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‘मुझे जवान-हैंडसम लड़के नहीं, औरतें पसंद’: ट्रंप

वाशिंगटन. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अक्सर अपनी ऊलजलूल टिप्पणियों की वजह से भी चर्चा में रहते हैं। ट्रंप कभी अपनी प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट के होंठों की तारीफ कर देते हैं तो कभी किसी देश पर सिर्फ इसीलिए मोटा टैरिफ लगा देते हैं क्योंकि वहां की राष्ट्रपति के बात करने का तरीका उन्हें पसंद नहीं आता। अब हाल ही में गाजा के पुनर्निर्माण के लिए बनाई गई बोर्ड ऑफ पीस की मीटिंग के दौरान ट्रंप का एक बयान चर्चा में है। बोर्ड ऑफ पीस की गुरुवार की हुई इस पहली बैठक का फोकस जहां गाजा के भविष्य पर होना था, वहां डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी अजीब बातों से गंभीर माहौल को पूरी तरह बदल गई। यहां पैराग्वे के राष्ट्रपति सैंटियागो पेना का स्वागत करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक कहा, “जवान और हैंडसम होना अच्छी बात है। इसका मतलब यह नहीं है कि हम आपको पसंद ही करें। मुझे जवान, हैंडसम मर्द पसंद नहीं हैं। औरतें, मुझे पसंद हैं। मर्दों में, मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है।” ट्रंप के यह कहते ही हॉल में खूब ठहाके लगे। महज 47 साल के हैं पेना बता दें कि 47 साल के पेना, पैराग्वे के डेमोक्रेटिक दौर के सबसे कम उम्र के राष्ट्रपति हैं। वह पेशे से एक अर्थशास्त्री थे और इससे पहले देश के फाइनेंस मिनिस्टर भी रह चुके हैं। उन्होंने कोलोराडो पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर प्रेसिडेंसी जीतने के बाद अगस्त 2023 में यह कार्यभार संभाला था। भारत ने भी लिया बैठक में हिस्सा इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप के गाजा के लिए गठित बोर्ड ऑफ पीस की उद्घाटन बैठक में भारत ने भी हिस्सा लिया। भारत ने इसमें एक पर्यवेक्षक देश के रूप में भाग लिया। 'डोनाल्ड जे. ट्रंप इंस्टीट्यूट ऑफ पीस' में आयोजित बैठक में उपस्थित लोगों की सूची के मुताबिक, भारत का प्रतिनिधित्व वॉशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास की प्रभारी राजनयिक नामग्या खम्पा ने किया। बता दें कि भारत 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल नहीं हुआ है। अब तक कुल 27 देशों ने इस समूह में शामिल होने के लिए हामी भर दी है, जिनमें अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, हंगरी, पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देशों के नाम शामिल हैं। मीटिंग में ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिका इस बोर्ड के लिए 10 अरब अमेरिकी डॉलर देगा।

