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एक-एक कर छूटते गए साथी, क्या ममता बनर्जी की पकड़ TMC पर कमजोर पड़ गई है?

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन होने के बाद से ममता बनर्जी का सियासी संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. टीएमसी विधायक से लेकर सांसद तक एक-एक कर ममता बनर्जी का साथ छोड़ते जा रहे हैं. अब हालत यह हो गई है कि सयानी घोष से लेकर युसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे बड़े सितारे भी बागी खेमे के साथ खड़े हो गए हैं।  15 साल तक बंगाल में एकछत्र राज करने के बाद सत्ता हाथ से निकलते ही टीएमसी में असंतोष फूट पड़ा है. टीएमसी में तमाम बड़े सिपहसलार अलग राह पर चल पड़े हैं, जिससे ममता बनर्जी के हाथों से पार्टी निकलती जा रही है।      टीएमसी के 19 बागी सांसदों के नाम सामने आ गए हैं, जो काकोली घोष दस्तीदार के अगुवाई में अलग गुट बनाने का फैसला किया है. इस फेहरिश्त में उन सभी नेताओं के नाम है, जिन्हें ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि बंगाल में ममता के पास कितनी ताकत बची है?  TMC के बड़े सितारे छोड़ गए ममता का साथ बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी ने एक जनवरी 1998 को कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था. इसके बाद 13 साल तक ममता बनर्जी संघर्ष कर साढे तीन दशक से सत्ता पर काबिज लेफ्ट को उखाड़ फेका था. ममता के इस सियासी संघर्ष के रहे तमाम टीएमसी नेता धीरे-धीरे साथ छोड़ गए. अभिषेक बनर्जी और ममता बनर्जी ने कई नए चेहरों को सियासत में लाए और सियासी पहचान दी, लेकिन सत्ता बदलते ही उनके मोहभग हो गए।  काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई वाले बागी गुट में शत्रुघ्न सिन्हा, जगदीश चंद्र बसुनिया, खलीउर रहमान, यूसुफ पठान, अबू ताहिर खान, पार्थ मौमिक, बापी हलधर, सायोनी घोष, माला रॉय, मिताली बाग, दीपक अधिकारी, कालीपद सोरेन, जून मालिया, अरूप चक्रवर्ती, शर्मिला सरकार, असित कुमार मल्ल, शताब्दी रॉय और रचना बनर्जी शामिल है. ये ऐसे नाम है, जिनकी राजनीतिक को ममता बनर्जी ने सियासी पहचान दी, लेकिन अब बीजेपी खेमे के साथ खड़े होने के लिए बेताब है।  ममता बनर्जी के पास कितने सांसद बचे 2024 के लोकसभा चुनावों में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी ने राज्य की कुल 42 लोकसभा सीटों में 29 पर जीत हासिल की थी. बीजेपी 12 और कांग्रेस को एक सीट मिली थी, चुनावों के बाद टीएमसी के बशीरहाट से ससद हाजी नुरुल इस्लाम की मौत हो गई थी. टीएमसी के पास 28 लोकसभा सांसद है, जिसमें से 19 सांसद बागी हो गई है. इसके बाद ममता बनर्जी के साथ सिर्फ 9 लोकसभा सांसद ही बचे हैं।  ममता बनर्जी के पास बचे टीएमसी लोकसभा सांसदों में फिलहाल कीर्ति आजाद, अभिषेक बनर्जी, सौगात राय, प्रसून बनर्जी, प्रतिमा मोंडल, सुदीप बंधोपाध्याय, महुआ मोइत्रा, कल्याण बनर्जी और सजदा अहमद हैं।  टीएमसी के 13 राज्यसभा सांसद हैं, जिसमें  दो सांसदों ने इस्तीफा दिया है. सुखेंदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव ने राज्यसभा सदस्यता के साथ-साथ टीएमसी से भी इस्तीफा दे दिया है. इन दोनों के अब बीजेपी से राज्यसभा जाने की चर्चा. इस तरह 11 राज्यसभा सांसद बच रहे हैं, लेकिन उनसे में से भी कितने सांसद ममता के साथ रहेंगे, ये कहना मुश्किल है।  ममता बनर्जी के पास कितने विधायक बचे पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव चुनाव में टीएमसी के टिकट पर 80 विधायक जीतकर आए, जिसमें से ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को ममता बनर्जी ने बाहर कर दिया था. इसके बाद  टीएमसी के 58 विधायकों ने अलग गुट बना लिया और अगुवाई ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया. टीएमसी के कुछ अन्य विधायकों ने भी साथ छोड़ा है।  ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि अब उनके पास 64 विधायकों का समर्थन है और एक विधायक के हमारे साथ जुड़ने के बाद संख्या 65 हो जाएगी. इस तरह 80 में से 65 विधायक अब ममता बनर्जी से अलग होकर अपना अलग गुट बना लिया है और  ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता मान लिया है. टीएमसी के 65 विधायकों के बागी होने के बाद ममता बनर्जी के साथ सिर्फ 15  विधायक ही बच रहे हैं. इसके अलावा बंगाल के तमाम बड़े शहरों के मेयर अपना इस्तीफा दे दिए हैं। 

ममता बनर्जी को बड़ा झटका? 20 बागी सांसदों का ओम बिरला को पत्र, NDA में एंट्री की चर्चाएं तेज

