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ग्वालियर कृषि यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने हवा में उगाया आलू, 1KG बीज से 400 किलो आलू की खेती

ग्वालियर  राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने 2 साल पहले रिसर्च के लिए खेती की एक नई तकनीक शुरू की थी. ये ऐरोपोनिक तकनीक थी, जिसके जरिए वैज्ञानिकों ने हवा में आलू उगाने का प्रयास शुरू किया था. ये प्रयास अब रंग ला चुका है और दो साल की शोध के बाद कृषि वैज्ञानिकों ने आलू के ऐसे बीज तैयार कर लिए हैं जो ना सिर्फ रोग रहित हैं बल्कि इसका प्रोडक्शन 50 गुना तक है. इनसे पैदा होने वाली आलू की फसल 400 गुना तक मिलती है. ग्वालियर कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का कमाल देश में कृषि क्षेत्र रिसर्च के बलबूते नए आयाम स्थापित करने में जुटा हुआ है. किसान की लागत कैसे बढ़े और कैसे नवाचार का फायदा किसानों को मिले, इस ओर ग्वालियर का राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय भी अपना योगदान दे रहा है. कृषि यूनिवर्सिटी ने अपनी ऐरोपोनिक्स यूनिट में पानी के जरिए हवा में आलू उगाये जा रहे हैं. जो जल्द ही किसानों की किस्मत बदलने को तैयार हो जायेंगे. असल में ये आलू ऐरोपोनिक तकनीक का इस्तेमाल कर उगाए गए हैं. या कहें आलू के बीज तैयार किये गए हैं. कृषि वैज्ञानिकों की भाषा में इस यूनिट में आलू के 20 वेराइटी के मिनी ट्यूबर तैयार किए जा रहे हैं, जो प्रोसेस होने के बाद किसानों के खेतों में फसल बनकर फायदा देंगे. टिशू कल्चर तकनीक से लैब में तैयार होता है पौधा एरोपोनिक प्रोजेक्ट की इंचार्ज डॉ. सुषमा तिवारी ने बातचीत में बताया कि, ''एयरोपौनिक तकनीक में पौधे टिशू कल्चर के माध्यम से लैब में तैयार किए जाते हैं, जब ये पौधे एरोपोनिक यूनिट में ट्रांसप्लांट करने होते हैं तब एक महीने पहले इन पौधों की हार्डनिंग की जाती है. इसके बाद इन्हें ट्रांसप्लांट किया जाता है. पूरे मध्य प्रदेश में ये पहल राजमाता कृषि विश्व विद्यालय द्वारा की गई है.'' रोग फ्री होता है एरोपोनिक तकनीक से उगा बीज इन पौधों में न्यूट्रिएंट देने के लिए फोगिंग सिस्टम का उपयोग किया जाता है. ऐसे में जो आलू के बीज यानी मिनी ट्यूबर बनते हैं वे उच्च गुणवत्ता वाले होते हैं और रोग मुक्त होते हैं. जिसका मतलब है खेत में उगने वाले आलू में रोग या वायरस का असर फसल पर पड़ता है, लेकिन इन आलुओं में ऐसी कोई बीमारी नहीं होती. एरोपोनिक में तैयार पौधे बीमारी फ्री होते हैं. ये हेल्दी पौधे होते हैं जिसकी वजह बीज अच्छी क्वालिटी का बनता है और प्रोडक्शन भी कई गुना ज़्यादा होता है.''  उद्देश्य के अनुसार मिलेगा आलू, किसानों के पास होंगे विकल्प मध्य प्रदेश की इस शोध यूनिट का बड़ा फायदा किसानों को भी मिलने वाला है, क्योंकि जब अच्छी गुणवत्ता का बीज किसानों को मिलेगा, जब बीज में कोई बीमारी नहीं होगी तो उनका प्रोडक्शन भी अच्छा होगा. ऊपर से अभी जब किसान आलू के बीज लेते हैं तो उनके पास ज़्यादा विकल्प नहीं होते हैं. लेकिन विश्वविद्यालय 20 प्रजातियों के बीज तैयार कर रहा है, जिसमें किसानों के उद्देश्य के अनुसार वे आलू उगा सकेंगे. उदाहरण के लिए फ्रेंच फ्राई के लिए फ़्राइओम है, चिप्स के लिए चिपसोना आलू है. इस तरह उनके पास जरूरत के हिसाब से विकल्प भी होंगे.  ऐरोपोनिक से बीज की कितनी उत्पादकता? डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया कि, ''एरोपोनिक तकनीक से उगाए गए बीज का वजन बेहद कम होता है. ये मिनी ट्यूबर 2-3 ग्राम वजन का होता है. दो साल पहले जब इसकी शुरुआत के समय डेमॉन्स्ट्रेशन यूनिट लगायी थी तब एक किलो बीज पैदा किया था. जिससे 400 किलो नार्मल आलू मिला था. लेकिन ये किसानों को जी-2 प्रोसेस के बाद ही दिए जाते हैं. जिससे वे इन्हें फील्ड में उगा सके. दो साल पहले जो प्रोसेस शुरू हुआ था उसका बीज अब तैयार हो चुका है और जल्द ही इनमें से कुछ बीज किसानों को जल्द मिलेंगे.''  किसान से पहले 3 चरणों से गुजरता है बीज एरोपोनिक तकनीक में बीज तीन चरणों में तैयार होता है. सबसे पहले चरण को जी-जीरो कहा जाता है. जिसमे कल्चर प्रोसेस से बीज को बोकर लैब में तैयार किया जाता है. इसके बाद ऐरोपोनिक यूनिट में मिनी ट्यूबर उगाए जाते हैं. दूसरा चरण जी-1 कहलाता है जिसमें ये मिनी ट्यूबर नेट हाउस यानी खास ग्रीन हाउस में लगाये जाते हैं. यह प्रोसेस पूरा होने के बाद जी-2 चरण शुरू होता है. जिसमें विश्वविद्यालय द्वारा तैयार फील्ड में इन बीजों की बोवनी कर इनसे सॉइल बेस्ड बीज तैयार किए जाते हैं, जो किसानों को उपलब्ध कराने के लिए तैयार होते हैं.  2 साल बाद बड़े स्तर पर तैयार होंगे बीज कृषि विज्ञानी सुषमा तिवारी कहती हैं कि, ''हम किसानों को बीज उपलब्ध कराने वाले हैं क्योंकि पुरानी खेप तैयार है हालांकि ये सीमित हैं, लेकिन अब से दो साल बाद हमारे पास बहुतायत में अलग अलग वेराइटी के बीज उपलब्ध होंगे और ये किसानों के लिए तैयार होंगे.'' पोषक तत्वों के लिए अलग से होती व्यवस्था पोषक तत्वों की कमी इन बीजों में ना हो इसके लिए एरोपोनिक यूनिट में दो टैंक बनाये गए हैं. जिनमें माइक्रो न्यूट्रिएंट्स घोले जाते हैं, इसका इलेक्ट्रिक कंडक्टिविटी मेंटेन किया जाता है, जितना मात्र में इसे दिया जाना है. टैंक में बड़े बड़े पाइप लगाए गए हैं. साथ ही फोगिंग सिस्टम लगाया गया है. इनके जरिए कंट्रोल पैनल में इसकी प्रोग्रामोंग सेट की जाती है, इसमें जरूरत के अनुसार, तीस सेकंड तक फोग चलाया जाता है और इसी के जरिए पौधों को पोषक तत्व मिलते हैं. किसानों के लिए व्यवसायिक विकल्प बन सकती है एरोपोनिक यूनिट किसानों के लिए भी एरोपोनिक तकनीक फायदे का सौदा है क्योंकि यह यूनिट महज 70 से 75 लाख रुपये में तैयार हो जाती है. ये उनके लिए व्यावसायिक रास्ते भी खोलता है क्योंकि किसान अपनी यूनिट तैयार कर ख़ुद उच्च गुणवत्ता के बीज तैयार कर सकते है और फिर उन बीज को बेच सकते हैं. एक बार यूनिट लगने के बाद इसे 5 से 7 साल तक उपयोग में लिया जा सकता है. इसमें छोटी मोटी रिपेयर मेंटेनेस होती है लेकिन फायदा भी बड़ा होता है. पंजाब हिमाचल के कुछ किसान इसका उपयोग कर भी रहे हैं.

