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रूसी तेल से और बैन हटा सकता है US

नई दिल्ली. वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा बाजार में पिछले कुछ दिनों में एक बड़ा और हैरान करने वाला बदलाव देखने को मिला है। हमेशा आक्रामक रुख अपनाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अचानक रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील दे दी। इसके साथ ही, बिना किसी शोर-शराबे के भारत ने अपने लिए एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत हासिल कर ली है। अमेरिकी ट्रेजरी (वित्त) मंत्री स्कॉट बेसेंट ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिकी सरकार और अधिक रूसी तेल से प्रतिबंध हटाने पर विचार कर रही है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है। इससे ठीक एक दिन पहले, अमेरिका ने भारत को मॉस्को से तेल खरीदने की अस्थायी मंजूरी दी थी। बाजार में आपूर्ति बढ़ाने की रणनीति फॉक्स बिजनेस से बात करते हुए ट्रंप के मंत्री स्कॉट बेसेंट ने शुक्रवार को कहा, 'हम अन्य रूसी तेलों से भी प्रतिबंध हटा सकते हैं।' उन्होंने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि समुद्र में करोड़ों बैरल प्रतिबंधित कच्चा तेल जहाजों पर मौजूद है। अनिवार्य रूप से, उन पर से प्रतिबंध हटाकर ट्रेजरी बाजार में एक नई सप्लाई पैदा कर सकता है। अमेरिका ने इस बात पर जोर दिया है कि इन नए कदमों का उद्देश्य मॉस्को को राहत देना बिल्कुल नहीं है। रूस पर ये प्रतिबंध यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की बातचीत में उसके आचरण के कारण लगाए गए थे। अमेरिका का कहना है कि यह नई छूट केवल उस सप्लाई को प्रभावित करेगी जो पहले से ही ट्रांजिट में है या जहाजों पर लदी है। बेसेंट ने यह भी कहा कि इस संघर्ष के दौरान बाजार को राहत पहुंचाने के लिए अमेरिका लगातार नए कदमों की घोषणा करता रहेगा, क्योंकि तेल की ऊंची कीमतें अमेरिकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों के लिए परेशानी का सबब बन गई हैं। भारत को मिली विशेष छूट इससे पहले गुरुवार को, अमेरिकी सरकार ने आर्थिक प्रतिबंधों में अस्थायी रूप से ढील दी थी ताकि समुद्र में फंसे रूसी तेल को भारत को बेचा जा सके। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि विभिन्न प्रतिबंध व्यवस्थाओं द्वारा रोके गए जहाजों से होने वाले लेनदेन सहित इस तरह की खरीद-फरोख्त को 3 अप्रैल, 2026 के अंत तक के लिए अधिकृत किया गया है। अचानक क्यों ढीले पड़े ट्रंप के तेवर? (अमेरिका की मजबूरी) अमेरिका द्वारा रूसी तेल पर से प्रतिबंध हटाने या ढील देने के पीछे रूस से कोई प्रेम नहीं है, बल्कि यह एक भयंकर आर्थिक और भू-राजनीतिक मजबूरी है। अमेरिका और इजरायल का ईरान के साथ जो सीधा युद्ध छिड़ गया है, उसने खाड़ी क्षेत्र में आग लगा दी है। ईरान के जवाबी हमलों के कारण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' से होने वाला व्यापार लगभग ठप हो गया है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। इस चोकपॉइंट के बंद होने से महज एक हफ्ते में कच्चे तेल की कीमतों में 30% का भारी उछाल आया है। शुक्रवार को कच्चे तेल की कीमतों में 8.5 प्रतिशत का भारी उछाल दर्ज किया गया। यह उछाल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के बाद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि मध्य पूर्व का यह युद्ध केवल ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण पर ही समाप्त होगा। अमेरिका में बढ़ती महंगाई और पेट्रोल की ऊंची कीमतें राष्ट्रपति ट्रंप के लिए घरेलू स्तर पर राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती हैं। ट्रंप ने भले ही ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण तक युद्ध जारी रखने की बात कही हो, लेकिन वे जानते हैं कि लंबे समय तक तेल की इतनी ऊंची कीमतें अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मंदी में धकेल सकती हैं। बाजार को शांत करने के लिए अमेरिका को तुरंत किसी भी कीमत पर बाजार में तेल की जरूरत है। रूसी तेल से और बैन हटा सकता है अमेरिका: इसका मतलब क्या है? अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट का बयान बहुत नपा-तुला लेकिन स्पष्ट है। अमेरिका रूस पर लगे मूल प्रतिबंधों को खत्म नहीं कर रहा है, बल्कि एक तकनीकी ढील निकाल रहा है। बेसेंट के अनुसार, प्रतिबंधों के कारण करोड़ों बैरल रूसी कच्चा तेल वर्तमान में जहाजों पर समुद्र में फंसा हुआ है। अमेरिका इन विशेष जहाजों पर से प्रतिबंध हटाकर इस तेल को बाजार में उतारना चाहता है। इससे वैश्विक आपूर्ति बढ़ेगी और तेल की कीमतों में कुछ नरमी आएगी। वाशिंगटन इसे रूस को राहत के तौर पर पेश नहीं कर रहा है। उनका तर्क है कि यह केवल ट्रांजिट में फंसे तेल के लिए है, न कि रूस के भविष्य के तेल उत्पादन के लिए। यह अमेरिका की मजबूरी में उठाया गया कदम है ताकि वैश्विक तेल संकट को टाला जा सके। खामोश रहकर भी भारत की जीत कैसे? इस पूरे वैश्विक उथल-पुथल में भारत सबसे बड़े विजेता के रूप में उभरा है, और वह भी बिना अमेरिका से कोई सीधा टकराव मोल लिए। भारत अपनी तेल जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है। महंगे तेल का सीधा असर भारत की महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अमेरिका ने भारत को 3 अप्रैल 2026 तक समुद्र में फंसे इस रूसी तेल को खरीदने की विशेष और अस्थायी छूट दे दी है। चूंकि यह तेल प्रतिबंधित और फंसा हुआ था, इसलिए भारत इसे रूस से भारी डिस्काउंट पर खरीद सकेगा। इससे भारत का आयात बिल काफी कम होगा। भारत ने इस पूरे संकट में 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' बनाए रखी। भारत ने ना तो अमेरिका का विरोध किया और ना ही रूस से अपने संबंध तोड़े। खामोश रहकर भारत ने बस सही समय का इंतजार किया। अमेरिका को वैश्विक तेल बाजार को क्रैश होने से बचाने के लिए भारत जैसे बड़े खरीदार की जरूरत थी, जो इस तेल को खपा सके। पहले जो तेल खरीदने पर भारत पर अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा मंडराता था, अब वही तेल भारत अमेरिकी सरकार की 'आधिकारिक मंजूरी' से खरीदेगा।

