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हनुमान चालीसा पढ़ते वक्त एकाग्रता सहित 10 नियमों का करें पालन

शनिवार और मंगलवार को लोग बजरंगबली को प्रसन्न करने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। कहते हैं कि हनुमान जी चिरंजीवी हैं। ऐसे में जो भक्त सच्ची श्रद्धा बजरंगबली को याद करता है उनकी पूजा करता है उनपर हनुमान जी की विशेष कृपा बरसती है, पलभर में संकट दूर हो जाते हैं। लेकिन हनुमान चालीसा का पाठ यदि नियम से किया जाए, तो ही इसका फल प्राप्त होता है। वरना गलत तरीके से किए गए पाठ से बजरंगबली नाराज हो जाते हैं। जैसे कि गलत स्थान व गलत समय पर पाठ करना आदि। चलिए जानते हैं कि हनुमान चालीसा का पाठ करते समय किन गलतियों से बचना चाहिए। हनुमान चालीसा के दौरान ना करें ये गलतियां – हनुमान चालीसा का पाठ करते समय किसी भी तरह की नकारात्मकता अपने दिल में नहीं लानी चाहिए। -जो लोग निर्बलों को बिना बात के सताते हैं, उन पर कभी भी हनुमान जी की कृपा नहीं बरसती है। – हनुमान चालीसा का पाठ करते समय साधक को किसी भी व्यक्ति से बातचीत नहीं करनी चाहिए। – कुछ समय ऐसे भी हैं जब हनुमान चालीसा का पाठ नहीं करना चाहिए। सूर्यास्त के तुरंत बाद पाठ करने से बचना चाहिए। – गुस्से, चिड़चिड़े मन या मानसिक अशांति की अवस्था में भी पाठ नहीं करना चाहिए। – बिना स्नान, अशुद्ध अवस्था, जल्दबाजी या दोपहर के समय किया गया पाठ भी फलदायी नहीं माना जाता। हनुमान चालीसा पाठ के 10 जरूरी नियम 1. हनुमान चालीसा पाठ में साफ-सफाई और पवित्रता का खास ख्याल रखना चाहिए। ऐसे में जहां आप हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं या पूजा स्थल की साफ-सफाई अच्‍छे से कर लें। 2. हनुमान चालीसा का पाठ हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करें। इसके लिए सुबह और शाम का समय परफेक्ट रहता है। 3. हनुमान चालीसा के पाठ के दौरान उपयोग किए गए फूल लाल रंग के रखें। 4. हनुमान चालीसा के पाठ के पहले बजरंगबली के सामने दीपक जरूर जलानी करना चाहिए। 5. ध्यान रखें कि दीपक में जो बाती लगा रहे हैं, वह भी लाल सूत (धागे) की होनी चाहिए। आप दीपक में चमेली का तेल या शुद्ध घी का इस्तेमाल होनी चाहिए। 6. हनुमानजी चालीसा के पाठ के बाद उन्हें गुड़ और चने का प्रसाद जरूर ‍अर्पित करें। 7. आप केसरिया बूंदी के लड्डू, बेसन के लड्डू, चूरमा, मालपुआ या मलाई मिश्री का भोग भी लगा सकते हैं। 8. हनुमान चालीसा पाठ के दौरान सिर्फ एक वस्त्र पहनकर ही चालीसा का पाठ करें या उनकी पूजा करें। 9. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक शनिवार या रविवार के दिन 100 बार हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। 10. अगर आप 100 बार नहीं कर सकते हैं, तो आप 11, 9, 5, 3 या 1 बार शनिवार, मंगलवार या फिर रोज कर सकते हैं।

