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हार के खिलाफ एक्शन में ममता बनर्जी, भवानीपुर परिणाम को लेकर हाईकोर्ट में दायर की याचिका

 कोलकाता ममता बनर्जी ने भवानीपुर की हार को कोलकाता हाईकोर्ट में चुनौती दी है. पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज दोपहर अचानक कोलकाता हाई कोर्ट पहुंच गईं और भवानीपुर विधानसभा रिजल्ट के नतीजे को चुनौती दी है. ममता बनर्जी के साथ सांसद डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेना और कल्याण बनर्जी मौजूद थे. रिपोर्ट के अनुसार ममता याचिका के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने कोर्ट पहुंचीं थीं।  भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के बीच सीधी टक्कर थी. इस सीट से पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने जीत हासिल की है. जबकि ममता को हार का मुंह देखना पड़ा था. कांटे की टक्कर में इस सीट पर शुभेंदु अधिकारी ने इस सीट पर ममता बनर्जी को 15104 वोटों से मात दी थी. इस सीट पर शुभेंदु अधिकारी को 73917 और ममता बनर्जी को 58812 वोट मिले थे. तीसरे स्थान पर रहे सीपीएम के श्रीजीब विश्वास को 3556 वोट मिले थे।  ममता बनर्जी मतगणना के दिन 16-17 राउंड तक आगे ही थीं. लेकिन दोनों उम्मीदवारों के बीच गैप धीरे धीरे कम होता गया. आखिर मतगणना के आखिरी चरणों में शुभेंदु अधिकारी ने तगड़ी लीड ली और आखिरकार 15104 वोट से चुनाव जीत गए। इस सीट पर मतगणना के दौरान काफी हंगामा भी हुआ था। उन्होंने भवानीपुर विधानसभा रिजल्ट के नतीजे को चुनौती दी. ममता बनर्जी के साथ सांसद डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेना और कल्याण बनर्जी भी उपस्थित थे। आपको बता दें कि भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के बीच सीधी टक्कर देखी गई थी. इस सीट से पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी ने जीत हासिल की. वहीं ममता को हार का मुंह देखने को मिला. कांटे की टक्कर में इस सीट पर शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को 15104 वोटों से हराया था।  

PCC दफ्तर का VIDEO बना चर्चा का विषय, दिग्विजय सिंह ने बदली सीट; पटवारी बोले- वे हमारे मार्गदर्शक हैं

भोपाल  मध्यप्रदेश कांग्रेस में घमासान मचा हुआ है। जिसका एक और वीडियो सामने आया है। जोकी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। दरअसल, मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने के बाद प्रदेश कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई थी। इसी दौरान खुले मंच पर दिग्गज नेताओं के बीच तनातनी देखने को मिली। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि जीतू पटवारी के सामने दिग्विजय सिंह अपनी कुर्सी छोड़कर हटे है। दरअसल, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू होने से पहले मंच पर सभी नेताओं को सीट पर बैठने हेतु ठीक करते नजर आए। इस दौरान पटवारी ने हाथ का इशारा करते हुए कहा कि “ऐसा कर लो तो हरीश चौधरी भी आ जाएंगे।” जीतू पटवारी की यह बात सुनते ही वहां बैठे पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह तुरंत अपनी कुर्सी से उठ खड़े होते हैं और साइड में जाने लगते हैं। दिग्विजय सिंह को नाराज होता देख जीतू पटवारी उन्हें रोकने की कोशिश करते हैं और कहते हैं, “आप इधर ही रुक जाओ सर…”। लेकिन, दिग्विजय सिंह उनकी बात अनसुनी कर देते हैं और मुख्य जगह छोड़कर साइड में रखी एक अन्य कुर्सी पर जाकर बैठ जाते हैं। जबकि सह-प्रभारी हरीश चौधरी उनकी छोड़ी कुर्सी पर बैठ गए। ऐसे में पार्टी के भीतर नेताओं में तनातनी की स्थिती बनी हुई है। वीडियो सामने आने के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर हमला बोला. पार्टी के नेता ने कहा- कांग्रेस में वर्चस्व और कुर्सी की लड़ाई चल रही है, सभी नेता एक दूसरे को निपटने में लगे हैं. आइए, विस्तार से जानते हैं वीडियो में कुर्सी को लेकर क्या खींचतान हुई, जीतू पटवारी ने क्या कहा, भाजपा ने किस तरह निशाना साधा. कांग्रेस ने किस तरह बचाव किया?    दरअसल, कांग्रेस की राज्यसभा प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के बाद कांग्रेस की ओर से भोपाल प्रदेश कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई थी. कॉन्फ्रेंस शुरू होने से पहले नेता बैठ रहे थे. इस दौरान मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी सिटिंग अरेंजमेंट संभालते हुए नजर आ रहे हैं।  'कुर्सी पर बैठ चुके पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को हाथ से इशारा करते हुए पटवारी कहते हैं, "ऐसा कर लो तो हरीश चौधरी भी आ जाएंगे." जीतू पटवारी की यह बात सुनते ही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह तुरंत अपनी कुर्सी छोड़कर साइड की तरफ जाने लगते हैं. पटवारी उन्हें बीच में टोकते हुए कहते हैं, "आप इधर ही रुक जाओ सर", लेकिन दिग्विजय सिंह उनकी बात अनसुनी कर बगल की कुर्सी पर जाकर बैठ जाते हैं. इसके बाद उनकी खाली हुई जगह पर हरीश चौधरी बैठते हैं' . भाजपा- कांग्रेस में वर्चस्व और कुर्सी की लड़ाई  इस पूरे घटनाक्रम को लेकर भाजपा ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोला. प्रदेश प्रवक्ता अजय सिंह यादव ने कहा कि राज्यसभा चुनाव के बाद कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस देखकर ऐसा लग रहा है जैसे मुद्दा चुनाव हार का न होकर एक दूसरे की कुर्सी छीनने का है. जिस तरह से वरिष्ठ नेताओं का अपमान किया जा रहा है, उन्हें अपमानित करके ना बोलने दिया जा रहा है और ना कुर्सी पर बैठने दिया जा रहा है. यह कांग्रेस की रीति नीति जनता के सामने है. इसी तरह के बर्ताव की वजह से जनता कांग्रेस को गंभीरता से नहीं लेती है. कांग्रेस में वर्चस्व और कुर्सी की लड़ाई चल रही है, सभी नेता एक दूसरे को निपटने में लगे हैं।  पीसी शर्मा- दिग्विजय सिंह को कोई साइडलाइन करे यह संभव इस सियासी ड्रामे के वायरल होने के बाद पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने पार्टी का बचाव किया. उन्होंने कहा कि आज के समय में दिग्विजय सिंह को कोई साइडलाइन करे यह संभव नहीं है. कमलनाथ और दिग्विजय की आवश्यकता है. दिग्विजय सिंह जो कहते हैं, सोच समझकर कहते हैं. सभी सीनियर लीडर हैं, बैठकर चर्चा करेंगे आगे क्या करना है. हाईकमान फैसला करेगा। 

