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दिल्ली में बदले बस यात्रा के नियम, छात्राओं-महिलाओं को हो रही दिक्कत; पिंक टिकट की मांग उठी

नई दिल्ली दिल्ली की डीटीसी और क्लस्टर बसों में महिलाओं का फ्री सफर अब नए दौर में पहुंच चुका है। महिला यात्रियों के हाथ में अब गुलाबी टिकट की जगह पिंक कार्ड नजर आ रहा है। शनिवार से बसों में पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड अनिवार्य हो गया है। जैसे ही बस रुकती है, महिलाएं कार्ड निकाल कंडक्टर की तरफ बढ़ा रही हैं, बदले में टिकट ले रही हैं, लेकिन जिनके पास कार्ड नहीं है, वह पैसे देकर टिकट खरीदने को मजबूर हैं। ऐसा ही नजारा नेहरू प्लेस जाने वाली बस में दिखा। मेरे पास दिल्ली का रेजिडेंस प्रूफ नहीं है। इसलिए मेरा पिंक कार्ड नहीं बन पाया। मुझे पैसे देकर सफर करना पड़ा। मेरे 90 रुपये खर्च हो गए। पिंक कार्ड की जगह पुराना पिंक टिकट ही बेहतर था, कम खर्च में महिलाएं आराम से सफर कर सकती थीं। पिंक कार्ड के नए नियम से अनजान महिला-छात्राएं हुईं परेशान अपनी छोटी बच्ची के साथ बस में चढ़ी एक महिला ने जब कंडक्टर से पिंक टिकट मांगा, तो उसने कहा, 'अब से सिर्फ पिंक कार्ड चलेगा।' महिला ने बताया, 'मैं कभी-कभी ही बस में सफर करती हूं, मुझे नए नियम के बारे में पता नहीं था। मुझे नेहरू प्लेस जाना है, टिकट कितने का है?' कंडक्टर ने कहा, '25 रुपये दीजिए।' महिला बोली, 'मेरे पास तो सिर्फ 15 रुपये ही हैं।' कंडक्टर ने कहा, 'कोई बात नहीं, आप टिकट ले लीजिए।' ऐसा ही हाल गाजियाबाद से आई एक छात्रा का था, जिन्हें सर्वप्रिय विहार जाना था। वह दिल्ली की रहने वाली नहीं थीं, इसलिए न तो उनके पास पिंक कार्ड था और न ही जेब में पैसे। मैं रोज मंगलापुरी से आनंद विहार काम पर जाती हूं। आज सुबह सबसे पहले मंगलापुरी बस डिपो पर कार्ड बनवाने गई थी, लेकिन वहां काउंटर बंद मिला। जब काउंटर ही नहीं खुलेगा तो कार्ड कैसे बनेगा? पूनम शर्मा महिलाओं को बसों में हुई परेशानी मैं बस से ट्यूशन जाती हूं। मुझे कार्ड बनवाना पड़ा। पहले पिंक टिकट से सफर आसान था। अब कंडक्टर को कार्ड देकर इंतजार करना पड़ता है। इससे बस में भीड़ जमा हो जाती है और धक्का-मुक्की होती है। यात्री, तनीषा शौकीन कार्ड एक बार स्कैन होने के बाद अपडेट में दिक्कत मुनिरका से बस में चढ़ी एक महिला ने पहले पिंक कार्ड स्कैन करवाकर सर्वप्रिय विहार तक का टिकट लिया। बाद में उन्हें पता चला कि बस नेहरू प्लेस तक जा रही है। जब उन्होंने कंडक्टर से नेहरू प्लेस का टिकट मांगा तो मशीन में दोबारा कार्ड स्कैन करने पर टिकट नहीं निकला। कंडक्टर ने कई बार कोशिश की लेकिन मशीन ने जवाब दे दिया। इसी तरह कई महिलाएं परेशान दिखीं। 38 सेंटरों पर बन रहे हैं पिंक कार्ड दिल्ली परिवहन निगम (DTC) के अधिकारियों के अनुसार, पिंक कार्ड बनवाने के लिए कुल 38 सेंटर बनाए गए हैं। ये सभी सेंटर सोमवार को बंद रहते हैं। कार्ड का इस्तेमाल करते समय ध्यान रखें कि अगर आप एक बस में सफर कर रहे हैं, तो उसमें दोबारा कार्ड टैप करने पर टिकट नहीं मिलेगी क्योंकि इसके लिए 1 घंटे का कूलिंग पीरियड तय किया गया है। हालांकि, अगर आप उस बस से उतरकर उसी रूट की किसी दूसरी बस में चढ़ते हैं, तो आपको आसानी से तुरंत टिकट मिल जाएगी। दिल्ली में अब तक 19 लाख 50 हजार से भी ज्यादा पिंक कार्ड बनाए जा चुके हैं।  

घर में इस दिशा में रखें ब्रह्मकमल का पौधा, खिलने पर शुभ मानी जाती है इसकी पंखुड़ियां

