samacharsecretary.com

दफ्तर में कहर बनकर टूटी आग: इंडोनेशिया की 7 मंजिला इमारत में कम-से-कम 20 लोगों की जान गई

जकार्ता  मंगलवार को  इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता की एक सात मंजिला ऑफिस बिल्डिंग में भयंकर आग लग गई। अधिकारियों ने बताया कि इस हादसे में कम-से-कम 20 लोगों की मौत हो चुकी है। यह आग बिल्डिंग की पहली मंजिल से शुरू हुई, और घनी धुआं व तेज लपटों के साथ तेजी से पूरे भवन में फैल गई।  घटना उस वक्त हुई जब कई कर्मचारी भवन के अंदर मौजूद थे। आग लगने की जानकारी मिलते ही बचाव दल मौके पर पहुंचा, लेकिन कई लोग फँस गए थे।  प्रारंभिक जानकारी में मृतकों की संख्या में अंतर रहा। कुछ सूत्रों ने 17 मृत्यु की पुष्टि की है, जबकि अन्य रिपोर्टों में यह संख्या 20 बताई गई। आग बुझाने व फंसे लोगों को बचाने का काम जारी है। राहत-कार्य व शव निकलने की प्रक्रिया अभी जारी है। 

चीन की सत्ता में हलचल: घोटाले में फंसे खेल मंत्री को फांसी, तय समय पर होगी सजा पूरी

बीजिंग  चीन के पूर्व खेल मंत्री गाओ झोंगवेन को अदालत ने भ्रष्टाचार और सत्ता के घोर दुरुपयोग के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई है। सज़ा पर दो साल की राहत दी गई है, जिसका मतलब है कि दो साल के भीतर कोई और राहत न मिलने पर सज़ा सीधे फांसी में तब्दील हो सकती है।  चीन की अदालतों के मुताबिक, गाओ झोंगवेन ने 33.4 मिलियन डॉलर (लगभग 280 करोड़ रुपये) की रिश्वत ली थी। यह रिश्वत कई कारोबारी समूहों और खेल संगठनों से ली गई थी, जिसमें पदों पर गलत नियुक्तियाँ, फंड जारी करवाना और सरकारी परियोजनाओं में पक्षपात करना शामिल था।   गाओ झोंगवेन चीन के खेल मंत्री रहने के साथ-साथ चीन की ओलंपिक कमेटी का भी प्रभारी रह चुका है। आरोप है कि इन पदों का इस्तेमाल उसने करोड़ों की उगाही और ‘फेवर’ बेचने के लिए किया। चीनी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, गाओ ने न केवल पैसा लिया बल्कि कई बार सत्ता का दुरुपयोग करते हुए अपने करीबी लोगों को बड़े पद दिलाए, अनुबंध फिक्स किए और बड़े खेल आयोजन ठेके के बदले रिश्वत ली।चीन में पिछले कुछ वर्षों से राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तरफ से एक बड़े पैमाने पर 'एंटी-करप्शन अभियान' चलाया जा रहा है।लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह अभियान जितना भ्रष्टाचार के खिलाफ है, उतना ही राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने का भी तरीका बन चुका है। गाओ झोंगवेन के खिलाफ कार्रवाई ने CCP के भीतर की अंदरूनी खींचतान और सत्ता संघर्ष की परतें भी खोल दी हैं।   चीन दुनिया के उन देशों में शामिल है जहाँ भ्रष्टाचार में भी मौत की सज़ा दी जाती है।लेकिन दो साल की ‘रिप्रीव’ वाली सज़ा अक्सर राजनीतिक मामलों में दी जाती है, ताकि आरोपी को नियंत्रित रखा जा सके और पूरी व्यवस्था पर सरकार की पकड़ बनी रहे। चीन ओलंपिक आयोजन और खेल प्रबंधन को अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि का अहम हिस्सा मानता है।ऐसे में, देश के पूर्व खेल मंत्री का 280 करोड़ रुपये की रिश्वत लेते पकड़ा जाना चीन की ग्लोबल छवि पर बड़ा झटका है।