नई दिल्ली पश्चिम बंगाल के बाद नई दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस में बड़ी टूट होने का प्रोसेस शुरू हो गया है. तृणमूल कांग्रेस के 20 असंतुष्ट सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र भेजा है और उन्होंने अलग गुट बनाने का प्रस्ताव दिया है. बताया जा रहा है कि इस गुट का नेतृत्व सांसद काकोली घोष दस्तीदार कर रही हैं. दिलचस्प बात यह है कि यह बगावत ऐसे समय में आया है जब तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी नई दिल्ली में ही मौजूद हैं. उनके साथ पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी भी हैं. इन सांसदों के पास दो विकल्प हैं. या तो ये टीएमसी से अलग होकर बीजेपी में शामिल हो जाएं या फिर विधानसभा की तरह अलग गुट बनाकर अलग हों।  तृणमूल कांग्रेस में बड़ी हलचल की खबर आ रही है. रिपोर्ट के अनुसार अब दिल्ली में भी टीएमसी में बड़ी टूट की आशंका है. टीएमसी  तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद अलग गुट बनाएंगे. ये 20 सांसद तृणमूल कांग्रेस से जल्द अलग होंगे. इस बाबत आज दिल्ली में अहम गतिविधियां हुईं. ये सांसद जल्द ही लोकसभा स्पीकर को अपने फैसले की जानकारी देंगे. लेकिन स्पीकर अभी दिल्ली में मौजूद नहीं हैं, लोकसभा स्पीकर अभी चंडीगढ़ में हैं।  लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसद हैं. पार्टी में टूट के लिए कम से कम दो तिहाई सांसदों की जरूरत है. ये संख्या 19 होती है. इस बीच टीएमसी के बागी गुट ने 20 सांसदों के अपने साथ होने का दावा किया है।  इन बागी सांसदों का कहना है कि लोकसभा में वे अपने नेता के रूप में अभिषेक बनर्जी को नहीं बल्कि काकोली घोष को चाहते हैं।  बताया जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को पत्र भेजने से पहले दिल्ली के मोतीलाल नेहरू मार्ग पर स्थित केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के सरकारी आवास पर सोमवार को एक बेहद गोपनीय बैठक की, जिसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी भी मौजूद रहे।  बागी सांसद शाम 6.30 बजे टीएमसी एमपी शताब्दी राय के घर एक और मीटिंग करेंगे।   इससे पहले तृणमूल कांग्रेस के 14 बागी सांसदों ने दिल्ली में पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की है. ये मुलाकात बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव के घर पर हुई है. पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी आज ही दिल्ली पहुंचे हैं. सूत्रों के अनुसार इस मीटिंग में टीएमसी के लोकसभा के 14 सांसद मौजूद थे. इस मुलाकात में बीजेपी नेता और पूर्व त्रिपुरा सीएम बिप्लब देब भी शामिल थे।  सूत्रों का दावा है कि तृणमूल कांग्रेस के 5 बागी सांसद सोमवार सुबह से केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पर मौजूद थे. इन पांच सांसदों के नाम बर्दमान पूर्व से सांसद शर्मिला सरकार, हावड़ा के सांसद प्रसून बनर्जी, कूचबिहार सांसद जगदीश बसुनिया, झारग्राम सांसद कालिपद सोरेन और बांकुरा सांसद अरूप चक्रवर्ती हैं. दोपहर 12.00 बजे के बाद बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी उनके घर गए. इस बीच सूत्रों ने बताया कि लोकसभा के कुल 14 टीएमसी सांसदों ने शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की. दोपहर 2 बजे के बाद शुभेंदु अधिकारी भूपेन्द्र यादव के घर से निकले।  इधर इस घटनाक्रम से पहले TMC से इस्तीफा देने वाले सुखेंदु शेखर से मिलने के लिए पार्टी के 5 सांसद पहुंचे. ये मुलाकात दिल्ली में हुई. सुखेंदु शेखर से मिलने आए सांसदों में बर्दमान पूर्व से सांसद शर्मिला सरकार, हावड़ा के सांसद प्रसून बनर्जी, कूचबिहार सांसद जगदीश बसुनिया, झारग्राम सांसद कालिपद सोरेन और बांकुरा सासंद अरूप चक्रवर्ती शामिल थे।  रिपोर्ट के अनुसार TMC के बागी सांसद लोकसभा में अभिषेक बनर्जी के बजाय काकोली घोष को पार्टी का नेता चाहते हैं।  बता दें कि राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर ने आज (सोमवार) ही राज्यसभा और पार्टी से इस्तीफा दिया है. इस बीच उनसे टीएमसी के पांच सांसद मिलने पहुंचे थे. इससे टीएमसी की राजनीति को लेकर कई अटकलें लगाई जा रही हैं।  बता दें कि TMC सांसदों में पहले ही विभाजन हो चुका है. तृणमूल कांग्रेस के विधायकों पर ममता बनर्जी की पकड़ ढीली पड़ने के बाद अब पार्टी के संसदीय खेमे को भी एक और झटका लगा है।  ममता के सबसे विश्वस्त लेफ्टिनेंट फिरहाद हकीम ऋतब्रत से मिले इस बीच कोलकाता से खबर है कि ममता बनर्जी के सबसे विश्वस्त लेफ्टिनेंट और कोलकाता के पूर्व मेयर फिरहाद हकीम ने बागी विधायकों के नेता ऋतब्रत बनर्जी से मुलाकात की है. ये मुलाकात विधानसभा में भी हुई है. फिरहाद हकीम ने इस मुलाकात को शिष्टाचार भेंट बताया है. फिरहाद हकीम ने कुछ दिन पहले ही कोलकाता के मेयर पद से इस्तीफा दिया है।    आज सुखेंदु बोले, कल दूसरे ही बोलेंगे-ऋतब्रत वहीं राज्यसभा में एक दशक से ज़्यादा समय तक पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाले सबसे पुराने सदस्य सुखेंदु शेखर रॉय ने सांसद और पार्टी, दोनों पदों से इस्तीफ़ा दे दिया है. और पार्टी के 5 सांसदों से मुलाकात की है।  वहीं बंगाल में ममता के खिलाफ बगावत करने वाले बागी विधायक और नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने कहा है कि उन्होंने कई विधायकों से मुलाकात की है।  नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने सुखेंदु के इस्तीफे और टीएमसी के राजनीतिक घटनाक्रम पर कहा कि, "यह सिर्फ़ सुखेंदु की बात नहीं है. असल में मैंने उनसे व्यक्तिगत रूप से बात नहीं की है. लेकिन उन्होंने जो कुछ भी कहा, मैं उससे ज़्यादातर सहमत हूं, खासकर संसद के उच्च सदन के कामकाज को लेकर. उनकी बातें बिल्कुल सही थीं. संसद कोई क्विज़ शो की जगह नहीं है. सुखेंदु जो बता रहे हैं, उसका अनुभव मैंने खुद किया है. उनके जैसे कद के सांसद को पिछली कतार में धकेल दिया जाना निराशाजनक था, आज सुखेंदु आवाज़ उठा रहे हैं; कल दूसरे भी ऐसा ही करेंगे।  ये हो सकते हैं बागी सांसद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को सौंपे गए पत्र में जगदीश चंद्र बसुनिया, अरुप चक्रवर्ती, प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार और खलीलुर रहमान जैसे नेताओं के नाम प्रमुखता से सामने आ रहे हैं. वहीं काकोली घोष दस्तीदार, पार्थ भौमिक, अभिनेता-राजनेता देव और जून माल्या को लेकर भी असंतोष की अटकलें लगाई जा रही हैं।  तृणमूल सांसद सुखेंदु शेखर राय ने पार्टी से इस्तीफा दिया, राज्यसभा सदस्य पद छोड़ा तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका देते हुए वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय ने पार्टी की … Read more

