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झारखंड राज्यसभा चुनाव में नथवानी फैक्टर! जीत का रिकॉर्ड बरकरार रहेगा या हेमंत सोरेन की रणनीति पड़ेगी भारी?

 नई दिल्ली झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर चुनाव हो रहे हैं. इन राज्यसभा दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवार चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रहे हैं, जिसके चलते गुरुवार को वोटिंग होगी. बीजेपी के समर्थित प्रत्याशी परिमल नाथवानी के उतरने से मुकाबला रोचक बन गया है. इसके साथ ही क्रॉस वोटिंग का खतरा भी बन गया है।  कारोबारी और सांसद के रूप में पहचान रखने वाले नथवानी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनके चुनावी जीत का रिकॉर्ड है. नथवानी अब तक तीन चुनाव जीत चुके हैं और कोई चुनाव नहीं हारे हैं. चौथी बार राज्यसभा चुनाव के लिए मैदान में उतरे हैं, लेकिन जीत के लिए बीजेपी का समर्थन ही काफी नहीं है।  झारखंड की सियासत में सीएम हेमंत सोरेन के अगुवाई में जेएमएम और कांग्रेस ने दोनों राज्यसभा सीटें जीतने की रणनीति बनाई है. जेएमएम-कांग्रेस के चक्रव्यूह को तोड़कर क्या परिमल नथवानी एक बार फिर इतिहास रच पाएंगे?  झारखंड की दो सीट पर 3 प्रत्याशी झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए तीन प्रत्याशी मैदान में है. जेएमएम से बैजनाथ राम और कांग्रेस से प्रणव झा चुनाव लड़ रहे हैं तो निर्दलीय तौर पर परिमल नथवानी किस्मत आजमा रहे हैं. नथवानी को बीजेपी का समर्थन है, जिसके चलते मुकाबला रोचक हो गया है. राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए कम से कम 28 विधायकों का प्रथम वरीयता के आधार पर वोट चाहिए।  झारखंड विधानसभा में महागठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं, जिनमें जेएमएम के 34, कांग्रेस के 16, आरजेडी के 4 और लेफ्ट के दो विधायक हैं. वहीं, एनडीए के पास 24 विधायक है, जिसमें बीजेपी से 21, आजसू 1, जेडीयू 1, एलजेपी के 1 विधायक हैं. इस तरह से परिमल नथवानी को जीत दर्ज करने के लिए 4 अतरिक्त वोटों की जरूरत है।  क्रॉस वोटिंग का खतरा मंडरा रहा विधानसभा में नंबर गेम के लिहाज से जेएमएम की जीत तय है, लेकिन कांग्रेस के लिए महागठबंधन को एकजुट रखना होगा. विधानसभा में महागठबंधन के पास 56 विधायकों का समर्थन है, जिसके लिहाज से दोनों ही सीटें जीत सकती है, लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में परिमल नथवानी के उतरने व बीजेपी के समर्थन से मुकाबला रोचक हो गया है. इसके साथ ही क्रॉस वोटिंग का खतरा बनता दिख रहा है।  राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए महागठबंधन के पास नंबर पूरे हैं, लेकिन परिमल नथवानी को बीजेपी के समर्थन करने के बाद भी 4 अतरिक्त वोटों की जरूरत है. ऐसे में क्रॉस वोटिंग का खतरा साफ नजर आ रहा है. नथवानी अपनी जीत के लिए पूरी ताकत लगा दी है तो कांग्रेस और जेएमएम अपने खेमे को बचाए रखने के लिए पूरी ताकत झोंक रखी है।  परिमल नथवानी कभी चुनाव नहीं हारे  परिमल नथवानी का झारखंड के साथ पुराना और गहरा नाता है और मंझे हुए सियासी खिलाड़ी हैं. नथवानी मुख्य तर पर कारोबारी हैं और रिलाइंस से जुड़े हुए हैं, लेकिन सियासी पिच पर उतरे तो अपना पहला राज्यसभा चुनाव 2008 में झारखंड से लड़ा. परिमल नथवानी ने निर्दलीय उम्मीदवार को रूप में किस्मत आजमाया था,  लेकिन उन्हें विभिन्न दलों के विधायकों का समर्थन मिला. उस समय क्रॉस वोटिंग ने उनकी राह आसान की और वे राज्यसभा पहुंचने में सफल रहे. आरजेडी के विधायकों का समर्थन उन्हें मिला था, जिसके दम पर जीतने में सफल रहे।  जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन अपने विधायकों को एकजुट रखने की चुनौती से जूझ रहा है. नथवानी की उम्मीदवारी को लेकर एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि वे झारखंड की राजनीति में दलगत सीमाओं से ऊपर स्वीकार्यता रखने वाले नेताओं में गिने जाते हैं. ऐसे में सवाल यही है कि क्या परिमल नथवानी अपने अजेय चुनावी रिकॉर्ड को बरकरार रखते हुए चौथी बार राज्यसभा पहुंचेंगे, या फिर झारखंड की बदलती राजनीतिक गणित उनके विजय अभियान पर विराम लगाएगी।  2014 में नथवानी ने दूसरी बार झारखंड से राज्यसभा का चुनाव लड़ा. भाजपा और आजसू के समर्थन से उन्होंने नामांकन दाखिल किया और निर्विरोध निर्वाचित हो गए. इस जीत ने उन्हें झारखंड से लगातार दूसरी बार राज्यसभा पहुंचाने का रिकॉर्ड दिया. वे झारखंड से दूसरी बार राज्यसभा पहुंचने वाले एकलौते निर्दलीय सांसद बने।  परमिल नथवानी का तीसरा बड़ा चुनाव 2020 में हुआ, लेकिन इस बार मैदान झारखंड नहीं बल्कि आंध्र प्रदेश को चुनाव. वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के समर्थन से वे राज्यसभा के लिए चुने गए और संसद के उच्च सदन में अपना तीसरा कार्यकाल शुरू किया. इस तरह लगातार तीसरी बार राज्यसभा सांसद बने।    नथवानी क्या चौथी बार जीत दर्ज करेंगे अब 2026 के राज्यसभा चुनाव में परिमल नथवानी ने झारखंड से लड़ने का फैसला किया. एक बार फिर निर्दलीय प्रत्याशी उतरे, लेकिन बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का समर्थन हासिल है. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा की रणनीति केवल सीट जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता पक्ष में संभावित क्रॉस वोटिंग की संभावना को भी भुनाने की है। 

राष्ट्रपति के स्वागत को तैयार ओंकारेश्वर, कड़ी सुरक्षा के बीच कई मार्ग डायवर्ट; MP दौरे की शुरुआत आज

ओंकारेश्वर  महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 18 से 22 जून तक मध्य प्रदेश दौरे पर होंगी, जिसमें से 18 और 19 जून को वे ओंकारेश्वर में होंगी।  राष्ट्रपति के दौरे को लेकर तीर्थ नगरी पूरी तरह हाई-सिक्योरिटी जोन में तब्दील हो गई है. जिला प्रशासन, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने राष्ट्रपति की सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए विशेष सुरक्षा व्यवस्था की है. कार्यक्रम स्थल, मंदिर परिसर, हेलीपेड, वीआईपी मार्गों और आसपास के क्षेत्रों में कड़ी निगरानी रखी जा रही है।  ओंकारेश्वर रहेगा नो-ड्रोन एरिया कलेक्टर ऋषव गुप्ता द्वारा जारी आदेश के अनुसार, '' 17 से 19 जून तक संपूर्ण ओंकारेश्वर क्षेत्र और कोठी हेलीपेड के आसपास दो किलोमीटर का दायरा 'नो-ड्रोन जोन' घोषित किया गया है. इस अवधि में किसी भी प्रकार के ड्रोन या ड्रोन कैमरे के संचालन पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा. आदेश का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।  इन वस्तुओं के साथ कार्यक्रम स्थल में प्रवेश प्रतिबंधित सुरक्षा कारणों से कार्यक्रम स्थल पर ड्रोन, धारदार हथियार, पानी की बोतलें, ज्वलनशील पदार्थ, पटाखे, लाठी-डंडे, छाते, औजार, तंबाकू उत्पाद, बैग, झोले तथा अन्य संदिग्ध सामग्री ले जाने पर प्रतिबंध लगाया गया है. सभी आगंतुकों को सुरक्षा जांच के बाद ही प्रवेश दिया जाएगा।  तीन दिन बदली रहेगी ओंकारेश्वर में यातायात व्यवस्था राष्ट्रपति के दौरे को देखते हुए 17 जून से 19 जून दोपहर 12 बजे तक विशेष यातायात व्यवस्था लागू रहेगी. इंदौर-खंडवा मार्ग पर भारी वाहनों को वैकल्पिक मार्गों से भेजा जाएगा, जिससे ओंकारेश्वर क्षेत्र में यातायात का दबाव कम रहे और सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित न हो।  