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न्यू ईयर से पहले बड़ा फैसला: दिल्ली की क्रिसमस पार्टियों में नहीं होंगे पटाखे

नई दिल्ली  साल 2025 खत्म होने को है। राजधानी दिल्ली नए साल का जश्न मनाने को तैयार है। क्रिसमस की रौनक और न्यू ईयर की धूम के लिए दिल्ली के क्लब, रेस्टोरेंट और बार पूरी तरह तैयार हैं। लेकिन इस बार पार्टी में एक बड़ा बदलाव आने वाला है। अब इन जगहों पर पटाखे फोड़ने की सख्त मनाही है। गोवा के नाइट क्लब में हुए खौफनाक हादसे के बाद ये फैसला लिया गया। हाल ही में गोवा के एक नाइटक्लब में लगी भीषण आग ने सबको हिला कर रख दिया। इस हादसे में कम से कम 25 लोगों की जान चली गई। इसी को ध्यान में रखते हुए दिल्ली के आबकारी विभाग ने फैसला लिया है कि पार्टी की मस्ती में सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। क्लब और रेस्टोरेंट वालों को सख्त हिदायत 10 दिसंबर को जारी आदेश में विभाग ने सभी होटल, क्लब और रेस्टोरेंट (HCR) लाइसेंस धारकों को चेतावनी दी है। फायर NOC हमेशा वैलिड रखें। फायर सेफ्टी सिस्टम पूरी तरह चालू हालत में हों। इसके अलावा परिसर में किसी भी तरह के पटाखे चाहे पारंपरिक हों या इलेक्ट्रिक पूरी तरह बैन हैं। अगर कोई गलती हुई तो दिल्ली एक्साइज एक्ट 2009 और नियम 2010 के तहत सख्त कार्रवाई होगी। लाइसेंस सस्पेंड या कैंसल तक हो सकता है। दिल्ली में कितने जगहों पर लागू होगा ये नियम? शहर में करीब 950 रेस्टोरेंट, बार और क्लब आबकारी विभाग के साथ रजिस्टर्ड हैं। खास बात ये कि 90 वर्ग मीटर या उससे ज्यादा एरिया वाले सभी प्रतिष्ठानों को अपना फायर NOC समय पर रिन्यू कराना अनिवार्य है। कोई बहाना नहीं चलेगा।  

जस्टिस जे. निशा बानो का केरल HC ट्रांसफर: राष्ट्रपति के आदेश के साथ जॉइनिंग की डेडलाइन तय

केरल मद्रास हाईकोर्ट की जज जे. निशा बानो को केरल हाईकोर्ट में ट्रांसफर किए जाने के लगभग दो महीने बाद भी उन्होंने पदभार ग्रहण नहीं किया है, जिसके बाद राष्ट्रपति ने उन्हें 20 दिसंबर, 2025 तक केरल हाईकोर्ट में पदभार ग्रहण करने का निर्देश दिया है। कानून मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि, राष्ट्रपति, भारत के चीफ जस्टिस से परामर्श करने के बाद मद्रास हाईकोर्ट की जज न्यायमूर्ति जे. निशा बानो को 20 दिसंबर 2025 को या उससे पहले केरल हाईकोर्ट में अपना पदभार ग्रहण करने का निर्देश देते हुए प्रसन्न हैं। केंद्र सरकार ने जज बानो के मद्रास हाईकोर्ट से केरल हाईकोर्ट में ट्रांसफर की अधिसूचना 14 अक्टूबर, 2025 को जारी की थी। हालांकि, लगभग दो महीने बीत जाने के बाद भी उन्होंने केरल हाईकोर्ट में कार्यभार नहीं संभाला था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस देरी ने केरल हाईकोर्ट बार के सदस्यों के बीच बेचैनी पैदा कर दी थी। बार की प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया देते हुए, न्यायमूर्ति बानो ने पिछले महीने एक समाचार पत्र को बताया था कि उन्होंने अपने बेटे के विवाह के मद्देनजर मद्रास हाईकोर्ट में अर्जित अवकाश के लिए आवेदन किया था। साथ ही, उन्होंने कहा था कि वह अपने ट्रांसफर पर पुनर्विचार के लिए किए गए अनुरोध के परिणाम का भी इंतजार कर रही थीं। इस बीच कांग्रेस सांसद केएम सुधा आर ने शुक्रवार को लोकसभा में प्रश्न उठाते हुए केंद्रीय कानून मंत्रालय से स्पष्टीकरण मांगा। उन्होंने पूछा कि क्या न्यायमूर्ति बानो अभी भी मद्रास हाईकोर्ट के कॉलेजियम का हिस्सा हैं और क्या उन्होंने जजों के रूप में नियुक्ति के लिए अनुशंसित उम्मीदवारों की किसी सूची पर हस्ताक्षर किए हैं। सांसद ने यह भी पूछा कि क्या जज ने अपने ट्रांसफर पर पुनर्विचार की मांग की थी। इसके जवाब में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सीधे तौर पर इन सवालों का जवाब नहीं दिया। इसके बजाय, उन्होंने न्यायिक नियुक्तियों और ट्रांसफरों को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक और प्रक्रियात्मक ढांचे को रेखांकित किया। मंत्री ने संविधान के अनुच्छेद 217 का उल्लेख करते हुए कहा कि एक जज को दूसरे हाईकोर्ट में ट्रांसफर किए जाने पर अपना वर्तमान पद खाली करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति बानो के ट्रांसफर की अधिसूचना 14 अक्टूबर, 2025 को जारी की गई थी और उन्होंने अनुच्छेद 217 (1) (ग) का हवाला दिया, जिसमें प्रावधान है कि राष्ट्रपति द्वारा किसी अन्य हाईकोर्ट में ट्रांसफर किए जाने पर जज का पद रिक्त हो जाएगा।  