टुकड़े-टुकड़े होने की आशंका! विशेषज्ञ बोले—पाकिस्तान फिर चला 1971 वाले रास्ते पर

इस्लामाबाद  पाकिस्तान एक बार फिर विभाजन के मुहाने पर खड़ा दिख रहा है। 1971 में बांग्लादेश बनकर टूट चुका पाकिस्तान अब अपनी ही जमीन को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटने की तैयारी कर रहा है। इसे शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की हाइब्रिड सरकार “प्रशासनिक सुधार” बता रही है, लेकिन देश के भीतर और बाहर के विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह कदम पाकिस्तान की पहले से हिलती नींव को और कमजोर कर देगा। IPP नेता का बड़ा ऐलान- 3 हिस्सों में बांटेंगे !  पाकिस्तान के संचार मंत्री और IPP नेता अब्दुल अलीम खान ने खुलकर कहा कि “छोटे प्रांत बनना निश्चित है।” उन्होंने ऐलान किया कि सिंध, पंजाब, KP और बलूचिस्तान-हर प्रांत को तीन-तीन हिस्सों में बांटा जाएगा। उन्होंने एशिया के दूसरे देशों का हवाला देकर कहा कि छोटे राज्य बेहतर प्रशासन देते हैं। लेकिन पाकिस्तान में इसे “शासन नहीं, सत्ता को बांटने की नई साजिश” माना जा रहा है।   1971 की परछाई फिर लौटी आजादी के समय पाकिस्तान में पाँच प्रांत थे ईस्ट बंगाल, वेस्ट पंजाब, सिंध, NWFP और बलूचिस्तान। 1971 में ईस्ट बंगाल बांग्लादेश बन गया, पाकिस्तान आधा रह गया। अब फिर से पाकिस्तान में विभाजन की चर्चा है लेकिन इस बार खुद सरकार की मर्जी से। पाकिस्तान का आधा हिस्सा पहले ही संकट में है । बलूचिस्तान में अलगाववाद चरम पर, KP में TTP की हिंसा अनियंत्रित, सेना और सरकार पूरी तरह असफल, और उस बीच प्रांतों के नए टुकड़े करने की घोषणा ! एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह कदम बलूच विद्रोह और पख्तून असंतोष को और भड़काएगा। थिंक टैंक्स की कड़ी चेतावनी सिंध की सबसे बड़ी पार्टी PPP ने ऐलान कर दिया है कि वह सिंध के विभाजन के खिलाफ सड़क से संसद तक लड़ाई लड़ेगी। मुख्यमंत्री मुराद अली शाह ने कहा कि “सिंध को बांटने की कोई कोशिश बर्दाश्त नहीं होगी।”यानी शहबाज-मुनीर सरकार का यह फैसला देश के भीतर नया गृहयुद्ध भी खड़ा कर सकता है। पूर्व टॉप ब्यूरोक्रेट सैयद अख्तर अली शाह ने इसे “खतरनाक प्रयोग” बताते हुए कहा-“पाकिस्तान की समस्या प्रांत कम होना नहीं, शासन पूरी तरह फेल होना है।” उन्होंने याद दिलाया कि अय्यूब खान के ‘दो प्रांत मॉडल’ और ‘बेसिक डेमोक्रेसी’ सिस्टम ने पाकिस्तान को और बर्बाद किया था। थिंक टैंक PILDAT के चीफ अहमद बिलाल महबूब ने कहा-“नए प्रांत बनाना महंगा, जटिल और राजनीतिक रूप से विस्फोटक कदम है।” उनका कहना है कि असल समस्या है …     कमजोर संस्थाएँ     ग़ायब लोकल गवर्नेंस     खराब कानून-व्यवस्था     सेना का राजनीतिक हस्तक्षेप     इनसे निपटे बिना प्रांत बढ़ाना केवल “नई अव्यवस्था” पैदा करेगा।     पाकिस्तान की जनता पूछ रही-टूटते देश को और क्यों तोड़ रहे हो?     देश में महंगाई, आतंकवाद, बेरोजगारी, आर्थिक गिरावट अपने चरम पर है।     ऐसे में प्रांतों के टुकड़े करने की घोषणा ने जनता में गुस्सा बढ़ा दिया है। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं-“कंगाल पाकिस्तान को और टुकड़ों में बांटने की जरूरत क्यों? पहले सरकार और सेना अपनी नाकामी सुधारें।” एक्सपर्ट्स की चेतावनी-“बंटवारा हुआ तो संभाल नहीं पाओगे।” सभी विशेषज्ञ एक आवाज़ में कह रहे हैं कि अगर पाकिस्तान ने यह फैसला लागू किया और पहले से जले हुए बलूचिस्तान व KP में नए प्रशासनिक नक्शे थोपे गए,तो अलग राष्ट्रों की मांग खुलकर फट सकती है। मुनीर-शहबाज सरकार इसे ‘सुधार’ बता रही है,लेकिन विशेषज्ञ इसे पाकिस्तान का एक और आने वाला 1971 बता रहे हैं।  

