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छत्तीसगढ़ हॉकी लीग में दिखेगा ओलंपियन्स का दम, दिग्गज खिलाड़ी संभालेंगे टीमों की कमान

छत्तीसगढ़ हॉकी लीग : टीमों की अगुवाई करेंगे हॉकी ओलंपियन्स ओलंपियन सुरेंद्र कुमार, प्रदीप मोर, एस.वी. सुtनील, ललित कुमार उपाध्याय, शमशेर सिंह और चिंगलेनसाना सिंह मार्की खिलाड़ी के रूप में शामिल राज्य के युवाओं को अनुभवी खिलाड़ियों और ओलंपियन्स के साथ खेलने का मिलेगा मौका, लीग के दौरान अनुभवी प्रशिक्षकों से कोचिंग भी मिलेगी अजय कुमार, अजितेश राय, मोहम्मद रियाज, देवेश चौहान, राजेन्दर सिंह जूनियर और रजनीश मिश्रा होंगे टीमों के मुख्य प्रशिक्षक रायपुर. रायपुर में होने वाले छत्तीसगढ़ हॉकी लीग के लिए सभी छह फ्रेंचाइजी टीमों के मुख्य प्रशिक्षकों और खिलाड़ियों का चयन कर लिया गया है। ओलंपिक खेलों में भारत की ओर से खेल चुके प्रतिष्ठित और अनुभवी हॉकी खिलाड़ियों को प्रत्येक टीम में मार्की (Marquee) खिलाड़ी के रूप में शामिल किया गया है। लीग में खेलने वाले वरिष्ठ खिलाड़ियों के सानिध्य में राज्य के युवा खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा निखारने का मौका मिलेगा। अनुभवी प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में टीमें खिताब के लिए दावेदारी करेंगी। इस दौरान नामी प्रशिक्षकों से राज्य के खिलाड़ियों को हॉकी के गुर सीखने के साथ ही बड़े मुकाबलों के दबाव से निपटने की कला भी सीखने मिलेंगी। प्रतियोगिता के सभी मुकाबलों का विधिवत आयोजन हॉकी इंडिया के ऑफिशल्स और अधिकारी करेंगे। छत्तीसगढ़ हॉकी लीग की टीमों में राष्ट्रीय स्तर के दिग्गज खिलाड़ियों, ओलंपियनों, स्थानीय प्रतिभाओं और छत्तीसगढ़ के अनुभवी खिलाड़ियों को शामिल किया गया है। लीग में राज्य की प्रतिभाओं को उच्च स्तरीय मंच मिलने के साथ ही घरेलू हॉकी के ढांचे को भी मजबूती मिलेगी। लीग के सभी मैच 21 अक्टूबर से 1 नवम्बर के बीच रायपुर के सरदार वल्लभ भाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम में खेले जाएंगे। पहला मुकाबला शाम साढ़े पांच बजे और दूसरा मुकाबला शाम साढ़े सात बजे शुरू होगा। दोनों मैचों के बीच प्रतिदिन मनोरंजन कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। जो दर्शक स्टेडियम नहीं पहुंच पाएंगे, वे भी मुकाबलों का आनंद ले सकेंगे। लीग का लाइव प्रसारण जियोहॉटस्टार (JioHotstar) पर किया जाएगा। स्टेडियम में दर्शकों का प्रवेश पूरी तरह नि:शुल्क रहेगा। राज्य शासन के खेल एवं युवा कल्याण विभाग द्वारा आयोजित की जा रही छत्तीसगढ़ हॉकी लीग की छह फ्रेंचाइजी टीमों के साथ प्रतिष्ठित संस्थान जुड़े हैं। चक्रधर चैंपियंस की फ्रेंचाइजी जिंदल स्टील लिमिटेड, न्यायधानी नाइट्स की साउथ इस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL), राजधानी रॉयल्स की बजरंग पावर एंड इस्पात लिमिटेड, मैनपाट टाइगर्स की छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल, संस्कारधानी स्ट्राइकर्स की सारडा एनर्जी एंड मिनरल्स लिमिटेड और बैलाडीला बुल्स की फ्रेंचाइजी एनएमडीसी लिमिटेड के पास है। इन टीमों के मुख्य प्रशिक्षक और खिलाड़ी इस प्रकार हैं –  न्यायधानी नाइट्स मुख्य प्रशिक्षक – मोहम्मद रियाज खिलाड़ी – सुरेंद्र कुमार (Marquee), राहुल ठाकुर, मोहम्मद अनीश रजा, लवी मानिकपुरी, अमित टोप्पो, अश्विन कुजूर, रोहित रजक, सागर सूर्यवंशी, सैय्यद समीर अली, कश्मीर मिंज, अभिजीत श्रीवास, सोनू निषाद, सुखवेद निर्मलकर, शादाब अहमद खान, अरबाज अली, ओम रुद्र नामदेव, अमन वर्मा, आदर्श राज सिंह, प्रिंस महतो, केतन कुशवाहा, रोहित कुल्लू, चिराग  मैनपाट टाइटन्स मुख्य प्रशिक्षक – अजय कुमार  खिलाड़ी – प्रदीप मोर (Marquee), अल्फ़ाज़ खान, सौर्य वर्मा, अजय तांडी, रेहान खान, प्रवीण यादव, साहिल ज़ाक्सा, मोहित नायक, अर्पण टोप्पो, आदित्य मेश्राम, अकविनाश तिग्गा, नरेंद्र निषाद, संदीप ठाकुर, प्रिंस भगत, राहुल पन्नू, प्रांजल यादव, नेहाल बरेठ, मनीष वट्टी, दक्ष चौबे, प्रह्लाद, आनंद लकड़ा, अवि मानिकपुरी  चक्रधर चैंपियंस मुख्य प्रशिक्षक – अजितेश राय खिलाड़ी – एस.वी. सुनील (Marquee), असीम हंश, वैभव सिंह चंदेल, विष्णु यादव, अविनाश तिर्की, करण कुमार साहू, अर्जुन यादव, प्रेम राव, मोहित कश्यप, अनुज जाल्क्सो, शैलेन्द्र वर्मा, गगन बाकवाले, खोगेश्वर बाग, कार्तिक यादव, हार्दिक आहूजा, भेद चौरे, भावेश धनकड़, मनीष मौर्य, बलदेव कवासी, युवराज वाल्मिकी, परमप्रीत, अद्रोहित एक्का  राजधानी रॉयल्स मुख्य प्रशिक्षक – राजेन्दर सिंह जूनियर  खिलाड़ी – ललित कुमार उपाध्याय (Marquee), हिमांशु मलिक, विनोद यादव, जुनैद अहमद, संदीप यादव, सुमित मिंज, तौफिक अहमद, अनिकेत कुजूर, ओंकार यादव, अविनाश एक्का, श्रेयांश चौरसिया, योगेश मेश्राम, जुबैर मोहम्मद, खुशाल यादव, कुणाल सेंद्रे, योगेश यादव, चिंता राम, अर्पण लकड़ा, पीयूष कुमार साहू, संजीत तिर्की, प्रेमचंद सोय, रौशन कुमार  संस्कारधानी स्ट्राइकर्स मुख्य प्रशिक्षक – रजनीश मिश्रा  खिलाड़ी – शमशेर सिंह (Marquee), आदित्य कुमार नेताम, रोशन राजपूत, झकमक लकड़ा, मानस पटेल, सोमदेव सूर्यवंशी, निशांत तिर्की, तरूण यादव, जीतू हेमला, कुशल यादव, सोमनाथ यादव, मुहुर्त कौशिक, ओम कुमार यादव, प्रकाश पटेल, सारिख अहमद, मुनीस्वर कुमार, महेंद्र सिंह नाग, अभिषेक यादव, आयुष साहू, आर्यन जेस, शाहरुख, आशीष तानी पूर्ति  बैलाडीला बुल्स मुख्य प्रशिक्षक – देवेश चौहान  खिलाड़ी – चिंगलेनसाना सिंह कंगुजाम (Marquee), दलेश्वर यादव, संतोष मौर्य, रोबिट एक्का, गुलशन कौशिक, प्रह्लाद तांडी, आनंद सूर्यवंशी, निहाल हुसैन, विशाल किस्पोट्टा, चन्द्रशेखर कुसवाहा, प्रभात सिंह, प्रीतम कुजूर, गणेश यादव, आदित्य मेरावी, करण वर्मा, तोमन साहू, हिमेश बंशोद, गोपाल पैकरा, अमन नाग, जसकरण सिंह, राहुल यादव, करण धानुक

