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TMC-Congress विलय की चर्चा पर बड़ा खुलासा, जानिए क्यों ममता बनर्जी के लिए आसान नहीं है यह फैसला

कोलकाता  तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की मुलाकात के बाद टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की मुलाकात के बाद दोनों पार्टियों का आपस में विलय की अटकलें शुरू हो गई. इन मुलाकातों के बाद कांग्रेस की ओर से अपने तमाम प्रदेश अध्यक्ष को मीटिंग के लिए बुलावा भेजे जाने के बाद टीएमसी का कांग्रेस में विलय की अटकलें और तेज हो गई. हालांकि टीएमसी की तरफ से इन अटकलों को खारिज कर दिया गया है और कांग्रेस ने भी प्रदेश अध्यक्षों के साथ अपनी बैठक को टाल दिया है. अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा हो रही है कि कांग्रेस और टीएमसी के बीच विलय को लेकर बातचीत में किसी बिंदु पर गतिरोध है. इन चर्चाओं के बीच विशेषज्ञों ने अपनी बात सामने रखी है. संविधान विशेषज्ञ का कहना है कि ममता बनर्जी के चाहने के बावजूद वह अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में नहीं कर पाएंगी।  सुप्रीम कोर्ट के वकील ने समझाया पार्टियों के विलय का पूरा समीकरण सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी दुबे ने कहा कि राजनीतिक दलों का विलेय दो तरह से होता है. एक विधायी विलय, जिसको हम लेजिस्लेटिव मर्जर कहते हैं. दूसरा होता है ऑर्गेनाइजेशनल मर्जर, जिसको हम सांगठनिक विलय कहते हैं. दोनों परिस्थितियों में दो तिहाई बहुमत होना जरूरी है. जब आप विधायी विलय करते हैं तो लोकसभा, राज्य सभा और विधानसभा के दो तिहाई सदस्यों का सहमति पत्र होना चाहिए. वहीं सांगठनिक विलय में भी तमाम राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय और जिला स्तरीय पार्टी पदाधिकारियों का दो तिहाई समर्थन चाहिए।  उन्होंने कहा की तारीख में ममता बनर्जी पार्टी प्रमुख होने के नाते अगर टीएमसी का विलय करना भी चाहती हैं तो उन्हें सबसे पहले इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया को यह आश्वस्त करना होगा कि उनके इस फैसले के साथ पार्टी पदाधिकारी या सांसद-विधायकों में दो तिहाई समर्थन प्राप्त है।  वरिष्ठ अधिवक्ता इसके अलावा विलय के लिए दोनों दलों के मुख्य संगठन माने पार्टी हाईकमान आपस में औपचारिक विलय का प्रस्ताव पारित करते हैं. मूल पार्टी के कम से कम दो तिहाई सदस्यों की सहमति से विलय होता है. तभी एंटी डिफेक्शन लॉ (दल-बदल विरोधी कानून) और मर्जर क्लॉज कॉन्स्टिट्यूशनल वैलिडिटी (विलय की संवैधानिक वैधता) कार्यान्वयन में मदद करेगा. इसके बिना लेजिसलेटिव मर्जर कर देते हैं और दो तिहाई सदस्य नहीं है तो वह भी नहीं माना जाएगा. संगठन का विलय कर देते हैं तो भी नहीं माना जाएगा।  उन्होंने समझाया कि विलय में यह भी देखना होगा कि जिन लोगों ने खुद को अलग गुट घोषित कर दिया है, वह कहां हैं. चुनाव आयोग को आश्वस्त होना पड़ेगा कि विलय के समय ब्लॉक से लेकर केंद्रीय स्तर के संगठन और उसके जो ऑफिस बियरर्स हैं वो किसके साथ है. क्योंकि वो रिप्रेजेंट करते हैं कितनी मेंबरशिप है. तभी यह ऐसा हो सकता है और हमने हाल ही में महाराष्ट्र के केस में दोनों पॉलिटिकल पार्टीज के केस में इलेक्शन कमीशन का फैसला देखा भी है. क्योंकि संगठन और विधायिका दोनों के मर्जर के बाद इलेक्शन कमिशन ने जो निर्णय लिया था।  अश्विनी दुबे ने बताया कि अयोग्यता केवल लोकसभा, राज्य सभा और विधानसभा सदस्यों का कहा सकता है. लेकिन संगठन के लोगों का डिसक्वालीफिकेशन नहीं हो सकता है. दूसरी पार्टी की मान्यता तब मिलेगी जब उसमें भी दो तिहाई सदस्य जो पार्टी के सदस्य हैं वो वो तैयार हो जाएं करें।  उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में शिवसेना की टूट और एनसीपी की टूट सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कह दिया था कि सिर्फ अगर विधायक चाहे और सांसद चाहें तो वो अपने हिसाब से पार्टी को ले जाकर मर्ज नहीं कर सकते. अलग पार्टी नहीं बना सकते तो वो विलय भी नहीं कर सकते।  कहा कि चाहे लोकसभा हो, चाहे राज्यसभा हो, चाहे विधानसभा हो, इनसाइड द हाउस तो बागी गुट अपना नेता चुन सकता है अपने फैसले ले सकता है, लेकिन पार्टी का वो रिप्रेजेंटेटिव नहीं माना जाएगा. ये नहीं माना जाएगा कि बाहर भी वो पार्टी का रिप्रेजेंटेटिव है. लेकिन जैसे लोकसभा के अंदर विधानसभा के अंदर जो तो तिहाई बहुमत वो बहुमत अगर पार्टी जो मूल पार्टी है मूल पार्टी पर दावा करते हैं कि हम ही यहां विधानसभा या लोकसभा में रिप्रेजेंट करते हैं. कहेंगे कि ये हमारे चुनाव में जीते हुए लोगों के नंबर हैं, तो वहां उनकी वैद्यता मानी जाएगी. लेकिन बाहर संगठन में वो रिप्रेजेंट नहीं कर सकते. संगठन के रिप्रेजेंटेशन के लिए संगठनिक विलय और संगठनिक विलय के लिए ऑर्गेनाइजेशनल मर्जर के लिए वह जो सदस्यों की संख्या है वो इंश्योर करना जरूरी है रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट के मुताबिक तो अंदर वो कर सकते हैं बाहर नहीं और यही सुप्रीम कोर्ट में अभी मामला पेंडिंग है।  . कहां से शुरू हुई टीएमसी और कांग्रेस के विलय की खबरें बता दें कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के महज 80 सीटों पर सिमटने के बाद पार्टी में भगदड़ मच गई है. ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में 58 विधायकों ने बागी गुट बना लिया और पश्चिम बंगाल विधानसभा में अपनी अलग मान्यता प्राप्त कर ली है. उनका दावा है कि उनके बागी गुट में अब तक तृणमूल कांग्रेस 65 विधायक आ चुके हैं. लोकसभा में काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में 20 सांसदों की सूची स्पीकर ओम बिरला को सौंपे जाने का दावा किया गया है. दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के इन बागी सांसदों ने एनडीए सरकार का सपोर्ट करने की बात कही है. उधर, राज्य सभा में अब तक टीएमसी के तीन सांसदों सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बराइक अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं।  इन राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच विपक्षी दलों के संगठन इंडिया ब्लॉक की बैठक में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुंची ममता बनर्जी ने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कीं. इसके अलावा टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की, जिसके बाद खबरें उड़ने लगी कि तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय होने जा रहा है. हालांकि करीब 24 घंटे बाद कांग्रेस की तरफ से जयराम रमेश और तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने ऐसे किसी विलय से इनकार कर दिया है।   

