samacharsecretary.com

बच्चे समलैंगिक हों तो भारतीयों की क्या प्रतिक्रिया? कई देशों में सर्वे में मिली जानकारी

 नई दिल्ली थाइलैंड में इसी साल समलैंगिक संबंधों को मंजूरी मिल गई है। इसके अलावा भारत में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है, लेकिन शादी को परमिशन देने को लेकर बहस जारी है। भले ही भारत में समलैंगिक संबंध अपराध के दायरे से बाहर हैं, लेकिन समाज में इसे लेकर बहस जारी है। एक बड़ा वर्ग इसे लेकर असहज है। इस बीच एक दिलचस्प सर्वे अमेरिकी रिसर्च संस्था प्यू ने किया है। प्यू रिसर्च के सर्वे में भारत समेत 15 देशों के लोगों से पूछा गया था कि यदि उनके बच्चे समलैंगिक हो जाते हैं तो वे कैसा अनुभव करेंगे। इसे सहजता से स्वीकार करेंगे या फिर ऐतराज होगा। इस सर्वे में शामिल भारतीयों से जब ऐसा ही सवाल पूछा गया तो 56 फीसदी ने कहा कि उन्हें परेशानी होगी। उन्होंने कहा कि यदि उनके बच्चे समलैंगिक संबंधों की ओर आकर्षित होते हैं या ऐसा करते हैं तो यह उन्हें पसंद नहीं है और उन्हें परेशानी होगी। इसके अलावा 9 फीसदी लोगों ने कहा कि वे ना तो पसंद करेंगे और ना ही असहज होंगे। इसके अलावा 16 पर्सेंट लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने कहा कि उन्हें कोई समस्या नहीं होगा। वहीं 19 फीसदी लोगों ने कोई जवाब देने से ही इनकार कर दिया। प्यू रिसर्च की तरफ से जिन 15 देशों में यह सर्वे किया गया है, उनमें से ज्यादा मध्यम आय वर्ग वाले हैं। इनमें इंडोनेशिया, तुर्की, बांग्लादेश, साउथ अफ्रीका, ब्राजील और अर्जेंटीना शामिल हैं। बच्चों के समलैंगिक संबंधों का सबसे प्रबल विरोध करने वाले देशों में घाना है। यहां के 95 फीसदी लोगों ने कहा कि बच्चों का समलैंगिक होना वह पसंद नहीं करेंगे। वहीं इंडोनेशिया में ऐसे 94 फीसदी लोग हैं, जो बच्चों का गे या लेस्बियन होना एकदम पसंद नहीं करते। नाइजीरिया में ऐसे लोगों की संख्या 91 फीसदी है तो वहीं तुर्की में 87 पर्सेंट लोग इसके खिलाफ हैं। अहम तथ्य यह है कि ज्यादातर मुस्लिम बहुल देशों की बड़ी आबादी समलैंगिक संबंधों को एकदम पसंद नहीं करती और वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे इसकी ओर बढ़ें। केन्या में 87 फीसदी और बांग्लादेश में 60 फीसदी लोग बच्चों के ऐसे संबंधों में जाने के खिलाफ हैं। पेरू में 59 फीसदी और समलैंगिक शादियों को मान्यता देने वाले थाइलैंड में ऐसे लोगों की संख्या 57 पर्सेंट ही है। इसके अलावा साउथ अफ्रीका में ऐसे 56 फीसदी लोग हैं। अर्जेंटीना में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है, जो बच्चों के समलैंगिक संबंधों में जाने को लेकर असहज नहीं हैं। अर्जेंटीना के 32 फीसदी लोगों ने ही कहा कि वे बच्चों के समलैंगिक संबंधों में जाने के खिलाफ हैं। ब्राजील में ऐसे लोगों की संख्या 38 फीसदी है, जबकि मेक्सिको में 45 फीसदी हैं।