भारत का नया हवाई निगरानी सिस्टम HAPS, 20 KM की ऊंचाई पर किया सफल ट्रायल; जानें कैसे करेगा काम

बेंगलुरु सौ बात की एक बात ये कि भारत रक्षा क्षेत्र में बहुत कुछ बना रहा है ये तो कई लोग अब जानने लग गए हैं लेकिन जो लेटेस्ट चीज भारत ने बनाई है वो जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बहुत कम देश हैं जो ये बना पाए हैं. भारत ने एक एयरशिप बनाई है. एयरशिप. एयरशिप मतलब क्या? कोई हवाई जहाज है? कोई शिप है जो हवा में उड़ती है? नहीं, असल में एयरशिप मतलब एक बड़ा गुब्बारा. भारत ने जो अभी टेस्ट किया है उसका साइज तो नहीं बताया गया लेकिन एयरशिप वाले गुब्बारे 50 से 100 मीटर या उससे भी लंबे होते हैं. यानी कई मंजिलों वाली इमारत जितने लंबे और बहुत मोटे होते हैं. जैसे हवा में कोई बड़ी-सी बस तैर रही हो जैसे. गैस भरी जाती हैं इसमें, ऐसी गैस जो हवा से हल्की होती है, इसलिए ये आसमान में तैरता रहता है।  जैसे बच्चों के गैस वाले गुब्बारे होते हैं उसी सिद्धांत पर एयरशिप हवा में तैरती है. लेकिन एयरशिप में इंजन भी लगे होते हैं. एयरशिप को ऊपर भेजने का मुख्य काम गैस करती है. उसके बड़े गुब्बारे वाले हिस्से में हीलीयम जैसी हवा से हल्की गैस भरी जाती है. गैस हल्की होने से पूरा प्लैटफॉर्म ख़ुद ही ऊपर उठ जाता है, जैसे गुब्बारा उड़ता है. फिर एक बार ऊंचाई पर पहुंच जाने के बाद उसे वहीं टिकाए रखने और जरूरत पड़ने पर आगे-पीछे या इधर-उधर करने के लिए इंजन और प्रोपेलर का इस्तेमाल होता है. ये इंजन आमतौर पर बिजली से चलते हैं. ऊंचाई पर सोलर पैनल लगाकर दिन में बिजली बनाई जाती है और बैटरी में स्टोर कर के रखी जाती है गुब्बारे के अंदर, ताकि रात में भी काम चल सके. सब कुछ नीचे जमीन से कंट्रोल होता है।  आसमान में क्या करेंगे ये एयरशिप तो इसको क्यों भेजते हैं ऊपर आसमान में? मुख्य तौर पर निगरानी करने के लिए. अभी जो भारत ने उड़ा कर टेस्ट किया है, उसमें कई तरह के जांच करने वाले उपकरण लगे थे. जैसे दिशा और गति नापने वाला सेंसर, GPS सिस्टम लगा है ग़ुब्बारे के अंदर ही जिससे पता चलता है कि ये कहां पर है, और इसमें लगे होते हैं कई तरह के कैमरे. जो नीचे की तस्वीरें और वीडियो बनाते रहते हैं. ये सब उपकरण इसलिए लगे होते हैं ताकि देखा जा सके कि ये सही तरीक़े से ऊपर जा रहा है, ऊपर टिक रहा है और सारी जानकारियां जमीन तक वापस पहुंचा पा रहा है या नहीं. तो एक तरह से इस तरह की एयरशिप को लॉन्च करने का मक़सद होता है कि ये बहुत ऊंचाई पर लंबे समय तक टिकी रहे, तैरती रहे और नीचे एक बड़े इलाक़े को देखती रहे, निगरानी करती रहे।  ड्रोन भी ये काम करते हैं लेकिन वो ज्यादा देर तक नहीं उड़ते. सैटेलाइट से भी यही काम किया जाता है लेकिन वो बहुत महंगी पड़ती हैं एयरशिप के मुक़ाबले में. ये एयरशिप यूं समझ लो कि ड्रोन और सैटेलाइट, दोनों के बीच का काम करती है. सीमाओं पर नजर रखने के लिए, दुश्मन की गतिविधियों को ट्रैक करने के लिए, या आपदा के समय जब जमीन के किसी हिस्से का बाक़ी नेटवर्क से अगर संपर्क टूट जाए तब ये बहुत काम आ सकती है. यानी आसमान में एक चौकीदार बैठा है ये समझ लो. भारत में हथियारों पर रिसर्च करने वाले संस्थान DRDO ने ये नई एयरशिप बनाई है. इसको कहते हैं HAPS, हाई ऑल्टीट्यूड प्लैटफ़ॉर्म सिस्टम. इसकी उड़ान का परीक्षण किया गया और ये आसमान में इतनी ऊंचाई पर पहुंच गई कि आम विमान वहां तक नहीं जा सकते. समुद्र तल से 21 km की ऊंचाई तक ये गई, और फिर 20 km की ऊंचाई पर ये तीस मिनट से ज्यादा समय तक टिकी रही. उसके बाद जमीन से कंट्रोल सेंटर से आदेश दिया गया और ये एयरशिप सुरक्षित नीचे आ गई।  आसमान से चौकीदारी पूरी उड़ान के दौरान इसकी तस्वीरें और सारी जानकारियां रीयल टाइम में जमीन पर कंट्रोल स्टेशन तक पहुंचती रहीं. यानी लाइव तस्वीरें आती रहीं. आगरा में DRDO की लैब है ADRDE, एरियल डिलिवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट, उसने इसको बनाया है. इसी लैब में पैराशूट और हल्के हवाई सिस्टम वगैरह बनते हैं. अब एयरशिप भी बना ली है. पिछले साल मई में मध्य प्रदेश के श्योपुर से इसकी पहली टेस्ट उड़ान हुई थी. तब ये 17 km की ऊंचाई तक गई थी और लगभग 62 मिनट हवा में रही थी. उस बार इसके दबाव और एमरजेंसी सिस्टम की जांच हुई थी. अबकी बार ये 4km और ऊपर गयी है और ऊंचाई पर टिकने की क्षमता भी दिखाई है. ड्रोन जो होते हैं वो क़रीब 12 km की ऊंचाई तक उड़ते हैं और ज्यादा देर तक एक जगह नहीं टिक पाते।  सैटेलाइट जो होती हैं वो तो अंतरिक्ष में होती हैं यानी बहुत ही ऊपर होती हैं, सैकड़ों किलोमीटर दूर जमीन से, और उन्हें वहां भेजना महंगा पड़ता है. ये एयरशिप इन दोनों के बीच का रास्ता है. 20 km की ऊंचाई का मतलब है कि ये बादलों और ज्यादातर विमानों से ऊपर रहती है. और लगभग एक ही जगह टिक सकती है. और इस वजह से वहां से ये एक बड़े इलाक़े को लंबे समय तक देख सकती है. ऐसे समझ लीजिए कि जैसे कोई वॉच टावर आसमान में तैर रहा हो।  ड्रोन-सैटेलाइट भी तो यही करते हैं सैटेलाइट की तुलना में ये काफ़ी सस्ता पड़ता है और कुछ दिक़्क़त आ जाए तो इसको नीचे उतारकर ठीक भी किया जा सकता है. भारत की लंबी सीमाओं को देखते हुए ऐसी चीज बहुत उपयोगी है. पाकिस्तान बॉर्डर है, चीन का बॉर्डर है, पहाड़ी इलाकों में लगातार नजर रखना मुश्किल होता है. समुद्री सीमा पर भी ये काम आ सकती है. कई दिनों या हफ्तों तक एयरशिप आसमान में एक जगह टिकी रह सकती है।  अभी तो बस छोटा-सा टेस्ट किया गया है आधे घंटे का. असली चुनौती है लंबे समय तक ऊपर टिकना, ज्यादा वजन ढोना और तरह-तरह के मौसम से लड़ना. लेकिन भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जो एयरशिप बनाने पर काम कर रहे हैं. लंबे समय तक टिकने वाला सिस्टम अभी … Read more

ग्वालियर में राज्यपाल का दौरा कल, छात्रों को देंगे उपाधियां; किसानों को भी मिलेगी सौगात

