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अमेरिका-ईरान समझौते से टूटी नाकाबंदी, होर्मुज जलडमरूमध्य से बहने लगा ईरानी तेल

नई दिल्ली मिडिल ईस्ट में जंग खत्म हो गई है और अमेरिका-ईरान में शांति समझौता हो गया है. इसके तहत जहां ईरान होर्मुज खोलने को राजी हो गया, तो वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया की तेल गैस जरूरत को पूरा करने के लिए अहम इस जरूरी समुद्री रूट से अमेरिकी नेवी की नाकाबंदी हटा दी. इसका असर भी देखने को मिल रहा है, करीब दो महीने की नाकाबंदी के बाद अब जहाजों में भरकर ईरानी कच्चा तेल निकलने लगा है।  4.8 मिलियन बैरल ईरानी तेल निकला टैंकरट्रैकर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, नेशनल ईरानी टैंकर कंपनी (NITC) के दो VLCC सुपरटैंकर – DIONA (9569695) और HERO2 (9362073) तेल लेकर निकले हैं और इनमें 3.8 मिलियन बैरल ईरानी कच्चा तेल भरा हुआ है. ये सुपरटैंकर अमेरिकी नेवी की नाकेबंदी वाली सीमा से बाहर निकले हैं।  बता दें कि पिछले दो महीनों में यह ऐसा पहला एक्सपोर्ट है, जिसकी पुष्टि 15 जून, 2026 के AIS डेटा और सैटेलाइट तस्वीरों से हुई है. इसके बाद एक तीसरा स्वेजमैक्स (Suezmax) टैंकर 1 मिलियन बैरल तेल लेकर निकला।  एक टैंकर बढ़ रहा पाकिस्तान की ओर रिपोर्ट में पोस्ट किए गए मैप में ये तेल के जहाज और STREAM अरब सागर में ओमान की खाड़ी के पास दिखाई दे रहे हैं. ये उस नाकेबंदी वाली लाइन को पार कर रहे हैं जो अप्रैल 2026 में US-ईरान टकराव के दौरान बनाई गई थी।  मैप में ये भी देखा जा सकता है कि नेशनल ईरानी टैंकर कंपनी का STREAM (9569633) पाकिस्तान के EEZ से नाकेबंदी वाली लाइन की ओर बढ़ रहा है, जहां यह जहाज ईरान में प्रवेश करने के इंतजार में पिछले 7 हफ्तों से रुका हुआ था।  डील के बाद क्रैश हुआ कच्चा तेल  गौरतलब है कि अमेरिका और ईरान में शांति समझौता होने से दुनिया ने राहत की सांस ली है. इसका सबसे बड़ा कारण कच्चा तेल है, जो डोनाल्ड ट्रंप के इस समझौते वाली डील के ऐलान के बाद से लगातार क्रैश हो रहा है. लंबे समय तक 100-110 डॉलर के आसपास रहकर दुनिया के डराने वाले ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत अब 80 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ चुकी है।  अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent Crude Oil Price 79.02 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है, जो इसके तीन महीने का लो लेवल है. वहीं दूसरी ओर WTI Crude Oil Price 76.15 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा है. इसके अलावा मर्बन क्रूड का भाव भी 7 फीसदी से ज्यादा फिसलकर अब 71 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है. तेल सस्ता होने से महंगाई का जोखिम कम हुआ है।   

रेजिडेंसी परमिट को लेकर स्वीडन का बड़ा फैसला, नए कानून से बढ़ी प्रवासियों की चिंता

 स्टॉकहोम  स्वीडन की संसद ने एक नया कानून पारित किया है, जिसके तहत अधिकारियों को प्रवासियों (इमिग्रेंट्स) का रेजिडेंसी परमिट खराब आचरण के आधार पर रद्द करने का अधिकार मिल गया है. इसमें बकाया कर्ज न चुकाना, बिना स्थानीय अधिकारियों को बताए काम करना या चरमपंथी संगठनों से संबंध जैसे कारण शामिल हैं।  ये कानून न केवल लंबित रेजिडेंसी परमिट आवेदनों पर लागू होगा, बल्कि पहले से दिए जा चुके परमिटों की भी समीक्षा कर उन्हें रद्द किया जा सकेगा. यह कदम दक्षिणपंथी सरकार और उसकी सहयोगी राष्ट्रवादी पार्टी स्वीडन डेमोक्रेट्स की सख्त इमिग्रेशन नीति का हिस्सा है. सितंबर में होने वाले संसदीय चुनाव से पहले सरकार लगातार इमिग्रेशन नियमों को कड़ा कर रही है।  नए कानून की हो रही आलोचना हालांकि, विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून की आलोचना की है. उनका कहना है कि यह मनमाना कानून है, क्योंकि इसके तहत ऐसे व्यवहार के आधार पर भी कार्रवाई की जा सकती है जिसे कानूनी रूप से अपराध घोषित नहीं किया गया है।  स्टॉकहोम स्थित मानवाधिकार संगठन सिविल राइट्स डिफेंडर्स ने कहा कि यह 'अच्छे व्यवहार वाला कानून' लोगों के बीच असमंजस पैदा करता है कि उनकी कौन-सी गतिविधि या अभिव्यक्ति उनके खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती है. संगठन के अनुसार, इससे कानून के शासन और कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत को कमजोर किया जाता है।  2022 का चुनाव इस वादे के साथ जीतने वाली सरकार का कहना है कि जो लोग नियमों का पालन नहीं करते या अपराध करते हैं, उनका देश में स्वागत नहीं है।  कानून में यह साफ नहीं किया गया है कि कौन-कौन से व्यवहार अस्वीकार्य माने जाएंगे. हालांकि सरकार ने संकेत दिया है कि बकाया कर्ज, टैक्स न चुकाना, आपराधिक गतिविधियां और चरमपंथी संगठनों से संबंध ऐसे कारण हो सकते हैं।  इन मामलों की समीक्षा स्वीडिश माइग्रेशन एजेंसी करेगी और उसके फैसलों के खिलाफ माइग्रेशन कोर्ट में अपील की जा सकेगी. मार्च में इस विधेयक को पेश करते समय स्वीडन के आव्रजन मंत्री योहान फोर्शेल ने कहा था, 'जो लोग सही तरीके से रहने की कोशिश नहीं करते, उन्हें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वो स्वीडन में बने रह सकेंगे।   