भारत में ऑपरेशन बंद कर अमेरिकी कंपनी ने निकाले सभी 250 कर्मचारी, कर्मचारियों में मची चिंता

नई दिल्‍ली AI अब कंपनियों के बीच तेजी से अप्‍लाई हो रहा है, जिसका नतीजा ये है कि कंपनियां एआई का यूज बढ़ाते ही कर्मचारियों की संख्‍या में कटौती कर रही हैं. इसी के मद्देनजर, एक  अमेरिकी कंपनी ने भारत से अपना कारोबार बंद करने का फैसला किया है. इससे भारत में काम कर रहे सभी 250 कर्मचारियों की नौकरी प्रभावित हुई है।   यह अमेरिकी रियल एस्टेट टेक कंपनी OpenDoor है, जिसने भारत स्थित अपने परिचालन को बंद करने का निर्णय लिया है, क्योंकि कंपनी संयुक्त राज्य अमेरिका में छोटी एआई बेस टीमों की ओर रुख कर रही है।  कर्मचारियों के साथ शेयर किए गए एक नोट में OpenDoor के सीईओ काज नेजातियान ने कहा कि कुछ महीने पहले जब कंपनी ने ओपनडोर 2.0 लॉन्च किया था, तब भारत में उसके लगभग 250 कर्मचारी थे. इसमें से पिछले कुछ महीनों में कुछ नौकरियों को वापस संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थानांतरित कर दिया गया है।  उन्‍होंने आगे कहा कि आज हम अमेरिका में अपने कस्‍टमर्स के लिए इन पदों को और भी सुलभ बनाने की प्रक्रिया को अंतिम रूप दे रहे हैं और भारत स्थित अपने परिचालन को बंद करने की प्रक्रिया शुरू कर रहे है. इससे भारत में हमारे उन सभी सहकर्मियों पर असर पड़ेगा, जिन्होंने ओपनडोर के लिए काम किया है।  भारत में बहुत अच्‍छे सहयोगी मिले उन्होंने कहा कि भारत में हमारे सहयोगी बहुत अच्छे लोग हैं. वे लोग शानदार काम करते हैं. अगर कोई इन्‍हें हायर करना चाहता है, तो उनके लिए ये बेहतरीन काम करके देंगे. हालांकि हम अब भारत से अपना कारोबार समेटकर निकल रहे हैं।  ओपनडोर यह बदलाव क्यों कर रहा है? इस फैसले के पीछे का कारण बताते हुए नेजातियान ने कहा कि ओपनडोर ने सालों से भारत में एक बड़ी टीम बनाई है ताकि अलग-अलग सिस्‍टम में मैन्युअल वर्कफ़्लो को संभाला जा सके. हालांकि, कंपनी ने कहा कि इन सिस्‍टम को यून‍िफाइड करने और पूरे अमेरिका में छोटी AI बेस्‍ड कस्‍टमर्स फोकस टीमें बनाने के बाद उसके ऑपरेशन में बदलाव आया है।  नेजातियन ने कहा कि हमारे ग्राहक अमेरिका में हैं, और उनके लिए हम जो परिचालन कार्य करते हैं, उसे उनके करीब रहकर करना सबसे अच्छा है. उन्होंने आगे कहा कि ओपनडोर 2.0 कर्मचारियों की संख्या के हिसाब से एक बहुत छोटी कंपनी होगी, लेकिन प्रभाव के हिसाब से एक बहुत बड़ी कंपनी होगी. उन्होंने लिखा कि हमारे लोग पहले से कहीं अधिक चीजों के मालिक होंगे, अधिक निर्माण करेंगे और उनका दायरा पहले से कहीं अधिक व्यापक होगा।  कंपनी ने कहा कि रिस्‍टैब्लिसमेंट से कम चीजों, कम प्रॉसेस और कम ऑप्‍शन के साथ संचालन सरल हो जाएगा. कंपनी एक ऐसा सिंगल प्लेटफॉर्म बनाने की योजना बना रही है जहां कर्मचारी घर की खरीद, रिन्‍यूवेबल और बिक्री की पूरी प्रक्रिया को ट्रैक कर सकें. साथ ही अलग-अलग सॉल्‍यूशन पर काम कर सकें। 

रेल यात्रियों को झटका! VIP कोटे के विस्तार से ग्वालियर की कई ट्रेनों में टिकट मिलना हो सकता है मुश्किल