ग्वालियर  मध्यप्रदेश के महामहिम राज्यपाल मंगुभाई पटेल गुरुवार 15 अक्टूबर को एक दिवसीय दौरे पर ग्वालियर आ रहे हैं. वे ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के 12वें दीक्षांत समारोह में शामिल होंगे. कार्यक्रम में राज्यपाल के साथ ही कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंसाना भी शिरकत करेंगे।  600 से ज्यादा छात्रों को मिलेंगी उपाधियां ग्वालियर के राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए 15 अक्टूबर महत्वपूर्ण दिन होने वाला है, क्योंकि इसी दिन 600 से ज़्यादा छात्रों को दीक्षांत समारोह में उपाधियां प्रदान की जाएंगी. वैसे तो विश्वविद्यालय का यह 12वां कन्वोकेशन है लेकिन यूनिवर्सिटी के अपने इतिहास में ये पहली बार होगा जब दीक्षांत समारोह समय पर आयोजित हो रहा है और पिछले सत्र में उत्तीर्ण हुए छात्रों को समय पर कॉन्वोकेशन आयोजित कर डिग्री और उपाधियां प्रदान की जाएंगी।  सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट का लोकार्पण करेंगे राज्यपाल कार्यक्रम की जानकारी देने के लिए आयोजित कृषि विश्वविद्यालय की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुलगुरु प्रो अरविंद कुमार शुक्ला ने बताया, '' दीक्षांत समारोह में कृषि विश्वविद्यालय के छात्रों को राज्यपाल मंगूभाई पटेल द्वारा उपाधियां प्रदान की जाएंगी. लेकिन इससे पहले वे ग्वालियर कृषि महाविद्यालय के सीएआईई में हाल ही में स्थापित की गई नई सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट का लोकार्पण भी करेंगे. इसके बाद ही दीक्षांत समारोह कार्यक्रम की शुरुआत होगी।  666 छात्रों को प्रदान की जाएंगी उपाधियां कुलगुरु अरविंद शुक्ला ने बताया, '' इस कन्वोकेशन में उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों में स्नातक के 345, स्नातकोत्तर के 294 और पीएचडी के 27 विद्यार्थी कुल 666 छात्र शामिल हैं. ये उपाधियां 1 अक्टूबर 2025 से 30 सितंबर 2026 के बीच उपाधि पूर्ण करने वाले विद्यार्थियों को प्रदान की जाएंगी. इस कार्यक्रम में 4 छात्र-छात्राओं को मेडल भी प्रदान किए जाएंगे. इनमें 2 स्नातक के, 1 स्नातकोत्तर और पीएचडी का 1 विद्यार्थी शामिल है. इसके अलावा 3 छात्र, छात्राओं को सिरताज बहादुर सिन्हा स्मृति नगद पुरस्कार दिया जाएगा।  स्टार्टअप्स के जरिए कमाई का साधन बनेगी 'सीपीयू' आपको बता दें कि कृषि विश्वविद्यालय द्वारा एग्रीकल्चर कॉलेज में स्थापित की गई सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट में पांच तरह के उत्पाद तैयार किए जाएंगे. ये इकाइयां उन छात्रों और किसानों के लिए लगाई गई है, जो किसी बेहतर स्टार्टअप और एफपीओ बनाकर उसे रोजगार का जरिया बनाने की चाह रखते हैं. इसका संचालन नाबार्ड के साथ किया जा रहा है. इनमें मध्य प्रदेश में पहली बार मसाला मेकिंग यूनिट जिसमे नाइट्रोजन का इस्तेमाल किया जाएगा. इससे मशीन गर्म नहीं होगी और मसाले अपने असल एरोमा के साथ तैयार होंगे और उनका जायका कम नहीं होगा. इसके अलावा टोमेटो प्यूरी या कैचअप यूनिट, पोहा मेकिंग यूनिट, नमकीन मेकिंग यूनिट और कोल्ड प्रेस ऑइल यूनिट भी हैं. इसके साथ ही एक एनिमल फीड लाइन भी शुरू होने जा रही है।  भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय संगठन मंत्री भी होंगे शामिल राज्यपाल मंगू भाई पटेल का यह दौरा टाइट शेड्यूल में रहेगा. दीक्षांत समारोह दोपहर तीन बजे से विश्वविद्यालय के दत्तोपंत थेगड़ी सभागार में शुरू होगा. राज्यपाल और कृषि मंत्री के अलावा भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय संगठन मंत्री दिनेश कुलकर्णी भी कार्यक्रम में शामिल होंगे। 

8th Pay Commission: सैलरी में बंपर बढ़ोतरी का प्रस्ताव, 3.833 फिटमेंट फैक्टर और 6% सालाना इंक्रीमेंट की मांग