ब्रह्म कमल (Saussurea obvallata) हिमालय में मिलने वाला पवित्र और दुर्लभ फूलों में से है, जिसे वास्तु शास्त्र में बहुत ही शुभ माना जाता है. इसे क्वीन ऑफ नाइट (Queen of Night) भी कहा जाता है क्योंकि यह फूल सिर्फ रात में खिलता है. वास्तु शास्त्र के अनुसार, इसे खिलते हुए देखना बहुत सौभाग्य की बात मानी जाती है, इसलिए लोग इसे देखने के लिए उत्तराखंड की 'वैली ऑफ फ्लावर्स' (Valley of Flowers) तक जाते हैं. लेकिन, हर किसी के लिए पहाड़ की इतनी ऊंचाई पर जाकर इसे देखना मुमकिन नहीं है. ऐसे में सवाल आता है कि क्या इसे घर पर उगाया जा सकता है. इसका जवाब है हां. आप इसे अपने घर पर भी उगा सकते हैं, बस इसके लिए आपको कुछ खास सावधानियां रखनी होंगी और सही माहौल देना होगा. क्या है ब्रह्म कमल? ब्रह्म कमल (Brahma Kamal) हिमालय में उगने वाली एक खास जड़ी-बूटी मानी जाती है. यह फूल भारत, नेपाल, भूटान और दक्षिण-पश्चिम चीन के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है. यह फूल ठंडे तापमान में ही उगता है. इसके कटोरे जैसे फूल बड़े बड़े पत्तों के बीच छुपे रहते हैं. ये रात में खिलता है और सुबह होते ही मुरझा जाते हैं. इसी वजह से इसे देखना बहुत ही दुर्लभ माना जाता है. ब्रह्म कमल को 'स्टेट फ्लावर ऑफ उत्तराखंड यानी राजकीय पुष्प' भी माना जाता है. साथ ही, ब्रह्म कमल की तस्वीर को भारतीय डाक टिकट पर भी छापा जाता था. ब्रह्म कमल की शुभ दिशा हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक, ब्रह्म कमल को बेहद पवित्र माना जाता है. इसका संबंध सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा से भी जोड़ा जाता है. वहीं, वास्तु शास्त्र के मुताबिक भी, यह पुष्प बहुत ही शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इसे घर की कुछ खास जगहों, जैसे घर के बीचों-बीच यानी ब्रह्मस्थान या उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण में रखने से घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक माहौल बना रहता है. ब्रह्म कमल की पौराणिक मान्यता ब्रह्म कमल को आम पौधों से बिल्कुल अलग बनाती है इसकी दुर्लभता. यह पौधा प्राकृतिक रूप से केवल जंगलों और पहाड़ी इलाकों में उगता है और इसका खिलना एक बेहद खास अनुभव माना जाता है. इसके फूल आमतौर पर सिर्फ रात में खिलते हैं और कुछ घंटों के बाद ही बंद हो जाते हैं. क्या ब्रह्म कमल घर में उगाया जा सकता है? जी हां, घर में भी ब्रह्म कमल उगाया जा सकता है. लेकिन, इसके लिए एकदम ठंडा तापमान होना चाहिए. इसको बाकी फूलों की तरह घर के अंदर उगाना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन, सही देखभाल और थोड़ी सी कोशिश से आप इस पवित्र पौधे को अपने घर में भी उगा सकते हैं. आइए जानते हैं इसे घर पर उगाने का आसान तरीका. ये रहना चाहिए तापमान- ब्रह्म कमल ठंडी और ऊंची जगहों पर अच्छे से बढ़ता है. इसे ज्यादा गर्मी और उमस बिल्कुल पसंद नहीं है. घर में आप इसे किसी ठंडी और छायादार जगह पर रख सकते हैं. अगर घर में एसी (AC) है, तो उसके आसपास की ठंडी जगह भी इसके लिए अच्छी रहती है. इस पौधे की मिट्टी कैसी होनी चाहिए? ब्रह्म कमल के लिए ऐसी मिट्टी चाहिए जिससे पानी आसानी से बाहर निकल जाए. इसके लिए आप रेत, मिट्टी और कोकोपीट को मिलाकर सही मिश्रण तैयार कर सकते हैं. साथ ही, इस पौधे को गमले में लंबे समय तक पानी में नहीं रखना चाहिए. – ऐसी चाहिए रोशनी ब्रह्म कमल को तेज धूप से बचाना चाहिए. खास तौर पर दोपहर की सीधी धूप से इसकी पत्तियां पीली पड़ सकती हैं या मुरझा सकती हैं. इसलिए इसे ऐसी जगह रखें जहां सीधी धूप न पड़े. – पानी देने का सही तरीका इस पौधे को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है. जब गमले की मिट्टी पूरी तरह सूख जाए, तभी पानी डालें. ज्यादा पानी देने से पौधे को नुकसान हो सकता है. – ब्रह्म कमल पौधा उगाने का तरीका बीज से पौधा उगाने में काफी समय लग सकता है, इसलिए घर पर इसे पत्तियों की कटिंग (Cutting) से उगाना ज्यादा आसान होता है. पत्ती को काटकर उसके कटे हिस्से को कुछ दिन सूखने दें ताकि उस पर हल्की परत जम जाए. इसके बाद इसे तैयार मिट्टी में लगा दें और गमले को ऐसी जगह रखें जहां हल्की और छनकर रोशनी आती हो. – उगाने में आएंगी ये मुश्किलें घर पर ब्रह्म कमल उगाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है क्योंकि इसकी ग्रोथ बहुत धीमी होती है और फूल आने में कई साल लग जाते हैं. सबसे जरूरी है कि पौधे के आसपास का तापमान ठंडा और एक जैसा रहे. बार-बार गमला बदलने या पानी देने में लापरवाही करने से पौधा खराब हो सकता है.

