहाज से इस बात की संभावना काफी कम है कि सुप्रीम कोर्ट कोई भी ऐसा निर्णय सुनाएगा, जिससे चुनाव प्रभावित हो. हां, यह जरूर संभव है कि वह वह कोई सकारात्मक सुझाव दे. क्या हैं … Read more

सुप्रीम कोर्ट ने शराब घोटाले में अनवर ढेबर को दी अस्थायी राहत

रायपुर छत्तीसगढ़ के शराब घोटाला मामले में जेल में बंद कारोबारी अनवर ढेबर को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है. उनकी मां के खराब स्वास्थ्य को देखते हुए 4 दिन की अंतरिम जमानत मंजूर कर दी गई है. पुलिस अभिरक्षा में 4 दिन मां के साथ रहने की इजाजत मिली है. दरअसल, कारोबारी अनवर ढेबर की ओर से सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें मां की खराब स्वास्थ्य में समय में मिलने के लिए अपील की थी. मामले में सुनवाई के दौरान ढेबर के वकीलों ने कोर्ट में बताया कि उनकी मां की हालत गंभीर है. इस वक्त वह हॉस्पिटल में एडमिट हैं. जिस पर सुप्रीम कोर्ट कहा कि ऐसे संवेदनशील समय पर परिवार के ऐसे समय में इंसान को अपने करीबियों के साथ रहने का मौका मिलना चाहिए. चार दिन की मिली अंतरिम जमानत कोर्ट ने चार दिन की अंतरिम जमानत दे दी है. जिसमें साफ किया कि यह राहत सिर्फ उनकी मां की तबीयत को ध्यान में रखते हुए दी गई है. 4 दिनों तक अनवर ढेबर अपने परिवार के साथ रह सकेंगे. जमानत की तिथि खत्म होते ही उन्हें दोबारा जेल जाना होगा. 3200 करोड़ का घोटाला, 60 लाख से अधिक पेटियों की बिक्री EOW/ACB द्वारा अब तक की गई जांच और 200 से अधिक व्यक्तियों के बयान एवं डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर अनुमान है कि लगभग 60,50,950 पेटी बी-पार्ट शराब की अवैध बिक्री हुई है, जिसकी अनुमानित कीमत 2174 करोड़ रुपये से अधिक है. पहले इस घोटाले का अनुमान 2161 करोड़ रुपये था, लेकिन नवीनतम आंकड़ों के अनुसार घोटाले की कुल राशि 3200 करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है. लखमा, चैतन्य, टूटेजा, ढेबर समेत 15 जेल में इस मामले में पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल, सेवानिवृत्त IAS अनिल टूटेजा और होटल व्यवसायी अनवर ढेबर समेत 15 लोग पहले से रायपुर सेंट्रल जेल में बंद हैं. ईओडब्ल्यू की जांच में अब तक कुल 70 लोगों को आरोपित बनाया गया है, जिसमें आठ डिस्टलरी संचालक भी शामिल हैं. अन्य संदिग्धों की भूमिका की भी गहन जांच की जा रही है.