नई दिल्ली  8वें वेतन आयोग को लेकर केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स की उम्मीदें लगातार बढ़ रही हैं। इस बीच, बेंगलुरु में हाल ही में 8वें वेतन आयोग की कर्मचारी और पेंशनर संगठनों के साथ बैठक हुई। इस बैठक में सैलरी, पेंशन, फिटमेंट फैक्टर, भत्तों और पे-लेवल में बदलाव जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की गई। इसी दौरान कर्नाटक पोस्ट्स एंड टेलीकम्युनिकेशंस पेंशनर्स एसोसिएशन ने 8वें वेतन आयोग के सामने कई अहम सुझाव रखे हैं। इनमें मिनिमम बेसिक सैलरी 69,000 रुपये करने, मिनिमम पेंशन 34,470 रुपये करने और सालाना इंक्रीमेंट को 3% से बढ़ाकर 6% करने की मांग शामिल है। हालांकि, ये सभी प्रस्ताव हैं। इन पर अंतिम फैसला होना अभी बाकी है। मिनिमम बेसिक सैलरी 69,000 रुपये करने की मांग एसोसिएशन ने केंद्रीय कर्मचारियों की न्यूनतम बेसिक सैलरी 69,000 रुपये तय करने का सुझाव दिया है। फिलहाल 7वें वेतन आयोग के तहत केंद्रीय कर्मचारियों की न्यूनतम बेसिक सैलरी 18,000 रुपये है। इस बढ़ोतरी के लिए एसोसिएशन ने 3.833 के फिटमेंट फैक्टर की मांग की है। अगर इस प्रस्ताव को स्वीकार किया जाता है, तो मौजूदा 18,000 रुपये की मिनिमम बेसिक सैलरी बढ़कर करीब 69,000 रुपये हो सकती है। हालांकि, कर्मचारियों को यह समझना जरूरी है कि 69,000 रुपये अभी तय वेतन नहीं है। यह एसोसिएशन की ओर से दिया गया प्रस्ताव है। मिनिमम पेंशन 34,470 रुपये करने का सुझाव पेंशनर्स के लिए भी एसोसिएशन ने बड़ी मांग रखी है। संगठन का सुझाव है कि 8वें वेतन आयोग में मिनिमम पेंशन बढ़ाकर करीब 34,470 रुपये की जाए। फिलहाल 7वें वेतन आयोग के तहत मिनिमम बेसिक पेंशन 9,000 रुपये बताई गई है। एसोसिएशन ने 3.833 के फिटमेंट फैक्टर के आधार पर इसे बढ़ाकर 34,470 रुपये करने का प्रस्ताव दिया है। अगर इस मांग को मंजूरी मिलती है, तो न्यूनतम पेंशन पाने वाले पेंशनर्स को फायदा हो सकता है। लेकिन अभी इस प्रस्ताव पर सरकार या 8वें वेतन आयोग की अंतिम मंजूरी नहीं आई है। 18 पे-लेवल को घटाकर 7 करने का प्रस्ताव एसोसिएशन ने वेतन ढांचे में बदलाव का भी सुझाव दिया है। इसके तहत 7वें वेतन आयोग के मौजूदा 18 पे-लेवल को मिलाकर 8वें वेतन आयोग में 7 पे-लेवल बनाने की मांग की गई है। एसोसिएशन का मानना है कि इससे पे स्ट्रक्चर को ज्यादा व्यवस्थित बनाया जा सकता है। साथ ही, अलग-अलग लेवल के लिए स्टैंडर्डाइज्ड पे स्केल्स लागू करने का सुझाव भी दिया गया है। सालाना इंक्रीमेंट 6% करने की मांग केंद्रीय कर्मचारियों के सालाना वेतन बढ़ोतरी यानी इंक्रीमेंट को लेकर भी एसोसिएशन ने अहम सुझाव दिया है। संगठन चाहता है कि मौजूदा 3% सालाना इंक्रीमेंट को बढ़ाकर 6% किया जाए। एसोसिएशन का कहना है कि 3% की मौजूदा बढ़ोतरी कर्मचारियों के बेहतर काम, नई स्किल सीखने और लगातार अच्छे परफॉर्मेंस को पर्याप्त रूप से प्रोत्साहित नहीं करती। ऐसे में इंक्रीमेंट की दर बढ़ने से कर्मचारियों को ज्यादा फायदा मिल सकता है। हालांकि, 6% इंक्रीमेंट की मांग भी अभी सिर्फ एक प्रस्ताव है। इस पर फाइनल फैसला होना बाकी है। मिनिमम वेतन तय करने के फॉर्मूले में भी बदलाव की मांग एसोसिएशन ने मिनिमम वेतन तय करने के लिए इस्तेमाल होने वाले आयक्रॉयड फॉर्मूले को भी आज की जरूरतों के हिसाब से अपडेट करने का सुझाव दिया है। इस फॉर्मूले का संबंध जरूरत के हिसाब से मिनिमम मजदूरी तय करने से है। एसोसिएशन का कहना है कि आज के समय में परिवारों के खर्च काफी बदल गए हैं। अब मोबाइल, इंटरनेट, डिजिटल डिवाइस और दूसरी जरूरी चीजों पर भी खर्च करना पड़ता है। इसलिए मिनिमम वेतन तय करते समय इन जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। फैमिली कैलकुलेशन में 5 यूनिट करने का सुझाव 7वें वेतन आयोग में जरूरत आधारित मिनिमम वेतन की गणना के लिए परिवार की तीन यूनिट का स्टैंडर्ड इस्तेमाल किया गया था। अब एसोसिएशन ने इसे बढ़ाकर पांच यूनिट करने की मांग की है। प्रस्तावित गणना के अनुसार, कर्मचारी और लाइफ पाटर्नर के लिए एक-एक यूनिट रखी जाएगी। वहीं, दो बच्चों और माता-पिता के लिए 0.8-0.8 यूनिट का प्रावधान सुझाया गया है। इस तरह कुल गणना 5.2 यूनिट होती है, जिसे पांच यूनिट के करीब माना गया है। एसोसिएशन ने यह भी कहा है कि लाइफ पाटर्नर की यूनिट की गणना में जेंडर के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।

भोपाल मास्टर प्लान 2047 पर 25 अक्टूबर तक मौका, भूमि उपयोग और ग्रीन बेल्ट को लेकर उठे सवाल

