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भाजपा प्रवक्ता ने की मांग, चांदनी चौक का नाम बदलकर शीश गंज चौक रखने का पत्र दिल्ली सरकार को भेजा

चंडीगढ़  भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की पंजाब ईकाई ने दिल्ली के चांदनी चौक का नाम शीश गंज रखने की मांग की है. 25 नवंबर को गुरु तेग बहादुर की 350वीं शहीदी वर्षगांठ से पहले पार्टी ने ये अपील की है. पंजाब बीजेपी के नेता और पार्टी प्रवक्ता प्रीतपाल सिंह बलियावाल ने दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को लेटर लिखकर ये मांग की. बलियावाल ने लिखा, यह भारत के सहिष्णुता, बहादुरी और आस्था की स्वतंत्रता के मूल्यों के प्रति ऐतिहासिक श्रद्धांजलि होगी. उन्होंने कहा कि वह एक सिख और एक भारतीय दोनों के रूप में गहरी श्रद्धा के साथ गुरु तेग बहादुर जी, हिंद की चादर के अद्वितीय बलिदान को याद करने के लिए लिख रहे हैं. गुरु तेग बहादुर ने धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा और मानवता की अंतरात्मा की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया. चुप्पी के बजाय बलिदान को चुना उन्होंने कहा कि चांदनी चौक का नाम बदलकर शीश गंज रखने से गुरु तेग बहादुर जी की शहादत की भावना अमर हो जाएगी और आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाया जाएगा कि भारत उन लोगों की वजह से मजबूत है, जिन्होंने चुप्पी के बजाय बलिदान को चुना. उन्होंने मुख्यमंत्री से इस प्रस्ताव पर संवेदनशीलता और गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया. मानवता की अंतरात्मा की रक्षा के लिए दिया बलिदान  बलियावाल ने अपने पत्र में लिखा है कि वह गुरु नानक देव जी की 556वीं जयंती के इस पवित्र अवसर पर ‘हिंद की चादर’ गुरु तेग बहादुर के अद्वितीय बलिदान को याद करने के लिए एक सिख और एक भारतीय दोनों रूप में गहरी श्रद्धा के साथ यह पत्र लिख रहे हैं. गुरु तेग बहादुर ने धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा और मानवता की अंतरात्मा की रक्षा के लिए बलिदान दिया. निर्दोष लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए किया गया मजबूर  उन्होंने लिखा कि औरंगजेब के अधीन मुगल शासन के दौरान 1675 में धार्मिक उत्पीड़न अपने चरम पर था. उस समय मंदिरों को नष्ट कर दिया गया, धर्मग्रंथों को जला दिया गया और निर्दोष लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया. पंडित कृपा राम के नेतृत्व में 500 से अधिक कश्मीरी पंडितों ने अपने धर्म की रक्षा के लिए श्री आनंदपुर साहिब में गुरु तेग बहादुर से मुलाकात की. गुरु साहिब ने उनकी पीड़ा सुनकर सर्वोच्च बलिदान देने का निर्णय लिया. उन्होंने कहा कि गुरु तेग बहादुर का सिर उसी स्थान पर काटा गया था, जहां आज गुरुद्वारा शीशगंज साहिब स्थित है, यह स्थान साहस, बलिदान और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा का प्रतीक है. बलियावाल ने आग्रह किया कि चांदनी चौक का नाम बदलकर शीशगंज करना और आसपास के मेट्रो स्टेशन को इन शहीदों को समर्पित करना एक प्रशासनिक निर्णय से कहीं बढ़कर होगा. शीश गंज गुरुद्वारा का क्या है महत्व? शीश गंज गुरुद्वारा का क्या महत्व है, बलियावाल ने इसके बारे में भी बताया.उन्होंनेलिखा कि 1675 में मुग़ल शासन के दौरान धार्मिक उत्पीड़न अपने चरम पर था. मंदिरों को नष्ट कर दिया गया, धर्मग्रंथों को जला दिया गया और निर्दोष लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया. पंडित कृपा राम के नेतृत्व में 500 से ज़्यादा कश्मीरी पंडितों ने अपने धर्म की रक्षा के लिए श्री आनंदपुर साहिब में गुरु तेग बहादुर से संपर्क किया. बीजेपी नेता ने लिखा कि गुरु साहिब ने सरबत दा भला के सिद्धांत को कायम रखने के लिए सर्वोच्च बलिदान देने का निर्णय लिया. उन्होंने कहा कि गुरु तेग बहादुर का सिर उसी स्थान पर काटा गया था जहां आज गुरुद्वारा श्री शीश गंज साहिब स्थित है, यह स्थान आज भी साहस, बलिदान और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा का प्रतीक है. उन्होंने लिखा, इस पवित्र स्थान से गुजरने वाले हर व्यक्ति को यह याद दिलाया जाएगा कि यह वह भूमि है जहां सत्य के लिए सिर कुर्बान किया गया था, लेकिन सत्य से कभी समझौता नहीं किया गया. बलियावाल ने कहा कि मुख्यमंत्री के नेतृत्व में ऐसा निर्णय दुनिया भर के करोड़ों सिखों और भारतीयों को गर्व और श्रद्धा से भर देगा और एकता तथा सर्वधर्म सम्मान का एक मजबूत संदेश देगा  