जहां कभी था नक्सलियों का गढ़, आज वहां स्वास्थ्य सेवा का केंद्र; डॉक्टर रामटेके की तपस्या रंग लाई

कांकेर एक समय छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के अंतागढ़ का नाम सुनते ही लोगों के मन में डर बैठ जाता था. घने जंगलों से घिरा यह इलाका नक्सली गतिविधियों का गढ़ माना जाता था. सड़कें कम थीं, संचार के साधन सीमित थे और स्वास्थ्य सुविधाएं लगभग न के बराबर. किसी को गंभीर बीमारी हो जाए तो इलाज से ज्यादा चिंता अस्पताल तक पहुंचने की होती थी. मलेरिया यहां की सबसे बड़ी समस्या थी और हर साल सैकड़ों परिवार इसके कारण तबाह हो जाते थे।  लेकिन आज उसी अंतागढ़ का एक सरकारी अस्पताल पूरे छत्तीसगढ़ के लिए मिसाल बन चुका है. यह बदलाव किसी बड़े बजट, किसी कॉर्पोरेट निवेश या किसी चमत्कार से नहीं आया, बल्कि एक डॉक्टर की 23 साल लंबी तपस्या और जिद का नतीजा है. यह कहानी है डॉक्टर भेषज कुमार रामटेके की, जिन्होंने वर्ष 2003 में अंतागढ़ में कदम रखा और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने 23 साल पहले शुरू किए अपने मिशन को अब एक मॉडल में बदल दिया है।  जब लोगों ने कहा- वहां मत जाओ वर्ष 2003 में जब डॉक्टर भेषज कुमार रामटेके की नियुक्ति सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अंतागढ़ में हुई, तब यह इलाका डॉक्टरों के लिए सबसे कठिन पोस्टिंग मानी जाती थी. नक्सली गतिविधियां लगातार होती थीं. कई गांव ऐसे थे जहां पहुंचने के लिए घंटों पैदल चलना पड़ता था. पूरे विकासखंड में न कोई निजी डॉक्टर था, न नर्सिंग होम और न कोई निजी अस्पताल।  ऐसे माहौल में अधिकांश लोग यहां लंबे समय तक काम करने की कल्पना भी नहीं करते थे. लेकिन डॉक्टर रामटेके ने इसे चुनौती नहीं, बल्कि मिशन के रूप में लिया।  स्थानीय लोग बताते हैं कि शुरुआती दिनों में उन्होंने अस्पताल के कमरे को ही अपना घर बना लिया था. दिन हो या रात, मरीजों के लिए वे हमेशा उपलब्ध रहते. धीरे-धीरे उन्होंने महसूस किया कि इस इलाके की सबसे बड़ी बीमारी केवल मलेरिया नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर लोगों का टूटता भरोसा भी है।  गांव-गांव जाकर समझी लोगों की पीड़ा डॉक्टर रामटेके ने इलाज को केवल अस्पताल तक सीमित नहीं रखा. वे गांवों में जाते, आदिवासी परिवारों के बीच बैठते, उनकी भाषा और जीवनशैली को समझने की कोशिश करते. उन्हें पता चला कि कई लोग बीमारी को सामान्य मानकर इलाज नहीं कराते और जब तक अस्पताल पहुंचते, हालत गंभीर हो चुकी होती।  यहीं से उन्होंने एक अलग रणनीति तैयार की. उनका मानना था कि बीमारी का इलाज अस्पताल में नहीं, बल्कि समाज के भीतर जाकर करना होगा।  मलेरिया बना सबसे बड़ा लक्ष्य उस समय अंतागढ़ में मलेरिया भयावह रूप ले चुका था. वर्ष 2003 में क्षेत्र का API (Annual Parasite Incidence) 51.11 था, जो 2006 तक बढ़कर 70.65 पहुंच गया. केवल वर्ष 2006 में 4,942 मलेरिया मरीज दर्ज किए गए।  स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 95 से 98 प्रतिशत मामले प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम मलेरिया के थे, जो सबसे खतरनाक माना जाता है. सेरेब्रल मलेरिया और अन्य जटिल मामलों के कारण लोगों की जान तक चली जाती थी. डॉक्टर रामटेके ने तय किया कि अगर अंतागढ़ को बदलना है तो सबसे पहले मलेरिया को हराना होगा।  