बंटवारे के बाद नया अध्याय: पाकिस्तान में शुरू हुआ संस्कृत कोर्स, पाठ्यक्रम में गीता-महाभारत

इस्लामाबाद  भारत और पाकिस्तान भले ही कभी एक ही रहे हों लेकिन आज दोनों देश के बीच राजनीतिक दूरियां इतनी बढ़ गई हैं कि अंतरराष्ट्रीय पटल पर दोनों देश एक दूसरे के दुश्मन बन गए हैं। वहीं इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि दोनों देशों की संस्कृति एक ही बीजे से उपजे हुए दो पौधों की तरह है जिसमें समानता को कभी खत्म नहीं किया जा सकता है। बंटवारे के बाद पहली बार है जब पाकिस्तान के किसी विश्वविद्यालय में संस्कृति का कोर्स शुरू किया गया है। इतना ही नहीं तैयारी यह भी है कि आने वाले समय में पाकिस्तान में भी भगवद्गीता और महाभारत की शिक्षा दी जाएगी।   लाहौर यनिवर्सिटी ऑफि मैनेजमेंट साइंसेज (LUMS) ने पारंपरिक भाषाओं के चार क्रेडिट कोर्स शुरू किए हैं। इसमें से एक संस्कृत भी है। फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज में समाजशास्त्र के असोसिएट प्रोफेसर डॉ. शाहिद रशीद के प्रयासों से यह सं हो बपाया है। वह खुद भी संस्कृत के विद्वान हैं। द ट्रि्ब्यून से बातचीत में उन्होंने बताया कि पारंपरिक भाषाओं में ज्ञान का सागर छइा है। मैंने पहले अरबी और फारसी पढ़ी और इसके बाद संस्कृत पढ़नी शुरू की। उन्होंने कहा, मुझे संस्कृत का व्याकरण समझने में एक साल लग गया और अब भी मैं कोशिश कर रहा हूं। उन्होंने बताया कि तीन महीने की वीकेंड वर्कशॉप में संस्कृत का कोर्स चलाया गया था। इसके बाद छात्रों में संस्कृति के प्रति रुचि दिखाई दी। एलयूएमएस में गुरमानी सेंटर के डायरेक्टर डॉ. अली उस्मान कासिम ने कहा कि पाकिस्तान के इलाके में भी संस्कृत पर बहुत काम हुआ है। अब भी पंजाब यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में संस्कृति की दुर्लभ पुस्तकें और ग्रंथ उपलब्ध हैं। यहां तक कि संस्कृत में लिखे पत्ते भी लाइब्रेरी में मौजूद हैं जिन्हें बाद में जेसीआर वूलनर ने एकत्रित किया था। इनका इस्तेमाल विदेशी शोधकर्ता ही करते हैं। वहीं पाकिस्तान में संस्कृत की शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया। ये हमारी भी भाषा है डॉ. रशीद ने कहा कि बहुत सारे लोगों को लगता है कि यह भाषा हिंदू धार्मक ग्रंथों के लिए ही है। मैं उनको बताना चाहता हूं कि यह पूरे क्षेत्र की भाषा है। संस्कृत के व्याकरण के रचयिता पाणिनि का गांव भी यहीं हुआ करता था। सिंधु सभ्यता के दौरान यहां बहुत ज्यादा लेखन हुआ। संस्कृत एक पर्वत की तरह है जिसमें बहुत सारे खजाने हैं। हमें इनको स्वीकार करना है। यह किसी एक विशेष धर्म से बंधी हुई नहीं है। उन्होंने कहा कि सीमा के दोनों तरफ जब संस्कृत पर काम होगा तो आप कल्पना करिए कि भारत के हिंदू और सिख अरबी पारसी सीखेंगे और पाकिस्तान के मुसलमान संस्कृति सीखेंगे। इससे दक्षिण एशिया में एक भाषा सेतु का निर्माण होगा। उन्होंने कहा कि भाषा की कोई सीमा नहीं होती है। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज हरियाणा के करनाल में रहते थे। वहीं उनकी मां उत्तर प्रदेश के शेखपुरा की रहने वाली हैं। उन्होंने कहा कि देवनागरी लिपि बहुत ही आकर्षक है। गीता और महाभारत पर भी लॉन्च होंगे कोर्स डॉ. कासमी ने कहा कि यूनिवर्सिटी का प्लान महाभारत और भगवद्गीता के कोर्स शुरू करने का भी है। हो सकता है कि 10 से 15 सालों में पाकिस्तान से गीता और महाभारत के भी विद्वान निकलें।  

