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पुरानी रिपोर्ट खारिज, सिद्धारमैया ने नवरात्र में की नई जातीय गणना की घोषणा

बेंगलुरु कांग्रेस शासित कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने शुक्रवार को ऐलान किया कि राज्य में 22 सितंबर से 7 अक्टूबर के बीच दशहरा की छुट्टियों के दौरान एक नया सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सर्वेक्षण कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि 2015 में की गई जाति जनगणना को सरकार ने नामंजूर कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि पिछली जनगणना के आंकड़े एक दशक पुराने हो चुके हैं, इसलिए समाज की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए नई जाति जनगणना जरूरी हो गई है। मुख्यमंत्री ने एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, "समाज में कई धर्म और जातियाँ हैं। विविधता और असमानता भी है। संविधान कहता है कि सभी के साथ समान व्यवहार होने चाहिए और सामाजिक न्याय होना चाहिए।" उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि नया सर्वेक्षण असमानताओं को दूर करने और लोकतंत्र की मज़बूत नींव रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 2 करोड़ परिवारों को किया जाएगा शामिल कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा किए जाने वाले इस सर्वे में राज्य के लगभग 2 करोड़ परिवारों के तहत आनेवाली करीब 7 करोड़ पूरी आबादी को शामिल किए जाने की उम्मीद है। इस सर्वे के दौरान हरेक परिवार को एक विशिष्ट घरेलू पहचान पत्र (UID) स्टिकर दिया जाएगा। इनमें से अब तक 1.55 करोड़ घरों पर ये स्टिकर चिपकाए जा चुके हैं। परिवारों की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षिक स्थिति का विवरण एकत्र करने के लिए 60 प्रश्नों वाली एक प्रश्नावली भी तैयार की गई है। हरेक को 20,000 रुपये तक का मानदेय रिपोर्ट में कहा गया है कि सर्वेक्षण के लिए दशहरा की छुट्टियों के दौरान 1.85 लाख सरकारी शिक्षकों को तैनात किया जाएगा। इस काम के लिए हरेक को 20,000 रुपये तक का मानदेय मिलेगा, जिससे शिक्षकों के पारिश्रमिक के लिए कुल आवंटन 325 करोड़ रुपये हो जाएगा। राज्य ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए 420 करोड़ रुपये निर्धारित किए हैं, जो 2015 की जाति जनगणना के दौरान खर्च किए गए 165 करोड़ रुपये से ढाई गुना से भी ज़्यादा है। बिजली मीटर के नंबरों की होगी जियो-टैगिंग रिपोर्ट में कहा गया है कि सर्वे के दौरान हरेक घर को बिजली मीटर के नंबरों से जियो-टैग किया जाएगा, और मोबाइ नंबों को राशन कार्ड और आधार से जोड़े जाएँगे। जो लोग सर्वे कर्मियों को अपनी जाति का विवरण नहीं देना चाहते, उनके लिए एक समर्पित हेल्पलाइन (8050770004) पर कॉल करके या ऑनलाइन जानकारी देने के विकल्प भी उपलब्ध कराए गए हैं। दिसंबर 2025 तक आएगी रिपोर्ट मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने नागरिकों से पूर्ण सहयोग देने का आग्रह किया। मधुसूदन नाइक की अध्यक्षता वाले आयोग को वैज्ञानिक और समावेशी तरीके से सर्वेक्षण करने का काम सौंपा गया है। उम्मीद है कि आयोग अपनी अंतिम रिपोर्ट दिसंबर 2025 तक सौंप देगा। बता दें कि इससे पहले कर्नाटक पिछड़ा वर्ग आयोग ने सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक सर्वेक्षण 2015 रिपोर्ट तैयार की थी। इसे 17 अप्रैल को सिद्धारमैया कैबिनेट में पेश किया जाना था। लेकिन उससे पहले ही यह लीक हो गई थी, जिस पर विवाद मच गया था और रिपोर्ट पेश नहीं हो पाई। पिछली जातीय गणना पर उठे थे सवाल राज्य के सबसे प्रभावशाली वोक्कालिगा और वीरशैव-लिंगायत समुदाय ने भी उस सर्वे पर सवाल उठाते हुए सिद्धारमैया सरकार को कठघरे में खड़ा किया था। आयोग ने बताया था कि उसने राज्य की 6.35 करोड़ आबादी में से 5.98 करोड़ लोगों के बीच सर्वे कर ये रिपोर्ट बनाई है। इन दोनों समुदायों ने आरोप लगाया था कि उनकी आबादी घटाकर बताई गई है। कांग्रेस सरकार का महीने भर में तीसरा दांव दरअसल, कर्नाटक में अगले कुछ महीनों में स्थानीय निकाय चुनाव होने हैं। उससे पहले इस सर्वे को सिद्धारमैया सरकार का एक दांव माना जा रहा है। एक तरफ इस सर्वे से वह वोक्कालिगा और वीरशैव-लिंगायत समुदाय की नाराजगी दूर करने जा रहे हैं तो दूसरी तरफ राज्य के अन्य ओबीसी, SC/ST वर्ग को भी साधने की कोशिशों में जुटे हैं। इससे पहले वह इसी महीने अल्पसंख्यक महिलाओं के लैंगिक सर्वेक्षण का भी आदेश दे चुके हैं। इसी महीने वह स्थानीय चुनाव बैलेट पेपर से कराने की घोषणा कर चुके हैं, जिसे राज्य चुनाव आयोग ने माना लिया है। इस तरह महीने भर में यह उनका तीसरा दांव है। बड़ी बात यह है कि कांग्रेस शासित राज्य में ये कवायद बिहार चुनाव से पहले कराई जा रही है। कांग्रेस इसके जरिए बिहार चुनावों में भी सियासी संदेश देने की कोशिश कर रही है।  