उद्धव खेमे में बढ़ी बेचैनी, शिंदे गुट के मंत्री के कार्यक्रम में पहुंचे संजय देशमुख

 मुंबई महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर बड़ा खेला होने जा रहा है. टीएमसी में बगावत के बाद अब उद्ध ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) में टूट का खतरा मंडराने लगा है. शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 5 लोकसभा सांसदों ने उद्धव ठाकरे के आवास 'मातोश्री' पर बुलाई गई अहम बैठक में हिस्सा नहीं लिया, जिसके चलते 'ऑपरेशन टाइगर' के कयास लगाए जाने लगे हैं।  शिवसेना (यूबीटी) के पास मौजूदा समय में कुल 9 लोकसभा सांसद हैं, जिनमें से रविवार को हुई बैठक में सिर्फ 4 सांसद ही पहुंचे थे बाकी 5 सांसदों ने हिस्सा नहीं लिया. इसे  उद्धव ठाकरे के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।  शिवसेना (यूबीटी) की टूट के लगाए जा रहे कयास पर उद्धव ठाकरने अपनी चुप्पी तोड़ दी है. उद्धव ठाकरे ने अब साफ-साफ कह दिया है कि अगर वे जाना चाहते हैं, तो खुशी-खुशी जाएं।  आज नहीं,  कल मेरा वक्त आएगा-उद्धव महाराष्ट्र में ऑपरेशन टाइगर की आशंका के बीच उद्धव ठाकरे ने एक तरह से चेतावनी के लहजे में अपने सांसदों से कहा है कि आज मेरा वक्त नहीं है, लेकिन कल जरूर आएगा. तब तक हमें सहना पड़ेगा और संघर्ष करना पड़ेगा. रविवार को मातोश्री में उद्धव ठाकरे ने अपना लोकसभा सांसदों की बैठक बुलाई थी, जिसमें पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से 4 ही सांसद पहुंचे थे और पांच नहीं शामिल हुए थे।  उद्धव ने कहा था कि जिन लोगों ने बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना छोड़ी है, उन्हें एक दिन पछतावा जरूर होगा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी. चार साल पहले पार्टी में बड़ी फूट पड़ी थी, जब 40 विधायक अलग हो गए थे. उस समय मैं राज्य का मुख्यमंत्री था. क्या लोगों को सच में लगता था कि मुझे उस बात का पता नहीं था, जो बाकी सभी लोग साफ-साफ देख और समझ सकते थे? कोई जाना चाहता है, तो वह जा सकता है-उद्धव उद्धव ठाकरे ने कहा कि शिवसेना में चार साल पहते हुई बगावत की मुझे भनक लग गई थी कि क्या हो रहा है, लेकिन मैंने किसी से कुछ भी नहीं कहा, न ही उन पर कोई दबाव नहीं डाला और न ही उनके घोटालों की जांच के लिए कोई फाइल खुलवाई. अगर कोई पहले से ही जाना चाहता है, तो उसे जबरदस्ती रोकने का क्या मतलब है? ऑपरेशन टाइगर की चल रही चर्चा के बीच उद्धव ठाकरे ने बहुत अहम बयान दिया है. उन्होंने कहा कि अगर कोई जाना चाहता है, तो वह जा सकता है. मैं बस उनके अच्छे राजनीतिक भविष्य की कामना करूंगा. इस तरह से उद्धव ठाकरे ने मान लिया है कि जिन्हें जाना है, वो पार्टी को छोड़कर जा सकता है।  उद्धव की बैठक में जो पांच सांसद नहीं पहुंचे उद्धव ठाकरे के द्वारा मातोश्री पर बुलाई गई बैठक में शिवसेना (यूबीटी) के जो पांच सांसद नहीं पहुंचे थे, उसमें संजय जाधव, संजय देशमुख, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और नागेश पाटिल अष्टिकर हैं. इन पांच सांसदों के कारण पार्टी में फिर से फूट पड़ने की चर्चा शुरू हो गई।  हालांकि, शिवसेना (यूबीटी) खेमे ने तुरंत दावा किया कि ये सांसद बैठक में वर्चुअली (ऑनलाइन) शामिल हुए थे, लेकिन सूत्रों का कहना है कि उद्ध ठाकरे सिर्फ नागेश पाटिल अष्टिकर से ही सीधे बात कर पाए. वहीं, बैठक में न शामिल होने वाले शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय देशमुख ने दिल्ली में एकनाथ शिंदे खेमे के मंत्री प्रताप राव जाधव से मुलाकात की है, जिसके बाद सियासी चर्चा तेज हो गई।  उद्धव के सांसद शिंदे के संपर्क में है-प्रताप जाधव उद्धव ठाकरे खेमे के नेता और केंद्रीय मंत्री प्रताप राव जाधव ने आजतक से बातचीत करते हुए कहा कि शिवसेना (यूबीटी) के सभी सांसद मेरे दोस्त हैं, हमने पहले साथ काम किया है. हमारी मुलाकात और बातचीत होती रहती है. एक बात साफ है कि शिवसेना (UBT) के कई सांसद पार्टी नेतृत्व (उद्धव ठाकरे) से वाकई नाखुश हैं।  प्रताप जाधव कहते हैं कि शिवसेना (यूबीटी) के सांसद उसी तरह से पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं, जैसे टीएमसी के सांसद थे. शिंदे के अगुवाई वाली ही शिवसेना असली शिवसेना हैं, जो बालासाहेब ठाकरे के सिद्धांतों पर काम कर रही है. शिवसेना (UBT) के सभी सांसदों का हमारी पार्टी में स्वागत है. UBT के कुछ सांसद एकनाथ शिंदे जी के संपर्क में हैं। 

