samacharsecretary.com

दुनिया में शांति की नई पहल! ट्रंप ने बनाया ‘बोर्ड ऑफ पीस’, PAK शामिल—उठे कई सवाल

दावोस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को बोर्ड ऑफ पीस के पहले चार्टर का औपचारिक ऐलान कर दिया। यूनाइटेड नेशन के तर्ज पर बनाए गए बोर्ड ऑफ पीस का शुरुआती फोकस गाजा पर होगा, लेकिन इसका विस्तार दुनियाभर के विवादों को सुलझाने के लिए हो सकता है। इसमें पाकिस्तान समेत कई देशों ने सदस्य बनने के लिए सहमति दी है। बोर्ड ऑफ पीस के लॉन्च पर ट्रंप ने कहा कि गाजा सीजफायर डील के तहत हमास को हथियार छोड़ने होंगे, नहीं तो यह फिलिस्तीनी आंदोलन का अंत होगा।   ट्रंप ने कहा, "उन्हें अपने हथियार छोड़ने होंगे, और अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो यह उनका अंत होगा।'' उन्होंने आगे कहा कि इस्लामी समूह हाथों में राइफल लेकर पैदा हुए थे। स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में बोर्ड ऑफ पीस के ऐलान के समय एक दर्जन से ज्यादा देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और टॉप डिप्लोमैट मौजूद रहे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर माइली, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, पैराग्वे के कंजर्वेटिव राष्ट्रपति सैंटियागो पेना, उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्ज़ियोयेव आदि की मौजूदगी रही। 'हम लोग कुछ भी कर सकते हैं जो करना चाहते हैं' ट्रंप ने आगे कहा, "एक बार जब यह बोर्ड पूरी तरह से बन जाएगा, तो हम लगभग कुछ भी कर सकते हैं, जो हम करना चाहते हैं। और हम इसे यूनाइटेड नेशंस के साथ मिलकर करेंगे।'' उन्होंने आगे कहा कि यू.एन. में बहुत ज्यादा पोटेंशियल है जिसका पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया है। ट्रंप, जो इस बोर्ड की अध्यक्षता करेंगे, ने दर्जनों दूसरे वर्ल्ड लीडर्स को इसमें शामिल होने के लिए इनवाइट किया और कहा कि वह चाहते हैं कि यह गाजा में लड़खड़ाते सीजफायर से परे की चुनौतियों का सामना करे, जिससे यह आशंका पैदा हो रही है कि यह ग्लोबल डिप्लोमेसी और कॉन्फ्लिक्ट रिजॉल्यूशन के मुख्य प्लेटफॉर्म के तौर पर यूएन की भूमिका को कमजोर कर सकता है। सदस्यों को देना होगा एक बिलियन डॉलर का फंड दूसरी बड़ी ग्लोबल पावर और अमेरिका के पारंपरिक पश्चिमी सहयोगी भी इस बोर्ड में शामिल होने से हिचकिचा रहे हैं, जिसके बारे में ट्रंप कहते हैं कि स्थायी सदस्यों को हर एक को $1 बिलियन का पेमेंट करके फंड देना होगा। अमेरिका के अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का कोई भी दूसरा स्थायी सदस्य – दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद से अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति पर सबसे ज्यादा दखल रखने वाले पांच देश – अभी तक इसमें शामिल होने के लिए तैयार नहीं हुआ है। देशों के प्रमुखों ने दस्तावेजों पर किया साइन बोर्ड ऑफ पीस में बतौर सदस्य शामिल होने के लिए मंच पर उपस्थित कई देशों के प्रमुखों ने दस्तावेजों पर साइन किया। इसके बाद व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलीन लेविट ने कहा कि इस तरह बोर्ड का चार्टर पूरी तरह से लागू हो गया है और यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन बन गया है। हस्ताक्षर समारोह स्विट्जरलैंड के दावोस में हुआ, जहां सालाना वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम हो रहा है, जिसमें ग्लोबल राजनीतिक और बिजनेस लीडर्स एक साथ आते हैं।

ट्रंप के सनकी इरादों से घबराए पीएम मार्क कार्नी, ग्रीनलैंड के बाद कनाडा को लेकर भी उठीं चिंताएं