राहुल गांधी के गैरहाजिरी पर BJP का हमला, उपराष्ट्रपति शपथग्रहण से चूके राहुल

नई दिल्ली  भाजपा ने गुरुवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर भारत के 15वें उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन के शपथग्रहण समारोह से अनुपस्थित रहने को लेकर तीखा हमला बोला है। भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने संवैधानिक परंपराओं का बहिष्कार किया है और वे भारतीय लोकतंत्र और संविधान का अपमान कर रहे हैं। भंडारी ने एक्स पर लिखा, “राहुल गांधी को भारतीय संविधान से नफरत है! राहुल गांधी को भारतीय लोकतंत्र से नफरत है! कुछ दिन पहले वे लाल किले पर स्वतंत्रता दिवस समारोह से गायब थे और आज उपराष्ट्रपति के शपथग्रहण से। क्या ऐसा व्यक्ति, जो संवैधानिक अवसरों को नजरअंदाज करता है, सार्वजनिक जीवन के योग्य है?” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राहुल गांधी के पास मलेशिया में छुट्टियां बिताने का समय है, लेकिन संवैधानिक कार्यक्रमों में शामिल होने का नहीं है। उन्हें भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक करार दिया। कांग्रेस नेता उदित राज ने कहा कि हर संवैधानिक कार्यक्रम में विपक्ष के नेता की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष ने पार्टी का प्रतिनिधित्व किया। भाजपा ही संविधान को कमजोर कर रही है, जबकि राहुल गांधी उसे बचाने के लिए लड़ रहे हैं। भाजपा के सहयोगी शिवसेना के नेता और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भी विपक्ष की अनुपस्थिति पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद संवैधानिक कार्यक्रमों पर हावी नहीं होने चाहिए। जानकारी के अनुसार राहुल गांधी शपथग्रहण में शामिल नहीं हो सके क्योंकि वे गुजरात में पार्टी कार्यक्रम के लिए रवाना हुए थे। हालांकि, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समारोह में मौजूद थे। आपको बता दें कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई। उन्होंने विपक्ष समर्थित उम्मीदवार बी. सुधर्शन रेड्डी को 152 वोटों से हराया। राधाकृष्णन इससे पहले महाराष्ट्र के राज्यपाल रह चुके हैं और अब वे 11 सितंबर 2030 तक इस पद पर रहेंगे। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी समारोह में मौजूद रहे।  