तीनों दरिंदों के खिलाफ हिम्मत दिखा छात्रा ने खुद को छुड़ाया, ग्वालियर में दिनदहाड़े किडनैपिंग की कोशिश नाकाम

ग्वालियर  ग्वालियर जिले में महिला सुरक्षा को शर्मसार कर देने वाली घटना, लेकिन साथ ही एक छात्रा की बहादुरी ने पूरे शहर को झकझोर दिया। दिनदहाड़े महिला पॉलिटेक्निक कॉलेज और महिला थाने के बीच तीन बदमाशों ने छात्रा को ऑटो में जबरन बैठाने की कोशिश की। लेकिन छात्रा ने ऐसी हिम्मत दिखाई कि आरोपी भाग खड़े हुए। घटना  सुबह 11 बजे की है जब ऑटो में सवार दो युवकों ने छात्रा का हाथ पकड़ उसे उठाने की कोशिश की। तीसरा ऑटो चालक उसे गाड़ी में बैठाने के लिए कह रहा था। छात्रा ने पूरे दम से विरोध किया और भागकर महिला पुलिस थाने की ओर दौड़ पड़ी। डर के मारे आरोपी ऑटो छोड़कर फरार हो गए। अद्भुत साहस दिखाते हुए, नाबालिग छात्रा ने खुद को उनके चंगुल से छुड़ाया और मदद के लिए महिला पुलिस थाने की ओर दौड़ी। हालांकि, मदद पहुंचने से पहले ही, आरोपी ऑटोरिक्शा छोड़कर पैदल ही भाग गए। दिनदहाड़े हुए इस घटनाक्रम से छात्रा दहशत में है। पुलिस ने केस दर्ज कर तीन आरोपितों बीरेंद्र सिंह, हरेंद्र गुर्जर और गौरव रावत को गिरफ्तार किया है। उनसे पूछताछ की जा रही है। घटना महिला थाना से चंद कदम की दूरी पर हुई। पड़ाव थाना क्षेत्र में साया होटल के पास रहने वाली 17 वर्षीय बालिका ने बताया कि वह पॉलीटेक्निक गर्ल्स कालेज में पढ़ती है। सुबह पौने 11 बजे कॉलेज जा रही थी। महिला थाने से थोड़ा आगे ऑटो खड़ा था। उसके पीछे वाली सीट पर बैठे दो युवक उसके हाथ-पैर पकड़कर जबरन बैठाने लगे और ड्राइवर को आटो चालू को कहा। पीड़िता जैसे-तैसे खुद को उनके चंगुल से छुड़ाते हुए पड़ाव चौराहे की ओर भागी। कुछ देर बाद ऑटो ड्राइवर और उसमें सवार आरोपित भी भाग गए। पुलिस ने ऑटोरिक्शा जब्त कर लिया है और आरोपियों से पूछताछ की जा रही है। पड़ाव पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर शैलेंद्र भार्गव ने कहा कि हमने अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और सीसीटीवी फुटेज के जरिए उनकी पहचान करके तीनों को गिरफ्तार कर लिया है। घटना महिला थाने से महज 50 कदम की दूरी पर हुई और पूरी वारदात CCTV में कैद है। पुलिस ने ऑटो जब्त कर लिया है और आरोपियों को भी पुलिस ने पकड़ लिया है, जिनसे पूछताछ की जा रही है। 

विशप हाउस, ग्वालियर में धर्मांतरण जांच, 23 स्टूडेंट्स में 18 ओडिशा से; फादर का बयान – माता-पिता ईसाई