ई-वॉलेट्स के जरिए पैसा जुटा रहा जैश, हमलों से बचने को बदल रहा रणनीति

लाहौर  ऑपरेशन सिंदूर के तहत मई 2025 में भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) में कई आतंकी लॉन्च पैड तबाह किए थे. इन ठिकानों का इस्तेमाल जैश-ए-मोहम्मद (JeM) और लश्कर-ए-तैयबा (LeT) कर रहे थे. इस बीच खुफिया रिपोर्टों के आधार पर IANS ने खुलासा किया है कि जैश-ए-मोहम्मद अब अपने नेटवर्क को दोबारा खड़ा करने की तैयारी कर रहा है. संगठन पूरे पाकिस्तान में 313 नए मरकज बनाने की योजना पर काम कर रहा है. ये ठिकाने नए आतंकियों को ट्रेनिंग देने और सुरक्षित आश्रय प्रदान करने के काम आएंगे. साथ ही ये ठिकाने जैश प्रमुख मसूद अजहर और उसके परिवार के लिए भी सुरक्षित अड्डे होंगे. इस नेटवर्क को खड़ा करने के लिए जैश ने 3.91 अरब पाकिस्तानी रुपये जुटाने का लक्ष्य तय किया है. रिपोर्ट के अनुसार, इस धन उगाही अभियान का नेतृत्व जैश प्रमुख मसूद अजहर और उसका भाई तल्हा अल सैफ कर रहे हैं. संगठन ने ऑनलाइन धन इकट्ठा करने के लिए ईजीपैसा और सदापे जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल की योजना बनाई है. इसके अलावा जैश के कमांडर मस्जिदों में शुक्रवार की नमाज के दौरान भी चंदा इकट्ठा कर रहे हैं. चंदे को गाजा में मानवीय सहायता के नाम पर दिखाया जा रहा है, जबकि असल में इसका इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के लिए हो रहा है. जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ी ब्लैंक दान रसीद सूत्रों के मुताबिक जांच के दौरान जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े ब्लैंक दान रसीद की एक कॉपी भी मिली. जांच में इस बात के सबूत मिले कि जमा किए जा रहे 3.94 अरब पाकिस्तानी रुपये कई पाकिस्तानी डिजिटल वॉलेट में जा रहे हैं. ऐसा ही एक सदापे खाता मसूद अजहर के भाई, तल्हा अल सैफ (तल्हा गुलजार) के नाम पर है, जो पाकिस्तानी मोबाइल नंबर +92 3025xxxx56 से जुड़ा है. यह नंबर जैश-ए-मोहम्मद के हरिपुर जिले के कमांडर आफ़ताब अहमद के नाम पर रजिस्ट्रड है, जिसके CNIC नंबर 133020376995 पर हरिपुर के खाला बट्ट टाउनशिप में जैश-ए-मोहम्मद के कैंप का पता दर्ज है. भारत के लिए क्या मायने रखता है यह पुनर्गठन जैश-ए-मोहम्मद की यह गतिविधि भारत के लिए नई चुनौती है. संगठन की कोशिश है कि ऑपरेशन सिंदूर से हुए नुकसान की भरपाई करके फिर से सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा दिया जाए. नए शिविरों का जाल फैलाने से कश्मीर घाटी में आतंक फैलाने की साजिश तेज हो सकती है. भारत के सुरक्षा तंत्र को इस पुनर्गठन पर करीबी निगरानी रखने की जरूरत है. 100 से अधिक आतंकवादी मारे गए ऑपरेशन सिंदूर के तहत 100 से अधिक आतंकवादी मारे गए. जैश का बहावलपुर स्थित मुख्यालय और कई ठिकाने पूरी तरह तबाह कर दिए गए. यह कार्रवाई 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले का बदला थी, जिसमें 26 निर्दोष नागरिक मारे गए थे. पाकिस्तान में बनाएगा 313 नए मरकज, मांग रहा चंदा ऑपरेशन सिंदूर के कई महीने बाद पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) अपने तबाह हुए प्रशिक्षण शिविरों और ठिकानों के नेटवर्क को फिर से पुनर्जीवित तकरने की तैयारी में लग गया है। अपने आतंकी ढांचे को फिर से खड़ा करने के लिए जैश-ए-मोहम्मद ने एक बड़ा धन उगाही अभियान शुरू किया है। इंडिया टुडे ने अपनी रिपोर्ट में इसके बारे में जानकारी दी है। मई में आपरेशन सिंदूर के तहत भारतीय सशस्त्र बलों ने जैश-ए-मोहम्मद का बहावलपुर स्थित मुख्यालय और आतंकी लॉन्च पैड को नेस्तनाबूद कर दिया था। 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारतीय सेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) में 9 आतंकी लॉन्च पैड को तबाह किया था। ये लॉन्च पैड जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हुए थे। इस ऑपरेशन में 100 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए थे। यह अभियान 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले का बदला लेने के लिए चलाया गया था। पहलगाम आतंकी हमले में 26 नागरिक मारे गए थे। 313 नए शिविर स्थापित करने की योजना  खुफिया जानकारी के आधार पर अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जैश-ए-मोहम्मद अपनी स्थिति सुधारने के लिए पूरा जोर लगा रहा है। संगठन ने कथित तौर पर पूरे पाकिस्तान में 313 नए 'मरकज' स्थापित करने की योजना बनाई है, जिनका इस्तेमाल आतंकियों को ट्रेनिंग और उन्हें ठिकाने देने के लिए किया जाएगा। इसके लिए 3.91 अरब पाकिस्तानी रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। पकड़े जाने से बचने के लिए ऑनलाइन चंदा इन ठिकानों में नए आतंकियों के लिए प्रशिक्षण केंद्र चलाने के साथ ही जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर और उसके परिवार के लिए सुरक्षित ठिकाने के रूप में काम करने की उम्मीद है। रिपोर्ट में बताया गया है कि धन उगाही अभियान का नेतृत्व मसूद अजहर अपने भाई तल्हा अल सैफ के साथ मिलकर कर रहा है। पकड़े जाने से बचने के लिए जैश ने ईजीपैसा और सदापे जैसे डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल की योजना बनाई है। ऑनलाइन पैसा इकठ्ठा करने के अलावा जैश के कमांडर शुक्रवार की नमाज के दौरान मस्जिदों में भी चंदा इकठ्ठा कर रहे हैं। इसे गाजा में मानवीय सहायता के लिए दिए जाने के लिए दिखा रहे हैं।