ट्रंप ने भरी बैठक में शहबाज को खड़ा करवाकर किया जलील

वाशिंगटन. वाशिंगटन में आयोजित 'बोर्ड ऑफ पीस' (Board of Peace) के उद्घाटन सत्र में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसकी चर्चा अंतरराष्ट्रीय मीडिया में जोर-शोर से हो रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने संबोधन के दौरान न केवल भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना बेहतरीन दोस्त बताया, बल्कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को बीच भाषण में खड़ा कर भारत-पाक शांति का पूरा श्रेय खुद ले लिया। ट्रंप भारत-पाकिस्तान संघर्ष को रोकने के अपने दावे का जिक्र कर रहे थे। उन्होंने शहबाज शरीफ की ओर देखते हुए उन्हें खड़ा होने के लिए कहा। जैसे ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री खड़े हुए, ट्रंप ने अपनी शैली में प्रधानमंत्री मोदी और भारत का गुणगान शुरू कर दिया। ट्रंप ने वहां उपस्थित दुनियाभर के कई नेताओं और मीडिया के सामने कहा, “भारत और पाकिस्तान… वह एक बहुत बड़ा मामला था। मैंने प्रधानमंत्री मोदी से बात की है। वह बहुत उत्साहित हैं और वास्तव में वह अभी इस कार्यक्रम को देख रहे हैं।” ट्रंप ने आगे कहा, "भारत और पाकिस्तान, आप दोनों का बहुत शुक्रिया। मोदी एक महान व्यक्ति हैं और मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं।" यह नजारा काफी दिलचस्प था क्योंकि जहां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री प्रोटोकॉल के तहत खड़े होकर यह सब सुन रहे थे, वहीं भारत इस बैठक में केवल एक 'पर्यवेक्षक' के रूप में मौजूद था और पीएम मोदी स्वयं वहां उपस्थित नहीं थे। ट्रंप ने इस दौरान फिर से दोहराया कि उन्होंने पिछले साल भारत-पाक युद्ध को केवल एक फोन कॉल से रोक दिया था। उन्होंने कहा, “जब मुझे पता चला कि दोनों देश लड़ रहे हैं और विमान गिराए जा रहे हैं, तो मैंने फोन उठाया और कहा अगर युद्ध नहीं रुका, तो मैं दोनों देशों पर 200 प्रतिशत का व्यापारिक टैरिफ लगा दूंगा।” ट्रंप ने जिस तरह से सार्वजनिक मंच पर शहबाज शरीफ को खड़ा कर पीएम मोदी का जिक्र किया वह पाकिस्तान के लिए काफी असहज स्थिति थी। एक तरफ जहां पाकिस्तान खुद को ट्रंप का करीबी सहयोगी दिखाने की कोशिश कर रहा है, वहीं ट्रंप बार-बार अपनी बातचीत में भारत और मोदी को अधिक महत्व देते नजर आ रहे हैं।

शहबाज़ शरीफ़ की अमेरिका यात्रा: ट्रंप से मुलाकात और बोर्ड ऑफ पीस की बैठक तय

इस्लामाबाद/वॉशिंगटन   पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मिशन पर अमेरिका पहुँच चुके हैं। 18 से 20 फरवरी तक चलने वाले इस दौरे का मुख्य केंद्र वॉशिंगटन में होने वाली उच्च स्तरीय बैठकें और अमेरिकी नेतृत्व के साथ द्विपक्षीय वार्ता है। ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शिरकत : पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयान के अनुसार, प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष आमंत्रण पर 'बोर्ड ऑफ़ पीस' की पहली बैठक में हिस्सा लेने के लिए अमेरिका गए हैं। महत्वपूर्ण बैठक : यह बैठक आज यानी गुरुवार, 19 फरवरी को होनी है। पृष्ठभूमि : गौरतलब है कि पिछले महीने स्विट्ज़रलैंड के दावोस में आयोजित 'वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम' के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में इस शांति बोर्ड का गठन किया गया था। वरिष्ठ मंत्रियों का दल साथ : प्रधानमंत्री अकेले इस दौरे पर नहीं हैं। उनके साथ पाकिस्तान का एक शक्तिशाली प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद है, जिसमें शामिल हैं-उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इसहाक डार। मंत्रिमंडल के अन्य वरिष्ठ मंत्री और उच्चाधिकारी। द्विपक्षीय और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा : 'बोर्ड ऑफ़ पीस' की बैठक के अलावा, शहबाज़ शरीफ़ अमेरिका की वरिष्ठ लीडरशिप के साथ अलग से भी मुलाकातें करेंगे।एजेंडा : इन बैठकों में मुख्य रूप से पाकिस्तान-अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों, सुरक्षा सहयोग और वर्तमान वैश्विक मुद्दों पर गहन चर्चा होने की संभावना है।कूटनीतिक महत्व : राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल में पाकिस्तान के साथ संबंधों की यह नई दिशा अंतरराष्ट्रीय गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।

ट्रंप की कड़ी चेतावनी: जिनेवा वार्ता से पहले ईरान को कहा- समझौता करो या नतीजे झेलो