उद्धव ठाकरे पर भरोसा नहीं! मंत्री नितेश राणे ने शिवसेना (UBT)-MNS गठबंधन पर किया कटाक्ष

मुंबई  महाराष्ट्र के मंत्री नितेश राणे ने शिवसेना (यूबीटी) के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे पर बड़ा हमला बोला. उन्होंने उद्धव ठाकरे को अविश्वासनीय व्यक्ति करार देते हुए कहा कि उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इसके साथ ही मनसे-शिवसेना (उद्धव) गठबंधन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि कौन किसके साथ जाता है, यह उनके दल का विषय है. राणे ने आरोप लगाया कि मातोश्री पर गए कांग्रेस नेताओं को खुद उद्धव ठाकरे ने बाहर निकाला था. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कांग्रेस, मनसे उम्मीदवार को स्वीकार करेगी? महाराष्ट्र की सियासत में इंडिया गठबंधन में मनसे को भी शामिल करने की बात चल रही है. ऐसी अटकलें हैं कि निकाय चुनाव में मनसे के नेता राज ठाकरे इंडिया गठबंधन की पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे. जो औरंगजेब की बात करेगा, उसे वापस भेजा जाएगा मालवणी/धाराशिव में औरंगजेब नारेबाजी पर नितेश राणे ने कहा, “हमारा देश हिंदू राष्ट्र है. यहां यदि कोई औरंगजेब का उदारीकरण करेगा, तो उन्हें पाकिस्तान भेजा जाएगा.” हैदराबाद गजट पर चुनौती पर उन्होंने कहा, “लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात रखने की आजादी है. किसी को भी कोर्ट जाने का अधिकार है.” रश्मी शुक्ला-नाना पटोले पर राणे ने कहा, “रश्मी शुक्ला के खिलाफ साजिश की जा रही है, यह हम पहले दिन से कह रहे हैं. अब सबके सामने आ गया है.” उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि “नाना पटोले कितनी बार मुंह के बल गिरेंगे, इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया जाना चाहिए.” ओबीसी आरक्षण से नहीं होगी कोई छेड़छाड़ ओबीसी आरक्षण पर आश्वासन पर राणे ने कहा कि ओबीसी आरक्षण से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी. मंत्री नितेश राणे ने कोंकण में हुई बैठक का जिक्र करते हुए कहा कि इस मीटिंग का मुख्य उद्देश्य कोंकण की इकोनॉमी को मजबूत करना है. इस चर्चा में कोंकण को काजू, आम और मछली का एक प्रमुख केंद्र बनाने और जयगढ़ बंदरगाह के विकास पर चर्चा हुई. इसके साथ ही जल परिवहन से जोड़ने के लिए एक डीपीआर तैयार करने पर भी बैठक में विचार किया गया.  

बीना की विधायक निर्मला सप्रे को नया झटका, उमंग सिंघार पहुंचे हाईकोर्ट

बीना बीना से विधायक निर्मला सप्रे की मुश्किलें कम होती नजर नहीं आ रही है,क्योंकि अब नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने हाईकोर्ट जबलपुर में याचिका दायर कर दी है। विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता रद्द कराने के लिए सिंघार ने हाईकोर्ट जबलपुर का रुख कर लिया है आपको बता निर्मला सप्रे सागर की बीना सीट से कांग्रेस के टिकट पर साल 2023 में विधानसभा चुनाव जीतीं थीं लेकिन साल 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री मोहन यादव की मौजूदगी में भगवा पार्टी में शामिल हो गई थीं।  उमंग सिंघार ने जो याचिका लगाई है उसमें मध्य प्रदेश सरकार, विधानसभा प्रमुख सचिव, विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र तोमर के साथ निर्मला सप्रे को पार्टी बनाया है। पहले  उमंग सिंघार की ओर से सप्रे की सदस्यता रद्द करने को लेकर इंदौर खंडपीठ में याचिका लगाई थी, लेकिन इंदौर खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए जबलपुर हाईकोर्ट में जाने की सलाह दी थी। अब नेता विपक्ष ने जबलपुर हाइकोर्ट में याचिका लगा दी है। मामले पर जल्द ही सुनवाई की तारीख तय होगी।

