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नंदीग्राम सीट से चुनाव लड़ने से कतरा रहे TMC नेता, ममता के सामने नई चुनौती

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं हैं। अब खबर है कि पार्टी को नंदीग्राम में होने वाले उप चुनाव के लिए उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। फिलहाल, सीट पर उप चुनाव का भी ऐलान नहीं हुआ है। अटकलें हैं कि टीएमसी नेता यहां से चुनाव लड़ने से इनकार कर रहे हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर के साथ नंदीग्राम से भी चुनाव लड़ा था और जीत दर्ज की थी, लेकिन अंत में उन्होंने यह सीट छोड़ने का फैसला किया। खास बात है कि अधिकारी 2021 में भी तत्कालीन सीएम ममता बनर्जी को नंदीग्राम से हरा चुके हैं। 2 नेता कर चुके मना पूर्वी मिदनापुर जिले की नंदीग्राम विधानसभा सीट पर उप चुनाव की तारीख का ऐलान कभी भी हो सकता है। अब अटकलों का दौर शुरू हो गया है कि यहां टीएमसी ने उम्मीदवार की तलाश शुरू कर दी है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि यहां से टीएमसी को उम्मीदवार खोजने में मुश्किल हो रही है। साथ ही दो नेताओं ने तो यहां से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। 2026 विधानसभा चुनाव में भी अधिकारी ने भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी को हराया है। नंदीग्राम से लड़ने नेता मना क्यों कर रहे अधिकारी के कभी करीबी रहे पवित्र कर भी नंदीग्राम से नहीं लड़ना चाहते। खास बात है कि शुभेंदु ने उन्हें ही इस सीट से हराया है। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, वह कहते हैं, 'कुछ लोग मुझसे बात करने आए थे, लेकिन मैं दोबारा नंदीग्राम से नहीं लड़ सकता। इसका सवाल ही पैदा नहीं होता है।' चुनाव से कुछ समय पहले ही कर भारतीय जनता पार्टी छोड़ टीएमसी में गए थे। 2021 में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी के इलेक्शन एजेंट रहे शेख सूफियान भी यहां से चुनाव लड़ने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। उन्होंने कहा, 'मैंने 2006 में नंदीग्राम का चुनाव लड़ा था। उसके बाद टीएमसी में से किसी ने भी मुझसे चुनाव लड़ने के लिए नहीं कहा। मुझे अब चुनावों में दिलचस्पी नहीं है। मैं मेरे परिवार की सलाह मानकर राजनीति से रिटायर हो रहा हूं।' टीएमसी का क्या है प्लान रिपोर्ट के अनुसार, टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'उम्मीदवार का चुनाव ममता बनर्जी करेंगी और इस पर बात करना अभी जल्दबाजी होगी। चुनावों का ऐलान होने दीजिए।' फलता जैसा लक्ष्य रखा मुख्यमंत्री बनने के बाद नंदीग्राम के अपने पहले दौरे पर अधिकारी ने अपने समर्थकों को आश्वस्त किया कि सीट खाली करने के बावजूद उनका अपने राजनीतिक गढ़ से जुड़ाव पूरी तरह मजबूत बना हुआ है। उन्होंने अभिनंदन रैली को संबोधित करते हुए अपने समर्थकों से पूछा कि क्या वे नंदीग्राम में भी फाल्टा जैसी जीत का अंतर दोहरा सकते हैं, जहां भाजपा ने एक लाख से अधिक मतों से जीत हासिल की है।

फलता ने बढ़ाई ममता की टेंशन! TMC के लिए भवानीपुर से ज्यादा बड़ा झटका क्यों माना जा रहा नतीजा

