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BRICS डिनर में वेज खाना, राहुल गांधी के पोस्ट से सोशल मीडिया पर छिड़ी नई बहस

नई दिल्ली कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के एक पोस्ट ने सोशल मीडिया पर एक अलग बहस छेड़ दी है। अपने पोस्ट में राहुल गांधी ने वेजिटेरियन और नॉन-वेजिटेरियन खाने का जिक्र किया, जिसके बाद लोगों उनकी पोस्ट पर काफी कमेंट कर रहे हैं । राहुल गांधी ने रविवार को सोशल मीडिया X पर एक पोस्ट करते हुए लिखा कि भारत में 80% लोग नॉन-वेजिटेरियन हैं। भारत का नॉन-वेज खाना बहुत स्वादिष्ट होता है। राहुल के इस पोस्ट को BRICS समिट में परोसे गए वेज फूड से जोड़कर देखा जा रहा है। राहुल गांधी ने किया ये पोस्ट बता दें कि, राहुल गांधी ने रविवार 13 सितंबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट शेयर किया। इस पोस्ट में उन्होंने छोले-भटूरे की फोटो शेयर की। साथ ही कैप्शन में उन्होंने इंडियन नॉन-वेज का जिक्र किया। X पर पोस्ट करते हुए राहुल गांधी ने लिखा, "80 प्रतिशत इंडियन नॉन-वेजिटेरियन हैं और इंडियन नॉन-वेज खाना बहुत ही ज्यादा स्वादिष्ट होता है। उन्होंने पोस्ट पर मजाकिया अंदाज में ये भी कहा कि उनकी बहन के बनाए छोले-भटूरे भी उतने ही स्वादिष्ट हैं। पोस्ट में शेयर की गई तस्वीर देखकर ऐसा लगता है कि ये छोले-भटूरे कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने अपने हाथों से तैयार किए थे। पोस्ट पर छिड़ी बहस दरअसस, BRICS के आधिकारिक गाला डिनर के मेन्यू में कोई नॉन-वेज डिश शामिल नहीं थी। शाकाहारी मेन्यू को लेकर सोशल मीडिया पर भी अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। वहीं राहुल गांधी के इस पोस्ट को BRICS समिट में परोसे गए वेज फूड से जोड़कर देखा जा रहा है। इसके जवाब में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने पोस्ट करते हुए लिखा कि मुझे यकीन नहीं हो रहा कि कांग्रेस पार्टी ब्रिक्स देशों के नेताओं को परोसे गए खाने के मेन्यू पर भी राजनीति कर रही है। हमारे मेहमानों ने भारतीय शाकाहारी भोजन का आनंद लिया, जो स्वाद और पोषण से भरपूर था और जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों की परंपराओं की झलक थी। BRICS के मेन्यू में थे ये डिश दरअसल 12 सितंबर को आयोजित डिनर के मेन्यू में पनीर के साथ सूखी सब्जी, चुकंदर का रायता, गुजराती खांडवी और मिलेट्स का पुलाव रखा गया था। कश्मीर की मशरूम डिश और मिठाई में फ्रूट क्रीम विद जलेबी परोसी गई थी। मेन्यू के मुताबिक, स्टार्टर के तौर पर खांडवी मिल-फ्यूई थी। मेन स्टार्टर में पनीर लबाबदार से लेकर गुच्छी मार्मिक, केसर, किशमिशन और मामरा बदाम के साथ पकाए गए हिमाचली गुच्छी मशरूम और मिलेट पुलाव था। भारत ने की मेजबानी बता दें कि, भारत में आयोजित दो दिवसीय 18वां BRICS शिखर सम्मेलन रविवार को खत्म हुआ। इस सम्मेलन में 11 सदस्य देशों के नेता एक मंच पर जुटे और कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ हुई थी। साल 2024 में इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को शामिल किया गया। इसके बाद 2025 में इंडोनेशिया भी BRICS का सदस्य बन गया। इसके अलावा, पिछले साल बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम को BRICS के साझेदार देशों का दर्जा दिया गया था।

पवन खेड़ा के हिजाब बयान पर पूनावाला का हमला, बोले- कांग्रेस ने किया सेल्फ गोल

नई दिल्ली  अब ये हाल है कांग्रेस पार्टी के मीडिया हेड का। मोदी जी को टारगेट करने के चक्कर में सफेद बाल वाला। आपको पता है किसकी बात कर रहा हूं। उसने जाकर सेल्फ गोल ही कर दिया। अपने ही वोट बैंक को ठोक दिया। गंदगी, गरीबी, टूटी-फूटी सड़कें ऐसा नहीं है कि बीजेपी को सभी तरह के हिजाब पसंद नहीं हैं। खासतौर पर वो वाले जो मीदी की नाकामियों को छुपाते हैं। और उसके बाद दिखा रहे हैं गंदगी, गरीबी, टूटी-फूटी सड़कें, जिनकों कवर किया जा रहा है। तो पवन खेड़ा के हिसाब से अब हिजाब जिसे ये डिग्निटी, आईडेंटिटी और महिलाओं की पसंद का एक सिंबर बताते थे वो दरअसल गंदगी छिपाने के लिए या कुछ ऐसा जो नहीं दिखना चाहिए वो सब छुपाने के लिए है। कुरान में कई बार जिक्र- पूनावाला शहजाद पूनावाल ने आगे कहा कि हिजाब का तो कुरान में कई बार जिक्र है कांग्रेस के मुताबिक ये तो महिलाओं की पसंद और उनके शरीर से संबंधित है। लेकिन कांग्रेस पार्टी अब हिजाब की तुलना उस चीज से कर रही है, जिससे की गंदगी को छुपाया जा सके। यानी की महिलाओं की तुलना कचरे से की जा रही है। इसलिए तो शायद सफेल बाल वाले ने पहले लिखा था कि क्या मैं इसे पोस्ट कर सकता हूं। अगर इस ट्वीट को लेकर भी पूछ लेते तो कांग्रेस की तरफ से जवाब न ही आता। अब तो उन्होंने अपने ही वोटबैंक को ठोक दिया। कॉमनवेल्थ गेम्स की हकीकत दिखाई पूनावाला ने आगे कहा कि अब पवन खेड़ा जी ने हिजाब की बात की है तो ये तस्वीर देखिए 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स की है, क्या आप इसको भी हिजाब कहेंगे और ये वाली तस्वीर भी देखिए। देखिए कैसे मुंह छुपाया जा रहा है, ये भी हिजाब है क्या। खैर छोड़िए, कांग्रेस पार्टी ने तो सेल्फ गोल कर लिया और उसने यही उम्मीद भी की जाती है। अपने ही वोट बैंक को ठोक दिया। अब तो मुस्लिम समुदाय भड़का हुआ है। वो कह रहे हैं कि ये कांग्रेस वाले हमारी धर्मिक पहचान को निशाना बना रहे हैं और ऐसा काम तो बीजेपी ने भी नहीं किया था। गजब है।