लोगों का भरोसा जीता, फिर बीमारी को हराया उन्होंने स्वास्थ्य विभाग, मिथानिनों, पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय समुदाय को एक साथ जोड़ा. गांवों में रैलियां निकाली गईं, ग्राम सभाएं आयोजित की गईं, दीवारों पर संदेश लिखे गए और घर-घर जाकर लोगों को समझाया गया कि मलेरिया से कैसे बचा जा सकता है।  वर्ष 2010 और 2015 में पूरे इलाके में लॉन्ग लास्टिंग इंसेक्टिसाइडल नेट (LLIN) वितरित किए गए. लोगों को मच्छरदानी के उपयोग की आदत डाली गई।  धीरे-धीरे बदलाव दिखने लगा. लोग समय पर जांच कराने लगे. बुखार होने पर तुरंत अस्पताल पहुंचने लगे. मलेरिया की चेन टूटने लगी।  आज स्थिति यह है कि जहां वर्ष 2006 में 4,942 मरीज थे, वहीं वर्ष 2025 में यह संख्या घटकर सिर्फ 127 रह गई. API 70.65 से गिरकर 1.39 पर पहुंच गया. मलेरिया जनित मौतों और गंभीर मामलों में भी भारी कमी आई।  मलेरिया के बाद अस्पताल की बारी बीमारी पर नियंत्रण मिलने के बाद डॉक्टर रामटेके ने अस्पताल की तस्वीर बदलने का बीड़ा उठाया. उन्होंने “कायाकल्प” योजना के तहत अस्पताल को एक मॉडल संस्थान बनाने की शुरुआत की।  अस्पताल परिसर की साफ-सफाई, वेस्ट मैनेजमेंट, संक्रमण नियंत्रण, मरीजों के लिए बेहतर सुविधाएं, हाइजीन और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों पर लगातार काम किया गया।  एक समय दो कमरों के खपरेल भवन से चलने वाला यह स्वास्थ्य केंद्र आज 30 बिस्तरों वाले व्यवस्थित अस्पताल में बदल चुका है।  350 मानकों पर खरा उतरता अस्पताल कायाकल्प योजना के तहत किसी अस्पताल का मूल्यांकन 350 से अधिक बिंदुओं पर किया जाता है. इसमें साफ-सफाई से लेकर संक्रमण नियंत्रण, मरीजों के अनुभव से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक सब कुछ शामिल होता है। अंतागढ़ अस्पताल ने इन सभी मानकों पर लगातार बेहतर प्रदर्शन किया है. पिछले पांच वर्षों से यह बस्तर संभाग में प्रथम स्थान प्राप्त कर रहा है. वर्ष 2025 में इसे पूरे छत्तीसगढ़ के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में दूसरा स्थान मिला।  एक डॉक्टर की वजह से बदली हजारों जिंदगियां 23 वर्षों तक लगातार एक ही क्षेत्र में काम करना अपने आप में असाधारण है. खासकर तब, जब वह इलाका नक्सल प्रभावित, आदिवासी बहुल और संसाधनों की कमी से जूझ रहा हो।  स्थानीय लोग कहते हैं कि डॉक्टर रामटेके केवल डॉक्टर नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह हैं. कई ऐसे बच्चे हैं जिनका जन्म उनके हाथों हुआ और आज वे युवा हो चुके हैं. कई परिवार ऐसे हैं जो उन्हें भगवान का रूप मानते हैं क्योंकि उन्होंने उनके प्रियजनों की जान बचाई।  अब पूरे छत्तीसगढ़ में लागू होगा मॉडल डॉक्टर रामटेके द्वारा विकसित मलेरिया नियंत्रण और अस्पताल प्रबंधन मॉडल को अब राज्य सरकार पूरे छत्तीसगढ़ में लागू करने की तैयारी कर रही है. अधिकारियों का मानना है कि यदि अंतागढ़ जैसे कठिन क्षेत्र में यह मॉडल सफल हो सकता है, तो राज्य के अन्य हिस्सों में भी स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को नई ऊंचाई मिल सकती है।  डर से भरोसे तक का सफर अंतागढ़ की यह कहानी केवल एक अस्पताल की कहानी नहीं है. यह उस विश्वास की कहानी है जो एक डॉक्टर ने समाज में जगाया. यह … Read more

रेजिडेंसी परमिट को लेकर स्वीडन का बड़ा फैसला, नए कानून से बढ़ी प्रवासियों की चिंता