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में फलता विधानसभा सीट पर हुए पुनर्मतदान के नतीजों ने पूरे राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार देबांशू पांडा ने इस सीट पर 1.09 लाख से भी ज्यादा वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की है. यह जीत सिर्फ भाजपा की मजबूती को नहीं दिखाती, बल्कि 15 साल सत्ता में बैठी रही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए एक ऐसा बड़ा झटका है जिसने पार्टी के भीतर एक गंभीर संकट का इशारा कर दिया है. जहां टीएमसी प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई. ये प्रत्याशी कोई और नहीं, टीएमसी संगठन में सबसे पावरफुल अभिषेक बनर्जी के राइट हैंड मैन कहे जाने वाले जहांगीर खान थे. जिन्होंने आखिरी वक्त मुकाबले से खुद को अलग कर लिया, और अपना वोट भी नहीं डाला।  ऐसे में यह सवाल तो बनता है कि टीएमसी के लिए ममता बनर्जी की सीट भवानीपुर की हार ज्यादा गंभीर थी, या फलता का नतीजा? भवानीपुर में होने वाले किसी भी राजनैतिक उतार-चढ़ाव को लोग अक्सर ममता बनर्जी के पर्सनल जादू और शहर के वोटर्स के मिजाज से जोड़कर देखते हैं, जहां हार-जीत का अंतर कभी-कभी पार्टी की ढिलाई की वजह से बदल सकता है. लेकिन फलता की हार तृणमूल कांग्रेस की उस 'ग्रासरूट मशीनरी' यानी जमीनी संगठन की नाकामी को सामने लाती है, जिसके दम पर पार्टी पिछले कई सालों से बंगाल पर राज कर रही है. यह हार इसलिए भी ज्यादा चुभने वाली है क्योंकि फलता सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के 'नंबर दो' और ममता के उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी के लोकसभा क्षेत्र 'डायमंड हार्बर' का एक मुख्य हिस्सा है।  इस क्षेत्र के पुराने इतिहास को देखें तो दक्षिण 24 परगना जिला हमेशा से टीएमसी का सबसे मजबूत और अभेद्य गढ़ रहा है. इस जिले ने हमेशा तृणमूल कांग्रेस का बढ़-चढ़कर साथ दिया है. साल 2024 के लोकसभा चुनावों में, जब अभिषेक बनर्जी ने डायमंड हार्बर सीट से रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की थी, तब इसी फलता विधानसभा क्षेत्र ने उन्हें अकेले 1.68 लाख वोटों की बड़ी लीड दी थी. उस चुनाव में अभिषेक बनर्जी का वोट शेयर फलता में लगभग 89% था, यानी  एकतरफा मुकाबला. लेकिन, सिर्फ दो साल के भीतर तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर गिरकर सिर्फ 3.7% पर आ जाना और पार्टी उम्मीदवार का चौथे नंबर पर खिसककर अपनी जमानत तक गंवा देना, किसी भी राजनैतिक पार्टी के लिए बहुत बड़ी नाकामी है. फलता सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है, बल्कि यह वह इंडस्ट्रियल और ग्रामीण इलाका है जहां टीएमसी का बूथ मैनेजमेंट सबसे अचूक माना जाता था. इस सीट पर मिली करारी हार यह साफ करती है कि पार्टी का वह जमीनी ढांचा, जो कभी हर वोटर के घर तक पकड़ रखता था, अब पूरी तरह से बिखर चुका है।  अभिषेक का 'डायमंड हार्बर मॉडल' ध्वस्त यह हार सीधे तौर पर टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की राजनैतिक साख और उनकी लीडरशिप पर बड़ा सवालिया निशान लगाती है. अभिषेक बनर्जी लगातार खुद को पार्टी के मॉडर्नाइजेशन और पार्टी ऑर्गेनाइजेशन में खुद को नए के लीडर के रूप में पेश करते रहे हैं. उन्होंने बार-बार 'डायमंड हार्बर मॉडल' की तारीफ की है. एक ऐसा मॉडल जिसे वे अच्छे गवर्नेंस, तुरंत एक्शन और अचूक चुनावी रणनीति का प्रतीक बताते थे. चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में, 2 मई को अभिषेक बनर्जी ने केंद्रीय नेतृत्व और भाजपा को खुली चुनौती देते हुए कहा था कि भाजपा को उनके डायमंड हार्बर मॉडल में एक मामूली खरोंच लगाने के लिए भी 10 जन्म लेने होंगे, और अगर हिम्मत है तो दिल्ली से अपने नेताओं को बुलाकर फलता में मुकाबला करके दिखाएं. इस तरह की आक्रामक चुनौती के बाद जब नतीजे पूरी तरह उल्टे आते हैं, तो राजनैतिक नुकसान सिर्फ एक सीट का नहीं होता, बल्कि नेता की साख पूरी तरह प्रभावित हो जाती है।  