मायावती का बड़ा संगठनात्मक फैसला, आनंद कुमार संभालेंगे राज्यों की जिम्मेदारी; आकाश आनंद पर भी हमला

नई दिल्ली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रमुख मायावती ने रविवार को मीडिया के सामने आकर इस बात पर जोर दिया कि वह बीमार नहीं हैं। मायावती ने कहा कि उनके द्वारा पार्टी से निकाले गए लोग उनके पार्टी के लोगों में भ्रम फैला रहे हैं कि बहन जी बीमार है। उन्होंने इसे लेकर भतीजे आकाश आनंद पर सीधा निशाना भी साधा। बताया कि शविवार रात आकाश ने मेरे निवास पर पार्टी इंचार्ज आलोक कुमार को फोन कर मेरे स्वास्थ्य की जानकारी ली थी, जो गंभीर बात है। आकाश ने आलोक कुमार से यह भी कहा था कि इसकी जानकारी बहनजी को मत देना। इसके साथ ही मायावती ने अब अपने सबसे छोटे भाई आनंद कुमार का कद बढ़ा दिया है। उन्होंने बताया कि यूपी-उत्तराखंड के अलावा देश के अन्य राज्यों में पार्टी के काम को दो सेक्टरों में रखा गया है। इन दोनों सेक्टरों की समीक्षा हर डेढ़ महीने पर दिल्ली में पार्टी उपाध्यक्ष आनंद कुमार करेंगे। मायावती ने कहा कि पिछले डेढ़ महीने से वह अपने कड़े निर्णयों की जानकारी अपने एक्स अकाउंट के जरिये साझा कर रही थीं, इसलिए सब कुछ साफ करने के लिए आज सामने आकर बता रही हूं। मेरे कड़े निर्णयों से पार्टी और संगठन को फायदा हो रहा है। उन्होंने बताया कि तीन सितम्बर को राष्ट्रीय पदाधिकारियों की बैठक में पार्टी को तीन सेक्टर में बांट दिया गया है, इसमें सेक्टर एक में यूपी और उत्तराखंड है और इनकी निगरानी और समीक्षा वह खुद कर रही है। शेष राज्यों को बाकी दो सेक्टर में रखा गया है, जिसकी समीक्षा पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आनंद कुमार करेंगे और मुझे रिपोर्ट देंगे। उन्होंने यह भी बताया कि राज्यों में प्रभारी काम करेंगे और मुख्य सेक्टर प्रभारी का पद समाप्त कर दिया गया है। पंचायत सहायकों की मांगों को लेकर सरकार से की ये अपील बसपा प्रमुख मायावती ने रविवार को उत्तर प्रदेश के लगभग 58 हजार पंचायत सहायकों की मांगों पर सरकार से सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की अपील की। उन्होंने कहा कि पंचायत सहायक अपने मानदेय को सम्मानजनक करने और संविदा के स्थान पर स्थायीकरण आदि की मांगों को लेकर लखनऊ में मान्यवर श्री कांशीराम ग्रीन ईको गार्डन के पास आंदोलन कर रहे हैं। सरकार इनकी मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार अवश्य करे। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की उपलब्धियों को सराहा बसपा प्रमुख मायावती ने नई दिल्ली में हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने कहा कि यू्क्रेन और ईरान के खिलाफ अमरीका के युद्ध के लगातार तनातनी और हाई टैरिफ आदि थोपने से भारी आर्थिक संकट जैसे हालातों और चुनौतियों के बीच ब्रिक्स संघ के देशों की आपसी सहमति से 140 पैराग्राफ का दिल्ली घोषणा पत्र का सर्वसम्मति से जारी होना आपसी अच्छी सूझबूझ और कूटनीतिक उपलब्धि से कम नहीं है। इन देशों के बीच और अच्छे संबंधों की उम्मीद जगाने वाला है। इसके साथ ही फिलस्तीन और आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के दृष्टिकोण को उचित समर्थन मिला है। इसके साथ ही पड़ोसी देश चीन से मतभेद नहीं बढ़ने देने और एक-दूसरे को विकास में पार्टनर समझने के दृष्टिकोण के कितने अच्छे नतीजे निकलेंगे ये आने वाले समय में जांच-परख की बात है। दोनों देशों के बीच सीमा का विवाद जितना जल्दी सुलझ जाए उतना अच्छा रहेगा।