मध्य प्रदेश में बकरी पालन पर 50% सब्सिडी, सरकार की स्कीम से किसानों के लिए बन रहा है सुपरहिट बिजनेस

छिंदवाड़ा  किसानों के लिए एक ऐसी योजना आई है जो 50% सब्सिडी के साथ मालामाल कर सकती है. इसके लिए आधी रकम किसानों को लगाना होता है तो आधा सरकार खर्च उठाती है. कुछ ऐसा ही किया है बांका नागनपुर के किसान नवीन रघुवंशी ने. जिन्होंने एक करोड़ रुपए का बकरी फॉर्म खोलकर खेती को फायदा का सौदा बनाया है. राष्ट्रीय पशुधन मिशन से हो जाएंगे मालामाल छिंदवाड़ा के बांका नागनपुर के किसान नवीन रघुवंशी ने बताया कि, ''पशुपालन विभाग की राष्ट्रीय पशुधन मिशन एनएलएम योजना का लाभ लेकर बकरी पालन शुरू किया है और फायदे का व्यापार साबित किया है. सीमित संसाधनों से शुरू हुई उनकी यह पहल आज आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक प्रबंधन के कारण क्षेत्र में एक मॉडल बकरी फार्म के रूप में पहचान बना चुकी है.'' उन्होंने बताया कि, ''एनएलएम योजना के अंतर्गत स्वीकृत उनके इस बकरी फार्म में सिरोही नस्ल की कुल 175 बकरियाँ, बकरे एवं उनके बच्चे उपलब्ध हैं. फार्म को मॉडल स्वरूप में विकसित किया गया है, जिसमें बीमार बकरियों के लिए अलग क्वारंटाइन शेड, बच्चों के लिए अलग कमरे तथा बकरियों के बैठने के लिए 4 फीट ऊँचाई पर प्लाई प्लेटफॉर्म बनाया गया है. इसी प्लेटफॉर्म के नीचे कड़कनाथ मुर्गी का पालन भी किया जा रहा है, जिससे एक्स्ट्रा इन्कम हो रही है.'' 1 करोड़ की लागत में आधी सब्सिडी उपसंचालक कृषि जितेंद्र सिंह ने बताया कि, ''बकरी फार्म की कुल लागत लगभग 1 करोड़ रुपये है, जिसमें भारत सरकार द्वारा 50 लाख रुपये की अनुदान राशि स्वीकृत की गई है. योजना के अंतर्गत पहली किस्त के रूप में 25 लाख रुपये की राशि नवीन रघुवंशी को प्रदान की जा चुकी है. इस आर्थिक सहयोग से फार्म को आधुनिक संसाधनों से सुसज्जित किया गया है. पोषण, ब्रीडिंग और तकनीक पर विशेष ध्यान बकरियों के पोषण के लिए फार्म में तीन प्रकार की नेपियर घास का उत्पादन किया जा रहा है. दाना बनाने की मशीन एवं चैफ कटर जैसी सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं. ब्रीडिंग के उद्देश्य से उच्च गुणवत्ता के बकरे रखे गए हैं, जिनमें एक बकरे की कीमत करीब 2 लाख रुपये है. बेहतर पोषण और मैनेजमेंट के कारण बकरियों का स्वास्थ्य एवं उत्पादन अच्छा हो रहा है. खेती में डिजिटल टेक्निक का उपयोग देश-विदेश तक पहचान नवीन रघुवंशी के बेटे मंथन रघुवंशी बकरी पालन एवं उन्नत कृषि को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नई पहचान दे रहे हैं. वे यूट्यूब एवं इंस्टाग्राम के माध्यम से बकरी पालन, उन्नत कृषि, मक्का उत्पादन तथा कम उम्र में पशुओं का वजन बढ़ाने जैसे विषयों जानकारी के वीडियो भी शेयर कर रहे हैं. कुछ दिन पहले उप संचालक पशुपालन एवं डेयरी विभाग डॉ.एच.जी.एस. पक्षवार, एपीसी ग्रुप एवं एसडीएम चौरई प्रभात मिश्रा के साथ एनएलएम योजना के अंतर्गत संचालित इस बकरी फार्म के संचालन की व्यवस्थाएं देखने पहुंचे थे. निरीक्षण दल में उप संचालक कृषि एवं किसान कल्याण विभाग जितेन्द्र कुमार सिंह, उप संचालक उद्यानिकी विभाग एम.एल. उइके, कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. झाड़े, डॉ. अलवा तथा कृषि विज्ञान केंद्र देलाखारी के प्रमुख डॉ. आर.एल. राउत पहुंचे थे.

