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कचरे से कमाई का कमाल! पन्ना में ग्रामीण महिलाएं प्लास्टिक से बना रहीं खूबसूरत स्मृति चिन्ह

पन्ना   पन्ना राष्ट्रीय उद्यान के आसपास के वन गांवों में कभी झाड़ियों और जंगल के किनारे दिखाई देने वाला प्लास्टिक अब ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार का जरिया बन रहा है। जिस कचरे से वन्यजीवों को खतरा पैदा होता था, उसे महिलाएं साफ करने के बाद प्रोसेस कर बैग, फोल्डर, स्टेशनरी और स्मृति चिन्ह जैसे उपयोगी उत्पाद तैयार कर रही हैं। इन उत्पादों को पर्यटक अपने साथ यादगार के तौर पर ले जा रहे हैं। 2022 में शुरू हुआ प्रोजेक्ट क्लीन डेस्टिनेशंस मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड ने वर्ष 2022 में पन्ना पार्क में 'प्रोजेक्ट क्लीन डेस्टिनेशंस' शुरू किया था। इसका उद्देश्य बढ़ते प्लास्टिक कचरे से निपटने के लिए केवल समय-समय पर सफाई अभियान चलाना नहीं, बल्कि एक स्थायी और सामुदायिक कचरा प्रबंधन व्यवस्था तैयार करना था। यह पहल 14 ग्राम पंचायतों के 30 गांवों में लागू की गई। अब तक इन क्षेत्रों से 45 टन से अधिक कचरा एकत्र कर उसकी छंटाई और वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेसिंग की जा चुकी है। प्लास्टिक से तैयार हो रहे उपयोगी प्रोडक्ट कचरे की छंटाई के बाद करीब 42 प्रतिशत गैर-पुनर्चक्रण योग्य प्लास्टिक इकोकारी को भेजा जाता है। यह एक सामाजिक उद्यम है, जो प्लास्टिक को उपयोगी सामग्री में बदलने का काम करता है। इसके बाद गांवों की वर्कशॉप में महिलाएं प्रोसेस किए गए प्लास्टिक से अलग-अलग उत्पाद तैयार करती हैं। इसके लिए पारंपरिक चरखे और हथकरघे का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह प्लास्टिक कचरे को उत्पाद में बदलने के साथ पारंपरिक कारीगरी को भी नए पर्यावरणीय उद्देश्य से जोड़ा गया है। महिलाओं के लिए रोजगार से आगे की पहल इस प्रोजेक्ट का मकसद केवल महिलाओं को काम या वेतन उपलब्ध कराना नहीं है। इसके जरिए ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण, आय और आर्थिक आत्मनिर्भरता के नए अवसर मिल रहे हैं। वहीं पर्यटकों के लिए तैयार किए गए स्मृति चिन्ह पन्ना के जंगलों और उन समुदायों से जुड़ी याद बन रहे हैं, जो इनके संरक्षण में योगदान दे रहे हैं। इस मॉडल में पर्यटन से पैदा होने वाला कचरा उसी गंतव्य के आसपास एकत्र होता है। फिर उसे स्थानीय स्तर पर अलग कर प्रोसेस किया जाता है और पारंपरिक शिल्प के जरिए नए उत्पाद में बदला जाता है। इसके बाद वही उत्पाद पर्यटन अर्थव्यवस्था में वापस पहुंचता है। 2025 में बांधवगढ़ तक पहुंचा मॉडल पन्ना में शुरू हुआ यह प्रयोग अब आगे बढ़ चुका है। 2025 में मध्य प्रदेश ने इस मॉडल को बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के आसपास के गांवों तक विस्तार दिया। राज्य का ग्रामीण पर्यटन मिशन अब 100 से अधिक गांवों को कवर करता है और 300 से अधिक महिलाओं के स्वामित्व वाले होमस्टे और नेचर भ्रमण स्थलों को समर्थन दे रहा है। इसमें प्राणपुर भी शामिल है, जिसे भारत के पहले हथकरघा शिल्प गांव के रूप में प्रमोट किया जा रहा है। यहां महिलाएं हथकरघा कैफे भी संचालित करती हैं। स्वच्छ वातावरण के लिए मिला SKOCH Silver Award इस प्रोजेक्ट को 2025 में स्वच्छ वातावरण के लिए SKOCH Silver Award से सम्मानित किया गया। राज्य सरकार ने उद्योग मानकों के अनुरूप पर्यावरणीय, सामाजिक और शासन यानी ESG फ्रेमवर्क अपनाने का भी उल्लेख किया है। मध्य प्रदेश की जिम्मेदार पर्यटन रणनीति में प्लास्टिक-मुक्त वन्यजीव क्षेत्र, इलेक्ट्रिक-व्हीकल मोबिलिटी, कम-कार्बन आर्किटेक्चर और सामुदायिक आजीविका को एक साथ जोड़ा जा रहा है। ऐसे में पन्ना का मॉडल सिर्फ सफाई अभियान नहीं, बल्कि संरक्षण के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को जोड़ने वाली पहल के रूप में सामने आ रहा है।