TMC के बागियों को BJP में नहीं मिली जगह? सायोनी घोष-काकोली के बाद पार्टी के फैसले पर सवाल

नईदिल्ली  सयोनी घोष, यूसुफ पठान हों या काकोली घोष… सभी ने बंगाल चुनाव में टीएमसी की हार के बाद ममता का साथ छोड़ा. टीएमसी के बागी सांसदों ने एनडीए का हिस्सा बनना पसंद किया. वे सभी एसीपीआई यानी नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हुए. यह एनसीपीआई दिल्ली में भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए का हिस्सा है. अब टीएमसी के उन बागी सांसदों को भाजपा ने ही झटका दिया है. जी हां, बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी नगर निकाय चुनाव अकेले लड़ने का फैसला किया है. भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस यानी TMC के उन बागी सांसदों के साथ गठबंधन की संभावना को खारिज कर दिया है, जो अब नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का हिस्सा हैं।  बीजेपी का यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि इस साल हुए विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने के बाद अब पार्टी की नजर कोलकाता और हावड़ा के नगर निकाय चुनावों पर है. इन दोनों चुनावों को बीजेपी के लिए बड़ी राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा है. केएमसी यानी कोलकाता नगर निगम (KMC) और हावड़ा नगर निगम (HMC) के चुनाव दुर्गा पूजा के बाद होने की उम्मीद है. दोनों नगर निगमों के वार्डों की सीमाओं में बड़े बदलाव किए जा रहे हैं. इसे परिसीमन कहा जाता है. इसके तहत मतदाताओं की संख्या और इलाकों के आधार पर वार्डों की सीमाएं फिर से तय की जाती हैं।  खबर के मुताबिक, बंगाल प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने हाल में कहा, ‘पश्चिम बंगाल में बीजेपी का कोई गठबंधन सहयोगी नहीं है. हम कोलकाता और हावड़ा नगर निकाय चुनाव अपने दम पर लड़ेंगे और जीतेंगे.’ उन्होंने कहा कि दिल्ली में एनसीपीआई के साथ कोई राजनीतिक समझ हो सकती है, लेकिन दिल्ली और कोलकाता के बीच करीब 1,500 किलोमीटर की दूरी है. उनका कहना था कि राष्ट्रीय स्तर पर किसी पार्टी के साथ राजनीतिक संबंध होने का यह मतलब नहीं है कि पश्चिम बंगाल में भी उसी पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन किया जाए।  विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी का बढ़ा आत्मविश्वास पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन के बाद बीजेपी को कोलकाता में भी अपना आधार मजबूत होने का भरोसा है. केएमसी में पहले बीजेपी की स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी. लेकिन विधानसभा चुनाव में कोलकाता की ज्यादातर सीटों पर लोगों ने बीजेपी को वोट दिया. केएमसी चुनाव की जिम्मेदारी संभाल रहे बीजेपी नेता रितेश तिवारी ने कहा कि पार्टी सभी 209 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और बड़ी जीत हासिल करेगी।  NCPI को अब भी गठबंधन की उम्मीद वहीं, दूसरी तरफ टीएमसी के बागी गुट वाले सांसदों की फौज वाली NCPI को अभी भी बीजेपी के साथ गठबंधन की उम्मीद है. पार्टी का तर्क है कि वह संसद में बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA के साथ है. इसलिए नगर निकाय चुनाव में भी दोनों दलों के साथ आने की संभावना है. NCPI की सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि उनकी पार्टी एनडीए की सबसे बड़ी सहयोगी पार्टियों में से एक है और वह गठबंधन के सदस्य के रूप में निकाय चुनाव लड़ेगी. उन्होंने कहा कि चुनाव के करीब आने पर गठबंधन को लेकर फैसला किया जाएगा, लेकिन साथ आने की पूरी संभावना है।  गौरतलब है कि बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी के खराब प्रदर्शन के बाद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 20 सांसदों ने पार्टी छोड़ दी थी. इसके बाद वे NCPI में शामिल हो गए. इसमें सयोनी घोष भी शामिल थीं. ये सांसद दिल्ली में NDA की बैठकों में भी शामिल होते रहे हैं।  बंगाल बीजेपी क्यों नहीं चाहती TMC के बागियों से गठबंधन? अब सबसे बड़ा सवाल है कि आकिर बंगाल में बीजेपी टीएमसी के बागियों संग गठबंधन क्यों नहीं चाहती? दरअसल, पश्चिम बंगाल बीजेपी के कई नेताओं का मानना है कि पार्टी को अपने संगठन और कार्यकर्ताओं के दम पर चुनाव लड़ना चाहिए. एक सीनियर बीजेपी नेता ने कहा कि यह बंगाल में सत्ता में आने के बाद पार्टी का पहला नगर निकाय चुनाव होगा. इसलिए बीजेपी अपने संगठन, नेताओं और कार्यकर्ताओं की ताकत को आजमाना चाहती है. उन्होंने यह भी कहा कि NCPI के कई नेता पहले TMC में थे. बंगाल में बीजेपी कार्यकर्ताओं ने इन्हीं नेताओं के खिलाफ लंबे समय तक संघर्ष किया है. कई बीजेपी कार्यकर्ताओं ने इस राजनीतिक लड़ाई में अपनी जान तक गंवाई है. ऐसे में अगर बीजेपी अब उन्हीं पूर्व TMC नेताओं के साथ हाथ मिलाती है तो पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच गलत संदेश जा सकता है. इसके अलावा बीजेपी TMC नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाती रही है. पार्टी निकाय चुनाव में भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का वादा करना चाहती है. ऐसे में TMC के कुछ नेताओं के साथ गठबंधन करने पर मतदाताओं के बीच सवाल खड़े हो सकते हैं।  कई पार्टियों के बीच मुकाबले का फायदा उठाना चाहती है BJP बीजेपी के अकेले चुनाव लड़ने के पीछे राजनीतिक गणित भी है. राज्य में मुकाबला सिर्फ बीजेपी और TMC के बीच नहीं होगा. NCPI, ममता बनर्जी की TMC, TMC से अलग हुए विधायक, वाम दल और कांग्रेस भी मैदान में होंगे. बीजेपी को लगता है कि अगर वोट कई पार्टियों में बंटता है तो उसे फायदा मिल सकता है. इसी वजह से पार्टी अकेले चुनाव लड़कर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। 