शुभेंदु अधिकारी ने इस नतीजे के तुरंत बाद तंज कसते हुए कहा कि कुख्यात 'डायमंड हार्बर' मॉडल अब तृणमूल के 'हार-बार' मॉडल में बदल चुका है. फलता की हार ने यह साबित कर दिया है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों की 35 कंपनियों की तैनाती और कड़े इलेक्शन मैनेजमेंट के बीच, जब सरकारी मशीनरी का अनुकूल सहयोग मुमकिन नहीं हो पाता, तब संगठन की असली परीक्षा होती है. यह नतीजा अभिषेक बनर्जी के उस दावे को कमजोर करता है कि उनका संगठन बिना किसी अतिरिक्त मदद के भी अजेय है।  अंतर्कलह का अंत नहीं इसके साथ ही, फलता के नतीजे टीएमसी के भीतर पिछले काफी समय से चल रहे 'पुराने वफादार बनाम नए कॉर्पोरेट-शैली के रणनीतिकार' के अंदरूनी संघर्ष को और ज्यादा तेज करेंगे. ममता बनर्जी की राजनीति हमेशा से संघर्ष करने, सड़क पर उतरकर आंदोलन करने और जमीनी स्तर के पुराने नेताओं को साथ लेकर चलने पर टिकी रही है. इसके उलट, अभिषेक बनर्जी पर उन्हीं की पार्टी के लोग आरोप लगा रहे हैं कि उनका मॉडल कॉर्पोरेट इलेक्शन मैनेजमेंट, डेटा एनालिटिक्स और पारंपरिक नेताओं को दरकिनार कर नए चेहरों को आगे बढ़ाने की वकालत करता है. फलता की इस ऐतिहासिक पराजय से पार्टी के भीतर ममता बनर्जी के पुराने खेमे को अभिषेक के खिलाफ मुंह खोलने का एक और मौका मिल गया है. पार्टी के भीतर यह आवाजें उठने लगी हैं कि संगठन के फैसलों से पुराने और जमीनी नेताओं को साइडलाइन करने का नतीजा ही फलता में देखने को मिला है।  ममता की चुनौती अभिषेक को बचाना चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में टीएमसी उम्मीदवार का अचानक पीछे हटने की घोषणा करना यह इशारा करता है कि लोकल लीडरशिप और शीर्ष नेतृत्व के रणनीतिकारों के बीच गहरा अविश्वास था. ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति बेहद पेचीदा है. एक तरफ उन्हें अपने घोषित उत्तराधिकारी की साख को बचाना है, तो दूसरी तरफ पार्टी के बिखरते जा रहे कार्यकर्ताओं और पुराने नेताओं की नाराजगी को दूर करना है. भवानीपुर की जीत या हार ममता के अपने कंट्रोल में होती है, लेकिन फलता का बिखरना यह दिखाता है कि पार्टी पर उनकी पकड़ के बावजूद ऑर्गेनाइजेशन पर कंट्रोल कमजोर हो रहा है।  इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू मतगणना के दिन तृणमूल की गैरमौजूदगी रही. टीएमसी जैसी मजबूत पार्टी का मतगणना केंद्रों पर अपने काउंटिंग एजेंट तक तैनात न … Read more

तारीखों के ऐलान के साथ बढ़ी राजनीतिक हलचल, शुभेंदु अधिकारी के वफादार का TMC में प्रवेश

कोलकाता पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है, जहां शुभेंदु अधिकारी के पूर्व वफादार माने जाने वाले नेता ने मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस में वापसी कर ली। यह नेता पबित्र कर हैं, जो पूर्व में नंदीग्राम-2 ब्लॉक के बोयाल-1 ग्राम पंचायत के प्रधान थे। उन्होंने बीजेपी छोड़कर टीएमसी की सदस्यता ग्रहण की और यह घटना पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की मौजूदगी में हुई। TMC ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि पबित्र