चीता प्रोजेक्ट में बड़ा कदम, कूनो से गांधीसागर जाएगी एक और मादा चीता; निर्वा या वीरा में से होगा चयन

श्योपुर  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन और भारत में चीता पुनर्वास परियोजना के चार वर्ष पूरे होने के मौके पर मध्य प्रदेश में चीतों को लेकर एक और बड़ा कदम उठाने की तैयारी है। 17 सितंबर को कूनो नेशनल पार्क से एक मादा चीता को गांधीसागर राष्ट्रीय अभयारण्य में शिफ्ट किए जाने की योजना पर विचार चल रहा है। हालांकि, शिफ्टिंग का अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अनुमति के बाद ही लिया जाएगा। अभी यह भी तय नहीं हुआ है कि कूनो से किस मादा चीता को गांधीसागर भेजा जाएगा। सूत्रों के अनुसार, निर्वा और वीरा में से किसी एक को गांधीसागर भेजने पर विचार किया जा रहा है। चीता परियोजना से जुड़े अधिकारी चाहते हैं कि कूनो की तर्ज पर गांधीसागर में भी चीतों की संख्या बढ़े और वहां सफलतापूर्वक वंशवृद्धि का सिलसिला आगे बढ़े। चार साल पहले कूनो में हुई थी चीता प्रोजेक्ट की शुरुआत 17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने जन्मदिन के अवसर पर नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा था। इसके बाद चीता पुनर्वास परियोजना के दूसरे चरण में दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते भारत लाए गए। कूनो में चीतों की संख्या बढ़ने के साथ उनके लिए दूसरे सुरक्षित रहवास की जरूरत महसूस हुई, जिसके बाद गांधीसागर राष्ट्रीय अभयारण्य को दूसरे घर के रूप में विकसित किया गया। पहले दो नर, फिर धीरा को भेजा गया गांधीसागर गांधीसागर में चीतों की आबादी बसाने की दिशा में 20 अप्रैल 2025 को कूनो से दो नर चीतों को यहां शिफ्ट किया गया था। इसके बाद वंशवृद्धि की संभावनाओं को मजबूत करने के लिए 17 सितंबर 2025 को मादा चीता धीरा को गांधीसागर लाया गया। अब परियोजना के तहत एक और मादा चीता को गांधीसागर भेजने की तैयारी है। इससे यहां नर और मादा चीतों का संतुलित समूह तैयार करने तथा भविष्य में वंशवृद्धि को बढ़ावा देने की उम्मीद है। अनुमति का इंतजार वन्यजीव विभाग की पीसीसीएफ डॉ. समीता राजौरा ने बताया कि मादा चीता की शिफ्टिंग को लेकर योजना है। मुख्यमंत्री की अनुमति मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई और किस मादा चीता को गांधीसागर भेजा जाना है, इसका अंतिम निर्णय लिया जाएगा।  

मध्य प्रदेश में 50 लाख ग्रामीणों की संपत्ति होगी मुफ्त रजिस्टर्ड, 17 सितंबर से शुरू होगा विशेष अभियान

 भोपाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से मध्य प्रदेश में जनभागीदारी और जनसेवा को केंद्र में रखकर दो बड़े अभियान शुरू होने जा रहे हैं। स्वामित्व अभियान के तहत प्रदेश के 50 लाख से अधिक ग्रामीणों की संपत्तियों की निश्शुल्क रजिस्ट्री कराकर उन्हें अधिकार अभिलेख सौंपे जाएंगे। वहीं, ‘सेवा से संकल्प’ अभियान के तहत 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक जनसेवा से जुड़े 13 अलग-अलग प्रकल्प संचालित किए जाएंगे। अभियान की शुरुआत 17 सितंबर की शाम सात बजे प्रदेशभर में एक साथ 58 लाख से अधिक दीप प्रज्ज्वलित कर होगी। इसका सबसे बड़ा आयोजन उज्जैन के श्रीमहाकाल महालोक में प्रस्तावित है, जहां 25 लाख से अधिक दीप जलाने की तैयारी की जा रही है। 