TET परीक्षा को लेकर अल्पसंख्यक स्कूलों में उठे सवाल, SC में याचिका दायर

नई दिल्ली अल्पसंख्यक स्कूलों को आरटीई (शिक्षा का अधिकार कानून) के दायरे से बाहर रखना और वहां के शिक्षकों को टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) से छूट देना बच्चों के योग्य शिक्षकों से शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है। ये बात अल्पसंख्यक स्कूलों के शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्य योग्यता से बाहर रखने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हस्तक्षेप अर्जी में कही गई है। अर्जीकर्ता खेम सिंह भाटी ने अल्पसंख्यक स्कूलों के शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से छूट के मामले में पक्ष रखने की इजाजत मांगते हुए कहा है कि टीईटी शिक्षा के अधिकार का अहम हिस्सा है इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों को योग्य और सक्षम शिक्षक पढ़ाएं। शिक्षा के अधिकार में अच्छी शिक्षा पाने का अधिकार शामिल है। इसीलिए अल्पसंख्यक स्कूलों को टीईटी की अनिवार्यता से छूट दिया जाना बच्चों के साथ अन्याय है और उनके योग्य शिक्षकों से शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है।   मामला बड़ी पीठ को भेजा सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा एक से कक्षा आठ तक को पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य करने के गत एक सितंबर के फैसले में अल्पसंख्यक स्कूलों को फिलहाल इससे छूट देते हुए उनका मामला विचार के लिए बड़ी पीठ को भेज दिया था। दो न्यायाधीशों की पीठ ने अल्पसंख्यक स्कूलों को आरटीई के दायरे से बाहर बताने वाले पांच न्यायाधीशों के प्रमति एजूकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट मामले में पूर्व में दिए फैसले पर सवाल उठाते हुए मामला बड़ी पीठ को भेज दिया था। तमिलनाडु सहित कई राज्यों के मामले लंबित हैं। इसमें चीफ जस्टिस को सुनवाई के लिए उचित पीठ गठित करनी है। इसी मामले में डॉक्टर खेम सिंह भाटी ने ये हस्तक्षेप अर्जी दाखिल की है। अर्जी में कहा गया है कि अल्पसंख्यक स्कूलों को आरटीई के दायरे से बाहर रखने के प्रमति जजमेंट में कानून की सही व्यवस्था नहीं दी गई है। आरटीई कानून सभी बच्चों के लिए गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया था लेकिन प्रमति जजमेंट में अल्पसंख्यक स्कूलों को इसके दायरे से बाहर करने से ये उद्देश्य कमजोर होता है, क्योंकि इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का योग्य शिक्षकों से शिक्षा पाने का अधिकार बाधित होता है। टीईटी शिक्षा के अधिकार का अहम हिस्सा कहा गया है कि अल्पसंख्यक संस्थानों को अपने शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन और प्रशासन के संविधान के अनुच्छेद 30 (1) में मिले अधिकार और प्रत्येक बच्चे को अनुच्छेद 21ए में मिले मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार के बीच एक संतुलित व्याख्या होनी चाहिए। ऐसी व्याख्या होनी चाहिए कि दो में से किसी का भी अधिकार पूर्ण रूप से समाप्त न हो। टीईटी शिक्षा के अधिकार का अहम हिस्सा है इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों को योग्य और सक्षम शिक्षक पढ़ाएं। शिक्षा के अधिकार में अच्छी शिक्षा पाने का अधिकार शामिल है इसीलिए अल्पसंख्यक स्कूलों को टीईटी की अनिवार्यता से छूट दिया जाना बच्चों के साथ अन्याय है और उनके योग्य शिक्षकों से शिक्षा पाने के अधिकार का उल्लंघन है।  

सड़क सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त : पैदल यात्रियों के लिए नया नियम? अब दायीं ओर चलना होगा ज़रूरी!