भोपाल  भावी विकास की रूपरेखा तय करने वाले ड्राफ्ट डेवलपमेंट प्लान 2047 को लेकर शहर में गहमागहमी बढ़ गई है। इस ड्राफ्ट में जमीन के इस्तेमाल (लैंड-यूज) के वर्गीकरण, सड़कों के अलाइनमेंट और मौजूदा रिहायशी इलाकों के भविष्य को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। आम नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने प्रस्तावित ज़ोनिंग और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों में बदलाव की मांग को लेकर मोर्चा खोल दिया है। 25 अक्टूबर तक आए 800 से अधिक सुझाव और आपत्तियां टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (T&CP) विभाग के पास आगामी 25 अक्टूबर की अंतिम तिथि से पहले लगभग 800 सुझाव और आपत्तियां पहुंच चुकी हैं। विभाग अब इन सभी सबमिशन की बारीकी से जांच करेगा और इसके बाद ही मास्टर प्लान को अंतिम रूप दिया जाएगा। नागरिकों और विभिन्न संगठनों द्वारा उठाए गए इन मुद्दों ने प्रशासन की प्लानिंग पर नए सिरे से विचार करने का दबाव बना दिया है। मुख्य मांगें और आपत्तियां क्या हैं? प्राप्त जानकारियों के अनुसार, सबसे प्रमुख मांग 'बीआईजेड-2' (BIZ-2) लैंड-यूज कैटेगरी को हटाने की है, ताकि वहां रिहायशी और व्यावसायिक गतिविधियां आसानी से संचालित हो सकें। इसके अलावा, ग्रीन बेल्ट और कृषि भूमि को आवासीय उपयोग के लिए फिर से वर्गीकृत करने, 18 मीटर चौड़ी प्रस्तावित सड़कों के अलाइनमेंट बदलने और कुछ चुनिंदा क्षेत्रों को इको-संवेदनशील जोन से बाहर करने की मांग भी जोर पकड़ रही है। स्थानीय स्तर पर विरोध और पर्यावरण की चिंताएं शहर के पॉश इलाकों जैसे बावडिया कलां और बाघमुग़लिया के निवासियों ने प्रस्तावित वेस्टर्न बायपास के साथ कनेक्टिविटी को लेकर सवाल खड़े किए हैं। वहीं, पर्यावरण के मोर्चे पर भी गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। लाहरपुर में 643 एकड़ कृषि भूमि को, जो कथित तौर पर पिछले 30 वर्षों से खेती के अधीन है, निर्धारित सबमर्जेंस (डूब) क्षेत्र से बाहर करने की मांग की गई है। इसके अलावा, उन इलाकों में प्रस्तावित सड़कों को लेकर भी गहरी चिंता जताई गई है जो बाघों की आवाजाही (टाइगर मूवमेंट) के लिए जाने जाते हैं। सेफ सिटी के यह है आठ पैरामीटर     प्रमुख स्थानों पर एआइ आधारित सीसीटीवी, ड्रोन, अलार्म, कंट्रोल सेंटर और संदिग्ध गतिविधियों की रिपोर्ट के लिए विशेष मोबाइल ऐप।     सुरक्षा का दायरा बढ़ाने के लिए निजी भवन और कालोनियों के गेट लगे कैमरों को पुलिस व प्रशासन के सेंट्रल सर्वर से जोड़ना।     संवेदनशील इलाकों में अत्याधुनिक हथियारों और बेहतर सुविधाओं से लैस पुलिस बल की तैनाती।     पार्कों व भवनों में ऊंची दीवारों की जगह पारदर्शी फेंसिंग, चौतरफा स्ट्रीट लाइट्स और सक्रिय सामाजिक निगरानी।     नियंत्रित गति, सही ज्यामिति, डिवाइडर, सिग्नल और पैदल यात्रियों के लिए मानक जेब्रा क्रासिंग व फुटपाथ।     बसों व मेट्रो में आधुनिक सुरक्षा उपकरण, चालक-परिचालकों का प्रशिक्षण और बेहतर लास्ट माइल कनेक्टिविटी।     कॉम्प्रेहेंसिव फायर मैनेजमेंट प्लान के तहत हर 50 हजार की आबादी पर एक नए फायर स्टेशन का निर्माण।     आपातकाल के लिए स्कूल, कॉलेज व सामुदायिक भवनों को भूकंपरोधी व बाढ़ से सुरक्षित राहत केंद्रों के रूप में तैयार करना।

मध्यप्रदेश में चौथी रेल लाइन की तैयारी तेज, कटनी-पेंड्रा रोड रूट पर जल्द शुरू होगा भूमि अधिग्रहण