41,568 गांवों में 68.47 लाख भूखंडों का सर्वे पूरा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गुरुवार को मंत्रालय से वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए सभी संभागायुक्तों और कलेक्टरों को दोनों अभियानों को उत्सव के रूप में आयोजित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि इनमें जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों, युवाओं और आमजन की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित की जाए। स्वामित्व अभियान के तहत प्रदेश के 41,568 गांवों में 68 लाख 47 हजार भूखंडों का सर्वे पूरा हो चुका है। अब इनमें से 50 लाख से अधिक हितग्राहियों के नाम संपत्तियों की निश्शुल्क रजिस्ट्री कराई जाएगी। इसके लिए पंचायत उपकर और अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी से छूट का प्रावधान पहले ही किया जा चुका है। यह अभियान तीन चरणों में 17 सितंबर से 3 अक्टूबर तक चलेगा। हर गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार लगेंगे शिविर मुख्यमंत्री ने कलेक्टरों को अभियान का नेतृत्व स्वयं करने के निर्देश दिए हैं। जिला, जोन और सेक्टर स्तर पर अधिकारियों की जिम्मेदारियां तय की जाएंगी। सरकार का जोर इस बात पर है कि पात्र हितग्राहियों को बिना किसी भेदभाव के निर्धारित समय में लाभ मिले और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहे। मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने ग्राम पंचायत स्तर पर सरपंच, सचिव, पटवारी और रोजगार सहायक को मिलकर शिविर आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। प्रत्येक गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार को लगने वाले इन शिविरों में प्रतिदिन कम से कम 30 से 40 रजिस्ट्रियां कराने का लक्ष्य रखा गया है। ‘आशीर्वाद का दीपक’ से शुरू होगा सेवा से संकल्प अभियान 17 सितंबर से शुरू होने वाले ‘सेवा से संकल्प’ अभियान का पहला प्रमुख कार्यक्रम ‘आशीर्वाद का दीपक’ होगा। शाम सात बजे प्रदेशभर में लाभार्थी परिवारों के घरों के साथ चयनित ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों पर एक साथ दीप प्रज्ज्वलित किए जाएंगे। उज्जैन के श्रीमहाकाल महालोक में अकेले 25 लाख से अधिक दीप जलाने की तैयारी है। कार्यक्रम में सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं के साथ समाज के सभी वर्गों को जोड़ने की योजना है। इसके बाद 17 अक्टूबर तक जनसेवा से जुड़े 13 अलग-अलग प्रकल्पों के माध्यम से अभियान को आगे बढ़ाया जाएगा।

भारत-रूस की डिफेंस पार्टनरशिप को मिलेगी नई धार? S-400, ब्रह्मोस-एनजी और Su-57E पर मंथन संभव

 नई दिल्ली रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत की तीन दिवसीय यात्रा पर पहुंचे हैं. वे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से द्विपक्षीय मुलाकात भी करेंगे. इस मुलाकात में रक्षा सहयोग सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बनने जा रहा है. भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे सैन्य संबंधों में नई ऊंचाई छूने की संभावनाएं हैं।  S-400 मिसाइल सिस्टम, ब्रह्मोस-एनजी मिसाइल अपग्रेड, Su-30एमकेआई फाइटर जेट का अपग्रेड और पांचवीं पीढ़ी का Su-57E लड़ाकू विमान- ये चार प्रमुख मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं. आइए समझते हैं कि इन हथियारों पर क्या डील हो सकती है और भारत के लिए इनका क्या महत्व है।  S-400 मिसाइल सिस्टम: बची हुई डिलीवरी और अतिरिक्त बैटरियों की बात भारत ने 2018 में रूस से पांच S-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने का 5.43 अरब डॉलर का समझौता किया था. इनमें से चार सिस्टम पहले ही आ चुके हैं और तैनात हैं. पांचवां सिस्टम नवंबर 2026 तक आने की उम्मीद है. पुतिन-मोदी मुलाकात में इस अंतिम खेप की समयबद्ध डिलीवरी और रखरखाव पर चर्चा होगी. रूस ने भारत में मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल सुविधा लगाने का भी प्रस्ताव रखा है।  इसके अलावा भारत अतिरिक्त पांच S-400 मिसाइल सिस्टम स्क्वाड्रन खरीदने पर भी विचार कर रहा है. रूस ने इसके लिए करीब 50 हजार करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया है. ये अतिरिक्त सिस्टम पश्चिमी और पूर्वी दोनों मोर्चों पर भारत की एयर डिफेंस क्षमता को दोगुना कर सकते हैं।  