देश की खूबसूरत लाल सड़क पर संकट, जानवरों की सुरक्षा में चोरों का हस्तक्षेप, एलईडी साइन बोर्ड और फेंसिंग चोरी

जबलपुर  नेशनल हाईवे-12 वाइल्डलाइफ प्रोटक्शन के लिए की गई रेड कलर की टेबल टॉप रेड मार्किंग की वजह से चर्चा में है. देश के कई इलाकों से इस तरह के सड़क बनाने के लिए जबलपुर नेशनल हाईवे अथॉरिटी के पास इंक्वारी भी आई है. नेशनल हाईवे अथॉरिटी का कहना है कि, उनका यह प्रयोग सफल रहा है, लेकिन वे अब चोरों से परेशान हैं, क्योंकि चोर सड़क पर लगे एलईडी साइन बोर्ड चुरा रहे हैं. सड़क किनारे लगी लोहे की जाली को भी कई जगह चुरा लिया गया है. एक बार फिर चर्चाओं में लाल सड़क जबलपुर से भोपाल तक के लिए नेशनल हाईवे 12 बनाया गया है. यह सड़क लगभग 300 किलोमीटर लंबी है. इस हाईवे का लगभग 12 किलोमीटर का क्षेत्र नौरादेही टाइगर रिजर्व से होकर गुजरता है. इसी में से लगभग 2 किलोमीटर इलाके में टेबल टॉप रेड मार्किंग की गई है, जिसकी वजह से यह सड़क चर्चा में बनी हुई है. इस 2 किलोमीटर इलाके में लाल कलर के बड़े-बड़े निशाना बनाए गए हैं. यह लगभग 2 मिलीमीटर मोटे हैं. देश के कई इलाकों से आई इंक्वायरी नेशनल हाईवे अथॉरिटी के अधिकारी अमृतलाल साहू का कहना है, "हमारा यह प्रयोग पूरे भारत में सराहा जा रहा है. इस सड़क के बनने के बाद देश के कई इलाकों से इसी तरह की सड़क बनाने के लिए जानकारियां मांगी गईं हैं. चेन्नई और पंजाब के सड़क निर्माण से जुड़े अधिकारियों ने इस निर्माण कार्य की जानकारी ली है. वाइल्डलाइफ प्रोटक्शन के लिए पहला प्रयोग अमृतलाल साहू ने बताया, "यह आइडिया पूरी दुनिया में नया है. हालांकि, सड़कों पर लाल कलर कई जगह पर लगाया जाता है. दुबई में कुछ सड़कें ऐसी हैं, जहां वाहनों की गति धीमी करने के लिए पूरी सड़क को ही लाल कर दिया जाता है. हालांकि, यह लंबाई मात्र 100 मीटर तक होती है. इसी तरह साइकिल ट्रैक बनाने के लिए भी सड़क लाल की जाती है, लेकिन वन्यजीवों के संरक्षण के लिए सड़क पर टेबल टॉप रेड मार्किंग पहली बार की गई." बीते 1 साल में एक भी जानवर की नहीं हुई मौत अमृतलाल साहू ने बताया कि "हमारा यह प्रयोग सफल रहा है. सड़क पर केवल लाल कलर के निशान ही नहीं बनाए गए हैं, बल्कि इस सड़क में जंगल के पूरे इलाके में तार की फेंसिंग भी की गई है. 25 जगह पर जानवरों को सड़क पार करने के लिए अंडरपास भी बनाए गए हैं. जब इस सड़क पर यह सभी सुविधाएं नहीं थी, तो 2 साल में लगभग 300 जानवरों की एक्सीडेंट से मौत हुई थी, लेकिन इस कार्य के पूरे हो जाने के बाद बीते 1 साल में कोई भी जानवर सड़क दुर्घटना से इस क्षेत्र में नहीं मरा है." चोरों से परेशान नेशनल हाईवे अथॉरिटी नेशनल हाईवे अथॉरिटी ने इस सड़क को अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से तैयार किया था, इसलिए सड़क पर कई जगह पर एलईडी साइन बोर्ड लगाए गए थे. टेबल टॉप रेड मार्किंग पर लगे उपकरणों की वजह से जानवरों की मौतों में बहुत गिरावट आई है, लेकिन अब ये उपकरण चोरों के निशाने पर हैं. अमृतलाल साहू ने बताया कि "वे चोरों से बहुत परेशान हैं. हाईवे से कई एलईडी साइन बोर्ड चोरी कर लिए गए, कुछ जगह पर वायर फेसिंग भी चोरी हो गई. इस सड़क पर हमने रखवाली के लिए पेट्रोलिंग गाड़ी रखी है, लेकिन इतनी लंबी सड़क की पूरे समय सुरक्षा नहीं की जा सकती. नेशनल हाईवे अथॉरिटी ने चोरों के खिलाफ थाने में शिकायत भी करवाई है."