“ईरान युद्ध के बाद…” ट्रंप ने बताया अपना अगला बड़ा टारगेट

वाशिंगटन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। वाइट हाउस में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने स्पष्ट किया कि उनके प्रशासन का वर्तमान लक्ष्य ईरान के साथ चल रहे युद्ध को समाप्त करना है, जिसके तुरंत बाद अमेरिका का पूरा ध्यान क्यूबा की ओर मुड़ जाएगा। यह बयान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका के अगले रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। मेजर लीग सॉकर चैंपियन 'इंटर मियामी सीएफ' के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने मध्य पूर्व के संघर्ष पर चर्चा की। उन्होंने कहा, "हम पहले ईरान युद्ध को खत्म करना चाहते हैं।" उन्होंने आगे संकेत दिया कि क्यूबा के साथ संबंधों में सुधार या वहां के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव केवल समय की बात है। ट्रंप ने दावा किया कि क्यूबा की राजधानी हवाना वाशिंगटन के साथ समझौता करने के लिए बेहद उत्सुक है। उन्होंने कहा, "क्यूबा बहुत बुरी तरह से एक डील चाहता है। जल्द ही बहुत से अद्भुत लोग वापस क्यूबा जा सकेंगे।" ईरान युद्ध में बड़ी जीत का दावा राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के खिलाफ जारी सैन्य अभियान पर एक उत्साहजनक रिपोर्ट पेश की। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी सेना और उनके इजरायली सहयोगी दुश्मन को समय से काफी पहले ही पूरी तरह से ध्वस्त कर रहे हैं। सैन्य प्रगति का विवरण देते हुए ट्रंप ने कहा ईरान के पास अब न तो कोई वायु सेना बची है और न ही प्रभावी हवाई रक्षा प्रणाली। राष्ट्रपति ने दावा किया कि अमेरिकी सेना ने मात्र तीन दिनों के भीतर ईरान के 24 जहाजों को नष्ट कर दिया है, जिससे उनकी नौसेना की शक्ति खत्म हो गई है। हालांकि, इन सैन्य दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन ट्रंप का लहजा पूरी तरह से आक्रामक और जीत के प्रति आश्वस्त नजर आया। वार्ता की मेज पर ईरान? ट्रंप ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि ईरानी नेतृत्व अब युद्ध समाप्त करने के लिए बातचीत का रास्ता तलाश रहा है। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा, “वे फोन कर रहे हैं और पूछ रहे हैं कि डील कैसे की जाए? मैंने उनसे कहा कि आप थोड़ा देर कर चुके हैं, अब हम उनसे ज्यादा लड़ने के इच्छुक हैं।” इसके साथ ही उन्होंने ईरानी राजनयिकों को एक अवसर भी दिया। ट्रंप ने कहा कि जो लोग सहयोग करेंगे वे एक नए और बेहतर ईरान के निर्माण में मदद कर सकते हैं, जिसमें विकास की अपार संभावनाएं होंगी। उन्होंने चेतावनी भी दी कि संघर्ष जारी रखने के परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं। तेल बाजार की रणनीति युद्ध के आर्थिक प्रभावों, विशेषकर तेल की कीमतों पर बोलते हुए ट्रंप ने स्वीकार किया कि इस संघर्ष की वजह से उन्हें अपनी घरेलू प्राथमिकताओं से थोड़ा भटकाव लेना पड़ा। उन्होंने कहा, "तेल की कीमतें अब काफी हद तक स्थिर हो गई हैं। हमने कीमतों को बहुत कम रखा था, लेकिन इस युद्ध के कारण हमें यह छोटा सा मोड़ लेना पड़ा।" राष्ट्रपति ने यह भी संकेत दिया कि ऊर्जा बाजारों पर दबाव कम करने के लिए जल्द ही कुछ नए उपायों की घोषणा की जा सकती है।