बिल्डिंग मालिक का फूटा गुस्सा, TMC से मांगा मुख्यालय खाली करने का जवाब

कोलकत्ता  पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने नई मुश्किल खड़ी हो गई है। खबर है कि तृणमूल कांग्रेस का मुख्यायल जिस भवन में है, उसके मालिक ने पार्टी से जगह खाली करने के लिए कहा है। इस संबंध में पुलिस में भी शिकायत दर्ज कराई गई है। खास बात है कि यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हो रहा है, जब टीएमसी में बगावत जारी है और विधायक पहले ही दो गुट तैयार कर चुके हैं। टीएमसी के मौजूद मुख्यालय का पता A/P-1/A कैनाल साउथ है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यहां के संपत्ति मालिक मोंटू साहा है और वह चाहते हैं कि टीएमसी उनकी संपत्ति को खाली कर दे। उनका कहना है कि टीएमसी के साथ कराया गया समझौता साल 2025 में ही खत्म हो गया है और वह पार्टी से लंबे समय से जगह खाली करने के लिए कह रहे हैं, लेकिन उसपर कोई सुनवाई नहीं हो रही है। पुलिस में शिकायत जगह खाली नहीं करने को लेकर जारी विवाद के बाद साहा अपने बेटे अमित के साथ रविवार को प्रॉपर्टी पर पहुंचे थे। वह टीएमसी नेताओं से बात करने पहुंचे थे, लेकिन वहां कोई भी पदाधिकारी मौजूद नहीं था। ऐसे में उन्होंने पुलिस का रुख किया है। खबर है कि पिता पुत्र कुछ घंटों तक इंतजार करने के बाद पुलिस स्टेशन के लिए रवाना हुए थे। क्या है प्लान उन्होंने संकेत दिए हैं कि पार्टी को प्रॉपर्टी से बाहर निकालने के लिए कानूनी मदद ली जा सकती है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, अमित का कहना है, 'पिछले साल के आखिर में जब कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो गया, तो हमने उनसे कई बार संपर्क किया और कहा कि हमें हमारी बिल्डिंग वापस चाहिए। इस बिल्डिंग में मरम्मत का काम होना है और हमें अपने बिजनेस के लिए भी इसकी जरूरत है।' अमित ने कहा, 'उन्होंने हमसे कहा था कि वे जुलाई तक बिल्डिंग खाली कर देंगे, लेकिन हमें यह अभी वापस चाहिए। पिछले कुछ समय से पार्टी का कोई भी व्यक्ति इस बारे में बात करने के लिए उपलब्ध नहीं है। हमारे पास पुलिस के पास जाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था।' रिपोर्ट के अनुसार, टीएएमसी के एक नेता का कहना है कि साहा ने संपत्ति किराये पर देकर कोई एहसान नहीं किया है। उन्होंने कहा है कि इसके बदले में कई कॉन्ट्रैक्ट हासिल किए हैं। TMC हेडक्वार्टर्स खास बात है कि टीएमसी के असली मुख्यालय पर भी विवाद जारी है। तृणमूल भवन नाम से पहचाने वाली इस बिल्डिंग पर बागी विधायक जावेद खान ने अपना दावा पेश कर दिया है। उनका कहना है कि तृणमूल भवन जिस जमीन पर बना हुआ है, वह उनके परिवार की है। उन्होंने कहा था, 'मेरे पास यह साबित करने के लिए पूरे सबूत हैं कि तोपसिया रोड प्लॉट मेरे परिवार का है।' दरअसल, यहां रिनोवेशन का काम शुरू होने के बाद टीएमसी 2022 में साहा की प्रॉपर्टी में शिफ्ट हुई थी। साहा परिवार का कहना है कि यह जगह टीएमसी को साल 2022 में किराये पर दी गई थी। इससे पहले साहा यहां अरब रेसीडेंसी नाम का होटल चलाते थे।

TMC में फिर उठे असंतोष के सुर, दिल्ली तक पहुंचा विवाद; ममता बनर्जी की बढ़ सकती है मुश्किल

कलकत्ता ममता बनर्जी के लिए मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के भीतर हुई बड़ी टूट के बाद अब पार्टी के सांसदों को लेकर भी हलचल तेज हो गई है. चर्चा यह है कि विधानसभा के बाद अब लोकसभा-राज्यसभा में भी बगावत की आहट सुनाई दे सकती है. यही वजह है कि डैमेज कंट्रोल के लिए पार्टी नेतृत्व पूरी तरह एक्टिव हो गया है।  दरअसल, ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में करीब 60 विधायकों के अलग होने के बाद TMC पहली बार इतने बड़े अंदरूनी संकट से जूझती दिख रही है. विधानसभा में यह बगावत इतनी बड़ी रही कि स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता भी मान्यता दे दी. अब सवाल उठ रहा है कि क्या यही सियासी हलचल संसद तक भी पहुंचेगी? न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने भी इस आशंका को खुलकर सामने रखा है. उन्होंने कहा कि जिस तरह इतने कम समय में बड़ी संख्या में विधायक अलग हुए हैं, वैसी प्रतिक्रिया लोकसभा में भी देखने को मिल सकती है. हालांकि, उन्होंने राज्यसभा को लेकर साफ भविष्यवाणी नहीं की, लेकिन यह जरूर कहा कि ऐसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।  दूसरी तरफ, सीनियर टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने पार्टी में किसी भी बड़ी टूट के दावे को सिरे से खारिज किया है. उनका आरोप है कि बीजेपी संसद के भीतर भी वही खेल दोहराने की फिराक में है जो उसने बंगाल विधानसभा में किया. हालांकि, उन्हें पूरा भरोसा है कि ममता बनर्जी पहले भी ऐसे कई मुश्किल हालात से बखूबी निकली हैं व इस बार भी शानदार वापसी करेंगी।  सबसे ज्यादा चर्चा बारासात सांसद काकोली घोष दस्तीदार को लेकर हो रही है. पार्टी के भीतर उनकी नाराजगी पहले से चर्चा में रही है. लोकसभा में चीफ व्हिप पद से हटाए जाने के बाद उन्होंने कई बार नेतृत्व को लेकर नाराजगी जाहिर की. यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में उनके नाम की चर्चा तेज है, हालांकि उन्होंने खुद किसी बगावत की पुष्टि नहीं की है. सूत्रों की मानें तो हालात संभालने के लिए ममता बनर्जी ने पिछले दो दिनों में कई नाराज विधायकों और सांसदों से खुद बात की. पार्टी की कोशिश है कि मामला आगे बढ़ने से पहले ही सुलझा लिया जाए. संसद में भी दो सबसे भरोसेमंद सांसदों को बाकी सहयोगियों से लगातार संपर्क बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।  फिलहाल TMC के पास लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं. दलबदल कानून के तहत अगर दो-तिहाई सांसद किसी अलग गुट के साथ जाते हैं, तो उनकी सदस्यता बच सकती है. इसी वजह से दो तरह की चर्चाएं चल रही हैं. पहली, 'ऋतब्रत मॉडल', जिसमें सांसद अलग गुट बनाकर खुद को असली TMC बताने की कोशिश करें. दूसरी, किसी दूसरी पार्टी के साथ विलय का रास्ता।  हालांकि, पार्टी का चुनाव चिह्न और संगठन पर दावा सिर्फ सांसदों या विधायकों की संख्या से तय नहीं होगा. इसके लिए चुनाव आयोग के सामने यह साबित करना होगा कि संगठन के भीतर असली बहुमत किसके साथ है. अभी के लिए इतना साफ है कि बंगाल की लड़ाई अब सिर्फ विधानसभा तक सीमित नहीं दिख रही।   

13 दिनों में बदल गई बंगाल की राजनीति, एक मुलाकात के बाद TMC में बढ़ा सत्ता संघर्ष