सरकार की कार्यप्रणाली में रुकावट डालना लोकतंत्र के खिलाफ—किरन रिजिजू

नई दिल्ली  संसद के मानसून सत्र का अंतिम दिन था। इस बार मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया। इस बीच केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष होना चाहिए। विरोध करना या असहमति जताना अपनी बात कहने का लोकतांत्रिक तरीका है, लेकिन संसद में सरकार के काम में बाधा डालना और उसे रोकना अलोकतांत्रिक है। किरेन रिजिजू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि सरकार की दृष्टि से देश के लिए बहुत उपयोगी सत्र रहा है, लेकिन विपक्ष के सांसदों को, खासकर नए सांसदों को, सदन में बोलने का मौका नहीं मिला। सत्र के दौरान सांसद अपने लोकसभा क्षेत्र की बात रखते हैं, लेकिन विपक्ष के कई सांसदों को बोलने का मौका नहीं मिला, उसके लिए विपक्ष के नेता जिम्मेदार हैं। एनडीए और कुछ दल, जिन्होंने सत्र में भाग लिया, उन्हें धन्यवाद। उन्होंने कहा कि एक बात मेरे मन में चोट पहुंचाती है। कैप्टन शुभांशु शुक्ला पर चर्चा रखी गई थी, लेकिन विपक्ष ने चर्चा नहीं करने दी, जिसका दुख है। कई बिल पास किए हैं, कुछ बिल संयुक्त संसदीय समिति को भेजे गए हैं। उनमें तीन बिल महत्वपूर्ण हैं, जिनमें गवर्नमेंट ऑफ यूनियन टेरिटरीज (संशोधन) बिल 2025, 130वां संविधान संशोधन बिल 2025 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) बिल 2025 शामिल हैं। ये ऐसे बिल हैं, जिनमें आजादी के बाद पहली बार प्रधानमंत्री को रखा गया है। लोग खुद को बचाने के लिए कानून बनाते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री ने कहा कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है। किरेन रिजिजू ने कहा कि विपक्ष के लोगों ने भ्रम फैलाने की कोशिश की। इस बिल के लिए देशभर में स्वागत हो रहा है। मेरे पास कई संदेश आए। उन्होंने कहा कि विरोध तो होता है, लोकतंत्र में विरोध होना भी चाहिए, पक्ष और विपक्ष मिलकर संसद बनते हैं, लेकिन संसद के कामकाज में बाधा डालना ठीक नहीं है। हमारी पार्टी जीवन भर विपक्ष में रही, थोड़े समय तक सत्ता में है। हमने हमेशा विपक्ष में रहते हुए ये ध्यान रखा कि विरोध से किसी को चोट न लगे और न ही सीमा लांघे। देश के खिलाफ बात करके, इलेक्शन कमीशन को गाली देकर, सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ बात करके आप लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं।

भारतीय एयरलाइंस के लिए घाटे का साल, एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस को सबसे बड़ा झटका