तुलसी के 5 संकेत बदल सकते हैं किस्मत

नई दिल्ली. तुलसी का पौधा हर घर की आत्मा माना जाता है। यह न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि वास्तु और स्वास्थ्य के नजरिए से भी बेहद अहम है। अक्सर हम देखते हैं कि कभी तुलसी अचानक हरी-भरी हो जाती है, तो कभी बिना किसी कारण के सूखने लगती है। मान्यताओं के अनुसार, तुलसी के ये बदलाव हमारे जीवन में आने वाली खुशियों या परेशानियों का पहले ही संकेत दे देते हैं। यहां तुलसी के पौधे से जुड़े उन शुभ संकेतों और नियमों के बारे में बताया गया है, जो घर में सुख-समृद्धि और मां लक्ष्मी की कृपा लाते हैं: 1. तुलसी का अचानक हरा-भरा होना अगर आपके आंगन में लगी तुलसी अचानक बहुत ज्यादा हरी-भरी और घनी हो गई है, तो यह एक बेहद शुभ संकेत है। इसका अर्थ है कि आपके घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ रहा है और जल्द ही आपको कोई अच्छी खबर या धन लाभ मिल सकता है। 2. मंजरियों का आना तुलसी के पौधे पर मंजरी आना शुभ माना जाता है, लेकिन वास्तु शास्त्र के अनुसार, अगर मंजरी बहुत ज्यादा हो जाएं, तो उन्हें समय-समय पर हटाकर भगवान विष्णु को अर्पित कर देना चाहिए। कहा जाता है कि बहुत ज्यादा मंजरी पौधे पर रहने से तुलसी 'तनाव' महसूस करती है, और उन्हें हटाने से घर का बोझ कम होता है। 3. पक्षियों का आगमन अगर आपके घर की तुलसी पर चिड़ियां या अन्य पक्षी आकर बैठते हैं और चहचहाते हैं, तो समझ लीजिए कि आपके घर में खुशहाली का समय आने वाला है। पक्षियों का तुलसी के पास आना वातावरण के शुद्ध और मंगलमय होने का प्रतीक माना जाता है। 4. तुलसी के पास छोटे पौधों का उगना अगर मुख्य तुलसी के गमले के आसपास अपने आप छोटे-छोटे तुलसी के पौधे उगने लगें, तो यह वंश वृद्धि और सौभाग्य का सूचक है। यह दर्शाता है कि देवी लक्ष्मी आपसे प्रसन्न हैं। तुलसी की देखभाल के जरूरी नियम दिशा का चुनाव: तुलसी को हमेशा उत्तर या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) दिशा में लगाना चाहिए। इस दिशा में रखने से घर में सुख-शांति बनी रहती है। शाम का दीपक: रोजाना शाम को तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। विशेष दिनों का ध्यान: एकादशी, रविवार और सूर्य ग्रहण के दिन तुलसी को जल नहीं चढ़ाना चाहिए और न ही इसके पत्ते तोड़ने चाहिए।

पुष्पों की रंगीन दुनिया: मुख्यमंत्री डॉ. यादव उद्घाटन करेंगे 30 जनवरी को

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मुख्य आतिथ्य में 30 जनवरी 2026 को राजधानी के हृदय स्थल गुलाब गार्डन में पुष्प महोत्सव का आयोजन किया जाएगा। महोत्सव में 5 हज़ार से अधिक गमले ओर 2 हज़ार से अधिक कट फ्लॉवर में विभिन्न किस्म के पुष्प की सुगंध का आनंद भोपालवासी उठा सकेंगे। महोत्सव की तैयारी की बैठक आयुक्त उद्यानकी ख़ाद्य संस्करण श्री अरविंद दुबे की अध्यक्षता में हुई। बेठक में नेशनल रोज सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष श्री सुशील प्रकाश, मध्यप्रदेश रोज सोसायटी के अध्यक्ष श्री गर्दे सहित अन्य सदस्य गण ओर विभागीय अधिकारी उपस्थित थे। आयुक्त श्री दुबे ने बताया कि राज्य सरकार वर्ष-2026 को कृषि वर्ष के रूप में मना रही है। इसी कड़ी में भव्य पुष्प महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। महोत्सव में भोपाल अलावा प्रदेश अन्य प्रमुख जिलो इंदौर, उज्जैन, नर्मदापुरम, पचमढ़ी, गुना ग्वालियर सहित अन्य जिलों से 5 हजार से अधिक गमलो ओर 2 हज़ार कट फ्लॉवर, प्रदर्शन किया जाएगा, जिलो से आने किसानों के पुष्प स्टॉल, नर्सरी के उत्पाद, आम जन के क्रय करने के लिए उपलब्ध रहेंगे।  