TMC बागियों का बड़ा खेल, संख्या बल में JDU-TDP को भी पीछे छोड़कर बढ़ाई ममता की मुश्किलें

नई दिल्ली लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी को कम सीटें आईं तो कहा गया क‍ि बीजेपी अब नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी की बैसाखी के सहारे चलने को मजबूर होगी. लेकिन अब वक्‍त बदलता द‍िख रहा है. टीएमसी के बागी सांसदों ने ऐसा दांव चल द‍िया है, जिससे एनडीए में नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी छोटी हो गई है. इतना ही नहीं, संसद में भी अब बागी गुटों वाली पार्टी पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी होगी।  ममता बनर्जी का साथ छोड़कर आए 20 सांसदों ने नेशनल‍िस्‍ट स‍िटीजन पार्टी में व‍िलय का ऐलान क‍िया है. इसकी च‍िट्ठी भी लोकसभा स्‍पीकर ओम बिरला को सौंप दी है. लोकसभा स्पीकर के मान्‍यता देते ही बागी सांसदों की नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NSPI ) लोकसभा में पांचवीं बड़ी पार्टी बन जाएगी. लेकिन सबसे बड़ा बदलाव एनडीए के अंदर होगा. अभी तक एनडीए में बीजेपी के बाद टीडीपी दूसरी और जेडीयू तीसरी सबसे बड़ी पार्टी थी. क्‍योंक‍ि टीडीपी 16 और जेडीयू के पास 12 सांसद हैं, जबक‍ि बागी सांसदों की पार्टी NSPI के 20 सांसद होंगे।  बीजेपी, कांग्रेस, सपा, डीएमके के बाद पांचवी बड़ी पार्टी लोकसभा में बीजेपी के पास 240, कांग्रेस के पास 98, समाजवादी पार्टी के पास 37, DMK के पास 22 लोकसभा के सांसद है. अभी TMC 28 सांसदों के साथ लोकसभा में चौथी बड़ी पार्टी है, लेकिन 20 बागी सांसदों के अलग होने से TMC नीचे पायदान पर चली जाएगी और NSPI पांचवीं बड़ी पार्टी बन जाएगी. NCPI की स्थापना 20 जनवरी, 2023 में हुई थी और इसका मुख्यालय हावड़ा में है. त्रिपुरा विधानसभा का चुनाव 2023 में इस पार्टी ने लड़ा था, लेकिन अपेक्ष‍ित कामयाबी नहीं म‍िल पाई थी।  बीजेपी क्‍यों होगी खुश 20 सांसदों का साथ म‍िलने से बीजेपी खुश होगी. क्‍योंक‍ि इनकी बदौलत अब बीजेपी 260 से ऊपर पहुंच जाएगी. यानी बहुमत के करीब. इससे नीतीश कुमार और चंद्रबाबू की पार्टी की बारगेन‍िंग पावर कम हो जाएगी. हालांक‍ि, ये दोनों नेता पीएम मोदी के साथ मजबूत समर्थन जता चुके हैं और एनडीए इनकी बदौलत 300 के काफी आगे न‍िकल चुकी है. सदन में भी यह मौजूदगी बीजेपी के बहुत काम आने वाली है। 

एक-तिहाई से दो-तिहाई हुआ था दल-बदल का पैमाना, फिर भी ममता बनर्जी के सामने खड़ा हुआ बड़ा संकट