नई दिल्ली वित्त वर्ष 2024-25 में ज्यादातर भारतीय एयरलाइंस ने नुकसान दर्ज किया है और सबसे ज्यादा घाटा टाटा ग्रुप की एयरलाइन एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस को हुआ है। यह जानकारी सरकार की ओर से गुरुवार को संसद को दी गई। लोकसभा में एक सवाल का लिखित में जवाब देते हुए केंद्रीय नागर विमानन राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने कहा कि एयर इंडिया और उसकी बजट एयरलाइन एयर इंडिया एक्सप्रेस ने वित्तीय वर्ष के दौरान कर से पूर्व 9,568.4 करोड़ रुपए का संयुक्त घाटा दर्ज किया है। वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान एयर इंडिया को 3,890.2 करोड़ रुपए का घाटा हुआ है, जबकि एयर इंडिया एक्सप्रेस को 5,678.2 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। अन्य एयरलाइन जैसे अकासा एयर को कर से पूर्व 1,983.4 करोड़ रुपए का घाटा हुआ था। वहीं, इस दौरान स्पाइसजेट को 58.1 करोड़ रुपए का घाटा हुआ है। इंडिगो, देश की एकमात्र बड़ी एयरलाइन है, जिसे वित्त वर्ष 25 में मुनाफा हुआ है। इंडिगो को पिछले वित्त वर्ष में कर से पहले 7,587.5 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ है।प्रोविजनल डेटा से जानकारी मिली है कि एयर इंडिया पर 26,879.6 करोड़ रुपए, इंडिगो पर 67,088.4 करोड़ रुपए, एयर इंडिया एक्सप्रेस पर 617.5 करोड़ रुपए, अकासा एयर पर 78.5 करोड़ रुपए और स्पाइसजेट पर 886 करोड़ रुपए का कर्ज है। मोहोल ने स्पष्ट किया कि 1994 में एयर कॉर्पोरेशन अधिनियम के निरस्त होने के बाद से एयरलाइनों के वित्तीय और परिचालन संबंधी निर्णय कंपनियां स्वयं लेती हैं, जिसमें ऋण पुनर्गठन भी शामिल है। उन्होंने कहा कि सरकार राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति, 2016 के तहत एक अनुकूल नीतिगत माहौल बनाकर एक सहायक भूमिका निभाती है। उन्होंने उड़ान जैसी योजनाओं का भी जिक्र किया, जो क्षेत्रीय मार्गों पर परिचालन करने वाली एयरलाइनों को वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं, जिससे वे अधिक लागत प्रभावी बनती हैं। ये आंकड़े ऐसे समय में सामने आए हैं जब घरेलू विमानन बाजार में वृद्धि के बावजूद एयरलाइनों की वित्तीय स्थिति को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं। मोहोल ने संसद को बताया कि पिछले महीनों की तुलना में जुलाई में एयरलाइन क्षमता में कोई कमी नहीं देखी गई है, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि सरकार इस क्षेत्र में सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए चुनौतियों का समाधान करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है।

स्वास्थ्य सेवाओं पर चर्चा के लिए प्रियंका गांधी ने की जेपी नड्डा से मुलाकात

नई दिल्ली  कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने गुरुवार को भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात की। उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं पर चर्चा की। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट कर कहा कि उन्होंने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात की और उनसे वायनाड में कुछ स्वास्थ्य परियोजनाओं में तेजी लाने का अनुरोध किया और उन्हें मनंतवडी में मेडिकल कॉलेज के अभाव में स्थानीय लोगों को हो रही गंभीर कठिनाइयों से अवगत कराया, जो अभी तक चालू नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि हमने वायनाड की आदिवासी आबादी के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवा की आवश्यकता, उनकी विशिष्ट स्वास्थ्य समस्याओं, लंबित राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) निधियों और क्षेत्र में जानवरों के हमलों के मामलों में एक विशेष ट्रॉमा सेंटर की आवश्यकता पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि इसके साथ ही, हम सभी ने केरल के लिए एक एम्स की लंबे समय से चली आ रही मांग को भी दोहराया। उन्होंने हमारी सभी मांगों को सुना और हमारे साथ खुलकर चर्चा की। मुझे पूरी उम्मीद है कि इन ज्वलंत मुद्दों पर उचित ध्यान दिया जाएगा। इससे पहले कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा था कि राहुल गांधी ने 'वोट चोरी' पर बड़ा खुलासा किया है। 'वोट चोरी' की जांच होनी चाहिए। चुनाव आयोग वोटर लिस्ट नहीं दे रहा है। इस मामले में जांच करने के बजाए, वह हलफनामा मांग रहा है। हम लगातार डेटा दिखा रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग मानने को तैयार ही नहीं है। उन्होंने आगे कहा था कि इंडिया गठबंधन के नेता आपस में चर्चा करेंगे और आगे का रास्ता तय करेंगे, लेकिन यह स्पष्ट है कि इस पूरे मामले में अनियमितताएं हैं, जिसे सभी ने देखा होगा। जिस तरह से भाजपा और अन्य नेता प्रतिक्रिया दे रहे हैं, उससे भी एक बात साफ है कि गड़बड़ी हुई है।