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने जिनेवा में होने वाली अहम परमाणु वार्ता से पहले ईरान को कड़ा और चेतावनी भरा संदेश दिया है। वॉशिंगटन डीसी में पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने कहा कि अगर ईरान ने समझौता नहीं किया तो उसे इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। ट्रंप ने बताया कि वह इस उच्चस्तरीय वार्ता प्रक्रिया में “अप्रत्यक्ष रूप से” शामिल रहेंगे। उन्होंने कहा कि जिनेवा में होने वाली बातचीत बेहद महत्वपूर्ण है। ट्रंप के मुताबिक, ईरान भले ही एक “कठिन वार्ताकार” हो, लेकिन उसकी नेतृत्व क्षमता कमजोर रही है। उन्होंने कहा, “अगर वे सही समय पर समझौता कर लेते तो हमें उनके परमाणु ठिकानों पर B-2 विमान भेजने की जरूरत ही नहीं पड़ती।” ट्रंप ने यह भी दावा किया कि हालिया सैन्य कार्रवाई ने पूरे भू-राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया और ईरान को दोबारा कूटनीति की ओर लौटने के लिए मजबूर किया। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगे ईरान “ज्यादा समझदारी” दिखाएगा, क्योंकि आर्थिक और राजनीतिक दबाव उसे बातचीत की मेज पर ला रहे हैं। मिडिल ईस्ट की स्थिति पर बोलते हुए ट्रंप ने कहा कि कहीं-कहीं तनाव जरूर दिख सकता है, लेकिन कुल मिलाकर क्षेत्र में शांति कायम है। उन्होंने कहा, “आप कहीं-कहीं आग की लपटें देख सकते हैं, लेकिन मूल रूप से मिडिल ईस्ट में शांति है। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि हमने परमाणु क्षमता पर B-2 हमला किया।” ट्रंप ने हालिया सैन्य अभियान Operation Midnight Hammer का बचाव करते हुए कहा कि इसके बिना ईरान एक महीने के भीतर परमाणु हथियार बना लेता। इस ऑपरेशन के तहत अमेरिका ने ईरान के तीन प्रमुख परमाणु ठिकानों Fordow, Natanz और Isfahan को निशाना बनाया था। इससे पहले अप्रैल 2025 में ईरान और अमेरिका के बीच ओमान के मस्कट और इटली के रोम में परमाणु वार्ता के दौर हुए थे, लेकिन जून 2025 में सैन्य हमलों के बाद हालात पूरी तरह बदल गए। ईरान ने इन हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन बताया था। अब सैन्य टकराव के बावजूद दोनों देश एक बार फिर परमाणु समझौते पर चर्चा के लिए मंगलवार को Geneva में मिलने जा रहे हैं। अमेरिकी मीडिया के मुताबिक, अमेरिका की ओर से विशेष दूत Steve Witkoff और Jared Kushner इन वार्ताओं में हिस्सा लेंगे।