 स्टॉकहोम  स्वीडन की संसद ने एक नया कानून पारित किया है, जिसके तहत अधिकारियों को प्रवासियों (इमिग्रेंट्स) का रेजिडेंसी परमिट खराब आचरण के आधार पर रद्द करने का अधिकार मिल गया है. इसमें बकाया कर्ज न चुकाना, बिना स्थानीय अधिकारियों को बताए काम करना या चरमपंथी संगठनों से संबंध जैसे कारण शामिल हैं।  ये कानून न केवल लंबित रेजिडेंसी परमिट आवेदनों पर लागू होगा, बल्कि पहले से दिए जा चुके परमिटों की भी समीक्षा कर उन्हें रद्द किया जा सकेगा. यह कदम दक्षिणपंथी सरकार और उसकी सहयोगी राष्ट्रवादी पार्टी स्वीडन डेमोक्रेट्स की सख्त इमिग्रेशन नीति का हिस्सा है. सितंबर में होने वाले संसदीय चुनाव से पहले सरकार लगातार इमिग्रेशन नियमों को कड़ा कर रही है।  नए कानून की हो रही आलोचना हालांकि, विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून की आलोचना की है. उनका कहना है कि यह मनमाना कानून है, क्योंकि इसके तहत ऐसे व्यवहार के आधार पर भी कार्रवाई की जा सकती है जिसे कानूनी रूप से अपराध घोषित नहीं किया गया है।  स्टॉकहोम स्थित मानवाधिकार संगठन सिविल राइट्स डिफेंडर्स ने कहा कि यह 'अच्छे व्यवहार वाला कानून' लोगों के बीच असमंजस पैदा करता है कि उनकी कौन-सी गतिविधि या अभिव्यक्ति उनके खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती है. संगठन के अनुसार, इससे कानून के शासन और कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत को कमजोर किया जाता है।  2022 का चुनाव इस वादे के साथ जीतने वाली सरकार का कहना है कि जो लोग नियमों का पालन नहीं करते या अपराध करते हैं, उनका देश में स्वागत नहीं है।  कानून में यह साफ नहीं किया गया है कि कौन-कौन से व्यवहार अस्वीकार्य माने जाएंगे. हालांकि सरकार ने संकेत दिया है कि बकाया कर्ज, टैक्स न चुकाना, आपराधिक गतिविधियां और चरमपंथी संगठनों से संबंध ऐसे कारण हो सकते हैं।  इन मामलों की समीक्षा स्वीडिश माइग्रेशन एजेंसी करेगी और उसके फैसलों के खिलाफ माइग्रेशन कोर्ट में अपील की जा सकेगी. मार्च में इस विधेयक को पेश करते समय स्वीडन के आव्रजन मंत्री योहान फोर्शेल ने कहा था, 'जो लोग सही तरीके से रहने की कोशिश नहीं करते, उन्हें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वो स्वीडन में बने रह सकेंगे।   

नौसेना के ‘फ्लाइंग फ्रिगेट’ का युग समाप्त, सी-किंग एमके 42बी स्क्वॉड्रन हुआ रिटायर

नई दिल्ली भारतीय नौसेना ने अपने सबसे भरोसेमंद और शक्तिशाली सी किंग एमके 42बी (Sea King Mk 42B) हेलिकॉप्टर के मुख्य स्क्वाड्रन को आधिकारिक तौर पर रिटायर कर दिया है. तीन दशकों से भी अधिक समय तक भारतीय समुद्री सीमाओं की सुरक्षा करने वाले और नौसैनिक अभियानों की रीढ़ माने जाने वाले इस हेलिकॉप्टर को फ्लाइंग फ्रिगेट यानी उड़ता हुआ युद्धपोत के नाम से जाना जाता था।   मुंबई स्थित नौसैनिक एयर स्टेशन 'आईएनएस शिक्रा' (INS Shikra) पर तैनात आईएनएएस 330 हारपून्स स्क्वाड्रन द्वारा संचालित इस सी किंग बेड़े ने देश की 36 वर्षों तक शानदार सेवा की. अब इसे आधिकारिक तौर पर नंबर-प्लेटेड यानी निष्क्रिय कर दिया गया है।  मुख्य स्क्वाड्रन के हटने के बाद अब नौसेना के पास केवल एक अंतिम सक्रिय सी किंग स्क्वाड्रन बचा है, जिसमें पुराने सी किंग एमके 42सी वेरिएंट के कुछ ही हेलिकॉप्टर बचे हैं, जिनका इस्तेमाल भी आने वाले समय में चरणबद्ध तरीके से बंद कर दिया जाएगा।  क्या रही सी किंग की ऐतिहासिक भूमिका? मुख्य बेड़े की विदाई के बाद बचे हुए कुछ गिने-चुने सी किंग हेलिकॉप्टर्स का संचालन अब विशाखापत्तनम स्थित 'आईएनएस डेगा' पर तैनात आईएनएएस 350 'सारस' स्क्वॉड्रन द्वारा किया जा रहा है. इन हेलिकॉप्टरों को अब मुख्य युद्धक भूमिकाओं से हटाकर प्राथमिक रूप से खोज और बचाव अभियानों तथा विशेष नौसैनिक अभियानों के बैकअप सपोर्ट के काम में लगाया गया है।  अपने गौरवशाली इतिहास में ब्रिटिश-निर्मित सी किंग हेलिकॉप्टरों ने समुद्र में भारत की ताकत का लोहा मनवाया था. यह अकेला ऐसा विमान था जो दुश्मन की पनडुब्बियों को खोजकर नष्ट करने, समुद्री जहाजों पर हमला करने, चौबीसों घंटे समुद्री निगरानी रखने के साथ-साथ गंभीर चक्रवातों और आपदाओं के दौरान मानवीय सहायता व बचाव कार्यों में सबसे आगे रहता था।  बड़े युद्धपोतों पर आसानी से लैंड करने और अत्यधिक घातक हथियारों से लैस होने के कारण ही नौसैनिक इसे 'फ्लाइंग फ्रिगेट' कहते थे।  अमेरिकी 'रोमियो' की एंट्री: एमएच-60आर सीहॉक संभालेंगे देश की कमान सी किंग हेलिकॉप्टरों की इस विदाई का मतलब यह नहीं है कि समुद्र में भारत की नजर कमजोर होगी; बल्कि यह नौसेना के आधुनिक और अधिक घातक रोटरी-विंग प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ने का एक बड़ा रणनीतिक कदम है।  इन बूढ़े हो चुके हेलिकॉप्टरों की जगह लेने के लिए भारत ने अमेरिका से अत्याधुनिक एमएच-60आर सीहॉक रोमियो हेलिकॉप्टरों को अपने बेड़े में शामिल करना शुरू कर दिया है. भारत ने अमेरिकी सरकार के साथ एक सरकारी सौदे के तहत कुल 24 एमएच-60आर हेलिकॉप्टरों का ऑर्डर दिया था, जिनमें से 21 हेलिकॉप्टर भारत को मिल चुके हैं।  इन 21 में से 15 रोमियो हेलिकॉप्टर वर्तमान में फ्रंटलाइन युद्धपोतों के साथ पूरी तरह से ऑपरेशनल हैं, जबकि तीन हेलिकॉप्टरों को अमेरिकी जमीन पर ही भारतीय पायलटों और क्रू मेंबर्स की एडवांस ट्रेनिंग के लिए रखा गया है।  बाकी बचे हेलिकॉप्टरों में भारत की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल जरूरी बदलाव और सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया चल रही है, जिसके बाद वे भी मुख्य सेना का हिस्सा बन जाएंगे।  अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन द्वारा निर्मित एमएच-60आर को दुनिया का सबसे आधुनिक नौसैनिक हेलिकॉप्टर माना जाता है, जो एडवांस सेंसर, एमके-54 टॉरपीडो और एजीएम-114 हेलफायर मिसाइलों से लैस है. इसके आने से हिंद महासागर में चीन की पनडुब्बियों पर नजर रखना भारत के लिए बेहद आसान हो जाएगा। 