जयशंकर बोले, भारत और रूस का साझा मकसद है आपसी सहयोग बढ़ाना

मॉस्को विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने गुरुवार को रूस की राजधानी मॉस्को में अपने समकक्ष सर्गेई लावरोव से मुलाकात के दौरान कहा कि भारत और रूस का साझा लक्ष्य आपसी रिश्तों में 'अधिकतम पूरकता' हासिल करना है। उन्होंने भरोसा जताया कि उनकी चर्चाएं सार्थक रहीं और इस वर्ष के अंत में होने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के शिखर सम्मेलन को अधिकतम परिणामोन्मुख बनाएंगी। जयशंकर ने कहा, "आज की बैठक हमें राजनीतिक रिश्तों पर चर्चा करने का अवसर देती है, साथ ही व्यापार, आर्थिक निवेश, रक्षा, विज्ञान-तकनीक और जन-से-जन संपर्क जैसे द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा का भी। पिछले वर्ष हमारे नेताओं की 22वीं वार्षिक शिखर सम्मेलन और फिर कजान में मुलाकात हुई थी। अब हम इस साल के अंत में होने वाले वार्षिक शिखर सम्मेलन की तैयारी कर रहे हैं।" उन्होंने बताया कि बुधवार को रूस के उप प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव के साथ अंतर-सरकारी आयोग की बैठक बहुत उपयोगी रही और कई मुद्दों पर समाधान निकाले गए। उन्होंने कहा, "अब मैं चाहता हूं कि उन चर्चाओं को आगे बढ़ाया जाए ताकि वार्षिक शिखर सम्मेलन में अधिकतम परिणाम हासिल किए जा सकें।" विदेश मंत्री ने हाल ही में हुई अन्य उच्चस्तरीय बैठकों का भी उल्लेख किया, जिनमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, रेल और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव तथा नीति आयोग प्रमुख सुमन बेरी की मॉस्को यात्राएं शामिल हैं। उन्होंने कहा कि बदलते भू-राजनीतिक हालात और वैश्विक व्यापारिक परिदृश्य के बीच भारत-रूस रिश्तों की निकटता और गहराई स्पष्ट झलकती है। जयशंकर ने लावरोव का गर्मजोशी से स्वागत किया और मेहमाननवाजी के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के विदेश मंत्रियों की बैठक सहित विभिन्न बहुपक्षीय मंचों पर उनकी नियमित मुलाकातों ने दोनों देशों के बीच सतत संपर्क बनाए रखने में मदद की है। बुधवार को जयशंकर ने मॉस्को में 26वें भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग (आईआरआईजीसी-टीईसी) की सह-अध्यक्षता भी की। इसके बाद उन्होंने एक्स पर लिखा, "भारत-रूस बिजनेस फोरम में शामिल होकर खुशी हुई। हमारे आर्थिक संबंधों की गहराई पर विभिन्न क्षेत्रों के नेताओं की राय और आकलन उपयोगी रहे।" उन्होंने कहा, "किसी भी स्थायी रणनीतिक साझेदारी में मजबूत और टिकाऊ आर्थिक आधार जरूरी है। इस संदर्भ में मैंने हमारे कारोबारियों से अधिक व्यापार करने, नए निवेश और संयुक्त उपक्रमों पर विचार करने तथा आर्थिक सहयोग के नए क्षेत्र तलाशने का आह्वान किया।"