कोलकाता दिल्ली में 'संयोगवश' हुई एक मुलाकात, हस्ताक्षर जालसाजी के आरोप, तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर बढ़ता असंतोष और उत्तराधिकार की लड़ाई जैसी महज 13 दिन के भीतर तेजी से घटी इन सिलसिलेवार घटनाओं ने 28 वर्ष पुरानी पार्टी को उसके पहले विभाजन की दहलीज पर ला खड़ा किया। बंग भवन में 22 मई को तृणमूल के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के बीच कथित तौर पर हुई 'संयोगवश' मुलाकात से शुरू हुआ घटनाक्रम बुधवार को उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया, जब 58 विधायकों ने पार्टी के विधायक दल पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया और विधानसभा अध्यक्ष से भी इसकी मान्यता हासिल कर ली। इस बगावत ने औपचारिक रूप से उस पार्टी में विभाजन की रेखा खींच दी, जिसकी स्थापना ममता बनर्जी ने एक जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर की थी। हालांकि, विद्रोह के बीज काफी पहले ही पड़ चुके थे। हार के बाद उभरने लगी थी कलह विधानसभा चुनाव में चार मई को भाजपा के हाथों मिली हार के बाद पार्टी के भीतर कलह उभरने लगी थी। पार्टी के कुछ विधायकों को लगने लगा था कि संगठन और निर्णय प्रक्रिया में पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के भतीजे एवं सांसद अभिषेक बनर्जी का दखल लगातार बढ़ रहा है, जिससे असंतोष धीरे-धीरे गहराता चला गया। नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक में छह मई को ममता बनर्जी ने कथित तौर पर विधायकों से चुनाव अभियान में अभिषेक बनर्जी की भूमिका के लिए खड़े होकर उनका अभिनंदन करने को कहा। हालांकि इसका उद्देश्य उनके योगदान को स्वीकारना था, लेकिन पार्टी के एक वर्ग में इस कदम को लेकर फुसफुसाहट शुरू हो गई। कुछ विधायकों को लगने लगा कि पार्टी का केंद्र धीरे-धीरे एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है। जहांगीर को अभिषेक ने क्यों नहीं किया निष्कासित? पार्टी में असंतोष पहली बार खुले तौर पर 19 मई को सामने आया। एक अन्य बैठक में ऋतब्रत बनर्जी और इंटाल्ली के विधायक संदीपन साहा ने सवाल उठाया कि फालटा विधायक जहांगीर खान द्वारा पुन: चुनाव से हटने की सार्वजनिक घोषणा किए जाने के बावजूद पार्टी ने उन्हें निष्कासित क्यों नहीं किया। चूंकि जहांगीर को अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता था, इसलिए इस आलोचना को व्यापक तौर पर तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव को सीधी चुनौती के रूप में देखा गया। 22 मई को ऋतब्रत ने की शुभेंदु से मुलाकात वरिष्ठ विधायक कुणाल घोष ने भी इसी तरह की चिंताएं जताईं, हालांकि बाद में उन्होंने खुद को बागी खेमे से अलग कर लिया। घटनाक्रम ने तीन दिन बाद निर्णायक मोड़ लिया। ऋतब्रत बनर्जी राज्यसभा सदस्य के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए 22 मई को दिल्ली गए हुए थे तभी वह दोपहर के भोजन के लिए बंग भवन पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से हो गई। इसके बाद ऋतब्रत ने सार्वजनिक रूप से विपक्षी विधायकों और सांसदों को प्रशासनिक समीक्षा बैठकों में आमंत्रित करने के शुभेंदु अधिकारी के फैसले का स्वागत किया और इसे स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा बताया। उनके इस बयान ने तत्काल राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। पहले से सुलग रहे असंतोष को और हवा दे दी हालांकि, कुछ ही दिन में तृणमूल एक अलग विवाद में घिर गई। 25 मई को आरोप सामने आए कि विधानसभा में विधायक दल के नेतृत्व ढांचे से जुड़े दस्तावेजों पर कई विधायकों के जाली हस्ताक्षर कर विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए थे। इस आरोप ने पहले से सुलग रहे असंतोष को और हवा दे दी तथा पार्टी के भीतर जारी खींचतान को खुले टकराव में बदल दिया। इस विवाद ने 27 मई को कानूनी मोड़ ले लिया जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से औपचारिक शिकायत कर हस्ताक्षरों की जालसाजी का आरोप लगाया। इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने मामले को पुलिस के संज्ञान में दिया, जिसके साथ ही अपराध अन्वेषण विभाग (सीआईडी) की ओर से जांच शुरू हो गई। अभिषेक बनर्जी पर हुआ हमला अगले दो दिन के दौरान जब जांचकर्ताओं ने विधायकों से पूछताछ शुरू की, तो मामला महज एक प्रक्रियागत विवाद तक सीमित नहीं रहा बल्कि तेजी से राजनीतिक संघर्ष में बदल गया। यह राजनीतिक सकंट 30 मई को उस समय और गहरा गया, जब अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर दौरे के दौरान भीड़ ने हमला कर दिया। यद्यपि सभी राजनीतिक दलों ने इस घटना की निंदा की, लेकिन तृणमूल के कई नेताओं ने निजी तौर पर संगठन और विधायक दल के कुछ वर्गों की अपेक्षाकृत फीकी प्रतिक्रिया पर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, यह नेतृत्व और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के एक हिस्से के बीच बढ़ती दूरी का संकेत था। ममता की बैठक में पहुंचे कम विधायक इसके बाद 31 मई तक नेतृत्व की पकड़ कमजोर पड़ती साफ दिखाई देने लगी। ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट स्थित आवास पर नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक बुलाई, लेकिन उसमें अपेक्षा से कम उपस्थिति रही। निर्णायक रूप से विभाजन एक जून को मुख्यमंत्री शुभेंदु द्वारा सार्वजनिक रूप से यह खुलासा किए जाने के कुछ ही घंटे बाद सामने आया कि सीआईडी जांच रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा की शिकायतों के आधार पर शुरू हुई है। तृणमूल कांग्रेस ने दोनों नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया। लेकिन संकट को थामने के बजाय इस कदम ने बगावत को और तेज कर दिया। 'ऑपरेशन क्राउन प्रिंस' देखते ही देखते बागी खेमे के भीतर इस मुहिम को एक नाम भी मिल गया-'ऑपरेशन क्राउन प्रिंस'। यह राजनीतिक नाटक बुधवार को चरम पर पहुंच गया जब 58 विधायकों के एक समूह ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुने जाने और नई टीम के गठन की जानकारी दी। विधानसभा अध्यक्ष ने इस दावे को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही बागी गुट को तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक विधायक दल के रूप में मान्यता मिल गई। कुछ ही मिनट बाद इन्हीं में से कई विधायक राज्य सचिवालय 'नबान्न' में शुभेंदु अधिकारी द्वारा बुलाई गई सरकारी समीक्षा बैठक में भी शामिल हुए। अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी दरार दिल्ली में शुरू हुई यह बगावत, जिसने हस्ताक्षर जालसाजी के आरोपों, संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष … Read more