बीजेपी की जन-विरोधी नीतियों से असंतुष्ट होकर वापस लौटे हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियां जोरों पर हैं और टीएमसी जल्द ही अपनी उम्मीदवारों की सूची घोषित करने वाली है। राजनीतिक हलकों में इस घटना को काफी महत्व दिया जा रहा है, क्योंकि नंदीग्राम सीट पहले से ही विवादास्पद और चर्चित बनी हुई है। पबित्र कर का राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। नवंबर 2020 में उन्होंने टीएमसी छोड़कर बीजेपी का दामन थामा था। BJP में शामिल होने के बाद उन्होंने बोयाल-1 क्षेत्र में पार्टी की संगठनात्मक संरचना को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। 2021 के विधानसभा चुनाव में उनकी मेहनत का असर दिखा, जब बीजेपी को इस इलाके में बढ़त मिली। उसी चुनाव में सुवेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को महज 1,900 से थोड़े अधिक वोटों के अंतर से नंदीग्राम सीट पर हराया था, जिसने पूरे राज्य की सियासत को हिला दिया था। पबित्र को सुवेंदु अधिकारी के करीबी सहयोगी के रूप में जाना जाता था, इसलिए उनकी टीएमसी में वापसी को एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर माना जा रहा है। यह कदम बीजेपी के लिए नंदीग्राम जैसे संवेदनशील क्षेत्र में झटका साबित हो सकता है। TMC का झंडा लहराने वाली तस्वीर अभिषेक बनर्जी के हाथों से टीएमसी का झंडा थामते हुए पबित्र कर की तस्वीरें वायरल हो गई हैं। यह घटना उम्मीदवारों की सूची घोषणा से महज कुछ घंटे पहले हुई, जिसने राजनीतिक गलियारों में जोरदार अटकलों को जन्म दिया है। कई विश्लेषकों और नेताओं का मानना है कि टीएमसी पबित्र कर को नंदीग्राम से सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ मैदान में उतार सकती है। अगर ऐसा होता है तो यह चुनावी मुकाबला और भी रोमांचक हो जाएगा, क्योंकि दोनों नेताओं के बीच पहले से व्यक्तिगत और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता रही है। नंदीग्राम 2021 में ममता बनर्जी की हार का प्रतीक बन चुका है और टीएमसी इसे वापस जीतकर अपनी ताकत दिखाना चाहती है। इस संभावित टक्कर से स्थानीय स्तर पर मतदाताओं की राय भी प्रभावित हो सकती है। यह घटनाक्रम बंगाल की सियासत में बदलते समीकरणों को दर्शाता है। जहां एक तरफ बीजेपी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटी है, वहीं टीएमसी पुराने नेताओं को वापस लाकर व नए चेहरों को मौका देकर अपनी स्थिति को और सुदृढ़ करना चाहती है। पबित्र कर की वापसी न केवल नंदीग्राम बल्कि पूर्व मेदिनीपुर जिले के अन्य हिस्सों में भी टीएमसी के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। आने वाले दिनों में जब TMC की उम्मीदवार सूची जारी होगी तो इस अटकल का जवाब मिल जाएगा। फिलहाल यह कदम बंगाल की राजनीति में नया तड़का जोड़ने वाला साबित हो रहा है और सभी की निगाहें नंदीग्राम पर टिकी हुई हैं।  

दिल्ली में TMC सांसदों का हंगामा: गृह मंत्रालय के बाहर 8 सांसदों का धरना, ममता ने कराई FIR