भोपाल सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) से पूछा है कि क्या भारत में भी विदेशों की तरह पैदल यात्रियों को सड़क की दायीं ओर चलने का नियम बनाया जा सकता है। अदालत ने दोनों पक्षों को 10 नवंबर तक सभी तथ्यों और आंकड़ों के साथ विस्तृत जवाब देने के निर्देश दिए हैं। यह मामला जबलपुर निवासी ज्ञान प्रकाश की याचिका पर उठाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि भारत में पैदल यात्रियों को बायीं ओर चलने की सलाह दी जाती है, जिससे उनकी जान को खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि साल 2022 में हुए 50 हजार सड़क हादसों में से 18 हजार मौतें पैदल चलने वालों की थीं, यानी कुल मौतों का करीब 36 प्रतिशत हिस्सा। क्यों दायीं ओर चलना हो सकता है सुरक्षित… ज्ञान प्रकाश ने दलील दी कि अगर पैदल यात्री सड़क की दायीं ओर चलेंगे तो उन्हें सामने से आने वाले वाहन दिखेंगे, जिससे समय रहते वे खुद को बचा सकेंगे। उन्होंने कहा कि भारत में पैदल यात्रियों के लिए नियम ब्रिटिशकालीन परंपराओं और 1958 के विएना कन्वेंशन से प्रेरित हैं, जो अब मौजूदा ट्रैफिक परिस्थितियों के अनुकूल नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि उसने 21 मई 2025 को ट्रैफिक नियंत्रण और सड़क अतिक्रमण हटाने के लिए निर्देश दिए थे, लेकिन उनका क्रियान्वयन अब तक नहीं हुआ है। अदालत ने केंद्र और NHAI से पूछा कि क्या भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में “राइट वॉकिंग सिस्टम” लागू किया जा सकता है। विदेशों में क्या होता है? अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन में लोग सड़क की दायीं ओर पैदल चलते हैं। जबकि ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया में पैदल यात्री बायीं ओर चलते हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि भारत में वाहनों के बायीं ओर चलने का नियम पैदल यात्रियों पर लागू करना गलत है। सड़क सुरक्षा पर बड़ा सवाल सड़क परिवहन मंत्रालय के 2023 के आंकड़ों के मुताबिक, टू-व्हीलर के बाद सड़क हादसों में सबसे ज्यादा मौतें पैदल यात्रियों की होती हैं। ऐसे में कोर्ट का यह सवाल सड़क सुरक्षा नीति में एक बड़ा बदलाव ला सकता है। यदि केंद्र सरकार और NHAI की रिपोर्ट में यह व्यवस्था व्यावहारिक मानी जाती है, तो जल्द ही भारत में पैदल यात्रियों के चलने के नियम में 70 साल पुराना बदलाव देखने को मिल सकता है।

सुप्रीम कोर्ट नाराज़! फ्रॉड केस में बेल देने पर दो जजों को भेजा ट्रेनिंग पर, निचली अदालतों को चेतावनी

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने धोखाधड़ी के एक मामले में दी गई जमानत को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने मजिस्ट्रेट और सेशन जज के जमानत देने के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं. दोनों न्यायिक अधिकारियों को दिल्ली न्यायिक अकादमी में सात दिन की स्पेशल ट्रेनिंग का निर्देश दिया गया है. अदालत ने कहा कि चार्जशीट सामग्री की जांच किए बिना जमानत आदेश पारित किए गए थे.  कोर्ट ने पाया कि गंभीर तथ्यात्मक मैट्रिक्स के बावजूद जमानत नहीं दी जानी चाहिए थी. अदालत ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को मामले में जांच अधिकारियों की भूमिका की जांच करने का भी निर्देश दिया है.  जमानत के सिद्धांतों को तथ्यों से जोड़ा जाना चाहिए, उन्हें शून्यता में लागू नहीं किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर की नाराजगी कोर्ट ने साफ कहा कि अगर वह एसीएमएम (ACMM) द्वारा आरोपी को जमानत दिए जाने और सेशन जज द्वारा इस पर हस्तक्षेप करने से इनकार करने के तरीके को नजरअंदाज करता है, तो यह अपनी ड्यूटी में फेल होगा. कोर्ट ने जमानत दिए जाने के आदेशों को रद्द करते हुए, दोनों न्यायिक अधिकारियों को करीब सात दिनों के विशेष न्यायिक प्रशिक्षण से गुजरने का निर्देश दिया.  कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से गुजारिश किया है कि दिल्ली न्यायिक अकादमी में ट्रेनिंग की उचित व्यवस्था की जाए, जिसमें उच्च न्यायालयों के फैसलों के महत्व पर न्यायिक अधिकारियों को संवेदनशील बनाने पर विशेष ध्यान दिया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत आदेश चार्जशीट सामग्री की जांच किए बिना ही पारित कर दिए गए थे. कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि एसीएमएम (ACMM) का आदेश चार्जशीट में उपलब्ध सामग्री की जांच किए बिना कैसे पारित कर दिया गया. कोर्ट ने खुद नोट किया था कि 'धोखाधड़ी की कथित घटना में दोनों आरोपियों की भूमिका को चार्जशीट में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है.' कोर्ट ने कहा कि जमानत के मामले मुख्य रूप से कानून के किसी भी सिद्धांत को लागू करने से पहले तथ्यों और परिस्थितियों पर तय किए जाने चाहिए. प्रक्रियागत खामियां और जांच अधिकारियों की भूमिका… कोर्ट ने जमानत देने के तरीके में हुई कुछ प्रक्रियागत अनियमितताओं को भी उजागर किया, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि आरोपी तकनीकी रूप से कोर्ट की कस्टडी में थे, फिर भी उन्हें औपचारिक रिहाई आदेश के बिना ही कोर्ट से जाने दिया गया था. अदालत ने यह भी कहा कि जांच अधिकारियों (IOs) की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इसके चलते, दिल्ली पुलिस आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से आईओज (IOs) के आचरण की जांच करने और प्राथमिकता के आधार पर उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है. क्या है मामला? यह मामला आरोपी पति और उसकी सह-आरोपी पत्नी से संबंधित था, जिन पर एक करोड़ नब्बे लाख रुपये लेने और जमीन हस्तांतरित करने का वादा करने का आरोप था. बाद में पता चला कि वह जमीन पहले ही गिरवी रख दी गई थी और किसी तीसरे पक्ष को बेची जा चुकी थी. अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को बताया कि आरोपी आदतन अपराधी हैं और उनके खिलाफ इसी तरह के छह मामले लंबित हैं. कोर्ट ने जमानत रद्द करने का एक प्रमुख कारण आरोपियों का आचरण बताया. 2019 में हाई कोर्ट ने मध्यस्थता की ख्वाहिश जताने पर उन्हें अंतरिम सुरक्षा दी थी, लेकिन करीब चार साल बीत जाने के बाद भी मध्यस्थता प्रक्रिया से कोई नतीजा नहीं निकला. कोर्ट ने कहा कि गंभीर तथ्यात्मक मैट्रिक्स के रोशनी में जमानत नहीं दी जानी चाहिए थी. कोर्ट ने दोहराया कि जमानत के सिद्धांत हमेशा विशिष्ट मामलों के तथ्यों के साथ जुड़े होने चाहिए.  