ग्वालियर ग्वालियर में एक क्रिश्चियन संस्था द्वारा संचालित एक विशप परिसर में कथित तौर पर धर्मांतरण का मामला सुलझ गया है. हिंदूवादी संगठनों ने आरोप लगाया था कि ग्वालियर के   मुरार-बड़ागांव इलाके में ईसाई मिशनरी एक सेंट जोसेफ स्कूल परिसर का संचालन करती है, उसी स्कूल परिसर में बिशप के निवास पर 26 बच्चों का धर्मांतरण कर धार्मिक शिक्षा दी जा रही है.  विश्व हिंदू परिसर (विहिप) नेता पप्पू वर्मा ने बताया कि उन्हें सूचना मिली थी कि बड़ागांव के पास क्रिश्चियन मिशनरी सेंट जोसेफ स्कूल में कुछ गरीब बच्चों को लाकर उनका धर्मांतरण कराया गया है. वह बच्चे छत्तीसगढ़, झासखंड, केरल, उड़ीसा आदि राज्यों के हैं. दरअसल, सूचना मिली थी कि चर्च के फादर की निगरानी में विशप हाउस के अंदर छात्रों को धर्मगुरु बनने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इन छात्रों में ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के निवासी शामिल हैं। जिनमें से कई आदिवासी हैं। सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासन की टीम सक्रिय हुई और तत्काल विशप हाउस पहुंची। अधिकारियों ने बच्चों से संबंधित सभी रिकॉर्ड की जांच की। चर्च प्रबंधन से फंडिंग, भूमि रिकॉर्ड और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई और सभी आवश्यक दस्तावेज लिए गए। इस दौरान यह जानकारी सामने आई कि विशप हाउस में कुल 23 छात्र पढ़ रहे हैं। इनमें से 18 छात्र ओडिशा, 3 मध्य प्रदेश (झाबुआ से 2, मोहना से 1) और 2 छत्तीसगढ़ से हैं। बताया जा रहा है कि प्रारंभिक जांच में धर्मांतरण की बात सामने नहीं आई है। फिर भी मामले की बारीकी से जांच की जा रही है कि कही दूर-दूर तक इसका धर्मांतरण से नाता तो नहीं है। बच्चों से जुड़े कागजात किए चेक हिंदू संगठनों की शिकायत पर जिला प्रशासन और पुलिस की टीम भी मौके पर पहुंच गई. उन्होंने वहां मौजूद विशप, स्टाफ और सभी 26 बच्चों से भी बातचीत की. वहां सभी के डॉक्युमेंट भी चेक किए. टीम को वहां धर्मांतरण जैसा कुछ नहीं मिला. वहां मिले विशप डेनियल फ्रांसिस का कहना था कि यहां सिर्फ कैथोलिक बच्चों की पढ़ाई होती है, जिन्हें भाषा की शिक्षा दी जाती है. धर्मांतरण जैसा कुछ भी नहीं है. उन्होंने हर तरह की जांच में सहयोग करने की बात कही. कई घंटे की जांच पड़ताल के बाद एसडीएम एनसी गुप्ता और मुरार के सीएसपी मनीष यादव ने बताया कि यहां धर्मांतरण के आरोप गलत और भ्रामक हैं. जांच से पता चला कि यहां पढ़ रहे सभी के माता पिता कृश्चियन हैं और ये सब कैथोलिक हैं, जिनकी पुष्टि डॉक्युमेंट से हो गई है. हाई स्कूल के बाद बच्चे अपनी स्किल डेवलपमेंट और भाषा की ट्रेनिंग के लिए पहुंचे थे. यहां बच्चों को ट्रेनिंग के दौरान हिंदी और अंग्रेजी भाषा की पढ़ाई कराते हैं. ग्वालियर अंचल में कुल 18 स्कूल संचालित हो रहे हैं. जांच में पता चला कि बड़ागांव स्थित ईसाई मिशनरी के हॉस्टल में बच्चों के परिजन भी समय-समय पर मिलने आते हैं.

अंग्रेजों की सत्ता को चुनौती देने से राष्ट्रीय पहचान तक: वंदे मातरम की कहानी और विरोध के कारण