ग्वालियर ग्वालियर से सफर करने वाले आम रेल यात्रियों के लिए आने वाले दिन और भी मुश्किल भरे हो सकते हैं। एक तरफ जहां नियमित ट्रेनों में लंबी वेटिंग लिस्ट और नो-रूम के कारण आम जनता का सफर बेपटरी हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ रेलवे प्रशासन आम यात्रियों को राहत देने के बजाय इमरजेंसी (आपातकालीन) कोटे का दायरा और बढ़ाने की तैयारी में है। इसमें रेलवे का तर्क है कि वीआइपी लोगों को अचानक आना-जाना पड़ता है, इसलिए यह कोटा बढ़ाया जा रहा है। लेकिन इस कदम से सीधा फायदा सिर्फ रसूखदारों को मिलेगा, जबकि दो-दो महीने पहले टिकट बुक कराकर कतार में खड़ा आम आदमी कंफर्म सीट के लिए तरसता रह जाएगा। कैंसर मरीजों को राहत, लेकिन आम जनता पर दोहरी मार इस पूरे मामले में राहत की बात सिर्फ इतनी है कि रेलवे इस कोटे के तहत आम आदमी की श्रेणी में आने वाले कैंसर मरीजों को प्राथमिकता देता है। बीमारी की गंभीरता को देखते हुए रेलवे का यह कदम सराहनीय है, लेकिन इसकी आड़ में वीआइपी सीटों की संख्या बढ़ाए जाने से सामान्य और स्लीपर क्लास के मध्यमवर्गीय यात्रियों का हक मारा जाना तय है। ग्वालियर से इन ट्रेनों पर असर ग्वालियर से शुरू होने वाली और यहां से गुजरने वाली लगभग 50 ट्रेनों में इमरजेंसी कोटा लागू है। वीआइपी कोटा बढऩे से जिन प्रमुख ट्रेनों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा, उनमें शामिल हैं। वंदे भारत, शताब्दी एक्सप्रेस, राजधानी एक्सप्रेस, पंजाब मेल, छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस, मंगला एक्सप्रेस, केरला एक्सप्रेस, स्वर्ण जयंती, चंबल एक्सप्रेस, ताज एक्सप्रेस, बरौनी एक्सप्रेस, रतलाम इंटरसिटी और बुंदेलखंड एक्सप्रेस आदि शामिल है। सीटों से ज्यादा आवेदन रेलवे की वीआइपी पेटी सुबह होते ही आवेदनों से भर जाती है। रेल प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि कोटा सीमित है, जबकि सिफारिशों का दबाव उम्मीद से कहीं ज्यादा है। सुबह 10 बजे तक रेलवे कार्यालय में माननीयों के प्रतिनिधियों की कतार लग जाती है। कई बार अंतिम क्षणों तक झांसी संपर्क करना पड़ता है। इन्हें मिलता है कोटा रेलवे के अनुसार ट्रेनों में कोटा न्यायाधीश, सांसद, विधायक, मंत्री, कैंसर मरीज, एमसीओ (मिलिट्री), सीआरपीएफ और पुलिस आदि को प्राथमिकता के आधार पर दिया जाता है। इसमें से कुछ का कोटा तो लगभग हर एक दो दिन में लगता ही है। मंजूरी मिलते ही बढ़ाया जाएगा इमरजेंसी कोटा हमारे यहां से निकलने वाली कुछ ट्रेनों में भारी मांग को देखते हुए कोटा बढ़ाने का प्रस्ताव बनाकर रेलवे बोर्ड को भेजा गया है। प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद कुछ चुनिंदा ट्रेनों में इमरजेंसी कोटा बढ़ जाएगा। -अमन वर्मा, सीनियर डीसीएम (झांसी मंडल)

अनिल अंबानी पर संकट के बादल! NCLT के फैसले ने बढ़ाई चिंता, आगे क्या होगा?

मुंबई  उद्योगपति अनिल अंबानी को एक बड़ा झटका लगा है। दरअसल, मुंबई स्थित राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की उस याचिका को स्वीकार कर लिया, जिसमें अंबानी के खिलाफ व्यक्तिगत दिवालियापन की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई थी। इस फैसले के साथ ही अंबानी के खिलाफ दिवालियापन प्रक्रिया का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, NCLT के फैसले के बाद अनिल अंबानी ने स्पष्ट किया है कि वे इस आदेश को राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) में चुनौती देंगे। अगर अनिल अंबानी का दिवालियापन प्रक्रिया मामला आगे बढ़ता है तो एक रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल (RP) नियुक्त किया जा सकता है, जो कानून के तहत उनकी व्यक्तिगत संपत्तियों का आकलन और नियंत्रण संभालने की प्रक्रिया शुरू करेगा। यह मामला करीब 1,200 करोड़ रुपये की वसूली से जुड़ा है। SBI का दावा है कि अनिल अंबानी ने रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCom) और रिलायंस इंफ्राटेल को दिए गए कर्ज के लिए व्यक्तिगत गारंटी दी थी। कंपनियों के कर्ज नहीं चुकाने के बाद बैंक ने गारंटी के आधार पर वसूली की कार्रवाई शुरू की थी। इस पूरे प्रकरण पर अनिल अंबानी की ओर से बयान आया है। यह मामला साल 2016 का है, जो कथित रूप से दी गई एक विवादित व्यक्तिगत गारंटी से जुड़ा है। अंबानी पक्ष का दावा है कि उन्हें इस फंड से कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं मिला था। मामला उस समय का है, जब भारत में व्यक्तिगत दिवालियापन संबंधी प्रावधान पूरी तरह लागू नहीं हुए थे। अंबानी के प्रवक्ता के मुताबिक NCLT का विस्तृत आदेश मिलने के बाद उनकी कानूनी टीम उसका अध्ययन करेगी और उपलब्ध कानूनी विकल्पों के तहत उचित मंच पर चुनौती देगी। उन्होंने भरोसा जताया कि अंबानी अपनी स्थिति को न्यायिक मंचों पर सफलतापूर्वक साबित करेंगे। अमिताभ झुनझुनवाला पर सीबीआई का एक्शन इस बीच, मुंबई की एक विशेष अदालत ने रिलायंस कॉमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड से जुड़े एक कथित बैंक धोखाधड़ी मामले में अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (एडीएजी) के पूर्व प्रबंध निदेशक अमिताभ झुनझुनवाला को सीबीआई की हिरासत में भेज दिया है। झुनझुनवाला इससे पहले अनिल अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड के खिलाफ भारतीय स्टेट बैंक की शिकायत के आधार पर दर्ज एक मामले में न्यायिक हिरासत में थे। इस मामले में कंपनी पर कथित तौर पर 2,929.05 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाने का आरोप है। सीबीआई के अनुसार, रिलायंस कॉमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड, उसके निदेशकों और अज्ञात सरकारी अधिकारियों ने मिलकर 31 बैंकों और वित्तीय संस्थानों के एक समूह (कंसोर्टियम) के साथ धोखाधड़ी की साजिश रची। इस समूह से कंपनी ने कुल मिलाकर लगभग 9,280 करोड़ रुपये का लोन लिया था।