हमला मत करना, नहीं तो ऐसा मारेंगे कि दुनिया ने कभी नहीं देखा होगा: ट्रंप

तेहरान. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को एक बार फिर चेतावनी दे दी है। रविवार को उन्होंने कहा कि अगर ईरान अटैक करता है, तो अमेरिका और ज्यादा ताकत से हमला करेगा। यह चेतावनी ईरान की वॉर्निंग के बाद आई है, जिसमें अमेरिका पर सबसे बड़े हमले की चेतावनी दी थी। इजरायल और अमेरिका के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की मौत हो चुकी है। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि अमेरिका और भी बड़ा जवाबी हमला करेगा। उन्होंने लिखा, 'ईरान ने अभी बयान दिया है कि वे आज बहुत जोरदार हमला करने जा रहे हैं, इतना बड़ा हमला जैसा उन्होंने पहले कभी नहीं किया। लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि अगर वे ऐसा करते हैं, तो हम उन पर ऐसी ताकत से हमला करेंगे जो पहले कभी नहीं देखी गई होगी!' सुप्रीम लीडर की मौत अमेरिका-इजरायल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की 86 वर्ष की उम्र में मौत हो गई। खामेनेई ने 1989 से इस्लामी गणराज्य का नेतृत्व किया। खामेनेई ने ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में दशकों तक धार्मिक सत्ता स्थापित करने और देश को एक क्षेत्रीय महाशक्ति बनाने का प्रयास किया। उनका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर इजरायल और अमेरिका के साथ टकराव रहा तथा उन पर देश में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों को कुचलने के भी आरोप लगे। ईरान में 88 सीट वाली विशेषज्ञ सभा खामेनेई के उत्तराधिकारी का चुनाव करेगी। इस विशेषज्ञ सभा में अधिकतर कट्टरपंथी धर्मगुरु शामिल हैं। हालांकि अब तक कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी तय नहीं हुआ है। UN में गूंजा मुद्दा संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंतोनियो गुतारेस ने ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हवाई हमलों की शनिवार को निंदा की और 'क्षेत्र और पूरी दुनिया को संकट से निकालने' के लिए तत्काल फिर से बातचीत शुरू करने का आह्वान किया। गुतारेस ने आपातकालीन बैठक में कहा कि स्थिति को और बिगड़ने से रोकने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए। गुतारेस ने कहा कि अमेरिका और इजरायल के हवाई हमलों ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर सहित अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया है। उन्होंने बहरीन, इराक, जॉर्डन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करने के लिए ईरान के जवाबी हमलों की भी निंदा की।अमेरिका ने किया हमले के फैसले का बचाव संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत माइक वाल्ट्ज ने कहा कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई वैध थी। उन्होंने सुरक्षा परिषद को बताया, 'ईरान परमाणु हथियार नहीं रख सकता। यह सिद्धांत राजनीति का विषय नहीं है। यह वैश्विक सुरक्षा का विषय है और इसी उद्देश्य से अमेरिका कानूनी कार्रवाई कर रहा है।' इजरायल के राजदूत डैनी डैनन ने इन हवाई हमलों का बचाव करते हुए कहा कि अस्तित्व पर आए संकट को रोकने के लिए ये हमले आवश्यक थे। ईरान ने बताया अपराध संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत अमीर सईद इरावानी ने परिषद को बताया कि हवाई हमलों में सैकड़ों ईरानी नागरिक मारे गए और घायल हुए हैं और इसे उन्होंने युद्ध अपराध एवं मानवता के खिलाफ अपराध बताया। रूस के राजदूत ने अमेरिका-इजरायल के हवाई हमलों की निंदा की, जबकि चीन के राजदूत ने अपनी आलोचना में अधिक संयम बरता।

AI के सैन्य इस्तेमाल पर ट्रंप का बड़ा कदम, Anthropic कंपनी पर लगाया बैन

वाशिंगटन अमेरिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सैन्य उपयोग में इस्तेमाल किए जाने को लेकर सरकार और Anthropic कंपनी के बीच टकराव कम होने का नाम नहीं ले रहा है. अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया है कि देश के सभी फ़ेंडरल एजेंसियां अब इस तकनीक का इस्तेमाल नहीं करेगी. अमेरिका को इसकी ज़रूरत नहीं है. राष्ट्रपति ने इसके उपयोग पर तुरंत बंद करने के निर्देश दिए हैं.  राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि अमेरिकी सरकार को इस तकनीक की ज़रूरत नहीं है और फ्यूचर में इस कंपनी के साथ बिज़नेस नहीं करेगा. हालांकि, रक्षा विभाग से जुड़ी एजेंसियों को छह महीने का चरणबद्ध समय दिया गया है. ये समय इसलिए दिया गया है ताकि इसके अल्टरनेट ऑप्शन ढूंढ़े जा सकें. Anthropic के सीईओ डारियो अमोदेई ने साफ किया कि उनकी कंपनी अपने Claude AI सिस्टम से सुरक्षा उपाय हटाने का विचार नहीं रखती. उन्होंने कहा है कि कुछ उपयोग जैसे पूरी तरह ख़ुद से चलने वाली हथियार सिस्टम या बड़े पैमाने पर घरेलू निगरानी नैतिक और तकनीकी सीमाओं को पार करते हैं, इसलिए ऐसी गतिविधियों की अनुमति नहीं दी जाएगी. अमोदेई ने यह भी जोर दिया कि कंपनी एआई के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग को प्राथमिकता देती है. हालांकि, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कंपनी को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक 'सप्लाई-चेन रिस्क' के रूप में घोषित कर दिया है. उन्होंने अपनी घोषणा में कहा कि अब कोई भी अमेरिकी सेना के साथ काम करने वाला ठेकेदार या साझेदार Anthropic के साथ व्यावसायिक गतिविधि नहीं कर सकेगा. यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, जिसके तहत सरकार ने Anthropic के साथ अपने सभी संबंधों को सीमित करने का कदम उठाया है. राष्ट्रपति ट्रंप ने इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा और कार्यकारी अधिकार के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने आरोप लगाया कि Anthropic के कामकाज से अमेरिकी सैनिकों और देश की सुरक्षा पर जोखिम उत्पन्न हो सकता है. हालांकि प्रशासन ने इस विवाद के पीछे के विस्तार से कारणों का खुलासा नहीं किया है, लेकिन यह साफ है कि यह कदम अमेरिकी सरकार और प्रमुख एआई डेवलपर के बीच बढ़ती तनातनी और बदलते रिश्तों का परिचायक है.