नंदीग्राम में फिर अग्निपरीक्षा, टूट के बीच TMC को नहीं मिल रहा मजबूत उम्मीदवार; 6 अक्टूबर को उपचुनाव

कलकत्ता पश्चिम बंगाल का नंदीग्राम उपचुनाव रोचक होता जा रहा है। ममता बनर्जी की पार्टी के नेता पहले ही मैदान से दूरी बना रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण वरिष्ठ नेता अबु ताहिर का बयान है, जिसमें उन्होंने साफ कर दिया है कि वह चुनाव नहीं लड़ेंगे। साथ ही ममता बनर्जी को ही उतरने के लिए कहा है। खास बात है कि साल 2021 में टीएमसी सुप्रीमो को नंदीग्राम से हार का सामना करना पड़ा था। जबकि, 2026 में भी पार्टी यहां से हारी। दोनों ही चुनावों में अब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को जीत मिली थी। नंदीग्राम सीट पर उपचुनाव के लिए 6 अक्तूबर को वोटिंग होने जा रही है और 9 अक्तूबर को नतीजों का ऐलान हो जाएगा। इधर, ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले टीएमसी के दूसरे गुट ने भी ममता बनर्जी और सांसद अभिषेक बनर्जी को उपचुनाव लड़ने की चुनौती दे दी है। हालांकि, अब तक तय नहीं है कि टीएमसी किसे उम्मीदवार बनाने जा रही है। चुनाव लड़ने से साफ इनकार ताहिर ने कहा, 'ममता बनर्जी को नंदीग्राम उपचुनाव में आकर चुनाव लड़ना चाहिए। जब तृणमूल सत्ता में थी, तब वह चुनाव लड़ने के लिए आई थीं। अब मैं चुनाव क्यों लड़ूं?' पीटीआई भाषा के मुताबिक, उन्होंने कहा, 'टीएमसी के सत्ता में रहने के 15 वर्षों के दौरान मुझे क्या मिला? इन 15 वर्षों में मुझे कभी भी टीएमसी का उम्मीदवार नहीं माना गया। मुझे अयोग्य समझा गया। फिर अब मुझे बलि का बकरा बनाने के लिए क्यों चुना जाना चाहिए?' उन्होंने साफ कर दिया है कि अगर चुनाव लड़ने के बारे में राय ली जाती है, तो 'मैं इनकार कर दूंगा।' क्या ममता बनर्जी लड़ेंगी चुनाव एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कई नेताओं का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी के बंगाल में बढ़ते प्रभाव और टीएमसी में टूट देखते हुए ममता बनर्जी को मैदान में उतरना चाहिए। हालांकि, इसे लेकर उन्होंने आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा है। चैनल से बातचीत में नेताओं का कहना है कि विधायक बनकर ममता लोगों के मुद्दे उठा सकती हैं और नेता प्रतिपक्ष बन सकती हैं। अटकलें ये भी हैं कि टीएमसी वरिष्ठ नेता अखिली गिरी पर दांव खेल सकती है। फिलहाल, आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया। मंगलवार को मजिस्ट्रेट ने एक बैठक भी बुलाई थी, जिसमें लगभग सभी दल मौजूद थे। जबकि, टीएमसी गायब रही और इस कदम को उम्मीदवार नहीं मिलने से जोड़कर देखा जाने लगा था। बागी गुट भी चुनौती दे रहा बागी गुट के प्रवक्ता रिजू दत्ता ने उनके बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा ,'अबू ताहेर सही हैं। उन्हें अब चुनाव क्यों लड़ना चाहिए। यदि ममता बनर्जी चुनाव लड़ने की इच्छुक नहीं हैं तो उनके भतीजे और सभी कुछ जानने वाले राजनीतिज्ञ अभिषेक को ही चुनाव लड़ जाना चाहिए।' TMC को दो बार लगी चोट साल 2021 में 1956 वोट से हारी टीएमसी और तब ममता बनर्जी ही पार्टी की उम्मीदवार थीं। इसके बाद टीएमसी को दूसरा झटका 2026 में लगा जब पार्टी के नेता पवित्र कर भी 9 हजार से ज्यादा वोटों से हार गए। खास बात है कि दोनों ही मौकों पर विजेता शुभेंदु अधिकारी रहे थे। हालांकि, उन्होंने 2026 में दो सीटों पर जीत के बाद भवानीपुर को बरकरार रखा।

मायावती की शर्त के बाद अशोक सिद्धार्थ का बड़ा ऐलान, राजनीति से लिया संन्यास; आकाश आनंद पर क्या बोले?