नई दिल्ली भारत की स्वतंत्रता संग्राम की गूंज में एक ऐसा गीत है जो न केवल राष्ट्रप्रेम की भावना जगाता है, बल्कि मातृभूमि को देवी के रूप में पूजने की परंपरा को जीवंत करता है। 'वंदे मातरम'- ये दो शब्द आज भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में गूंजते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह गीत कैसे और कब रचा गया? कैसे यह बंगाल के एक उपन्यास से निकलकर पूरे देश की आवाज बन गया? और कैसे यह स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बना, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी? आइए, इतिहास की उन पन्नों को पलटें जहां राष्ट्रवाद की लौ पहली बार प्रज्वलित हुई। वंदे मातरम की जड़ें 19वीं सदी के बंगाल में हैं, जब भारत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। इस गीत के रचयिता थे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, जिन्हें बंगाली साहित्य का पितामह कहा जाता है। बंकिम चंद्र एक प्रशासनिक अधिकारी थे, लेकिन उनकी रचनाएं राष्ट्रवाद की आग से भरी हुई थीं। गीत की रचना 7 नवंबर 1875 को हुई, जब बंकिम चंद्र अपने घर में बैठे थे। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, यह गीत एकाएक प्रेरणा से लिखा गया। बंकिम ने इसे संस्कृत और बंगाली के मिश्रण में रचा, जहां संस्कृत श्लोक मातृभूमि की महिमा गाते हैं और बंगाली हिस्सा भावनात्मक गहराई प्रदान करता है। गीत की पहली पंक्तियां हैं: वंदे मातरम्। सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्। शस्यशामलां मातरम्॥ यह गीत सबसे पहले उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ, जो 1882 में पूरा हुआ और धारावाहिक रूप में बंगाली पत्रिका बंगदर्शन में छपा। उपन्यास की पृष्ठभूमि 18वीं सदी का संन्यासी विद्रोह है, जहां भूखे संन्यासी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह करते हैं। 'वंदे मातरम' उपन्यास में संन्यासियों का युद्धगीत है, जो मातृभूमि को दुर्गा देवी के रूप में चित्रित करता है। बंकिम चंद्र ने गीत को संगीतबद्ध करने के लिए अपने भतीजे को प्रेरित किया, लेकिन मूल धुन बाद में जादवपुर विश्वविद्यालय के संगीतकारों द्वारा विकसित की गई। गीत की रचना का उद्देश्य स्पष्ट था – भारतीयों में मातृभूमि के प्रति प्रेम और विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष की भावना जगाना। स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका: ब्रिटिशों की नींद उड़ाने वाला नारा वंदे मातरम महज एक गीत नहीं रहा; यह स्वतंत्रता संग्राम का युद्धघोष बन गया। 1896 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार इसे सार्वजनिक रूप से गाया गया, जब रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे अपनी धुन में प्रस्तुत किया। टैगोर की आवाज ने गीत को अमर बना दिया। 1905 के बंगाल विभाजन के दौरान यह गीत स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक बना। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेता इसे रैलियों में गाते थे। ब्रिटिश सरकार इतनी भयभीत हुई कि 1907 में उन्होंने गीत गाने पर प्रतिबंध लगा दिया। फिर भी, क्रांतिकारी जैसे अरविंद घोष और सुभाष चंद्र बोस इसे गुप्त रूप से गाते रहे। महात्मा गांधी ने भी इसे सराहा, लेकिन पूरे गीत को अपनाने में संकोच किया क्योंकि इसमें हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख था, जो मुस्लिम समुदाय को अलग कर सकता था। फिर भी, आंदोलन में इसका प्रभाव असीम था। 1937 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे ऑर्केस्ट्रा में प्रस्तुत किया, जिसने इसे वैश्विक स्तर पर पहुंचाया। राष्ट्रीय गीत का दर्जा: 1950 की ऐतिहासिक घोषणा स्वतंत्रता के बाद वंदे मातरम को राष्ट्रीय सम्मान मिला। 24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा ने इसे राष्ट्रीय गीत घोषित किया। यह निर्णय डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में लिया गया। उसी दिन जना गना मन को राष्ट्रीय गान बनाया गया।राष्ट्रीय गीत के रूप में केवल उपन्यास के पहले दो छंदों को अपनाया गया, क्योंकि पूरे गीत में विद्रोही तत्व थे और धार्मिक संदर्भ मुस्लिम लीग की आपत्तियों के कारण विवादास्पद थे। जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आजाद ने समझौता किया। आज, सरकारी समारोहों में पहले दो छंद गाए जाते हैं। वंदे मातरम विवादों से अछूता नहीं रहा। 2006 में शताब्दी समारोह के दौरान कुछ मुस्लिम संगठनों ने धार्मिक आधार पर विरोध किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे राष्ट्रप्रेम का प्रतीक माना। गीत की विरासत फिल्मों, स्कूलों और खेल आयोजनों में जीवित है। देश भर में हो रहा आयोजन राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में देश भर में 150 महत्वपूर्ण स्थानों पर आयोजित कार्यक्रमों में सामूहिक रूप से ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में ऐसे ही एक कार्यक्रम में भाग लेंगे। संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री हिस्सा लेंगे। इसके साथ ही विभिन्न कार्यक्रमों की शुरुआत होगी। इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में होने वाले उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री मोदी मुख्य अतिथि होंगे। समारोह सात नवंबर की सुबह सार्वजनिक स्थानों पर स्कूली बच्चों, कॉलेज के छात्रों, अधिकारियों, निर्वाचित प्रतिनिधियों, पुलिसकर्मियों और डॉक्टरों सहित नागरिकों की भागीदारी के साथ 'वंदे मातरम' के पूर्ण संस्करण के सामूहिक गायन के साथ शुरू होगा। मंत्रालय ने कहा कि गीत के ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व को देखते हुए, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में राष्ट्रव्यापी समारोहों को मंजूरी दी थी। अधिकारियों ने बताया कि उद्घाटन समारोह में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम, 'वंदे मातरम' के 150 वर्षों के इतिहास पर एक प्रदर्शनी, एक लघु वृत्तचित्र फिल्म का प्रदर्शन और एक स्मारक डाक टिकट और सिक्का जारी किया जाएगा। मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलमा ने ‘वंदे मातरम’ कार्यक्रम को बताया गैर-इस्लामिक, सरकार से निर्देश वापस लेने की मांग जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के धार्मिक संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलेमा (MMU) ने बुधवार को केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार के एक आदेश की कड़ी आलोचना की है। इस आदेश में स्कूलों को ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में सांस्कृतिक और संगीत कार्यक्रम आयोजित करने तथा सभी विद्यार्थियों और शिक्षकों की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित करने को कहा गया है। एमएमयू की अगुवाई मीरवाइज उमर फारूक कर रहे हैं। उन्होंने इस निर्देश को 'गैर-इस्लामिक' और 'आरएसएस प्रेरित हिंदू विचारधारा थोपने की कोशिश' करार दिया है। संयुक्त बयान में ग्रैंड मुफ्ती नासिर-उल-इस्लाम और मौलाना रहमतुल्लाह समेत कई धार्मिक नेताओं ने कहा कि यह आदेश इस्लाम की मूल आस्था- तौहीद (अल्लाह की एकता) के सिद्धांत के विरुद्ध है। उन्होंने उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से इस … Read more

UP को मिली नई वंदे भारत एक्सप्रेस: लखनऊ से सहारनपुर तक सफर होगा और तेज, जारी हुआ पूरा शेड्यूल