CM योगी आदित्यनाथ आज HCLTech के कार्यक्रम में होंगे शामिल, ‘टेक्नोलॉजी और टैलेंट’ पर रहेगा फोकस

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एचसीएलटेक के कार्यक्रम में आज होंगे शामिल  पावरिंग टेक्नोलॉजी, टैलेंट एंड ट्रांसफॉर्मेशन इन उत्तर प्रदेश थीम पर आयोजित होगा कार्यक्रम लखनऊ में एचसीएलटेक के 10 साल पूरे होने पर हो रहा समारोह   यूपी में टेक्नोलॉजी, टैलेंट और ट्रांसफॉर्मेशन पर होगा मंथन लखनऊ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज मंगलवार (06 अक्टूबर) को एचसीएलटेक के लखनऊ में संचालन के 10 वर्ष पूरे होने के अवसर पर एचसीएल आईटी सिटी में आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। कार्यक्रम की थीम पावरिंग टेक्नोलॉजी, टैलेंट एंड ट्रांसफॉर्मेशन इन उत्तर प्रदेश रखी गई है।  सीएम योगी की मौजूदगी में एचसीएलटेक के सफर के साथ उत्तर प्रदेश में आईटी और टेक्नोलॉजी क्षेत्र के विस्तार, रोजगार सृजन और भविष्य में निवेश की योजनाओं पर चर्चा होगी। इस दौरान एचसीएलटेक की अध्यक्ष रोशनी नादर मल्होत्रा और सीओओ राहुल सिंह कार्यक्रम को संबोधित करेंगे। एचसीएलटेक और एचसीएल फाउंडेशन ने तकनीकी क्षेत्र के साथ सामाजिक सरोकारों में भी भागीदारी की है। फाउंडेशन की पहल के जरिए प्रदेश के 20 जिलों के करीब 3,000 गांवों में आजीविका, कृषि, कौशल विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और समावेशन से जुड़े कार्यक्रम संचालित किए गए हैं।

सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को, जानें श्राद्ध-तर्पण का सही समय और किन पितरों के लिए करें पूजा

: पितृ पक्ष में आने वाली सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है. यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन होता है और इस दिन उन सभी पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारण से निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया. 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को मनाई जाएगी. सर्वपितृ अमावस्या तिथि (Sarva Pitru Amavasya 2026 Tithi) अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर की रात करीब 9 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 10 अक्टूबर की रात 9 बजकर 19 मिनट तक रहेगी. इसलिए श्राद्ध कर्म के लिए 10 अक्टूबर की तिथि महत्वपूर्ण रहेगी. सर्वपितृ अमावस्या क्यों मानी जाती है खास? सर्वपितृ अमावस्या को महालय अमावस्या भी कहा जाता है. यह पितृ पक्ष के समापन का दिन है. धार्मिक परंपरा में इसे उन पितरों के लिए विशेष माना गया है, जिनकी श्राद्ध तिथि याद नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारण से छूट गया हो. धार्मिक पंचांग परंपरा के अनुसार, अगर किसी पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या उस तिथि पर श्राद्ध नहीं किया जा सका, तो सर्वपितृ अमावस्या पर उनका श्राद्ध किया जा सकता है. इस दिन सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों का स्मरण करके श्रद्धा से तर्पण और श्राद्ध करने की परंपरा है. इसलिए अगर किसी कारण से पितृ पक्ष में किसी पूर्वज का श्राद्ध छूट गया हो, तो सर्वपितृ अमावस्या को उनके निमित्त श्राद्ध करने की परंपरा है. सर्वपितृ अमावस्या पर क्या करना चाहिए? इस दिन अपनी पारिवारिक परंपरा और पुरोहित की सलाह के अनुसार तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म किया जा सकता है. पितरों का स्मरण करते हुए जल, तिल आदि से तर्पण करने की परंपरा है. इसके अलावा कई परिवारों में श्राद्ध के अवसर पर गाय, कौवे और कुत्ते को भोजन कराने तथा जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र का दान करने की परंपरा भी है. कुछ क्षेत्रों में इसे पंचबली की परंपरा से जोड़ा जाता है. अगर सामर्थ्य और पारिवारिक परंपरा हो तो ब्राह्मण भोजन और दक्षिणा भी कराई जा सकती है. घर पर व्यवस्था संभव न हो तो मंदिर या किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन और अन्न का दान करना भी श्रद्धा से किया जा सकता है. क्या श्राद्ध से पहले खाना नहीं खाना चाहिए? यह नियम सभी परिवारों के लिए एक जैसा नहीं है. कई पारंपरिक विधियों में श्राद्धकर्ता के लिए संयम और सात्विक आहार का पालन बताया जाता है और कुछ परंपराओं में श्राद्ध कर्म पूरा होने तक भोजन न करने की व्यवस्था भी होती है. लेकिन इसे हर व्यक्ति के लिए एक अनिवार्य नियम की तरह नहीं बताया जाना चाहिए. व्रत, स्वास्थ्य, उम्र और पारिवारिक परंपरा के अनुसार नियम अलग हो सकते हैं. इसलिए अगर आप विधिवत श्राद्ध कर रहे हैं तो अपने पुरोहित से पहले ही पूछ लें कि उस विधि में भोजन कब करना है. श्राद्धकर्ता कौन बन सकता है? श्राद्धकर्ता को लेकर अलग-अलग धर्मशास्त्रीय परंपराओं में अलग व्यवस्थाएं मिलती हैं. सामान्य रूप से पुत्र द्वारा श्राद्ध करने की परंपरा प्रमुख रही है, लेकिन पुत्र न होने की स्थिति में अन्य निकट संबंधियों द्वारा श्राद्ध किए जाने के उल्लेख भी मिलते हैं. कुछ परंपराओं में पत्नी, पुत्री या अन्य परिजन भी विशेष परिस्थितियों में श्राद्ध कर सकते हैं. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर परिस्थिति में केवल बड़ा पुत्र ही श्राद्ध कर सकता है. परिवार की परंपरा और संबंधित संस्कार-विधि के अनुसार श्राद्धकर्ता का निर्धारण किया जा सकता है. अगर परिवार में एक से अधिक पुत्र हैं, तो अलग-अलग रहने वाले पुत्रों को लेकर भी अलग परंपराएं मिलती हैं. ऐसी स्थिति में स्थानीय पुरोहित से विधि पूछना सबसे उचित रहेगा. पितृ पक्ष में कैसा भोजन करना चाहिए? पितृ पक्ष के दौरान सात्विक और संयमित भोजन करने की परंपरा कई परिवारों में है. खासकर जिस दिन श्राद्ध किया जाता है, उस दिन श्राद्ध के भोजन की शुद्धता और विधि का विशेष ध्यान रखा जाता है. मांसाहार और मदिरा से परहेज करने की परंपरा व्यापक रूप से देखी जाती है. हालांकि प्याज, लहसुन, मसूर, उड़द, चना या कुछ दूसरी चीजों को लेकर नियम क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं. इसलिए इन्हें हर परिवार के लिए एक जैसा शास्त्रीय निषेध बताना उचित नहीं है. सर्वपितृ अमावस्या पर जरूर करें ये काम पितृ पक्ष में धार्मिक ग्रंथों का पाठ और भगवान का स्मरण कई परिवारों की परंपरा का हिस्सा है. श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ भी श्रद्धा से किया जा सकता है. लेकिन यह कहना कि सर्वपितृ अमावस्या पर गीता के पूरे 18 अध्याय या विशेष रूप से केवल सातवें अध्याय का पाठ करना ही शास्त्रों में अनिवार्य बताया गया है, उचित नहीं होगा. यह अधिक सही है कि व्यक्ति अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार गीता पाठ, मंत्र-जप या भगवान का स्मरण करें