ट्रंप के नोबेल शांति पुरस्कार का एपस्टीन फाइलों में भी जिक्र

वाशिंगटन. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनका नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर दिखाया गया प्रेम दुनिया में किसी से छिपा नहीं है। ट्रंप ने हर तरीके से प्रयास करके आखिरकार वेनेजुएला की मचाडो से नोबेल शांति पुरस्कार ले ही लिया। इन सब के बीच अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जारी की जा रही एपस्टीन फाइल्स में भी डोनाल्ड ट्रंप के नोबेल पुरस्कार के प्रति प्रेम का जिक्र किया गया है। यहां पर एक ईमेल में एपस्टीन ट्रंप के सहयोगी को लिखता है कि डोनाल्ड को अगर इस बात का पता चलेगा कि नोबेल समिति का चेयरमैन यहां रुका हुआ है तो उसका सिर फट जाएगा। अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जारी की गई बदनाम फाइनेंशर जेफ्री एपस्टीन की फाइलों में सामने आया है कि उसने नोबेल शांति पुरस्कार समिति के चैयरमेन रहे थॉरबोर्न यागलैंड के साथ अपने संबंधों के जरिए बिल गेट्स और स्टीव बैनन जैसे कई प्रभावशाली लोगों के साथ दोस्ती की थी। गौरतलब है कि यागलैंड 2009 से लेकर 2015 तक नोबेल समिति के प्रमुख रहे थे। फाइल्स से मिली जानकारी के मुताबिक यागलैंड से एपस्टीन की मुलाकात करवाने वाले नॉर्वेजियन राजनयिक थे, जो कि इजरायल और फिलिस्तीन के बीच ओसलो अकॉर्ड साइन करवाने के लिए जाने जाते हैं। यॉगलैंड का कई बार जिक्र यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से जुड़ी फाइलों में यागलैंड का नाम कई हजार बार सामने आता है। हालांकि अभी तक जितनी भी फाइलें सामने आई हैं, उसमें पुरस्कार के लिए किसी के नाम पर लॉबिंग की बात सामने नहीं आई है, लेकिन इतना साफ है कि एपस्टीन ने यागलैंड से अपनी दोस्ती के चलते कई बड़े नामों से अपनी दोस्ती मजबूत की। रिपोर्ट्स के मुताबिक एपस्टीन ने एक मेल में इस बात की जानकारी दी है कि 2010 में उसने यागलैंड को न्यूयॉर्क और पेरिस स्थिति अपनी संपत्तियों में ठहरने की मदद की थी। डोनाल्ड ट्रंप के करीबी को किया मैसेज यागलैंड का जिक्र करते हुए एपस्टीन ने 2018 में डोनाल्ड ट्रंप के सहयोगी स्टीव बैनन को भी एक मेल किया था, जिसमें उसने ट्रंप के शांति पुरस्कार के प्रति प्रेम का जिक्र किया था। एक मेल में एपस्टीन ने लिखा, "डोनाल्ड का सिर फट जाएगा अगर उसे पता चले कि तुम अब उस व्यक्ति के दोस्त हो जो सोमवार को नोबेल शांति पुरस्कार का फैसला करेगा।” कई लोगों को नोबेल समिति के अध्यक्ष के नाम पर फंसाने की कोशिश एपस्टीन ने यागलैंड के नाम पर कई लोगों के साथ दोस्ती स्थापित करने की कोशिश की थी। एपस्टीन ने यागलैंड का नाम लेकर वाइट हाउस की पूर्व कानूनी सलाहकार कैथी रूमलर को भी एक मेल भेजा था, जिसमें उसने लिखा, "नोबेल शांति पुरस्कार के प्रमुख मिलने के लिए आ रहे हैं, क्या आप जुड़ना चाहेंगी?" इसके अलावा एपस्टीन ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी लैरी समर्स को भी मेल किया था, जिसमें उसने लिखा, “नोबेल शांति पुरस्कार के प्रमुख मेरे यहां ठहरे हुए हैं, अगर आपकी रुचि हो।”2014 में एपस्टीन ने बिल गेट्स को लिखे एक ईमेल में बताया कि यागलैंड को काउंसिल ऑफ यूरोप के प्रमुख के रूप में दोबारा चुना गया है। इसके जवाब में गेट्स ने लिखा, “मेरा ख्याल है कि उनकी शांति पुरस्कार समिति की भूमिका भी अब अनिश्चित होगी?” गौरतलब है कि यागलैंड के नोबेल पुरस्कार समिति के अध्यक्ष के तौर पर रहते 2009 में बराक ओबामा और 2012 में यूरोपीय संघ को नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। एपस्टीन फाइ्ल्स में नाम आने के बाद यागलैंड को ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं। इसके बाद नार्वे की आर्थिक अपराध इकाई इन मामलों की जांच कर रही है।

ट्रंप की कार्रवाई: ईरान के समीप भेजा गया ऑपरेशन मादुरो में शामिल सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर

न्यूयॉर्क अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रही बातचीत के बीच तनाव फिर चरम पर है. अमेरिका ने दुनिया का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर USS गेराल्ड आर. फोर्ड को पारस की खाड़ी में भेजने का फैसला किया है. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यह जानकारी चार अमेरिकी अधिकारियों ने दी है. इससे पहले खबरें थीं कि USS जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश को भेजा जाएगा, लेकिन अब फोर्ड को चुना गया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा है कि अगर बातचीत फेल हुई तो अमेरिका ईरान पर हमला करने को तैयार है. क्या हुआ नया?     USS गेराल्ड आर. फोर्ड की तैनाती: यह दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे आधुनिक एयरक्राफ्ट कैरियर है. इसमें 100 से ज्यादा लड़ाकू विमान, हजारों सैनिक और एस्कॉर्ट जहाज होते हैं.     पहले यह, यह कैरेबियन सागर में था. वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी से जुड़े ऑपरेशन में शामिल था.     अब इसे मिडिल ईस्ट भेजा जा रहा है. अप्रैल अंत या मई तक यह घर (नॉरफोक, वर्जीनिया) नहीं लौटेगा – क्रू के लिए लंबी तैनाती और मेंटेनेंस में देरी होगी.     पहले की रिपोर्ट: वॉल स्ट्रीट जर्नल ने कहा था कि USS जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश (वर्जीनिया तट पर ट्रेनिंग कर रहा) को भेजा जा सकता है. लेकिन अब फोर्ड को चुना गया.     पहले से मौजूद ताकत: USS अब्राहम लिंकन कैरियर और कई अन्य जहाज पहले से मिडिल ईस्ट में तैनात हैं. गेराल्ड आर फोर्ड क्लास  यह अमेरिकी जंगी जहाज है दुनिया का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर है. अपने क्लास का पहला विमानवाहक पोत, जिसे मई 2017 में कमीशन किया गया. इसके चार और पोत तैयार हो रहे हैं. यह 337 मीटर लंबा है. इसकी बीम 748 मीटर की है. इसका फुल लोड डिस्प्लेसमेंट 1 लाख टन है. इसपर 78 मीटर चौड़ा फ्लाइट डेक है. इसपर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एयरक्राफ्ट लॉन्चिंग सिस्टम लगा है. एडवांस्ड अरेस्टिंग गीयर की सुविधा है. इसपर एक बार में 75 एयरक्राफ्ट तैनात किए जा सकते हैं. इसके आलावा यह 4539 सैनिकों को अपने साथ ले जा सकता है.  ट्रंप का बयान: हमला करने को तैयार ट्रंप ने इजरायली चैनल N12 को इंटरव्यू में कहा…     या तो हम डील करेंगे, या बहुत सख्त कदम उठाएंगे – जैसे पिछली बार.      अगर ईरान के साथ बातचीत फेल हुई, तो सैन्य कार्रवाई होगी.     ट्रंप मैक्सिमम प्रेशर नीति अपना रहे हैं – प्रतिबंध, सैन्य तैनाती और धमकी से ईरान को नया परमाणु समझौता करने पर मजबूर करना. क्यों हो रहा है यह सब?     ईरान का परमाणु कार्यक्रम: ईरान यूरेनियम को हथियार बनाने लायक स्तर तक समृद्ध कर रहा है. अमेरिका और इजरायल इसे बड़ा खतरा मानते हैं.     ट्रंप का रुख: 2018 में ट्रंप ने पुराना समझौता (JCPOA) तोड़ा था. अब नई डील चाहते हैं – ईरान को पुरानी से बेहतर शर्तें माननी होंगी.     रणनीतिक महत्व: मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ताकत बढ़ाकर ट्रंप ईरान को दबाव में रखना चाहते हैं. कैरियर से F-35 जैसे स्टेल्थ फाइटर इस्तेमाल हो सकते हैं.     क्षेत्रीय तनाव: इजरायल-ईरान संघर्ष, हूती हमले और गाजा युद्ध के बीच अमेरिका अपने सहयोगियों (इजरायल, सऊदी) की रक्षा कर रहा है. क्या होगा आगे? फोर्ड की तैनाती से अमेरिका की हवाई ताकत दोगुनी हो जाएगी. अगर दूसरा कैरियर (बुश) भी आया, तो क्षेत्र में अमेरिकी मौजूदगी और मजबूत होगी. विशेषज्ञ कहते हैं कि यह 'सिग्नलिंग' है – अमेरिका दिखा रहा है कि वह गंभीर है. दुनिया शांति की अपील कर रही है, ताकि बातचीत से हल निकले. अमेरिका ईरान को परमाणु डील के लिए मजबूर करने के लिए सैन्य ताकत बढ़ा रहा है. दुनिया के सबसे बड़े कैरियर की तैनाती तनाव को और बढ़ा रही है. फिलहाल बातचीत का मौका है, लेकिन फेल होने पर मिडिल ईस्ट में बड़ा संघर्ष हो सकता है.   