ज्योतिष अलर्ट: शनि जब इन 7 ग्रहों के साथ आते हैं तो शुरू होती हैं समस्याएं और बीमारियां

शनि ग्रह का गोचर और उनकी अन्य ग्रहों के साथ युति किसी व्यक्ति के जीवन में तमाम पहलुओं पर गहरा प्रभाव डालती है. इसमें स्वास्थ्य, रिश्ते और आर्थिक स्थिति भी शामिल है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि लगभग ढाई वर्ष तक एक राशि में रहते हैं. प्रख्यात ज्योतिषी डॉ. बसवराज गुरुजी ने इस अवधि के दौरान शनि के साथ अन्य ग्रहों की युति होने पर पड़ने वाले प्रभावों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बारे में जानकारी दी है. उनका कहना है कि ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक जब शनि अकेले प्रभाव में होते हैं, तो इससे गठिया रोग, तंत्रिका संबंधी कमजोरी, कमजोरी, पक्षाघात, गुर्दे और यकृत की विफलता, अस्थमा, श्वसन संबंधी समस्याएं, निमोनिया, तेज बुखार, बेहोशी, बालों का झड़ना, अपच और व्यसनों की ओर झुकाव जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं. जब अन्य ग्रह शनि के साथ युति बनाते हैं तो भी तमाम तरह के विशिष्ट प्रभाव पड़ते हैं. आइए जानते हैं कि किस ग्रह के साथ युति बनाने पर कौन-कौन समस्या हो सकती है? शनि और सूर्य की युति जब सूर्य और शनि एक साथ युति में होते हैं, तो शरीर में कमजोरी, दृष्टिहीनता, सुस्ती और उत्साह की कमी होती है. वरिष्ठों से परेशानी, ससुर या ससुर से दूरी या उनकी बीमारी की चिंता, अत्यधिक खर्च और मानसिक शांति का ह्रास हो सकता है. शनि और चंद्रमा की युति जब चंद्रमा शनि के साथ युति बनाते हैं तो मतिभ्रम, सीने में दर्द, एनीमिया, चेहरे की चमक में कमी, चेहरे पर मुंहासे, सुस्ती और रुचि की कमी हो सकती है. शनि और बुध की युति जब बुध और शनि एक साथ युति में होते हैं तो हकलाना, त्वचा रोग, कान में दर्द और कान से स्राव जैसी समस्याएं हो सकती हैं. छोटे बच्चों के लिए बुध को शांत कराना उचित होता है. शनि और बृहस्पति की युति जब बृहस्पति और शनि एक साथ युति में होते हैं तो पाचन संबंधी समस्याएं, अत्यधिक बुद्धि, अजीब व्यवहार, स्मृति हानि और भोजन के प्रति उदासीनता हो सकती है. शनि और शुक्र की युति जब शुक्र और शनि एक साथ युति में होते हैं तो गले में खराश, प्रतिभा में कमी, टॉन्सिल की समस्या, बवासीर और छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं. शनि और राहु की युति जब राहु शनि के साथ युति में होते हैं तो जहर, बांझपन और हड्डियों में दर्द का डर हो सकता है. साथ ही, यह डर भी हो सकता है कि खाया गया भोजन जहर में परिवर्तित हो जाएगा. शनि और केतु की युति जब केतु शनि के साथ युति में होते हैं तो इससे रक्तचाप (बीपी), रक्त संबंधी समस्याएं और शरीर में हर तरह का दर्द हो सकता है. गुरुजी ने सलाह दी है कि ज्योतिष से संबंधित इन सभी समस्याओं के लिए चिकित्सा उपचार के साथ-साथ संबंधित ग्रहों की शांति पूजा करना जरूरी है.