ओटावा/दावोस  डोनाल्ड ट्रंप ने  एक नया मैप सोशल मीडिया पर डाला है, जिसमें कनाडा, ग्रीनलैंड और वेनेजुएला को अमेरिका का हिस्सा दिखाया गया है। ये नक्शा एडिटेड है, लेकिन ट्रंप का इरादा नहीं। कनाडा इस बात को जान गया है कि ग्रीनलैंड के बाद अगला नंबर उसका है। डोनाल्ड ट्रंप के बयान से कनाडा के आम लोगों में भारी गुस्सा है, वो अपमान महसूस कर रहे हैं और वो धीरे धीरे अमेरिका के खिलाफ एक मजबूत संकल्प के साथ नई तैयारी में जुट गये हैं। कनाडा, ट्रंप प्रशासन की तरफ से आने वाले नई खतरनाक मांगों का सामना करने की तैयारी में जुट गया है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने 'अमेरिकी दबदबा खत्म हो गया' कहकर शुरूआत कर दी है। कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने कनाडा के आगे के रास्तों के बारे में बताया और चेतावनी दी और कहा कि "मजबूत देश इकोनॉमिक इंटीग्रेशन को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, टैरिफ को दबाव बनाने के लिए और सप्लाई चेन को शोषण करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।" लेकिन स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में मार्क कार्नी ने अमेरिका का नाम तो नहीं लिया, लेकिन उन्होंने अपने भाषण में इसे 'ग्लोबल टूट' करार दिया और कहा कि "बीच की ताकतों को मिलकर काम करना होगा क्योंकि अगर हम टेबल पर नहीं होंगे, तो हम मेन्यू में होंगे।" यानि, कनाडा और यूरोपीय देशों को अब समझ में आ रहा है, जो भारत वर्षों से कहता आया है। लेकिन अभी तक ये देश अमेरिकी दबदबे का फायदा उठा रहे थे और जब ट्रंप ने चाबी कसी है, तो उन्हें 'ग्लोबल ऑर्डर, दूसरे देशों की संप्रभुता, अमीर और गरीब देशों का फर्क' समझ में आ रहा है। अमेरिका से लड़ने की तैयारी में कनाडा? कनाडा ने अपनी दक्षिणी सीमा को मजबूत करने में लगभग एक अरब डॉलर खर्च किए हैं। अब वह आने वाले सालों में अपनी उत्तरी सीमा की सुरक्षा के लिए अरबों डॉलर और खर्च करेगा। जबकि प्रधानमंत्री कार्नी ने फिर से दोहराया कि "कनाडा, ग्रीनलैंड के साथ मजबूती से खड़ा है और ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला करने के उनके खास अधिकार का समर्थन करता है।" हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि "रूस आर्कटिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है।" उन्होंने कहा, "हम अपने NATO सहयोगियों के साथ काम कर रहे हैं, जिसमें नॉर्डिक बाल्टिक के 8 देश भी शामिल हैं, ताकि गठबंधन के उत्तरी और पश्चिमी किनारों को और सुरक्षित किया जा सके, जिसमें ओवर-द-होराइजन रडार, पनडुब्बियों, विमानों और जमीन पर, बर्फ पर सैनिकों में अभूतपूर्व निवेश शामिल है।" हाल के महीनों में कनाडा ने रक्षा, और खासकर आर्कटिक की सुरक्षा को लेकर अपनी नई प्रतिबद्धता को दिखाने पर जोर दिया है। प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने आर्कटिक में खतरों के लिए शुरुआती चेतावनी रडार कवरेज देने के लिए "ओवर-द-होराइजन" रडार सिस्टम के लिए 4 अरब डॉलर से ज्यादा का फंड देने का वादा किया है। उन्होंने आने वाले सालों में आर्कटिक में एक विशाल सेना से लगातार मिलिट्री मौजूदगी बढ़ाने का भी वादा किया है। लेकिन कनाडा के साथ दिक्कत ये है कि जिस अमेरिका के साथ अपनी सबसे ज्यादा लगने वाली सीमा का वो अभी तक सबसे ज्यादा फायदा उठा रहा था, वो सीमा उसके लिए सबसे मुश्किल बन चुकी है। कनाडा, अमेरिका के साथ दुनिया की सबसे बड़ी जमीनी सीमा को साझा करता है, इसके अलावा वो दूसरी तरफ ग्रीनलैंड के साथ दुनिया की सबसे बड़ी समुद्री सीमा को शेयर करता है। कनाडा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ग्रीनलैंड? ग्रीनलैंड, कनाडा और अमेरिका दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। पिछले कई दशकों से ग्रीनलैंड की सुरक्षा के लिए कनाडा ने NATO देशों और NORAD (नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड) के साथ मिलकर ऑपरेशनल डिफेंल प्लानिंग किए हैं, जिसमें इसी हफ्ते ग्रीनलैंड में एक NORAD मिशन भी शामिल है। NORAD ने एक बयान में पुष्टि की है, कि कॉन्टिनेंटल यूनाइटेड स्टेट्स और कनाडा के बेस से ऑपरेट होने वाले एयरक्राफ्ट, ग्रीनलैंड में "अलग-अलग लंबे समय से प्लान की गई NORAD एक्टिविटीज को सपोर्ट करने के लिए" होंगे, जो यूनाइटेड स्टेट्स और कनाडा, साथ ही किंगडम ऑफ डेनमार्क के बीच स्थायी डिफेंस सहयोग पर आधारित है।कनाडा के अधिकारी फिलहाल ये तय नहीं कर पाए हैं कि ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए सैनिक भेजे जाए या नहीं। वो अभी इस बात पर विचार कर रहे हैं कि प्रतीकात्मक तौर पर सैनिकों को ग्रीनलैंड भेजने का फैसला सही रहेगा या नहीं, लेकिन प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के दावोस भाषण से साफ हो गया है कि डोनाल्ड ट्रंप के साथ कनाडा के रिश्ते काफी ज्यादा खराब होने वाले हैं। इसके अलावा उन्होंने इस महीने चीन की भी यात्रा की है। उन्होंने अमेरिका को संदेश और संकेत दोनों दे दिया है कि कनाडा के पास विकल्प हैं। ऐसे में अगर डोनाल्ड ट्रंप ज्यादा आगे बढ़ते हैं, तो अमेरिका अपने पड़ोसी देश को खो सकता है।  