S-400 मिसाइल सिस्टम लंबी दूरी तक विमान, मिसाइल और ड्रोन को मार गिराने में सक्षम है. ऑपरेशन सिंदूर में इसकी प्रभावशीलता साबित हो चुकी है. इसलिए अतिरिक्त खरीद भारत की बहुस्तरीय रक्षा व्यवस्था को मजबूत करेगी।  ब्रह्मोस-एनजी: हल्की और ज्यादा घातक मिसाइल का अपग्रेड ब्रह्मोस भारत-रूस का संयुक्त प्रोजेक्ट है और दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक है. अब दोनों देश इसकी नेक्स्ट जनरेशन यानी ब्रह्मोस-एनजी पर काम कर रहे हैं. यह मौजूदा ब्रह्मोस से काफी हल्की है- लगभग 1.3 टन वजन की।  इसकी रेंज 400 किलोमीटर से ज्यादा है. स्पीड 4322 km/hr तक है. छोटी साइज की वजह से तेजस और मिग-29 जैसे विमानों पर कई मिसाइलें लगाई जा सकती हैं. पुतिन के दौरे में ब्रह्मोस-एनजी के विकास, संयुक्त उत्पादन और अपग्रेड पर चर्चा होने की पूरी संभावना है।  रूस ने साफ कहा है कि अब मिसाइल को और बेहतर और ज्यादा बनाने का समय आ गया है. भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एयर, लैंड और सी-बेस्ड प्लेटफॉर्म पर स्ट्राइक क्षमता बढ़ेगी. निर्यात बाजार में भी ब्रह्मोस-एनजी की अच्छी मांग हो सकती है।  Su-30MKI अपग्रेड: सुपर सुखोई बनने की राह भारतीय वायुसेना के पास करीब 260 Su-30MKI लड़ाकू विमान हैं. ये वायुसेना की रीढ़ माने जाते हैं. अब इन्हें सुपर सुखोई कॉन्फिगरेशन में अपग्रेड करने की बड़ी योजना पर चर्चा चल रही है. इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 11 अरब डॉलर से ज्यादा है. अपग्रेड में नए रडार, बेहतर एवियोनिक्स, आधुनिक हथियार सिस्टम और लंबी रेंज की मिसाइलें शामिल होंगी।  यह अपग्रेड चरणबद्ध तरीके से होगा. इससे पुराने विमानों की उम्र बढ़ेगी और वे अगले कई साल तक आधुनिक खतरों से निपटने में सक्षम रहेंगे. भारत अपनी स्वदेशी क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है, इसलिए इस अपग्रेड में भारतीय कंपनियों की भागीदारी भी बढ़ाने की कोशिश होगी. पुतिन-मोदी मुलाकात में इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने पर सहमति बन सकती है।  Su-57E: पांचवीं पीढ़ी के विमान का टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सु-57 रूस का पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है. भारत लंबे समय से अपनी पांचवीं पीढ़ी के विमान एंडवास्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट पर काम कर रहा है, लेकिन वह अभी कई साल दूर है. इस बीच चीन और पाकिस्तान की बढ़ती स्टील्थ क्षमता को देखते हुए भारत के पास अंतरिम समाधान की जरूरत है।  रूस ने भारत को Su-57E (एक्सपोर्ट वर्जन) बेचने के साथ-साथ भारत में संयुक्त उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण का प्रस्ताव दिया है. यहां तक कि पूर्ण तकनीक एक्सेस की बात भी कही गई है।  सीमित संख्या में विमान खरीदकर और बाद में लोकल प्रोडक्शन शुरू करके भारत अपना स्टील्थ गैप भर सकता है. रडार, इंजन और वेपन इंटीग्रेशन जैसी संवेदनशील तकनीकों पर बातचीत चल रही है. यह डील अगर हुई तो भारत-रूस रक्षा संबंधों में नया अध्याय खुलेगा।  भारत के लिए क्या मायने रखती हैं ये डीलें? इन सभी सौदों का उद्देश्य भारत की सैन्य क्षमता को आधुनिक खतरों के अनुरूप बनाना है. S-400 मिसाइल सिस्टम एयर डिफेंस को मजबूत करेगा, ब्रह्मोस-एनजी स्ट्राइक पावर बढ़ाएगा, Su-30MKI अपग्रेड मौजूदा बेड़े को लंबे समय तक उपयोगी बनाएगा. Su-57E भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा।  साथ ही भारत मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहा है, इसलिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और संयुक्त उत्पादन वाले प्रस्ताव ज्यादा आकर्षक हैं. रूस भी अपने रक्षा निर्यात को बढ़ाना चाहता है और भारत जैसे विश्वसनीय साझेदार के साथ गहरी साझेदारी चाहता है. ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान यह मुलाकात सिर्फ द्विपक्षीय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है।  हालांकि फाइनल डील तुरंत नहीं हो सकती, लेकिन दिशा तय हो जाएगी. आने वाले महीनों में इन प्रोजेक्ट्स पर प्रगति देखने को मिलेगी. भारत की सुरक्षा जरूरतों और रणनीतिक स्वायत्तता को ध्यान में रखते हुए ये चर्चाएं बेहद महत्वपूर्ण हैं। 