डोनाल्ड ट्रंप के दावों की खुली पोल: भाषण में बोले 5 झूठ, मीडिया ने किया फैक्ट चेक

वॉशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्टेट ऑफ द यूनियन संबोधन में सबसे लंबा भाषण देकर इतिहास रच दिया। इस दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से 8 जंगें रुकवाने का दावा किया तो वहीं अर्थव्यवस्था, टैरिफ वॉर समेत कई मसलों पर बढ़-चढ़कर दावे किए। डोनाल्ड ट्रंप दावे करने में आगे रहे हैं, लेकिन अकसर गलत तथ्य दे देते हैं। ऐसा ही मंगलवार की रात को भी हुआ, जब उन्होंने जनता के सामने कई गलत तथ्य रख दिए। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के बोले गए झूठ ज्यादातर देर तक टिक नहीं सके। न्यूयॉर्क टाइम्स समेत अमेरिका के ही कई अखबारों ने उनका फैक्ट चेक कर दिया है। आइए जानते हैं, डोनाल्ड ट्रंप ने अपने भाषण में बोले कौन-कौन से झूठ… अर्थव्यवस्था, नौकरी और निवेश पर क्या गलत दावा डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि हमारी इकॉनमी तेजी से बढ़ रही है। अमेरिकी दुनिया में हॉटेस्ट है। उनका दावा था कि हमारे पास काफी नौकरियां हैं। पहले के मुकाबले अमेरिका में सबसे ज्यादा लोगों के पास जॉब्स हैं। यह इतिहास में सबसे अधिक है। लेकिन डेटा कुछ और कहता है। अमेरिकी आंकड़ों के अनुसार 2025 में अमेरिका में नौकरी पाने वालों की संख्या में बड़ी गिरावट आई है। यह आंकड़ा कोरोना काल के किसी भी साल के मुकाबले कम रहा है। अमेरिकी लेबर ब्यूरो के अनुसार 2025 में अमेरिका में सिर्फ 1 लाख 81 हजार ही नई नौकरियां जुड़ीं। एरिना के कत्ल में प्रवासी शख्स के शामिल होने का दावा, क्या सच अमेरिकी लीडर ने यह दावा भी किया कि एरिना जारुस्का का कत्ल एक प्रवासी ने किया था। उनका कहना कि एक खूंखार अपराधी ने इस कांड को अंजाम दिया, जो खुली सीमाओं से आ गया था। वह यहां मुक्त होकर घूम रहा था। लेकिन उनका यह फैक्ट भी गलत निकला। एरिना के कत्ल में गिरफ्तार डिकार्लोस ब्राउन जूनियर कोई प्रवासी नहीं है। बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह कहते रहे हैं कि अमेरिका में बाहर से आने वाले लोग ही ज्यादातर हिंसा के जिम्मेदार रहे हैं। बिजली की कीमत कम होने की बात निकली गलत अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिका में की कीमतें घट रही हैं। इतनी कमी आई है कि यकीन नहीं होता। लेकिन सच्चाई कुछ और है। अमेरिका में प्रति परिवार ऊर्जा का बिल बीते एक साल में 6.7 पर्सेंट तक बढ़ गया है। वह लगातार कहते रहे हैं कि देश में बिजली की कीमत कम हो जाएगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ है। सच्चाई यह है कि डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद से कई यूटिलिटी कंपनियों ने मांग की है कि रेट बढ़ाए जाएं। यह इजाफा हुआ भी है। कहा जा रहा है कि 2035 तक 18 फीसदी की बढ़ोतरी हो जाएगी। गैस वाला बयान भी ट्रंप का झूठा ही साबित हुआ ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका में गैस की कीमत अब 1.99 डॉलर प्रति गैलन तक हो गई है। लेकिन बीते कुछ दिन पहले पर्यावरण को लेकर लगी पाबंदियों के चलते इसमें इजाफा होने की चर्चा है। इससे स्पष्ट है कि आने वाला समय रेट बढ़ने का रहेगा। यही नहीं कुछ राज्यों में अब भी कीमत 4.60 डॉलर प्रति गैलन है। इस तरह ट्रंप का दावा यहां भी गलत निकला है। 8 जंगें रुकने का दावा भी झूठा, गाजा में अब भी हो रहीं मौतें अब बात करते हैं, डोनाल्ड ट्रंप के युद्ध वाले दावों की। उन्होंने एक बार फिर से कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल के शुरुआती 10 महीनों में 8 जंगें रुकवा दीं। अब इस मामले में भी सच्चाई यह है कि अमेरिका का दखल 6 जंगों में ही रहा है। अन्य दो युद्ध ऐसे रहे हैं, जिसमें उसका कोई रोल नहीं रहा। इसके अलावा कई लोगों ने तो इन 6 में भी उसे कोई क्रेडिट नहीं दिया है। ट्रंप ने गाजा में सीजफायर का दावा किया है, लेकिन वहां अब भी इजरायल के हमले जारी हैं और हर दिन ही कुछ मारे जा रहे हैं।  

ट्रंप का विवादास्पद दावा- ‘मैं न होता तो PAK के 3.5 करोड़ लोग होते मारे’, ऑपरेशन सिंदूर पर बयान