मोदी सरकार का नया बिल, पीएम और सीएम को हटाने की योजना और केजरीवाल का असर

नई दिल्ली मोदी सरकार प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को गंभीर आरोप के मद्देनजर 30 दिनों से ज्यादा की जेल के बाद पद से हटाने वाला बिल लेकर आई है, जिसपर हंगामा मच गया है। अमित शाह के बुधवार को बिल लोकसभा में पेश करते हुए कांग्रेस, सपा, एआईएमआईएम समेत पूरे विपक्ष ने इसका जमकर विरोध किया। विपक्ष का आरोप है कि इस बिल के कानून बनने के बाद केंद्र सरकार उन राज्यों को टारगेट करेगी, जहां विपक्षी दलों की सरकार है, जबकि कानून के हिसाब से जब तक कोई आरोपी दोषी न साबित हो जाए, तब तक उसे निर्दोष ही माना जाता है। फिलहाल, इस बिल को ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (जेपीसी) को भेज दिया गया है, जहां पक्ष-विपक्ष, दोनों के सांसद बिल के प्रावधानों पर विचार करेंगे, और फिर इसे अगले संसद सत्र में पास करवाने की कोशिश की जा सकती है। इस बिल के लाए जाने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि आखिर सरकार ने इसे लाने का फैसला क्यों किया। इसके पीछे वजह दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और तमिलनाडु के पूर्व मंत्री सेंथिल बालाजी बताए जा रहे हैं। केजरीवाल और बालाजी से कैसा कनेक्शन? जहां अरविंद केजरीवाल दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री हैं तो वहीं, सेंथिल बालाजी तमिलनाडु सरकार के पूर्व मंत्री हैं। हालांकि, दोनों में एक खास कनेक्शन यह है कि दोनों पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और फिर जेल हुई, लेकिन काफी समय तक पद से इस्तीफा नहीं दिया। पिछले साल लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली के कथित शराब घोटाले में केजरीवाल की गिरफ्तारी हुई और लंबे समय तक उन्होंने जेल से ही सरकार चलाई। एनडीटीवी ने सरकार के सूत्रों के हवाले से बताया, ''केजरीवाल के गिरफ्तारी के बाद भी इस्तीफा न देने की वहज से केंद्र सरकार ने एक महीने से ज्यादा जेल में बंद सीएम, मंत्रियों को हटाने के लिए कानून बनाने का फैसला किया।'' दिल्ली के कथित शराब घोटाले में आम आदमी पार्टी के कई मंत्रियों की गिरफ्तारी हुई थी। इसमें मार्च में केजरीवाल को अरेस्ट किया गया। माना जा रहा था कि वह गिरफ्तारी होने के बाद अपने पद से इस्तीफा दे देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने जेल से ही सरकार चलाई और जब वे जेल से बाहर आ गए, तब सितंबर में उन्होंने सीएम पद से इस्तीफा देते हुए आतिशी को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंपी। सरकार के सूत्रों ने बताया कि जब केजरीवाल ने जेल से ही सरकार चलाने का फैसला किया था और इस्तीफा देने से मना कर दिया था, तभी सरकार यह कानून लेकर आना चाहती थी, लेकिन उस समय इसे प्रतिशोध की राजनीति की तरह विपक्ष इसे पेश करता। इसी वजह से सरकार ने इंतजार किया और अब मॉनसून सत्र में यह बिल लेकर आई। बालाजी के मामले से भी ऐक्शन में आई सरकार वहीं, तमिलनाडु के पू्र्व मंत्री सेंथिल बालाजी को भी 2023 में भ्रष्टाचार के एक मामले में अरेस्ट किया गया था, लेकिन उसके बाद भी वह बिना विभाग के मंत्री बने रहै। इस पर मद्रास हाई कोर्ट तक को आपत्ति जतानी पड़ी, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। हालांकि, जमानत मिलते ही उन्हें फिर से मंत्री पद दे दिया गया। लेकिन एक सुनवाई के दौरान जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इस्तीफा देने या जमानत रद्द करने की धमकी दी, तब उन्होंने अपना पद छोड़ा। सरकारी सूत्र ने बताया कि इस मजाक को खत्म करने की जरूरत है। इसी के चलते सरकार अब पीएम-सीएम और मंत्रियों को हटाने वाला बिल लेकर आई है। हालांकि, चूंकि संविधान संशोधन के तहत दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है, जिसकी वजह से बिल के संसद में पारित होना मुश्किल लगता है। अगर सरकार को बिल पास करवाना है तो उसे विपक्ष को भी साथ लेना पड़ेगा। हालांकि, विपक्षी सांसदों के विरोध के स्तर को देखते हुए यह कहना कठिन है कि वे बिल के वर्तमान प्रावधानों पर सहमत होंगे।  