बैटिंग की दादागीरी से नहीं मिलेगा वर्ल्ड कप, भारत को चाहिए ऐसी गेंदबाजी जो मैच छीन सके

नई दिल्ली 1983 और 2011… भारतीय क्रिकेट के ये दो साल सिर्फ विश्व कप जीतने की तारीखें नहीं हैं, बल्कि उस क्रिकेट की पहचान हैं, जिसमें भारत ने दुनिया को बताया था कि बड़े टूर्नामेंट कैसे जीते जाते हैं. 2027 में फिर वही गौरव हासिल करना है तो सिर्फ बल्लेबाजी के दम पर सपना देखना खतरनाक होगा. टीम इंडिया के पास बल्लेबाजी में रोहित शर्मा, विराट कोहली, केएल राहुल, शुभमन गिल और संजू सैमसन जैसे विकल्प हैं. रन बनाने की ताकत की कमी नहीं है. सवाल यह है कि रन बचाने और विकेट निकालने की ताकत कितनी है? क्रिकेट अब सिर्फ 350 रन बनाने का खेल नहीं रह गया है. बड़े टूर्नामेंट में असली परीक्षा तब होती है जब सामने वाली टीम भी 300-350 के पार जाने की स्थिति में हो. ऐसे में आपकी गेंदबाजी कितनी जल्दी मैच का रुख बदल सकती है, यही खिताब और सिर्फ अच्छे प्रदर्शन के बीच का फर्क बनती है. भारत अगर बल्लेबाजी की दादागीरी के भरोसे हर मुकाबला जीतने की सोचता रहेगा तो यह रणनीति लंबे टूर्नामेंट में जोखिम भरी होगी. एक खराब दिन बल्लेबाजों का आया और स्कोर 250-270 के आसपास अटक गया तो मैच बचाने के लिए गेंदबाजों के पास क्या हथियार होंगे? यहीं जसप्रीत बुमराह और हार्दिक पंड्या की भूमिका बेहद अहम हो जाती है. बुमराह 100 फीसदी फिट हों और हार्दिक अपनी पूरी गेंदबाजी क्षमता के साथ उपलब्ध हों तो टीम का संतुलन ही बदल जाता है. लेकिन सवाल सिर्फ दो खिलाड़ियों का नहीं है. 2027 विश्व कप के लिए भारत को ऐसी गेंदबाजी यूनिट चाहिए जो परिस्थितियों की मोहताज न हो और बड़े मुकाबलों में खुद मैच छीन सके. और इसके लिए सबसे जरूरी है- अब प्रयोगों की दुकान बंद कर विश्व कप के लिए चुनी जाने वाली टीम को साथ खेलने का पर्याप्त समय देना होगा. विश्व कप से छह महीने पहले टीम बनाने की कोशिश करने की बजाय कम से कम छह महीने पहले एक पक्का टीम संयोजन तैयार होना चाहिए. कौन नई गेंद संभालेगा, डेथ ओवर में कौन आएगा, बीच के ओवरों में विकेट कौन निकालेगा, बुमराह के साथ दूसरा और तीसरा तेज गेंदबाज कौन होगा, हार्दिक की मौजूदगी में टीम का संतुलन कैसा होगा- इन सवालों के जवाब टूर्नामेंट शुरू होने से काफी पहले मिलने चाहिए. बल्लेबाजी में पांच बड़े नाम होने से टीम कागज पर मजबूत दिख सकती है, लेकिन विश्व कप कागज पर नहीं जीते जाते. वहां एक विकेट मैच बदलता है, एक स्पेल कहानी बदलता है और एक दबाव भरा ओवर पूरा अभियान बदल सकता है. 1983 की टीम के पास कपिल देव थे, 2011 की टीम के पास जहीर खान… दोनों टीमों में बल्लेबाजी सितारों से भरी थी, लेकिन खिताब तक पहुंचने के लिए गेंदबाजी ने भी अपनी भूमिका निभाई. इसलिए 2027 का सवाल यह नहीं होना चाहिए कि भारत के पास कितने बड़े बल्लेबाज हैं. सवाल यह होना चाहिए कि क्या भारत के पास इतने धारदार गेंदबाज हैं जो बड़े मैच में सामने वाली टीम की बल्लेबाजी की कमर तोड़ सकें? अगर जवाब अभी पूरी तरह साफ नहीं है तो वक्त अभी भी है. लेकिन वक्त को प्रयोगों में गंवाने की बजाय योजना में लगाना होगा. 2027 में 1983 और 2011 का गौरव दोहराना है तो बैटिंग की दादागीरी के साथ गेंदबाजी में भी बारूद चाहिए. वरना 350 रन भी कभी-कभी कम पड़ सकते हैं  