श्रद्धालुओं के लिए विशेष पार्किंग व्यवस्था इंदौर, खंडवा और मूंदी की ओर से आने वाले श्रद्धालुओं के वाहनों को ट्रेंचिंग ग्राउंड (नया बस स्टैंड) और ताम्रकर (गणेश नगर) पार्किंग में खड़ा कराया जाएगा. यहां से श्रद्धालुओं को पैदल मंदिर और घाट क्षेत्र तक जाना होगा. वही, बसों की पार्किंग मोरटक्का में रहेगी, जहां से प्रशासन द्वारा विशेष परिवहन सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।  राष्ट्रपति के काफिले के दौरान रहेगा नो-व्हीकल जोन राष्ट्रपति के काफिले के आवागमन के दौरान सुरक्षा कारणों से निर्धारित मार्गों पर अस्थाई रूप से नो-व्हीकल जोन लागू किया जाएगा. राष्ट्रपति के गंतव्य तक पहुंचने के बाद यातायात को पुनः सामान्य कर दिया जाएगा।      सिंहस्थ 2028 में AI बताएगा कब आएगा आंधी-तूफान! करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए हाईटेक सिक्योरिटी प्लान     जंगल की सुरक्षा में तैनात फायर फाइटर की टाइगर ने ली जान, कान्हा टाइगर रिजर्व में खौफनाक घटना जिला प्रशासन और यातायात पुलिस ने श्रद्धालुओं तथा स्थानीय नागरिकों से सहयोग की अपील करते हुए कहा है कि वे निर्धारित पार्किंग और डायवर्जन व्यवस्था का पालन करें, प्रतिबंधित सामग्री साथ न लाएं और यात्रा के लिए पर्याप्त समय लेकर निकलें।  भारी वाहनों का रूट बदला गया     इंदौर-इच्छापुर मार्ग पर चलने वाले भारी मालवाहक वाहनों को डायवर्ट किया जाएगा।     इंदौर से खंडवा जाने वाले भारी वाहन तेजाजी नगर, महू, मानपुर, धामनोद, खरगोन, भीकनगांव और देशगांव होते हुए खंडवा जाएंगे।     सिमरोल से आने वाले वाहन मंडलेश्वर, कसरावद, खरगोन, भीकनगांव और देशगांव होकर खंडवा पहुंचेंगे।     बड़वाह से आने वाले वाहन मंडलेश्वर, कसरावद, खरगोन और भीकनगांव के रास्ते खंडवा जाएंगे।     खंडवा से इंदौर जाने वाले भारी वाहन भीकनगांव, खरगोन और कसरावद होकर जाएंगे।     मंडलेश्वर से आने वाले वाहन कसरावद और खलघाट के रास्ते इंदौर पहुंच सकेंगे। श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्था 18 और 19 जून को ओंकारेश्वर आने वाले श्रद्धालुओं के वाहनों को निर्धारित पार्किंग में खड़ा कराया जाएगा।     इंदौर की ओर से आने वाले छोटे और मध्यम वाहन बड़वाह, मोरटक्का, सनावद और इनपुन होते हुए ट्रेंचिंग ग्राउंड और ताम्रकर पार्किंग तक जाएंगे।     खंडवा और मूंदी की ओर से आने वाले वाहन भी सनावद और इनपुन के रास्ते इन्हीं पार्किंग स्थलों तक पहुंचेंगे     पार्किंग से श्रद्धालुओं को पैदल दर्शन और स्नान के लिए जाना होगा। बसों के लिए व्यवस्था     इंदौर और खंडवा से आने वाली श्रद्धालुओं की बसें मोरटक्का में पार्क की जाएंगी।     वहां से प्रशासन द्वारा लोक परिवहन के जरिए श्रद्धालुओं को ओंकारेश्वर पहुंचाया जाएगा।     नियमित रूट की बसों को सनावद और इनपुन होते हुए पी-01 पार्किंग तक भेजा जाएगा। इसके आगे पैदल जाना होगा।     कुछ समय के लिए रास्ते बंद रह सकते हैं। कुछ मार्ग नो व्हीकल जोन रहेंगे राष्ट्रपति के काफिले के गुजरने के दौरान सुरक्षा कारणों से कुछ मार्गों को अस्थायी रूप से नो व्हीकल जोन बनाया जाएगा। राष्ट्रपति के गंतव्य तक पहुंचने के बाद यातायात सामान्य कर दिया जाएगा। प्रशासन की अपील पुलिस और जिला प्रशासन ने श्रद्धालुओं एवं आम लोगों से ट्रैफिक डायवर्जन और पार्किंग व्यवस्था का पालन करने तथा यात्रा के लिए अतिरिक्त समय लेकर निकलने की अपील की है।

ईरान को ट्रंप की खुली चेतावनी, G7 मंच से बोले- समझौता नहीं हुआ तो सैन्य कार्रवाई फिर संभव