धर्म बदलवाने का दबाव और हैवानियत की हदें, पति-पत्नी की साजिश का सनसनीखेज मामला आया सामने

कैमूर बिहार के कैमूर में धर्मांतरण के लिए रची गई खौफनाक साजिश का खुलासा हुआ है. दरअसल कैमूर में एक मुस्लिम कपल ने धर्मांतरण के लिए एक महिला को निशाना बनाकर बेहद घिनौनी साजिश रची. महिला को कथित तौर पर नशीला पदार्थ खिलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया गया. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जब आरोपी महिला के साथ दुष्कर्म कर रहा था, तब उसकी पत्नी मोबाइल फोन से पूरी घटना का वीडियो बना रही थी. इसके बाद वीडियो वायरल करने की धमकी देकर महिला पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया गया और ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू हुआ।  क्या है पूरा मामला? मामला कैमूर जिले के रामगढ़ थाना क्षेत्र का बताया जा रहा है. पीड़ित महिला की शिकायत के अनुसार आरोपी एकराम अंसारी ने उसे नशीला पदार्थ दिया, जिससे वह अचेत हो गई. आरोप है कि बेहोशी की हालत का फायदा उठाकर आरोपी ने उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए. इस दौरान आरोपी की पत्नी शाहिदा बेगम मौके पर मौजूद रही और उसने मोबाइल फोन से पूरी घटना का वीडियो रिकॉर्ड किया। वीडियो बनाकर ब्लैकमेलिंग का खेल! पीड़िता का आरोप है कि घटना के बाद आरोपी दंपति ने वीडियो को हथियार बना लिय. महिला को धमकी दी गई कि यदि उसने उनकी बात नहीं मानी और धर्म परिवर्तन नहीं किया तो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जाएगा. लगातार मिल रही धमकियों और दबाव से परेशान होकर महिला ने पुलिस का दरवाजा खटखटाया।  पुलिस ने खोला साजिश का राज शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की. जांच के दौरान सामने आया कि कथित दुष्कर्म और वीडियो रिकॉर्डिंग की घटना में पति-पत्नी दोनों की भूमिका थी. पुलिस अधिकारियों के अनुसार महिला को नशीला पदार्थ दिए जाने, दुष्कर्म और वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करने के आरोपों की जांच की गई, जिसके बाद कार्रवाई करते हुए आरोपी दंपति को गिरफ्तार कर लिया गया।  दोनों आरोपी गिरफ्तार पुलिस ने आरोपी एकराम अंसारी और उसकी पत्नी शाहिदा बेगम को गिरफ्तार कर लिया है. अधिकारियों का कहना है कि मामले में सभी पहलुओं की गहन जांच की जा रही है. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और मोबाइल फोन की भी जांच की जा रही है ताकि पूरे घटनाक्रम की सच्चाई सामने लाई जा सके।  इलाके के लोग हैरान! वहीं इस घटना सामने आने के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गई है. स्थानीय लोग इस वारदात को लेकर स्तब्ध हैं. नशीला पदार्थ, दुष्कर्म, वीडियो रिकॉर्डिंग, ब्लैकमेलिंग और धर्म परिवर्तन के दबाव जैसे गंभीर आरोपों ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है. पुलिस का कहना है कि जांच के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। 

LPG से मुक्ति की ओर भोपाल, चार इमली समेत 4 प्रमुख कॉलोनियों में PNG नेटवर्क का विस्तार