भारत का न्यूक्लियर शील्ड हुआ मजबूत, 30 नए परमाणु हथियार जोड़ने का दावा; FAS ने बताया पूरा आंकड़ा

 नई दिल्ली अमेरिका की फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स यानी FAS ने हाल ही में भारत के परमाणु हथियारों को लेकर अपना ताजा अनुमान जारी किया है. इस रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास करीब 190 असेंबल किए गए परमाणु हथियार हैं. इनमें से 160 से ज्यादा हथियार ऐसे डिलीवरी सिस्टम से जुड़े हैं जो अभी एक्टिव हैं।  FAS जैसे संगठनों के अनुमान अक्सर वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बनते हैं क्योंकि परमाणु शक्ति वाले देश अपने भंडार की सटीक संख्या सार्वजनिक रूप से नहीं बताते. भारत भी इसी परंपरा का पालन करता है. आधिकारिक तौर पर अपनी संख्या की पुष्टि नहीं करता।  रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत ने जितने लॉन्चर अभी तैयार रखे हैं, उससे ज्यादा हथियार बना लिए हैं. कुल भंडार करीब 190 हथियारों का है जबकि लॉन्चरों से जुड़े हथियार करीब 160 हैं. बाकी अतिरिक्त हथियार उन मिसाइलों के लिए बनाए गए हैं जो अभी उत्पादन या विकास के चरण में हैं।  इनमें अग्नि-प्राइम और लंबी दूरी वाली के-4 जैसी मिसाइलें शामिल हैं. विशेषज्ञों के अनुसार यह कोई अव्यवस्था का संकेत नहीं बल्कि परमाणु रणनीति का सामान्य तरीका है. हथियारों का उत्पादन अक्सर डिलीवरी सिस्टम के सेवा में आने से पहले ही आगे चलता रहता है ताकि जब नए सिस्टम तैयार हों तो हथियार तुरंत उपलब्ध रहें।  अतिरिक्त हथियारों का रणनीतिक मतलब FAS के अनुमान के अनुसार अतिरिक्त हथियार भविष्य की मिसाइलों के लिए रखे गए हैं. जब नए डिलीवरी सिस्टम सर्विस में आते हैं तो उनके लिए पहले से तैयार हथियार उपलब्ध रहने से प्रतिरोधक क्षमता तेजी से मजबूत होती है. यह प्रथा कई परमाणु शक्ति वाले देशों में देखी जाती है।  युद्ध के समय या तनाव की स्थिति में लॉन्चर और हथियार का मेल बैठाना आसान हो जाता है. भारत की परमाणु नीति में विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता पर जोर दिया जाता है. अतिरिक्त हथियार इस क्षमता को समय के साथ बनाए रखने और जरूरत पड़ने पर विस्तार करने में मदद करते हैं।    ये अनुमान बाहरी संगठन के हैं. भारत सरकार आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं करती. इसलिए वास्तविक संख्या इससे कम या ज्यादा हो सकती है. फिर भी FAS जैसी संस्थाओं के आकलन अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक चर्चाओं में महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि वे खुले स्रोतों, सैटेलाइट चित्रों और अन्य सार्वजनिक जानकारियों पर आधारित होते हैं।  नो-फर्स्ट-यूज नीति और परीक्षण रोक कायम रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण बात यह भी उजागर होती है कि भंडार बढ़ने के बावजूद भारत अपनी नो-फर्स्ट-यूज यानी पहले इस्तेमाल न करने की नीति पर कायम है. भारत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह परमाणु हथियारों का इस्तेमाल तभी करेगा जब उस पर परमाणु हमला हो।  यह नीति भारत की परमाणु रणनीति का मूल आधार रही है. इसके अलावा भारत ने स्वयं घोषित परमाणु परीक्षण रोक भी जारी रखी हुई है. 1998 के परीक्षणों के बाद से भारत ने कोई नया परीक्षण नहीं किया है और इस रोक को बनाए रखा है।   