वाशिंगटन ईरान के साथ चल रही बातचीत के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पीस डील को लेकर बेहद सख्त संकेत दिया है. अरब रिपब्लिक ऑफ मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सिसी के साथ द्विपक्षीय बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि ईरान से जुड़ा मौजूदा मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MOU) अभी अंतिम रूप में नहीं है. यदि उन्हें ये समझौता पसंद नहीं आया, तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई के रास्ते पर वापस लौट सकता है।  राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत के बाद एक बेहद मजबूत डील तैयार की गई है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अभी तक कोई पूरी तरह नहीं जानता कि इसका अंतिम स्वरूप क्या होगा।  उनका दावा था कि ज्यादातर लोग इस समझौते से खुश नजर आ रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि इस समझौते का विकल्प पूरी दुनिया में आर्थिक अस्थिरता और मंदी हो सकता है. कुछ लोग दुनिया में मंदी देखना चाहते हैं।  ट्रंप ने कहा कि जो लोग दुनिया में मंदी देखना चाहते हैं, वे बेवकूफ हैं. उनके मुताबिक ऐसे लोग वैश्विक अर्थव्यवस्था और स्थिरता की अहमियत नहीं समझते. ट्रंप ने यह भी कहा, "नंबर एक, स्ट्रेट कभी नहीं खुलेगा।  हालांकि उन्होंने यह साफ नहीं किया कि वह किस समुद्री मार्ग की बात कर रहे थे. इसके अलावा ट्रंप ने अमेरिका की ओर से ईरान में बड़े निवेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें 300 बिलियन डॉलर की बात है।  उन्होंने कहा कि ऐसी खबरें पूरी तरह झूठी हैं. अमेरिका इस समझौते के हिस्से के रूप में किसी तरह का 300 बिलियन डॉलर का निवेश नहीं कर रहा है. ईरान के साथ बातचीत की स्थिति स्पष्ट करते हुए ट्रंप ने कहा कि मौजूदा MOU अभी फाइनल नहीं हुआ है।  उन्होंने कहा कि यदि उन्हें अंतिम एग्रीमेंट पसंद नहीं आया तो अमेरिका युद्ध में लौट सकता है. उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में सैन्य कार्रवाई का विकल्प मेज पर होगा।  जी7 शिखर सम्मेलन में ट्रंप के इस बयान को ईरान के लिए सीधी चेतावनी माना जा रहा है. एक तरफ अमेरिका समझौते की संभावना को खुला रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ यह संदेश भी दे रहा है कि वो अपने रणनीतिक हितों से किसी तरह का समझौता नहीं केरगा।  अब्देल फत्ताह अल-सिसी के साथ हुई इस बैठक ने साफ कर दिया है कि ईरान पर अमेरिकी नीति अभी भी डिप्लोमेसी और दबाव के दोहरे फार्मूले पर बढ़ रही है। 

होर्मुज मार्ग खुला, भारत की बढ़ी ऊर्जा सुरक्षा; भरपूर LNG से दूर होगी गैस की किल्लत

नई दिल्ली ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौता और इसके साथ ही होर्मुज स्ट्रेट के दोबारा खुलने के बीच भारत के लिए डबल खुशखबरी आई है. एक तरफ तो होर्मुज में महीनों से फंसे तेल-गैस भरे जहाज अब वहां से भारत की तरफ से रवाना होने लगे हैं. इसमें पहले जहाज दिशा 62000 हजार क्यूबिक टन एलएनजी लेकर होर्मुज पार करके भारत के सफर पर निकल चुका है और इसके साथ 34 दूसरे जहाजों की भी रवानगी का रास्ता साफ हो चुका है. वहीं इस बीच दुनिया के सबसे बड़े एनएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) निर्यातकों में शामिल कतर ने संकेत दिया है कि जैसे ही होर्मुज में जहाजों की आवाजाही सामान्य होगी, वह रिकॉर्ड गति से गैस उत्पादन बढ़ाना शुरू कर देगा. इसका सीधा फायदा भारत जैसे बड़े आयातक देशों को मिलने वाला है।  बिजनस समाचार आउटलेट ब्लूमबर्ग के मुताबिक, कतर की सरकारी ऊर्जा कंपनी कतर एनर्जी ने अपने खरीदारों को बताया है कि होर्मुज के सुरक्षित रूप से खुलने के एक महीने के भीतर वह अपनी एनएलजी उत्पादन क्षमता को करीब 50 फीसदी तक बहाल कर देगी. इसके बाद अगले एक महीने में उत्पादन बढ़ाकर लगभग 80 फीसदी तक पहुंचाने की योजना है. यानी सिर्फ दो महीने के भीतर दुनियाभर के बाजार में गैस की आपूर्ति तेजी से बढ़ सकती है।  