इंटरनेशनल कोर्ट के जजों पर अमेरिका का प्रतिबंध, नेतन्याहू से जुड़ा मामला

वॉशिंगटन/यरुशेलम  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) के वैसे जजों पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिन्होंने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने को मंजूरी दी थी और अरेस्ट वारंट जारी किया था। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो द्वारा बुधवार को घोषणा किए गए इस कदम की इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने प्रशंसा की है। उन्होंने कहा कि यरूशलेम को झूठे तरीके से बदनाम करने के ICC के अभियान पर अमेरिकी सरकार का यह दंडात्मक कदम सराहनीय है। नेतन्याहू ने इस कदम को इजरायल की रक्षा में एक निर्णायक कदम कहा है। नेतन्याहू के ऑफिस से जारी एत बयान में उन्होंने कहा, "मैं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को हेग स्थित अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों पर प्रतिबंध लगाने के फैसले के लिए बधाई देता हूँ।" उन्होंने आगे कहा, "यह इजरायल और इजरायली डेमोक्रेटिक फ्रंट को निशाना बनाकर किए जा रहे झूठे प्रचार अभियान के खिलाफ और सच्चाई व न्याय के पक्ष में एक कड़ा कदम है।" किन-किन पर लगे प्रतिबंध? ट्रंप प्रशासन ने जिन जजों पर ये प्रतिबंध लगाए हैं उनमें फ्रांस के न्यायाधीश निकोलस यान गुइलौ, फिजी के उप अभियोजक नजहत शमीम खान और सेनेगल के उप अभियोजक मामे मांडियाये नियांग के भी नाम शामिल हैं। इन लोगों ने गाजा में कथित युद्ध अपराधों के लिए इजरायली पीएम नेतन्याहू और उनके पूर्व रक्षा मंत्री योआव गैलेंट के खिलाफ पिछले साल गिरफ्तारी वारंट पर हस्ताक्षर किए थे। इनके अलावा कनाडा की न्यायाधीश किम्बर्ली प्रोस्ट को भी उस फैसले के लिए प्रतिबंधित किया गया है जिन्होंने आईसीसी को अफगानिस्तान में अमेरिकी कर्मियों की जाँच करने की अनुमति दी थी। नवंबर 2024 में नेतन्याहू के खिलाफ जारी हुए थे वारंट बता दें कि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के न्यायाधीशों के एक पैनल ने नवंबर 2024 में नेतन्याहू और योआव गैलेंट के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे। न्यायाधीशों का मानना था कि उक्त दोनों ने गाजा में हमास के खिलाफ इजरायल के अभियान के दौरान मानवीय सहायता रोककर और जानबूझकर नागरिकों को निशाना बनाकर युद्ध अपराध किए हैं। हालांकि, इजरायल के अधिकारी इस तरह के आरोपों को खारिज करते हैं। ICC ने प्रतिबंधों की कड़ी आलोचना की इसके जवाब में आईसीसी ने बुधवार को अमेरिकी प्रतिबंधों की कड़ी निंदा की और इसे सभी 125 सदस्य देशों के अधिदेश के तहत संचालित एक निष्पक्ष न्यायिक संस्था की स्वतंत्रता पर एक ज़बरदस्त हमला बताया है। एक बयान में, ICC ने कहा कि ये प्रतिबंध "अदालत के सदस्य देशों, नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था और सबसे बढ़कर, दुनिया भर के लाखों निर्दोष पीड़ितों का अपमान हैं।" अदालत ने आगे कहा, "आईसीसी किसी भी दबाव या धमकी की परवाह किए बिना, अपने कानूनी ढाँचे के अनुसार अपने आदेशों का सख्ती से पालन करना जारी रखेगा।" फरवरी और जून में भी लगाए थे प्रतिबंध इससे पहले जून में भी ट्रंप प्रशासन ने आईसीसी के दो अन्य जजों को प्रतिबंधित कर दिया था। उससे पहले फरवरी में ICC के मुख्य अभियोजक करीम खान पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था। इन प्रतिबंधों के बाद आईसीसी के कर्मचारियों के सामने कई तरह की अड़चनें आ रही हैं। प्रतिबंधों के कारण उनकी अमेरिका में एंट्री बैन हो गई है। इसके अलावा वे अमेरिकी संपत्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे। बैंकों से भी लेनदेन रुक जाएगा।

PM मोदी ने ट्रंप से मुलाकात के बाद मैक्रों से की फोन चर्चा, रूस-यूक्रेन मुद्दे पर फोकस

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से फोन पर बातचीत की। बातचीत की जानकारी देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स हैंडल पर लिखा,"मेरे मित्र राष्ट्रपति मैक्रों के साथ बहुत अच्छी बातचीत हुई। यूक्रेन और पश्चिम एशिया में संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान के प्रयासों पर विचारों का आदान-प्रदान किया। भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की हमारी प्रतिबद्धता दोहराई।" बता दें कि रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ने व्लादिमीर पुतिन, वोलोदिमीर जेलेंस्की और यूरोपीय यूनियन के नेताओं से बातचीत की। अलास्का में पुतिन से मुलाकात के बाद ट्रंप ने जेलेंस्की से बात की। ट्रंप ने उम्मीद जताया है कि जल्द ही तीनों नेता एक साथ बैठकर युद्ध की समाप्ति पर फैसला लेंगे।  