कलकत्ता राजनीति का सबसे कड़वा सच है कि सत्ता खिसकते ही सबसे पहले अपने ही साथ छोड़ते हैं और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी इस समय इसी कड़वे सच का सामना कर रही हैं. चुनावी हार के सदमे के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के दो कद्दावर चेहरे काकोली घोष और सुदीप बंदोपाध्याय ने 20 सांसदों के साथ मिलकर बगावत का बिगुल फूंक दिया है. इस बड़ी टूट ने ममता खेमे में हड़कंप मचा दिया है।  अब सवाल सिर्फ पार्टी टूटने का नहीं, बल्कि वजूद का है क्या ये बागी सांसद ममता से उनकी पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह भी छीन लेंगे? इस पूरे सियासी ड्रामे के बीच देश का 'दलबदल विरोधी कानून' (Anti-Defection Law) क्या ममता की नैया पार लगा पाएगा या बागियों का रास्ता साफ करेगा।  क्या है दलबदल विरोधी कानून ? हरियाणा में दलबदल का आया राम और गया राम वाला किस्सा जगजाहिर है. 1967 से 1983 के बीच यहां दल-बदल का खूब खेल चला. कांग्रेस से समाजवादी नेता जहां नाता तोड़ अलग हुए, वहीं कांग्रेस ने कई राज्यों में इसका जमकर फायदा उठाया और अपनी सरकार बनाई. ऐसे में देश में 'दल बदल निषेध कानून' लाने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जाता है।  इंदिरा गांधी की हत्या के बाद साल 1984 के ऐतिहासिक जनादेश के बाद जब कांग्रेस भारी बहुमत से सत्ता में आई, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने देश की राजनीति में 'आया राम, गया राम' यानी विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त की बीमारी को जड़ से खत्म करने का फैसला किया. इसी मकसद से साल 1985 में राजीव गांधी सरकार 'दलबदल विरोधी कानून' लेकर आई और इसे संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) से सफलतापूर्वक पारित कराया गया. इस ऐतिहासिक पहल को 52वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान की 10वीं अनुसूची के रूप में जोड़ा गया, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक स्थिरता और शुचिता लाई जा सके।  अटल सरकार ने दो-तिहाई सदस्यों की लिमिट की  कानून के तहत अगर कोई सांसद या विधायक अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ता है या सदन में अपनी पार्टी के 'व्हिप' का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है. इसके अनुसार एक तिहाई विधायक और सांसद अगर दलबदल करते हैं तो फिर उनकी सदस्यता बच सकती है।  दलबदल कानून में सबसे बड़ी कमजोरी या विसंगति यह थी कि व्यक्तिगत स्तर पर दल बदल पर तो रोक लगाई गई, लेकिन नेताओं को थोक में ऐसा करने को कानूनी मान्यता दे दी गई. इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए के शासनकाल 2003 में यह तय किया गया कि सिर्फ एक व्यक्ति ही नहीं, अगर सामूहिक रूप से भी दल बदला जाता है तो उसे भी असंवैधानिक करार दिया जाएगा।  संविधान में 91वां संशोधन कर सदस्यों की संख्या एक तिहाई से बढ़ाकर दो-तिहाई कर दी गई. इसी संशोधन में धारा 3 को पूरी तरह खत्म कर दिया गया, जिसके तहत एक तिहाई पार्टी सदस्यों को लेकर दल बदला जा सकता था. इसके जरिए दल बदल का कानून को रोकने और सख्त बनाने के लिए अटल सरकार ने दो-तिहाई सदस्यों की लिमिट लगाई थी, अब वो भी टूटता नजर आ रहा है।  ममता के केस में गणित  संविधान के मुताबिक अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई (2/3) सांसद या विधायक एक साथ अलग होते हैं, तो उन पर दल बदल कानून लागू नहीं होता. लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 10 सांसद टीएमसी के हैं. लोकसभा सांसदों की कुल संख्या 28 के लिहाज से बागी हुए 20 सांसद हैं, जो दो-तिहाई के आंकड़े को आसानी से छू लिया है. ऐसे में दलबदल कानून ममता बनर्जी के हाथ बांध देगा. इस तरह कानूनन टीएमसी के बागी सांसदों की सदस्यता बची रहेगी।  राजनीतिक गलियारों और हालिया कानूनी बहसों में एक दिलचस्प पेंच सामने आया है. पार्टी से बगावत करने और अलग गुट बनाने के बावजूद तकनीकी और कानूनी रूप से ये बागी सांसदों ने एनसीपीआई में विलय कर दिया है, लेकिन पार्टी के कब्जे और चुनाव निशान पर दावेदारी के लिए जुलाई में स्पीकर से गुहार लगाएंगे. इसके अलावा ममता बनर्जी की पार्टी के बंगाल में 80 से 60 से ज्यादा विधायक अलग गुट बना लिए हैं और अपना नेता भी सदन में चुन लिया है।  महाराष्ट्र के शिंदे और अजित पवार मामलों ने देश को दिखाया है कि दो-तिहाई लिमिट होने के बाद भी दलबदल कानून अब पार्टियों को टूटने से बचाने में 'रामबाण' नहीं रहा. दलबदल कानून के तहत फैसला लेने का अंतिम अधिकार सदन के अध्यक्ष के पास होता है. जब तक स्पीकर आखिरी फैसला नहीं लेते, बागी सांसद तकनीकी रूप से सुरक्षित रहते हैं और यह समय उन्हें अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका दे देता है।  दलबदल कानून केवल सांसदों की कुर्सी बचा सकता है, लेकिन पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह किसे मिलेगा इसका पर चुनाव आयोग ही फैसला करता है. काकोली घोष और सुदीप बंदोपाध्याय के गुट के पास दो तिहाई संसदों का समर्थन हासिल है. सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा है कि जब दो-तिहाई सांसदों के साथ अलग होते हैं तो पहले दिन मूल पार्टी पर अपना दावा नहीं कर सकते हैं. इसीलिए एनसीपीआई में विलय का रास्ता चुना. अब आगे की लड़ाई जुलाई में होगी, जब टीएमसी के बागी नेता पार्टी और चुनाव चिन्ह पर दावा जताएंगे? क्या ममता बनर्जी के हाथ से निकल जाएगी उनकी अपनी पार्टी? तकनीकी और संवैधानिक रूप से ऐसा होना बिल्कुल मुमकिन है, लेकिन यह डगर इतनी आसान नहीं होगी. पूरी रणनीति के तहत, बागी सांसद सबसे पहले स्पीकर के सामने अपने 'विधायी बहुमत' के दम पर खुद को 'असली टीएमसी' घोषित करने की मांग करेंगे. इसके बाद यह जंग चुनाव आयोग पहुंचेगी. यदि आयोग के सामने बागी गुट अपना संख्याबल साबित करने में सफल रहा, तो ममता बनर्जी को अपनी ही बनाई पार्टी का नाम और सिंबल गंवाना पड़ सकता है।  इतिहास पर नजर डालें तो हमेशा यही देखा गया है कि जब भी किसी पार्टी में दो गुट बनते हैं तो दोनों ही गुट खुद को 'असली पार्टी' बताते हैं ऐसे में फैसला चुनाव आयोग के हाथ में होता है. चुनाव आयोग देखता है कि पार्टी के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों (सांसदों और विधायकों) में से कितने लोग किस गुट के … Read more