हिरासत मौत पर सुप्रीम कोर्ट ने दी कड़ी चेतावनी, पुलिस की लापरवाही पर तुरंत कार्रवाई जरूरी

भोपाल  मध्य प्रदेश में पुलिस हिरासत में 26 साल के युवक की मौत के मामले में जिम्मेदार दो पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार इन अधिकारियों की गिरफ्तारी के आदेश की अनदेखी नहीं कर सकती.  पीठ की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि अगर अधिकारी उन्हें गिरफ्तार करने में विफल रहते हैं, तो कोर्ट उन दोनों के खिलाफ आरोप तय कर सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों को बर्खास्त किया जाए, ताकि उनके सामने न्याय हो सके. कोर्ट को सूचित किया गया कि मई 2025 से दोनों अधिकारियों का वेतन रोक दिया गया है, और SP को आदेश मिल चुका है कि उन्हें निलंबित कर दिया गया है.  जस्टिस महादेवन की टिप्पणी जस्टिस महादेवन ने सवाल उठाया कि अधिकारी 15 अप्रैल से अपने पता नहीं लगाया जा सका, जबकि अगस्त में उन्होंने अग्रिम जमानत दाखिल की. उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी स्थिति बनी रही तो CBI निदेशक के खिलाफ भी अवमानना की कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है. कोर्ट का अवमानना संबंधी नोट जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि गिरफ्तारी के निर्देश के बाद अग्रिम जमानत की गुहार करना अपने आप में अवमानना है. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि 15 मई के निर्देश के बावजूद अब तक गिरफ्तारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है. आगामी निर्देश और हलफनामा कोर्ट ने कहा कि सात अक्टूबर तक आदेश का अनुपालन करते हुए हलफनामा दाखिल किया जाए, और अगर अनुपालन नहीं होता है, तो 8 अक्टूबर को मध्य प्रदेश के DGP भी कोर्ट में उपस्थित होंगे.