पितृ पक्ष में चीटियों को आटा-चीनी खिलाने से क्या होता है? जानें धार्मिक मान्यताओं से जुड़े रहस्य

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनकी तृप्ति के लिए बेहद समर्पित माना जाता है. इस दौरान लोग पिंडदान, तर्पण और दान-पुण्य के जरिए अपने पितरों को याद करते हैं. पितृ पक्ष में दान और जीवों की सेवा का विशेष महत्व बताया गया है, जिनमें से चीटियों को आटा या चीनी डालना एक बेहद महत्वपूर्ण उपाय माना जाता है. क्या आपने कभी सोचा है कि विशेष रूप से इन दिनों में चीटियों को भोजन कराना क्यों जरूरी माना गया है? गरुड़ पुराण और धार्मिक मान्यताओं में इससे जुड़े कई गहरे रहस्य और कारण बताए गए हैं. आइए जानते हैं कि पितृ पक्ष के दौरान चीटियों की सेवा करने से पितृ क्यों प्रसन्न होते हैं. गरुड़ पुराण में जीव सेवा का महत्व हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथों, विशेषकर गरुड़ पुराण में यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि मनुष्य के द्वारा किए गए कर्मों का प्रभाव केवल इंसानों पर ही नहीं, बल्कि समस्त जीव-जंतुओं पर भी पड़ता है. ऐसा माना जाता है कि मृत्यु के बाद आत्माएं विभिन्न योनियों में भटकती हैं. चीटियां और अन्य सूक्ष्म जीव भी सृष्टि का एक अहम हिस्सा हैं. पितृ पक्ष में चीटियों को आटा डालने से चींटी जैसे छोटे जीवों की भूख शांत होती है, जिससे उनका आशीर्वाद अदृश्य रूप से हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लेकर आता है. – चीटियों को खिलाने से दूर होते हैं दोष ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, चीटियों का संबंध राहु-केतु और शनि जैसे ग्रहों से भी जोड़ा जाता है. जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से या विशेषकर पितृ पक्ष में चीटियों को शक्कर मिला हुआ आटा डालता है, तो उसके कई प्रकार के ग्रह दोष और बाधाएं शांत होने लगती हैं. इससे जीवन में आ रही अड़चनें दूर होती हैं. – ऋणों और पापों से मुक्ति का मार्ग धर्मग्रंथों में कहा गया है कि अनजाने में हमसे कई छोटे-छोटे जीव-हत्या के पाप हो जाते हैं, जिन्हें 'पंच महायज्ञ' या जीव सेवा के माध्यम से संतुलित किया जाता है. चीटियों को भोजन कराने से चींटी ऋण और अन्य सूक्ष्म जीवों के प्रति कर्ज से मुक्ति मिलती है. इसे चींटी सेवा या 'कीड़ी नगर' डालना भी कहा जाता है, जो पुण्य का बड़ा काम माना गया है. – पितरों की तृप्ति और उनका आशीर्वाद ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृ पक्ष में हमारे पूर्वज किसी न किसी रूप में हमारे आसपास या जीवों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं. जब हम चीटियों या अन्य बेजुबान जानवरों को अन्न दान करते हैं, तो उससे मिलने वाला पुण्य सीधा हमारे पितरों तक पहुंचता है. इससे पितृ तृप्त होते हैं और अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. चीटियों को आटा डालते समय किन बातों का रखें ध्यान? साफ-सुथरी जगह चुनें: चीटियों को हमेशा खुले में, पेड़ के नीचे या उनके बिल के पास साफ स्थान पर ही आटा डालना चाहिए. शक्कर या बूरा मिलाएं: सादे आटे की जगह उसमें थोड़ा सा चीनी या बूरा मिलाकर डालने से चीटियां आसानी से उसे ग्रहण कर पाती हैं. नियमितता का रखें ख्याल: यदि आप पितृ पक्ष के दौरान यह नियम अपनाते हैं, तो इसे श्रद्धा और निरंतरता के साथ करें, जिससे आपको इसका पूर्ण आध्यात्मिक लाभ मिल सके.