भोपाल  मध्य प्रदेश में पिछले तीन महीनों से चल रही एलपीजी (घरेलू गैस सिलेंडर) की भारी किल्लत से आम जनता परेशान है। राजधानी भोपाल में भी यह संकट लगातार बना हुआ है और गैस एजेंसियों पर सिलेंडरों की बुकिंग को लेकर लोग चक्कर काट रहे हैं। बुधवार को ही एक गैस एजेंसी पर सिलेंडर न मिलने को लेकर उपभोक्ताओं ने भारी हंगामा किया। इस बड़े संकट से निपटने के लिए अब खाद्य विभाग भोपाल को 'सिलेंडर फ्री' बनाने की एक बड़ी योजना पर काम कर रहा है। इसके तहत जिन इलाकों में पीएनजी (पाइप्ड नेचुरल गैस) की पाइपलाइन बिछ चुकी है, वहां भविष्य में एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई पूरी तरह बंद कर दी जाएगी। चार बड़ी कॉलोनियों से होगी शुरुआत फूड कंट्रोलर चंद्रभान सिंह जादौन ने बताया कि भोपाल में 'थिंक गैस' कंपनी के जरिए घरों तक सीधे पाइपलाइन से गैस पहुंचाने का काम किया जा रहा है। यह लाइन मिसरोद से शुरू होकर होशंगाबाद रोड के दोनों तरफ की कॉलोनियों को कवर कर रही है। वर्तमान में बावड़ियाकलां, सलैया, अयोध्या बायपास, अवधपुरी और साकेत नगर के अधिकांश घरों में कनेक्शन दिए जा चुके हैं। अब विभाग ने योजना बनाई है कि जिन क्षेत्रों में पाइपलाइन बिछ रही है, वहां पहले शत-प्रतिशत (100%) घरों को कनेक्शन दिया जाए और उसके बाद ही अगली कॉलोनी में काम शुरू हो। इसके लिए पहले चरण में चार बड़ी कॉलोनियों— बावड़ियाकलां की केराल केनसिप, अवधपुरी की सौम्या पार्कलैंड, अयोध्या बायपास की सागर लैक व्यू होम्स और सलैया की आकृति ग्रीन को चुना गया है। 172 कॉलोनियों के सामने से गुजर रही है लाइन अधिकारियों के मुताबिक, थिंक गैस कंपनी ने होशंगाबाद रोड के दोनों ओर समेत कुल 172 कॉलोनियों के मुख्य रास्तों पर गैस लाइन बिछा दी है। यहां रहने वाले लोग कंपनी के पास आवेदन करके अपने घरों में कनेक्शन लगवा रहे हैं और कटारा हिल्स समेत कई अन्य इलाकों से भी लोग इसके लिए तेजी से फॉर्म भर रहे हैं। विभाग अब चार-चार कॉलोनियों का समूह बनाकर फोकस कर रहा है ताकि काम जल्दी पूरा हो सके। एक तय समय सीमा के बाद इन इलाकों में एलपीजी सिलेंडरों की होम डिलीवरी हमेशा के लिए बंद कर दी जाएगी। मंत्री और अफसरों के बंगलों में भी बिछेगी पाइपलाइन भोपाल के दो सबसे बड़े और वीआईपी इलाके 'चार इमली' और '74 बंगला' में भी इस समय भूमिगत (अंडरग्राउंड) गैस पाइपलाइन बिछाने का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है। आपको बता दें कि इन दोनों क्षेत्रों में मध्य प्रदेश के 75 फीसदी से ज्यादा मंत्रियों, सीनियर आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) अधिकारियों के सरकारी बंगले हैं। इन इलाकों के अधिकांश हिस्सों में लाइन बिछाने का काम पूरा हो चुका है और कुछ ही दिनों में बंगलों के भीतर कनेक्शन देने की शुरुआत हो जाएगी। अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते गहराया संकट दरअसल, वैश्विक स्तर पर अमेरिका और ईरान के बीच छिड़े सैन्य टकराव के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। इसी का असर है कि मध्य प्रदेश और भोपाल में पिछले कई महीनों से घरेलू गैस की भारी किल्लत देखी जा रही है। भोपाल में इस समय हर दिन 12 से 14 हजार सिलेंडरों की बुकिंग हो रही है, जबकि कंपनियों की तरफ से सप्लाई केवल 9 से 10 हजार सिलेंडरों की ही हो पा रही है। इस किल्लत की चपेट में आम जनता के साथ-साथ कई बड़े मंत्री और अफसर भी आ गए थे, जिसके बाद वीआईपी इलाकों में भी पाइपलाइन बिछाने के काम में तेजी लाई गई है। होशंगाबाद रोड पर सबसे ज्यादा 43 हजार कनेक्शन वर्तमान में पीएनजी पाइपलाइन का सबसे बड़ा जाल होशंगाबाद रोड पर फैला हुआ है, जहां करीब 43 हजार घरों में गैस पाइपलाइन के जरिए खाना बन रहा है। अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में इस योजना को पुराने शहर (ओल्ड सिटी) की तरफ भी ले जाया जाएगा ताकि वहां के बड़े इलाकों को कवर करके घर-घर गैस पहुंचाई जा सके। इसके अलावा घरों के साथ-साथ शहर के सभी बड़े होटलों, रेस्टोरेंटों, व्यावसायिक संस्थानों और बहुमंजिला इमारतों (मल्टीस्टोरी बिल्डिंग) को भी अनिवार्य रूप से पीएनजी लाइन से जोड़ा जाएगा। 90 दिनों में कनेक्शन लेना होगा अनिवार्य सरकार ने इस योजना को लेकर एक नई और सख्त गाइडलाइन भी जारी कर दी है। इसके नियम के मुताबिक, जिन इलाकों में गैस की अंडरग्राउंड पाइपलाइन बिछ जाएगी, वहां के निवासियों को 90 दिनों के भीतर पीएनजी कनेक्शन लेना अनिवार्य होगा। यदि कोई तय समय के भीतर नया कनेक्शन नहीं लेता है, तो उसका पुराना एलपीजी सिलेंडर वाला कनेक्शन सरकारी आदेश के तहत ब्लॉक या काट दिया जाएगा। PNG को लेकर केंद्र सरकार ने गाइडलाइन भी जारी की गैस संकट के बीच ही भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 'अनिवार्य वस्तु अधिनियम, 1955' के तहत एक नया आदेश जारी किया था। इस नए नियम का मकसद देशभर में गैस पाइपलाइन बिछाने और उनके विस्तार के काम को रफ्तार देना है। अब पाइपलाइन के काम में जमीन मिलने या मंजूरी मिलने में होने वाली देरी खत्म हो गई है। जिससे रिहायशी इलाकों (Residential areas) तक गैस इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से पहुंच सकेगा। नए एक्ट के 4 नियम समझें 1. सोसाइटियों और RWA की मनमानी खत्म     कई बार हाउसिंग सोसाइटियों या RWA (रेसिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन) के विरोध की वजह से पाइपलाइन का काम रुक जाता था। अब ऐसा नहीं होगा।     अगर कोई कंपनी पाइपलाइन के लिए रास्ता मांगती है तो सोसाइटी को 3 दिन के भीतर मंजूरी देनी होगी।     अगर सोसाइटी ने मना किया या देरी की तो वहां रहने वाले सभी घरों की PNG सप्लाई पर रोक लगाई जा सकती है। 2. छोटे इलाकों को 10 दिन में मंजूरी मिलेगी     पाइपलाइन बिछाने के लिए अब सरकारी विभागों को फाइलों को लटकाने की इजाजत नहीं है।     छोटे नेटवर्क के लिए 10 दिन और बड़ी लाइनों के लिए 60 दिन में मंजूरी देना अनिवार्य है।     अगर विभाग तय समय में जवाब नहीं देता, तो उसे 'डीम्ड क्लियरेंस' यानी 'ऑटोमैटिक मंजूरी' मान लिया जाएगा और काम शुरू कर दिया जाएगा। 3. जमीन और मुआवजे का झंझट खत्म अगर पाइपलाइन किसी की निजी जमीन … Read more

Tata Sierra CNG का इंतजार कर रहे ग्राहकों के लिए खबर, कंपनी ने लॉन्च को लेकर खोले पत्ते