लखनऊ  बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से बाहर कर दिया है. इससे पहले मायावती ने 3 सितंबर 2026 को आकाश को राष्ट्रीय संयोजक के पद से हटाया था. अब उन्होंने आकाश को बसपा की प्राथमिक सदस्यता और पार्टी से भी पूरी तरह मुक्त कर दिया है।  दरअसल आकाश आनंद के ससुर और पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ ने राजनीति से संन्यास का ऐलान किया है. इसे लेकर मायावती ने कहा कि उन्होंने अगर समय पर फैसला ले लेते तो आकाश के साथ ऐसा नहीं होगा।  मायावती ने कहा कि अशोक सिद्धार्थ ने राजनीति छोड़ने का फैसला सही समय पर नहीं लिया. अगर वो ये कदम पहले उठा लेते, तो बसपा, बहुजन मूवमेंट और खुद आकाश आनंद को लगातार मुश्किल और विपरीत परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता।  मायावती ने पिछले हफ्ते आकाश आनंद को राजनीति के लिए अपरिपक्व बताते हुए पार्टी के कोर्डिनेटर समेत सभी पदों से हटा दिया था। इसके बाद बुधवार को आकाश को दोबारा पद देने के लिए उनके ससुर अशोक के सामने एक शर्त रख दी थी। मायावती ने कहा था कि आकाश आनन्द के भविष्य के लिए अशोक सिद्धार्थ के पास अभी भी मौका है। वे अपनी महत्वकांक्षा त्याग कर राजनीति से पूरी तरह से संन्यास ले लें तो आकाश आनन्द को उनकी ज़िम्मेदारियां वापस देने पर विचार हो सकता है। 'जो व्यक्ति 'डबल माइंड' होकर काम…' मायावती ने आकाश आनंद के रुख पर अपनी नाराजगी जाहिर की. उन्होंने मुद्दा उठाया कि आकाश आनंद पहले हमेशा उनके एक्स पोस्ट को रिपोस्ट किया करते थे, लेकिन अशोक सिद्धार्थ से जुड़ी मायावती की पोस्ट को उन्होंने रिपोस्ट नहीं किया. मायावती के मुताबिक, ये इस बात का साफ संकेत है कि आकाश आनंद पार्टी से ज्यादा पारिवारिक रिश्तों को तरजीह दे रहे हैं. उन्होंने सवाल किया कि जो व्यक्ति 'डबल माइंड' होकर काम करेगा, वो बसपा का भला कैसे कर सकता है? मायावती ने अपने पोस्ट में आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ की मंशा पर भी सवाल खड़े किए. उन्होंने कहा कि अगर सिद्धार्थ को सच में आकाश आनंद के भविष्य और बहुजन मूवमेंट की चिंता होती, तो वो बहुत पहले ही राजनीति से किनारा कर लेते. लेकिन उनकी नीयत और निजी महत्वाकांक्षाओं को लेकर अब भी सवाल बने हुए हैं।  2027 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का आह्वान पार्टी में इस बड़े बदलाव के बाद मायावती ने कार्यकर्ताओं को नया लक्ष्य सौंपा. उन्होंने बसपा कार्यकर्ताओं से अपील की कि वो विरोधियों के सभी राजनीतिक हथकंडों का मजबूती से मुकाबला करें. उन्होंने उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों में 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' के सिद्धांत पर चलते हुए पूरी ताकत से जुटने और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की बात की।  मायावती को लिखा भावुक पत्र मायावती की शर्त के 24 घंटे के अंदर ही अशोक सिद्धार्थ ने भावुक पत्र लिखते हुए सक्रिय राजनीति के साथ ही सामाजिक जीवन से पूरी तरह संन्यास की घोषणा कर दी। उन्होंने मायावती और बसपा के प्रति अपनी अटूट निष्ठा भी जाहिर की है। अशोक सिद्धार्थ ने पत्र में स्पष्ट किया कि उनके लिए बहनजी का आदेश दुनिया की किसी भी चीज से बढ़कर है और उनके मार्गदर्शन के आगे पारिवारिक रिश्ते-नाते बेहद छोटे हैं। विरोधियों पर निशाना, आरोपों को बेबुनियाद भी बताया अशोक सिद्धार्थ ने पार्टी पर कब्जे के विरोधियों के आरोपों को बेबुनियाद बताया। उन्होंने कहा कि पार्टी के कुछ साथी अफवाह फैला रहे हैं कि वे पार्टी पर कब्जा और आकाश आनंद को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। सफाई देते हुए कहा कि आकाश को सलाह देना तो दूर, बीते कई महीनों में उनसे मुलाकात केवल पार्टी कार्यक्रमों के सिलसिले में हुई है। कहा कि आकाश मेरे दामाद से पहले बहनजी के भतीजे हैं। उनके अंदर बहुजन मिशन का खून बहता है। मेरे जैसा मामूली कार्यकर्ता भला उन्हें क्या गुमराह करेगा? 35 सालों का सफर और मायावती के प्रति आभार अशोक सिद्धार्थ ने बसपा में 35 वर्षों के योगदान का जिक्र करते हुए लिखा कि मान्यवर कांशीराम और डॉ. भीमराव अंबेडकर के मिशन में मायावती की वजह से ही उन्हें एक आम कार्यकर्ता से संसद और विधानमंडल तक पहुंचने का मौका मिला। मिशन के लिए अगर जान भी देनी पड़े तो यह उनके लिए गर्व की बात होगी। अंत में यह भी लिखा कि आकाश आनंद को जिम्मेदारी देना या न देना पूरी तरह से बसपा सुप्रीमो का अधिकार है। उनके संन्यास को आकाश आनंद की पद पर वापसी से जोड़कर न देखा जाए। अगर बहनजी को लगता है कि उनके राजनीति में रहने से संतों, गुरुओं और महापुरुषों के बहुजन मिशन को नुकसान पहुंच रहा है तो वे तत्काल प्रभाव से राजनीतिक और सामाजिक जीवन से संन्यास ले रहे हैं।