टैरिफ केस में ट्रंप फंसे, कोर्ट के एक आदेश से अमेरिका पर भारी आर्थिक मार

वाशिंगटन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अगर सुप्रीम कोर्ट उनके प्रशासन के खिलाफ फैसला देता है, तो अमेरिका को लगाए गए टैरिफ (आयात शुल्क) की रकम वापस करनी पड़ सकती है। उन्होंने माना कि ऐसा करना आसान नहीं होगा और इससे कई लोगों को नुकसान भी हो सकता है। ट्रंप ने कहा,“मुझे नहीं पता सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला देगा। अब तक हमने टैरिफ के जरिए सैकड़ों अरब डॉलर की कमाई की है। अगर हम केस हार गए, तो हमें पूरी कोशिश करनी पड़ेगी कि वह पैसा वापस किया जाए।” राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कहा कि टैरिफ सिर्फ पैसे कमाने का जरिया नहीं हैं, बल्कि इससे अमेरिका को राष्ट्रीय सुरक्षा में भी बड़ा फायदा मिला है। उन्होंने कहा कि टैरिफ के कारण देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है और अमेरिका की स्थिति दुनिया में बेहतर हुई है। यह मामला इस समय अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। अगर अदालत यह तय करती है कि ट्रंप ने आपातकालीन शक्तियों का गलत इस्तेमाल कर टैरिफ लगाए, तो सरकार को अरबों डॉलर वापस करने पड़ सकते हैं। इसी बीच ट्रंप अपने 2026 के पहले विदेशी दौरे पर स्विट्ज़रलैंड के डावोस जा रहे हैं, जहां वे विश्व आर्थिक मंच (WEF) में वैश्विक नेताओं और बड़े उद्योगपतियों से मुलाकात करेंगे। वहां वे अमेरिका की व्यापार नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक भूमिका पर अपनी बात रखेंगे। टैरिफ, ग्रीनलैंड को लेकर बयान और वेनेजुएला के तेल से जुड़े फैसलों के कारण ट्रंप पहले ही कई देशों और सहयोगियों के निशाने पर हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ट्रंप की आर्थिक और व्यापार नीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