ग्रामीणों को बड़ी राहत! मकान पर संपत्ति कर से छूट, ईंट भट्ठे से मोबाइल टावर तक आएंगे टैक्स के दायरे में

पटना सरकार गांव वालों को बड़ी राहत देने जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में घर अथवा व्यावसायिक संपत्ति पर लगने वाले कर को लेकर पंचायती राज विभाग ने नियमावली में सुधार की औपचारिकता पूर्ण कर ली है। नई नियमावली में ऐसी कर व्यवस्था तैयार की गई जिससे ग्रामीणों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े और पंचायतों की स्थानीय आय के स्रोत भी स्पष्ट हो सकें। इसके लिए विधान मंडल से पारित कानून एवं नियमावली संशोधन किया गया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के निर्देश पर गत दिनों पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की अध्यक्षता में विभागीय अधिकारियों के साथ हुई बैठक में इस पर सहमति बनी। प्रस्तावित सुधार के तहत गांवों में सामान्य आवासीय मकान या निजी व्यावसायिक संपत्ति पर सीधे संपत्ति कर लगाने की व्यवस्था में बदलाव किया गया है। विभाग का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां शहरी क्षेत्रों से अलग हैं, इसलिए नगर निकायों की तर्ज पर ग्रामीण क्षेत्रों में संपत्ति आधारित कर व्यवस्था लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा। पंचायती राज विभाग पंचायतों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए कर एवं शुल्क से जुड़े दूसरे विकल्पों पर काम पूरा कर लिया है। नियमावली में यह स्पष्ट किया जाएगा कि पंचायतें किन सेवाओं अथवा स्थानीय सुविधाओं के एवज में शुल्क ले सकती हैं। इससे पंचायतों को आय का स्रोत मिलेगा और ग्रामीणों पर सीधे संपत्ति कर का भार भी नहीं पड़ेगा। विभाग स्तर पर पूर्व नियमावली को शिथिल कर नए प्रविधानों की समीक्षा के उपरांत संशोधन का प्रारूप तैयार किया जा रहा है। इसमें कर निर्धारण, वसूली और पंचायतों की आय से जुड़े प्रविधानों को सरल और स्पष्ट करने पर बल रहेगा। नई व्यवस्था का उद्देश्य पंचायतों की वित्तीय क्षमता बढ़ाने के साथ ग्रामीणों के हितों का संरक्षण करना है। नियमावली में संशोधन के बाद पंचायतों को स्थानीय स्तर पर संसाधन जुटाने के लिए अधिक स्पष्ट अधिकार मिल सकेंगे। निजी स्कूल, मोबाइल टावर, रेस्टोरेंट पर टैक्स नए प्रविधान के तहत ईंट भट्ठे, निजी स्कूल, मोबाइल टावर, रेस्टोरेंट, चावल मिल, निजी अस्पताल आदि को कर के दायरे में लाने की तैयारी है। इसी तरह बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान से कर वसूली की तैयारी है। होर्डिंग, बैनर आदि व्यावसायिक गतिविधियों पर कर देना होगा। मकान मालिक को व्यावसायिक संपत्ति पर कर नहीं देना होगा। पंचायती राज विभाग कैबिनेट से शीघ्र प्रस्ताव स्वीकृत कराएगा। गांवों का नेटवर्क     गांवों की संख्या: 45,103     पंचायतों की संख्या: 8041  

‘मछली’ की कहानी के बाद यूपी के जंगलों की बारी, नल्ला मुथु बनाएंगे वन्यजीवन पर खास डॉक्यूमेंट्री

लखनऊ  रणथंभौर की बाघिन ‘मछली’ की जिंदगी को नौ साल कैमरे में कैद कर दुनिया को उसकी कहानी दिखाने वाले मशहूर वन्यजीव फिल्मकार सुब्बैया नल्ला मुथु अब प्रदेश के जंगलों की अनकही कहानियां दुनिया तक पहुंचाएंगे। बाघों की जिंदगी और जंगल की धड़कन को कैमरे के जरिये कहानी में बदलने वाले नल्ला के अनुभव का लाभ अब प्रदेश के वन्यजीव संरक्षण और प्राकृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने में लिया जाएगा। इसके लिए आठ अक्टूबर को वन विभाग उनके साथ एमओयू करेगा। एमओयू के तहत दुधवा टाइगर रिजर्व, पीलीभीत, रानीपुर व अमानगढ़ टाइगर रिजर्व आदि में डाक्यूमेंट्री और अन्य फिल्मांकन की दिशा में काम होगा। मुथु को तराई के जंगलों में शूटिंग के लिए तीन वर्ष का समय मिलेगा। बाघों के साथ ही यहां की जैव विविधता, प्राकृतिक आवास, वन्यजीवों के व्यवहार और संरक्षण की चुनौतियों को कहानी का हिस्सा बनाया जा सकता है। दुर्लभ वन्यजीव और समृद्ध जैव विविधता मौजूद यह पहल इसलिए भी अहम है क्योंकि तराई के जंगलों में बाघों के साथ हाथी, गैंडा, बारहसिंघा समेत कई दुर्लभ वन्यजीव और समृद्ध जैव विविधता मौजूद है। गौरतलब है कि मुथु के लिए वन्यजीव फिल्मांकन महज कैमरे से वीडियो बनाना नहीं, बल्कि जंगल में लंबे समय तक रहकर उसके किरदारों को समझना रहा है। रणथंभौर की ‘मछली’ पर बनाई गई उनकी फिल्म ‘द वर्ल्ड्स मोस्ट फेमस टाइगर’ को 66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ पर्यावरण फिल्म का पुरस्कार मिला। उन्होंने करीब नौ वर्ष तक मछली और उसके वंश की कहानी को कैमरे में दर्ज किया था। वर्ष 2024 में मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में उन्हें वी. शांताराम लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड भी मिला था। पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल कर चुके नल्ला के चर्चित काम में ‘टाइगर डायनेस्टी’, ‘टाइगर क्वीन’ और ‘लाइफ फोर्स’ जैसी वन्यजीव फिल्में शामिल हैं। 1987 से फिल्म निर्माण से जुड़े नल्ला ने 11 सीरीज और 55 डाक्यूमेंट्री बनाने के साथ भारतीय वन्यजीवों पर व्यापक काम किया है। इससे पहले वह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में हाई-स्पीड कैमरा विशेषज्ञ के रूप में भी काम कर चुके हैं।  