भारत के लिए चौंकाने वाला खुलासा: रूस ने ट्रंप के तेल दावों की पोल खोली

मॉस्को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावे के बाद भारत-रूस संबंधों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। ट्रंप ने भारत पर लगे टैरिफ को घटाते हुए सोमवार को कहा था कि भारत ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के तहत रूस से तेल खरीदना बंद करने पर सहमति जताई है, लेकिन रूस ने इस दावे पर साफ शब्दों में कहा है कि भारत की ओर से उसे ऐसा कोई आधिकारिक संदेश नहीं मिला है। रूस के राष्ट्रपति कार्यालय (क्रेमलिन) के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने मंगलवार को कहा कि मॉस्को भारत के साथ अपने रणनीतिक साझेदारी वाले रिश्तों को बेहद अहम मानता है और उन्हें आगे भी मज़बूत करना चाहता है।   ट्रंप का बड़ा ऐलान ट्रंप ने एक दिन पहले घोषणा की थी कि अमेरिका और भारत के बीच एक नया व्यापार समझौता हुआ है। इसके तहत अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात पर लगने वाला टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया जाएगा। इसी के साथ ट्रंप ने दावा किया था कि इसके बदले भारत रूस से तेल खरीद बंद करेगा और अमेरिका से ज़्यादा तेल खरीदेगा। ट्रंप ने यह भी कहा था कि भारत के रूसी तेल खरीदने से यूक्रेन युद्ध में रूस को अप्रत्यक्ष रूप से मदद मिल रही है। रूस की दो टूक इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए क्रेमलिन के प्रवक्ता पेसकोव ने कहा, “रूस भारत के साथ संबंधों पर ट्रंप की टिप्पणियों का ध्यान से विश्लेषण कर रहा है।” जब उनसे सीधे पूछा गया कि क्या भारत ने रूसी तेल खरीदना बंद करने का फैसला किया है, तो उन्होंने दो टूक जवाब दिया, "अब तक तो हमने भारत की ओर से रूस से तेल खरीद रोकने को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं सुना है।” उन्होंने कहा कि नई दिल्ली भारत-रूस साझेदारी को भी उतनी ही अहमियत देता है। पेसकोव ने कहा, "हम द्विपक्षीय अमेरिकी-भारतीय संबंधों का सम्मान करते हैं लेकिन हम रूस और भारत के बीच एक उन्नत रणनीतिक साझेदारी के विकास को भी उतना ही महत्व देते हैं। भारत के साथ हमारे रिश्ते हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं और हम उन्हें आगे भी विकसित करना चाहते हैं।” तेल और कूटनीति यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद 2022 से भारत रियायती रूसी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा है। पश्चिमी देशों ने इस पर नाराज़गी जताई है और रूस की ऊर्जा आय को सीमित करने के लिए कई प्रतिबंध लगाए हैं। हालांकि भारत का रुख हमेशा यही रहा है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। बहरहाल, तस्वीर अभी साफ नहीं है क्योंकि एक तरफ ट्रंप का बड़ा दावा है, तो दूसरी तरफ रूस का इनकार। भारत की ओर से अब तक इस मुद्दे पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। ऐसे में यह साफ है कि तेल, व्यापार और कूटनीति का यह खेल अभी जारी रहेगा।

टैरिफ समझौते के बाद बोले PM मोदी — आत्मविश्वास से ही भारत बन रहा वैश्विक ताकत

नई दिल्ली भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच वार्ता के बाद टैरिफ डील पर बड़ा फैसला हुआ है। अमेरिका ने अब भारत पर लगने वाले टैरिफ को सीधे 50 फीसदी से घटाकर 18 पर्सेंट कर दिया है। इसे भारत और अमेरिका के रिश्तों में सुधार की नई पहल के तौर पर देखा जा रहा है। इसके अलावा भारत के एक्सपोर्ट बाजार के लिहाज से भी यह अहम है। इस फैसले को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी ने सोमवार रात को ही एक ट्वीट किया था और डोनाल्ड ट्रंप को धन्यवाद दिया था। अब उन्होंने एक और पोस्ट की है, जिसमें आत्मविश्वास के जरिए विकसित भारत के रास्ते में आगे बढ़ने की बात कही है।   पीएम नरेंद्र मोदी ने इस पोस्ट में टैरिफ डील का जिक्र नहीं किया, लेकिन उनकी बात को उससे ही जोड़कर देखा जा रहा है। पीएम मोदी ने लिखा, 'आत्मविश्वास वह बल है जिससे सब कुछ संभव है और विकसित भारत के सपने को साकार करने में यही शक्ति काम आएगी।' मोदी ने यह टिप्पणी अमेरिका और भारत के बीच एक व्यापार समझौते पर सहमति बनने के कुछ घंटों बाद की है। इस समझौते के तहत वाशिंगटन भारतीय वस्तुओं पर जवाबी शुल्क को मौजूदा 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर देगा। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर लिखा, 'आत्मविश्वास वह शक्ति है जिसके बल पर सब कुछ संभव है। विकसित भारत के सपने को साकार करने में देशवासियों की यही शक्ति बहुत काम आने वाली है।' मोदी ने संस्कृत का यह श्लोक भी साझा किया- ''श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भ्यात् सम्प्रवर्धते। दाक्ष्यात् तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठत।' उन्होंने इस श्लोक का अर्थ समझाते हुए लिखा, ‘शुभ कार्यों से धन अर्जित होता है। यह साहस और आत्मविश्वास से बढ़ता है, कुशलता एवं दक्षता से स्थिर रहता है और संयम द्वारा सुरक्षित होकर राष्ट्र की प्रगति में सहायक बनता है।’ ट्रंप के दावों पर अब भी सस्पेंस, भारत सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार बता दें कि भारत पर अमेरिका ने मोटे टैरिफ लादे थे। इसके बाद कई बार ऐसा हुआ कि दोनों देशों के बीच टैरिफ खत्म करने को लेकर बात कई बार बात हुई, लेकिन सिरे नहीं चढ़ सकी। अब इस डील के बाद माना जा रहा है कि अमेरिका और भारत के बीच संबंधों में सुधार हो सकता है। अब नई डील के साथ ही भारत पर अमेरिकी टैरिफ काफी कम हो गया और यह पाकिस्तान, चीन समेत अपने तमाम पड़ोसी देशों के मुकाबले कम है। हालांकि अब भी इस बात को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत ने अमेरिकी उत्पादों की भारतीय बाजार में एंट्री और रूस से तेल खरीद रोकने पर सहमति जताई है या नहीं।