मैक्रों का ब्लू सनग्लास अंदाज, दावोस में ट्रंप को बर्दाश्त की हद बताने वाला बयान

दावोस फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्विटजरलैंड के दावोस में दिए गए अपने भाषण से अतंरराष्ट्रीय हलकों में सनसनी मचा दी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जुबानी हमलों का लगातार सामना कर रहे मैक्रों ने बिगड़ते वर्ल्ड ऑर्डर पर गहरी चिंता जताई. उन्होंने अपने भाषण में "बुलीज़" (bullies) जैसे शब्दों का प्रयोग किया और कहा कि जोर-जबरदस्ती के बजाय सम्मान और नियम-आधारित व्यवस्था को प्राथमिकता देने की बात की.  इमैनुएल मैक्रों ने बिना नाम लिए लेकिन स्पष्ट रूप से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ओर इशारा करते हुए कहा कि दुनिया "एक नियम-रहित विश्व" (world without rules) की ओर बढ़ रही है, जहां अंतरराष्ट्रीय कानून को पैरों तले कुचला जा रहा है और सिर्फ "ताकतवर का कानून" (law of the strongest) चल रहा है.  मैक्रों ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में जुटे विश्व भर के नेताओं को आसामनी रंग सनग्लासेज पहने मैक्रों ने संबोधित करते हुए कहा, "देखिए हम किस स्थिति में हैं. मेरा मतलब है, डेमोक्रेसी के खिलाफ, तानाशाही की तरफ बदलाव. ज़्यादा हिंसा, 2024 में 60 से ज़्यादा युद्ध – यह एक बिल्कुल रिकॉर्ड है, भले ही मुझे पता चला कि उनमें से कुछ फिक्स थे. और टकराव नॉर्मल हो गया है, हाइब्रिड हो गया है, नई मांगों, जगह, डिजिटल जानकारी, साइबर, व्यापार वगैरह में फैल रहा है." अंतर्राष्ट्रीय कानून को पैरों तले रौंदा जाता है  मैक्रों ने अमेरिकी दादागीरी की चर्चा करते हुए कहा कि, "यह एक ऐसी दुनिया की ओर भी बदलाव है जहां कोई नियम नहीं हैं जहां अंतर्राष्ट्रीय कानून को पैरों तले रौंदा जाता है और जहां ऐसा लगता है कि सिर्फ़ सबसे ताकतवर का कानून ही मायने रखता है." ट्रंप से 200 फीसदी टैरिफ की धमकी झेल चुके फ्रांस के राष्ट्रपति ने कहा कि साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं फिर से उभर रही हैं. जाहिर है रूस का युद्ध, यूक्रेन के खिलाफ़ रूस का आक्रामक युद्ध, जो अगले महीने अपने चौथे साल में प्रवेश करेगा और मध्य पूर्व और पूरे अफ्रीका में संघर्ष जारी हैं. बहुपक्षवाद कमजोर किया जा रहा है यह एक ऐसी दुनिया की ओर भी बदलाव है जहां प्रभावी सामूहिक शासन नहीं है और जहां बहुपक्षवाद उन शक्तियों द्वारा कमज़ोर किया जा रहा है जो इसमें बाधा डालती हैं या इससे मंह मोड़ लेती हैं, और नियम कमज़ोर हो रहे हैं.  ट्रंप द्वारा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को ठेंगा दिखाने की घटनाओं की ओर इशारा करते हुए मैक्रों ने कहा कि, "मैं ऐसे इंटरनेशनल संगठनों के कई उदाहरण दे सकता हूं जिन्हें बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने कमज़ोर कर दिया है या छोड़ दिया है। और जब हम स्थिति को देखते हैं, तो यह साफ़ तौर पर बहुत चिंताजनक समय है, क्योंकि हम उस स्ट्रक्चर को खत्म कर रहे हैं जहां हम स्थिति को ठीक कर सकते हैं और हमारे सामने आने वाली आम चुनौतियों का सामना कर सकते हैं. टैरिफ का इस्तेमाल संप्रभुता पर प्रेशर बनाने के लिए मैक्रों ने कहा कि अब सामूहिक शासन की बजाय टकराव का रास्ता अपनाया जा रहा है. अमेरिकी टैरिफ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका से ट्रेड एग्रीमेंट के ज़रिए मुकाबला जो हमारे एक्सपोर्ट हितों को कमज़ोर करता है, ज़्यादा से ज़्यादा रियायतें मांगता है और खुले तौर पर यूरोप को कमज़ोर करने और अपने अधीन करने का लक्ष्य रखता है, साथ ही नए टैरिफ का अंतहीन जमावड़ा जो मूल रूप से अस्वीकार्य है, खासकर जब उनका इस्तेमाल क्षेत्रीय संप्रभुता के खिलाफ दबाव बनाने के लिए किया जाता है. फ्रांस के राष्ट्रपति ने कहा कि इस समस्या को ठीक करने के लिए इसका जवाब है ज़्यादा सहयोग. और नए तरीके अपनाना. उन्होंने कहा कि यह साफ तौर पर ज़्यादा आर्थिक संप्रभुता और रणनीतिक अर्थव्यवस्था बनाना है, खासकर यूरोपियनों के लिए.  आसमानी रंग का गोगल्स चमकाकर मैक्रां ने महफिल लूट ली इस संबोधन में राष्ट्रपति मैक्रों के भाषण के अलावा उनका आसमानी सनग्लास भी चर्चा में रहा. अमूमन बिना चश्मा के दिखने वाले मैंक्रों इस बार आसमानी सनग्लास में थे. उनका ये लुक सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. हालांकि इस चश्मे की वजह मेडिकल है. इसकी वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि, 'उनकी आंखों में समस्या है. मीटिंग की शुरुआत में ही उन्होंने विनम्रता से कहा, "सनग्लासेस के लिए माफी चाहता हूं, मेरी आंखों में हल्की दिक्कत है. फ्रांसीसी मीडिया के अनुसार, इसका कारण एक फटी हुई खून की नस थी, जिससे मैक्रों की आंखों में सूजन आ गई थी. बता दें कि 15 जनवरी को फ्रांसीसी राष्ट्रपति को साफ तौर पर लाल और सूजी हुई आंख के साथ देखा गया था. 

ट्रंप का वर्चुअल वार! ग्रीनलैंड पर सोशल मीडिया से जताया अमेरिकी दावा, पड़ोसी देशों तक गया संदेश