  नई दिल्ली टाटा ने सीएनजी कारों के साथ वो प्रयोग किए हैं, जो इंडस्ट्री में दूसरे प्लेयर्स नहीं कर रहे हैं. चाहें सीएनजी के साथ ऑटोमेटिक (AMT) गियरबॉक्स देना हो या फिर कार का पेट्रोल पर नहीं बल्कि सीधे सीएनजी पर स्टार्ट होना हो. लेकिन टाटा की सारी सीएनजी कारें सब-फोर मीटर सेगमेंट की हैं।  यानी टाटा सीएनजी वाली सभी कारें चार मीटर से छोटी हैं. चाहें बता टियागो की हो या फिर नेक्सन की. ऐसे में एक सवाल उठता है कि क्या टाटा मोटर्स एक बड़ी सीएनजी कारों को मार्केट में उतारेगी. मसलन टाटा सिएरा सीएनजी या कर्व सीएनजी हमें देखने को मिलेगी. वैसे इंटरनेट पर टाटा सिएरा सीएनजी को लेकर कई तरह की बातचीत चल रही है।  कयास लगाए जा रहे हैं कि कंपनी इसे जल्द ही लॉन्च कर सकती हैं, लेकिन इन कयासों को हकीकत क्या है. ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वक्त में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा हुआ है. वैसे इजाफा सीएनजी की कीमतों में भी हुआ है. तो क्या टाटा बड़ी सीएनजी कारों को लॉन्च करेगी।  क्या CNG में आएगी टाटा सिएरा और कर्व SUV?  ऑटो से बातचीत में टाटा पैसेंजर इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के चीफ कमर्शियल ऑफिसर विवेक श्रीवत्स ने सीएनजी और टाटा की प्लानिंग पर कई बाते बताई हैं. टाटा की बड़ी कारों में सीएनजी देने के सवालों पर उन्होंने बताया, 'सीएनजी कारों के ज्यादातर खरीदार 15 लाख से कम के सेगमेंट में हैं. बड़ी गाड़ियों में कंज्यूमर्स के अपेक्षाएं अलग हैं।  'बड़ी कारों के खरीदारों को परफॉर्मेंस, ड्राइवेबिलिटी और ओवरऑल कैपेबिलिटी चाहिए होती है. प्रोडक्ट के नजरिये से भी देखें तो, बड़ी गाड़ियों में CNG पावरट्रेन हमेशा वैसी परफॉर्मेंस नहीं देते जैसी उस सेगमेंट के ग्राहक चाहते हैं. फिलहाल हमें बड़ी कारों में सीएनजी की कोई मांग नहीं दिख रही है।  इसका ये मतलब है कि अगर आप सिएरा सीएनजी का इंतजार कर रहे हैं, तो कंपनी इसे अभी लॉन्च नहीं करने वाली है. हालांकि, विवेक ने ये नहीं कहा कि सिएरा सीएनजी या टाटा की बड़ी कारों में सीएनजी कभी नहीं मिलेगा. उन्होंने बताया कि हम लगातार मार्केट ट्रेंड्स और कस्टमर्स की जरूरत का आकलन करते रहते हैं. अगर भविष्य में बड़ी कारों में सीएनजी की मांग बढ़ेगी, तो हम सही प्रोडक्ट के साथ बाजार में उतरने पर विचार करेंगे।  बढ़ रहा सीएनजी का मार्केट सीएनजी कारों को पहले सिर्फ फ्लीट ओनर्स की पसंद के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब ये नजरिया बदल रहा है. इसकी वजह सेफ, कम्फर्टेबल और प्रैक्टिकल विकल्प का मिलना है. सीएनजी देश का तेजी से बढ़ने वाला फ्यूल टाइप है।  वित्तवर्ष 2025 में इसका मार्केट शेयर 19 परसेंट था, जो वित्तवर्ष 2026 में बढ़कर 22 फीसदी पहुंच गया है. हालांकि, इसके बाद भी लोगों के मन में सीएनजी कारों की रिसेल वैल्यू और अपफ्रंट कॉस्ट को लेकर कई सवाल होते हैं।  विवेक श्रीवत्स ने बताया कि सीएनजी कारों की नेट कॉस्ट पेट्रोल कारों के मुकाबले 16 से 20 फीसदी ज्यादा होती हैं. हालांकि, अगर कोई रोजाना 40 किलोमीटर का औसत सफर करता है, तो 16 से 20 परसेंट का ये एक्स्ट्रा खर्च शुरुआती एक साल में ही निकल जाता है।  उन्होंने बताया कि चार साल की ओनरशिप में पेट्रोल कार का कुल खर्च सीएनजी के मुकाबले 10 से 12 परसेंट बढ़ जाता है. वहीं फैक्टरी फिटेड सीएनजी कारों की रिसेल वैल्यू भी ज्यादा होती है। 

NCR में बड़ा बदलाव संभव! हरियाणा के 5 जिलों की किस्मत का फैसला करेगी 16 जून की बैठक

चंडीगढ़  दिल्ली और आसपास के राज्यों के करोड़ों लोगों के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) की सीमाओं से जुड़ी एक बेहद बड़ी और महत्वपूर्ण खबर सामने आ रही है। हरियाणा में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) का दायरा अब बहुत जल्द बड़े स्तर पर सिकुड़ने वाला है। आगामी 16 जून को एनसीआर प्लानिंग बोर्ड (एनसीआरपीबी) की एक अहम बैठक होने जा रही है। यहां करनाल, जींद, महेंद्रगढ़, भिवानी और चरखी दादरी जिलों का बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) से बाहर हो सकता है।  दरअसल, केंद्र सरकार और एनसीआर प्लानिंग बोर्ड रीजनल प्लान-2041 के तहत एनसीआर की सीमाओं की समीक्षा कर रहे हैं। प्रस्ताव के अनुसार, एनसीआर की सीमा दिल्ली के राजघाट से 100 किलोमीटर के दायरे तक सीमित की जा सकती है। इस बदलाव का सबसे अधिक असर हरियाणा पर पड़ने की संभावना है। वर्तमान में हरियाणा के 14 जिले पूरी तरह या आंशिक रूप से एनसीआर में शामिल हैं। इनका कुल क्षेत्रफल 25 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक है। नया प्रस्ताव लागू होने पर यह क्षेत्र घटकर करीब 10.5 हजार वर्ग किलोमीटर रह सकता है। इससे करनाल, जींद, महेंद्रगढ़, भिवानी और चरखी दादरी जैसे जिलों के बड़े हिस्से एनसीआर की सीमा से बाहर हो सकते हैं। इस मुद्दे को सबसे पहले पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने उठाया था। उनका तर्क था कि दिल्ली से काफी दूर स्थित जिलों को एनसीआर में बनाए रखना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने एनसीआर के मौजूदा ढांचे की समीक्षा की आवश्यकता पर कई बार जोर दिया था। अब उनकी इसी सोच को रीजनल प्लान-2041 के माध्यम से आगे बढ़ाया जा रहा है। क्या है हरियाणा सरकार का दिया गया सुझाव? हरियाणा सरकार ने यह भी सुझाव दिया है कि राज्य के 11 राष्ट्रीय राजमार्गों के दोनों ओर एक-एक किलोमीटर चौड़े कॉरिडोर को एनसीआर में शामिल रखा जाए . इससे सड़क और आर्थिक गतिविधियों से जुड़े क्षेत्रों को फायदा मिल सकता है . माना जा रहा है कि इस व्यवस्था से पानीपत और करनाल के कुछ हिस्सों को राहत मिल सकती है। राज्य सरकार का कहना है कि एनसीआर में शामिल जिलों पर कई अतिरिक्त नियम और प्रतिबंध लागू होते हैं। वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का असर उन क्षेत्रों पर भी पड़ता है, जो दिल्ली के प्रभाव क्षेत्र से काफी दूर हैं। इससे उद्योग, निर्माण कार्य और अन्य आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं।  यदि एनसीआर की सीमा में बदलाव होता है, तो इसका असर केवल एनसीआर का दर्जा खत्म होने तक सीमित नहीं रहेगा। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग, परिवहन परियोजनाओं, रेल कनेक्टिविटी, निवेश योजनाओं और रियल एस्टेट सेक्टर पर भी प्रभाव पड़ सकता है।अब सभी की नजर 16 जून को होने वाली एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की बैठक पर टिकी है, जहां इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय की दिशा तय हो सकती है। 