ओडिशा में तनाव चरम पर: 150 घर जलाए, इंटरनेट बंद, भारी फोर्स तैनात

मलकानगिरी  ओडिशा के मलकानगिरी जिले में सोमवार तड़के बड़ी हिंसा भड़क गई, जब हथियारबंद आदिवासी भीड़ ने बांग्लादेशी मूल के लोगों के एमवी-26 गांव पर हमला कर दिया और करीब 150 घरों को आग के हवाले कर दिया। यह हमला एक लापता आदिवासी महिला लेक पदियामी (51) का सिर कटा शव मिलने के बाद हुआ। महिला का शव पास के राखलगुडा गांव में नदी किनारे मिला था, जिसके बाद स्थानीय आदिवासी समुदाय में भारी आक्रोश फैल गया। स्थिति नियंत्रण में लाने की कोशिशें घटना के बाद जिला प्रशासन ने इलाके में धारा 144 लागू कर दी और शाम 6 बजे से पूरे जिले में 24 घंटे के लिए इंटरनेट सेवाएँ निलंबित कर दी हैं। प्रशासन ने संभावित प्रतिक्रियाओं को रोकने के लिए पुलिस की 8 प्लाटून और बीएसएफ की दो प्लाटून तैनात की हैं। मलकानगिरी पुलिस ने इलाके में फ्लैग मार्च भी किया। DIG (दक्षिण-पश्चिमी) कंवर विशाल सिंह, डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर सोमेश कुमार उपाध्याय और एसपी विनोद पाटिल ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर दोनों समूहों के साथ बैठक की। पुलिस ने एमवी-26 गांव में हमले के मामले में दो लोगों को हिरासत में लिया है, जबकि कई लोग फरार बताए जा रहे हैं। आदिवासी संगठनों की मांग आदिवासी संगठनों ने आरोपियों की जल्द गिरफ्तारी और महिला के कटे सिर की तलाश करने की मांग की है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि एमवी-26 गांव के सुका रंजन मंडल ने संपत्ति विवाद के चलते महिला की हत्या की। इसके बाद हजारों की भीड़ हथियारों के साथ एमवी-25 इलाके में जमा हो गई, जिससे हालात और बिगड़ गए। हिंसक भीड़ ने एमवी-26 और राखलगुडा गांव में तोड़फोड़ की और घरों व घास के ढेर में आग लगा दी। इससे दोनों समुदायों के बीच तनाव और बढ़ गया। जिले में हालात अभी भी तनावपूर्ण हैं, लेकिन पुलिस का दावा है कि व्यवस्था नियंत्रण में है। एसपी विनोद पाटिल ने लोगों से शांति बनाए रखने और अफवाहों से दूर रहने की अपील की है।  

लद्दाख कनेक्टिविटी को मिली रफ़्तार! मनाली–लेह रूट पर बने चार आधुनिक पुलों की तारीफ़ करती दिखीं कंगना रनौत

शिमला भाजपा की सांसद कंगना रनौत ने केंद्र सरकार द्वारा हिमाचल प्रदेश के लिए किए जा रहे निरंतर विकास कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि केंद्र ने हमेशा हिमाचल की भौगोलिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए बुनियादी ढांचे को सशक्त करने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश की सड़के प्रदेश की जीवन रेखा हैं और केंद्र सरकार द्वारा सड़क व पुल निर्माण के क्षेत्र में किए गए कार्य आने वाले वर्षों में प्रदेश की प्रगति की मजबूत नींव सिद्ध होंगे। सांसद कंगना रनौत ने मनाली–लेह सामरिक मार्ग पर सीमा सड़क संगठन (BRO) के प्रोजेक्ट दीपक द्वारा निर्मित चार महत्वपूर्ण परियोजनाओं के वर्चुअल उद्घाटन पर केंद्र सरकार और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं से अब सेना के भारी-भरकम वाहनों और पर्यटकों की आवाजाही पहले से कहीं अधिक आसान, सुगम और सुरक्षित हो जाएगी। उन्होंने जानकारी दी कि बीआरओ द्वारा लगभग 18 करोड़ रुपये की लागत से इन परियोजनाओं का निर्माण किया गया है, जिनमें 70 मीटर लंबा शोगटोंग ब्रिज, जिंगजिंगबर में दो मल्टी-सेल बॉक्स ब्रिज तथा कीलिंग सराय में 60 मीटर लंबा यूनम ब्रिज शामिल हैं। सभी पुल अत्याधुनिक तकनीक से तैयार किए गए हैं ताकि हर मौसम में भारी वाहनों की निर्बाध आवाजाही संभव हो सके। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रविवार को लेह से देशभर की 125 परियोजनाओं का लोकार्पण कर उन्हें देश को समर्पित किया। इन पुलों के निर्माण से मनाली–लेह मार्ग पर वर्षों से चली आ रही एवलांच जोन, उफनते नालों और कच्चे रास्तों की समस्याओं से बड़ी राहत मिलेगी। पहले जहां सेना के काफिलों और आम यात्रियों को जोखिम भरे मार्ग से गुजरना पड़ता था, वहीं अब नए पुलों के माध्यम से यात्रा अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद हो जाएगी। कंगना रनौत ने कहा कि इन परियोजनाओं से न केवल सामरिक दृष्टि से देश की सुरक्षा को मजबूती मिलेगी, बल्कि पर्यटन को भी व्यापक बढ़ावा मिलेगा। मनाली–लेह हाईवे पर यात्रा करने वाले पर्यटकों को अब पहले से कहीं बेहतर और सुरक्षित अनुभव प्राप्त होगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का हिमाचल के विकास के लिए निरंतर सहयोग देने हेतु आभार जताते हुए कहा कि केंद्र सरकार के मजबूत नेतृत्व में प्रदेश निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