मुरादाबाद आठ नवंबर को हाइ स्पीड ट्रेन लखनऊ से सहारनपुर के बीच वंदे भारत एक्सप्रेस का शुभारंभ हो रहा है। इसको लेकर बुधवार को डीआरएम कार्यालय में तैयारियां तेज हो गई हैं। अवकाश के दिन भी अधिकारी प्लेटफार्म, स्वागत मंच, अतिथियों की सूची, सांस्कृतिक कार्यक्रम की रूपरेखा और सुरक्षा प्रबंधों पर अहम चर्चा हुई। सांसद रुचि वीरा व क्षेत्रीय विधायकगण को आमंत्रित किया गया है।लखनऊ में उद्घाटन कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्चुअली हिस्सा लेंगे। यह ट्रेन लखनऊ से सुबह 5 बजे रवाना होगी और मुरादाबाद में सुबह 9:27 बजे प्रवेश करेगी, इसके बाद दोपहर 12:45 बजे सहारनपुर पहुंचेगी। लखनऊ से मुरादाबाद तक का मार्ग लगभग 325 किमी है। इस ट्रैक पर वंदे भारत ट्रेन को मुरादाबाद तक पहुंचने में लगभग 4 घंटे 37 मिनट का समय लगेगा। इस वजह से सामान्य ट्रेनों की तुलना में मुरादाबाद तक पहुंचने में करीब एक घंटे की बचत होगी। यह ट्रेन सप्ताह में सोमवार को छोड़कर छह दिन चलेगी और इसमें कुल सात स्टेशन पर ठहराव होगा। लखनऊ, सीतापुर, शाहजहांपुर,बरेली, मुरादाबाद,नजीबाबाद, रुड़की, सहारनपुर। सीनियर डीसीएम आदित्य गुप्ता का कहना है कि लखनऊ से मुरादाबाद आगमन पर आठ नवंबर को वंदे भारत एक्सप्रेस का स्वागत किया जाएगा। इसकी तैयारियां तेजी पर हैं। जिम्मेदारियों सौंप दी गई हैं।  लखनऊ से सहारनपुर के बीच समय सारिणी लखनऊ (प्रस्थान) सुबह 05:00 बजे सीतापुर सुबह 05:55 बजे शाहजहाँपुर जंक्शन सुबह 07:10 बजे बरेली जंक्शन सुबह 08:08 बजे मुरादाबाद जंक्शन सुबह 09:27 बजे नजीबाबाद जंक्शन सुबह 10:45 बजे रुड़की दोपहर 11:40 बजे सहारनपुर (अंतिम) दोपहर 12:45 बजे वापसी रूट सहारनपुर से 15:00 बजे रवाना, रुड़की 15:35, नजीबाबाद 16:40, मुरादाबाद 18:10, बरेली 19:33, शाहजहाँपुर 20:38, सीतापुर 21:50, लखनऊ 23:00।   मंडल को मिली चौथी वंदेभारत एक्सप्रेस मुरादाबाद रेल मंडल को चौथी वंदेभारत एक्सप्रेस मिली है। मेरठ से वाराणसी, देहरादून से लखनऊ, दिल्ली से देहरादून अब चौथी लखनऊ से मुरादाबाद होकर सहारनपुर के लिए वंदेभारत एक्सप्रेस मिली है।  

टाटा मोटर्स का सम्मान: वर्ल्ड चैंपियन बेटियों को गिफ्ट में दी जाएगी Sierra एसयूवी

मुंबई  भारतीय महिला क्रिकेट टीम की ऐतिहासिक जीत का जश्न मनाने के लिए टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल ने एक अनोखा कदम उठाया है. कंपनी टीम की हर सदस्य को जल्द लॉन्च होने वाली नई Tata Sierra की एक-एक यूनिट भेंट करेगी. यह सिर्फ एक तोहफ़ा नहीं, बल्कि उनके अदम्य साहस, समर्पण और देश को गौरवान्वित करने की भावना के प्रति एक सच्चा सम्मान होगा. बीते 2 नवंबर को हुए वूमेंस वर्ल्ड कप फाइनल में भारतीय टीम ने साउथ अफ्रीका को 52 रनों से करारी शिकस्त दी थी. यह पहला मौका था जब भारतीय महिला टीम ने वर्ल्ड कप जीता था. इस प्रतियोगिता में भारतीय खिलाड़ियों ने गेंद और बल्ले से वो करिश्मा कर दिखाया था, जिसका इंतजार सालों से था. अब मौका है इस ऐतिहासिक जीत का जश्न मनाने का और इन खिलाड़ियों को सम्मानित करने का.  टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल लिमिटेड के एमडी और सीईओ शैलेश चंद्र ने कहा, “भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने अपने असाधारण प्रदर्शन और शानदार जीत से पूरे देश को गर्व का एहसास कराया है. उनका सफर दृढ़ निश्चय और विश्वास की ताकत का प्रतीक है, जो हर भारतीय को प्रेरित करता है. टाटा मोटर्स के लिए यह गर्व की बात है कि हम इन लीजेंड्स को एक और लीजेंड – Tata Sierra – भेंट कर रहे हैं. यह दो दिग्गजों की साझी भावना और अनंत प्रेरणा का प्रतीक है.” टीम के हर मेंबर को मिलेगा टॉप मॉडल टाटा मोटर्स ने ऐलान किया है कि, भारत को विश्वविजयी बनाने वाली महिला क्रिकेट टीम के हर सदस्य को एक-एक टाटा सिएरा एसयूवी भेंट की जाएगी. टाटा सिएरा को आगामी 25 नवंबर 2025 को लॉन्च किया जाना है. कंपनी टाटा सिएरा के फर्स्ट बैच को तोहफे में देगी और इसमें एसयूवी का टॉप मॉडल शामिल होगा.   कैसी है नई Tata Sierra  भारत में 90 के दशक का ऑटोमोबाइल इतिहास जब लिखा जाएगा, तो Tata Sierra का नाम उसमें सुनहरे अक्षरों में दर्ज रहेगा. यह वही एसयूवी थी जिसने देश को पहली बार 'लाइफस्टाइल व्हीकल' की झलक दिखाई थी. अब तीन दशक बाद, टाटा मोटर्स इस दिग्गज ब्रांड को फिर से जीवंत करने रही है और टाटा सिएरा को बिल्कुल नए अंदाज में पेश करने की तैयारी है.   एक्सटीरियर डिज़ाइन नई Sierra अपने डिज़ाइन में अतीत की झलक और मॉर्डन टेक्नोलॉजी का अद्भुत मिश्रण लेकर आएगी. इसमें स्कल्प्टेड बोनट, शार्प एंगल लाइन्स, और ब्लैक्ड-आउट ग्रिल पर उकेरा गया ‘SIERRA’ नेमप्लेट है. इसके साथ फ्रंट में कनेक्टेड LED लाइट बार, डुअल-टोन अलॉय व्हील्स और पिलर्स पर दिया गया कलर डिटेलिंग, पुराने Sierra के मशहूर 'रैप-अराउंड ग्लास' लुक को आधुनिक अंदाज़ में पेश करती है. कैसा होगा केबिन इंटीरियर की बात करें तो नई Sierra में ट्रिपल-स्क्रीन सेटअप होगा, जिसमें डिजिटल इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर, इंफोटेनमेंट यूनिट और को-पैसेंजर डिस्प्ले शामिल है. SUV में Level-2 ADAS, पैनोरमिक सनरूफ, वेंटिलेटेड फ्रंट सीट्स, डुअल-जोन क्लाइमेट कंट्रोल और एडवांस्ड कनेक्टिविटी जैसे फीचर्स मिलेंगे. इंजन ऑप्शन टाटा की मल्टी-पावरट्रेन स्ट्रैटेजी के तहत, Sierra को पहले अलग-अलग इंजन विकल्पों के साथ पेश किया जाएगा. और अगले साल इसके ऑल-इलेक्ट्रिक वेरिएंट के रूप को भी बाजार में उतारा जाएगा. इसमें 1.5-लीटर टर्बो पेट्रोल इंजन और 2.0-लीटर टर्बो डीज़ल इंजन मिलने की उम्मीद है, जो मैनुअल और ऑटोमैटिक दोनों ट्रांसमिशन के साथ आएंगे. क्या होगी कीमत हालांकि लॉन्च से पहले Tata Sierra की कीमत के बारे में कुछ भी कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी. लेकिन इसकी कीमतें 13.50 लाख से 24 लाख रुपये (एक्स-शोरूम) के बीच होने की उम्मीद है. बाजार में इसका मुकाबला Mahindra Thar Roxx और MG Hector जैसी एसयूवी से होगा.