मुख्यमंत्री डॉ. यादव को भेंट की गई ‘ट्रेजर्स ऑफ ताप्ती वैली एंड बुरहानपुर’ की प्रति, विरासत संरक्षण पर हुई चर्चा

मुख्यमंत्री डॉ. यादव को ट्रेजर्स ऑफ ताप्ती वैली एण्ड बुरहानपुर की प्रति भेंट भोपाल  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पुस्तक ''ट्रेजर्स ऑफ ताप्ती वैली एण्ड बुरहानपुर'' की प्रति, पूर्व मंत्री तथा बुरहानपुर विधायक श्रीमती अर्चना चिटनिस ने मंत्रालय में गत दिवस भेंट की। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि ताप्ती नदी घाटी और विशेष रूप से बुरहानपुर के इतिहास में गहराई से उतरती यह पुस्तक इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, शोधार्थियों, पर्यटन एवं विरासत संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों तथा सामान्य पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी होगी। पुस्तक का प्रकाशन नई दिल्ली के इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट द्वारा किया गया है। पुस्तक के लेखक सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद तथा विरासत संरक्षण और संग्रहालय विशेषज्ञ डॉ. ओम प्रकाश मिश्रा है। पुस्तक में बुरहानपुर और ताप्ती नदी घाटी के इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और स्थापत्य विरासत का व्यापक एवं शोधपरक जानकारी है। बुरहानपुर के ऐतिहासिक विकास, यहाँ प्राप्त मुद्राओं (न्यूमिसमेटिक्स) तथा अभिलेखीय साक्ष्यों (एपिग्राफी) के माध्यम से पुस्तक में क्षेत्र के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक इतिहास का समग्र विश्लेषण है। बुरहानपुर की सूफी परंपरा, मंदिरों तथा अन्य धार्मिक स्थलों का भी इसमें विस्तार से वर्णन है, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक सह-अस्तित्व की परंपरा को दर्शाता है। पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बुरहानपुर के शहरी स्वरूप, परकोटे, द्वारों, घाटों और सरायों पर केंद्रित है। पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणाली ‘कुंडी भंडारा’ का अध्ययन यह दर्शाता है कि मध्यकालीन समाज किस प्रकार जल संसाधनों का वैज्ञानिक और सतत उपयोग करता था। सांस्कृतिक विरासत, फारूकी एवं मुगल कालीन स्मारकों तथा असीरगढ़ दुर्ग के विस्तृत विश्लेषण से यह पुस्तक, बुरहानपुर की ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करती है। पुस्तक के लेखक डॉ. मिश्रा भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत टैगोर नेशनल फेलो एवं टैगोर नेशनल स्कॉलर रहे हैं। प्रदेश के पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय विभाग में निदेशक के रूप में कार्य करते हुए डॉ. मिश्रा ने अनेक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों पर व्यापक उत्खनन कार्यों का निर्देशन किया। वर्तमान में डॉ. मिश्रा मध्यप्रदेश पर्यटन बोर्ड में पुरातत्व सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं।  

भोपाल में कचरा नियम सख्त! बड़ी सोसायटियों को खुद करना होगा वेस्ट मैनेजमेंट, निगम वसूलेगा अतिरिक्त चार्ज