नई दिल्ली पश्चिम बंगाल में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, सियासी सरगर्मी बढ़ती जा रही है. गुरुवार को, कोलकाता में पॉलिटिकल कंसल्टेंसी और इलेक्शन मैनेजमेंट कंपनी I-PAC के दफ्तर में ईडी ने छापा मारा. इस दौरान सीएम ममता बनर्जी भी मौके पर पहुंचीं और इसके बाद मामले ने तूल पकड़ लिया. बंगाल में ईडी के खिलाफ दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज किया गया है. इसके साथ ही, मामला कोर्ट भी पहुंच गया है. TMC ने कोर्ट से ED की कार्रवाई को गैर-कानूनी घोषित करने और पार्टी के सभी गोपनीय दस्तावेज़ तुरंत वापस करने के निर्देश देने की मांग की है. इससे पहले दिन में, ED ने एक याचिका दायर की और दावा किया कि ये छापे 'बंगाल कोयला खनन' घोटाले से जुड़े थे और ममता पर आधिकारिक जांच में 'बाधा डालने' का आरोप लगाया है. प्रदर्शन में डेरेक ओ'ब्रायन, शताब्दी रॉय, महुआ मोइत्रा और कीर्ति आजाद जैसे प्रमुख सांसद शामिल हैं। टीएमसी सांसद ईडी की कोलकाता में आई-पैक कार्यालयों और इसके सह-संस्थापक प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। मौके पर पहुंची पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाया और महुआ मोइत्रा और डेरेक ओ'ब्रायन को हिरासत में लिया। मौके पर पहुंची पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाया है। TMC सांसद डेरेक ओ ब्रायन और महुआ मोइत्रा को दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ऑफिस के बाहर विरोध प्रदर्शन करते समय पुलिस ने हिरासत में ले लिया। टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन और महुआ मोइत्रा हिरासत में त्रिणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद रेक ओ ब्रायन और महुआ मोइत्रा को पुलिस ने हिरासत में लिया। यह कार्रवाई तब हुई जब दोनों सांसद केंद्र के गृह मंत्री अमित शाह के कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा 'हम भाजपा को हराएंगे। पूरा देश देख रहा है कि दिल्ली पुलिस एक चुने हुए सांसद के साथ कैसा व्यवहार कर रही है।' वहीं सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने भी कहा 'आप देख रहे हैं कि यहां सांसदों के साथ क्या हो रहा है।    बंगाल में ईडी की कार्रवाई का विरोध, तृणमूल सांसदों ने गृह मंत्री के घर के बाहर प्रदर्शन किया टीएमसी ने आरोप लगाया कि केंद्रीय एजेंसियां चुनाव से पहले पार्टी के रणनीतिक दस्तावेजों तथा डेटा को हाथ लगाने की कोशिश कर रही हैं, जिससे राजनीतिक माहौल और गरमाया गया है। पार्टी का कहना है कि यह कार्रवाई चुनाव वर्ष में राजनीतिक दबाव पैदा करने की साजिश का हिस्सा है। दिल्ली समेत कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन जारी है, जिसमें टीएमसी नेताओं ने प्रवर्तन निदेशालय की I‑PAC के खिलाफ छापेमारी का विरोध करते हुए केंद्र सरकार पर कड़ी टिप्पणियां कीं।  TMC सांसद कीर्ति आजाद ने कहा, "ED ने गलत तरीके से छापे मारे हैं, और यह अलोकतांत्रिक तरीके से चुनाव जीतने की कोशिश है, बीजेपी इस तरह से चुनाव नहीं जीत पाएगी…" सिर्फ चुनाव के दौरान ED, CBI TMC सांसद शताब्दी रॉय ने कहा कि कल ED की टीम भेजी और उन्हें चुनाव के समय सब कुछ याद आता है, वे सिर्फ जीतने के लिए चुनाव के दौरान ED, CBI की टीमें भेजते हैं, लेकिन वे चुनाव नहीं जीतेंगे…" प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी के खिलाफ ममता बनर्जी ने आज यानी शुक्रवार को विरोध मार्च निकालने की का ऐलान किया है. उन्होंने इस कार्रवाई को राजनीतिक रूप से प्रेरित और चुनावों से पहले TMC को डराने की कोशिश बताया. बंगाल कांग्रेस ने भी ईडी की छापेमारी का विरोध किया है. विपक्ष आए दिनों यह आरोप लगाता रहता है कि मोदी सरकार केंद्रीय जांच एजेंसियों के जरिए उनके नेताओं को जानबूझकर और चुन-चुनकर निशाना बना रही हैं. 