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध समेत आठ युद्धों को रोकने के अपने दावे को दोहराया. हालांकि, उन्होंने अपने 'स्टेट ऑफ द यूनियन' संबोधन में एक चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा कि उन्होंने भारत के ऑपरेशन सिंदूर को रोककर 3.5 करोड़ लोगों की जान बचाई थी. ट्रंप ने दावा किया कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने उनसे कहा था कि अगर उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो पिछले साल भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 3.5 करोड़ लोग मारे गए होते. ट्रंप का यह बयान भारत के खिलाफ मई 2025 में चार दिवसीय सैन्य संघर्ष के दौरान पाकिस्तान के बैकफुट पर होने का स्पष्ट संकेत देता है. डोनाल्ड ट्रंप ने अपने संबोधन में कहा, 'अपने पहले 10 महीनों में, कंबोडिया और थाईलैंड समेत मैंने आठ युद्ध रुकवाए. ये मजाक नहीं है. पाकिस्तान और भारत के बीच परमाणु युद्ध हो सकता था. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने मुझसे कहा कि अगर मैं हस्तक्षेप न करता तो 3.5 करोड़ लोगों की मौत होती.' ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले 'स्टेट ऑफ द यूनियन संबोधन' के दौरान अपनी उपलब्धियों का बखान करते हुए ये दावे किए. ट्रंन ने इन आठ युद्धों को रोकने का किया दावा डोनाल्ड ट्रंप ने जिन युद्धों को सुलझाने का दावा किया है, उनमें- इजरायल और हमास, इजरायल और ईरान, मिस्र और इथियोपिया, भारत और पाकिस्तान, सर्बिया और कोसोवो, रवांडा और कांगो, आर्मेनिया और अजरबैजान, कंबोडिया और थाईलैंड के बीच के संघर्ष शामिल हैं. भारत ने पाकिस्तान के साथ चार दिवसीय संघर्ष के दौरान दोनों देशों के बीच सीजफायर कराने में भूमिका निभाने के ट्रंप के दावों को बार-बार खारिज किया है. संघर्ष को रोकने में ट्रंप की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चुटकी लेते हुए इससे इनकार किया था. भारत ने ट्रंप के दावे को हर बार किया खारिज उनसे पूछा गया था कि पाकिस्तान के साथ सैन्य संघर्ष के दौरान यूएस कहां था? मतलब अमेरिका की क्या भूमिका थी. इस पर कूटनीतिक भाषा में जवाब देते हुए जयशंकर ने कहा था, 'यूएस, यूनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका में था.' उनके इस जवाब का मतलब था कि अमेरिका का भारत पाकिस्तान सीजफायर में कोई भूमिका नहीं थी. भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने भी सीजफायर में किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप को खारिज किया था. उन्होंने कहा था, 'पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन (DGMO) ने हॉटलाइन पर अपने भारतीय समकक्ष से संपर्क किया और संघर्ष खत्म का अनुरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच युद्धविराम समझौता हुआ.'

राष्ट्रपति ट्रंप का बयान- इनकम टैक्स के बदले टैरिफ आ रहा है, विदेशी कर रहे हैं भुगतान

 वाशिंगटन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में पहली बार अमेरिकी कांग्रेस में वार्षिक 'स्टेट ऑफ द यूनियन' संबोधन दे रहे हैं. ट्रंप ने अपने कार्यकाल में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का दावा किया. उन्होंने कहा कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था पहले कभी इतनी तेजी से नहीं बढ़ी और दावा किया कि देश को पहले डेड कहा जाता था, अब हम सबसे आगे हैं. ट्रंप ने यह भी दोहराया कि उन्होंने 'ड्रिल, बेबी, ड्रिल' का अपना वादा निभाया है. यह नारा अमेरिकी राष्ट्रपति और अन्य रिपब्लिकन नेताओं द्वारा अमेरिका में तेल और गैस ड्रिलिंग को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा दूसरे देशों पर लगाए गए टैरिफ को असंवैधानिक बताकर खारिज करने के बाद डोनाल्ड ट्रंप अपने फैसले को जायज ठहराने के लिए तरह-तरह के पैंतरे आजमा रहे हैं. यूएस सुप्रीम कोर्ट ने स्वीपिंग टैरिफ खत्म किया तो ट्रंप ने 15% ग्लोबल टैरिफ का एलान कर दिया. अब यूएस कांग्रेस में अपने संबोधन में उन्होंने टैरिफ को इनकम टैक्स का सब्सिट्यूट बता दिया. डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, 'मेरा मानना ​​है कि विदेशी देशों द्वारा चुकाए जा रहे ये टैरिफ, हमारे देश में इनकम टैक्स की आधुनिक प्रणाली को काफी हद तक प्रतिस्थापित कर देंगे, जिससे मेरे देशवासियों पर से एक बड़ा वित्तीय बोझ कम हो जाएगा.' स्टेट ऑफ द यूनियन संबोधन में राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिकी पुरुष हॉकी के ओलंपिक हीरो कॉनर हेलेब्यूक को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम' से सम्मानित करने की घोषणा की. अमेरिकी पुरुष हॉकी टीम के खिलाड़ी ट्रंप के संबोधन के दौरान यूएस कैपिटल में मौजूद थे. अमेरिका ने 2026 विंटर ओलंपिक के फाइनल में कनाडा को हराकर 46 साल बाद हॉकी में स्वर्ण पदक जीता. अमेरिकी सीमा अब सुरक्षित और दुश्मन डरे हुए हैं: ट्रंप डोनाल्ड ट्रंप ने अपने संबोधन में कहा कि अमेरिकी सीमा अब सुरक्षित है और दुश्मन डरे हुए हैं. उन्होंने कहा, 'हमारी सेना और पुलिस पहले से कहीं अधिक मजबूत है, और वैश्विक मंच पर अमेरिका को एक बार फिर सम्मान प्राप्त है.'अमेरिकी राष्ट्रपति ने इमिग्रेशन का मुद्दा उठाया, जो उनके चुनाव अभियान के प्रमुख मुद्दों में से एक था, और अपने प्रशासन के दौरान इसमें महत्वपूर्ण बदलाव का दावा किया. उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछले एक साल में अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर घातक फेंटानिल की तस्करी में रिकॉर्ड 56 प्रतिशत की गिरावट आई है. ट्रंप ने कहा कि अवैध आव्रजन और मादक पदार्थों की तस्करी पर अंकुश लगाने के प्रयासों से परिणाम मिले हैं, और उन्होंने दावा किया कि चार साल तक बेरोकटोक सीमा पार करने के बाद, अब अमेरिका के पास देश के इतिहास की 'सबसे मजबूत और सुरक्षित सीमा' है. उन्होंने कहा कि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल के अंत तक मेक्सिको के साथ लगने वाली अमेरिकी सीमा पर अवैध घुसपैठ रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई थी. महंगाई पिछले पांच वर्षों में सबसे निचले स्तर पर: ट्रंप ट्रंप ने अपने कार्यकाल के दौरान महंगाई पर काबू पाने का दावा किया. उन्होंने अपने पूर्ववर्ती, जो बाइडेन के कार्यकाल के दौरान देश के इतिहास में सबसे भीषण महंगाई होने का आरोप लगाया. अमेरिकी संसद को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि उनके प्रशासन ने 12 महीनों के भीतर महंगाई को पिछले पांच वर्षों में सबसे निचले स्तर पर ला दिया है. उन्होंने यह भी दावा किया कि चुनाव के बाद से शेयर बाजार ने 53 बार सर्वकालिक उच्च स्तर दर्ज किया है और कहा कि उनकी सरकार ने अपने पहले वर्ष में 18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का निवेश आकर्षित किया है.