भोपाल  भोपाल में 1 अप्रैल 2026 से लागू हुए केंद्र सरकार के नए 'ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों' ने शहर के एक बड़े हिस्से की नींद उड़ा दी है। नगर निगम परिषद द्वारा स्वीकृत इस कड़े कानून का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला असर भोपाल की 900 से अधिक बड़ी कॉलोनियों, सोसायटियों और व्यावसायिक संस्थानों पर पड़ने जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि जो परिसर केवल अपने यहां होने वाली पानी की खपत के कारण 'बल्क वेस्ट जनरेटर' (बड़ा कचरा उत्पादक) के दायरे में आ गए हैं, उन्हें अब अपना कचरा खुद ठिकाने लगाना होगा। इस नियम के दायरे में नगर निगम को हैंडओवर हो चुकीं 1273 कॉलोनियों समेत खुद नगर निगम का 'तुलसी नगर' स्थित नया मुख्यालय भी शामिल हो गया है। इस पूरी व्यवस्था को जमीन पर उतारने के लिए निगम के पास 18 महीने (डेढ़ साल) का समय है।  बल्क वेस्ट के नियम: इन 4 शर्तों से तय होंगे 'बड़े कचरा उत्पादक' यदि कोई भी परिसर नीचे दी गई चार शर्तों में से किसी एक को भी पूरा करता है, तो उसे अनिवार्य रूप से 'बल्क वेस्ट जनरेटर' माना जाएगा और पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराना होगा: 1. आवासीय परिसर: 5 एकड़ (20,000 वर्ग मीटर) या उससे अधिक फ्लोर एरिया वाली हाउसिंग सोसाइटी। 2. व्यावसायिक परिसर: 5,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल वाले होटल, मॉल, अस्पताल, मैरिज गार्डन या बाजार। 3. कचरे की मात्रा: रोजाना 100 किलोग्राम या उससे अधिक ठोस कचरा निकालने वाले संस्थान। 4. पानी की खपत : रोजाना 40,000 लीटर या अधिक पानी की खपत करने वाले परिसर (भोपाल में ऐसी 900 सोसायटियां हैं)। सोसायटियों के पास कचरा निपटान के 3 विकल्प और 'निगम का चार्ज' नए कानून के तहत सोसायटियों को कचरा प्रबंधन के लिए तीन रास्ते दिए गए हैं। यदि वे तीसरा विकल्प चुनकर कचरा नगर निगम के ग्लोबल ट्रांसफर स्टेशन भेजती हैं, तो उन्हें प्रति टन के हिसाब से यह चार्ज देना होगा: विकल्प 1: वे अपने कैंपस के अंदर ही खुद का प्रोसेसिंग प्लांट लगाएं और गीले कचरे से खाद या बायोगैस बनाकर खुद निपटारा करें। बल्क वेस्ट के नियम: इन 4 शर्तों से तय होंगे 'बड़े कचरा उत्पादक' यदि कोई भी परिसर नीचे दी गई चार शर्तों में से किसी एक को भी पूरा करता है, तो उसे अनिवार्य रूप से 'बल्क वेस्ट जनरेटर' माना जाएगा और पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराना होगा: 1. आवासीय परिसर: 5 एकड़ (20,000 वर्ग मीटर) या उससे अधिक फ्लोर एरिया वाली हाउसिंग सोसाइटी। 2. व्यावसायिक परिसर: 5,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल वाले होटल, मॉल, अस्पताल, मैरिज गार्डन या बाजार। 3. कचरे की मात्रा: रोजाना 100 किलोग्राम या उससे अधिक ठोस कचरा निकालने वाले संस्थान। 4. पानी की खपत : रोजाना 40,000 लीटर या अधिक पानी की खपत करने वाले परिसर (भोपाल में ऐसी 900 सोसायटियां हैं)। सोसायटियों के पास कचरा निपटान के 3 विकल्प और 'निगम का चार्ज' नए कानून के तहत सोसायटियों को कचरा प्रबंधन के लिए तीन रास्ते दिए गए हैं। यदि वे तीसरा विकल्प चुनकर कचरा नगर निगम के ग्लोबल ट्रांसफर स्टेशन भेजती हैं, तो उन्हें प्रति टन के हिसाब से यह चार्ज देना होगा: विकल्प 1: वे अपने कैंपस के अंदर ही खुद का प्रोसेसिंग प्लांट लगाएं और गीले कचरे से खाद या बायोगैस बनाकर खुद निपटारा करें। विकल्प 2: वे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पोर्टल पर रजिस्टर्ड किसी थर्ड पार्टी एजेंसी को यह काम सौंपें। विकल्प 3 (निगम को सौंपने पर प्रति टन दरें): आवासीय सोसायटियां : 2,100 रुपये प्रति टन सरकारी विभाग, स्कूल, कॉलेज: 2,400 रुपये प्रति टन मॉल, होटल, अस्पताल, मैरिज गार्डन: 2,700 रुपये प्रति टन जो सोसायटियां कचरा पूरी तरह से अलग-अलग (सूखा, गीला, सैनिटरी, ई-वेस्ट) छांटकर देंगी, उन्हें सिर्फ 922 रुपये प्रति टन देना होगा। मिक्स कचरा देने पर इन दरों का 150% जुर्माना लगेगा। अब रखने होंगे 4 अलग डस्टबिन शहर की कॉलोनियों में अब आगामी डेढ़ साल के भीतर 4-डस्टबिन मॉडल लागू करना अनिवार्य होगा। आम जनता को अब केवल गीला और सूखा नहीं, बल्कि कुल चार श्रेणियों में कचरा छांटना होगा: 1. गीला कचरा: रसोई का भोजन, फल-सब्जियों के छिलके। 2. सूखा कचरा: रद्दी कागज, गत्ते, प्लास्टिक, कांच, कपड़े। 3. सैनिटरी कचरा: डायपर, सैनिटरी नैपकिन, टिशू पेपर, घरेलू मेडिकल वेस्ट। 4. घरेलू ई-वेस्ट: पुराने मोबाइल, चार्जर, बैटरियां, केमिकल और एक्सपायर्ड दवाइयां। शादी-पार्टी के लिए नया नियम: घर या संस्थान में जन्मदिन, धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम में 100 से अधिक मेहमान शामिल होने पर आयोजन से 3 दिन पहले नगर निगम से अनुमति लेनी होगी।  वे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पोर्टल पर रजिस्टर्ड किसी थर्ड पार्टी एजेंसी को यह काम सौंपें। विकल्प 3 (निगम को सौंपने पर प्रति टन दरें): आवासीय सोसायटियां : 2,100 रुपये प्रति टन सरकारी विभाग, स्कूल, कॉलेज: 2,400 रुपये प्रति टन मॉल, होटल, अस्पताल, मैरिज गार्डन: 2,700 रुपये प्रति टन जो सोसायटियां कचरा पूरी तरह से अलग-अलग (सूखा, गीला, सैनिटरी, ई-वेस्ट) छांटकर देंगी, उन्हें सिर्फ 922 रुपये प्रति टन देना होगा। मिक्स कचरा देने पर इन दरों का 150% जुर्माना लगेगा। अब रखने होंगे 4 अलग डस्टबिन शहर की कॉलोनियों में अब आगामी डेढ़ साल के भीतर 4-डस्टबिन मॉडल लागू करना अनिवार्य होगा। आम जनता को अब केवल गीला और सूखा नहीं, बल्कि कुल चार श्रेणियों में कचरा छांटना होगा: 1. गीला कचरा: रसोई का भोजन, फल-सब्जियों के छिलके। 2. सूखा कचरा: रद्दी कागज, गत्ते, प्लास्टिक, कांच, कपड़े। 3. सैनिटरी कचरा: डायपर, सैनिटरी नैपकिन, टिशू पेपर, घरेलू मेडिकल वेस्ट। 4. घरेलू ई-वेस्ट: पुराने मोबाइल, चार्जर, बैटरियां, केमिकल और एक्सपायर्ड दवाइयां। शादी-पार्टी के लिए नया नियम: घर या संस्थान में जन्मदिन, धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम में 100 से अधिक मेहमान शामिल होने पर आयोजन से 3 दिन पहले नगर निगम से अनुमति लेनी होगी।