जापान से लोग हो रहे गायब! एक ही साल में दर्ज हुई जनसंख्या की सबसे बड़ी कमी

टोक्यो अमेरिका भले भी सी-5 ग्रुप में जापान को शामिल करने की तरफ देख रहा हो, लेकिन कभी अपने तकनीक के दम पर दुनिया पर राज करने का सपना देखने वाला यह देश आज घरेलू स्तर पर जूझ रहा है। जापान के लिए उसकी गिरती हुई जनसंख्या एक बड़ा सिरदर्द बन गई है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक साल में जापान की जनसंख्या में से करीब 9 लाख लोग कम हो गए हैं। मतलब पैदा होने वाले और मरने वालों के बीच का फासला करीब 9 लाख के आसपास है। ऐतिहासिक रूप से यह जापान की आबादी की सबसे बड़ी गिरावट है।   करीब 12.5 करोड़ की आबादी वाले जापान के लिए एक साल में 9 लाख लोगों को खोना एक बड़ा झटका है। यह जापान की आबादी का करीब 0.7 फीसदी है, जो कि उसने केवल एक साल में खो दिया है। अरब से ज्यादा आबादी वाले भारत के लिए यह आंकड़ा बेहद कम लगे लेकिन जापान के लिए यह एक बहुत बड़ी और चिंताजनक बात है। जापान पिछले कई वर्षों से लगातार जनसंख्या की गिरावट का सामना कर रहा है। घटती जन्म दर और आबादी की बढ़ती उम्र जापान की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक विकास को भी धीमा कर रही है। जापान की आबादी में युवाओं की आबादी लगातार घट रही है, जबकि बुजुर्गों का अनुपात लगातार बढ़ रहा है। अर्थव्यवस्था पर असर जनसंख्या में लगातार युवाओं आबादी का कम होना जापान के विकास के लिए लगातार परेशानी बढ़ा रहा है। कामकाजी युवाओं की कमी की वजह से आर्थिक विकास मंद पड़ गया है, वहीं दूसरी ओर सरकार के ऊपर लगातार बुजुर्गों को पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं किया जाने वाला खर्च बढ़ाना पड़ रहा है, जिससे आर्थिक मोर्चे पर दोहरा दबाव पड़ रहा है। सरकार के प्रयास नाकाफी जापानी सरकार इस जनसंख्या संकट के उबरने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन उसके प्रयास अभी तक नाकाफी ही साबित हुए हैं। हाल के वर्षों में सरकार की तरफ से बच्चों के जन्म पर आर्थिक सहायता, वर्क लाइफ बैलेंस सुधार और महिलाओं को भागीदारी को बढ़ाने की कोशिश की गई है, लेकिन अभी तक इनका असर जनसंख्या पर देखने को नहीं मिला है। वह लगातार कमी के रिकॉर्ड बनाती जा रही है। जनसंख्या मामले के विशेषज्ञों के मुताबिक अगर जापान अपनी आबादी को बढ़ाने और स्थाई करने का कोई रास्ता जल्दी ही नहीं ढूंढ़ता है, तो आने वाले दशकों में यह एक बड़ा संकट होगा। उस समय पर जनसंख्या का कम होना जापान के लिए केवल आंकड़ों का संकट नहीं रह जाएगा, बल्कि यह भविष्य में देश की दिशा तय करने वाला मुद्दा बन जाएगा।

अमेरिकी संसद में बगावत: ट्रंप के भारत पर 50% टैरिफ के खिलाफ डेमोक्रेट सांसदों ने उठाया विरोध