6.30 लाख ग्राहकों के लिए खुशखबरी, पोस्ट ऑफिस से निकासी के लिए पासबुक जरूरी नहीं

 रायबरेली  जिले के करीब 6.50 लाख डाकघर खाताधारकों के लिए राहत भरी खबर है। अब पासबुक साथ न होने पर भी आधार कार्ड के माध्यम से मुख्य डाकघर, उपडाकघर और ग्रामीण शाखा डाकघरों से जमा-निकासी की सुविधा मिल सकेगी। इससे विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के खाताधारकों को बड़ी सहूलियत होगी। डाक विभाग ने अन्य बैंकों की तर्ज पर आधार आधारित लेनदेन एईपीएस (आधार-सक्षम भुगतान प्रणाली) की सुविधा लागू कर दी है। इसके तहत खाताधारक आधार संख्या और बायोमेट्रिक सत्यापन के जरिए अपने खाते से नकदी निकालने के साथ ही धनराशि जमा भी करा सकेंगे। इससे पासबुक खो जाने या साथ न होने की स्थिति में भी बैंकिंग कार्य प्रभावित नहीं होगा। जिले में दो मुख्य डाकघर और 54 उपडाकघर संचालित हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में शाखा डाकघरों के माध्यम से भी यह सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। डाक अधीक्षक अनूप अग्रवाल का कहना है कि 6.50 लाख खाताधारकों को इस सुविधा का लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि आधार आधारित जमा-निकासी प्रणाली पूरी तरह सुरक्षित है और बायोमेट्रिक सत्यापन के बाद ही लेनदेन किया जाएगा।