इंदौर की आंकाक्षा ने किलिमंजारो चोटी पर चढ़कर साड़ी में लहराया तिरंगा, 19,000 फीट की ऊंचाई पर किया कारनामा

इंदौर  इंदौर की पर्वतारोही आकांक्षा शर्मा कुटुम्बले ने 19341 फीट की ऊंचाई पर स्थित अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी माउंट किलिमंजारो पर सफलतापूर्वक चढ़ाई कर उपलब्धि हासिल की है। इससे पहले उन्होंने पिछले वर्ष सितंबर माह में यूरोप की सबसे ऊंची चोटी माउंट एलब्रुस पर भी चढ़ाई की थी। ये दोनों चोटियां विश्व की प्रतिष्ठित सेवन समिट्स में शामिल हैं।  पेशे से सिविल इंजीनियर आकांक्षा दोनों शिखरों पर चढ़ाई करने वाली इंदौर की संभवतः पहली पर्वतारोही हैं। साथ ही वे ऐसा करने वाली मध्य भारत की चुनिंदा पर्वतारोहियों में भी शामिल हो गई हैं। माउंट किलिमंजारो पर्वत की ऊंचाई बेस से शिखर तक की ऊंचाई के लिहाज से  दुनिया की किसी भी अन्य पर्वत चोटी से अधिक है। भूमध्य रेखा के समीप स्थित होने के कारण इसकी भौगोलिक परिस्थितियां अन्य पर्वत श्रृंखलाओं से अलग हैं, जिसके चलते शिखर पर ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है।आकांक्षा को भी चढ़ाई के दौरान ऑक्सीजन की कमी का सामना करना पड़ा। उन्हें सांस लेने में कठिनाई हो रही थी और एक-एक कदम बढ़ाना भी चुनौतीपूर्ण था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और विषम परिस्थितियों में भी चढ़ाई पूरी की। चढ़ाई के दौरान तापमान 12 डिग्री था और हवा 20 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से चल रही थी।   चोटी पर पहुंचने के बाद आकांक्षा ने कश्मीरी कानी साड़ी पहनकर अपनी सांस्कृतिक पहचान को दर्शाया। उन्होंने बताया कि यह परिधान उन्हें अपने भारतीय होने का एहसास कराता है और कश्मीर से उनका विशेष लगाव है। वे अक्सर कश्मीर जाती रहती हैं।आकांक्षा ने कहा कि पर्वतारोहण के लिए उनकी कर्मभूमि कश्मीर रही है। उन्होंने माउंटेनियरिंग के बेसिक और एडवांस कोर्स वहीं से किए हैं और कश्मीर की कई चोटियों पर अभ्यास भी किया है। इसी कारण उन्होंने निर्णय लिया कि किलिमंजारो की चोटी पर पहुंचने के बाद वे कश्मीर से लाई गई कानी साड़ी पहनेंगी। उन्होंने यह साड़ी टी-शर्ट और लोअर के ऊपर पहनी, जिसे उन्होंने एक अत्यंत सुखद अनुभव बताया।   यह अभियान आकांक्षा ने सफारी टच तंजानिया कंपनी के साथ पूरा किया। इस अभियान में वे अपने समूह की एकमात्र पर्वतारोही थीं। विश्व के सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को सेवन समिट्स कहा जाता है। पर्वतारोहण की दुनिया में इन सभी चोटियों पर चढ़ाई करना एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है। इसमें यूरोप की माउंट एलब्रुस और अफ्रीका की माउंट किलिमंजारो भी शामिल हैं।  आकांक्षा ने बताया कि माउंट किलिमंजारो की तैयारी के लिए उन्होंने नियमित रूप से रनिंग की, जिम में  ट्रेनिंग की और सीढ़ियों पर चढ़ने-उतरने का अभ्यास किया। वे पांचवीं मंजिल पर रहती हैं और बिल्डिंग के बाहर की सीढ़ियों पर अभ्यास करने से उन्हें विशेष लाभ मिला। इसके अलावा उन्होंने प्राणायाम का अभ्यास भी किया, जिससे फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने में मदद मिली।

मुख्यमंत्री शहडोल पहुंचेंगे आज, दौरे की तैयारियों के लिए कमिश्नर और कलेक्टर ने लिया जायजा