भंडार के धीरे-धीरे बढ़ने के बावजूद इन दो नीतियों का जारी रहना भारत के संयमित और जिम्मेदार रुख को दर्शाता है. कई देशों में भंडार बढ़ने के साथ आक्रामक नीतियां भी बदलती देखी गई हैं, लेकिन भारत ने अपनी घोषित स्थिति में बदलाव नहीं किया है. यह वैश्विक परमाणु व्यवस्था में भारत की छवि को स्थिर रखने में मदद करता है।  परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का विकास भारत की परमाणु शक्ति का विकास कई दशकों से चल रहा है. शुरूआती चरण में सीमित क्षमता से लेकर अब ज्यादा एडवांस डिलीवरी सिस्टम तक का सफर तय किया गया है. लैंड बेस्ड मिसाइलें, समुद्र आधारित क्षमता और हवाई प्लेटफॉर्म तीनों पर काम चलता रहा है।  अतिरिक्त हथियारों का निर्माण इसी व्यापक विकास का हिस्सा माना जा सकता है. जब नए सिस्टम जैसे अग्नि-प्राइम या समुद्र आधारित के-4 जैसी मिसाइलें सेवा में आती हैं तो उनके लिए हथियार पहले से तैयार रखना तार्किक कदम है।  यह विकास क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को भी प्रभावित करता है. दक्षिण एशिया में परमाणु शक्ति का संतुलन लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है. भारत अपनी क्षमता को मजबूत करते हुए भी आधिकारिक तौर पर न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता की बात करता रहा है. यानी जरूरत से ज्यादा हथियार जमा करने की बजाय विश्वसनीय और पर्याप्त क्षमता बनाए रखना. FAS के आंकड़े इसी दिशा में धीमी लेकिन निरंतर प्रगति का संकेत देते हैं।  कुछ विश्लेषक अतिरिक्त हथियारों को भविष्य की तैयारियों से जोड़ते हैं. जब उत्पादन लाइन चल रही हो तो हथियारों को पहले तैयार कर लेना व्यावहारिक होता है. लॉन्चर तैयार होने में समय लगता है जबकि हथियार उत्पादन अपेक्षाकृत तेजी से हो सकता है. यह अंतर सामान्य माना जाता है और इसे अव्यवस्थित विस्तार की बजाय योजनाबद्ध तैयारी के रूप में देखा जाता है।  आने वाले वर्षों में भारत की परमाणु क्षमता का स्वरूप नए डिलीवरी सिस्टम के सेवा में आने के साथ और स्पष्ट होगा. अग्नि-प्राइम जैसी मिसाइलें मोबाइल और आधुनिक मानी जाती हैं जबकि के-4 समुद्र आधारित क्षमता को मजबूत करने वाली है. अतिरिक्त हथियार इन सिस्टम के लिए उपलब्ध रहने से समग्र प्रतिरोधक ताकत बढ़ेगी। 

चावल की खेती से निकलती है मीथेन गैस, ग्लोबल वार्मिंग पर IISER भोपाल की रिसर्च ने खींचा ध्यान

भोपाल  आपकी प्लेट में रखा चावल धान के जिन खेतों से आता है वो न सिर्फ जहरीली मीथेन गैस वातावरण में छोड़ते हैं बल्कि ये ग्लोबल वॉर्मिंग भी बढ़ा रहे हैं। आईसर भोपाल और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने पर्यावरण को लेकर एक रिसर्च लेटर प्रकाशित किया है। इनके शोध में जो बात सामने आई है वो बहुत चौकाने वाली है। देश के पानी से भरे धान के खेत जो दुनिया की एक बड़ी आबादी का पेट भर रहे हैं वो हर साल पर्यावरण में 97 लाख टन मीथेन गैस छोड़ रहे हैं। कार्बनडाई ऑक्साइड की तुलना में मीथेन गैस पर्यावरण में कम समय के लिए रहती है, लेकिन यह अपने अंदर गर्मी को बनाए रखती है। इसकी वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी होती है। दोनों संस्थानों के वैज्ञानिकों ने इसके लिए यूरोप कॉपरनिकस प्रोग्राम के सैटेलाइट डाटा का उपयोग किया। इसमें 10 मीटर रिजॉल्यूशन पर धान के खेत का नक्शा बनाया गया। इसमें यह सामने आया कि मीथेन गैस का उत्सर्जन सबसे ज्यादा कहां और कब होता है। इस शोध से जुड़े आईसर के वैज्ञानिकों की माने तो अकेले मॉनसून के मौसम में बोई जाने वाली खरीफ फसल से ही देश में चावल से जुड़ी मीथेन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा निकलता है। देश के ज्यादातर इलाकों में चावल हमारे खाने की थाली का एक मुख्य हिस्सा होता है। लेकिन यही देश के जलवायु पर पड़ने वाले असर का एक बड़ा कारण निकलकर सामने आया है। धान के खेतों से मीथेन गैस निकलने