  कटनी कटनी से पेंड्रा रोड के बीच चौथी रेल लाइन बिछाने की तैयारी अब जमीन अधिग्रहण की दिशा में आगे बढ़ रही है। केंद्र सरकार से परियोजना को मंजूरी मिलने के बाद रेलवे ने जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर दी है। अब सर्वे के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि रेल लाइन के लिए किन गांवों की कितनी निजी जमीन की जरूरत पड़ेगी। सर्वे शुरू होने के साथ ही संभावित प्रभावित किसानों और जमीन मालिकों की नजर इस बात पर रहेगी कि उनकी जमीन परियोजना के दायरे में आती है या नहीं और अधिग्रहण होने पर उन्हें कितना मुआवजा मिलेगा। इन जिलों से होकर गुजरेगी रेललाइन, 201 किलोमीटर है कुल लंबाई जानकारी के अनुसार कटनी-पेंड्रा रोड रेलखंड पर चौथी लाइन बिछाने की परियोजना की लंबाई 201.37 किलोमीटर है। इसके लिए मध्य प्रदेश के कटनी सहित उमरिया, शहडोल और अनूपपुर जिलों में जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की तैयारी है। हाल ही में जारी अधिसूचना के तहत संबंधित अधिकारियों को जमीन अधिग्रहण की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इससे परियोजना के लिए जमीन चिह्नित करने की कार्रवाई आगे बढ़ सकेगी। जिले में जमीन अधिग्रहण के लिए एसडीएम को नियुक्त किया गया है। चौथी लाइन से यह होगा फायदा कटनी-पेंड्रा रोड रेलखंड पर चौथी लाइन बनने का फायदा सिर्फ मालगाडियों को नहीं, यात्रियों को भी मिलेगा। इस रूट पर कोयला मालगाडियों का दबाव लगातार बढने की संभावना है। अतिरिक्त ट्रैक उपलब्ध होने से मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों के संचालन के लिए ज्यादा क्षमता मिलेगी। इससे ट्रेनों को एक दूसरे के लिए रास्ता देने में होने वाली देरी और अनावश्यक ठहराव कम हो सकते हैं। कटनी से बिलासपुर, अनूपपुर, शहडोल और छत्तीसगढ़ की ओर जाने वाले यात्रियों के लिए इसका सीधा फायदा बेहतर परिचालन के रूप में मिल सकता है। ट्रैक क्षमता बढने से समयपालन में सुधार, अतिरिक्त यात्री ट्रेनें चलाने और मौजूदा ट्रेनों के फेरे बढ़ाने की संभावनाएं भी मजबूत होंगी। यानी चौथी लाइन बढ़ते माल यातायात के साथ यात्री सुविधाओं के विस्तार का रास्ता भी खोलेगी। 2975 करोड़ की है परियोजना केंद्र सरकार ने 9 सितंबर 2026 को कटनी-पेंड्रा रोड चौथी रेल लाइन सहित तीन रेल परियोजनाओं को मंजूरी दी थी। तीनों परियोजनाओं की कुल अनुमानित लागत 10,783 करोड़ रुपए है। कटनी-पेंड्रा रोड चौथी रेल लाइन पर करीब 2,975 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। चौथी लाइन बनने के बाद इस मार्ग पर ट्रेनों के संचालन के लिए अतिरिक्त ट्रैक उपलब्ध होगा। इसका सबसे बड़ा फायदा मालगाडियों को होगा, क्योंकि कोयले की बढ़ती खेप को अधिक क्षमता के साथ निकाला जा सकेगा। जमीनों का सर्वे इस परियोजना का अहम चरण होगा। इसी से पता चलेगा कि किन गांवों में रेल लाइन के लिए जमीन की जरूरत है और किन किसानों के खेत या जमीन का कुछ हिस्सा प्रभावित हो सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि कई परिवारों की आजीविका का मुख्य साधन भी होती है। ऐसे में यदि किसी किसान की खेती की जमीन अधिग्रहण के दायरे में आती है, तो उसके सामने खेती के रकबे में कमी और भविष्य की आय को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं। अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ने पर जमीन मालिकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा मुआवजे का होगा।