कैसा होगा कलयुग का अंत? धर्मग्रंथों में बताए गए हैं ये संकेत और भविष्यवाणियां

 कल्पना कीजिए उस समय की, जब दुनिया में धर्म का नाम लेने वाला कोई नहीं होगा. जब इंसानों की उम्र लगातार घटती जाएगी और आखिर में मनुष्य की औसत आयु महज 20 साल रह जाएगी. जब छोटी उम्र में ही बाल सफेद होने लगेंगे और इंसान का जीवन पाप, लालच और अधर्म से घिर जाएगा. धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में कलयुग के अंतिम चरण को लेकर कई तरह के वर्णन मिलते हैं. इन वर्णनों के अनुसार, जैसे-जैसे कलयुग अपने चरम पर पहुंचेगा, वैसे-वैसे धर्म, सत्य, दया, पवित्रता, क्षमा और मनुष्य की आयु में कमी आती जाएगी. लेकिन सवाल है कि आखिर कलयुग का अंत कैसा होगा? क्या समुद्र और नदियां सूख जाएंगी? और सबसे बड़ा सवाल, इस घोर अधर्म के बीच भगवान विष्णु का कल्कि अवतार कैसे होगा? आइए जानते हैं पुराणों में बताए गए कलयुग के अंतिम समय की उस कथा के बारे में. जब 20 साल की उम्र ही बन जाएगी बुढ़ापे की निशानी धार्मिक ग्रंथों में कलयुग के अंतिम चरण को बेहद भयावह बताया गया है. मान्यता है कि इस दौर में मनुष्य की आयु लगातार कम होती जाएगी. आज जहां 20 साल की उम्र को युवावस्था की शुरुआत माना जाता है, वहीं कलयुग के अंतिम चरण में यही उम्र जीवन के अंतिम पड़ाव के करीब मानी जाएगी. कहा गया है कि इंसानों के शरीर में भी समय से पहले बुढ़ापे के लक्षण दिखाई देने लगेंगे. कम उम्र में ही बाल सफेद होने लगेंगे और शारीरिक शक्ति तेजी से घटने लगेगी. यानी जिस उम्र में आज के युवा अपना करियर और भविष्य बनाने के बारे में सोचते हैं, उस समय इंसान अपने जीवन के अंत के करीब पहुंच चुका होगा. रिश्ते और परिवार भी कमजोर पड़ जाएंगे कलयुग के अंतिम समय को लेकर शास्त्रों में सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों के पतन का भी वर्णन मिलता है. धर्म, सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा और संयम जैसी चीजें धीरे-धीरे समाप्त होती जाएंगी. पति-पत्नी के रिश्तों में भी विश्वास और सम्मान कम होता जाएगा. लोग स्वार्थ और अपनी इच्छाओं को रिश्तों से ऊपर रखने लगेंगे. परिवार की जगह धन और व्यक्तिगत लाभ को ज्यादा महत्व दिया जाएगा. धार्मिक वर्णनों में तो यहां तक कहा गया है कि उस समय अच्छे चरित्र की पहचान भी व्यक्ति के आचरण से नहीं, बल्कि उसके पास मौजूद धन से की जाएगी. जिसके पास धन होगा, वही सम्मानित माना जाएगा कलयुग के अंतिम चरण में धन ही प्रतिष्ठा का सबसे बड़ा आधार बन जाएगा. जिस व्यक्ति के पास जितना ज्यादा धन होगा, समाज उसे उतना ही प्रभावशाली और गुणवान समझेगा. उसके परिवार और कुल की प्रतिष्ठा भी धन के आधार पर तय की जाएगी.  वहीं गरीब व्यक्ति को अपमानित और अयोग्य समझा जाएगा. धन के लिए लोग अपने ही रिश्तेदारों और मित्रों के खिलाफ खड़े हो जाएंगे. लालच इतना बढ़ जाएगा कि इंसान अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जाने से पीछे नहीं हटेगा. धर्म की जगह अधर्म का बोलबाला होगा कलयुग के अंतिम समय में धर्म का पालन करने वाले लोगों की संख्या बेहद कम रह जाने की बात कही गई है. लोग धार्मिक ग्रंथों और वेदों की बातें तो करेंगे, लेकिन उनके जीवन में उनका पालन दिखाई नहीं देगा. कुछ धार्मिक गुरु भी अपने स्वार्थ के लिए लोगों का इस्तेमाल करेंगे. वे ज्ञान की बातें करेंगे, लेकिन उनके आचरण में धर्म और सदाचार की कमी होगी. वहीं चालाक, लोभी और स्वार्थी व्यक्ति को ही बुद्धिमान और सफल माना जाएगा. धरती पर अन्न उगना भी मुश्किल हो जाएगा. पुराणों में कलयुग के अंतिम चरण में प्राकृतिक असंतुलन का भी वर्णन मिलता है. मान्यता है कि धरती की उर्वरता कम होती जाएगी और अन्न का उत्पादन प्रभावित होगा. बारिश अनियमित हो जाएगी और मौसम का संतुलन बिगड़ जाएगा. कहीं भयंकर गर्मी होगी तो कहीं कड़ाके की ठंड. आंधी, बाढ़ और दूसरे प्राकृतिक संकट बढ़ सकते हैं. कुछ धार्मिक वर्णनों में तो यह भी कहा गया है कि सूर्य का तेज इतना बढ़ जाएगा कि नदियां और समुद्र तक सूखने लगेंगे. जब तीर्थों की जगह छोटे तालाबों को महत्व मिलेगा कलयुग के अंत से जुड़े धार्मिक वर्णनों में यह भी कहा गया है कि लोगों की धार्मिक आस्था और परंपराओं में इतना बदलाव आ जाएगा कि पवित्र तीर्थों के महत्व को भी लोग भूलने लगेंगे. लोग दूर स्थित पवित्र नदियों और तीर्थस्थलों की जगह अपने आसपास मौजूद छोटे जलस्रोतों को ही तीर्थ मानने लगेंगे. यह वर्णन सिर्फ भौगोलिक बदलाव की बात नहीं करता, बल्कि उस समय मनुष्य की सोच और धार्मिक मूल्यों में आने वाले बदलाव की ओर भी संकेत करता है. कलयुग का सबसे बड़ा प्रतीक होगा कली पुरुष धार्मिक मान्यताओं में कली पुरुष को कलयुग के अधर्म और बुराइयों का प्रतीक माना गया है. जैसे-जैसे अधर्म बढ़ेगा, कली की शक्ति भी बढ़ती जाएगी. उसका प्रभाव मनुष्यों की सोच और व्यवहार पर पड़ने लगेगा. लोग धीरे-धीरे लोभ, क्रोध, हिंसा, छल और स्वार्थ के रास्ते पर जाने लगेंगे. कहा जाता है कि कली पुरुष को सबसे ज्यादा शक्ति अधर्म से ही मिलेगी. जितना अधर्म बढ़ेगा, उतना ही उसका प्रभाव भी बढ़ता जाएगा. फिर होगा भगवान कल्कि का अवतार लेकिन सनातन परंपरा में एक बात हमेशा कही गई है कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब धर्म की पुनर्स्थापना के लिए ईश्वर अवतार लेते हैं. कलयुग के अंत में भगवान विष्णु के दसवें अवतार भगवान कल्कि के अवतार की मान्यता है. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब अधर्म अपने चरम पर पहुंच जाएगा और धर्म लगभग समाप्त हो जाएगा, तब भगवान कल्कि अवतार लेकर अधर्म का नाश करेंगे और धर्म की दोबारा स्थापना करेंगे. मान्यता है कि भगवान कल्कि सफेद घोड़े पर सवार होकर प्रकट होंगे. उनके घोड़े का नाम देवदत्त बताया जाता है. वे हाथ में तलवार धारण करके अधर्म और अत्याचार का अंत करेंगे. भगवान कल्कि के गुरु होंगे परशुराम भगवान कल्कि से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में भगवान परशुराम का भी विशेष स्थान बताया गया है. परशुराम को विष्णु का छठा अवतार माना जाता है और वे चिरंजीवी माने गए हैं. मान्यता है कि भगवान परशुराम ही भगवान कल्कि को युद्ध और धर्म का ज्ञान देंगे. धार्मिक प रंपराओं में यह भी कहा जाता है कि परशुराम आज भी महेंद्र पर्वत पर तपस्या कर रहे … Read more