टैरिफ पॉलिसी पर ट्रंप घिरे, बहुमत अमेरिकियों ने जताई नाराजगी और क्षमता पर उठे सवाल

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति अपने कामों से अधिक अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। कब क्या कहेंगे, शायद ट्रंप खुद नहीं जानते। यही कारण है कि वे अक्सर चर्चा में बने रहते हैं। इस बीच एक सर्वे रिपोर्ट सामने आया है। इस सर्वे के अनुसार, अधिकतर ट्रंप की नीतियों और देश चलाने के तरीके से खुश नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति अपने कामों से अधिक अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। कब क्या कहेंगे, शायद ट्रंप खुद नहीं जानते। यही कारण है कि वे अक्सर चर्चा में बने रहते हैं। इस बीच एक सर्वे रिपोर्ट सामने आया है। इस सर्वे के अनुसार, अधिकतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और देश चलाने के तरीके से खुश नहीं है। फरवरी 2026 के सर्वेक्षण में ट्रंप की कुल अस्वीकृति दर (Disapproval Rating) लगभग 60% पहुंच गई है, जो उनके दूसरे कार्यकाल में अब तक की सबसे ऊंची दरों में से एक है और 2021 में पद छोड़ते समय वाली स्थिति के समान है। सर्वे के अनुसार, अधिकतर लोग महंगाई, टैरिफ, विदेश संबंध, आव्रजन और समग्र अर्थव्यवस्था जैसे रोजमर्रा के महत्वपूर्ण मुद्दों पर ट्रंप के तरीके से असहमत हैं। यह सर्वेक्षण इप्सोस द्वारा इप्सोस के नॉलेजपैनल के जरिए किया गया था, और यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के पहले के वैश्विक टैरिफ को रद्द करने से ठीक पहले हुआ था। सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग दो-तिहाई अमेरिकी (करीब 65%) ट्रंप द्वारा महंगाई से निपटने के तरीके से असहमत हैं। आयातित वस्तुओं पर टैरिफ लगाने के उनके तरीके को 64% लोग नापसंद करते हैं, जबकि 62% लोग विदेशी संबंधों को संभालने के तरीके से असहमत हैं। 58% प्रतिभागियों ने आव्रजन (इमिग्रेशन) को संभालने के तरीके का विरोध किया, और 57% ने कहा कि समग्र अर्थव्यवस्था को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। इनमें से किसी भी मुद्दे पर ट्रंप को जनता से स्पष्ट समर्थन नहीं मिल रहा है। ट्रंप से नाखुश लेकिन डेमोक्रेट्स पर भरोसा नहीं सर्वे के अनुसार, अधिकतर लोग ट्रंप से नाखुश हैं, लेकिन अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स पर भी पूरा भरोसा नहीं है। दरअसल, जब लोगों से पूछा गया कि देश की सबसे बड़ी समस्याओं को सुलझाने के लिए वे किस पर ज्यादा भरोसा करते हैं, तो राय लगभग बराबर बंट गई। ट्रंप (33%), डेमोक्रेट्स (31%), या 'दोनों में से कोई नहीं' (31%)। सर्वे रिपोर्ट से साफ है कि कई अमेरिकी दोनों पक्षों से नाखुश हैं। सर्वे के अनुसार, ट्रंप को सबसे कम समर्थन डेमोक्रेट्स और निर्दलीय (इंडिपेंडेंट) मतदाताओं से मिला, जिन्होंने लगभग हर मुद्दे पर उनसे असहमति जताई। इतना ही नहीं, रिपब्लिकन पार्टी में भी मतभेद हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) आंदोलन के मजबूत समर्थक ज्यादातर ट्रंप के फैसलों से सहमत थे, लेकिन MAGA से खुद को अलग मानने वाले रिपब्लिकन अधिक आलोचनात्मक थे, खासकर महंगाई और विदेश नीति जैसे मुद्दों पर। कुल मिलाकर, ट्रंप की अस्वीकृति दर लगभग 60% है, जो उनके दूसरे कार्यकाल में अब तक की सबसे ऊंची दरों में से एक है और 2021 में पद छोड़ते समय वाली दर के बराबर है। ट्रंप के सत्ता संभालने के हालात और हुए खराब इस बीच, अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों का नजरिया भी निराशाजनक है। लगभग आधे अमेरिकियों का कहना है कि ट्रंप के सत्ता संभालने के बाद हालात और खराब हुए हैं। सिर्फ करीब 3% लोगों ने कहा कि अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है। सर्वेक्षण में शामिल केवल 22% लोगों ने ही आर्थिक रूप से खुद को बेहतर महसूस किया, जबकि अधिकांश ने कहा कि उनकी स्थिति पहले जैसी है या और खराब हो गई है। सर्वेक्षण में ट्रंप की राष्ट्रपति बनने की योग्यता पर भी सवाल उठे। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, आधे से ज्यादा अमेरिकियों ने कहा कि उनमें राष्ट्रपति बनने के लिए जरूरी मानसिक क्षमता नहीं है, और लगभग आधे ने कहा कि वे शारीरिक रूप से भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं। रिपब्लिकन इस पर काफी हद तक असहमत थे, लेकिन डेमोक्रेट्स और निर्दलीय मतदाताओं ने इन चिंताओं को मजबूती से साझा किया। भरोसा भी एक बड़ी समस्या है। लगभग 70% अमेरिकियों (दस में से सात) ने कहा कि ट्रंप ईमानदार या भरोसेमंद नहीं हैं। कई लोगों का मानना है कि वे राष्ट्रपति पद का दुरुपयोग अपने निजी फायदे के लिए कर रहे हैं, और अधिकांश को लगता है कि उन्होंने अपनी कानूनी शक्तियों का उल्लंघन किया है। वहीं, खास कार्रवाइयों के बारे में ज्यादातर अमेरिकी बच्चों के लिए अनुशंसित टीकों में कटौती का विरोध करते हैं और अन्य देशों में बदलाव लाने के लिए अमेरिकी सेना के इस्तेमाल का समर्थन नहीं करते। कई लोगों का यह भी मानना है कि प्रशासन जेफरी एपस्टीन फाइलों जैसे संवेदनशील मामलों पर पारदर्शी नहीं रहा है। बता दें कि यह सर्वेक्षण अमेरिका भर में 2500 से ज्यादा वयस्कों पर किया गया है।  

ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी 15% बढ़ा दिया टैरिफ

नई दिल्ली. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ को लेकर एक बार फिर से बड़ा ऐलान किया है। शनिवार को उन्होंने कहा कि अब से तुरंत प्रभाव से दुनिया के सभी देशों पर लगने वाला 10% टैरिफ बढ़ाकर 15% कर दिया जाएगा। ट्रंप का कहना है कि कई देश दशकों से अमेरिका का फायदा उठाते आए हैं, लेकिन अब उनकी सरकार इसे रोक रही है। उन्होंने कहा कि आने वाले कुछ महीनों में वे और नए-नए टैक्स तय करेंगे, जो कानूनी होंगे। उनका मकसद अमेरिका को और भी मजबूत और महान बनाना है – पहले से कहीं ज्यादा! डोनाल्ड ट्रंप की ओर से लगाए गए टैरिफ पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी को 6-3 के फैसले में बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने माना कि ट्रंप ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का दुरुपयोग किया, जो राष्ट्रीय आपातकाल के लिए आरक्षित है और इस कानून के तहत वैश्विक टैरिफ लगाना असंवैधानिक है। इस फैसले से ट्रंप के आर्थिक एजेंडे को गहरा धक्का लगा, क्योंकि ये टैरिफ लगभग सभी अमेरिकी व्यापारिक भागीदारों पर लागू थे। हालांकि, स्टील और एल्युमिनियम जैसे क्षेत्र-विशेष टैरिफ प्रभावित नहीं हुए, जो सेक्शन 232 जैसे अलग कानूनों के तहत लगाए गए थे। इस निर्णय से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ गई है और व्यवसायों को अरबों डॉलर के टैरिफ रिफंड की उम्मीद है। कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जॉन जी. रॉबर्ट्स जूनियर ने फैसले में लिखा कि कांग्रेस ही टैरिफ लगाने का अधिकार रखती है, राष्ट्रपति नहीं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भड़के ट्रंप ट्रंप ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी, इसे भयानक और शर्मनाक बताते हुए न्यायाधीशों को मूर्ख कहा। उन्होंने इसे गहरा निराशाजनक करार दिया और कहा कि विदेशी देश खुश हैं, लेकिन ज्यादा देर नहीं टिकेगा। फैसले के कुछ घंटों बाद ही ट्रंप ने नया 10% वैश्विक टैरिफ लागू कर दिया, जिसमें कनाडा और मैक्सिको को छूट दी गई है, क्योंकि वे उत्तर अमेरिकी व्यापार समझौते के तहत संरक्षित हैं। ट्रंप ने कहा कि उनके पास बैकअप प्लान है और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कुछ न्यायाधीशों पर शर्म आने की बात कही। उनकी यह प्रतिक्रिया उनके आक्रामक व्यापार नीति को दर्शाती है, जो वैश्विक बाजारों में अस्थिरता पैदा कर रही है। ट्रंप के पास अब क्या है रास्ता डोनाल्ड ट्रंप के पास अब भी कई विकल्प बचे हैं, जैसे सेक्शन 232 और 301 जांचों के तहत क्षेत्र-विशेष टैरिफ लगाना, जो स्टील, एल्युमिनियम और ऑटो जैसे उत्पादों पर पहले से लागू हैं। ये टैरिफ अगले दशक में 635 अरब डॉलर की कमाई कर सकते हैं। ट्रंप अन्य कानूनों का सहारा ले सकते हैं, जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा आधारित टैरिफ, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले से प्रभावित नहीं हैं। वे नए कार्यकारी आदेश जारी कर सकते हैं या कांग्रेस से नए कानून की मांग कर सकते हैं, हालांकि राजनीतिक विभाजन के कारण यह मुश्किल है। कुल मिलाकर ट्रंप की व्यापार युद्ध जारी रह सकता है, लेकिन अब अधिक कानूनी जांच के साथ।