यमुना पर तीन प्रमुख बांध प्रोजेक्ट्स को मिली गति, केंद्र का फैसला दिल्ली के जलसंकट को सुलझाएगा

लखनऊ  कई दशकों से ठंडे बस्ते में पड़े यमुना और उसकी सहायक नदियों पर प्रस्तावित तीन बड़े बांध प्रोजेक्ट अब फिर से रफ्तार पकड़ने जा रहे हैं। केंद्र सरकार ने लखवार, रेणुकाजी और किशाऊ बांध परियोजनाओं की समीक्षा कर इन्हें पुनर्जीवित करने का फैसला लिया है। अधिकारियों के अनुसार, इन परियोजनाओं के पूरा होने से यमुना नदी में जल प्रवाह बेहतर होगा और राजधानी दिल्ली की पीने के पानी की जरूरतें अगले 25 वर्षों तक पूरी की जा सकेंगी। इन परियोजनाओं को लेकर हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और जल मंत्री प्रवेश वर्मा के साथ बैठक हुई थी। बैठक में यमुना के पुनर्जीवन और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में टिकाऊ जल उपलब्धता सुनिश्चित करने की व्यापक रणनीति पर चर्चा की गई। अधिकारियों का कहना है कि इन तीनों बांधों से मिलने वाला पानी दिल्ली की दीर्घकालिक जल समस्या का समाधान बन सकता है। दिल्ली में पानी की कमी, बढ़ती मांग वर्तमान में दिल्ली में औसतन 900 मिलियन गैलन प्रतिदिन (MGD) पानी का उत्पादन होता है, जबकि कुल मांग 1,113 MGD है। इसका मतलब है कि राजधानी को करीब 200 MGD पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, दिल्ली के कम से कम 10 प्रतिशत घरों में आज भी पाइप से पानी की नियमित आपूर्ति नहीं हो पा रही है। दिल्ली को कितना पानी मिलेगा      परियोजनाएं पूरी होने के बाद दिल्ली को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।     लखवार बांध से दिल्ली को लगभग 135 MGD पानी मिलेगा।     रेणुकाजी परियोजना से 275 MGD पानी मिलने की संभावना है।     किशाऊ परियोजना से 372 MGD पानी दिल्ली को उपलब्ध कराया जा सकेगा। इन तीनों परियोजनाओं से कुल मिलाकर पानी की आपूर्ति बढ़ेगी, जिससे मौसमी और अनियमित जल स्रोतों पर निर्भरता कम होगी। अधिकारियों के अनुसार, अगले 5 से 7 वर्षों में इन परियोजनाओं से दिल्ली को पानी मिलना शुरू हो सकता है। पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) में सुधार इन बांधों से केवल पानी की मात्रा ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि यमुना में ई-फ्लो (पर्यावरणीय प्रवाह) भी सुधरेगा। ई-फ्लो का मतलब नदी में पानी की वह मात्रा, समय और गुणवत्ता है, जो स्वस्थ जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और उस पर निर्भर मानव जीवन के लिए जरूरी होती है। अतिरिक्त 1,000 क्यूसेक पानी मिलने से यमुना की जल गुणवत्ता और प्रवाह की स्थिति बेहतर होने की उम्मीद है। परियोजनाओं की मौजूदा स्थिति     लखवार परियोजना (उत्तराखंड): अब तक करीब 12.6 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। इसे 2031 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।     रेणुकाजी परियोजना (हिमाचल प्रदेश): यह फिलहाल टेंडर प्रक्रिया के चरण में है और इसके 2032 तक पूरा होने की उम्मीद है।     किशाऊ परियोजना (उत्तराखंड–हिमाचल सीमा): यह अभी अंतरराज्यीय समझौते और मंजूरी के चरण में है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2033 रखा गया है। कई राज्यों को होगा फायदा इन परियोजनाओं से केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को भी लाभ मिलेगा। जल बंटवारा राज्यों की लागत भागीदारी के आधार पर किया जाएगा। इसके अलावा, इन बांधों से 760 मेगावाट से अधिक जलविद्युत उत्पादन की क्षमता भी विकसित की जाएगी। पहले क्यों रुकी थीं परियोजनाएं अधिकारियों के मुताबिक, इन परियोजनाओं के लंबे समय तक अटके रहने के पीछे कई कारण रहे:-     फंड की कमी     राज्यों के बीच विवाद     पर्यावरण और वन संबंधी मंजूरियों में देरी अब केंद्र सरकार के सक्रिय हस्तक्षेप के बाद इन बाधाओं को दूर करने की कोशिश की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये तीनों परियोजनाएं तय समयसीमा में पूरी हो जाती हैं, तो न केवल दिल्ली की जल आपूर्ति मजबूत होगी, बल्कि यमुना नदी के पुनर्जीवन की दिशा में भी यह एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।  