की वजह धान पानी से भरे खेतों में होती है, इसलिए इसमें ऑक्सीजन की कमी होती है। यहीं पर सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को सड़ाकर मीथेन गैस को छोड़ते हैं। खेती की यह प्रक्रिया बहुत पुरानी है, लेकिन इससे पर्यावरण पर लगातार प्रभाव पड़ रहा है। देश में करीब चार करोड़ हेक्टेयर जमीन पर चावल की खेती की जाती है। यह जितना लोगों की आजीविका का साधन है उतना ही हवा को नुकसान पहुंचाने वाला भी है। मीथेन के उत्सर्जन में हो सकती है 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी इस शोध में जो बात सामने है उसमें बताया गया है कि अगर आने वाले समय में तापमान में बढ़ोतरी होती है और बारिश का पैटर्न भी बिगड़ता है तो मीथेन गैस के उत्सर्जन में 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे खेती की पैदावार और इससे होने वाजी आजीविका पर भी असर पड़ेगा। इसमें शोधकर्ताओं का कहना है कि मीथेन पर इस शोध को हमें और व्यापक स्तर पर करने की आवश्यकता है। वैज्ञानिकों ने बताई बड़ी वजह शोधकर्ताओं ने यह महत्वपूर्ण अध्ययन किया है, जिसे विज्ञान जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका 'नेचर फूड' जर्नल में जगह मिली है. इस शोध में साफ तौर पर बताया गया है कि साल 2001 से लेकर 2020 के बीच के दो दशकों में पूरे एशिया महाद्वीप में चावल के उत्पादन के कारण ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है।  धान के खेत ग्लोबल वार्मिंग से कैसे जुड़े? आखिरकार धान की खेती से पर्यावरण को इतना नुकसान कैसे पहुंच रहा है, इसे समझना बहुत जरूरी है. वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में विस्तार से समझाया है कि धान की फसल को तैयार करने के लिए खेतों को लंबे समय तक पानी से भरकर जलमग्न रखना पड़ता है. जब यह खेत पानी से पूरी तरह भरे रहते हैं, तो वहां की मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है. ऐसी स्थिति में वहां मौजूद बैक्टीरिया बड़ी मात्रा में मीथेन गैस पैदा करने लगते हैं. इसके साथ ही इन खेतों से नाइट्रस ऑक्साइड गैस भी बाहर निकलती है।  इसलिए बढ़ रहा है तापमान यह दोनों ही गैसें कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले वातावरण में गर्मी को रोकने में कहीं ज्यादा खतरनाक और असरदार होती हैं. यह गैसें हमारे वायुमंडल में एक मोटी परत बना लेती हैं जो सूरज की गर्मी को वापस अंतरिक्ष में जाने से रोक देती है. इसके कारण धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा गहराता जा रहा है।  दुनिया में धान की खेती से कितना बढ़ रहा है प्रदूषण? इस पूरे मामले को गहराई से समझने के लिए शोध दल के प्रमुख और बोस्टन कॉलेज के प्रोफेसर हानक्विन तियान की देखरेख में एक बड़ा विश्लेषण किया गया. इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने 21 हजार से भी ज्यादा क्षेत्रीय आंकड़ों को खंगाला. इसके साथ ही इस काम में आधुनिक मशीन लर्निंग तकनीक और वैश्विक स्तर के विश्लेषण का सहारा लिया गया ताकि नतीजे पूरी तरह सटीक आ सकें।  पूर्वी एशिया में मीथेन का उत्सर्जन सबसे ज्यादा इस तकनीक से सामने आए नतीजों से पता चला है कि पूर्वी एशिया के देशों में मीथेन का उत्सर्जन सबसे ज्यादा दर्ज किया गया है. वहीं दूसरी तरफ, अफ्रीका महाद्वीप में अब धान की खेती का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है, जिसके कारण वह भी अब इस मामले में एक नया हॉटस्पॉट बनकर उभर रहा है. साल 2001 से 2020 के आंकड़ों को देखें तो दुनिया भर में धान के खेतों से होने वाले कुल उत्सर्जन में अकेले एशिया की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से भी ज्यादा रही है. इसमें भी दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों का योगदान सबसे आगे पाया गया है।  