भारत के लिए क्यों अहम है यह खबर? भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित एनएलजी से पूरा करता है और इसमें कतर उसकी सबसे बड़ी सप्लाई लाइनों में से एक है. भारत और कतर के बीच लंबे समय से गैस आपूर्ति का समझौता है. ऐसे में कतर से सप्लाई बढ़ने का मतलब है कि भारत को गैस की उपलब्धता बेहतर होगी और उद्योगों, बिजली उत्पादन तथा शहरों में गैस वितरण पर दबाव कम होगा।  हाल के महीनों में ईरान की इजरायल और अमेरिका के साथ जंग के कारण होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही रुक गई है. इसकी वजह से ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई थी और LNG की आपूर्ति पर भी असर पड़ा था।  दुनिया का सबसे बड़ा LNG हब फिर होगा एक्टिव कतर का रास लाफान (Ras Laffan) एलएनजी कॉम्प्लेक्स दुनिया की सबसे बड़ी गैस निर्यात सुविधाओं में गिना जाता है. पिछले साल अकेले इसी परिसर से दुनिया की कुल LNG आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा निर्यात किया गया था. लेकिन मार्च में ईरानी मिसाइल हमलों और उसके बाद क्षेत्रीय संघर्ष के चलते इस विशाल परियोजना का संचालन बुरी तरह प्रभावित हुआ।  युद्ध के शुरुआती दिनों में कतर को अपने एनएलजी टर्मिनलों का संचालन सीमित करना पड़ा था. होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी के कारण बड़े गैस जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई थी. नतीजतन वैश्विक बाजार में गैस की उपलब्धता पर दबाव बढ़ गया।  हालात सामान्य होने में लगेगा समय हालांकि कतर तेजी से उत्पादन बढ़ाने की तैयारी कर रहा है, लेकिन पूरी क्षमता से वापसी में अभी समय लगेगा. जानकारी के अनुसार रास लाफान संयंत्र की दो उत्पादन इकाइयों को गंभीर नुकसान पहुंचा था. इनकी मरम्मत और पूर्ण बहाली में कई साल लग सकते हैं।  फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि एक महीने में 50 फीसदी और दो महीने में 80 फीसदी क्षमता तक पहुंचना उम्मीद से कहीं तेज रिकवरी है. यही वजह है कि ऊर्जा बाजार इस खबर को बेहद सकारात्मक मान रहा है।  सस्ती हो जाएगी गैस अगर कतर योजना के मुताबिक उत्पादन बढ़ाने में सफल रहता है और होर्मुज मार्ग पूरी तरह सुरक्षित हो जाता है, तो अंतरराष्ट्रीय LNG कीमतों पर दबाव कम हो सकता है. इसका फायदा भारत को सस्ती गैस और ऊर्जा सुरक्षा के रूप में मिल सकता है।  यानी भारत के लिए यह सचमुच ‘डबल खुशखबरी’ है. एक तरफ होर्मुज के खुलने से सप्लाई चेन सामान्य होगी, दूसरी तरफ कतर से LNG की भारी आपूर्ति शुरू होने की उम्मीद है. इससे हाल के महीनों में बनी गैस की किल्लत और बाजार की अनिश्चितता काफी हद तक दूर हो सकती है। 

ब्रह्मपुत्र पर चीन का मेगा प्रोजेक्ट, भारत पर क्या होगा असर? सीमा के करीब बन रहा विशाल बांध

नई दिल्ली  चीन हमेशा से भारत के खिलाफ नई-नई साजिश रचते रहता है. एक बार फिर चीन ने बॉर्डर के पास बड़ी साजिश रचने की कोशिश में है. दरअसल तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर दुनिया के सबसे बड़े बांध का निर्माण चीन ने शुरू कर दिया है. इस निर्माण ने एक बार फिर भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि यह मेगा प्रोजेक्ट भारतीय सीमा से सिर्फ 50 किलोमीटर दूर बनाया जा रहा है. ब्रह्मपुत्र जैसी जीवनदायिनी नदी पर चीन का यह प्रोजेक्ट है. चिंता इस बात की है कि यदि चीन भविष्य में पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने की स्थिति में पहुंचता है तो इसका असर करोड़ों लोगों की जिंदगी, खेती और पर्यावरण पर पड़ सकता है. यही वजह है कि भारत इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद सतर्क नजर बनाए हुए है।  