बीजापुर में विकास की नई पहल: माओवाद प्रभावित सात गांवों में पहली बार आयोजित हुआ मेगा हेल्थ कैंप

 बीजापुर में विकास की दस्तकः धुर माओवाद प्रभावित क्षेत्र के सात गांवों में पहली बार लगा मेगा हेल्थ कैंप 989 ग्रामीणों को मिला उपचार का लाभ रायपुर कभी माओवाद की छाया में सिमटे बीजापुर जिले के भैरमगढ़ ब्लॉक के इन्द्रावती नदी पार बसे गांवों में अब विकास की नई सुबह दिखने लगी है। छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति 2025 के सकारात्मक परिणाम अब धरातल पर नजर आने लगे हैं। बड़ी संख्या में माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद अब इन दुर्गम इलाकों में प्रशासन ने पहली बार सात गांवों में एक साथ मेगा हेल्थ कैंप का आयोजन किया, जिसने ग्रामीणों के जीवन में उम्मीद की नई किरण जगा दी। इस अभियान में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम शामिल रही। टीम ने उसपरी, बेलनार, सतवा, कोसलनार, ताड़पोट, उतला और इतामपार गांवों में स्वास्थ्य शिविर लगाए। कुल 989 ग्रामीणों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। कैंप में सामान्य जांच के 777, रक्तचाप 371, मुख कैंसर 344, ब्रेस्ट कैंसर 112, नेत्र जांच 199, दंत जांच 154, टीकाकरण 14, संपूर्ण टीकाकरण 8, मलेरिया 156, क्षय रोग 7 तथा उल्टी-दस्त के 24 प्रकरणों की जांच की गई। इनमें 54 वरिष्ठ नागरिक भी शामिल रहे।  विशेषज्ञों ने एक बालक को हृदय रोग से ग्रस्त पाया, जिसे ‘चिरायु योजना’ के तहत उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा प्रदान की जाएगी। कैंप के दौरान बीमार ग्रामीणों का मौके पर ही उपचार कर मुफ्त दवाइयों का वितरण किया गया। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अनुरूप साहू और डॉ. बी.एस. साहू ने बताया कि अब दूरस्थ अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाएं सुलभ हो रही हैं, जिससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय सुधार की उम्मीद है। ग्रामीणों में भी अब भय की जगह विश्वास और आशा का माहौल दिखाई दे रहा है। वे शासन-प्रशासन से जुड़कर शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के प्रति सजग हो रहे हैं। बीजापुर कलेक्टर  संबित मिश्रा ने स्वास्थ्य विभाग की टीम को बधाई देते हुए कहा “शासन के निर्देशानुसार प्रशासन अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के लिए संकल्पित है। ‘नियद नेल्लानार योजना’ के तहत अंदरुनी क्षेत्रों में विकास कार्यों में तेजी आई है और प्रशासन की टीमें पूरी तत्परता से काम कर रही हैं।”जिससे बीजापुर में अब सकारात्मक बदलाव नजर आ रहे है। बीजापुर में यह पहल न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को बढ़ाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रही है, बल्कि यह संदेश भी दे रही है कि अब माओवाद नहीं, मुख्यधारा और विकास ही बीजापुर की नई पहचान बनेगा।