बीजेपी का बड़ा संगठनात्मक फेरबदल, 7 मोर्चों के प्रभारी नियुक्त; हरीश द्विवेदी और सतीश पूनिया को अहम जिम्मेदारी

नई दिल्ली  भारतीय जनता पार्टी ने संगठन के स्तर पर नए सात अलग-अलग मोर्चों के प्रभारियों को नियुक्त किया है. इसमें बस्ती सांसद हरीश द्विवेदी को युवा मोर्चा को प्रभारी बनाया गया है. इसके अलावा राजस्थान के वरिष्ठ नेता सतीश पूनिया को एसटी मोर्चा को प्रभारी बनाया गया है. आंध्र प्रदेश में भाजपा की प्रदेश अध्‍यक्ष रहीं दग्गुबती पुरंदेश्वरी (डी. पुरंदेश्वरी) को महिला मोर्चा का प्रभारी बनाया गया है।  बीजेपी के प्रभारियों का ऐलान     युवा मोर्चा- हरीश द्विवेदी     महिला मोर्चा- डी. पुरंदेश्वरी     एससी मोर्चा- संजय भाटिया     ओबीसी मोर्चा – वैजयंत पांडा     किसान मोर्चा – लाल सिंह आर्या      एसटी मोर्चा – सतीश पूनिया     अल्पसंख्यक मोर्चा- गजेंद्र पटेल एससी मोर्चा के प्रभारी बनाए गए संजय भाटिया हरियाणा से भाजपा के एक प्रमुख नेता हैं. वह वर्तमान में राज्यसभा के सदस्य हैं. भाजपा संगठन में राष्ट्रीय महामंत्री की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।  ओबीसी मोर्चा की प्रभारी बनाई गईं बैजयंत पांडा ओड़िशा में भाजपा की बड़ी नेता है. वह वर्तमान में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं. ओडिशा की केंद्रपाड़ा सीट से लोकसभा जीतने वाली बैजयंत पांडा की ओडिशा विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत में बड़ी भूमिका रही है।  किसान मोर्चा के प्रभारी बनाए गए लाल सिंह आर्य मध्य प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रह चुके हैं. एमपी में उनकी गिनती भाजपा के एक बेहद वरिष्ठ, अनुभवी और प्रमुख दलित नेता के रूप में रही है. वह वर्तमान में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय प्रभारी भी रहे हैं।  सतीश पूनिया राजस्थान भाजपा के कद्दावर नेता हैं. वो राजस्थान में भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. हरियाणा विधानसभा चुनाव में बतौर प्रभारी उन्होंने भाजपा की जीत की हैट्रिक पूरी करवाई थी. पूनिया अभी राज्यसभा सांसद हैं. अब उन्हें एसटी मोर्चा का प्रभारी बनाया गया है। 

आकाश आनंद की फिर होगी BSP में वापसी? मायावती ने शक्तियां बहाल करने को लेकर रखी शर्त

लखनऊ बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर पार्टी अनुशासन और मिशन को सर्वोपरि रखते हुए एक्स पर एक बयान जारी किया है. उन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थ के चलते पार्टी हितों को नुकसान पहुंचाने के आरोपी पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ पर निशाना साधा, जिसके कारण उनके दामाद आकाश आनंद को भी झटका लगा है और अब केवल ससुर के संन्यास लेने पर ही आकाश की पार्टी में सक्रिय भूमिका बहाल होना संभव बताया गया है।  अशोक सिद्धार्थ पर गंभीर आरोप मायावती ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से सिलसिलेवार पोस्ट साझा करते हुए कहा कि अशोक सिद्धार्थ ने पार्टी के मिशन से अधिक अपने निजी और पारिवारिक स्वार्थ को महत्व दिया है. पार्टी द्वारा कई बार मौके दिए जाने के बावजूद उन्होंने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं छोड़ी, जिसका खामियाजा उनके दामाद आकाश आनंद को भी भुगतना पड़ रहा है. पार्टी ने अपने आंतरिक अनुशासन और मूवमेंट के हितों को ध्यान में रखते हुए यह कड़ा रुख अपनाया है।  आकाश आनंद की वापसी की शर्त पार्टी प्रमुख ने साफ कर दिया है कि यदि अशोक सिद्धार्थ अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर राजनीति से पूरी तरह संन्यास का ऐलान कर देते हैं, तभी आकाश आनंद के लिए पार्टी में स्वतंत्र रूप से काम करने का रास्ता खुलेगा. इसके बाद ही बसपा नेतृत्व आकाश को उनकी पुरानी जिम्मेदारियां वापस देने पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर सकता है, क्योंकि पार्टी में इस बात को लेकर आम राय बनी हुई है।  बदलता राजनीतिक घटनाक्रम इससे पहले आकाश आनंद के सोशल मीडिया प्रोफाइल बायो में लगातार बदलाव देखने को मिले थे, जिसमें उन्होंने खुद को पहले कार्यकर्ता और बाद में समर्थक लिख लिया था. पार्टी पदाधिकारियों को भी आकाश आनंद और अशोक सिद्धार्थ को सोशल मीडिया पर अनफॉलो करने के निर्देश दिए गए थे. दूसरी ओर, मायावती के छोटे भतीजे ईशान आनंद को सक्रिय राजनीति में आगे लाए जाने और मुख्य सेक्टर प्रभारी बनाए जाने की चर्चाएं भी तेजी से चल रही हैं। 