तिब्बत से निकलने वाली यारलुंग त्सांगपो नदी भारत में प्रवेश करने के बाद सियांग और फिर ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है. यह नदी अरुणाचल प्रदेश और असम की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है. लाखों किसान इसकी जलधारा पर निर्भर हैं. ऐसे में नदी के ऊपरी हिस्से में चीन का विशाल बांध बनाना केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं बल्कि भू-राजनीतिक चुनौती भी माना जा रहा है. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार भारत को आशंका है कि बांध के कारण नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हो सकता है, इससे कभी अचानक बाढ़ और कभी पानी की कमी जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. हाल के सैटेलाइट चित्रों और खुफिया रिपोर्टों ने यह संकेत दिया है कि चीन इस प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ा रहा है, जिससे नई दिल्ली की चिंताएं और बढ़ गई हैं।  सीमा के करीब चीन का मेगा डैम, क्यों बढ़ी चिंता?     चीन ने तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी के निचले हिस्से पर दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोपावर बांध के निर्माण की आधिकारिक शुरुआत कर दी है. यह स्थान अरुणाचल प्रदेश की सीमा से लगभग 50 किलोमीटर दूर बताया जा रहा है. भारत लंबे समय से इस प्रोजेक्ट को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त करता रहा है. भारत का मानना है कि सीमा पार बहने वाली नदियों पर किसी भी बड़े निर्माण से पहले संबंधित देशों के बीच पारदर्शिता और समन्वय जरूरी है. हालांकि चीन ने अब तक अपने प्रोजेक्ट को केवल बिजली उत्पादन से जुड़ा कदम बताया है।      यारलुंग त्सांगपो नदी हिमालयी क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में गिनी जाती है. यह तिब्बत से निकलकर भारत में सियांग के रूप में प्रवेश करती है और आगे असम में ब्रह्मपुत्र बन जाती है. इसी कारण नदी के ऊपरी हिस्से में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे तौर पर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को प्रभावित कर सकता है. बड़े पैमाने पर जल संग्रहण और प्रवाह नियंत्रण से नदी की प्राकृतिक व्यवस्था बदल सकती है।      इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि वह ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन से जुड़ी हर गतिविधि पर लगातार नजर रख रही है. सरकार के अनुसार चीन की हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स और बांध निर्माण से जुड़े सभी घटनाक्रमों का अध्ययन किया जा रहा है. इसके साथ ही प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को भी मजबूत किया जा रहा है।  कृषि और पर्यावरण पर पड़ सकता है असर सबसे बड़ी चिंता नदी के प्रवाह में संभावित बदलाव को लेकर है. यदि किसी कारण से पानी का बहाव कम या अधिक होता है तो अरुणाचल प्रदेश और असम की कृषि व्यवस्था प्रभावित हो सकती है. ब्रह्मपुत्र घाटी की लाखों हेक्टेयर खेती इस नदी के पानी पर निर्भर करती है. पानी की कमी होने पर फसलों का उत्पादन प्रभावित होगा, जबकि अचानक अधिक पानी छोड़े जाने पर बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है. पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह प्रोजेक्ट संवेदनशील मानी जा रही है. नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव से जलीय जीवों, वनस्पतियों और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र पहले ही जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना कर रहा है. ऐसे में इतने बड़े बांध का प्रभाव लंबे समय तक महसूस किया जा सकता है।  भारत की जवाबी रणनीति क्या है?     