बंगाल की राजनीति में तीखा वार, स्वपन दासगुप्ता ने TMC को लेकर BJP को किया आगाह

कलकत्ता तृणमूल कांग्रेस आंतरिक कलह के कारण बिखर रही है. ममता बनर्जी के हाथ से पार्टी फिसलती हुई दिख रही है. इस बीच सीएम शुभेंदु सरकार में मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने अपनी ही पार्टी को चेतावनी दी है. स्वपन दास गुप्ता ने टीएमसी के वैसे नेताओं की ओर इशारा किया है जो बीजेपी के करीब आने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा है कि उन्हें यही उम्मीद है कि तोड़-फोड़ करने वालों की राजनीतिक संस्कृति पश्चिम बंगाल BJP को दूषित न करे. उन्होंने कहा है कि वे TMC के विनाश पर कोई भी आंसू नहीं बहा रहे हैं।  TMC के 58 विधायकों के ऐसे गुट के नेता को प्रतिपक्ष की मान्यता मिल गई है, जिसे ममता बनर्जी का समर्थन प्राप्त नहीं है. इस गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी हैं. स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दी है।  कोलकाता के रासबिहारी से विधायक स्वपन दासगुप्ता ने एक्स पर लिखा, "TMC के आत्म-विनाश पर मैं कोई आंसू नहीं बहा रहा हूं. मेरी एकमात्र आशा यही है कि इन तोड़-फोड़ करने वालों की राजनीतिक संस्कृति पश्चिम बंगाल BJP को दूषित न करे।  बंगाल बीजेपी को आगाह करते हुए स्वपन दासगुप्ता ने लिखा, "हमें झूठे दोस्तों से हमेशा सावधान रहना होगा जो आज हमारे करीब आ रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने पिछले पाप धोने की जरूरत है।  मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने लिखा, "बंगाल की शुद्धिकरण प्रक्रिया अधूरी नहीं छोड़ी जा सकती। पत्रकार के रूप में सक्रिय रहने वाले स्वपन दासगुप्ता को सीएम शुभेंदु अधिकारी ने अपनी सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया है।  TMC में इतिहास की सबसे बड़ी टूट 3 जून 2026 को पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूकंप आया. तृणमूल कांग्रेस के इतिहास में पहली बड़ी टूट हुई. विधानसभा स्पीकर रथींद्रनाथ बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी।   ऋतब्रत को ममता ने हाल ही में पार्टी से निष्कासित किया था. उन्होंने अपने पास 58 TMC विधायकों का हस्ताक्षर दिखाया और उन्हें नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दिया. स्पीकर ने अभिषेक बनर्जी द्वारा नामित शोभनदेब चट्टोपाध्याय के दावे को खारिज कर दिया।  ऋतब्रत ने खुद को 'असली TMC' का प्रतिनिधि बताया और ममता बनर्जी को मुख्य सलाहकार बनाने का प्रस्ताव रखा और कहा कि वे रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे. उनके गुट में संदीपन साहा, जावेद खान, शिउली साहा समेत कई प्रमुख विधायक शामिल हैं।  इस घटनाक्रम से TMC में गहरा संकट पैदा हो गया है. ममता-अभिषेक गुट ने सभी पार्टी कमेटियों को भंग कर दिया है।   

बंगाल में महाराष्ट्र जैसा ‘खेला’ होने के संकेत? ऋतब्रत बनर्जी की भूमिका पर बढ़ी चर्चा

  कोलकाता पश्चिम बंगाल की सत्ता बदलते ही ममता बनर्जी के सामने सियासी संकट गहराता जा रहा है. चुनाव में मिली करारी हार के बाद एक-एक करके टीएमसी के पत्ते झड़ते जा रहे हैं. टीएमसी के एक के बाद एक नेता बागी तेवर अपनाता जा रहा है. ममता बनर्जी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. टीएमसी से निष्कासित विधायक रि ऋतब्रत बनर्जी क्या अब टीएमसी के 'एकनाथ शिंदे' साबित होंगे?  साल 2022 का महाराष्ट्र में जब एकनाथ शिंदे ने शिवसेना से बगावत कर उद्धव ठाकरे के हाथों से सरकार और सियासत दोनों ही छीन ली थी. अब ठीक वैसी ही सियासी स्क्रिप्ट अब पश्चिम बंगाल में लिखे जाने की सुगबुगाहट है. इसके केंद्र में टीएमसी से निष्कासित विधायक  ऋतब्रत बनर्जी हैं।   ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने बीती रात कोलकाता स्थित विधायक हॉस्टल में टीएमसी के कई विधायकों से मुलाकात की. टीएमसी के 80 विधायकों में से 60 विधायकों ने ममता बनर्जी की बैठक से दूरी बना ली थी. अब उन्हीं विधायकों से ऋतब्रत बनर्जी की मुलाकात ने बंगाल में सियासी हलचल बढ़ा दी है.  ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कोई बड़ा खेला होने जा रहा है?  टीएमसी में बगावत के बढ़ते आसार  बंगाल की सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी की सियासी चुनौतियां कम होने का नाम नहीं ले रही है. टीएमसी के कार्यकर्ता से लेकर नेता तक का मोहभंग हो रहा है. ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को लेकर विरोध के सुर टीएमसी में तेज होते जा रहे हैं.  टीएमसीके कई नेता और विधायक पार्टी की इस हालत के लिए खुले तौर पर उन्हें ही दोषी ठहरा रहे हैं. वे उन पर भ्रष्टाचार, घमंड, परिवारवाद, सीनियर नेताओं को किनारे करने और I-PAC के प्रोफेशनल्स के ज़रिए पार्टी को अपनी जागीर की तरह चलाने का आरोप लगा रहे हैं।  टीएमसी के कुछ नेता खुले तौर पर पार्टी पर आरोप लगा रहे हैं कि 15 साल सत्ता में रहने के बाद पार्टी जमीनी हकीकत से कट गई है. सिंडिकेट और 'कट-मनी' (कमीशन) की आदी हो गई है, और हिंसक रूप से अहंकारी हो गई है. वे जवाबदेही और आत्म-मंथन की मांग कर रहे हैं, जिसका ममता बनर्जी ने जिद के साथ विरोध किया है.  टीएमसी में टूटने का सबसे खतरा वहीं से आ रहा है जहां से तृणमूल कांग्रेस खड़ी हुई थी, मतलब जमीनी स्तर से विरोध तेज हो गया है।  ममता बनर्जी ने रविवार को टीएमसी विधायकों की  पीशी-भाईपो की बुलाई थी, जिसमें 80 में से सिर्फ टीएमसी 20 विधायक ही शामिल हुए. इससे पहले विभिन्न नगर निकायों के लगभग 100 TMC पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया है. कई टीएमसी नेता की बीजेपी के साथ बातचीत कर रहे हैं. कुछ लोग, जैसे फिल्म निर्माता और पूर्व विधायक राज चक्रवर्ती, चुनाव में हार के बाद पूरी तरह से राजनीति छोड़ चुके हैं. इस तरह टीएमसी से नेताओं को मोहभंग हो रहा है, जो ममता बनर्जी के लिए सियासी टेंशन का सबब बनता जा रहा है।   ऋतब्रत बनर्जी बनेंगे टीएमसी के 'शिंदे' टीएमसी के टिकट पर विधायक बने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिसके चलते ममता बनर्जी ने दोनों विधायकों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. अब इन्हीं दोनों विधायकों ने टीएमसी के साथ खेला करने की कवायद में जुट गए हैं.  टीएमसी के कई विधायकों के साथ  ऋतब्रत बनर्जी ने देर रात मुलाकात की है. इससे यह अटकलें तेज हो गई हैं कि टीएमसी के भीतर एक नया समूह आकार ले सकता है।  विधायक हॉस्टल में  ऋतब्रत बनर्जी से मिलने वालों में पश्चिमी मिदनापुर की एक महिला विधायक भी शामिल थीं.  ऋतब्रत और संदीपन से मिलने वाले टीएमसी के एक विधायक के मुताबिक हम पार्टी तोड़कर कोई अलग दल बनाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, हम टीएमसी के झंडे तले ही काम करेंगे. ऐसे में साफ है कि टीएमसी के अंदर कुछ सियासी खिचड़ी जरूर पक रही है.  टीएमसी से निष्कासित विधायक जिस तरह से एक्टिव हैं और अभिषेक पर पार्टी को हाईजैक करने का आरोप लगाया, उससे सियासत तेज हो गई है।   ऋतब्रत बनर्जी ने खोला सियासी मोर्चा  ऋतब्रत बनर्जी ने आजतक से बात करते हुएअभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को सीधे तौर पर चुनौती दी है. मुख्य मुद्दा पार्टी में IPAC के संबंध में जूनियर बनर्जी की भूमिका अहम थी. TMC विधायक कुणाल घोष ने आरोप लगाया था कि निकाले गए ये दोनों विधायक पार्टी को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और उन्होंने दक्षिण कोलकाता के एक होटल में कुछ विधायकों के साथ एक गुप्त बैठक की थी, बाद में ऋतब्रत ने इस आरोप से इनकार कर दिया।  अभिषेक बनर्जी की घटना ने बढ़ाई टेंशन अभिषेक बनर्जी को जनता के गुस्से का सामना करना पड़ा. वह सोनारपुर गए थे., उनके ऊपर अंडे और जूते फेंके गए। कल्याण बनर्जी ने अगले दिन आरोप लगाया कि उनके सिर पर एक पत्थर लगा था, लेकिन इन सबसे ऊपर, जहां भी वे गए, चोर, चोर के नारे लगे. इस तरह का दृश्य हर टीएमसी विधायक और सांसद को सियासी तौर पर चिंतित कर रहा है।  टीएमसी के कई नेताओं को डर सता रहा है कि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के साथ जुड़ाव उनका राजनीतिक करियर बर्बाद कर सकता है.  इसके चलते ही टीएमसी के नेता ममता बनर्जी की बैठक में शामिल नहीं हुए. इससे ममता बनर्जी की सियासी टेंशन बढ़ गई है, क्योंकि जो विधायक बैठक में नहीं आए, लेकिन उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी से मुलाकात की है. इसके चलते ही माना जा रहा है कि कोई बड़ा खेला होने जा रहा है।  कुणाल घोष की अपील डूबते जहाज न छोड़े टीएमसी के 80 विधायकों और 29 सांसदों में से आधे से ज्यादा (लगभग 40-45 विधायक और 15-18 सांसद) ममता बनर्जी से अलग होकर 'दो घास-फूल' वाले चुनाव चिह्न के लिए चुनाव आयोग से संपर्क करते हैं, तो यह ममता बनर्जी और उनके भतीजे के पार्टी पर दावे को खारिज करने के लिए काफी हो सकता है. सोमवार को MLA कुणाल घोष ने टीएमसी नेताओं से हाथ जोड़कर गुज़ारिश की कि वे डूबते जहाज को छोड़कर न भागें, लेकिन ऐसे मुश्किल समय … Read more