वॉशिंगटन  अमेरिका में भारत से आयात होने वाले उत्पादों पर लगाए गए भारी टैरिफ को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50 प्रतिशत तक शुल्क लगाने के लिए राष्ट्रीय आपातकाल का हवाला दिया था. अब हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की तीन डेमोक्रेट सांसदों—डेबोरा रॉस (नॉर्थ कैरोलिना), मार्क वीजी (टेक्सास) और भारतीय मूल के राजा कृष्णमूर्ति (इलिनॉय)—ने इस फैसले को चुनौती देते हुए एक प्रस्ताव पेश किया है. सांसदों ने कहा कि यह टैरिफ न केवल अवैध हैं, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों के हितों के खिलाफ हैं. तीनों सांसदों ने साझा बयान में कहा, “ये टैरिफ आम लोगों की जेब पर भार डाल रहे हैं और अमेरिकी व्यवसायों को नुकसान पहुंचा रहे हैं. इसे हटाना अमेरिका-भारत संबंधों के लिए भी महत्वपूर्ण है.” ट्रंप प्रशासन ने 1 अगस्त 2025 को भारत से आने वाले उत्पादों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया था. इसके बाद 27 अगस्त 2025 को भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत सेकेंडरी टैरिफ की घोषणा की गई. इससे कुल शुल्क 50 प्रतिशत तक पहुंच गया. प्रशासन का तर्क था कि भारत अब भी रूस से तेल खरीद रहा है, जिससे मॉस्को को यूक्रेन युद्ध के लिए वित्तीय सहायता मिल रही है. सांसदों की प्रतिक्रिया डेबोरा रॉस ने कहा कि नॉर्थ कैरोलिना की अर्थव्यवस्था भारत से जुड़े निवेश पर निर्भर है. उन्होंने बताया कि भारतीय कंपनियों ने वहां अरबों डॉलर का निवेश किया है और हजारों नौकरियां पैदा की हैं. ऐसे में टैरिफ इस आर्थिक संबंध को नुकसान पहुँचा रहे हैं. मार्क वीजी ने कहा, “ये टैरिफ आम अमेरिकी परिवारों के लिए महंगाई बढ़ाने जैसा है. भारत हमारा महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक सहयोगी है, और ऐसे कदम द्विपक्षीय रिश्तों को कमजोर करते हैं.” राजा कृष्णमूर्ति ने कहा कि टैरिफ अमेरिकी सप्लाई चेन में रुकावट डाल रहे हैं और अमेरिकी मजदूरों को नुकसान पहुँचा रहे हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि टैरिफ हटाने से अमेरिका-भारत के आर्थिक और सुरक्षा संबंध मजबूत होंगे. कांग्रेस बनाम राष्ट्रपति यह प्रस्ताव अमेरिकी कांग्रेस में उस बड़े प्रयास का हिस्सा है, जिसमें डेमोक्रेट्स और कुछ रिपब्लिकन राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों के दुरुपयोग पर अंकुश लगाना चाहते हैं. सांसदों का कहना है कि व्यापार नीति बनाने का अधिकार संविधान के तहत केवल कांग्रेस के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं. वर्तमान में यह प्रस्ताव हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में पेश किया गया है. यदि इसे मंजूरी मिलती है, तो इसे सीनेट में भी पेश किया जाएगा. विशेष बहुमत मिलने पर राष्ट्रपति के वीटो को भी ओवरराइड किया जा सकता है. प्रस्ताव पारित होने पर भारत पर लगे 50 प्रतिशत टैरिफ हट सकते हैं और दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों में सुधार की संभावना बढ़ सकती है.