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार (20 जनवरी) को सोशल मीडिया पर एक नया नक्शा साझा किया है, जिसमें कनाडा, वेनेजुएला और ग्रीनलैंड को अमेरिकी भू-भाग के हिस्से के रूप में दिखाया गया है। यह नक्शा उनके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर पोस्ट किया गया है। ये नक्शा कंप्यूटर या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार किया गया माना जा रहा है।   ट्रंप द्वारा शेयर किए गए इस नक्शे में अमेरिका का आकार काफी बड़ा दिखाया गया है। इसमें पड़ोसी देश कनाडा, दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला और डेनमार्क के अधीन ग्रीनलैंड को अमेरिकी क्षेत्र बताया गया है। इसके साथ ट्रंप ने एक और तस्वीर भी पोस्ट की, जिसमें वह उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस और अपने विदेश मंत्री मार्को रूबियो के साथ ग्रीनलैंड में अमेरिकी झंडा लगाते नजर आ रहे हैं। उस तस्वीर पर लिखा है- “Greenland US Territory Est 2026” यानी ग्रीनलैंड, अमेरिकी क्षेत्र – स्थापना- 2026 कनाडा को लेकर पुराना बयान बता दें कि पिछले साल जनवरी में दूसरी बार राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद ही ट्रंप ने कहा था कि कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाया जाना चाहिए। हालांकि, कनाडा सरकार ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच व्यापार को लेकर तनाव और टैरिफ विवाद बढ़ गया था।   वेनेजुएला पर पहली बार दावा इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी विशेष बलों ने वेनेजुएला में एक अभियान चलाया था, जिसके बाद वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर न्यूयॉर्क ले जाया गया। इसके बाद ट्रंप ने कहा कि अमेरिका वेनेजुएला को चलाएगा और वहां के तेल संसाधनों पर अमेरिकी कंपनियों का नियंत्रण होगा। हालांकि, यह पहली बार है जब ट्रंप ने खुले तौर पर वेनेजुएला को अमेरिकी क्षेत्र के रूप में दिखाया है। ट्रंप ग्रीनलैंड क्यों चाहते हैं? ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की “राष्ट्रीय सुरक्षा” के लिए जरूरी है, क्योंकि यह खनिज संसाधनों से भरपूर और रणनीतिक रूप से अहम इलाका है। जबकि अमेरिका पहले से ही वहां एक सैन्य अड्डा रखता है और डेनमार्क नाटो का सहयोगी देश है। हाल ही में ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्हें अब शांति स्थापना की जिम्मेदारी उनकी नहीं है और न ही यह सोचने की उनकी मजबूरी है। इसके साथ ही उन्होंने ग्रीनलैंड पर “पूरी तरह नियंत्रण” की बात कही थी। उन्होंने ग्रीनलैंड सौदे का विरोध करने वाले यूरोपीय देशों पर भारी टैक्स (टैरिफ) लगाने की चेतावनी भी दी है। ट्रंप कार्ड पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया ट्रंप के इस कदम से यूरोप और नाटो देशों में चिंता बढ़ गई है। कई देशों ने साफ किया है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और उस पर अमेरिका का कोई अधिकार नहीं बनता। विशेषज्ञों का कहना है कि यह नक्शा कोई आधिकारिक घोषणा नहीं है और न ही अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अमेरिका ने इन देशों को अपने अधीन किया है। इसे ट्रंप की राजनीतिक सोच और दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

‘अब शांति मेरी जिम्मेदारी नहीं’ नोबेल पर भड़के ट्रंप, नॉर्वे PM को लिखा पत्र लीक

वाशिंगटन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर जुनून अब अपने अगले शिखर तक पहुंचता नजर आ रहा है। इस बार की नोबेल विजेता मचाडो ने भले ही उन्हें अपना नोबेल पदक सौंप दिया हो, लेकिन इसके बाद भी ट्रंप का नॉर्वे की नोबेल समिति को लेकर गुस्सा कम नहीं हुआ है। उन्होंने नॉर्वे के पीएम जोनास गहर स्टोरे को एक पत्र लिखकर कहा है कि अब, जबकि उन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं दिया गया है, तो वह 'केवल शांति' के बारे में सोचने की जरूरत महसूस नहीं करते हैं।   रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्टोरे को लिखे एक पत्र में उन्हें नोबेल पुरस्कार न दिए जाने का जिक्र किया। इतना ही नहीं उन्होंने नोबेल समिति में नॉर्वे सरकार की भूमिका को अपनी विदेश नीति से भी जोड़ा। उन्होंने लिखा, "आपके देश ने मुझे 8 से अधिक युद्धों को रोकने के बावजूद नोबेल शांति पुरस्कार न देने का निर्णय लिया, इसलिए अब मुझे केवल शांति के बारे में सोचने की कोई बाध्यता महसूस नहीं होती, हालांकि शांति हमेशा सर्वोपरि रहेगी, लेकिन अब मैं इस बारे में सोच सकता हूं कि संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए क्या अच्छा और उचित है।" ट्रम्प ने आगे ग्रीनलैंड पर डेनमार्क की संप्रभुता पर सवाल उठाया और तर्क दिया कि न तो डेनमार्क और न ही मौजूदा सुरक्षा व्यवस्थाएं इस क्षेत्र को प्रमुख शक्तियों से बचा सकती हैं। उन्होंने कहा, "डेनमार्क अकेले चीन और रूस जैसी शक्तियों से ग्रीनलैंड की रक्षा नहीं कर सकता। वैसे भी उसके पास ग्रीनलैंड के स्वामित्व का कोई अधिकार क्यों है? उनके पास कोई लिखित दस्तावेज नहीं है। बस इतना है कि सैंकड़ों सालों पहले एक नाव ने वहां पड़ाव डाल लिया था, ऐसे तो हमारी भी सैकड़ों नावें वहां उतरती थीं।" अमेरिका के लिए कुछ करे नाटो नाटो में अमेरिका की भूमिका पर बात करते हुए ट्रंप ने दावा किया, "नाटो की स्थापना के बाद से अमेरिका ने किसी भी अन्य देश की तुलना में इसके लिए अधिक काम किया है, और अब नाटो को भी संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए कुछ करना चाहिए। जब तक ग्रीनलैंड पर अमेरिका का पूर्ण नियंत्रण नहीं हो जाता, तब तक दुनिया सुरक्षित नहीं रहेगी।”  