ममता सरकार को बड़ा राजनीतिक झटका, स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को दी नई जिम्मेदारी

कोलकाता विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे बड़े संकट से जूझ रही है। इसी कड़ी में बुधवार को टीएमसी के 58 बागी विधायकों ने पार्टी से निष्कासित ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता मानते हुए विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस को अपने फैसले से अवगत करा दिया है। सूत्रों ने बताया कि ऋतब्रत बनर्जी ने संदीपन साहा और कई अन्य बागी विधायकों के साथ विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात की और 58 विधायकों के हस्ताक्षर वाले समर्थन पत्र सौंपे। उन्होंने एक नई नेतृत्व टीम का प्रस्ताव भी रखा, जिसमें ऋतब्रत को विधायक दल का नेता, जावेद खान, संदीपन साहा और शिउली साहा को उप-नेता और रघुनाथगंज के विधायक अखरुज्जमां को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाया है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को बड़ा झटका लगा है. पश्चिम बंगाल विधानसभा स्पीकर रवीन्द्र नाथ बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दे दी है. ममता बनर्जी ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष घोषित किया था. इसके बाद पार्टी में बगावत हो गई है. 80 में से 60 विधायकों ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष मानने से इंकार कर दिया. इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 60 विधायकों ने स्पीकर रवीन्द्र नाथ बोस से मुलाकात कर उनसे कहा कि वे TMC के असली गुट हैं और ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दे दी जाए. विधायकों की अपील पर विचार करते हुए स्पीकर ने  ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दे दी है।  गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों की वजह से चुनाव नतीजे आने के बाद ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन शाह को TMC से निलंबित कर दिया था। इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी ने ममता बनर्जी के खिलाफ बगावत कर दिया।  स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के कमरे की चाबी दे दी है. टीएमसी के इस गुट में चार उप नेता प्रतिपक्ष बनाए गए हैं. इनके नाम हैं- जावेद अहमद खान, शबीना यास्मीन, शीलू साह, और संदीपन साह. अकीरजम्मा सदन में टीएमसी के चीफ व्हिप होंगे।  स्पीकर के इस फैसले से साफ हुआ है उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी की अगुआई वाली टीएमसी को असली तृणमूल कांग्रेस माना है।   यह घटनाक्रम विधानसभा में बागी विधायकों की एक बैठक के बाद सामने आया। विधानसभा में हुई इस बैठक में शामिल कोई भी विधायक मंगलवार को मध्य कोलकाता में पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी के धरने में मौजूद नहीं था। दूसरी ओर, शोभनदेव चट्टोपाध्याय, नयना बंद्योपाध्याय, मदन मित्रा और कुणाल घोष जैसे नेता बागी विधायकों की बैठक से दूर रहे।बागियों ने ममता को माना पार्टी सुप्रीमोबागी विधायकों द्वारा विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए पत्र में ममता बनर्जी को पार्टी का अध्यक्ष बताया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि बागी विधायक अपनी लड़ाई को टीएमसी सुप्रीमो के खिलाफ नहीं, बल्कि मौजूदा विधायक दल के नेतृत्व के खिलाफ पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। बागी गुट के सूत्रों ने बताया कि विधायकों ने यह भी साफ कर दिया है कि वे विधायक दल के मामलों पर फैसले लेने के संबंध में अभिषेक बनर्जी के अधिकार को स्वीकार नहीं करते हैं।पार्टी के साथ विश्वासघात हुआ। टीएमसीटीएमसी नेतृत्व ने इस पूरी कवायद को विश्वासघात करार देते हुए खारिज कर दिया। पार्टी के वरिष्ठ नेता और विधायक कुणाल घोष ने कहा कि संगठन के भीतर बातचीत से किसी भी मतभेद को सुलझाया जा सकता था। अगर उन्हें कोई समस्या थी, तो वे पार्टी के भीतर इस पर चर्चा कर सकते थे। इसके बजाय उन्होंने पार्टी को धोखा देना चुना। बागी विधायकों और उनके समर्थकों को गद्दार बताते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि टीएमसी इस संकट से उबर जाएगी और ममता बनर्जी के नेतृत्व में एकजुट रहेगी।अयोग्य होने से बच जाएंगे बागी विधायकदल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी अलग हुए गुट को अयोग्य घोषित होने से बचने के लिए विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है। चूंकि, विधानसभा में टीएमसी के 80 विधायक हैं, इसलिए यह सीमा 54 विधायकों की है। यदि बागी गुट का दावा स्वीकार कर लिया जाता है, तो वे आसानी से इस आंकड़े को पार कर लेंगे और सदन में एक अलग गुट के रूप में मान्यता पाने के अपने दावे को मजबूत करेंगे। यह है मामलाघटनाक्रम की जड़ें छह मई को ममता बनर्जी के आवास पर चुने गए विधायकों की एक बैठक में थीं, जहां विधायकों ने कथित तौर पर पार्टी नेतृत्व को विपक्ष के नेता, उप-नेता और मुख्य सचेतक के नामों पर फैसला करने का अधिकार दिया था। इसके बाद टीएमसी ने विधानसभा को सूचित किया कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय विपक्ष के नेता होंगे, नयना बंद्योपाध्याय और आशिमा पात्रा उप-नेता होंगी और फिरहाद हकीम मुख्य सचेतक होंगे। हालांकि, विधानसभा सचिवालय ने इस सूचना पर कोई कार्रवाई नहीं की और प्रक्रियागत जरूरतों का हवाला दिया कि ऐसे पदाधिकारियों का चुनाव विधायक दल की एक औपचारिक बैठक में होना चाहिए।हस्ताक्षर पर उठे थे सवालविवाद तब और बढ़ गया जब बागी विधायकों ने आरोप लगाया कि विधानसभा सचिवालय को भेजे गए पत्र पर किए गए हस्ताक्षर सही नहीं हैं। पार्टी नेतृत्व ने इस आरोप को खारिज कर दिया और बागियों पर चुनावी झटके के बाद संगठन को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। इसी क्रम में टकराव तब और तेज हो गया जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निकाल दिया गया।