मध्य प्रदेश में कांग्रेस का मिशन 2028! 70 कमजोर सीटों की पहचान, भाजपा की 35 सीटों पर खास नजर

 भोपाल  मध्य प्रदेश में वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव के लिए अब लगभग दो वर्ष ही बचे हैं। ऐसे में पिछले चुनाव में करारी हार झेल चुकी कांग्रेस ने उन सीटों पर अभी से जोर लगाना शुरू कर दिया है, जिन पर वह कभी नहीं जीती या एक-दो बार ही जीती है। ऐसी 70 सीटों की पहचान की गई है। पार्टी सबसे पहले इन विधानसभा क्षेत्रों में घर-घर मतदाता सूची का सत्यापन करेगी। इंदौर में 19 सितंबर को प्रस्तावित राहुल गांधी के दौरे के बाद पार्टी इन सीटों पर फोकस करेगी। मतदाताओं के नाम, फोन नंबर सहित उनकी जानकारी संकलित की जाएगी, जिससे उनसे संपर्क किया जा सके। बता दें कि वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कुल 230 सीटों में से 66 ही कांग्रेस को मिली थीं। कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती हैं ये विधानसभा सीटें भोपाल की गोविंदपुरा विधानसभा सीट पर 1980 से भाजपा का कब्जा है। यहां पहले बाबूलाल गौर और पिछले दो बार से उनकी बहू कृष्णा गौर विधायक हैं। सागर की रहली विधानसभा सीट से भाजपा के गोपाल भार्गव 1985 से लगातार जीत रहे हैं। इंदौर-2 विधानसभा सीट 1993 से भाजपा के पास है। घर-घर जाकर मतदाता सूची का सत्यापन करेंगे पार्टी कार्यकर्ता महामंत्री एवं संगठन प्रभारी, प्रदेश कांग्रेस, डॉ. संजय कामले ने कहा कि पार्टी ने ऐसी 70 विधानसभा सीटें चिह्नित की हैं, जिनमें प्रदर्शन कमजोर रहा है। पार्टी इन सीटों पर कभी नहीं जीती या अभी तक में एक-दो बार ही जीती हैं। इन सीटों पर सबसे पहले मतदाता सूची के सत्यापन के लिए अभियान चलाया जाएगा जो लगभग छह माह चलेगा। भाजपा के लिए 35 सीटों पर चुनौती भाजपा ने भी जनसंघ के समय से नहीं जीती या बहुत कम बार जीती 35 सीटों की पहचान की है। इन सीटों की जिम्मेदारी बड़े नेताओं को दी जाएगी। चार-चार गांवों का क्लस्टर गठित कर एक प्रभारी बनाया जाएगा जो कमजोरियों की पहचान कर दूर करने का प्रयास करेगा। दरअसल, भाजपा ने वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव में खुद को मजबूत बनाने के लिए माइक्रो-प्लानिंग रणनीति बनाई है। पार्टी का लक्ष्य प्रत्येक बूथ पर 51 प्रतिशत वोट शेयर हासिल करना है। इसके लिए "पन्ना प्रमुखों" को सक्रिय कर घर-घर संपर्क अभियान चलाया जा रहा है। अल्पसंख्यक और जातिगत समीकरण को देखते हुए इन सीटों पर प्रभावी जाति समूहों एससी-एसटी व अन्य को साधने के लिए नजदीकी विधायकों को सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे पहुंचाने का निर्देश दिया गया है। मंत्रियों की तैनाती भी इन "कठिन" सीटों पर की गई है। संगठन के दिग्गज मंत्रियों और कोर ग्रुप के सदस्यों को प्रभारी बनाया गया है ताकि वे जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का भरोसा जीत सकें। सीटें जो भाजपा के लिए हैं चुनौती गुना जिले की राघौगढ़ विधानसभा सीट पर 1977 से कांग्रेस का कब्जा है। सीधी जिले की चुरहट विधानसभा सीट से भाजपा सिर्फ दो बार जीत पाई है। भोपाल की उत्तर विधानसभा सीट वर्ष 1998 से कांग्रेस के पास है। कसरावद भीकनगांव में 2013 से लगातार कांग्रेस जीती है। बड़वानी के राजपुर से बाला बच्चन भी लगातार तीन बार से जीते हैं।  

राहुल गांधी खुद चुनेंगे कांग्रेस की फ्यूचर टीम, 120 युवा नेता शॉर्टलिस्ट; संगठन में बड़े बदलाव के संकेत