शहडोल प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का आज 8 फरवरी को शहडोल जिले के धनपुरी और गधिया क्षेत्र का दौरा प्रस्तावित है। मुख्यमंत्री के आगमन को लेकर जिला प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद नजर आ रहा है और तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इसी कड़ी में संभागायुक्त शहडोल सुरभि गुप्ता ने लालपुर हवाई पट्टी का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। निरीक्षण के दौरान बताया गया कि मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर लालपुर हवाई पट्टी पर उतरेगा, जहां से वे सड़क मार्ग से धनपुरी के लिए रवाना होंगे। संभागायुक्त ने हवाई पट्टी पर सुरक्षा, साफ-सफाई, यातायात प्रबंधन और आपात व्यवस्था को लेकर अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के दौरे में किसी भी प्रकार की अव्यवस्था नहीं होनी चाहिए और सभी विभाग आपसी समन्वय के साथ कार्य करें। इसी क्रम में कलेक्टर डॉ. केदार सिंह ने जयसिंहनगर के गधिया पहुंचकर मुख्यमंत्री के प्रस्तावित कार्यक्रम स्थल का निरीक्षण किया। कलेक्टर ने मंच, बैठक व्यवस्था, बिजली, पेयजल, स्वच्छता और सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेते हुए संबंधित अधिकारियों को समय रहते सभी तैयारियां पूरी करने के निर्देश दिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री के कार्यक्रम को सफल बनाने में कोई कोताही नहीं बरती जाए। जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पहले धनपुरी पहुंचेंगे, जहां विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होने के बाद वे गधिया के लिए रवाना होंगे। मुख्यमंत्री के दौरे को लेकर स्थानीय प्रशासन के साथ-साथ पुलिस विभाग भी सतर्क है और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है। निरीक्षण के दौरान जिला पंचायत सीईओ शिवम प्रजापति, एसडीएम सोहागपुर अमृता गर्ग सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे। मुख्यमंत्री के दौरे को लेकर जिले में प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है और सभी विभाग निर्धारित समय सीमा में तैयारियां पूरी करने में जुटे हुए हैं।   

झारखंड में गठबंधन की योजना नाकाम, निकाय चुनाव में बागियों का असर

रांची   झारखंड में नगर निकाय चुनाव भले ही औपचारिक रूप से पार्टी आधार पर नहीं हो रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है. भाजपा, झामुमो और कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक पार्टियां नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतों में अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने के लिए खुलकर मैदान में हैं. समर्थित उम्मीदवारों के नाम पर पार्टियों के भीतर ही सियासी गोटी बिछाई जा रही है. इस बार के निकाय चुनाव में पार्टियों के भीतर बगावत ने गठबंधन और रणनीति दोनों को कमजोर कर दिया है. बागियों ने बिगाड़ा सियासी गणित चुनावी फसल काटने की होड़ में कई जगहों पर पार्टी के ही नेता या उनके परिवार के सदस्य अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ मैदान में उतर गए हैं. इससे पार्टी के प्रति निष्ठा पर सवाल खड़े हो गए हैं. कहीं पति पार्टी लाइन पर खड़ा है, तो पत्नी बागी बनकर उसी पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव लड़ रही है. इस स्थिति ने पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें कई गुना बढ़ा दी हैं. राज्यभर में गहमा-गहमी, नामांकन तक चला मान-मनौव्वल रांची, धनबाद, देवघर, मेदिनीनगर समेत कई नगर निकायों में नामांकन के आखिरी दिन तक गहमा-गहमी बनी रही. 4 फरवरी को नामांकन की अंतिम तारीख और 6 फरवरी को नाम वापस लेने की अंतिम तिथि तक रूठने-मनाने का दौर चलता रहा. हालांकि कई जगहों पर पार्टी नेतृत्व बागियों को मनाने में नाकाम रहा. 48 निकायों में सजी चुनावी बिसात झारखंड में इस बार नौ नगर निगम, 20 नगर परिषद और 19 नगर पंचायतों में चुनावी मुकाबला है. इतने बड़े स्तर पर हो रहे चुनाव में सत्तारूढ़ झामुमो, कांग्रेस और राजद के बीच कोई स्पष्ट गठबंधन फॉर्मूला तय नहीं हो सका है. इसका सीधा फायदा बागी उम्मीदवारों को मिलता दिख रहा है. धनबाद में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती धनबाद नगर निगम चुनाव भाजपा के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण बन गया है. पार्टी ने मेयर पद के लिए संजीव कुमार को समर्थन दिया है, लेकिन भाजपा के कई नेता बागी होकर मैदान में हैं. झरिया के पूर्व विधायक संजीव सिंह भी चुनाव लड़ रहे हैं. इसके अलावा मुकेश पांडेय और भृगुनाथ भगत ने भी नामांकन वापस नहीं लिया. भाजपा किसी भी बागी को मनाने में सफल नहीं हो सकी. वहीं झामुमो की प्रत्याशी डॉ नीलम मिश्रा ने नामांकन वापस ले लिया है. अब पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल झामुमो समर्थित उम्मीदवार होंगे. देवघर में भाजपा और झामुमो दोनों में अंदरूनी कलह देवघर नगर निगम में भाजपा ने रीता चौरसिया को समर्थित प्रत्याशी बनाया है. पार्टी ने यहां काफी मंथन किया, लेकिन बाबा बनलासे और उमाशंकर सिंह बागी बनकर मैदान में डटे हुए हैं. इससे भाजपा का वोट बैंक बंटने की आशंका है. उधर झामुमो में भी फूट नजर आ रही है. रवि राउत पार्टी समर्थित उम्मीदवार हैं, जबकि झामुमो नेता सूरज झा भी चुनावी मैदान में उतर गए हैं. कांग्रेस ने यहां किसी भी उम्मीदवार को समर्थन नहीं दिया है. कांग्रेस नगर अध्यक्ष रवि केसरी भी मेयर पद के लिए किस्मत आजमा रहे हैं. मेदिनीनगर में बहुकोणीय मुकाबला मेदिनीनगर में चुनावी घमासान अपने चरम पर है. यहां झामुमो ने पूर्वम सिंह, भाजपा ने अरुणा शंकर, कांग्रेस ने नम्रता त्रिपाठी, जेएलकेएम ने आइसा सिंह और लोजपा ने ज्योति गुप्ता को समर्थन दिया है. भाजपा के भीतर भी असंतोष साफ दिख रहा है और पार्टी को कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. रांची में त्रिकोणीय मुकाबला राजधानी रांची में नगर निगम चुनाव सबसे ज्यादा रोचक हो गया है. कांग्रेस और झामुमो के बीच सहमति नहीं बन पाई. कांग्रेस ने पूर्व मेयर रमा खलखो को उम्मीदवार बनाया है, जबकि झामुमो ने सुजित विजय आनंद कजूर को समर्थन दिया है. भाजपा ने रोशनी खलखो को पार्टी समर्थित उम्मीदवार घोषित किया है. भाजपा ने रोशनी खलखो के खिलाफ नामांकन करने वाले संजय टोपो, राजेंद्र मुंडा और सुनील कच्छप को मना लिया, लेकिन सुजाता कच्छप नहीं मानीं. झामुमो ने भी पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में करीना तिर्की, बिरू तिर्की और रामशरण तिर्की जैसे नेताओं को मनाने में सफलता पाई है. बागी बदल सकते हैं चुनावी समीकरण निकाय चुनाव में बागियों की मजबूत मौजूदगी ने यह साफ कर दिया है कि झारखंड में गठबंधन और पार्टी अनुशासन दोनों कमजोर पड़ते नजर आ रहे हैं. वोटों के बंटवारे से कहीं न कहीं अप्रत्याशित नतीजे सामने आ सकते हैं. यही वजह है कि इस बार के निकाय चुनाव को सभी दल बेहद अहम मान रहे हैं और अंतिम समय तक रणनीति बदलने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं.