रुद्राक्ष पहनने की सोच रहे हैं? पहले पढ़ें ये नियम, वरना हो सकता है नुकसान

रुद्राक्ष बहुत ही पवित्र माना जाता है. लोग इसकी माला पहनते हैं. रुद्राक्ष को धारण करने के लाभ बताए गए हैं. शास्त्रों के अनुसार, रुद्राक्ष की माला का जाप बहुत फलदायी माना जाता है. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, रुद्राक्ष की माला का जप करने से कई गुना अधिक फल मिलता है. इस माला का जप करने से अध्यात्मिक उन्नति होती है. रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओं से हुई बताई जाती है. इसको धारण करने से बहुत से लाभ होते हैं, लेकिन शास्त्रों में इसे धारण करने के नियम भी बताए गए हैं. इसे शास्त्रों में बताए नियम से ही धारण करना चाहिए. अन्यथा लाभ के स्थान पर नुकसान भी हो सकता है. इस तरह करें रुद्राक्ष धारण रुद्राक्ष को बाजार से लाकर सीधा ही कभी धारण न करें, बल्कि पहले इसे गंगाजल या कच्चे दूध से शुद्ध करें. उसके बाद इसको धारण करें. शुभ मुहूर्त में 108 बार ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करें और इसकी प्राण प्रतिष्ठा करें या फिर मंदिर में शिवलिंग से इसको स्पर्श कराएं. फिर रुद्राक्ष को धारण करें. इन बातों का रखें ध्यान रुद्राक्ष धारण करने से पहले शुभ दिन अवश्य देखें. शास्त्रों में बताया गया है कि रुद्राक्ष धारण करने के लिए अमावस्या, पूर्णिमा, सावन, सोमवार या शिवरात्रि का दिन सबसे उत्तम माना जाता है. इसके साथ ही रुद्राक्ष को हमेशा साफ रखें. इतना ही नहीं कभी भी अपना पहना हुआ रुद्राक्ष किसी दूसरे को नहीं दें और ना ही किसी का रुद्राक्ष स्वयं लें. अगर आप इन नियमों की अनदेखी करते हैं, तो आपको रुद्राक्ष के लाभ की जगह अशुभ परिणाम प्राप्त हो सकते हैं. रुद्राक्ष धारण करने के लाभ नियमानुसार रुद्राक्ष धारण करने से भगवान शिव की कृपा मिलती है. साथ ही यह मन को शांत रखता है. रुद्राक्ष धारण करने से एकाग्रता बढ़ती है. नकारात्मक ऊर्जा व बुरी नजर का प्रभाव दूर रहता है. मन में आने वाले अशुद्ध और बुरे विचार दूर रहते हैं. ज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार, ये ग्रहों के दुष्प्रभाव से बचाता है. इसे धारण करने से हर काम सफल होता है.