अमेरिका की नीति में अंतर, भारत को टारगेट, चीन और रूस को बड़ा लाभ

चीन  चीन की पांचों उंगलियां इस वक्त घी में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों ने जहां दुनिया भर में उथल-पुथल मचाई है, वहीं दूसरी तरफ चीन को अब भी छूट मिली हुई है। बीते अप्रैल महीने में चीन के साथ शुरू हुए मिनी ट्रेड वॉर के बाद अमेरिका पीछे हटता हुआ दिखा और फिलहाल उसने चीन पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने के डेडलाइन को और बढ़ा दिया है। इस बीच ट्रंप का फोकस फिलहाल भारत पर है। बीते कुछ सप्ताह में ट्रंप ने रूसी तेल की खरीद को लेकर भारत को लगातार टारगेट किया है और कुल 50 फीसदी टैरिफ लगाने का ऐलान भी किया है। ऐसे में फोकस शिफ्ट होता देख चीन रूसी तेलों का आयात बढ़ाने में जुट गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन इन दिनों पारंपरिक रूप से भारत आने वाले अतिरिक्त शिपमेंट को सुरक्षित करने के लिए तेजी से काम कर रहा है। गौरतलब है कि यूक्रेन जंग शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंध के बीच भारत और चीन रूसी तेल के सबसे बड़े खरीददार के रूप में उभरे थे, जिन्हें रूस डिस्काउंट पर तेल बेच रहा है। अब भारत को अमेरिका से मिल रहे झटकों के बाद चीन इसे अपने लिए एक बड़े अवसर के रूप में देख रहा है। चीन ने बढ़ाया आयात बीते दिनों कुछ रिपोर्ट्स में यह खबरें सामने आईं हैं कि भारत अमेरिकी प्रतिबंधों को देखते हुए रूसी कच्चे तेल के आयात में कमी कर रहा है। रॉयटर्स ने बीते दिनों विश्लेषकों के हवाले से बताया था कि भारत ने रूस से अपने कच्चे तेल के आयात में प्रतिदिन 600,000 से 700,000 बैरल तक की कमी की है। इस बीच चीन के रिफाइनर एक्स्ट्रा रूसी तेल खरीदने के लिए आगे आए हैं। फर्स्टपोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन की सरकारी तेल कंपनियों और प्रमुख निजी रिफाइनरों ने अगस्त में ही अक्टूबर और नवंबर में डिलीवरी के लिए रूसी कच्चे तेल के कम से कम 15 कार्गो सुरक्षित कर लिए हैं। हर शिपमेंट में 700,000 से 10 लाख बैरल होंगे जिसे चीन की आपूर्ति में एक बड़ी बढ़ोतरी बताया जा रहा है। मौके का फायदा इस बीच तेल की कीमतें कम होने से भी चीन को बेहद फायदा हो रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक रूसी ग्रेड के तेल अन्य देशों की तुलना में कम से कम 3 डॉलर प्रति बैरल सस्ते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक ट्रंप से मिले इस डेडलाइन का फायदा उठाकर चीनी रिफाइनर जल्द से जल्द ज्यादा से ज्यादा शिपमेंट सुरक्षित कर रहे हैं। भारत पर टैरिफ बढ़ाने का ऐलान बीते कुछ सप्ताह में अमेरिका ने लगातार इस बात को दोहराया है कि भारत रूस से बहुत अधिक व्यापार खरीदता है और यूक्रेन जंग में रूस की आर्थिक मदद कर रहा है। ट्रंप ने इस तरह के आरोप लगाते हुए भारत पर पहले 25 फीसदी और फिर बाद में अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। हालांकि भारत ने यह स्पष्ट किया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। भारत ने अमेरिकी टैरिफ को बेतुका और अनुचित भी बताया है। भारत नहीं करेगा हितों से समझौता बता दें कि भारत अपनी जरूरतों का 75 से 80 फीसदी क्रूड ऑयल इंपोर्ट करता है। बीते सालों में रूस से कच्चे तेल की आपूर्ति कई गुना बढ़ गई है और फिलहाल भारत लगभग 38 फीसदी तेल रूस से खरीदता है। भारत ने अमेरिका को स्पष्ट रूप से कहा है कि अपनी अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा और वह वहां से तेल खरीदेगा जहां उसे अच्छा सौदा मिलेगा। रूसी तेल से कच्चे तेल का आयात कम होने की खबरों के बीच शीर्ष अधिकारियों ने कहा है कि खरीददारी का फैसला पूरी तरह आर्थिक और वाणिज्यिक आधार पर ही किया जाएगा।