अचानक चर्चा में आई NCPI! 20 बागी सांसदों की नई मंजिल, फाउंडर से लेकर बंगाल लिंक तक सब जानिए

कोलकाता   राजनीति की अच्छी समझ रखने वाले किसी व्यक्ति के लिए भी 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) का नाम सुनना लगभग नामुमकिन है। अब यह लोकसभा की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बनने जा रही है। एक चौंकाने वाली घटनाक्रम में, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को सूचित किया कि उनके समूह का विलय NCPI के साथ हो गया है। यह पश्चिम बंगाल के हावड़ा में रजिस्टर्ड है और जिसने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में कुछ सीटों पर चुनाव लड़ा था। बागी सांसदों ने कहा कि वे एनसीपीआई और BJP के नेतृत्व वाले NDA का समर्थन करेंगे। दिलचस्प बात यह है कि अपने अधिकारों को बचाने के लिए, राजनीतिक दल बदलने वालों को नकारें NCPI के नारों में से एक था। इस विलय से यह कम जानी-पहचानी पार्टी सत्ताधारी गठबंधन में BJP (240) के बाद और TDP (16) व JDU (12) से आगे दूसरा सबसे बड़ा गुट (20 लोकसभा सदस्य) बन जाएगी। चुनाव आयोग में करेंगे टीएमसी के चिन्ह पर दावा टीएसी के बागी सासंदों ने लोकसभा स्पीकर से उन्हें ट्रेज़री बेंच (सत्ता पक्ष की सीटों) पर जगह देने का अनुरोध किया, क्योंकि अब तक वे संसद में TMC के सदस्य के रूप में विपक्षी दलों के साथ बैठते थे। सुदीप बंद्योपाध्याय छह बार के सांसद होने के नाते इस अलग हुए गुट के सबसे अनुभवी सदस्य हैं। उन्होंने असली TMC होने का दावा करने के लिए चुनाव आयोग जाने की संभावना भी खुली रखी है। TMC बागियों के पास ज़रूरी 2/3 संख्या से 1 सांसद ज्यादा है स्पीकर ओम बिरला के साथ बैठक के बाद, सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि यह विलय दलबदल विरोधी कानून (संविधान की दसवीं अनुसूची) की ज़रूरतों के अनुसार किया गया है। यह कानून पार्टी में विभाजन को मान्यता नहीं देता है। एक ऐसा बिंदु जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में शिवसेना में विभाजन के मामले में भी जोर दिया था। हालांकि एक पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों के दूसरी पार्टी में विलय के लिए अपवाद की अनुमति देता है। 20 सांसदों के साथ, TMC के बागी गुट के पास ज़रूरी दो-तिहाई संख्या से एक सांसद ज़्यादा है, क्योंकि लोकसभा में TMC के कुल 28 सदस्य हैं। हावड़ा में रजिस्टर्ड, पर त्रिपुरा में मौजूदगी NCPI चुनाव आयोग (EC) के पास रजिस्टर्ड लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी है। यह उन 2,049 पार्टियों में से एक है जो मान्यता प्राप्त करने के लिए ज़रूरी चुनावी प्रदर्शन के स्तर तक नहीं पहुंच पाई हैं। NCPI को जनवरी 2023 में भारत के चुनाव आयोग (ECI) के साथ रजिस्टर किया गया था। यह पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में रजिस्टर्ड है, लेकिन इसने मुख्य रूप से त्रिपुरा में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाने की कोशिश की है। श्वेली कुंडू राष्ट्रीय अध्यक्ष एनसीपीआई का आधिकारिक चुनाव चिह्न सात स्ट्रोक वाला इंक पेन का निब है। पार्टी ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में अपनी शुरुआत की। पार्टी ने कुछ चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारे, लेकिन बहुत कम वोट मिले और यह चुनाव पर कोई खास असर नहीं डाल पाई। इस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्वेली कुंडू हैं। हावड़ा में तरुण कुमार रॉय पार्टी चीफ 2023 में बनी इस पार्टी का चुनाव चिह्न सात किरणों वाली पेन की निब है और त्रिपुरा व मेघालय में इसकी कुछ मौजूदगी है। हालांकि, यह कभी भी ज़्यादा लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाई और इसे बड़ी पार्टियों के साथ-साथ TIPRA और IPFT जैसे क्षेत्रीय दलों से भी नकारा गया है। त्रिपुरा में शांतनु साहा पार्टी का कामकाज संभालते हैं, जबकि हावड़ा के तरुण कुमार रॉय कथित तौर पर इसके कामकाज में शामिल हैं।. अभिषेक बनर्जी की गुहार उन्होंने तृणमूल कांग्रेस लोकसभा संसदीय दल के नेता अभिषेक बनर्जी द्वारा लिखा गया एक पत्र लोकसभा अध्यक्ष को सौंपा, जिसमें उनसे किसी भी कथित अलग गुट को मान्यता न देने का आग्रह किया गया है। इस पत्र में तर्क दिया गया है कि संविधान किसी मौजूदा राजनीतिक दल के भीतर एक अलग समूह बनाने की अनुमति नहीं देता है। 10 जून की तारीख वाले इस पत्र को पहले ईमेल के जरिए भी भेजा गया था, जिसमें कहा गया है कि दलबदल विरोधी कानून इस तरह के विभाजन की इजाजत नहीं देता। पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने अपने पत्र में अनुरोध किया है कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (एआईटीसी) को एक ही राजनीतिक पार्टी माना जाए जिसका प्रतिनिधित्व सदन में केवल उसके अधिकृत नेता और मुख्य सचेतक द्वारा किया जाए। उन्होंने यह भी आग्रह किया कि बागी सांसदों की ओर से किसी भी तरह के पत्राचार या अनुरोध पर कोई फैसला करने से पहले पार्टी को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए। महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए बनर्जी ने तर्क दिया कि 10वीं अनुसूची के तहत अब विभाजन का बचाव उपलब्ध नहीं है। वर्तमान कानूनी ढांचा किसी एक राजनीतिक दल की पहचान को मान्यता देता है न कि उसके भीतर मौजूद विरोधी गुटों को अलग अलग मान्यता देता है। बनर्जी ने यह भी कहा कि विलय के किसी भी दावे के लिए राजनीतिक पार्टी का विलय और दो-तिहाई विधायकों का समर्थन, दोनों जरूरी हैं और कानून के तहत इनमें से सिर्फ एक शर्त पूरी करना काफी नहीं होगा। लोकसभा स्पीकर से मुलाकात के बाद आजाद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने यह साफ कर दिया है कि एक राजनीतिक पार्टी में विभाजन मंजूर नहीं है। NCPI पार्टी क्या है? नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI त्रिपुरा की एक कम प्रसिद्ध रजिस्टर्ड, लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी है जिसकी कोई खास राजनीतिक मौजूदगी नहीं है। NCPI ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें इसके उम्मीदवार या तो नोटा से पीछे रहे या उन्हें उससे बस कुछ ही अधिक वोट मिले। पार्टी का इतिहास उपलब्ध चुनाव आयोग और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, NCPI को 20 जनवरी 2023 को एक Registered Unrecognised Political Party (RUPP) के रूप में रजिस्टर्ड किया गया था। पार्टी का रजिस्ट्रेशन एड्रेस पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में बताया जाता है। लेकिन इसने अपनी शुरुआती चुनावी गतिविधियां मुख्य रूप से त्रिपुरा में की थीं। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा … Read more