ग्रीनलैंड पर कब्जे के विरोध पर 8 देशों पर फूटा ट्रंप का टैरिफ बम

वाशिंगटन. ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की योजना पर डोनाल्ड ट्रंप का विरोध करने वाले 8 देशों पर अमेरिका ने 10 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने बताया कि डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूके, नीदरलैंड्स और फिनलैंड पर 10 फीसदी का अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाएगा। अगर ग्रीनलैंड की खरीद वाली डील नहीं पूरी हो पाती है तो इस टैरिफ को बढ़ाकर 25 फीसदी कर दिया जाएगा। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों के बीच कांग्रेस के एक द्विदलीय प्रतिनिधिमंडल ने शनिवार को डेनमार्क और ग्रीनलैंड को अपने समर्थन का आश्वासन देने की कोशिश की। ट्रंप ने धमकी दी है कि आर्कटिक के रणनीतिक द्वीप पर अमेरिका के नियंत्रण का समर्थन नहीं करने पर कड़े शुल्क लगाए जाएंगे। प्रतिनिधिमंडल के नेता और डेलावेयर से डेमोक्रेटिक पार्टी के सीनेटर क्रिस कून्स ने कहा कि ग्रीनलैंड को लेकर मौजूदा बयानबाजी से डेनमार्क में चिंता का माहौल है। उन्होंने कहा कि वह हालात को शांत करना चाहते हैं। कोपेनहेगन में कून्स ने कहा, "मुझे उम्मीद है कि डेनमार्क के लोग अमेरिकी लोगों में अपना विश्वास नहीं छोड़ेंगे।" उन्होंने कहा कि अमेरिका डेनमार्क और नाटो के प्रति "उन सभी कार्यों के लिए सम्मान रखता है जो हमने साथ मिलकर किए हैं।" उनकी टिप्पणियां ‘व्हाइट हाउस’ से आ रही टिप्पणियों से बिल्कुल विपरीत हैं। ट्रंप ने बार-बार यह दावा करके अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने की अपनी मांगों को सही ठहराने की कोशिश की है कि चीन और रूस की ग्रीनलैंड पर नजर है, जहां महत्वपूर्ण खनिजों के विशाल अप्रयुक्त भंडार मौजूद हैं। ‘व्हाइट हाउस’ ने जबरन इस क्षेत्र पर कब्ज़ा करने की संभावना से इनकार नहीं किया है। कून्स ने कहा, ‘‘ग्रीनलैंड को फिलहाल कोई सुरक्षा खतरा नहीं है।’’ ट्रंप कई महीनों से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि अमेरिका को ग्रीनलैंड पर नियंत्रण रखना चाहिए, जो नाटो सहयोगी डेनमार्क का एक अर्द्ध-स्वायत्त क्षेत्र है। उन्होंने इस सप्ताह की शुरुआत में कहा था कि ग्रीनलैंड का अमेरिकी नियंत्रण में न होना "अस्वीकार्य" होगा।

अमेरिकी सीनेटरों ने डोनाल्ड ट्रंप को लिखी चिट्ठी, दाल पर 30% टैरिफ हटाने की अपील

 नई दिल्‍ली कुछ दिन पहले ही अपडेट आया था कि भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील के फर्स्‍ट स्‍टेज की बातचीत लगभग पूरी ही हो चुकी है, जल्‍द ही इसका ऐलान किया जा सकता है. इस बीच अमेरिकी सीनेटर्स ने राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप को चिट्ठी लिखी है और भारत को अमेरिकी मटर दाल पर से टैक्‍स हटाने की मांग की है.  ट्रंप को लिखी चिट्ठी में अमेरिकी सीनेटरों ने भारत-अमेरिका ट्रेड एग्रीमेंट में 'दलहन फसलों के लिए अनुकूल प्रावधान' की मांग की है.  राष्ट्रपति ट्रंप से यह सुनिश्चित करने के लिए कह रहे हैं कि भारत पीली मटर (दलहन) पर 30% टैक्स हटा दे, जिसे अमेरिकी किसान बेचना चाहते हैं.  भारत दालों का सबसे बड़ा यूजर  नॉर्थ डकोटा और मोंटाना मटर समेत दलहन फसलों के टॉप दो उत्पादक हैं और भारत इन फसलों का दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जो दुनिया की कुल खपत का लगभग 27% हिस्सा यूज करता है. जैसे-जैसे यूनाइटेड स्टेट्स व्यापार में असमानताओं को ठीक करने की कोशिश कर रहा है, अमेरिकी किसान इस कमी को पूरा करने में मदद करने के लिए तैयार हैं.  उन्‍होंने ट्रंप से कहा कि जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ रही है, हम आपसे रिक्वेस्ट करते हैं कि यूनाइटेड स्टेट्स और रिपब्लिक ऑफ इंडिया के बीच होने वाले किसी भी एग्रीमेंट में दालों की फसलों के लिए जोर दें. भारत में सबसे ज्‍यादा खाई जाने वाली दालें मसूर, चना, सूखी बीन्स और मटर हैं, फिर भी उन्होंने अमेरिकी दालों पर काफी टैरिफ लगाया है. अमेरिका को हो रहा नुकसान ट्रंप को लिखे लेटर में कहा गया है कि भारत ने 30 अक्टूबर, 2025 को पीली मटर पर 30% टैरिफ लगा दिया. यह ड्यूटी 1 नवंबर, 2025 से लागू है, जिस कारण अमेरिकी दालों के प्रोड्यूसर्स को भारत में अपने हाई-क्वालिटी प्रोडक्ट को एक्सपोर्ट करते समय कॉम्पिटिशन में काफी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है. पहले भी कर चुके हैं मांग  सीनेटरों ने ट्रंप से कहा कि आपके पहले कार्यकाल में हमने आपको इस मुद्दे पर लिखा था, और आपने 2020 में भारत के साथ ट्रेड बातचीत के दौरान हमारा लेटर प्रधानमंत्री मोदी को खुद दिया था, जिससे हमारे प्रोड्यूसर्स को बातचीत की टेबल पर लाने में मदद मिली.  अमेरिकी खेती के सामान के लिए मार्केट के मौके बढ़ाने का आपका काम बहुत जरूरी रहा है. जैसे-जैसे यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड में असमानताओं को ठीक करने की कोशिश कर रहा है, अमेरिकी किसान इस कमी को पूरा करने में मदद करने के लिए तैयार हैं. अगर ट्रेड के मौके मिलते हैं, तो उनमें दुनिया को खाना खिलाने और एनर्जी देने की जबरदस्त क्षमता है. हमारे देशों के बीच इकोनॉमिक सहयोग को बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के साथ दालों पर टैरिफ के मुद्दे पर बात करना अमेरिकी प्रोड्यूसर्स और भारतीय कस्टमर्स दोनों के लिए फायदेमंद होगा. 