इंडो-पैसिफिक में तनाव बढ़ा: रूसी-चीनी एयर इंट्री पर सियोल ने फाइटर जेट उड़ाए

सियोल  दक्षिण कोरिया ने मंगलवार को एक बार फिर अपने वायु रक्षा पहचान क्षेत्र (KADIZ) में सात रूसी और दो चीनी सैन्य विमानों की घुसपैठ का पता लगाया। इसके जवाब में सियोल ने तुरंत दर्जनों लड़ाकू विमान रवाना किए। यह घटना ऐसे समय हुई है जब रूस-चीन की सैन्य नजदीकियां लगातार बढ़ रही हैं और दोनों देश उत्तर पूर्व एशिया में बिना पूर्व सूचना के संयुक्त हवाई गश्त कर रहे हैं।   सियोल के ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ (JCS) ने बयान जारी कर कहा कि ये रूसी और चीनी विमान स्थानीय समयानुसार सुबह करीब 10 बजे (GMT 0100 बजे) कोरिया एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन जोन (KADIZ) में दाखिल हुए। हालांकि किसी भी विमान ने दक्षिण कोरियाई हवाई क्षेत्र का उल्लंघन नहीं किया। सियोल ने कहा कि किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से निपटने के लिए सामरिक उपाय करते हुए उसने लड़ाकू विमान भेजे। खबर के अनुसार, ये विदेशी विमान लगभग एक घंटे तक KADIZ के अंदर-बाहर उड़ते रहे। इन विमानों को वायु रक्षा क्षेत्र में प्रवेश करने से काफी पहले ही पता लगा लिया गया था। KADIZ एक विस्तृत क्षेत्र होता है जिसमें देश सुरक्षा कारणों से आने-जाने वाले विमानों पर नजर रखते हैं, लेकिन यह उनका क्षेत्रीय हवाई क्षेत्र नहीं होता। पहले भी हो चुकी है ऐसी घटनाएं 2019 से चीन और रूस संयुक्त सैन्य अभ्यास का हवाला देते हुए बिना पूर्व सूचना के दक्षिण कोरिया के वायु रक्षा क्षेत्र में नियमित रूप से अपने सैन्य विमान भेजते रहे हैं। पिछले साल नवंबर में भी पांच चीनी और छह रूसी सैन्य विमानों के KADIZ में आने पर सियोल ने लड़ाकू जेट तैनात किए थे। इसी तरह की घटनाएं जून और दिसंबर 2023 तथा मई और नवंबर 2022 में भी हुई थीं, जिनमें बीजिंग और मॉस्को ने इन उड़ानों को 'संयुक्त रणनीतिक हवाई गश्त' बताया था।