ममता बनर्जी ने कई नेताओं पर कार्रवाई की, यूथ विंग अध्यक्ष सायोनी घोष हटाई गईं

कोलकाता ममता बनर्जी की TMC के ज्यादातर विधायकों और सांसदों ने बगावत कर ली है और नया गुट बना लिया है। TMC बनने के बाद से ममता बनर्जी के ऊपर आया यह सबसे बड़ा संकट है। विधानसभा में करीब 64 विधायक अलग हो गए, जबकि लोकसभा में 20 सांसदों ने नया गुट बनाकर एनडीए को समर्थन देने का फैसला किया है। जिन सांसदों ने बगावत की है, उसमें एक समय सबसे ममता और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की करीबी नेता मानी जाने वाली सायोनी घोष भी शामिल हैं। अब ममता बनर्जी ने सायोनी को बड़ा झटका दिया है। उन्हें तृणमूल यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया है। सायोनी घोष वही नेता हैं, जिन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान काबा-मदीना वाला गीत गाकर सुर्खियां बंटोरी थीं। टीएमसी की शनिवार को वर्किंग कमेटी की बैठक हुई। इसमें जिन नेताओं ने विरोधी गुट का दामन थाम लिया था, उन्हें उनके पदों से हटा दिया गया। सायोनी के अलावा, सुदीप बंद्दोपाध्याय को कोलकाता उत्तर के पार्टी प्रमुख पद से हटा दिया गया। उनकी जगह कुणाल घोष को यह जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा, माला रॉय को भी वर्किंग कमेटी से हटा दिया गया है। ममता बनर्जी के घर पर हुई बैठक के बाद, पार्टी सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा, "यह वर्किंग कमेटी की बैठक थी। सुखेंदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव ने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है, इसलिए दो पद खाली हो गए। सुदीप बंद्योपाध्याय, माला रॉय और एक और व्यक्ति, जो दूसरी तरफ चले गए हैं और अलग गुट बना रहे हैं, उन्हें वर्किंग कमेटी से हटा दिया गया है। सौगत रॉय और ज्योतिप्रिय मल्लिक को वर्किंग कमेटी में शामिल किया गया है। सुदीप बंद्योपाध्याय की जगह कुणाल घोष को कोलकाता उत्तर का अध्यक्ष बनाया गया है। सायोनी घोष को तृणमूल युवा कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है। 4000 EVM का जलना एक गंभीर मामला है, हम इसे आगे उठाएंगे।" ममता के एक और सांसद हुए बागी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद और ममता के करीबी नेताओं में गिने जाने वाले सुदीप बंद्योपाध्याय भी बागी हो गए। उन्होंने शनिवार को नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात की। उनके साथ पार्टी की बागी सांसद शताब्दी रॉय भी थीं। बंद्योपाध्याय और यादव की मुलाकात ने पार्टी के भीतर जारी संकट के बीच नई राजनीतिक अटकलों को जन्म दिया, जिससे यह सवाल उठने लगे कि क्या वरिष्ठ सांसद बंद्योपाध्याय बागी गुट में शामिल हो सकते हैं। सूत्रों ने बताया कि ये अटकलें तब और तेज हो गईं जब बंद्योपाध्याय ने यादव से मुलाकात के बाद राष्ट्रीय राजधानी में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी कथित तौर पर मुलाकात की।