गौशाला मुद्दे पर जीतू पटवारी का सीधा वार, सीएम मोहन यादव को 7 दिन का अल्टीमेटम

इंदौर   मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को सीधी चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि प्रदेशभर में सड़क दुर्घटनाओं में रोजाना सैकड़ों गायों की मौत हो रही है। सरकार की जिम्मेदारी है कि गौशालाओं को व्यवस्थित किया जाए। पटवारी ने कहा है कि ‘मैं मुख्यमंत्री को चुनौती देता हूं कि एक सप्ताह के भीतर सभी गौशालाओं को दुरुस्त किया जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो मैं खुद निरीक्षण करूंगा और उसका वीडियो बनाकर सार्वजनिक करूंगा।’ उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार गोरक्षा के नाम पर सिर्फ राजनीति कर रही है, जबकि सड़कों पर बेसहारा मवेशी रोज़ दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं।  

कांग्रेस सरकार गिरने के बाद भी दिग्विजय-कमलनाथ में सुलह, मनभेद से इनकार

नई दिल्ली  कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने शुक्रवार को सोशल मीडिया पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के साथ तस्वीर शेयर की। इसके साथ ही लिखा कि कमल नाथ जी और मेरे लगभग 50 वर्षों के पारिवारिक संबंध रहे हैं। हमारे राजनैतिक जीवन में उतार चढ़ाव आते रहे हैं और ये स्वाभाविक भी है। हमारा सारा राजनैतिक जीवन कांग्रेस में रहते हुए विचारधारा की लड़ाई एकजुट हो कर लड़ते हुए बीता है और आगे भी लड़ते रहेंगे। छोटे मोटे मतभेद रहे हैं, लेकिन मनभेद कभी नहीं। उन्होंने आगे लिखा कि कल उनकी मुलाकात हुई। हम दोनों को कांग्रेस पार्टी ने नेतृत्व खूब अवसर दिए और जनता का प्यार सदैव मिलता रहा है। आगे भी हम मिल कर जनता के हित में कांग्रेस के नेतृत्व में सेवा करते रहेंगे।  2020 का विवाद और अब का संदेश मार्च 2020 में जब कांग्रेस की कमलनाथ सरकार गिरी थी, तब पार्टी के भीतर गहरी खींचतान रही। हाल ही में इसको लेकर दोनों नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिले। दिग्विजय और कमलनाथ ने एक-दूसरे को सरकार गिराने के लिए जिम्मेदार होने का आरोप लगाया था। अब दिग्विजय सिंह की पोस्ट ने संकेत दिया है कि पार्टी आने वाले समय में पुराने विवादों को पीछे छोड़कर एकजुटता की नई तस्वीर पेश करना चाहती है। दोनों नेता एकजुटता का संदेश देने की कोशिश कर रहे वरिष्ठ पत्रकार अरुण दीक्षित का मानना है कि कांग्रेस के नेता अपनी खोई हुई साख वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं। सबको पता है कि आपसी टकराव और अहंकार की राजनीति ने ही 2020 में मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार को गिरा दिया था। अब भले ही दोनों नेता एकजुटता का संदेश देने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा बनी हुई है कि उनकी लड़ाई ने ही पार्टी को सत्ता से बाहर किया। दीक्षित का कहना है कि आज दोनों ही नेता राजनीतिक तौर पर हाशिए पर हैं। कांग्रेस को जो नुकसान होना था, वह हो चुका है। सरकार गिरने पर विवाद  कुछ दिन पहले दिए गए एक इंटरव्यू में दिग्विजय सिंह ने कहा था कि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच गहराते मतभेद ही 2020 में कांग्रेस सरकार गिरने का कारण बने, इसके जवाब में कमलनाथ ने ट्वीट कर कहा कि सिंधिया को लगता था दिग्विजय सिंह सरकार चला रहे हैं, इसलिए उन्होंने बगावत की. इस बयानबाजी ने फिर से पुराने घाव हरे कर दिए थे और यह चर्चा जोर पकड़ने लगी थी कि क्या कांग्रेस में भीतर ही भीतर सब कुछ ठीक नहीं है.  सियासी एकजुटता  कमलनाथ और दिग्विजय सिंह दोनों ही मध्य प्रदेश कांग्रेस के आज भी सबसे बड़े और सीनियर चेहरे हैं, उनके बीच सार्वजनिक रूप से एक सकारात्मक संवाद और तस्वीर सामने आना पार्टी कार्यकर्ताओं में एकता का संदेश दे सकता है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह मुलाकात 2023 के विधानसभा चुनावों में पार्टी के कमजोर प्रदर्शन के बाद 2028 की तैयारी और पुनर्गठन की शुरुआत हो सकती है. क्योंकि कांग्रेस पार्टी भी यह जानती है कि दोनों की राजनीतिक जड़ें आज भी एमपी में सबसे ज्यादा मजबूत हैं. दिग्विजय और कमलनाथ की मुलाक़ात से यह साफ है कि कांग्रेस अब 2020 की बगावत से उबरकर आंतरिक मतभेदों को सुलझाने और नया जनाधार तैयार करने में जुट गई है.   नई नेतृत्व का एकजुटता से काम करने पर ही होगा फायदा  पत्रकार दीक्षित ने आगे लिखा कि अब केवल तस्वीरें साझा करने या बयान देने से पार्टी को लाभ नहीं मिलने वाला। कांग्रेस का फायदा तभी होगा जब नई नेतृत्व टीम पूरी एकजुटता के साथ काम करेगी और व्यक्तिगत अहंकार को किनारे रखेगी। उन्होंने कहा कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, जिन्हें राहुल गांधी ने जिम्मेदारी दी है, उनका सबसे अहम काम टीम बनाना और कार्यकर्ताओं को जोड़ना है। लेकिन, इस दिशा में ठोस प्रयास दिखाई नहीं दे रहे। जब कमांडर कमजोर होता है तो पूरी फौज बिखर जाती है। 