बच्चे की परवरिश का हक किसे? HC ने सुनाया अहम निर्णय, बना मिसाल

भुवनेश्वर  ओडिशा हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में पत्नी की मौत के बाद नाबालिग की देखभाल और उसके गार्जियनशिप का अधिकार उसके पिता को दिया है। न्यायालय ने तर्क देते हुए कहाकि अगर नाबालिग की देखभाल का अधिकार किसी को नहीं दिया जाता है तो बच्चे और पिता दोनों एक-दूसरे के प्यार और स्नेह से वंचित हो जाएंगे, जिसके वे प्राकृतिक रूप से हकदार हैं। बता दें कि इस जोड़े की शादी 19 जून, 2019 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। दोनों पति-पत्नी के रूप में शांति से रह रहे थे। बच्चे की मां की मौत के बाद उसकी गार्जियनशिप को लेकर विवाद खड़ा हो गया।   बच्चे के नाना ने बाद में बच्चे की देखभाल का अधिकार ले लिया। इसके बाद पिता ने इस मामले में पारिवारिक अदालत भद्रक में केस दायर किया अपीलकर्ता की याचिका को बाद में पारिवारिक अदालत, भद्रक ने 12 जुलाई, 2022 को पारिवारिक अदालत अधिनियम, 1984 की धारा 19 और गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 47 के तहत खारिज कर दिया था। पारिवारिक अदालत ने अपीलकर्ता की गार्जियनशिप की याचिका को सिर्फ इस आधार पर खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता ने हालांकि उसने खुद को बच्चे का प्राकृतिक पिता होने का दावा किया था, लेकिन वह नाबालिग का जन्म प्रमाण पत्र और अपनी पत्नी का मृत्यु प्रमाण पत्र पेश करने में विफल रहा। वहीं, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश संजय कुमार मिश्रा की एकल पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 के तहत कानूनी प्रावधानों, बच्चे के कल्याण, पिता की देखभाल के अधिकार को ध्यान में रखते हुए…यह अदालत यह पाती है कि पारिवारिक अदालत का बच्चे की देखभाल की ऐसी याचिका को तकनीकी आधार पर खारिज करना सही नहीं था क्योंकि अपीलकर्ता की पत्नी का मृत्यु प्रमाण पत्र और बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र पेश नहीं किया गया था।’ न्यायाधीश मिश्रा ने फैसले में कहा, ‘जब बच्चे की मां जीवित थी तब किसी वैवाहिक विवाद का कोई आरोप नहीं था। न ही पत्नी या बेटे के खिलाफ दुर्व्यवहार की कोई शिकायत थी। उसके कानूनी अधिकारों के खिलाफ कुछ भी नहीं है। एक प्राकृतिक अभिभावक के रूप में और अपने बच्चे की देखभाल पाने की उसकी वैध इच्छा है।’ न्यायाधीश मिश्रा ने पारिवारिक अदालत के फैसले को रद्द करते हुए कहाकि यह अदालत मानती है कि अपीलकर्ता प्राकृतिक अभिभावक होने के अलावा नाबालिग बच्चे की भलाई सुनिश्चित करने के लिए भी, खासकर उसकी मां की मौत के बाद उसे अपने असली पिता के साथ रहना चाहिए। यह अदालत उम्मीद करती है क्योंकि बच्चा बहुत छोटा है। अगर उसकी देखभाल अपीलकर्ता-पिता को सौंप दी जाती है, तो वह अपने असली पिता के साथ बहुत अच्छे से घुल-मिल जाएगा।  

बंगाल हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से पूछा— सारी पुलिस क्यों चाहिए?