TMC संकट गहराया: सांसदों का NDA समर्थन की ओर झुकाव

पश्चिम बंगाल TMC (तृणमूल कांग्रेस) के 20 से ज्यादा सांसद पार्टी छोड़ने की कगार पर हैं. ये सांसद अब खुद को एक अलग गुट बनाना चाहते हैं और NDA (BJP) का साथ देने की बात कर रहे हैं. सोमवार को ये सब लोकसभा स्पीकर से मिलने दिल्ली जा रहे हैं. TMC यानी ममता बनर्जी की पार्टी में इस वक्त बड़ा घमासान चल रहा है. पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद से पार्टी के अंदर खींचतान बढ़ती जा रही है. बागी सांसदों का दावा क्या है? TMC सांसद काकोली घोष दस्तीदार, जो इस बागी गुट की लीडर बन गई हैं, उन्होंने कहा कि उनके साथ अब 22 सांसद हैं. इससे पहले उन्होंने 20 का दावा किया था. दो नए सांसद और जुड़े हैं, लेकिन उनके नाम अभी नहीं बताए गए. काकोली ने कहा कि जब वो लोग औपचारिक रूप से शामिल होंगे, तभी नाम सामने आएंगे. स्पीकर से मुलाकात क्यों? सोमवार को ये सांसद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिलने वाले हैं. मांग यह है कि उन्हें एक अलग संसदीय गुट के तौर पर मान्यता दी जाए, यानी वो TMC से अलग एक नया पार्लियामेंट्री ब्लॉक बनाना चाहते हैं. काकोली ने खुद कोलकाता एयरपोर्ट पर मीडिया से यह बात कही. 19 सांसदों के दस्तखत वाला दस्तावेज शुक्रवार को एक कागज सामने आया जिस पर 19 TMC सांसदों के दस्तखत थे. इन नामों में काकोली घोष दस्तीदार, सताब्दी रॉय, बापी हल्दर, शर्मिला सरकार, प्रसून बनर्जी, जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया, असित माल, अरूप चक्रवर्ती, कालीपद सोरेन, दीपक अधिकारी यानी देव, जून मालिया, पार्थ भौमिक, खलीलुर रहमान, अबू ताहेर खान, यूसुफ पठान, मिताली बाग और माला रॉय शामिल हैं. रचना बनर्जी और सायनी घोष के दस्तखत भी अलग से दिखे. ये सभी स्पीकर को चिट्ठी लिख चुके हैं कि उन्हें काकोली की अगुवाई में अलग गुट माना जाए. हालांकि यह साफ नहीं है कि स्पीकर के दफ्तर को यह चिट्ठी मिली या नहीं. दस्तखतों की असलियत की भी कोई पक्की पुष्टि नहीं हुई है. NDA का साथ देने की बात इस बागी गुट ने यह भी कहा है कि वो केंद्र में BJP की अगुवाई वाली NDA सरकार को समर्थन देंगे. यानी यह सिर्फ पार्टी से अलग होना नहीं है, बल्कि सीधे विरोधी खेमे में जाने की तैयारी है. दिल्ली में मीटिंग और शुवेंदु अधिकारी बागी सांसदों की एक मीटिंग पहले कोलकाता में होनी थी, लेकिन अब वो दिल्ली शिफ्ट हो गई है. पश्चिम बंगाल के CM शुवेंदु अधिकारी के इस मीटिंग में आने की उम्मीद थी, लेकिन एक सरकारी काम की वजह से वो शायद नहीं आ पाएंगे. कौन नहीं है इनके साथ? TMC के कई बड़े नेता इस बागी गुट में नहीं हैं. अभिषेक बनर्जी, कल्याण बनर्जी, सौगत रॉय, महुआ मोइत्रा, किर्ती आजाद, शत्रुघ्न सिन्हा, प्रतिमा मंडल और सज्दा अहमद के दस्तखत उस कागज पर नहीं थे. सुदीप और भूपेंद्र की मुलाकात बीच में एक और दिलचस्प बात हुई. TMC के वरिष्ठ सांसद सुदीप बंदोपाध्याय शनिवार को दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मिले. इससे अटकलें लगने लगीं कि क्या सुदीप भी बागी गुट में शामिल हो सकते हैं. हालांकि अभी इस बारे में कुछ पक्का नहीं कहा जा सकता. कुल मिलाकर ऐसा है कि TMC के 20 से ज्यादा सांसद ममता बनर्जी से बगावत कर एक अलग गुट बनाने की कोशिश में हैं. वो NDA का साथ देना चाहते हैं और स्पीकर से मान्यता मांग रहे हैं. पार्टी के भीतर बड़ी टूट देखने को मिल रही है.