मचाडो ने व्हाइट हाउस में ट्रंप को सौंपा अपना नोबेल पुरस्कार, वेनेजुएला संकट पर हुई चर्चा

वाशिंगटन वेनेजुएला की विपक्षी नेता और नोबेल प्राइज विजेता मारिया कोरीना मचाडो और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात आखिरकार हो गई. वेनेजुएला में हुए एक्शन के बाद इस मीटिंग पर सबकी नजर थी. मीटिंग के बाद मचाडो ने बड़ा दावा किया. वह बोलीं कि उन्होंने मीटिंग के दौरान ट्रंप को अपना नोबेल शांति पुरस्कार पदक भेंट किया, हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि क्या उन्होंने वास्तव में इसे स्वीकार किया. मचाडो लंच मीटिंग के लिए गुरुवार को व्हाइट हाउस पहुंचीं थीं.  यह बैठक वेनेजुएला के राजनीतिक भविष्य को लेकर चल रही तीव्र बहस के बीच हुई, जो इस महीने की शुरुआत में अमेरिका के नेतृत्व में पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद हुई है. एक घंटे से अधिक चली चर्चा के बाद जब मचाडो व्हाइट हाउस से निकलीं, तो उनका जोरदार स्वागत समर्थकों ने किया. उन्होंने समर्थकों से कहा, 'हम राष्ट्रपति ट्रंप पर भरोसा कर सकते हैं,' जिसके बाद कुछ लोगों ने 'धन्यवाद, ट्रंप' के नारे लगाए और फिर वाशिंगटन में अन्य बैठकों के लिए रवाना हो गईं. यह पूछे जाने पर कि क्या ट्रंप ने उनके द्वारा दिया गया पदक स्वीकार कर लिया है, मचाडो ने जवाब देने से इनकार कर दिया. यह कदम कई हफ्तों से चल रही अटकलों और ट्रंप को पुरस्कार देने की उनकी पिछली सार्वजनिक टिप्पणियों के बाद आया है. हालांकि, नोबेल शांति पुरस्कार देने वाली संस्था पहले ही साफ कर चुकी है कि नियमों के अनुसार पुरस्कार को हस्तांतरित या साझा नहीं किया जा सकता है. ट्रंप ने मचाडो को दिया गिफ्ट वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो व्हाइट हाउस से एक गिफ्ट बैग लेकर बाहर निकलीं, जिस पर प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप का नाम लिखा था. बैग को मचाडो ने अपने पर्स के साथ हाथ में पकड़ा हुआ था. इस लाल रंग के बैग पर प्रेसिडेंट के सिग्नेचर हो रखे हैं. बैग में आखिर क्या है, ये अभी साफ नहीं है. व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने मचाडो को वेनेजुएला के कई लोगों की एक उल्लेखनीय और साहसी आवाज बताया, लेकिन साथ ही यह भी दोहराया कि उनके नेतृत्व की संभावनाओं के बारे में ट्रंप का आकलन बदला नहीं है. ट्रंप पहले भी कह चुके हैं कि नेतृत्व करने के लिए उन्हें घरेलू समर्थन प्राप्त नहीं है. मचाडो को US से मिला-जुला सपोर्ट नोबेल पुरस्कार विजेता होने और लोकतंत्र की मुखर वकालत करने के बावजूद, मचाडो को अमेरिकी अधिकारियों से मिला-जुला समर्थन मिला है. ट्रंप ने तेल और अन्य मुद्दों पर सहयोग के लिए रोड्रिगेज की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की है, जबकि कुछ अमेरिकी सांसदों ने मचाडो पर भरोसा जताया है. गुरुवार की बैठक माचाडो की महीनों बाद वॉशिंगटन में पहली सार्वजनिक उपस्थिति थी. सुरक्षा को खतरे के चलते उन्हें वेनेजुएला छोड़ना पड़ा था. मादुरो समर्थक सर्वोच्च न्यायालय ने माचाडो को वेनेजुएला के 2024 के राष्ट्रपति चुनाव लड़ने से रोक दिया था. स्वतंत्र पर्यवेक्षकों का कहना है कि विपक्ष समर्थित एडमंडो गोंजालेज ने निर्णायक जीत हासिल की, हालांकि मादुरो ने जीत की घोषणा कर सत्ता पर अपना कब्जा बनाए रखा. डेमोक्रेटिक सीनेटर क्रिस मर्फी, जिन्होंने मचाडो से मुलाकात की, ने बताया कि मचाडो ने सांसदों को बताया कि वेनेजुएला में दमनकारी व्यवस्था मादुरो काल से बनी हुई है. उन्होंने अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज को एक 'कुशल नेता' बताया, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन से और अधिक मजबूत होती जा रही हैं. ट्रंप ने पहले कहा था कि उनकी प्राथमिकता वेनेजुएला के तेल तक अमेरिकी पहुंच सुनिश्चित करना और देश की अर्थव्यवस्था को संभालना है. मादुरो के बाद सरकार संभाल रहीं रोड्रिगेज की उन्होंने बार-बार तारीफ की है.