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल में जारी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) की सुरक्षा को लेकर दायर एक याचिका पर चुनाव आयोग (ECI) और पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस जारी किया। यह याचिका सनातनी संसद नामक संगठन ने दायर की है, जिसमें मांग की गई है कि SIR की अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन तक राज्य पुलिस अधिकारियों को चुनाव आयोग के प्रतिनियुक्ति के तहत काम करने का निर्देश दिया जाए। वैकल्पिक मांग के रूप में, याचिकाकर्ता ने SIR की अवधि तक केंद्रीय सशस्त्र बलों की तैनाती की भी मांग की है।   मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच के समक्ष सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में बीएलओ पर लगातार हमले हो रहे हैं और राज्य सरकार सुरक्षा देने से इनकार कर रही है। उन्होंने बीएलओ को तत्काल अंतरिम सुरक्षा देने की मांग की। रिपोर्ट के मुताबिक, न्यायमूर्ति बागची ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सबूतों को अपर्याप्त बताते हुए कहा कि याचिका में वास्तविक घटनाओं का विवरण बहुत कम है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि एक एफआईआर के अलावा कोई ठोस उदाहरण नहीं दिया गया है। बाकी सारे पुराने संदर्भ और अनुमान हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या केवल एक FIR के आधार पर यह कहा जा सकता है कि स्थिति इतनी ‘विशिष्ट’ है कि पश्चिम बंगाल पर अलग से आदेश दिया जाए? उन्होंने पूछा कि क्या सिर्फ एक एफआईआर के आधार पर पूरे राज्य को विशेष स्थिति मानकर केंद्रिय बल तैनात करने का आदेश दिया जा सकता है? ECI ने कहा- राज्य पुलिस पर निर्भर, सहयोग नहीं मिला तो चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि BLOs के साथ दुर्व्यवहार और अवरोध की घटनाओं पर आयोग ने पहले ही राज्य सरकार को कड़ा पत्र लिखा है। द्विवेदी ने कोर्ट को बताया- कई जगहों पर बीएलओ को काम करने से रोका जा रहा है और चुनाव अधिकारियों को घेरा जा रहा है। पुलिस राज्य सरकार के हाथ में है। वह सहयोग नहीं करेगी तो हमें स्थानीय पुलिस को प्रतिनियुक्ति पर लेना पड़ेगा। अगर उस पर भरोसा न हो, तो फिर केंद्रीय बल ही विकल्प है। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक दलों के हस्तक्षेप के कारण BLOs पर दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने उदाहरण दिया कि केरल में कांग्रेस पार्टी ने CPI(M) पर एक BLO के आत्महत्या के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया है। BLOs पर बढ़ते बोझ पर बहस द्विवेदी ने कहा कि आयोग ने एक बूथ पर मतदाताओं की संख्या 1500 से घटाकर 1200 कर दी है और BLO को रोजाना केवल लगभग 35 मतदाताओं से मिलना होता है। इस वजह से कोई विशेष बोझ नहीं है। लेकिन न्यायमूर्ति बागची ने असहमति जताते हुए कहा- यह डेस्क वर्क नहीं है। BLO को हर घर जाना है, सत्यापन करना है और फॉर्म भरवाना है। यही उन पर दबाव बढ़ाता है। इसलिए हमने राज्यों को BLOs की संख्या बढ़ाने का निर्देश दिया था। हम किसी राजनीतिक नैरेटिव में नहीं पड़ना चाहते- कोर्ट पीठ ने कहा कि उनका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि SIR बिना किसी बाधा और हिंसा के पूरा हो। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने ECI से कहा- अगर BLOs को धमकी मिल रही है, तो यह गंभीर मुद्दा है। लेकिन अभी तक आप (ECI) हमारे पास खुद नहीं आए। किसी अन्य पक्ष की याचिका पर हमें तथ्यों की जांच करनी होगी। CJI ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के पास केंद्रीय सुरक्षा बलों की मांग करने का अधिकार है, लेकिन आयोग ने अब तक इस विकल्प का उपयोग नहीं किया है। द्विवेदी ने बताया कि मामला संवेदनशील होने के चलते आयोग ने ‘कड़ा कदम’ उठाने में संयम बरता, लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया कि BLOs की सुरक्षा के लिए मजबूत कदम उठाए जाएंगे। बेंच ने स्पष्ट किया कि याचिका मुख्य रूप से अखबारी रिपोर्टों पर आधारित है और सिर्फ एक एफआईआर ही ठोस सबूत है। जस्टिस बागची ने कहा- क्या हम यह कह सकते हैं कि पश्चिम बंगाल की स्थिति इतनी अनोखी है कि सिर्फ इसी राज्य के लिए विशेष निर्देश जारी किए जाएं? क्या पूरे देश की पुलिस को चुनाव आयोग के नियंत्रण में दे दिया जाए? सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि यदि चुनाव आयोग खुद आता तो कोर्ट विचार करता, लेकिन किसी तीसरे पक्ष की याचिका पर एक घटना के आधार पर व्यापक आदेश नहीं दिया जा सकता। फिर भी कोर्ट ने सभी पक्षों को नोटिस जारी करते हुए चुनाव आयोग से पूछा है कि देश के विभिन्न राज्यों से उसे कितना सहयोग मिल रहा है और किन-किन राज्यों में बीएलओ को धमकी मिल रही है। चुनाव आयोग ने आश्वासन दिया कि वह बीएलओ की सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाएगा और जरूरत पड़ी तो केंद्रीय सहायता भी मांगेगा। अब मामले की अगली सुनवाई नोटिस के जवाब आने के बाद होगी।

वंदे मातरम विवाद: अमित शाह से बहस में क्यों तल्ख हुए खरगे? बोले— आपका भी समय आएगा…