दुर्गा पूजा में ही बाहर आती है मां दुर्गा की सोने की मूर्ति, पुलिस सुरक्षा में होती है पूजा

shardiya navratri : पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के जयपुर राजबाड़ी की दुर्गा पूजा अपनी अनोखी परंपरा, इतिहास और स्वर्ण प्रतिमा के कारण खास पहचान रखती है. यहां मां दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा साल के लगभग 360 दिन बैंक लॉकर में सुरक्षित रहती है. दुर्गा पूजा के अवसर पर षष्ठी के दिन कड़ी पुलिस सुरक्षा के बीच मां की स्वर्ण प्रतिमा को बैंक लॉकर से निकालकर जयपुर राजबाड़ी लाया जाता है. इस दौरान यहां सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए जाते हैं. पूजा संपन्न होने के बाद दशमी के दिन पुलिस सुरक्षा के बीच स्वर्ण प्रतिमा को दोबारा बैंक के लॉकर में सुरक्षित रख दिया जाता है. जयपुर राजबाड़ी की इस पूजा का सबसे बड़ा आकर्षण मां दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा और चांदी का चालचित्र है. मां की प्रतिमा द्विभुजा स्वरूप में है. इस अनोखी प्रतिमा को देखने के लिए पुरुलिया के अलावा दूसरे जिलों और अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक जयपुर पहुंचते हैं. करीब 400 साल पुरानी परंपरा राजपरिवार से मिली जानकारी के मुताबिक, जयपुर राजबाड़ी की दुर्गा पूजा करीब 400 साल पुरानी परंपरा से जुड़ी है. मान्यता है कि राजा जयसिंह के समय से इस क्षेत्र में राजपरिवार की धार्मिक परंपराओं की शुरुआत हुई. बाद में राजा काशीनाथ सिंह के समय पूजा के दौरान मंदिर में आग लगने की घटना हुई. इसके बाद राजा ने मां दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करने का संकल्प लिया. राजपरिवार से जुड़ी मान्यता के अनुसार, राजा काशीनाथ सिंह को सपने में मां दुर्गा ने स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करने का संकेत दिया था. इसके बाद बनारस के कारीगरों को बुलाकर स्वर्ण प्रतिमा और चांदी का चालचित्र तैयार कराया गया. राजपरिवार के मुताबिक, प्रतिमा और चालचित्र के निर्माण में बड़ी मात्रा में सोने और चांदी का इस्तेमाल किया गया था. चोरी के बाद बदली सुरक्षा व्यवस्था जयपुर राजबाड़ी में हुई चोरी की एक घटना के बाद स्वर्ण प्रतिमा की सुरक्षा को लेकर व्यवस्था बदली गई. बताया जाता है कि चोर राजबाड़ी में घुसे और कई कीमती सामान व आभूषण लेकर फरार हो गए. इसके बाद पुलिस की सलाह पर स्वर्ण प्रतिमा को पूजा के दिनों को छोड़कर पूरे साल बैंक लॉकर में रखने का फैसला किया गया. ये परंपरा तभी से जारी है. पूजा के समय पुलिस सुरक्षा में प्रतिमा राजबाड़ी लाई जाती है और पूजा समाप्त होने के बाद फिर बैंक लॉकर में रख दी जाती है. देवी की पूजा का इतिहास जयपुर राजपरिवार के सदस्य प्रशांत नारायण सिंह देव के मुताबिक, यह पूजा कई पीढ़ियों से चली आ रही है. उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में यहां मिट्टी की प्रतिमा और पारंपरिक तरीके से पूजा होती थी. बाद में एक घटना के बाद स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा शुरू हुई. उन्होंने बताया कि राजा काशीनाथ सिंह को स्वप्न में मां दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करने का संकेत मिला था. इसके बाद राजपरिवार ने अपने कोष से सोना निकालकर बनारस के कारीगरों से मां की स्वर्ण प्रतिमा तैयार कराई. उन्होंने यह भी बताया कि आज सुरक्षा कारणों से मां की स्वर्ण प्रतिमा बैंक लॉकर में रखी जाती है और पूजा के समय पुलिस सुरक्षा के बीच राजबाड़ी लाई जाती है. उनके मुताबिक, पहले पूजा चार दिनों की होती थी. जबकि इस बार पूजा को पांच दिनों तक आयोजित करने की तैयारी है. कितनी भव्य होती है देवी की पूजा? राजबाड़ी की पुरानी परंपराओं से जुड़ी रूनी बनर्जी ने बताया कि पहले दुर्गा पूजा राजबाड़ी में बेहद भव्य तरीके से आयोजित होती थी. उस समय राजबाड़ी में हाथी, घोड़े और बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी होती थी और पूजा का स्वरूप काफी विशाल हुआ करता था. लेकिन चोरी की घटना के बाद स्वर्ण प्रतिमा की सुरक्षा को लेकर विशेष व्यवस्था हुई. उन्होंने बताया कि यह पूजा षष्ठी से शुरू होती है और पुलिस की कड़ी निगरानी में पूरी व्यवस्था संचालित होती है. आज भी पूजा के दौरान दूर-दूर से लोग जयपुर पहुंचते हैं और राजबाड़ी की पूजा और स्वर्ण प्रतिमा को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं.