नैनो यूरिया और नैनो डीएपी से किसान मनोहर यादव की खेती बनी अधिक लाभकारी

रायपुर  छत्तीसगढ़ शासन द्वारा कृषि क्षेत्र में नवाचार और वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयास किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं। जांजगीर-चांपा जिले के नवागढ़ विकासखंड अंतर्गत ग्राम कचंदा निवासी किसान  मनोहर यादव इसकी एक प्रेरणादायक मिसाल हैं। नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के उपयोग से उन्होंने अपनी खेती की लागत कम करने के साथ-साथ उत्पादन और आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हासिल की है। लगभग दो एकड़ भूमि पर खेती करने वाले  यादव पहले बढ़ती कृषि लागत और उत्पादन की अनिश्चितता से चिंतित रहते थे। कृषि विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन तथा राज्य शासन की किसान हितैषी पहलों से प्रेरित होकर उन्होंने पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने का निर्णय लिया और अपनी फसलों में नैनो यूरिया एवं नैनो डीएपी का प्रयोग शुरू किया। नई तकनीक के परिणाम शीघ्र ही सामने आने लगे। नैनो उर्वरकों के उपयोग से फसलों को संतुलित पोषण मिला, जिससे पौधों की वृद्धि बेहतर हुई और उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई। साथ ही उर्वरकों पर होने वाला खर्च भी कम हुआ, जिससे खेती की लागत नियंत्रित करने में मदद मिली। कम मात्रा में अधिक प्रभावी साबित होने वाले नैनो उर्वरकों ने उनकी खेती को पहले की तुलना में अधिक लाभकारी बना दिया है।  मनोहर यादव बताते हैं कि नैनो उर्वरकों का परिवहन और उपयोग बेहद सरल है, जिससे समय और श्रम दोनों की बचत होती है। बेहतर गुणवत्ता वाली फसल और बढ़ी हुई पैदावार का सीधा लाभ उनकी आय में वृद्धि के रूप में मिला है। उन्होंने अन्य किसानों से भी आधुनिक कृषि तकनीकों और वैज्ञानिक खेती को अपनाने की अपील करते हुए कहा कि बदलते समय के साथ नवाचार आधारित खेती ही समृद्धि का मार्ग है। उनका मानना है कि नई तकनीकों और कृषि विभाग के मार्गदर्शन का लाभ उठाकर किसान कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त कर अपनी आर्थिक स्थिति को सशक्त बना सकते हैं।

राखी के त्योहार पर ग्रहण की छाया, क्या बदलेगा रक्षाबंधन मनाने का तरीका?

इंदौर  रक्षाबंधन का पावन पर्व इस बार 28 अगस्त दिन शुक्रवार को सावन पूर्णिमा के दिन मनाया जाएगा. लेकिन इस दिन साल 2026 का अंतिम चंद्र ग्रहण भी लगने वाला है. यह ग्रहण कुंभ राशि और शतभिषा नक्षत्र में घटित होने वाला है. ऐसे में रक्षाबंधन के पर्व को लेकर लोगों के मन में बड़ा सवाल आ रहा है कि जब रक्षाबंधन के दिन चंद्र ग्रहण लग रहा है तो क्या राखी बांधने को लेकर नियम और तिथि बदल जाएगी. ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के दौरान कई शुभ कार्यों से परहेज करने की सलाह दी जाती है, लेकिन इसकी मान्यता ग्रहण की दृश्यता पर भी निर्भर करती है. आइए जानते हैं रक्षाबंधन के दिन चंद्र ग्रहण होने से क्या राखी बांधने में कोई बाधा आएगी… इस समय लगेगा चंद्र ग्रहण भारतीय समय के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन लगने वाले चंद्र ग्रहण की शुरुआत सुबह 6 बजकर 53 मिनट से होगी और दोपहर 12 बजकर 32 मिनट को ग्रहण का समापन होगा. ग्रहण की कुल अवधि लगभग 5 घंटे 39 मिनट बताई जा रही है और यह एक गहरा आंशिक ग्रहण होगा. इस दौरान चंद्रमा का बड़ा पृथ्वी की छाया में ढक जाएगा. इस दौरान चंद्रमा गहरा लाल या तांबे के रंग जैसा नजर आएगा, इसी वजह से इसे ब्लड मून भी कहा जाएगा. यह ग्रहण अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर में पूरी तरह दिखाई देने वाला है।  इस राशि और नक्षत्र में लग रहा है चंद्र ग्रहण ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन लगने वाला चंद्र ग्रहण कुंभ राशि और शतभिषा नक्षत्र में घटित होने वाला है. हालांकि, ग्रहण से जुड़े नियमों का पालन करने वाले कुछ लोग ग्रहण काल के दौरान भोजन ना करने, गर्भवती महिलाओं को घर पर रहने की सलाह, मंत्र जाप करने और भगवान का स्मरण करने जैसी परंपराओं का पालन करते हैं. लेकिन जहां ग्रहण दिखाई नहीं देता, वहां इन नियमों को अनिवार्य नहीं माना जाता।  किस राशि और नक्षत्र में लगेगा ग्रहण ज्योतिषीय नजरिए से देखा जाए, तो यह ग्रहण कुंभ राशि और शतभिषा नक्षत्र में होगा, जिससे यह इस राशि के जातकों के लिए खास रूप से महत्वपूर्ण है। हालांकि ग्रहण का असल प्रभाव हर व्यक्ति की कुंडली के मुताबिक भिन्न होता है, जिसका मतलब है कि, इसका प्रभाव सार्वभौमिक नहीं है। रक्षा बंधन पर चंद्र ग्रहण का प्रभाव विशेषज्ञों के मुताबिक, साल का दूसरा चंद्र ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, ग्रहण का असर सिर्फ उन्हीं हिस्सों में पड़ता है, जहां इसे देखा जा सकता है। इसलिए ग्रहण के दौरान अशुभ माने जाने वाला सूतक काल भी भारत में लागू नहीं होगा। इसका मतलब है कि रक्षा बंधन बिना किसी बाधा के मनाया जा सकता है। बहनें अपने भाइयों को शुभ अवसर पर राखी बांध सकती हैं। हालांकि भाद्र काल में राखी बांधने से सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि यह काल राखी के लिए काफी अशुभ माना जाता है। साल का दूसरा चंद्र कहां दिखाई देगा? साल का दूसरा चंद्र ग्रहण मुख्य रूप से अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और प्रशांत एवं अटलांटिक महासागरों के आसपास के हिस्सों में दिखाई दे सकता है। इन स्थानों पर दर्शक चंद्रमा को एक अलग रंग में देखेंगे, जिससे इस खगोलीय घटना का आकर्षण और भी बढ़ जाएगा। कुल मिलाकर इस साल रक्षा बंधन पर चंद्र ग्रहण का साया रहने वाला है, लेकिन भारत में यह नहीं दिखाई देगा इसलिए इसके नकारात्मक प्रभाव मान्य नहीं होंगे। इस तरह भाई-बहन का त्योहार खुलकर मनाया जा सकेगा। भारत में दिखाई नहीं देगा चंद्र ग्रहण ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि इस बार लगने वाला चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा. ऐसे में देश के अधिकांश हिस्सों में रक्षाबंधन के पर्व पर ग्रहण का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं माना जाएगा. बहनें शुभ मुहूर्त में अपने भाइयों को राखी बांध सकेंगी और पर्व की पारंपरिक रस्में सामान्य रूप से संपन्न की जा सकेंगी. चूंकि यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा इसलिए इस ग्रहण का सूतक काल भी मान्य नहीं होगा. जानकारी के लिए बता दें कि चंद्र ग्रहण का सूतक काल ग्रहण से लगभग 9 घंटे पहले शुरू हो जाता है।  श्रद्धालु अनावश्यक भ्रम से बचें रक्षाबंधन के दिन चंद्रग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा. ऐसे में आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है, बिना किसी संशय के आप भाई-बहन के इस पावन पर्व को मनाएं. लेकिन भद्राकाल का ध्यान जरूर रखें क्योंकि भद्रा के समय राखी बांधना अशुभ माना जाता है. रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक माना जाता है. इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनके सुख, समृद्धि और लंबी आयु की कामना करती हैं, जबकि भाई उनकी रक्षा का संकल्प लेते हैं. ऐसे में ग्रहण को लेकर फैली शंकाओं के बीच विद्वानों का कहना है कि श्रद्धालुओं को अनावश्यक भ्रम से बचना चाहिए। 