नई दिल्ली  राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष होने के मौके पर आज (मंगलवार (9 दिसंबर को) संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में भी चर्चा हो रही है। इसकी शुरुआत करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वंदे मातरम् को देश भक्ति, त्याग और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बताया और कहा कि जो लोग इस समय इसकी चर्चा करने के औचित्य और जरूरत पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें अपनी सोच पर नए सिरे से विचार करना चाहिए। शाह ने चर्चा के माध्यम से देश के बच्चे, युवा और आने वाली पीढ़ी यह बात समझ सकेगी कि वंदे मातरम् का देश को स्वतंत्रता दिलाने में क्या योगदान रहा है।   उन्होंने कहा कि लोकसभा में कांग्रेस की एक बड़ी नेत्री ने इस विषय पर यह प्रश्न उठाया था कि आज वंदे मातरम् पर चर्चा क्यों होनी चाहिए। इसके बाद उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस पार्टी ने वंदे मातरम् को दो टुकड़े किए जिसके कारण बाद में देश का विभाजन हुआ। शाह के इस बयान पर राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद मल्लिकार्जुन खरगे भड़क गए और उन्होंने गृह मंत्री के इस बयान का विरोध करने लगे। तभी राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने खरगे से कहा कि आपको बी बोलने का मौका मिलेगा, प्लीज बैठ जाइए। हालांकि, खरगे इतने पर भी नहीं रुके और वह बोलते रहे। तब सत्ता पक्ष की तरफ से हो-हल्ला होने लगा। इसी बीच अमित शाह ने कहा, खरगे साहब आपका भी समय आएगा। आपको भी बोलने का बहुत समय मिला है। इसके बाद सभापति ने भी खरगे से फिर अनुरोध किया कि वो बैठ जाएं। इसके बाद खरगे शांत हो गए। इसके बाद चर्चा को आगे ढ़ाते हुए शाह ने कहा कि यह अमर कृति ‘‘भारत माता के प्रति समर्पण, भक्ति और कर्तव्य के भाव जागृत करने वाली कृति है।’’ गृह मंत्री ने कहा कि जिन्हें यह समझ नहीं आ रहा है कि आज इस पर चर्चा क्यों की जा रही है, उन्हें अपनी समझ पर नये सिरे से विचार करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग इस चर्चा को पश्चिम बंगाल में होने जा रहे चुनाव से जोड़ कर देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग बंगाल चुनाव से जोड़कर राष्ट्रीय गीत के महिमामंडन को कम करने का प्रयास कर रहे हैं। लोकसभा में सोमवार को इस विषय पर हुई चर्चा में कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों के सांसदों ने इस मुद्दे पर इस समय चर्चा कराये जाने की जरूरत पर प्रश्न उठाये थे। शाह ने कहा कि यह बात अवश्य है कि बंकिमचंद्र चटर्जी ने इस रचना को बंगाल में रचा था किंतु यह रचना न केवल पूरे देश में बल्कि दुनिया भर में आजादी की लड़ाई लड़ रहे लोगों के बीच फैल गयी थी। उन्होंने कहा कि आज भी कोई व्यक्ति यदि सीमा पर देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देता है तो यही नारा लगाता है। उन्होंने कहा कि आज भी जब कोई पुलिसकर्मी देश के लिए अपनी जान देता है तो प्राण देते समय उसके मुंह में एक ही बात होती है, ‘वंदे मातरम्’। शाह ने कहा कि देखते देखते आजादी के आंदोलन में वंदे मातरम देश भक्ति, त्याग और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गया है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि ‘‘बंकिम बाबू’’ ने इस गीत को जिस पृष्ठभूमि में लिखा, उसके पीछे इस्लामी आक्रांताओं द्वारा भारत की संस्कृति को जीण-शीर्ण करने के प्रयास और ब्रिटिश शासकों द्वारा एक नयी संस्कृति को थोपने की कोशिशें की जा रही थीं। शाह ने कहा कि वंदे मातरम् के प्रति समर्पण की जरूरत, जब यह बना तब थी, आजादी के आंदोलन में थी, आज भी है और जब 2047 में महान भारत की रचना होगी, तब भी रहेगी।  