ममता बनर्जी को बड़ा झटका? TMC के 59 विधायक ऋतब्रत बनर्जी के खेमे में जाने की चर्चा

कोलकत्ता  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के महज एक महीने के भीतर राज्य की राजनीति में अब तक का सबसे बड़ा और अप्रत्याशित भूचाल आ चुका है. पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) आधिकारिक तौर पर दोफाड़ होने की कगार पर पहुंच गई है. कोलकाता के सियासी गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, टीएमसी के भीतर की गुटबाजी अब एक खुली जंग में तब्दील हो चुकी है, जिसके बाद तृणमूल कांग्रेस का आड़ा-तिरछा विभाजन तय माना जा रहा है. इस बड़े उलटफेर ने राज्य से लेकर देश भर के राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है।  59 विधायक हुए बागी? मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, बुधवार सुबह ठीक 10 बजे ऋतब्रता बनर्जी और संदीपान साहा के नेतृत्व में टीएमसी के बागी विधायकों का एक बहुत बड़ा हुजूम अचानक विधानसभा पहुंच गया. सूत्रों का दावा है कि पार्टी के कुल 80 विधायकों में से दो-तिहाई से कहीं अधिक, यानी कुल 59 नाराज विधायक अब ऋतब्रता बनर्जी के पाले में खड़े हो चुके हैं. इन सभी विधायकों ने एक संयुक्त पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे विधानसभा अध्यक्ष रथेंद्र बसु को सौंपने की तैयारी की जा चुकी है।  ममता के धरने में दिखी कम संख्या इस अभूतपूर्व टूट के बीच सबसे ज्यादा चौंकाने वाला आंकड़ा ममता बनर्जी के खेमे का सामने आया है. राजनीतिक गलियारों में दावा किया जा रहा है कि अब पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के साथ महज 21 विधायक ही शेष बचे हैं. इस दावे को मंगलवार को तब और हवा मिल गई जब कोलकाता के वाई चैनल पर आयोजित ममता बनर्जी के धरने में पूरी पार्टी से सिर्फ 6 विधायक और 5 सांसद ही शामिल होने पहुंचे. विधायकों की इस बेहद कम संख्या ने खुद टीएमसी नेतृत्व को भी गहरे संकट में डाल दिया है।  ऋतब्रता को विपक्ष का नेता बनाने का दांव ऋतब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाला यह बागी गुट अब पूरी ताकत के साथ विधानसभा में खुद को असली तृणमूल कांग्रेस के रूप में स्थापित करने की कोशिश में जुट गया है. बागी विधायकों के दस्तखत वाले पत्र के जरिए विधानसभा अध्यक्ष से मांग की जा रही है कि ऋतब्रता बनर्जी को आधिकारिक तौर पर विपक्ष का नेता घोषित किया जाए. इसके साथ ही संदीपान साहा को उप-विपक्ष का नेता और मुर्शिदाबाद के विधायक अखरुज्जमान को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।  ममता के पास सिर्फ 21 विधायक? सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक 59 विधायकों के बागी रुख अख्तियार कर लेने के बाद अब आधिकारिक तौर पर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के पास सिर्फ 21 विधायक बचे हैं. विधायकों का ये नंबर गेम बताता है कि टीएमसी इस वक्त पूरी तरह से मुश्किलों में घिरी हुई।  बताया जा रहा है कि टीएमसी के ये बागी विधायक विधानसभा पहुंच गए हैं, जहां वह विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस से मुलाकात करेंगे. इसके लिए स्पीकर भी सदन पहुंच गए हैं. बताया जा रहा है कि स्पीकर से मुलाकात के दौरान ऋतब्रत नेता प्रतिपक्ष के लिए अपनी बात रखेंगे।  क्या है बागी विधायकों की मांग टीएमसी के इन बागी विधायकों की मांग है कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय के बजाय पार्टी के किसी अन्य बेहद वरिष्ठ नेता को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (लीडर ऑफ अपोजिशन) की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाए, जिसके लिए उन्होंने ये कड़ा रुख अपनाया है। उधर, टीएमसी के बागी विधायकों में शामिल मुस्तफिजुर रहमान ने कहा कि टीएमसी के 59 विधायकों ने हस्ताक्षर किया है. हम सभी ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं है, लेकिन हम चाहते हैं कि किसी वरिष्ठ नेता को नेता प्रतिपक्ष बनाया जाए। विधानसभा के मौजूदा समीकरणों को देखें तो इस अभूतपूर्व बगावत के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के पास अब केवल 21 वफादार विधायक ही बचे हैं, जिससे पार्टी के पूरी तरह विभाजित होने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है। आपको बता दें कि हाल ही में संपन्न हुए बंगाल विधानसभा में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 207 सीटों पर शानदार जीत दर्ज कर टीएमसी को सत्ता से बेदखल कर दिया।  दिग्गज और अल्पसंख्यक नेताओं की बड़ी बगावत इस विद्रोह की सबसे खास बात यह है कि इसमें ममता बनर्जी के पुराने और सबसे भरोसेमंद सिपहसालार शामिल हैं. बागी गुट में पूर्व मंत्री जावेद खान, शूलि साहा, वीरभूम के कद्दावर नेता काजल शेख, पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा, मुर्शिदाबाद के विधायक नियामत शेख, सामशेरगंज के विधायक मोहम्मद नूर आलम, उत्तर दिनाजपुर के विधायक गुलाम रब्बानी, डोमजूर के विधायक तापस मैती और हावड़ा मध्य के विधायक अरूप राय जैसे कद्दावर नाम शामिल हैं. मालदा की विधायक और पूर्व मंत्री साबीना यास्मीन ने खुलेआम ऋतब्रता बनर्जी का समर्थन कर दिया है. इसके अलावा, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों के अधिकांश अल्पसंख्यक विधायक भी इसी बागी गुट के साथ खड़े नजर आ रहे हैं।  फर्जी हस्ताक्षर पर छिड़ी कानूनी जंग इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में एक बड़ा कानूनी मोड़ तब आया, जब अभिषेक बनर्जी की तरफ से विधानसभा भेजे गए एक पत्र पर बागी विधायकों ने अपने फर्जी हस्ताक्षर होने का आरोप लगा दिया. ऋतब्रता बनर्जी और संदीपान साहा ने स्पीकर से लिखित शिकायत की है कि विधायकों की मर्जी के बिना उनके दस्तखत का गलत इस्तेमाल किया गया है. इस गंभीर शिकायत के बाद राज्य की सीआईडी (CID) ने मामले की जांच शुरू कर दी है। 