चारधाम यात्रा पर बड़ी अपडेट: तय समय से पहले खुलेंगे कपाट, व्यवस्थाओं को लेकर सरकार तैयार

उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा को लेकर इस साल श्रद्धालुओं के लिए अच्छी खबर है. साल 2026 में चारधाम यात्रा पिछले साल की तुलना में 11 दिन पहले शुरू होने जा रही है. यात्रा का आगाज 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ होगा. पिछले वर्ष (2025) चारधाम यात्रा 30 अप्रैल को शुरू हुई थी, लेकिन इस बार तिथियों के शुभ संयोग के कारण यह 19 अप्रैल से ही शुरू हो जाएगी. यात्रा का समय बढ़ने से न केवल देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए अधिक समय मिलेगा, बल्कि स्थानीय होटल कारोबारियों, टैक्सी संचालकों और व्यापारियों के चेहरे भी खिल गए हैं. माना जा रहा है कि इस अतिरिक्त समय से पर्यटन कारोबार में बड़ी बढ़ोत्तरी होगी. क्या होती है अक्षय तृतीया? चारधाम यात्रा के शुभारंभ के लिए अक्षय तृतीया का दिन विशेष माना जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहते हैं. ‘अक्षय’ का अर्थ है जिसका कभी क्षय (नाश) न हो. शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किया गया दान, जप और पुण्य कर्म अनंत फलदायी होता है. इसी दिन से सतयुग और त्रेतायुग का आरंभ माना जाता है. बद्रीनाथ धाम के कपाट खोलने की प्रक्रिया और गंगोत्री-यमुनोत्री के कपाट खोलने के लिए इस दिन को सबसे शुभ माना जाता है क्योंकि यह दिन नई शुरुआत और समृद्धि का प्रतीक है. बीते साल की चुनौतियों से सबक वर्ष 2025 की यात्रा कई विपरीत परिस्थितियों के कारण प्रभावित रही थी. सीमा पर तनाव और उसके बाद धराली व थराली में आई प्राकृतिक आपदाओं ने श्रद्धालुओं की राह रोकी थी. कई बार प्रशासन को सुरक्षा कारणों से यात्रा रोकनी पड़ी थी. इन अनुभवों को देखते हुए, इस बार प्रशासनिक मशीनरी पहले से ही ‘अलर्ट मोड’ पर है. प्रशासनिक तैयारियां तेज गढ़वाल कमिश्नर विनय शंकर पांडेय ने ऋषिकेश में यात्रा की प्रारंभिक तैयारियों की समीक्षा पूरी कर ली है. सड़कों की मरम्मत, पेयजल व्यवस्था और यात्रियों के पंजीकरण को लेकर खाका तैयार किया जा रहा है. जल्द ही मुख्य सचिव स्तर पर अंतिम समीक्षा बैठक की जाएगी ताकि यात्रियों को किसी भी तरह की अव्यवस्था का सामना न करना पड़े.  

माता-वध का कठिन आदेश: किस परिस्थिति में परशुराम ने उठाया था यह कदम और क्या थे तीन वरदान

जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु के दस अवतार हैं. इन अवतारों में से ही एक है भगवान परशुराम. भगवान परशुराम विष्णु जी के छठवें अवतार हैं. माना जाता है कि भगवान परशुराम आज भी धरती पर वास कर रहे हैं. परशुराम भगवान का नाम राम था, लेकिन जब भगवान शिव ने उनको एक दिव्य फरसा दिया तो उनका नाम परशुराम पड़ गया. भगवान परशुराम के पिता का नाम महर्षि जमदग्नि और उनकी माता का नाम रेणुका था. श्री हरुि विष्णु ने माता रेणुका के गर्भ से शुक्र की आंशिक उर्जा से परशुराम के रूप में जन्म लिया था. उनका कुल ब्राह्मण था, लेकिन वो स्वभाव और कर्म से क्षत्रिय के रूप में जाने जाते हैं. परशुराम जी को बहुत बड़े पितृ भक्त के रूप में भी जाना जाता है. उन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी मां का सिर काट दिया था. फिर उन्होंने पिता से तीन वरदान मांगे थे. आइए इस कथा के बारे में विस्तार से जानते हैं. पतिव्रता नारी थीं माता रेणुका एक कथा के अनुसार, रेणुका माता का पतिव्रत धर्म बहुत ऊंचा था. रेणुका माता कभी भी पके हुए मिट्टी के घड़े में पानी नहीं लाती थीं, बल्कि वो अपने पतिव्रत धर्म से कच्ची मिट्टी के घड़े में ही मेंं पानी लाया करती थीं. घड़े से एक बूंद भी पानी नहीं गिरता था. एक दिन वो आश्रम से नदी में पानी लेने गईं. इस दौरान जल भरते समय उनकी नजर चित्रांगद नाम के एक गंधर्व पर पड़ी, जो अपनी अप्सराओं के साथ विलास में डुबा हुआ था. ये सब देकखर माता रेणुका का मन एक छण के लिए मचल गया. फिर उसी समय उनका पतिव्रत धर्म नष्ट या कहें कि खंडित हो गया. इसके बाद जिस कच्ची मिट्टी के घड़े वो जल लेकर जाया करती थीं, उसमें पानी रुका ही नहीं. ये देखकर माता रोने लगीं और आश्रम वापस लौट आईं. इसके बाद महर्षि जमदग्नि आए और उन्होंने अपने तप के प्रभाव से सब कुछ जान लिया. महर्षि जमदग्नि सबकुछ जानकर बहुत क्रोधित हुए. महर्षि जमदग्नि ने बेटों को दिया श्राप महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पांच बेटे थे. उन्होंने सबको बुलाया. सबसे पहले उन्होंने अपने सबसे बड़े बेटे को आदेश दिया कि अपनी मां का सिर काट दो. बेटे ने कहा कि आपकी आज्ञा हो तो मैं अपने प्राण दे सकता हूं, लेकिन मां के प्राण नहीं ले सकता. फिर उन्होंने क्रोध में बेटे को विवेकहीन हो जाने का श्राप दे दिया. इसी तरह तीनों बेटों ने मना कर दिया और सभी को महर्षि जमदग्नि ने विवेकहीन हो जाने का श्राप दे दिया. परशुराम जी ने काटा मां सिर और मांगे वरदान अंत में उन्होंने परशुराम जी को बुलाया और बाकी सब की तरह उन्हें भी मां का सिर काट देने के लिए कहा. परशुराम जी ने बिना एक पल विचार किए पिता की आज्ञा का पालन करते हुए माता रेणुका का सिर काट दिया. ये देखकर महर्षि जमदग्नि बहुत प्रसन्न हुए और बेटे से वरदान मांगने के लिए कहा. तब परशुराम जी ने तीन वरदान मांगे. परशुराम जी ने पहले वरदान के रूप में माता रेणुका का जीवन मांगा. दूसरे वरदान के रूप में परशुराम ने ये मांगा की मां को कभी याद न रहे कि मैंने उनका सिर काट दिया था. तीसरे और अंतिम वरादन के रूप में उन्होंने पिता से अपने भाइयों की चेतना मांगी. महर्षि जमदग्नि ने तीनों वरदान अपने पुत्र को दे दिए. एक कथा ये भी है कि माता रेणुका को सब कुछ याद था. उन्होंने एक दिन अपने पुत्र परशुराम को बुलाकर कहा था कि जिस तरह तुमने मुझे कष्ट दिया, उसी प्रकार एक दिन तुमको भी कष्ट होगा. कहा जाता है कि रामायण काल में माता रेणुका कैकेयी के रूप में आई थीं. उन्होंने विष्णु जी के एक अन्य अवतार भगवान राम के लिए वनवास मांगा था.

वास्तु शास्त्र की चेतावनी: इस दिशा में बैठकर भोजन करने से बढ़ सकती हैं परेशानियां