पेंशनर्स के परिवारों को राहत, फैमिली पेंशन के लिए नया खाता खोलने की जरूरत नहीं

नई दिल्ली  केंद्रीय पेंशनभोगियों और उनके जीवनसाथी के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और राहत भरी खबर है. पेंशन और पेंशनभोगी कल्याण विभाग (DoPPW) तथा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के अनुसार, मुख्य पेंशनभोगी के निधन के बाद उनके पति या पत्नी के साथ चल रहा जॉइंट बैंक अकाउंट बंद नहीं किया जाएगा. इसके साथ ही, फैमिली पेंशन शुरू कराने के लिए जीवित जीवनसाथी को कोई भी नया सिंगल बैंक अकाउंट खोलने की आवश्यकता नहीं होगी. सरकार के इस कदम का मुख्य उद्देश्य संकट की घड़ी में बुजुर्गों को बैंकों की लंबी कागजी कार्रवाई और चक्कर काटने से बचाना है।  क्या है नया नियम और व्यवस्था? पेंशन विभाग और बैंकिंग नियमों के मुताबिक, यदि पेंशनभोगी का अपने जीवनसाथी के साथ "आइदर और सर्वाइवर" (Either or Survivor) या "फॉर्मर और सर्वाइवर" मोड में संयुक्त खाता है, तो पेंशनभोगी की मृत्यु के बाद उसी खाते में फैमिली पेंशन ट्रांसफर की जाएगी. बैंक इस मौजूदा जॉइंट अकाउंट को ही सिंगल अकाउंट में परिवर्तित कर देगा. इसके लिए पूरी बैंकिंग प्रक्रिया को नए सिरे से दोहराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है।  फैमिली पेंशन शुरू कराने की आसान प्रक्रिया पेंशनभोगी के निधन के बाद परिवार को सबसे पहले संबंधित बैंक शाखा को सूचित करना होगा. इसके लिए जीवनसाथी को केवल निम्नलिखित दस्तावेज जमा करने होंगे:     मृत्यु प्रमाण पत्र: पेंशनभोगी के निधन की आधिकारिक पुष्टि के लिए.     PPO की कॉपी: यदि पीपीओ में पति/पत्नी का नाम फैमिली पेंशन के लिए पहले से दर्ज है, तो काम बेहद आसान हो जाता है।      साधारण आवेदन पत्र और KYC: बैंक खाते का स्टेटस अपडेट करने के लिए एक साधारण फॉर्म और पहचान पत्र।  इन दस्तावेजों को जमा करते ही बैंक केंद्रीय पेंशन प्रसंस्करण केंद्र (CPPC) को सूचना भेजेगा और उसी खाते में फैमिली पेंशन क्रेडिट होना शुरू हो जाएगी. इस प्रक्रिया में जीवित पति/पत्नी को 'फॉर्म 14' भरने की भी जरूरत नहीं पड़ती।  देरी से बचने के लिए अभी करें ये काम विशेषज्ञों के अनुसार, अक्सर फैमिली पेंशन में देरी नियमों की वजह से नहीं, बल्कि दस्तावेजों में कमियों के कारण होती है. इसलिए पेंशनभोगियों को समय रहते ये कदम उठाने चाहिए: नाम की स्पेलिंग जांचें: सुनिश्चित करें कि पीपीओ, आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक खाते में जीवनसाथी के नाम की स्पेलिंग बिल्कुल एक जैसी हो।  KYC अपडेट रखें: बैंक खाते का नो-योर-कस्टमर (KYC) रिकॉर्ड हमेशा अपडेटेड रखें ताकि खाता कभी फ्रीज न हो।  जॉइंट अकाउंट मोड: यदि खाता जॉइंट नहीं है, तो उसे तुरंत 'आइदर या सर्वाइवर' मोड में बदलवा लें। 