दिल्ली की हवा अब होगी साफ? चीन की तकनीक देगी प्रदूषण पर ‘नियंत्रण’

नई दिल्ली दिल्ली में वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर के बीच चीन ने दिल्ली और आसपास के इलाकों में इस समस्या से निपटने के लिए मदद की पेशकश की है। 2010 के दशक की शुरुआत में दिल्ली और बीजींग दोनों ही धुंध और वायु प्रदूषण के अत्यधिक और खतरनाक स्तर से जूझ रहे थे, जहां पीएम 2.5 की सांद्रता नियमित रूप से 500 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक थी। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर वार्षिक दिशानिर्देश से 50 गुना ज्यादा थी। नवंबर 2025 तक बीजींग ने निरंतर सुधारों के जरिये वायु प्रदूषण की समस्या पर काफी हद तक अंकुश लगाने में सफलता हासिल कर ली है। आइये जानते हैं चीन ने बीजींग की हवा को कैसे साफ किया।   चीन की दिल्ली को प्रदूषण में मदद की पेशकश नई नीतियों के साथ कड़ाई से लागू किए गए नियम चीनी सरकार ने एक राष्ट्रीय अभियान शुरू किया, जिसमें नई नीतियों के साथ नए नियम बना कर उनको कड़ाई से लागू किया। चीन ने सबसे पहले बीजींग को चुना। यहां दूसरे देशों के दूतावास हैं और वायु प्रदूषण की समस्या चीन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का कारण बन गई थी। तमाम बदलाव लाने वाली तकनीकों का परीक्षण बीजींग में किया गया और इसके सकारात्मक नतीजे सामने आने के बाद इसे दूसरी जगहों पर भी लागू किया गया। लो एमिसन जोन की रणनीति वायु प्रदूषण से निपटने और विशिष्ट क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता में सुधार लाने की बीजींग की रणनीति में लो एमिसन जोन(एलईजेड) जैसी पहलों ने महत्पपूर्ण भूमिका निभाई। बीजिंग ने प्रदूषण नियंत्रण में सफलता पाई ये क्षेत्र उच्च-उत्सर्जन वाले वाहनों के प्रवेश को सीमित करते हैं, जिससे परिवहन के स्वच्छ और अधिक पर्यावरण-अनुकूल साधनों के उपयोग को बढ़ावा मिलता है। इसके अतिरिक्त, शहर ने प्रदूषणकारी औद्योगिक सुविधाओं को बंद करके और ही¨टग प्रणालियों को उन्नत करके कोयले की खपत को कम करने के लिए काम किया।गैस आधारित इंडस्ट्री बीजींग ने कोयले के इस्तेमाल में कमी लाने में अग्रणी भूमिका निभाई। 3,000 छोटे बायलरों को चरणबद्ध तरीके से बंद किया और 2017 तक कोयले के इस्तेमाल को 1.5 करोड़ टन तक सीमित कर दिया। यानी 30 प्रतिशत की कटौती। प्राकृतिक गैस और नवीकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों ने इस कमी को पूरा किया, और शहर ने 4 गीगावाट सौर और पवन ऊर्जा क्षमता बढ़ाई। वाहनों के प्रदूषण पर नियंत्रण का तरीका बीजींग ने लाइसेंस प्लेट लाटरी के •ारिए वाहनों की संख्या सीमित कर दी और मेट्रो नेटवर्क का विस्तार 1,000 किलोमीटर तक कर दिया। कैसे साफ हुई बीजींग की हवा? बीजींग ने सार्वजनिक परिवहन, साइकिलिंग और नवीकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों से चलने वाले ई-वाहनों को अपनाया है, जिससे शहर के परिवहन परि²श्य में नया बदलाव आया है। 2020 तक, सब्सिडी और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास से नई बिक्री में इलेक्टि्रक वाहनों का योगदान 40 प्रतिशत तक पहुंच गया। 2,000 से ज्यादा कारखाने बंद हो गए या स्थानांतरित हो गए, और सर्दियों के दौरान इस्पात उत्पादन में कटौती की गई। निगरानी और पेड़ लगाने पर जोर निगरानी के मोर्चे पर काफी काम किया गया। 1,500 स्टेशनों के एक राष्ट्रव्यापी नेटवर्क ने रियल टाइम पीएम2.5 डाटा उपलब्ध कराया। सार्वजनिक ट्रेकिंग के लिए 'ब्लू स्काई' जैसे एप को सशक्त बनाया गया। बीजींग के आसपास 10 करोड़ पेड़ लगाए। इससे पेड़ों ने बड़ी मात्रा में कार्बन का अवशोषण किया और हवाओं के प्रदूषण को कम करने में बड़ा योगदान दिया। ये रहे नतीजे 2013 से 2017 तक, बीजींग में पीएम2.5 का स्तर 35 प्रतिशत से घटकर 89.5 से 58 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रह गया। इसी अवधि में राष्ट्रीय औसत में 25 प्रतिशत की गिरावट आई। 2020 तक, तीन-वर्षीय कार्य योजना ने कोयले की खपत में 15 करोड़ टन की और कटौती की और कुल खपत में स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत तक बढ़ा दी। सांस की दिक्कतों से जुड़े मामलों में 20 प्रतिशत की कमी आई। औसत आयु पर असर वायु गुणवत्ता में सुधार ने लोगों की जीवन प्रत्याशा को बढ़ाने में योगदान दिया है। बीजींग में, पीएम2.5 के स्तर में गिरावट से स्थानीय जीवन प्रत्याशा में लगभग 4.6 वर्ष की वृद्धि होने का अनुमान है। राष्ट्रीय स्तर पर 2013 से औसत जीवन प्रत्याशा में दो वर्ष की वृद्धि हुई है। 2013 और 2020 के बीच, चीन वायु प्रदूषण में कुल वैश्विक कमी के लगभग तीन-चौथाई के लिए जिम्मेदार था। इसके विपरीत, बांग्लादेश, भारत, नेपाल और पाकिस्तान सहित दक्षिण एशियाई देशों में 2000 के बाद से कण प्रदूषण में ¨चताजनक वृद्धि देखी गई है।  