भारत केवल चिंता जताने तक सीमित नहीं है. सरकार ने चीन के सामने कई बार सीमा पार नदी प्रोजेक्टओं में पारदर्शिता और डेटा साझा करने की मांग रखी है. भारत चाहता है कि चीन किसी भी बड़े जल प्रोजेक्ट से पहले निचले प्रवाह वाले देशों को जानकारी दे और नियमित रूप से जल स्तर का डेटा उपलब्ध कराए।      इसके अलावा भारत पूर्वोत्तर राज्यों में बाढ़ की पहले से चेतावनी देने वाली व्यवस्था, नदियों की निगरानी और आपदा से निपटने की तैयारियों को मजबूत कर रहा है. आधुनिक तकनीक के जरिए नदी के जलस्तर और प्रवाह की निगरानी बढ़ाई जा रही है. इससे किसी भी संभावित आपात स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया दी जा सकेगी।  क्या पानी बन सकता है रणनीतिक हथियार? अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पानी को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है. भविष्य में जल संसाधन भू-राजनीतिक शक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकते हैं. चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र के ऊपरी हिस्से में बड़े बांधों का निर्माण इसी बहस को और मजबूत करता है. हालांकि चीन बार-बार कहता रहा है कि उसका उद्देश्य केवल ऊर्जा उत्पादन है. लेकिन भारत सहित कई देशों की चिंताएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं. भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि ब्रह्मपुत्र नदी का प्राकृतिक प्रवाह और पूर्वोत्तर राज्यों की जल सुरक्षा प्रभावित न हो. यही कारण है कि नई दिल्ली इस प्रोजेक्ट पर लगातार निगरानी रख रही है और कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रिय बनी हुई है। 

युद्ध पर G7 की बड़ी पहल, एक सुर में बोले सदस्य देश- तुरंत लागू हो युद्धविराम

पेरिस  फ्रांस में G7 समिट के आखिरी दिन सुबह यानी बुधवार को मीटिंग हुई. इस मीटिंग में संयुक्त बयान सभी देशों की तरफ से जारी किया गया. इसमें G7 के देशों ने लेबनान में तुरंत युद्ध विराम की मांग की।  द गार्जियन के मुताबिक, ज्वाइंट स्टेटमेंट में जारी बयान में कहा गया कि हम लेबनान में तुरंत और मजबूत सीजफायर की मांग करते हैं. साथ ही इसके जरिए लेबनान की लीडरशिप की उन कोशिशों का समर्थन करते हैं, जिनका मकसद हिज्बुल्लाह को वेपन फ्री, हथियारों पर सरकार की मॉनोपोली और इंटरनेशनल सिक्योरिटी की गारंटी के साथ अपने देश की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा करना है।  इस बैठक में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी मौजूद रहे. डील के बाद भी इजरायल ने कल साउथ लेबनान पर हमला किया. इस हमले में चार लोगों की मौत की पुष्टी हुई है. यह हमला ऐसे वक्त हुआ, जब जी7 के लिए प्रमुख देश फ्रांस में इकट्ठा हुए हैं. इससे पहले पीएम मोदी ने युद्ध का स्थायी समाधान करने की मांग की है. पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात ने भी इस बैठक में सुर्खियां बटौरी हैं।  कनाडा के पीएम ने डील को बताया गेमचेंजर इधर, कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने मिडिल ईस्ट में तनाव खत्म करने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच डील को गेमचेंजर बताया. फ्रांस समिट में आखिरी दिन बात करते हुए, सीएनएन से उन्होंने कहा कि सिर्फ इस स्थिति के लिए नहीं, बल्कि यह हमें. और बैठक में यही हुआ. हमने यूक्रेन को लेकर अभी नए नजरिए से बात की है।  NATO ने किया ईरान और यूएस डील का स्वागत  इधर, NATO के सचिव जनरल मार्क रुटे ने मिडिल ईस्ट में युद्ध खत्म करने के लिए ईरान और यूएस डील का स्वागत किया है. उन्होंने कहा है कि हॉर्मुज को फिर से खोलने की योजना बहुत बड़ा कदम होगी. प्रेस ब्रीफिंग में उन्होंने कहा कि मुझे पता है कि फ्रांस और यूके के नेतृत्व वाली पहल के जरिए कई सहयोगी देश सपोर्ट में हैं।