नई दिल्ली लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस संगठन को नए सिरे से गढ़ने और युवाओं को फ्रंटफुट पर लाने की कवायद शुरू कर दी है. कांग्रेस को बुजुर्ग और 'ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स' करने वाले नेताओं के चंगुल से निकालकर अब एक युवा, आक्रामक और जमीन पर लड़ने वाले संगठन में तब्दील करने की योजना पर काम शुरू हो चुका है।  कांग्रेस में राष्ट्रीय संगठन के पदों पर नियुक्ति के लिए अब राजनीतिक वरिष्ठता के बजाय काम के रिकॉर्ड और जमीनी सक्रियता को मुख्य कसौटी माना जा रहा है. संगठन को अधिक समावेशी और गतिशील बनाने के लिए पार्टी नेतृत्व ने नए राष्ट्रीय सचिवों को शामिल करने हेतु इंटरव्यू की प्रक्रिया शुरू की है।  राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल के साथ कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव पद के लिए नेताओं के इंटरव्यू ले रहे हैं. देश के अलग-अलग राज्यों से चुनिंदा नेताओं को दिल्ली बुलाया गया है, ताकि संगठन में एक नई, पेशेवर और वैचारिक रूप से मजबूत युवा लीडरशिप तैयार की जा सके।  राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ले रहे इंटरव्यू राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने सोमवार को कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव पद के लिए 30 नेताओं का इंटरव्यू लिया. रायबरेली के दो दिवसीय दौरे से राहुल गांधी के लौटने के बाद फिर से इंटरव्यू की प्रक्रिया शुरू होगी. यह कदम केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि पार्टी में नई ऊर्जा और मजबूत युवा लीडरशिप खड़ी करने का एक सुनियोजित प्रयास है।  कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव के लिए 10-10 के समूह में नेताओं का इंटरव्यू लिया जा रहा है. राहुल गांधी नेताओं से उनके पुराने कामकाज से लेकर प्रोफाइल तक के बारे में सवाल पूछ रहे हैं. जिन नेताओं का इंटरव्यू लिया जा रहा है, उनके कामकाज का पूरा रिपोर्ट कार्ड पहले से ही राहुल गांधी के पास मौजूद है।  राहुल गांधी बना रहे अपनी नई टीम कांग्रेस ने अलग-अलग राज्यों में राष्ट्रीय सचिवों की नियुक्ति की कवायद शुरू कर दी है, जिसके लिए राहुल गांधी पार्टी में अपनी नई टीम तैयार कर रहे हैं. इसीलिए फाइनल इंटरव्यू राहुल गांधी खुद ले रहे हैं. राष्ट्रीय सचिव पद के लिए शॉर्टलिस्ट किए गए नेताओं के कामकाज की रिपोर्ट के साथ राहुल गांधी उनसे मिल रहे हैं।  राहुल गांधी का मुख्य ध्यान इस बात पर है कि निर्णय केवल सिफारिशों या सिफारिशी पत्रों के आधार पर न हों, बल्कि जमीनी हकीकत, काम करने की क्षमता और दूरदृष्टि के बल पर युवाओं को जगह मिले. कांग्रेस अपने मौजूदा 60 प्रतिशत से ज़्यादा सचिवों को बदलने की तैयारी में है और संगठन में नए चेहरों को मौका देने की योजना बना रही है।  कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव पद के लिए 120 नेताओं का इंटरव्यू लिया जाएगा, जिसके बाद पार्टी उनकी नियुक्ति करेगी. इस पद के लिए उन नेताओं को प्राथमिकता दी जा रही है, जिन्होंने पहले कांग्रेस के 'संगठन सृजन' कार्यक्रम के तहत ऑब्जर्वर के तौर पर काम किया है।  नई लीडरशिप खड़ी करने का प्लान राहुल गांधी ने जब 2004 में राजनीति में कदम रखा था, तब से कांग्रेस पार्टी का कायाकल्प और 'जनरेशन चेंज' उनका सबसे बड़ा और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट रहा है. उन्होंने कांग्रेस के भीतर युवाओं को आगे लाने और पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे में बड़े बदलाव करने के लिए कई प्रयास किए हैं. कांग्रेस ने यूथ कांग्रेस और NSUI में भी नियुक्तियां करने के लिए इंटरव्यू-आधारित प्रक्रिया अपनाई थी. इसके जरिए प्रतिभा-आधारित चयन प्रक्रिया को बढ़ावा दिया गया, ताकि बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले युवा भी नेतृत्व में आ सकें।  राहुल गांधी का यह सियासी प्रयोग पहले पुराने दिग्गजों (ओल्ड गार्ड) के कड़े विरोध और अंदरूनी खींचतान के चलते परवान नहीं चढ़ सका था. हालांकि, पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस के भीतर जो कदम उठाए जा रहे हैं और बदलाव दिख रहे हैं, उनसे स्थिति बदल रही है. कांग्रेस ने वरिष्ठ नेताओं की जगह नए चेहरों की ताजपोशी कर सियासी संदेश दिया है. संगठन में बदलाव शुरू हो चुके हैं और अब नए चेहरे नजर आने लगे हैं।  प्रदेश संगठन से लेकर जिला संगठन तक में युवा चेहरों की नियुक्तियां हो रही हैं. इससे साफ जाहिर होता है कि राहुल गांधी का दो दशक पुराना सपना अब हकीकत में बदलने लगा है. इसी कड़ी में राष्ट्रीय सचिवों की नियुक्ति का खाका खींचा जा रहा है. इसके जरिए उन कार्यकर्ताओं और युवा नेताओं को तरजीह दी जा रही है जो लंबे समय से जमीन पर काम कर रहे हैं, ताकि मेहनत करने वाले युवाओं का भरोसा राजनीति में बना रहे।  कांग्रेस का प्लान देश के हर कोने और समाज के हर वर्ग से आने वाले युवाओं को मौका देकर एक समावेशी टीम बनाने का है. राहुल गांधी का यह प्रयोग इस बात का प्रतीक है कि भविष्य की राजनीति को वही दिशा दे सकते हैं जिनके पास नया दृष्टिकोण, ऊर्जा और जनसेवा का जज्बा हो. राष्ट्रीय सचिवों के इस चयन अभियान से न केवल संगठन में नई जान फूंकने की कोशिश की जा रही है, बल्कि यह देश के हर उस युवा के लिए भी एक उम्मीद का संदेश है जो राजनीति को बदलाव का जरिया मानता है।