बांधवगढ़ की बाघिन का राजस्थान में रिश्ता तय, हेलीकॉप्टर से विदाई और मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व में शिफ्ट

उमरिया  बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की बाघिन का रेस्क्यू सफल रहा. इस बाघिन को राजस्थान के मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व में शिफ्ट करने की योजना है. फिलहाल बाघिन को ऑब्जरवेशन में रखा गया है. राजस्थान सरकार ने केंद्र सरकार के सामने मध्य प्रदेश से 3 टाइगर की डिमांड रखी थी. राजस्थान को एक ऐसी बाघिन की तलाश है, जो मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व में कुनबा बढ़ा सके. एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर से राजस्थान जाएगी बाघिन बांधवगढ़ की बाघिन एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर से राजस्थान जाएगी. यहां से उसकी दुल्हन की तरह धूमधाम से विदाई होगी. इसकी तैयारी के लिए एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर का ट्रायल लैंडिंग भी हो चुका है. कुछ दिन पहले पेंच टाइगर रिजर्व से एक बाघिन को इसी तरह एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर से राजस्थान के मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व शिफ्ट किया गया था. रेस्क्यू के बाद बाघिन को रेडियो कॉलर पहनाया बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर अनुपम सहाय ने बताया "बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व प्रबंधन ने कक्ष क्रमांक RF-327, के दमना बीट के ताला परिक्षेत्र से एक बाघिन का रेस्क्यू किया है, जिसकी उम्र 3 से 4 वर्ष है. अब बाघिन के हर मूवमेंट पर नजर रहेगी. रेस्क्यू करने के बाद उसके स्वास्थ्य की जांच की गई है और रेडियो कॉलर पहनाया गया." बाघिन को अंडर ऑब्ज़र्वेशन रखने के लिए आगामी कुछ दिनों के लिए मगधी परिक्षेत्र के बहेरहा स्थित बाड़े में सुरक्षित रूप से रखा गया है. योजना के अनुसार सभी तरह की परमिशन मिलने के बाद बाघिन को राजस्थान भेजा जाएगा. मुकुंदरा टाइगर रिजर्व की शान बनेगी बाघिन बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से एक बाघिन को राजस्थान के मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व में भेजने की योजना है. इसकी तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है. इसी के तहत इस बाघिन का रेस्क्यू किया गया है. राजस्थान के मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व को एक एडल्ट बाघिन चाहिए, जो बाघों का कुनबा बढ़ा सके. ऐसी बाघिन की उम्र 3 से 5 साल तक के बीच होनीचाहिए, जो प्रजनन करने योग्य हो. इस बारे में राजस्थान सरकार ने भारत सरकार के माध्यम से परमिशन लेकर मध्य प्रदेश से 03 टाइगर और महाराष्ट्र से 02 टाइगर मांगे हैं. इसी कड़ी में पेंच टाइगर रिजर्व से राजस्थान जा चुकी है. अब बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से बाघिन ले जाने की तैयारी है. 