बीजेपी ने केरल निकाय चुनाव में कांग्रेस को पछाड़ा, लेफ्ट को भी लगा बड़ा झटका

तिरुवनंतपुरम केरल में सत्ता का सेमिफाइनल माने जा रहे अहम स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे अब काफी हद तक साफ हो गए हैं. राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया है. वहीं सत्ताधारी सीपीएम नीत एलडीएफ को इन चुनावों में झटका लगा है. वहीं इन निकाय चुनावों में बीजेपी ने चौंकाने वाला प्रदर्शन किया है. भगवा दल ने तिरुवनंतपुरम सहित कई जिला पंचायतों में जीत दर्ज की है. केरल के 6 नगर निगम, 14 जिला पंचायत, 87 नगर पालिका, 152 ब्लॉक पंचायत और 941 ग्राम पंचायत के लिए चुनाव हुए थे. राज्य के 244 केंद्रों और 14 जिला कलेक्ट्रेट में वोटों की गिनती चल रही है. यहां सभी की नजरें इन नतीजों पर हैं, क्योंकि इससे 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर जनता का रुझान पता चलेगा. स्थानीय निकाय चुनाव इस बार केवल सीटों की गणित तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने राज्य की राजनीति में कुछ ऐसे मुद्दों को भी केंद्र में ला दिया, जो आने वाले विधानसभा चुनावों की दिशा तय कर सकते हैं. लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) का परंपरागत दबदबा बरकरार है, कांग्रेस भी कई इलाकों में मजबूती से लड़ती दिखी, लेकिन बीजेपी के लिए यह चुनाव खास तौर पर अहम माना जा रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह है एर्नाकुलम जिले का मुनंबम इलाका, जहां NDA की जीत को बीजेपी एक "राजनीतिक और सामाजिक टर्निंग पॉइंट" के रूप में पेश कर रही है. बीजेपी के केरल महासचिव अनूप एंटनी जोसेफ ने मुनंबम वार्ड में NDA की जीत को "ऐतिहासिक" बताया है. बीजेपी नेता का दावा है कि मुनंबम में करीब 500 ईसाई परिवार वक्फ बोर्ड के कथित अवैध दावों की वजह से अपने घरों से बेदखली के खतरे का सामना कर रहे थे. अनूप एंटनी के मुताबिक, मोदी सरकार और बीजेपी ने इस मुद्दे पर खुलकर इन परिवारों का साथ दिया, उसी का नतीजा है कि लोगों ने स्थानीय चुनाव में बीजेपी को अपना समर्थन दिया. सात दशक पुराना है वक्फ विवाद की जड़ मुनंबम वक्फ विवाद की जड़ें आज से करीब सात दशक पुरानी हैं. 1950 में सिद्दीकी सैत नामक व्यक्ति ने यह जमीन फरीद कॉलेज को दान की थी. इसके बाद कॉलेज प्रशासन ने इस भूमि के कुछ हिस्से स्थानीय निवासियों को बेच दिए, जबकि इन इलाकों में लोग पहले से रह रहे थे. साल 2019 में केरल वक्फ बोर्ड ने इस पूरी जमीन को वक्फ संपत्ति के तौर पर रजिस्टर कर दिया, जिससे पहले हुए सभी सौदे अमान्य माने जाने लगे. इसके बाद सैकड़ों परिवारों के सामने बेदखली का संकट खड़ा हो गया. 410 परिवारों के बेदखली का डर इस फैसले के खिलाफ मुनंबम और चेराई इलाकों में 410 दिनों से भी ज्यादा समय तक आंदोलन चला. प्रभावित परिवारों ने कोझिकोड वक्फ ट्रिब्यूनल में चुनौती दी, वहीं राज्य सरकार ने जमीन के स्वामित्व की जांच के लिए सीएन रामचंद्रन नायर आयोग का गठन किया. 2025 में केरल हाई कोर्ट के एकल पीठ ने इस आयोग को रद्द कर दिया था, लेकिन बाद में डिवीजन बेंच ने आयोग को बहाल करते हुए 2019 के वक्फ रजिस्ट्रेशन को "कानून के अनुरूप नहीं" बताया. सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के फैसले पर लगाई रोक  रिपोर्ट के मुताबिक, 12 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के "नॉट वक्फ" वाले फैसले पर रोक लगा दी और जनवरी 2026 तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया. इससे फिलहाल किसी भी परिवार की बेदखली पर रोक है. मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भी पहले ही भरोसा दिला चुके हैं कि किसी को जबरन नहीं हटाया जाएगा. मुनंबम की जीत को ईसाई समर्थन का संकेत मान रही बीजेपी बीजेपी अब इस पूरे विवाद को "न्याय बनाम अन्याय" की लड़ाई के रूप में पेश कर रही है. मुनंबम में मिली जीत को पार्टी केरल में ईसाई समुदाय के बीच बढ़ते भरोसे का संकेत मान रही है. मसलन, भले ही यह जीत प्रतीकात्मक हो, लेकिन वक्फ जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बीजेपी की आक्रामक राजनीति आने वाले समय में राज्य की चुनावी बहस को और तेज कर सकती है.  

सिद्धीक सैत द्वारा दान की गई भूमि पर 600 परिवारों को बेदखली का खतरा, SC में वक्फ बोर्ड ने की अपील