शांति वार्ता धरी की धरी रह गई: ट्रंप समझौते के बाद भी दो देशों में गोलीबारी तेज

थाइलैंड  थाइलैंड और कंबोडिया के बीच विवादित सीमा पर फिर से हिंसा भड़क उठी है। सोमवार को थाइलैंड ने कंबोडियाई सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिसमें एक थाइ सैनिक की मौत और चार कंबोडियाई नागरिकों की जान चली गई। दोनों देश एक-दूसरे पर ट्रंप द्वारा कराई गई शांति डील तोड़ने का आरोप लगा रहे हैं। इस संघर्ष से हजारों लोग अपने घरों से भाग रहे हैं और पूर्वी एशिया में स्थिरता पर सवाल खड़े हो गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 'शांति की जीत' अब खतरे में है, जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार की सिफारिश तक मिल चुकी थी।   दोनों देशों के बीच सीमा पर दूसरे दिन भी भीषण लड़ाई जारी रही, जिसके कारण हजारों नागरिक अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर भागने को मजबूर हो गए। मंगलवार को कंबोडिया के शक्तिशाली सीनेट अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री हुन सेन ने वादा किया कि उनका देश थाइलैंड के खिलाफ कड़ी लड़ाई लड़ेगा और अपनी भूमि की रक्षा करेगा। कैसे भड़का नया संघर्ष? रविवार रात दोनों देशों की सीमा पर हुई झड़प में एक थाई सैनिक की मौत के बाद तनाव अचानक बढ़ गया। जुलाई में हुई पांच दिन की जंग को खत्म करने के लिए हुए संघर्षविराम के बावजूद गोलाबारी फिर शुरू हो गई। जुलाई के संघर्ष में दोनों तरफ दर्जनों नागरिक और सैनिक मारे गए थे और लगभग एक लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया था। दोनों देशों के आरोप-प्रत्यारोप तेज हुन सेन ने फेसबुक और टेलीग्राम पर पोस्ट कर दावा किया कि कंबोडिया ने सोमवार तक संयम दिखाया, लेकिन रात में थाई सेना की गतिविधियों के जवाब में फायरिंग की। उन्होंने कहा कि थाइलैंड की बढ़त वाले क्षेत्रों पर केंद्रित जवाबी कार्रवाई से दुश्मन की ताकत को कमजोर कर नष्ट किया जा सकता है। थाई सेना ने आरोप लगाया कि कंबोडियाई बलों ने मंगलवार सुबह साकेओ प्रांत के एक गांव पर तोप के गोले दागे, हालांकि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ। थाई सैन्य प्रवक्ता ने यह भी कहा कि रविवार और सोमवार को भी कंबोडिया ने उसकी चौकियों पर हमला किया। हुन सेन ने कहा- कंबोडिया शांति चाहता है, लेकिन अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए लड़ने को मजबूर है। ताजा हताहतों का आंकड़ा     कंबोडियाई सेना के अनुसार, ताजा संघर्ष में 7 नागरिकों की मौत और 20 लोगों के घायल होने की पुष्टि हुई है।     थाई सेना ने बताया कि एक सैनिक की मौत और 29 सैनिक घायल हुए हैं।     थाई रियर एडमिरल सुरासंत कोंगसिरी ने कहा कि नौसेना को पूर्वी सीमा पर मजबूत किया जा रहा है। थाइलैंड के एयरस्ट्राइक जारी रहेंगे थाइलैंड ने सोमवार को सीमा के पास कई हवाई हमले किए, जिन्हें उसने रक्षात्मक कार्रवाई बताया। ये हमले कंबोडिया की सैन्य पोस्टों को निशाना बनाकर किए गए थे। सुरासंत ने कहा कि यह अभियान हमलों के बंद होने तक जारी रहेगा। लोगों का बड़े पैमाने पर पलायन दोनों तरफ के गांवों में रहने वाले लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंच रहे हैं। थाइलैंड की दूसरी आर्मी रीजन ने बताया कि उसने चार सीमा प्रांतों में लगभग 500 अस्थायी शिविर स्थापित किए हैं, जिनमें 1,25,838 लोग शरण ले चुके हैं। बाकी लोग रिश्तेदारों के यहां जा रहे हैं। कंबोडिया ने भी सीमा के करीब बसे गांवों से लोगों के पलायन की पुष्टि की है। थाई प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नवीराकुल ने टेलीविजन संबोधन में कहा कि देश अपनी सुरक्षा के लिए हर जरूरी सैन्य कार्रवाई करेगा। उन्होंने कहा- थाइलैंड ने कभी हिंसा नहीं चाही, लेकिन अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं करेगा। सदियों पुराना विवाद, बार-बार भड़कता तनाव दोनों देशों के बीच 800 किलोमीटर से अधिक लंबी भूमि सीमा पर कई बार तनाव होता रहा है। जुलाई में हुए संघर्षविराम को मलेशिया ने मध्यस्थता कर कराया था और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव के कारण दोनों देशों को इसे स्वीकार करना पड़ा था। ट्रंप ने व्यापारिक विशेषाधिकार वापस लेने की चेतावनी दी थी। अक्टूबर में हुआ विस्तृत समझौता- जिसमें भारी हथियार हटाना, गलत सूचना रोकना, विश्वास बहाली और बारूदी सुरंगों को हटाने में सहयोग जैसी बातें शामिल थीं। वह आज तक पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है। इसके बाद दोनों देशों ने एक–दूसरे पर दुष्प्रचार, सीमा उल्लंघन और उत्तेजक बयानबाजी जारी रखी। कैदी और बारूदी सुरंगें बढ़ा रहीं तनाव कंबोडिया की मुख्य शिकायत यह है कि थाइलैंड संघर्षविराम लागू होने के दौरान पकड़े गए 18 कैदियों को अभी भी नहीं छोड़ रहा है। थाइलैंड का आरोप है कि कंबोडिया ने विवादित क्षेत्रों में नई बारूदी सुरंगें बिछाई हैं, जिनसे कई थाई सैनिक घायल हुए हैं। कंबोडिया का कहना है कि यह पुराने गृहयुद्ध की सुरंगें हैं, जो 1999 तक चले संघर्ष से बची हुई हैं। इन्हीं मुद्दों के कारण थाइलैंड ने इस माह की शुरुआत में सीजफायर समझौते के क्रियान्वयन को अनिश्चितकाल के लिए रोकने की घोषणा कर दी। यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने नई हिंसा पर गंभीर चिंता जताई है, खासकर हवाई हमलों और भारी हथियारों के इस्तेमाल पर।