IPS प्रमोशन पर लगी ब्रेक: MP में पहली बार डीपीसी निरस्त, पांच अधिकारियों को निराशा

भोपाल राज्य पुलिस सेवा से आईपीएस संवर्ग में पदोन्नति के लिए 12 सितंबर को हुई विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की कार्रवाई निरस्त कर दी गई है। प्रदेश में पहली बार है जब इसे निरस्त किया गया है। इसमें पांच अधिकारियों को पदोन्नत किया जाना था। बताया जा रहा है कि 1997 बैच के अधिकारी अमृत मीणा के जाति प्रमाण पत्र संबंधी दस्तावेजों में कुछ उलझन के चलते छानबीन की जा रही है। साथ ही एक अन्य दावेदार की विभागीय जांच भी चल रही है। मामले पर कोई भी बोलने के लिए तैयार नहीं डीपीसी की कार्रवाई रद होने की इन्हें ही मुख्य वजह माना जा रहा है। हालांकि, कोई भी अधिकारी इस मामले में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों की उपस्थिति में भोपाल में ही डीपीसी हुई थी, जिसमें मुख्य सचिव अनुराग जैन, डीजीपी कैलाश मकवाणा और अपर मुख्य सचिव गृह शिव शेखर शुक्ला सम्मिलित हुए थे। सामान्यत: 15 से 20 दिन में पदोन्नति की अधिसूचना जारी कर दी जाती है, पर डेढ़ माह बाद इसे रद कर दिया गया है।   डीपीसी में 15 लोगों के नामों पर विचार किया गया डीपीसी में 1997 और 1998 बैच के 15 अधिकारियों के नामों पर विचार किया गया था। इसमें सीताराम सस्त्या, अमृत मीणा, विक्रांत मुराब, सुरेंद्र कुमार जैन, आशीष खरे, राजेश रघुवंशी, निमिषा पांडेय, राजेश कुमार मिश्रा, मलय जैन, अमित सक्सेना, मनीषा पाठक, सुमन गुर्जर, संदीप मिश्रा, सव्यसाची सर्राफ और समर वर्मा का नाम शामिल था। अगले वर्ष यानी 2025 में सात अधिकारियों की पदोन्नति राज्य पुलिस सेवा से आईपीएस में होनी है, पर वर्ष 2024 की डीपीसी में देरी के चलते वर्ष 2025 में भी देरी होगी। 

मध्यप्रदेश पुलिस एक्शन मोड में: 80% बाइक सवार बिना हेलमेट, शुरू हुआ बड़ा अभियान

भोपाल प्रदेश में प्रतिवर्ष छह से सात हजार दोपहिया वाहन चालक और सवारी की सड़क दुर्घटनाओं में मौत हो रही है। इसका बड़ा कारण यह है कि लगभग 80 प्रतिशत वाहन चालक हेलमेट नहीं पहन रहे हैं। इस कारण अब पुलिस प्रदेश भर में अभियान चलाकर हेलमेट नहीं लगाने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करेगी। छह नवंबर (गुरुवार) से इसके लिए विशेष अभियान की शुरुआत हो रही है जो लगातार चलेगा। दोपहिया वाहन पर सवार दूसरी सवारी के लिए भी हेलमेट लगाना अनिवार्य होगा। मौतों के आंकड़े इस अभियान में सबसे अधिक सख्ती भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और उज्जैन में की जाएगी। कारण, इन जिलों में सड़क हादसे और मौतों की संख्या अधिक है। वर्ष 2024 में प्रदेश में 14,791 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हुई। जिसमें इंदौर शहर में 2425, ग्रामीण में 290, भोपाल शहर में 945 और ग्रामीण में 235, उज्जैन में 1536, जबलपुर में 2035 और ग्वालियर में 1049 लोगों की मौत हुई। यानी इन पांच जिलों में 8,515 लोगों की मौत हुई जो कुल मौतों का 58 प्रतिशत है।   यही कारण है कि इन जिलों में अभियान के अंतर्गत बहुत अधिक सख्ती की जानी है। DIG, पुलिस प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (PTRI) टीके विद्यार्थी ने बताया कि हेलमेट नहीं पहनने वाले वाहन चालकों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। साथ ही पीछे बैठी सवारी को भी हेलमेट पहनने के लिए समझाइश देंगे। सभी जिलों में हर दिन की कार्रवाई की जानकारी एकत्र की जाएगी। यह अभियान लगातार चलेगा।