US में भारतीयों के खिलाफ नफरत क्यों बढ़ी? ट्रंप दौर की नीतियों ने कैसे बनाया टारगेट

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के तहत वीजा नियमों में किए गए बदलाव भारतीयों के लिए कई परेशानियां खड़ी कर रहे हैं। हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट के मुताबिक कुशल कामगारों के लिए मिलने वाले H-1B वीजा नियमों में बदलाव के बाद भारतीय प्रोफेशनल्स और भारतीय मूल के कारोबारियों के खिलाफ अमेरिका में नफरत भरा माहौल बना है और भारतीयों के प्रति भेदभाव भी बढ़ता दिख रहा है।   बता दें कि ट्रंप सरकार ने नए नियमों के तहत H-1B वीजा के लिए आवेदन शुल्क बढ़ाकर 1 लाख डॉलर कर दिया गया है। इसके साथ ही वेतन के आधार पर चयन की व्यवस्था लागू की गई है, जिसमें ज्यादा सैलरी वाली नौकरियों को प्राथमिकता मिलेगी। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह बदलाव अमेरिकी कामगारों की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं। वहीं फरवरी से नियम और सख्त होने वाले हैं। अमेरिकी अधिकारी सबसे ज्यादा वेतन पाने वाले लेवल-4 H-1B आवेदकों को प्राथमिकता देंगे। इससे कई कुशल विदेशी प्रोफेशनल्स के लिए वीजा पाना और मुश्किल हो जाएगा। बड़ी कंपनियां निशाने पर रिपोर्ट में बताया है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा किए गए इन बदलावों के बाद हालात और बदतर हुए हैं। कई बड़ी अमेरिकी कंपनियां, जैसे फेडएक्स, वॉलमार्ट और वेरिजोन को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर निशाना बनाया गया है। सोशल मीडिया पर इन कंपनियों पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वे गैरकानूनी तरीके से भारतीयों को नौकरियां ‘बेच’ रही हैं। नौकरी चोर’ और ‘वीजा स्कैमर’ का टैग एडवोकेसी ग्रुप ‘स्टॉप एएपीआई हेट’ और काउंटर टेररिज्म फर्म ‘मूनशॉट’ के मुताबिक पिछले साल नवंबर में दक्षिण एशियाई समुदायों के खिलाफ हिंसा की धमकियों में 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इसी दौरान ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर गालियों और अपशब्दों के इस्तेमाल में भी 69 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ। बीते दिसंबर में भी एक भारतीय कंपनी को जमकर निशाना बनाया गया। दरअसल सोशल मीडिया पर फेडएक्स के एक क्षतिग्रस्त ट्रक का वीडियो वायरल हो गया, जिसके बाद भारतीय मूल के सीईओ राज सुब्रमणियम को निशाना बनाया गया। ऑनलाइन पोस्ट में ‘अमेरिकी कंपनियों पर भारतीय कब्जा रोकने’ जैसी आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं। हालांकि फेडएक्स ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। मामले पर बात करते हुए सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर राकिब नाइक ने बताया कि इनमें से कई हमले संगठित कैंपेन का हिस्सा प्रतीत हैं। उनके मुताबिक, सरकारी स्मॉल बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन से लोन लेने वाले भारतीय-अमेरिकी कारोबारियों को खास तौर पर निशाना बनाया गया है। नाइक ने चेतावनी दी कि भेदभाव बढ़ रहा है और भारतीयों को ‘नौकरी चोर’ और ‘वीजा स्कैमर’ तक कहा जा रहा है। ऐसे माहौल में कम्पनियां समावेशी वातावरण बनाने की नीति को होल्ड पर डाल चुकी हैं।