पंजाब में किसानों का बड़ा प्रदर्शन, बठिंडा-मानसा में प्रशासनिक दफ्तरों पर लगाया ताला

 बठिंडा  पंजाब के विभिन्न जिलों में मांगों को लेकर किसानों की ओर से जिला प्रबंधकीय परिसर के सभी गेटों का बंद कर धरना-प्रदर्शन किया जा रहा है।किसान सोमवार से यहां धरना-प्रदर्शन करने में जुटे हैं। इस दौरान किसी भी कर्मचारी को अंदर जाने नहीं दिया गया। इस कारण जिला प्रबंधकिय परिसर में बने सभी सरकारी दफ्तरों में काम बंद पड़ा है। मानसा में भी दिखा असर वहीं, मानसा में भी किसान जिला प्रबंधकीय परिसर के गेट पर लगा रहे हैं। इस बीच किसान संगठन उगराहा की ओर से मंगलवार सुबह प्रबंधन के परिसर को जाने वाले दोनों गेट को बंद करते धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया गया। प्रशासन की ओर से किसानों के प्रदर्शन को देखते धरना स्थल के आसपास पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। इस दौरान किसी भी अधिकारी और कर्मचारियों को प्रबंधन के परिसर के अंदर और बाहर जाने की अनुमति नहीं है। नतीजन डीसी, एसएसपी समेत अन्य विभागों के अधिकारी अपने दफ्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं। बेशक सोमवार को जिले में मुख्यमंत्री की लोक मिलनी को लेकर पूरा प्रशासन गांव फत्ता मालोका में व्यस्त होने के कारण बड़े अधिकारी दफ्तर तक नहीं पहुंच पाए, लेकिन किसानों ने मंगलवार सुबह ही प्रबंधकीय कॉम्प्लेक्स के बाहरी गेट से आगे बढ़ते परिसर के अंदर जाने वाले दोनों दरवाजों को बंद करते सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की गई। किसान नेता राम सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री गांव की चौपाल में लोगों की समस्या हल करने के दावे कर रहे हैं, लेकिन किसानी मांगों को लेकर पिछले महीने डीसी दफ्तरों के आगे दिन रात का धरना देने के बाद भी सरकार उनकी मांगे मानने को मंजूर नहीं है। किसान नेता ने कहा कि संगठन की प्रदेश कमेटी नेताओं कि फैसले अनुसार प्रबंधकीय कांप्लेक्स का। घेराव जारी रहेगा। प्रदर्शन में ही लंगर का प्रबंध प्रबंधकीय कांप्लेक्स में धरने पर बैठे किसानों के लिए लंगर की व्यवस्था भी की गई है ताकि किसान लंगर खाने के लिए इधर-उधर में जा सके।