पार्टी में फूट की चर्चाओं के बीच TMC में बड़ा संगठनात्मक बदलाव, ममता ने लिया बड़ा एक्शन

कोलकत्ता   पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के टूटने और महाराष्ट्र की तरह पार्टी के सिंबल पर कब्जे की खबरों के बीच ममता बनर्जी के सबसे वफादार शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने मोर्चा संभाल लिया है. टीएमसी के पहले निर्वाचित विधायक और विधानसभा में मनोनीत नेता प्रतिपक्ष (LoP) चट्टोपाध्याय ने मंगलवार को दल-बदल और बगावत की सभी अटकलों को खारिज कर दिया. उन्होंने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस का बहुमत आज भी ममता बनर्जी के साथ मजबूती से खड़ा है. संगठन पर पार्टी के पुराने वफादारों का ही नियंत्रण रहेगा।  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी ने बड़ा एक्शन लेते हुए तृणमूल कांग्रेस की सभी कमेटियों, पार्टी से जुड़े संगठनों को तत्काल प्रभाव से विलय कर दिया है. टीएमसी ने कहा है कि सभी कमेटियों और फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन का पुनर्गठन किया जाएगा।  टीएमसी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा है कि गहन विचार-विमर्श के बाद, यह निर्णय लिया गया है कि पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सभी समितियां, साथ ही इसके सभी अनुषांगिक संगठन, तत्काल प्रभाव से भंग माने जाएंगे।  TMC ने कहा कि पार्टी हर स्तर पर आत्म-निरीक्षण, कार्य-निष्पादन समीक्षा और संगठनात्मक मूल्यांकन की एक व्यापक प्रक्रिया चलाएगी. इस प्रक्रिया के निष्कर्षों के आधार पर मुख्य संगठन और सभी अनुषांगिक संगठनों की संगठनात्मक संरचना का पुनर्गठन किया जाएगा और उचित समय पर इसकी घोषणा की जाएगी।  पार्टी अपने संगठन को सुदृढ़ बनाने और उसे नए उत्साह तथा उद्देश्य के साथ भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने हेतु पूरी तरह प्रतिबद्ध है। बता दें कि बंगाल विधानसभा में हार के बाद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को TMC में फूट का सामना करना पड़ रहा है. कुछ आनुषांगिक संगठन आलाकमान के फैसले से इतर दूसरे गुट के फैसलों के साथ सहमति जता रहे हैं। टीएमसी ने भंग की सारी कमेटियां और संगठन तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में अपनी सभी कमेटियों के साथ-साथ अपने सभी फ्रंटल संगठनों को भी तत्काल प्रभाव से भंग करने का फैसला किया है. पार्टी ने कहा कि अब वह एक विस्तृत आंतरिक समीक्षा करेगी, जिसमें सभी स्तरों पर कामकाज और संगठनात्मक कार्यप्रणाली का मूल्यांकन शामिल होगा. इस प्रक्रिया के नतीजों के आधार पर, मुख्य संगठन और उससे जुड़े सभी विंग्स के लिए एक नए सिरे से तैयार संगठनात्मक ढाँचे की घोषणा बाद में की जाएगी।  पार्टी ने एक बयान में कहा, ‘गहन विचार-विमर्श के बाद, यह फैसला किया गया है कि पश्चिम बंगाल में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की सभी कमेटियां, और साथ ही उसके सभी फ्रंटल संगठन, तत्काल प्रभाव से भंग माने जाएँगे. पार्टी हर स्तर पर आत्म-निरीक्षण, कामकाज की समीक्षा और संगठनात्मक मूल्यांकन का एक व्यापक अभियान चलाएगी. इस प्रक्रिया से सामने आए नतीजों के आधार पर, मुख्य संगठन और सभी फ्रंटल संगठनों के संगठनात्मक ढांचे का पुनर्गठन किया जाएगा और उचित समय पर इसकी घोषणा की जाएगी।  उन्होंने आगे कहा, ‘पार्टी अपने संगठन को मज़बूत करने और उसे नए जोश और उद्देश्य के साथ भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।  TMC के 16 फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन हैं. टीएमसी की फ्रंटल संगठन की संख्या लगभग 16 है. आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार ये संगठन पार्टी के विभिन्न वर्गों जैसे युवा, महिला, छात्र, मजदूर आदि को संगठित करते हैं।   कमेटियों की बात करें तो इसमें TMC की मुख्य कार्यकारी कमेटी है. इसके अलावा कोर कमेटी, स्टेट कमेटी, जिला और ब्लॉक कमेटी और अनुशासन समिति है. अब इन सभी का विलय कर दिया गया है और कमेटियों का गठन किया जाएगा।   पैसे और सत्ता के दम पर बगावत कराने की कोशिश : शोभनदेव शोभनदेव चट्टोपाध्याय का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब निष्कासित और बागी नेताओं (ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा) के गुट 20 से 50 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं. शोभनदेव ने इन दावों के पीछे की इनसाइड स्टोरी को उजागर करते हुए गंभीर आरोप लगाये।  नेता विपक्ष के पद के लिए 58 विधायकों ने रीताब्रता बनर्जी का समर्थन किया टीएमसी विधायकों की बैठक के बाद 58 सदस्यों के हस्ताक्षरों वाला एक संयुक्त पत्र विधानसभा स्पीकर को सौंपा गया है, जिसमें विपक्ष के नेता के तौर पर रीतातब्रता बनर्जी के नाम का प्रस्ताव किया गया है।   टीएमसी के करीब 60 विधायक बैठक के लिए विधानसभा पहुंचे टीएमसी के 80 विधायकों में से लगभग 60 विधायक बैठक के लिए पश्चिम बंगाल विधानसभा पहुंचे, जिससे इस बात की अटकलें तेज़ हो गई हैं कि वे शायद विधायक दल पर नियंत्रण हासिल करने और विपक्ष के नेता के पद पर दावा ठोकने की कोशिश कर सकते हैं।  तो ममता बनर्जी के पास सिर्फ 20 टीएमसी विधायकों का सपोर्ट? रिताब्रता बनर्जी ने 59 टीएमसी विधायकों के समर्थन का दावा किया है. ऐसे में अगर बनर्जी के बताए नंबर सही हैं, तो इससे विधानसभा के राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव दिखेगा, जिससे पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पास सिर्फ 20 MLAs का सपोर्ट बचेगा. हालांकि, इन दावों को अलग से वेरिफाई नहीं किया गया है, और तृणमूल कांग्रेस ने भी अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।