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने  केरल के एर्नाकुलम जिले की मुनंबम भूमि को वक्फ संपत्ति न मानने संबंधी केरल हाईकोर्ट की टिप्पणी पर अंतरिम रोक लगा दी। न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने इस मामले में अगली सुनवाई तक भूमि की यथास्थिति बनाए रखने का भी आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 27 जनवरी, 2026 को होगी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केरल सरकार द्वारा गठित जस्टिस सी.एन. रामचंद्रन नायर जांच आयोग के कामकाज पर कोई रोक नहीं लगाई गई है और आयोग अपनी जांच जारी रख सकता है। पीठ ने अपने आदेश में कहा- नोटिस जारी किया जाए, छह हफ्ते में जवाब दाखिल हो। मामले को 27 जनवरी 2026 को सूचीबद्ध किया जाए। तब तक हाईकोर्ट के उस आदेश की घोषणा कि विवादित संपत्ति वक्फ नहीं है, स्थगित रहेगी और यथास्थिति बनाए रखी जाए। यह स्पष्ट किया जाता है कि हमने जांच आयोग के काम पर कोई रोक नहीं लगाई है। अदालत ने यह अंतरिम आदेश केरल वक्फ संरक्षण वेदी की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर पारित किया। याचिका में केरल हाईकोर्ट की उस डिवीजन बेंच के फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसने राज्य सरकार द्वारा गठित जांच आयोग को वैध ठहराया था और साथ ही यह टिप्पणी की थी कि मुनंबम की जमीन वक्फ संपत्ति नहीं है। क्या है पूरा विवाद? यह मामला मुनंबम की करीब 135 एकड़ भूमि से जुड़ा है, जिसे वर्ष 1950 में सिद्दीक सैत नामक व्यक्ति ने फारूक कॉलेज को दान में दिया था। उस समय इस भूमि पर स्थानीय परिवार पहले से ही रह रहे थे। बाद में कॉलेज ने भूमि के कुछ हिस्से इन्हीं निवासियों को बेच दिए। विवाद तब गहराया जब 2019 में केरल वक्फ बोर्ड ने इस जमीन को वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत कर दिया, जिससे पहले की गई बिक्री को अवैध माना गया। इसके चलते 600 से अधिक परिवारों को बेदखली का डर सताने लगा और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। वक्फ बोर्ड के इस फैसले को कोझिकोड वक्फ ट्रिब्यूनल में चुनौती दी गई, जहां मामला अभी लंबित है। हाईकोर्ट में क्या हुआ? भूमि विवाद और बढ़ते तनाव के बीच, नवंबर 2024 में केरल सरकार ने इस मुद्दे का समाधान तलाशने के लिए पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सी.एन. रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में एक जांच आयोग गठित किया। इसके खिलाफ केरल वक्फ संरक्षण वेदी ने हाईकोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि वक्फ अधिनियम के तहत आने वाले मामलों में राज्य सरकार को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने इस दलील से सहमति जताते हुए आयोग को रद्द कर दिया। हालांकि, अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एकल न्यायाधीश के फैसले को पलट दिया। डिवीजन बेंच ने न केवल राज्य सरकार के आयोग को वैध ठहराया, बल्कि यह भी कहा कि 2019 में वक्फ बोर्ड द्वारा जमीन का पंजीकरण कानून के विपरीत था। अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि जमीन को वक्फ घोषित करना एक तरह की जमीन पर कब्जा करने की रणनीति जैसा प्रतीत होता है और 1950 का दस्तावेज वक्फनामा नहीं, बल्कि एक गिफ्ट डीड था। सुप्रीम कोर्ट में याचिका डिवीजन बेंच के इन निष्कर्षों को चुनौती देते हुए वक्फ संरक्षण वेदी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने यह तय करके कि जमीन वक्फ है या नहीं, अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर फैसला दिया, जबकि यह मुद्दा पहले से ही वक्फ ट्रिब्यूनल में विचाराधीन है। साथ ही, यह भी तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट का फैसला कार्यपालिका को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप की अनुमति देता है, जहां कानूनन एक अलग वैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है। संक्षिप्त सुनवाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए भूमि की स्थिति को यथावत रखने का आदेश दिया, लेकिन जांच आयोग को अपना काम जारी रखने की अनुमति दे दी। अब सभी की निगाहें 27 जनवरी, 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस संवेदनशील भूमि विवाद की आगे की दिशा तय होगी।  

पुतिन से मिलते वक्त शहबाज शरीफ को 40 मिनट इंतजार, रूस-तुर्की मीटिंग में पाकिस्तान की फजीहत

अश्गाबात तुर्कमेनिस्तान में एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तान की डिप्लोमेसी का मजाक बना है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिलने का कार्यक्रम था. लेकिन पुतिन उनसे मिलने नहीं आए, बल्कि 40 मिनट तक इंतजार कराया. दरअसल पुतिन तब तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन से मुलाकात कर रहे थे. पुतिन का इंतजार करते-करते आखिर शहबाज से रहा नहीं गया और आखिरकार तय प्रोटोकॉल तोड़ते हुए वह पुतिन-एर्दोगन की मीटिंग में घुस गए. इस दौरान पुतिन और एर्दोगन बातचीत कर ही रहे थे. किस जगह हुई पाकिस्तान की डिप्लोमैटिक बेइज्जती? यह पूरा घटनाक्रम तुर्कमेनिस्तान की तटस्थता की 30वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुआ. सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में देखा गया कि शहबाज शरीफ अपने विदेश मंत्री इशाक डार के साथ एक अलग कमरे में बैठे हुए हैं और साफ तौर पर बेचैन नजर आ रहे हैं. तय समय बीत जाने और किसी बुलावे के न आने के बाद शहबाज शरीफ अचानक उस हॉल में पहुंच गए, जहां रूस और तुर्की के राष्ट्रपति आमने-सामने चर्चा  जिसमें देखा जा सकता है कि पुतिन के लिए बैठक में काफी देर तक शरीफ इंतजार करते रहे, लेकिन वह नहीं आए। वह अपने विदेश मंत्री इशाक डार के साथ कमरे में थे। इसके बाद शरीफ अचानक से उठे और बगल में हो रही पुतिन व तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की बंद कमरे की बैठक में घुस गए। हालांकि, वहां भी उनकी बात नहीं हो सकी और सिर्फ दस मिनट बाद वहां से भी रवाना होना पड़ा। सोशल मीडिया पर इसी वीडियो को लेकर शरीफ का मजाक उड़ाया जा रहा है। एक यूजर ने लिखा कि पुतिन भिखारियों पर अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहते हैं। वहीं, एक और यूजर ने कहा कि यह तो इंटरनेशनल बेइज्जती हो गई। एक और यूजर ने कहा कि 40 मिनट पुतिन का दरवाजा खटखटाते थक गए, लेकिन एंट्री नहीं मिली, जैसे शादी में बिना इन्विटेशन घुसने वाला रिश्तेदार। हालांकि बाद में वीडियो हटा दिया। बता दें कि इंटरनेशनल फोरम फॉर पीस एंड ट्रस्ट प्रोग्राम तुर्कमेनिस्तान के अशगाबात में आयोजित किया जा रहा है। इस मीटिंग में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ सहित कई देशों के नेताओं ने हिस्सा लिया है।