अमेरिका–ईरान टेंशन चरम पर: ट्रंप की चेतावनी के बाद सुरक्षित ठिकाने पर खामेनेई, भारत का नाम क्यों लिया?

वाशिंगटन ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। इस बीच खबर आ रही है कि ईरानी सुरक्षा अधिकारियों द्वारा अमेरिका के संभावित हमले के खतरे को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई तेहरान में अंडरग्राउंड हो गए हैं। वह किसी बंकर में छिप गए हैं। ईरान इंटरनेशनल के अनुसार, खामेनेई को एक ऐसी सुरक्षित जगह पर ले जाया गया है जिसमें कई आपस में जुड़ी सुरंगें और आधुनिक सुरक्षा उपकरण हैं।   उनके भूमिगत होने के दौरान उनके तीसरे बेटे मसूद खामेनेई कार्यालय का दैनिक कामकाज संभाल रहे हैं और सरकार के साथ संचार के मुख्य माध्यम बने हुए हैं। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने चेतावनी दी है कि सर्वोच्च नेता पर किसी भी तरह का हमला पूरे देश के खिलाफ पूर्ण युद्ध माना जाएगा। इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी दी है कि एक अमेरिकी 'अर्माडा' (जंगी बेड़ा) ईरान की ओर बढ़ रहा है। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने पुष्टि की है कि विमानवाहक पोत USS अब्राहम लिंकन और कई विध्वंसक पोत वर्तमान में हिंद महासागर में तैनात हैं। ट्रंप ने एयर फोर्स वन पर संवाददाताओं से कहा, "हम ईरान की ओर फोर्स भेज रहे हैं। बस जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की जाएगी।" उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके सख्त रुख की वजह से ईरान ने लगभग 840 लोगों को फांसी देने का फैसला टाल दिया है। भारत को ईरान का धन्यवाद तनाव के बीच, ईरान के राजदूत मोहम्मद फताली ने भारत सरकार को धन्यवाद दिया है। दरअसल, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में ईरान के खिलाफ लाए गए एक राजनीतिक रूप से प्रेरित प्रस्ताव के विरोध में भारत ने मतदान किया। भारत ने चीन और पाकिस्तान के साथ मिलकर इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया, जो ईरान में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई हिंसा की अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग कर रहा था। भारत का यह वोट प्रस्तावों के खिलाफ उसकी पुरानी नीति का हिस्सा माना जा रहा है। ईरान में दिसंबर के अंत से शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों में भारी हिंसा हुई है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और UN विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस दौरान 5,000 से 20,000 के बीच लोग मारे गए हो सकते हैं। 8 जनवरी 2026 को ईरान ने अपने इतिहास का सबसे लंबा और व्यापक इंटरनेट ब्लैकआउट लागू किया, जिससे देश का बाहरी दुनिया से संपर्क लगभग कट गया था।  

‘यूरोप ने भारत पर टैरिफ नहीं लगाया, ट्रंप के करीबी सहयोगी ने किया बड़ा दावा’