संवैधानिक संशोधन बिल पर नजर, एनडीए बढ़ा रहा है संख्याबल

नई दिल्ली  तृणमूल कांग्रेस में बगावत से संसद में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए की संख्या बढ़ने की उम्मीद है। बीजेपी सरकार अहम संवैधानिक संशोधन बिल पास कराने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की कोशिश कर रही है। हालांकि राज्यसभा चुनाव का मौजूदा दौर एनडीए को दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंचने में मदद करेगा, लेकिन लोकसभा में टीएमसी के पाला बदलने के बावजूद वह अभी भी 363 के जादुई आंकड़े से काफी दूर है। क्या कहता है गणित? सूत्रों का कहना है कि झारखंड और मिजोरम में हो रहे राज्यसभा चुनावों में निर्दलीय सीटों पर जीत हासिल करके एनडीए अपनी मौजूदा 148 सांसदों की संख्या में तीन सीटें और जोड़ लेगा। टीएमसी के तीन सांसदों के इस्तीफे और उपचुनावों के बाद एनडीए पश्चिम बंगाल से तीनों सीटें हासिल कर लेगा, जिससे उसकी संख्या 154 हो जाएगी, जो उच्च सदन में दो-तिहाई बहुमत से नौ कम है। चूंकि उच्च सदन में टीएमसी के और सांसदों के इस्तीफे की संभावना है, इसलिए एनडीए 163 का आंकड़ा छू सकता है, जिससे उसे सभी संवैधानिक संशोधन बिल पास कराने के लिए जरूरी संख्या बल मिल जाएगा। नवंबर में फिर घट जाएगी संख्या नवंबर तक सत्ताधारी गठबंधन की ताकत कम हो सकती है क्योंकि उत्तर प्रदेश से 10 सांसद रिटायर होंगे और राज्य विधानसभा में अपनी बेहतर संख्या के कारण समाजवादी पार्टी राज्यसभा में कुछ सीटें हासिल कर सकती है। विपक्षी गठबंधन के 64 सांसद विपक्षी इंडी गठबंधन के पास अभी 64 सांसद हैं, क्योंकि डीएमके (आठ सांसदों के साथ) इससे बाहर हो गई है और आप (तीन सांसदों के साथ) ने खुद को इस समूह से अलग कर लिया है। वाईएसआरसीपी और बीजेडी जैसी निर्दलीय पार्टियां (जिनके पास क्रमशः सात और छह सीटें हैं) और एमडीएमके राज्यसभा में किसी भी तरफ जा सकती हैं। हालांकि, लोकसभा में एनडीए की संख्या 213 तक पहुंच सकती है, क्योंकि टीएमसी के लगभग 20 और सांसद एक अलग समूह बनाकर इसे समर्थन दे सकते हैं। पार्टी छोड़ने वाले ये सांसद सोमवार को स्पीकर ओम बिरला से मिलेंगे और टीएमसी से अलग होने की घोषणा करने वाला पत्र उन्हें सौंपेंगे। लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत पाने के लिए 363 सांसदों की जरूरत होती है।

वित्त मंत्री बोलीं—भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, विपक्ष संकट का माहौल बनाता है

नई दिल्ली केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधा है। वित्त मंत्री ने कहा कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश में भारत और उसके लोगों की उपलब्धियों को कमतर आंकते हैं। सीतारमण ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी कोविड-19 वैश्विक महामारी और पश्चिम एशिया में संघर्ष जैसे बड़े संकटों के दौरान भी भारत की उपलब्धियों को नजरअंदाज करते हैं। देश के सामने ऐसा कोई संकट नहीं है, जैसा राहुल गांधी पेश कर रहे हैं। 'लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष जब भी बोलते हैं, तो…' प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश में बीजेपी सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में बेंगलुरू में ‘विकसित भारत संकल्प समावेश’ का आयोजन किया गया है। इसमें पार्टी पदाधिकारियों को संबोधित करते हुए निर्मला सीतारमण ने कहा कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष जब भी बोलते हैं, तो हर चीज की केवल आलोचना करते हैं और भारत के लोगों की उपलब्धियों को कमतर आंकते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसा करके वह प्रधानमंत्री मोदी या केंद्र सरकार को कमतर दिखा रहे हैं। बार-बार कहते हैं बड़ा संकट आने वाला है लेकिन कोई संकट नहीं आया: सीतारमण सीतारमण ने कहा कि राहुल गांधी लगातार कहते रहते हैं कि अगले कुछ सप्ताह में सब कुछ ढह जाएगा। नेता प्रतिपक्ष बार-बार कहते हैं कि कोई बड़ा संकट आने वाला है, लेकिन भारत के सामने ऐसा कोई संकट नहीं है। उन्होंने कहा कि इसके विपरीत, तिमाही दर तिमाही और साल दर साल भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना हुआ है। जब भी कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष (राहुल गांधी) लोकसभा में बोलते हैं, तो उनका लहजा हर चीज की बुराई करने और भारत के लोगों की उपलब्धियों को कमतर आंकने वाला होता है। भारत पर कोई आपदा नहीं आने वाली है। IMF अप्रैल-मई में अपने आकलन के दौरान और फिर अक्टूबर में डेटा जारी करके बताता है कि भारत अभी भी सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था क्यों बना हुआ है। भले ही मिडिल ईस्ट में संकट चल रहा हो और होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावटें आ रही हों। बात सिर्फ कच्चे तेल या LPG की कीमत की नहीं है, इन सभी चुनौतियों के बावजूद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि सप्लाई में कोई रुकावट न आए। अर्थव्यवस्था और आम घरों की जरूरतों पर इसी तरह का ध्यान दिया जा रहा है। पश्चिम एशिया संकट, फ्यूल का जिक्र कर क्या बोलीं वित्त मंत्री केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत के सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने की बात सरकार नहीं कह रही, बल्कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़े और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) भी यही कहते हैं। सीतारमण ने पश्चिम एशिया संकट का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने यह सुनिश्चित किया कि ईंधन की आपूर्ति में कोई बाधा न आए। वित्त मंत्री ने अपनी बात स्पष्ट करने के लिए पश्चिम एशिया से ईंधन की ढुलाई में आने वाली चुनौतियों का भी उल्लेख किया।