कंबोडिया बॉर्डर पर बमबारी, ट्रंप के सीजफायर दावे के विपरीत, थाईलैंड ने दिया कड़ा बयान

न्यूयॉर्क अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीजफायर कराने के दावे के बावजूद दोनों देशों के बीच सीमा पर लड़ाई थमती नहीं दिख रही है. कंबोडिया ने दावा किया है कि शनिवार सुबह भी थाई सेनाएं विवादित सीमा पर हमले कर रही हैं, जबकि थाईलैंड ने उलटे कंबोडिया पर अंतरराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया है. फिलहाल, थाईलैंड और कंबोडिया के बीच विवादित सीमा पर सैन्य टकराव नहीं रुक रहा. यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि उन्होंने दोनों देशों के बीच सीजफायर कराने में अहम भूमिका निभाई है. कंबोडिया के सूचना मंत्रालय ने शनिवार को कहा कि थाई सैन्य बलों ने सीमा पार हमले बंद नहीं किए हैं. मंत्रालय के मुताबिक, थाई सेनाएं अब भी बमबारी कर रही हैं और इन हमलों में फाइटर जेट्स का भी इस्तेमाल किया गया है. कंबोडिया के सूचना मंत्रालय ने बयान में कहा, थाई सेनाओं ने अब तक बमबारी बंद नहीं की है और हमले लगातार जारी हैं. थाईलैंड का पलटवार, कंबोडिया पर गंभीर आरोप वहीं, थाईलैंड की सेना ने कंबोडिया के आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया है. थाई सेना का कहना है कि कंबोडिया बार-बार अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा है. थाईलैंड के मुताबिक कंबोडियाई बलों ने नागरिक इलाकों को निशाना बनाया है और सीमा क्षेत्रों में बारूदी सुरंगें बिछाई हैं. थाईलैंड का आया बयान… बॉर्डर पर बमबारी के बीच थाईलैंड के प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नवीराकुल का बयान आया. उन्होंने कहा, यह बिल्कुल भी कोई रोड एक्सीडेंट नहीं है. थाईलैंड तब तक सैन्य कार्रवाई करता रहेगा, जब तक हमारी जमीन और हमारे लोगों के लिए कोई और नुकसान या खतरा खत्म नहीं हो जाता. मैं यह बात पूरी तरह स्पष्ट करना चाहता हूं. आज सुबह हमारी कार्रवाइयों ने खुद सब कुछ बता दिया है. ट्रंप का दावा… लेकिन दोनों देशों की चुप्पी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार रात थाई प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नवीराकुल और कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन मानेत से फोन पर बातचीत के बाद कहा था कि दोनों देश शुक्रवार से ही सभी तरह की गोलीबारी रोकने पर सहमत हो गए हैं. हालांकि ट्रंप के इस दावे के बाद दोनों देशों के नेताओं के बयानों में किसी औपचारिक सीजफायर समझौते का जिक्र नहीं किया गया. थाई प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नवीराकुल ने साफ कहा कि कोई सीजफायर नहीं हुआ है. जब ट्रंप के दावे पर सवाल किया गया तो थाई विदेश मंत्रालय ने पत्रकारों को प्रधानमंत्री के बयान का हवाला दिया. कंबोडिया ने दोहराई शांतिपूर्ण समाधान की बात कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन मानेत ने शनिवार को फेसबुक पर जारी एक बयान में ट्रंप के साथ हुई बातचीत और मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के साथ पहले हुई चर्चा का जिक्र किया. मानेत ने कहा कि कंबोडिया अब भी विवादों का शांतिपूर्ण समाधान चाहता है. उन्होंने कहा कि कंबोडिया अक्टूबर में मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में हुए पहले के समझौते के तहत ही विवाद सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है. ट्रंप ने सीजफायर पर क्या कहा था? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया था कि थाईलैंड और कंबोडिया शुक्रवार शाम से अपने जॉइंट बॉर्डर पर सभी तरह की सैन्य कार्रवाइयों को रोकने पर सहमत हो गए हैं. ट्रंप ने कहा कि उन्होंने थाई प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नवीराकुल और कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन मानेत से अलग-अलग बातचीत की. उन्होंने इन चर्चाओं को बेहद सकारात्मक बताया और कहा कि इनका मकसद दोनों देशों के लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद में हालिया तनाव को खत्म करना था. ट्रंप के ट्रुथ सोशल पर जारी संदेश के मुताबिक, दोनों नेताओं ने तुरंत सभी तरह की गोलीबारी रोकने और उस शांति ढांचे पर वापस लौटने की प्रतिबद्धता जताई है, जिसे पहले अमेरिका की भूमिका और मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम की मध्यस्थता से तय किया गया था. ट्रंप ने कहा, वे इस शाम से सभी तरह की फायरिंग रोकने पर सहमत हो गए हैं और मेरे साथ तथा उनके साथ मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम की मदद से किए गए मूल शांति समझौते पर वापस लौटेंगे. यह नए सीजफायर का ऐलान ऐसे समय किया गया था, जब बीते कुछ दिनों में हुए घातक संघर्षों के चलते हजारों नागरिकों को अपने घर छोड़ने पड़े थे और इस साल की शुरुआत में मलेशिया की मध्यस्थता से हुए संघर्षविराम के टूटने का खतरा पैदा हो गया था. ट्रंप ने अक्टूबर में मलेशिया में हुई फॉलो-अप बैठकों में भी हिस्सा लिया था. वे इस संघर्ष को उन कई विवादों में से एक बताते हैं, जिन्हें उनके मुताबिक उन्होंने सुलझाया है.