गाजा में इजरायल का घातक एयरस्ट्राइक, 3-मंजिला इमारत को किया निशाना, खौफनाक दृश्य कैमरे में कैद

गाजा सीजफायर लागू होने के बावजूद इजरायली सेना ने पूर्वी गाजा सिटी के जैतून इलाके में एक रिहायशी क्षेत्र को निशाना बनाते हुए एयरस्ट्राइक की. रिपोर्ट के मुताबिक हमला असकुला जंक्शन के पास स्थित तीन मंजिला इमारत पर किया गया. हमले के बाद इलाके में आग की लपटें और घना धुआं उठता देखा गया, जिससे स्थानीय लोगों में दहशत फैल गई. यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका प्रशासन ने जनवरी में घोषणा की थी कि युद्धविराम समझौते का दूसरा चरण शुरू हो चुका है. इस चरण में गाजा से इजरायली सेना की अतिरिक्त वापसी और पुनर्निर्माण कार्यों की शुरुआत शामिल है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि गाजा के पुनर्निर्माण पर करीब 70 अरब डॉलर का खर्च आ सकता है. अक्टूबर 2023 में शुरू हुई इजरायली सैन्य कार्रवाई एक साल से अधिक समय तक चली थी. इस अभियान में गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार करीब 72 हजार फिलिस्तीनी मारे गए और 1.71 लाख से अधिक घायल हुए. इसके अलावा गाजा के लगभग 90 प्रतिशत बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा या वह नष्ट हो गया.   युद्धविराम लागू होने के बाद भी हालात पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं. गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि इस अवधि में इजरायली कार्रवाइयों में 574 लोगों की मौत हुई और 1,518 अन्य घायल हुए हैं. इन आंकड़ों के सामने आने के बाद समझौते के पालन और क्षेत्र में स्थिरता को लेकर नए सवाल उठने लगे हैं.   फिलहाल क्षेत्र में तनाव बना हुआ है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर स्थिति पर टिकी है. आगे की घटनाओं और प्रतिक्रियाओं का इंतजार किया जा रहा है, जबकि युद्धविराम के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.

ASUS ने पेश किए नए लैपटॉप्स, AI फीचर्स और लंबी बैटरी लाइफ के साथ शानदार परफॉर्मेंस

नई दिल्ली ASUS ने अपने लेटेस्ट लैपटॉप की प्रीबुकिंग शुरू कर दी है. ये लैपटॉप्स कंपनी की Zenbook और Vivobook सीरीज का हिस्सा हैं, जो AMD Ryzen AI प्रोसेसर के साथ आते हैं. कंपनी के पोर्टफोलियो में कई लैपटॉप शामिल हैं, जिन्हें आप प्रीबुक कर सकते हैं. जल्द ही इनकी सेल भी शुरू होगी.  इन लैपटॉप्स की कीमत और फीचर्स का खुलास कंपनी ने कर दिया है. ब्रांड का कहना है कि इन प्रोडक्ट्स को AI असिस्ट प्रोडक्टिविटी, मल्टीटास्किंग, क्रिएटिव वर्कलोड और रोजमर्रा की कम्प्यूटिंग जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है. आइए जानते हैं इनकी खास बातें.  क्या हैं फीचर्स? ASUS Zenbook S16 में AMD Ryzen AI 9 465 प्रोसेसर दिया गया है. ये लैपटॉप Copilot+ PC कैपेबिलिटी और ASUS AI ऐप्लिकेशन्स के साथ आता है. इसका वजन 1.5 किलोग्राम है और ये लैपटॉप ऑल-मेटल चैसी के साथ आता है. इसमें 16-inch का OLED डिस्प्ले मिलेगा, जो 120Hz रिफ्रेश रेट सपोर्ट करता है. कंपनी की मानें तो डिवाइस 23 घंटे की बैटरी लाइफ के साथ आता है.  Zenbook 14 को कंपनी ने AMD Ryzen AI 5 430 प्रोसेसर के साथ लॉन्च किया है. इसमें 14-inch का FHD+ OLED टच स्क्रीन डिस्प्ले मिलता है. ब्रांड का कहना है कि ये लैपटॉप सिंगल चार्ज में 25 घंटे तक की बैटरी लाइफ ऑफर करता है.  इसके अलावा Vivobook S16 को कंपनी ने इंट्रोड्यूस किया है, जो AMD Ryzen AI 400 प्रोसेसर के साथ आता है. इसमें Copilot+ PC फीचर मिलता है. डिवाइस FHD+ OLED डिस्प्ले के साथ आता है. ये मशीन सिंगल चार्ज में 23 घंटे तक चल सकती है.  इनके अलावा कंपनी ने Vivobook 16, Vivobook 15 और दूसरे मॉडल्स को लॉन्च किया है. सभी में कंपनी ने AMD Ryzen प्रोसेसर दिया है, जो अगल-अगल कैपेबिलिटी के साथ आते हैं. इनमें कंपनी ने SSD स्टोरेज दिया है.  कितनी है कीमत?  इन सभी मॉडल्स को 12 फरवरी से खरीदा जा सकेगा. हालांकि, ASUS Vivobook 16 मार्च में उपलब्ध होगा. Zenbook S16 की कीमत 1,69,990 रुपये है. वहीं Zenbook 14 की कीमत 1,15,990 रुपये है. Vivobook S16 की कीमत 1,04,990 रुपये से शुरू है.  Vivobook 16 को कंपनी ने 87,990 रुपये की शुरुआती कीमत पर लॉन्च किया है. वहीं Vivobook 15 की कीमत 62,990 रुपये से शुरू होती है. ASUS Vivobook 16 (M1605NAQ) की कीमत 65,990 रुपये से शुरू होती है. प्रीऑर्डर पर 5,599 रुपये का फायदा सिर्फ 1 रुपये में मिलेगा. ये ऑफर जेनबुक मॉडल्स पर है.