मीथेन गैस क्यों है इतनी खतरनाक? मीथेन जमीनी-स्तर के ओजोन के बनने में मुख्य भूमिका निभाती है. यह एक खतरनाक वायु प्रदूषक और ग्रीनहाउस गैस है, जिसके संपर्क में आने से हर साल 10 लाख लोगों की समय से पहले मौत हो जाती है. मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस भी है. 20 साल की अवधि में, यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 80 गुना ज्यादा गर्मी पैदा करती है।  औद्योगिक काल से पहले 30 प्रतिशत था मीथेन का योगदान  औद्योगिक काल से पहले के समय से अब तक ग्लोबल वार्मिंग में मीथेन का योगदान लगभग 30 प्रतिशत रहा है, और 1980 के दशक में रिकॉर्ड रखना शुरू होने के बाद से यह किसी भी अन्य समय की तुलना में तेजी से बढ़ रही है. असल में, यूनाइटेड स्टेट्स नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़ों के अनुसार, 2020 में महामारी से जुड़े लॉकडाउन के दौरान जब कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की गति धीमी हुई, तब भी वायुमंडलीय मीथेन का स्तर … Read more

भोपाल गैस कांड के चार दशक बाद यूनियन कार्बाइड साइट की दोबारा जांच, मिट्टी-पानी में तलाशे जाएंगे जहरीले रसायन

भोपाल  दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदियों में शामिल भोपाल गैस त्रासदी के चार दशक बाद यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर की मिट्टी और पानी की एक बार फिर वैज्ञानिक जांच कराई जाएगी। जांच के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि इतने वर्षों बाद भी परिसर में प्रदूषण की स्थिति क्या है और जमीन के नीचे अथवा परिसर में मौजूद तालाबों के पानी में जहरीले रासायनिक तत्व तो मौजूद नहीं हैं। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही तय होगा कि फैक्ट्री परिसर की जमीन का इस्तेमाल गैस पीड़ितों के स्मारक, अस्पताल या अन्य कार्यों के लिए किया जा सकता है या नहीं। सरकार ने परीक्षण का जिम्मा गुजरात की एक कंपनी को सौंपा है। कंपनी जल्द ही अलग-अलग स्थानों से नमूने लेकर जांच शुरू करेगी। इस पूरी प्रक्रिया पर करीब 2.65 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। 87 एकड़ जमीन पर प्रस्तावित है स्मारक और अस्पताल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रासायनिक कचरा हटाए जाने के बाद इसी वर्ष जनवरी में यूनियन कार्बाइड परिसर की खाली जमीन पर गैस त्रासदी के पीड़ितों की स्मृति में स्मारक और अस्पताल बनाने की घोषणा की थी। फैक्ट्री परिसर में कुल 87 एकड़ जमीन है। अब इस जमीन के भविष्य के उपयोग से पहले एक बार फिर पर्यावरणीय स्थिति का वैज्ञानिक आकलन कराया जा रहा है। जांच में मिट्टी के साथ भूजल और परिसर में बने तालाबों के पानी के नमूनों की भी जांच की जाएगी, ताकि किसी तरह के रासायनिक अवशेष की मौजूदगी का पता लगाया जा सके। 2010 की जांच में मिले थे पारा और कीटनाशक इससे पहले वर्ष 2010 में राष्ट्रीय पर्यावरणीय शोध संस्थान (नीरी), नागपुर ने परिसर की मिट्टी की जांच की थी। इसके अलावा फैक्ट्री परिसर के बाहर भूजल के 30 नमूने लेकर उनका परीक्षण किया गया था। तब कुछ नमूनों में पारा (मर्करी) समेत कुछ कीटनाशक निर्धारित मात्रा से अधिक पाए गए थे। ऐसे में चार दशक बाद होने वाली नई जांच से यह स्पष्ट होगा कि मौजूदा समय में परिसर और उसके आसपास प्रदूषण की स्थिति क्या है। टेंडर पर भी उठे सवाल वहीं, एक संगठन से जुड़ी रचना ढींगरा ने जांच के लिए कंपनी के चयन पर सवाल उठाते हुए कहा है कि अदालत ने इसके लिए ग्लोबल टेंडर किए जाने की आवश्यकता बताई है। सरकार की ओर से गुजरात की कंपनी को जांच का काम सौंपा गया है। अब नई जांच की रिपोर्ट पर यह तय होगा कि त्रासदी के चार दशक बाद यूनियन कार्बाइड परिसर की 87 एकड़ जमीन को स्मारक और अस्पताल जैसे सार्वजनिक उपयोग में लाने के लिए पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित माना जा सकता है या नहीं।