काकोली घोष दस्तीदार का बड़ा राजनीतिक कदम, NCPI की कमान संभाली; NDA में एंट्री की तैयारी

कोलकाता तृणमूल कांग्रेस (TMC) से बगावत करने वाले सांसदों ने दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बचने के लिए एक बड़ा 'मास्टरस्ट्रोक' चला है। 20 बागी टीएमसी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय कर लिया है और अब इस पार्टी की कमान पूरी तरह से अपने हाथों में ले ली है। कभी टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी की बेहद करीबी मानी जाने वालीं और इस बगावत का प्रमुख चेहरा बनीं काकोली घोष दस्तीदार को NCPI का नया अध्यक्ष चुन लिया गया है। कैसे हुआ यह 'तख्तापलट'? सूत्रों के मुताबिक, बागी गुट और NCPI के बीच एक आपसी सहमति से यह टेकओवर हुआ है। काकोली घोष की ताजपोशी से ठीक दो दिन पहले NCPI की तत्कालीन अध्यक्ष शेवली कुंडू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद 30 मई को चार बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार को आधिकारिक तौर पर इस पार्टी (NCPI) का अध्यक्ष चुन लिया गया। रविवार को 20 बागी सांसदों के गुट ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की और उन्हें इस अनजान पार्टी के साथ अपने विलय की आधिकारिक जानकारी दी, जिसके बाद से यह पार्टी रातों-रात राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गई है। अभिषेक बनर्जी से नाराजगी बनी बगावत की वजह टीएमसी के भीतर मचे इस घमासान की असल जड़ ममता बनर्जी के भतीजे और पार्टी के अघोषित उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी को माना जा रहा है। बागी सांसदों का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी का रवैया बेहद 'अहंकारी' है और उन्होंने पार्टी के आंतरिक ढांचे को पूरी तरह दरकिनार कर दिया है। इसी कथित मनमानी के चलते सांसदों में गुस्सा पनपा, जो अंततः इस बड़ी बगावत में तब्दील हो गया। बीजेपी नेताओं का मिला परदे के पीछे से साथ इस पूरे घटनाक्रम में बीजेपी आधिकारिक तौर पर तो कुछ नहीं कह रही है, लेकिन बागी सांसदों को उसका पूरा सहयोग मिला है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और अनुभवी सांसद निशिकांत दुबे ने बागी गुट के साथ लगातार चर्चा कर उनकी आगे की रणनीति तय करने में अहम भूमिका निभाई। बागी सांसदों की कई अहम बैठकें सीधे केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर ही हुईं। NDA में शामिल होने की अपील रविवार को स्पीकर ओम बिरला को दिए गए विलय के पत्र में इन 20 सांसदों ने खुद को बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA का हिस्सा बताया है। उन्होंने मांग की है कि चूंकि अब तक वे टीएमसी के साथ विपक्ष में बैठते थे, इसलिए अब उन्हें सत्ताधारी गठबंधन (NDA) के साथ सीटें आवंटित की जाएं। क्या है NCPI (नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया)? NCPI को जनवरी 2023 में एक राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता मिली थी। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में इसका पता पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के सांकराइल का है। यह पार्टी चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड 2000 से अधिक गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (RUPPs) में से एक है। साल 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने 4 उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से एक उम्मीदवार को सबसे ज्यादा महज 536 वोट ही मिल सके थे। सुदीप बंद्योपाध्याय भी बागियों के साथ छह बार के सांसद और बागियों में सबसे वरिष्ठ सदस्य सुदीप बंद्योपाध्याय भी कुछ दिन पहले ही इस गुट में शामिल हो गए हैं। उन्होंने यह कदम काकोली घोष के NCPI के 'राजनीतिक मामलों की समिति' द्वारा अध्यक्ष चुने जाने के बाद उठाया। आगे क्या होगा? अगर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला इस विलय को अपनी मंजूरी दे देते हैं, तो यह भारतीय राजनीति का एक बड़ा उलटफेर होगा। कल तक संसद या किसी भी राज्य विधानसभा में एक भी सदस्य न रखने वाली पार्टी NCPI रातों-रात लोकसभा की 5वीं सबसे बड़ी पार्टी और सत्ताधारी NDA का दूसरा सबसे बड़ा दल बन जाएगी।