दावोस  अमेरिकी वित्त मंत्री स्‍कॉट बेसेंट ने यूरोपीय यूनियन को लेकर बड़ा दावा किया है. उन्‍होंने दावोस में दिए एक इंटरव्‍यू में कहा कि यूरोपीय सहयोगियों ने रूसी तेल के आयात पर भारत के खिलाफ संयुक्त टैरिफ लगाने से इनकार कर दिया था, क्‍योंकि वे भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को अंतिम रूप देना चाहते थे.  स्‍कॉट बेसेंट का यूरोप पर किया गया यह व्‍यंग ऐसे वक्‍त में आया है, जब यूरोपीय यूनियन की अध्‍यक्ष उर्सला वॉन डेर लेयेन  की भारत यात्रा शनिवार से शुरू हो रही है. जिसका मकसद भारत के साथ सबसे बड़ी डील करना है. ट्रंप के खास ने पॉलिटिको को दिए एक इंटरव्‍यू में कहा कि 2025 से तीसरे देशों के खरीदारों पर 25 प्रतिशत जुर्माना लागू करने के अमेरिकी प्रयास 'सफल' रहे हैं. उन्होंने आगे कहा कि मैं यह भी बताना चाहूंगा कि हमारे दिखावटी यूरोपीय सहयोगियों ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था, क्योंकि वे भारत के साथ यह बड़ा व्यापार समझौता करना चाहते थे.  युद्ध को फंडिंग करने का आरोप  इस इंटरव्‍यू के दौरान स्‍कॉट बेसेंट ने यूरोप पर भारतीय रिफाइनरियों से रूसी तेल उत्‍पाद खरीदकर 'खुद के खिलाफ युद्ध को फंडिंग करने' का भी आरोप लगाया. वह यह कहने का प्रयास कर रहे थे कि एक तरफ यूरोप युक्रेन की तरफ है और दूसरी ओर वह रूसी तेल के खिलाफ टैरिफ न लगाकर रूस को फंड भी कर रहा है. बेसेन्ट ने आगे कहा कि विडंबना और मूर्खता की पराकाष्ठा यह है कि अनुमान लगाइए कि रिफाइन‍िंग उत्‍पाद कौन खरीद रहा था? यूरोपीय लोग…  भारत पर 25 फीसदी टैरिफ?  इस इंटरव्‍यू के दौरान स्‍कॉट बेसेंट ने संकेत दिया कि भारत पर लगा 25 फीसदी टैरिफ का जुर्माना हटाया जा सकता है. उन्‍होंने कहा कि हमाना 25 फीसदी टैरिफ बहुत सफल रहा है. रूस से भारत द्वारा तेल की खरीद ठप हो गई है. टैरिफ अभी भी लागू है, मुझे लगता है कि अब इन्‍हें हटाने का समय आ चुका है.  गौरतलब है कि अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया है , जिसमें रूस से तेल खरीद पर 25 प्रतिशत का जुर्माना भी शामिल है. नई दिल्ली ने अमेरिकी कार्रवाई को बार-बार 'अनुचित, अन्यायपूर्ण और तर्कहीन' बताया है और साथ ही यह भी कहा है कि उसकी एनर्जी खरीद राष्‍ट्रीय हित के लिए है, ना कि किसी को फंडिंग के लिए.  500 फीसदी टैरिफ प्रस्‍ताव पर क्‍या बोले बेसेंट  रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने रूसी तेल की द्वितीयक खरीद और फिर रिसेल पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने के लिए एक विधेयक प्रस्तावित किया है. इस बिल पर बोलते हुए बेसेंट ने फॉक्‍स न्‍यूज को बताया कि प्रस्‍ताव सीटने के सामने है और हम देखेंगे कि यह पारित होता है या नहीं. हमारा मानना है कि ट्रंप को उस अधिकार की आवश्‍यकता न हीं है, वह इसे IEEPA के तहत कर सकते हैं, लेकिन सीनेट उन्‍हें वह अधिकार देना चाहती है. बता दें इस साल दिसंबर में, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और सरकारी स्वामित्व वाली रिफाइनरियों द्वारा मॉस्को से कच्चे तेल के आयात में भारी कटौती  के बाद, भारत रूसी ईंधन के खरीदारों में तीसरे स्थान पर आ गया है.