अन्न को हिंदू धर्म में 'ब्रह्म' माना गया है और भोजन करने की प्रक्रिया को एक 'यज्ञ' के समान पवित्र माना गया है। अक्सर हम इस बात पर तो ध्यान देते हैं कि हम क्या खा रहे हैं, लेकिन हम 'किधर' मुंह करके खा रहे हैं, इसे नजरअंदाज कर देते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार, गलत दिशा में बैठकर किया गया भोजन न केवल बीमारियों को बुलावा देता है, बल्कि घर की सुख-शांति भी छीन सकता है। यदि आप भी बार-बार बीमार पड़ते हैं या घर में बरकत नहीं रहती, तो एक बार अपने भोजन करने की दिशा जरूर बदलें। आइए जानते हैं वास्तु के अनुसार भोजन करने की सही और गलत दिशाएं। 1. पूर्व दिशा वास्तु शास्त्र में पूर्व दिशा को देवताओं की दिशा माना गया है। यदि आप पूर्व दिशा की ओर मुख करके भोजन करते हैं, तो इससे शरीर को सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। यह दिशा मानसिक तनाव को दूर करती है और लंबी आयु प्रदान करती है। बुजुर्गों और बीमार व्यक्तियों के लिए इस दिशा में बैठकर खाना सबसे उत्तम माना गया है। 2. उत्तर दिशा उत्तर दिशा को कुबेर और मां लक्ष्मी की दिशा माना जाता है। इस दिशा की ओर मुख करके भोजन करने से शरीर निरोगी और स्वस्थ रहता है। जो लोग करियर में सफलता चाहते हैं या धन प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, उन्हें उत्तर दिशा की ओर मुख करके भोजन करना चाहिए। विद्यार्थियों के लिए भी यह दिशा श्रेष्ठ है। 3. पश्चिम दिशा पश्चिम दिशा की ओर मुख करके भोजन करना वास्तु में मिला-जुला परिणाम देता है, लेकिन अक्सर इसे पाचन के लिए ठीक नहीं माना जाता। इस दिशा में बैठकर खाना खाने से पाचन तंत्र (Digestion) खराब हो सकता है और व्यक्ति के मन में भौतिक इच्छाएं बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं, जो मानसिक अशांति का कारण बनती हैं। 4. दक्षिण दिशा वास्तु के अनुसार, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके भोजन करना सबसे हानिकारक माना गया है। इस दिशा को यम की दिशा माना जाता है। दक्षिण दिशा में बैठकर खाना खाने से पेट संबंधी गंभीर रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। साथ ही, इससे मान-सम्मान में कमी और आर्थिक तंगी का सामना भी करना पड़ सकता है।

स्पोर्ट्स की दुनिया की बड़ी रात: मैड्रिड में 20 अप्रैल को लॉरियस अवार्ड्स

मैड्रिड मैड्रिड लगातार तीसरे वर्ष ‘लॉरियस वर्ल्ड स्पोर्ट्स अवार्ड्स’ की मेजबानी करेगा। आयोजकों ने सोमवार को यह घोषणा की। पिछले साल की तरह यह पुरस्कार समारोह 20 अप्रैल को सिबेल्स पैलेस में आयोजित किया जाएगा। आयोजकों ने बयान में कहा, ‘‘मैड्रिड ने 2024 में पहली बार लॉरियस पुरस्कारों की मेजबानी की थी और उसके बाद शहर को ‘लॉरियस स्पोर्ट फॉर गुड’ से बहुत फायदा हुआ।’’ बयान में कहा गया है, ‘‘2026 में होने वाले पुरस्कार समारोह में एक बार फिर खेलों से जुड़े दिग्गजों के साथ मनोरंजन, संस्कृति और फैशन जगत की कुछ बड़ी हस्तियां भी इसमें शामिल होंगी। सात प्रमुख श्रेणियों में से प्रत्येक में विजेता रहने वाले को प्रतिष्ठित लॉरियस प्रतिमा प्रदान की जाएगी।’’ मैड्रिड समुदाय की प्रमुख इसाबेल डियाज़ आयुसो ने कहा कि वह अपने शहर में खेलों से परिपूर्ण वर्ष की प्रतीक्षा कर रही हैं। उन्होंने कहा, ‘‘मैड्रिड खेलों का हमेशा स्वागत करता रहा है क्योंकि यह उन साझा मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है जिससे हम सभी को लाभ होता है।’’ मैड्रिड के मेयर जोस लुइस मार्टिनेज अल्मेडा ने कहा, ‘‘मैड्रिड को गर्व है कि ‘लॉरियस वर्ल्ड स्पोर्ट्स अवार्ड्स’ एक बार फिर यहां आयोजित किए जा रहे हैं। हम एक ऐसा शहर हैं जो खेल और खिलाड़ियों से प्यार करता है।’’