हुमायूं को TMC में मिलेगी तन्हाई? दूसरे दल नहीं दे रहे समर्थन

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले विधायक हुमायूं कबीर को खास राजनीतिक समर्थन नहीं मिल रहा है। तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें पहले ही निलंबित कर दिया है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और लेफ्ट ने भी उनसे किनारा किया है। यहां तक कि सांसद असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने भी दूरी बनाने का फैसला किया है। विधायक बने रहने का फैसला करने के बावजूद, कबीर ने सोमवार को दोहराया कि वह इस महीने के अंत में एक नया राजनीतिक दल बनाने की योजना पर आगे बढ़ेंगे। उन्होंने दावा किया, 'मैंने अभी तक कांग्रेस से बात नहीं की है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम ने उनके साथ बातचीत की जिम्मेदारी ली है। अगले विधानसभा चुनाव के लिए मुर्शिदाबाद में कांग्रेस और वाम दलों के साथ सीट के बंटवारे की प्रबल संभावना है।' भाजपा बोली- जिन्ना की भाषा बोल रहे भाजपा विधायक और बंगाल में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को कहा कि कबीर की बयानबाजी को ‘मुहम्मद अली जिन्ना की भाषा’ करार दिया। उन्होंने कहा कि यह 'बंगाली हिंदुओं के लिए सीधी चुनौती' है। उन्होंने आरोप लगाया, 'हमने स्पष्ट रूप से कहा है कि आप अपनी जमीन पर, अपने समुदाय के धन से, कानूनी तौर पर मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे बनाएं। लेकिन रेजिनगर में जो हुआ वह धार्मिक आस्था नहीं थी। यह राज्य के संरक्षण में कट्टरपंथियों का शक्ति प्रदर्शन था।' शुभेंदु ने कबीर पर सीधा निशाना साधते हुए कहा, 'हुमायूं कबीर अब जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह हुसैन सुहरावर्दी और मुहम्मद अली जिन्ना की भाषा से अलग नहीं है। यह एक चुनौती है, एक युद्धघोष है, यह सह-अस्तित्व की भाषा नहीं है।' सीट बदलेगी TMC? टीएमसी ने विधानसभा के अंदर भी कबीर से दूरी बनाए रखने का फैसला किया है। टीएमसी नेताओं ने कहा कि सदन में उनके बैठने की व्यवस्था बदली जाएगी। पीटीआई भाषा के अनुसार, पार्टी सूत्रों ने बताया कि विधायक बने रहने के उनके फैसले के बाद, तृणमूल कांग्रेस विधायक दल ने सत्तारूढ़ दल के सदस्यों से दूर रखने के लिए कबीर की सीट भाजपा सदस्यों की सीट के पास करने की पहल की है। इससे पहले, कबीर को उनके पूर्व मंत्री पद के कारण सत्ता पक्ष की सीट के पास अगली पंक्ति में सीट दी गई थी। तृणमूल कांग्रेस के मुख्य सचेतक निर्मल घोष ने कहा कि पार्टी स्थिति पर कड़ी नजर रख रही है। उन्होंने पीटीआई-भाषा को बताया, 'निलंबित विधायकों को विधानसभा में बैठने की व्यवस्था पर फैसला अगले कुछ दिन में लिया जाएगा।' पश्चिम बंगाल विधानसभा के कार्यकाल की समाप्ति से पहले सदन का शीतकालीन सत्र और अंतरिम बजट सत्र की बैठक होने की उम्मीद है। AIMIM ने क्या कहा हुमायूं कबीर ने खुद को पश्चिम बंगाल का ओवैसी बताया था। साथ ही खबरें थीं कि वह AIMIM के साथ गठबंधन भी करने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया था कि इस संबंध में ओवैसी से बात हुई है। हालांकि, AIMIM ने विधायक कबीर के साथ चुनावी गठजोड़ से सोमवार को इनकार किया और उनके प्रस्तावों को 'राजनीतिक रूप से संदिग्ध और वैचारिक रूप से असंगत' बताया। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सैयद असीम वकार ने कहा, 'सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कबीर को अधिकारी के राजनीतिक तंत्र का हिस्सा माना जाता है। और यह सर्वविदित है कि अधिकारी भाजपा के राष्ट्रीय स्तरीय नेतृत्व के मुख्य रणनीतिक ढांचे के भीतर काम करते हैं।' उन्होंने कहा, 'मुस्लिम समुदाय राष्ट्र निर्माण में विश्वास रखता है, उसे तोड़ने में नहीं। वह देश को मजबूत करने वाली ताकतों के साथ खड़ा है और अशांति और विभाजन पैदा करने वालों को नकारता है।' कांग्रेस ने निकाली सद्भावना यात्रा शनिवार को कांग्रेस ने आरोप लगाया कि टीएमसी और भाजपा, दोनों ही, उस जिले में धार्मिक आशंकाओं का फायदा उठा रहे हैं जहां ऐतिहासिक रूप से साम्प्रदायिक तनाव देखा गया है। कोलकाता में कांग्रेस के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने एक मस्जिद से मंदिर तक ‘सद्भावना रैली’ निकाली और लोगों से अपील की कि वे बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के बाद पैदा हुए साम्प्रदायिक भय के माहौल की वापसी को खारिज करें। प्रदेश कांग्रेस प्रमुख शुभंकर सरकार ने कहा, 'मंदिर और मस्जिद लोगों को ना तो रोजगार देंगे और ना ही भोजन। विभाजन की राजनीति बंद होनी चाहिए।' मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सीपीएम ने भी कबीर के फैसले से दूरी बनाई है। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है।

बंगाल में TMC के गुंडों ने BJP सांसद को पीटा, गजेंद्र सिंह बोले: महिलाएं भी असुरक्षित

बीकानेर राजस्थान के बीकानेर में केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह ने बयान दिया है। सिंह ने कहा कि पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में मेडिकल छात्रा के साथ हुए गैंगरेप मामले को लेकर देशभर में आक्रोश है। इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि रात में लड़कियों को कॉलेज के बाहर नहीं जाना चाहिए। इस बयान ने व्यापक विवाद खड़ा कर दिया है और विपक्षी दलों ने इसे महिलाओं के प्रति असंवेदनशील करार दिया है। केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह ने ममता सरकार पर कड़ा हमला बोलते हुए कहा कि बंगाल में सुरक्षा की स्थिति बेहद खराब है। उन्होंने कहा कि राज्य में न रात में कोई सुरक्षित है और न ही दिन में, और महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध इस बात का प्रमाण हैं। गजेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया कि एक महिला मुख्यमंत्री होते हुए ममता बनर्जी का यह बयान न केवल असंवेदनशील है, बल्कि इससे यह संदेश जाता है कि पीड़ितों को अपने आप को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी लेनी होगी, जबकि अपराधियों पर कठोर कार्रवाई नहीं हो रही। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि टीएमसी के गुंडों द्वारा भाजपा सांसद पर हाल ही में हमला किया गया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है, और इस तरह की अराजक परिस्थितियों में महिलाओं का असुरक्षित होना और उनके साथ दुराचार होना आम बात बन गई है। गजेंद्र सिंह ने कहा कि यदि मुख्यमंत्री ने अपराधियों पर कड़ी कार्रवाई की होती, तो यह स्पष्ट संदेश जाता कि भविष्य में कोई भी अपराध करने से पहले सोचेगा। गजेंद्र सिंह ने चेतावनी दी कि लोकतंत्र में ममता बनर्जी के इस बयान का जवाब अगले चुनाव में वहां की माताएं, बहनें और बेटियां निश्चित रूप से देंगी। वे कांग्रेस के नेता और पूर्व सांसद रामेश्वर डूडी को श्रद्धांजलि देने बीकानेर पहुंचे थे।

TMC ने INDIA ब्लॉक से दूरी बनाई, उपराष्ट्रपति चुनाव में रखी ये मांग

कलकत्ता उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर NDA और विपक्षी INDIA गठबंधन के बीच सियासी हलचल तेज हो गई है. एनडीए ने महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि विपक्षी पार्टियों के बीच अब भी आखिरी सहमति नहीं बन पाई है. सूत्रों के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस (TMC) का मानना है कि INDIA गठबंधन का उम्मीदवार तमिलनाडु से नहीं होना चाहिए, और साथ ही ममता बनर्जी की पार्टी ने उम्मीदवार को लेकर अपनी मंशा भी जाहिर की है. टीएमसी चाहती है कि विपक्ष एक नॉन-पॉलिटिकल उम्मीदवार उतारे, जो बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा के खिलाफ लड़ाई को मज़बूत कर सके. टीएमसी का कहना है कि यह चुनाव सिर्फ पद की लड़ाई नहीं बल्कि संविधान और "आइडिया ऑफ इंडिया" को बचाने की जंग है. टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास से निकलते समय बताया था कि "कल (मंगलवार) दोपहर 12.30 बजे मल्लिकार्जुन खड़गे के घर पर INDIA गठबंधन की बैठक होगी." उन्होंने भरोसा जताया कि विपक्ष शाम तक एक मजबूत उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर देगा. एनडीए ने सीपी राधाकृष्णन को बनाया है अपना उम्मीदवार दूसरी तरफ, एनडीए उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन का राजनीतिक करियर लंबा और प्रभावशाली रहा है. वह 31 जुलाई 2024 से महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं. इससे पहले फरवरी 2023 से जुलाई 2024 तक उन्होंने झारखंड के राज्यपाल के रूप में काम किया. इस दौरान उन्हें राष्ट्रपति की तरफ से तेलंगाना के राज्यपाल और पुडुचेरी के लेफ्टिनेंट गवर्नर का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया था. राधाकृष्णन तमिलनाडु से आने वाले वरिष्ठ बीजेपी नेता हैं और सार्वजनिक जीवन में उनका अनुभव चार दशकों से भी अधिक का है. वे दो बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं और कोयंबटूर से संसद पहुंचे थे. 2004 से 2007 तक उन्होंने तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभाई. उनकी पहचान आरएसएस विचारधारा से जुड़ी हुई है. सितंबर में होंगे उपराष्ट्रपति चुनाव उपराष्ट्रपति चुनाव 9 सितंबर 2025 को होना है. यह चुनाव पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफे के बाद कराया जा रहा है. अब देखना यह होगा कि INDIA गठबंधन किस उम्मीदवार को मैदान में उतारकर एनडीए के मुकाबले में खड़ा करता है.