संसद हमले में जान गंवाने वाले सुरक्षाकर्मियों को PM मोदी समेत नेताओं ने याद किया, दी श्रद्धांजलि

नई दिल्ली  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरे नेता शनिवार को 2001 के पार्लियामेंट हमले की बरसी पर उस हमले में जान देने वाले सुरक्षाकर्मियों को श्रद्धांजलि अर्पित किए.इसके साथ ही देशभर में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले सुरक्षाकर्मियों की याद में श्रद्धांजलि सभाएं की गईं और उनको याद किया गया.इससे पहले दिन में, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संसद हमले में अपनी जान देने वाले सुरक्षाकर्मियों को श्रद्धांजलि दी और कहा कि उनका बलिदान देश हमेशा याद रखेगा. एक पोस्ट में, CM योगी आदित्यनाथ ने कहा, "'लोकतंत्र का मंदिर', भारतीय संसद भवन, साल 2001 में आज ही के दिन एक कायरतापूर्ण आतंकवादी हमला देखा था, जो देश की संप्रभुता, गरिमा और लोगों की शक्ति पर एक क्रूर हमला था. संसद और देश की गरिमा की रक्षा के लिए इस दिल दहला देने वाली घटना में अपनी जान देने वाले अमर वीरों को विनम्र श्रद्धांजलि. देश हमेशा उनका आभारी रहेगा. जय हिंद!" केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी उन लोगों को श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने इस भयानक आतंकवादी हमले के दौरान भारतीय संसद की रक्षा करते हुए देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया.     गडकरी ने कहा, "13 दिसंबर 2001 को संसद भवन पर आतंकवादी हमले के दौरान लोकतंत्र के मंदिर की रक्षा के लिए अपनी जान देने वाले बहादुरों को सलाम. देश की रक्षा के लिए उनका बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा."  सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स ने भी 2001 के पार्लियामेंट टेरर अटैक की बरसी पर 88 बटालियन की कॉन्स्टेबल कमलेश कुमारी को श्रद्धांजलि दी और उनके साहस और बलिदान को याद किया.     CRPF के X पोस्ट में लिखा था, "बहादुरों को श्रद्धांजलि… 13 दिसंबर 2001 को, दिल्ली में पार्लियामेंट पर हुए टेररिस्ट अटैक के दौरान, 88 बटालियन, #CRPF की कॉन्स्टेबल कमलेश कुमारी ने भारी फायरिंग के बीच टेररिस्ट का पीछा करके और अपने साथी जवानों को उनकी एक्टिविटीज के बारे में लगातार जानकारी देकर अदम्य साहस और बेमिसाल बहादुरी का परिचय दिया." पोस्ट में कहा गया, "उनके हिम्मत वाले कामों की वजह से, सभी 5 आतंकवादी मारे गए. इस घटना के दौरान, उन्हें गंभीर चोटें आईं और आखिरकार उन्होंने ड्यूटी की वेदी पर अपनी जान दे दी. उनके अदम्य साहस और असाधारण बहादुरी के लिए, उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया. बहादुर 'बलिदानी' को #CRPF का हमेशा सलाम." 13 दिसंबर, 2001 को, आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के पांच भारी हथियारों से लैस आतंकवादियों ने नई दिल्ली में संसद परिसर में धावा बोल दिया और अंधाधुंध गोलियां चलाईं.     इस हमले में सुरक्षाकर्मियों और एक आम नागरिक समेत करीब 14 लोग मारे गए थे. यह आतंकी हमला संसद की कार्यवाही स्थगित होने के करीब 40 मिनट बाद हुआ था, और इमारत में करीब 100 सदस्य मौजूद थे. शुक्रवार को लोकसभा ने पार्लियामेंट सिक्योरिटी सर्विस, दिल्ली पुलिस और CRPF के उन बहादुर जवानों को दिल से श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने 13 दिसंबर, 2001 को हुए आतंकवादी हमले के दौरान पार्लियामेंट की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था. स्पीकर ओम बिरला ने श्रद्धांजलि देने में सदन का नेतृत्व किया. सदन ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में डटे रहकर देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता की रक्षा करने के अपने पक्के इरादे को दोहराया.