बिना लोहा-स्टील के तैयार हो रहा संत रविदास लोक, नागर शैली की भव्य इमारत का निर्माण अंतिम चरण में

सागर  सागर में सामाजिक समरसता के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हो रहा संत रविदास लोक 92% पूरा हो चुका है। 100 करोड़ रुपए की लागत से 11 एकड़ में बन रहे इस परिसर का निर्माण अब अंतिम चरण में है। यह मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम की देखरेख में तैयार हो रहा है। लोक का संत शिरोमणि गुरु रविदास महाराज के 650वें जयंती वर्ष के दौरान फरवरी 2027 से पहले लोकार्पण करने का लक्ष्य है। 12 अगस्त 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका भूमिपूजन किया था। अब लोकार्पण के लिए भी उनके आने की तैयारी है। प्रधानमंत्री कार्यालय की एक विशेष टीम परियोजना की सीधे मॉनीटरिंग कर रही है। 1000 साल तक टिकने वाली नागर शैली से निर्माण संत रविदास लोक का निर्माण नागर शैली में किया जा रहा है। दावा है कि इस तकनीक से बना परिसर 1000 साल तक अडिग रह सकेगा। निर्माण में लोहे और स्टील का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। परिसर में संत रविदास के जीवन और विचारों को प्रामाणिकता के साथ सहेजने के लिए मंदिर की गैलरी और म्यूजियम में शामिल किए जा रहे दोहों, साखियों और पदों की भी जांच हो रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी और इतिहासकार इनकी सूक्ष्मता से समीक्षा कर रहे हैं, ताकि प्रस्तुत सामग्री की प्रामाणिकता पर भविष्य में सवाल न उठें। युवाओं के लिए क्विज, शाम को लेजर शो परिसर में घूमने के बाद युवाओं के लिए ऑन-द-स्पॉट क्विज प्रतियोगिता होगी। इसमें दोहों, साखियों और पदों का सही अर्थ बताने वालों को पुरस्कृत किया जाएगा। शाम को ‘रविदास जल कुंड’ में ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ की वाणी पर सतरंगी लाइट और साउंड के साथ वॉटर स्क्रीन लेजर शो होगा। परिसर को मध्यप्रदेश का पहला जीरो-वेस्ट धार्मिक परिसर बनाने की भी योजना है। बुंदेलखंड से बाहर भी संदेश पहुंचाने की तैयारी संत रविदास लोक का उद्देश्य संत रविदास के विचारों और सामाजिक समरसता के संदेश को व्यापक स्तर पर पहुंचाना है। मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 15.6% है, जबकि बुंदेलखंड में यह 17 से 18% बताई गई है। परिसर के जरिए मध्यप्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब में फैले संत रविदास के अनुयायियों तक भी संदेश पहुंचाने की तैयारी है। पीएम मोदी ने किया था मंदिर का भूमिपूजन मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मंदिर निर्माण की प्रगति का जायजा लिया. वहीं उन्होंने मंदिर और संग्रहालय का मॉडल देखकर बन रहे भव्य मंदिर की जानकारी ली. बता दें कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने 2023 में संत रविदास जयंती के अवसर पर सागर में आयोजित एक कार्यक्रम में 100 करोड़ की लागत से संत रविदास के भव्य मंदिर और संग्रहालय के निर्माण का ऐलान किया था. रविदास मंदिर और संग्रहालय का भूमिपूजन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया था. मंदिर और संग्रहालय निर्माण कार्य अगस्त 2025 तक पूरा होने का लक्ष्य रखा गया है।  कैसा होगा संत रविदास मंदिर और संग्रहालय रविदास मंदिर और संग्रहालय के निर्माण कार्य पर केंद्र और राज्य सरकार द्वारा लगातार नजर रखी जा रही है. इस सिलसिले में केंद्र और राज्य सरकार के संस्कृति और धर्मस्व विभाग के अधिकारी लगातार दौरा करते रहते हैं और तय समय में मंदिर निर्माण होगा कि नहीं, इसकी प्रगति का जायजा लेते रहते हैं. सरकार ने संत रविदास की अनमोल विरासत को सहेजने और सुरक्षित रखने के साथ-साथ उनके संदेश और दर्शन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए सागर में 100 करोड़ की लागत से संत रविदास मंदिर और संग्रहालय का निर्माण कार्य शुरू किया है।  संत रविदास मंदिर का डिजाइन वास्तु कला के आधार पर संत रविदास में आस्था रखने वाले और उनके दर्शन और साहित्य पर शोध करने वाले विद्वानों और भक्तों के लिए यह एक अनुपम सौगात होगी. मंदिर का डिजाइन वास्तु कला के आधार पर तैयार किया गया है. करीब 12 एकड़ भूमि में मंदिर का निर्माण किया जा रहा है. अध्योध्या के राम मंदिर में लगे राजस्थान के धोलपुर वंशीपहाड़पुर के लाल पत्थरों से संत रविदास मंदिर का निर्माण किया जा रहा है. संत रविदास मंदिर 66 फीट ऊंचा होगा. मंदिर के गर्भगृह में लोहे का उपयोग नहीं करके केवल पत्थर, रेत, गिटटी का उपयोग किया जा रहा है. मंदिर में अत्याधुनिक संसाधन के साथ-साथ मंदिर परिसर में विशेष रूप से पेड़ पौधे लगाकर हरियाली की जा रही है. रात में आकर्षक साज सज्जा के साथ रोशनी की भी व्यवस्था की जा रही है।