ट्रंप का बड़ा दांव! 10% वैश्विक टैरिफ से भारत और अन्य देशों की अर्थव्यवस्था पर कितनी मार?

नई दिल्ली अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में टैरिफ पर ट्रंप की जोरदार हार हुई है. US Supreme Court ने बड़ा फैसला सुनाते हुए Donald Trump को बड़ा झटका देते हुए उनके द्वारा इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर एक्ट (IEEPA) के तहत लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया है. इस हार के बाद ट्रंप ने 10 फीसदी ग्लोबल टैरिफ (10% Global Tariff) लगाने का ऐलान कर दिया है. आइए समझते हैं इसका भारत समेत दुनिया के तमाम देशों पर क्या असर होने वाला है और क्या अब पहले से लागू टैरिफ के बजाय सिर्फ 10% टैरिफ ही देना होगा? कोर्ट के फैसले के बाद ट्रंप ने फोड़ा टैरिफ बम सबसे पहले बता दें कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की ओर से US Reciprocal Tariff को अवैध करार दिए जाने के बाद ट्रंप के तेवर गर्म हो गए हैं. कोर्ट के फैसले के कुछ घंटों के बाद ही राष्ट्रपति ने एक कार्यकारी आदेश पर साइन कर दिए और दुनिया के सभी देशों से आयात पर 10 फीसदी का ग्लोबल टैरिफ जड़ दिया. इसकी जानकारी उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर अपने अकाउंट से एक पोस्ट शेयर कर भी दी है.  क्या भारत और दूसरे देशों पर सिर्फ 10% टैरिफ?  Donald Trump के टैरिफ को गैरकानूनी बताए जाने और इसके बाद ट्रंप द्वारा नए ग्लोबल टैरिफ (Global Tariff) का ऐलान करने के बाद बड़ा सवाल ये है कि भारत समेत तभी देशों को अब सिर्फ 10% ही टैरिफ देना होगा. तो एएनआई की रिपोर्ट में इसे लेकर व्हाइट हाउस के अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि हां, जब तक कोई अन्य प्राधिकरण लागू नहीं किया जाता, तब तक 10% टैरिफ ही लागू रहेगा. इसका मतलब 18% नहीं, अब भारतीय सामानों के आयात पर अमेरिका में 10 फीसदी टैरिफ रह सकता है. हालांकि, यहां ट्रंप के बयान पर गौर करें, तो उन्होंने कहा था कि 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत 10% वैश्विक टैरिफ मौजूदा टैरिफ के अतिरिक्त होगा.  IEEPA की जगह लेगा नया टैरिफ?  ट्रंप ने बीते साल 2025 के अप्रैल महीने में अमेरिका के लिए लिब्रेशन डे करार देते हुए टैरिफ का ऐलान किया था, जो 10 फीसदी से 50 फीसदी तक था. ये रेसिप्रोकल टैरिफ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (IEEPA) के तहत लगाया था और कोर्ट ने इस संबंध में साफ किया है कि ऐसा करने का अधिकार राष्ट्रपति के पास नहीं है और ये सिर्फ इमरजेंसी के हालात में यूज होता है. ऐसे में अधिकारी ने साफ किया कि हां, ये IEEPA के तहत लागू किए गए टैरिफ की जगह लेगा, जब तक कोई नया सिस्टम लागू नहीं किया जाता.  कितने दिन तक लागू रहेगा नया टैरिफ?  Donald Trump ने सुप्रीम कोर्ट में मिली टैरिफ पर हार के बाद आनन-फानन में 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत 10% वैश्विक टैरिफ लगाने का आदेश दे दिया. इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया है कि करीब पांच महीने या 150 दिनों के लिए लागू रहेगा. क्या ट्रंप लगा सकते हैं अधिक टैरिफ?   इस सवाल का जबाव भी खुद डोनाल्ड ट्रंप ने दिया है और प्रेस कॉन्फ्रेंस में 10% ग्लोबल टैरिफ पर बात करते हुए संकेत दिया है कि उचित टैरिफ तय करने के लिए जरूरी जांच की जाएगी और जरूरत पड़ने पर Tariff Hike किया जा सकता है.  ट्रंप ने क्यों लगाया नया ग्लोबल टैरिफ?  White House के अधिकारी ने बताया है कि अमेरिका का नया 10% ग्लोबल टैरिफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संरक्षणवादी व्यापार एजेंडे का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य भुगतान संतुलन संबंधी समस्याओं और अनुचित व्यापार प्रथाओं का समाधान करना है. इसके साथ ही उन्होंने सभी ट्रेड पार्टनर्स को Trade Deals का पालन करने की सलाह भी दी है.