होली 2026: 3 या 4 मार्च, पंडितों से जानें रंगों के पर्व की सही तिथि

इंदौर      इस साल होली के पर्व को लेकर लोगों में काफी ज्यादा असमंजस की स्थिति बनी हो गई है. इसके पीछे का मुख्य कारण है 3 मार्च 2026 को लगने वाला चंद्र ग्रहण. गणनाओं के मुताबिक, 2 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा है, जबकि रंगों का पर्व होली 4 मार्च को मनाया जाएगा. तो आइए देश के प्रसिद्ध पंडितों से जानते हैं कि होली की सही तिथि या डेट क्या रहने वाली है.  ज्योतिषाचार्य पंडित दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री के अनुसार, भारतीय ज्योतिष और निर्णय सिंधु ग्रंथ के आधार पर फाल्गुन शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि 2 मार्च 2026 को पड़ रही है. शास्त्रों के मुताबिक, इस दिन भद्रा समाप्त होने के बाद या भद्रा के पूंछ काल में होलिका दहन करना ही शास्त्र सम्मत माना जा रहा है. उन्होंने बताया कि 2 मार्च की रात 12 बजकर 50 मिनट से 2 बजकर 2 मिनट के बीच होलिका दहन का श्रेष्ठ मुहूर्त रहेगा. अगले दिन 3 मार्च 2026 को फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा के दिन साल का पहला चंद्रग्रहण लगेगा. ग्रहण होने के कारण अगले दिन चैत्र कृष्ण पक्ष प्रतिपदा यानी 4 मार्च 2026 को पूरे भारत में होली मनाई जाएगी.  3 मार्च को ये रहेगी चंद्रग्रहण की टाइमिंग  दरअसल गणनाओं के मुताबिक, 3 मार्च 2026 फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को चंद्रमा का उदय शाम 5 बजकर 59 मिनट पर होगा, जबकि ग्रहण की शुरुआत दोपहर 3 बजकर 20 मिनट पर होगी. ग्रहण का (मध्यकाल) मध्यान्ह समय शाम 5 बजकर 4 मिनट पर होगा और ग्रहण का मोक्ष काल शाम 6 बजकर 47 मिनट रहेगा. पूरे भारत में चंद्रोदय के समय यानी 3 मार्च की शाम 05 बजकर 59 के बाद ही सभी स्थानों में चंद्रग्रहण देखा जा सकेगा. केवल ग्रहण का मोक्ष काल ही दिखाई देगा, जबकि ग्रहण का प्रारंभ और मध्य काल भारत में कहीं भी दिखाई नहीं होगा, क्योंकि चंद्रोदय से पहले ही ग्रहण का आरंभ हो जाएगा.  सनातन धर्म के अनुसार, सूर्य ग्रहण में 12 घंटे पूर्व और चंद्र ग्रहण में 9 घंटे पूर्व सूतक काल मान्य होता है. इस गणना के अनुसार, 3 मार्च को सुबह 6 बजकर 20 मिनट से सूतक काल प्रारंभ हो जाएगा. कहां कहां दिखाई देगा चंद्रग्रहण?  3 मार्च को लगने जा रहा यह चंद्रग्रहण भारत के अलावा पूर्वी एशिया, ऑस्ट्रेलिया, प्रशांत महासागर और अमेरिका में भी दिखाई देगा. ऐसे में पूरे भारत में होली का पर्व 4 मार्च 2026 को ही मनाया जाना उचित रहेगा. होलिका दहन 2 मार्च 2026 को भद्रा पूंछ काल में, रात 12 बजकर 50 मिनट के बाद करना ही शास्त्र सम्मत माना जा रहा है.  होली की तिथि को लेकर पंडित वेद प्रकाश मिश्रा ने भी दिया अपना मत ज्योतिषाचार्य पंडित वेद प्रकाश मिश्रा ने बताया कि शास्त्रीय परंपरा के अनुसार, होलिका दहन रात में और रंगोत्सव अगले दिन प्रातः काल मनाया जाता है. लेकिन 3 मार्च को चंद्रग्रहण और सूतक काल होने के कारण उस दिन रंगोत्सव करना उचित नहीं है. इसी कारण होली का पर्व 4 मार्च 2026 को मनाया जाएगा. दरअसल, हृषीकेश पंचाङ्ग के अनुसार, फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 2 मार्च को शाम 5 बजकर 18 मिनट पर होगी, जो 3 मार्च को शाम 4 बजकर 33 मिनट तक रहेगी. इस प्रकार 2 मार्च को निशाव्यापिनी पूर्णिमा प्राप्त हो रही है. हालांकि, 2 मार्च को शाम 5 बजकर 18 मिनट से भद्रा लग रही है, इसलिए भद्रा के मुख काल को त्यागकर, भद्रा पूंछ काल में रात 12 बजकर 50 मिनट से रात 2 बजकर 02 मिनट तक होलिका दहन करना शास्त्र सम्मत माना जा रहा है.  आगे पंडित वेद प्रकाश मिश्रा ने बताया कि, प्रचलित मान्यता के अनुसार, होलिका दहन के अगले दिन अर्थात् 3 मार्च को होली का पर्व मनाया जाना चाहिए. लेकिन इस दिन शाम को ग्रस्तोदित चंद्रग्रहण है, जो शाम 5 बजकर 59 मिनट से शाम 6 बजकर 47 मिनट तक रहेगा. ग्रहण समाप्त होने के बाद 3 मार्च को चौसठ्ठी देवी की यात्रा और पूजन किया जाएगा.  यानी, सभी मतों और पंडितों के मुताबिक, 4 मार्च को ही होली मनाना ज्यादा शुभ माना जा रहा है.