कांग्रेस की किसान न्याय यात्रा आज उज्जैन में, दिग्गज नेताओं की जुटेगी ताकत

उज्जैन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के गृह जिले उज्जैन में शुक्रवार को कांग्रेस किसान न्याय यात्रा निकालेगी। रैली के बाद जनसभा होगी। इसमें राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार सहित सभी वरिष्ठ नेता भाग लेंगे। सभा में पार्टी वोट चोरी, सिंहस्थ के लिए किसानों की भूमि अधिग्रहण, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था का मुद्दा उठाएगी।प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री का गृह क्षेत्र होने के बाद भी किसानों की कोई सुनने के लिए तैयार नहीं है। वे कर्ज, महंगाई और खाद संकट से जूझ रहे हैं। यह न्याय यात्रा भाजपा सरकार की जनविरोधी नीतियों, किसानों की उपेक्षा, युवाओं की बेरोजगारी और महिलाओं की असुरक्षा के विरुद्ध है। प्रदेश की अर्थव्यवस्था कर्ज के दलदल में फंस गई है। ऐसा कोई महीना नहीं बीतता है जब सरकार कर्ज न ले। किसानों को सरकार ने खाद की लाइन में लगा दिया है। उन पर पुलिस लाठियां बरसा रही है। सिंहस्थ के नाम पर किसानों की भूमि लेकर स्थायी निर्माण का रास्ता बनाया जा रहा है, जिसका विरोध हो रहा है। वोट चोरी की बात अब जगजाहिर हो चुकी है। प्रदेश के कई विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूची में गड़बड़ी की गई है। कानून व्यवस्था का बुरा हाल है। अनुसूचित जाति-जनजाति, पिछड़ा वर्ग या महिला, सबके साथ अत्याचार हो रहा है। ये सब मुद्दे उज्जैन में आयोजित किसान न्याय यात्रा में उठाए जाएंगे।

वोटर लिस्ट विवाद में सोनिया गांधी पर छाया राहत का सूरज, कोर्ट ने याचिका ठुकराई

नई दिल्ली  कांग्रेस की वरिष्ठ नेता, सांसद और पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को राऊज एवेन्यू कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने उनके खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सोनिया गांधी ने बिना नागरिकता हासिल किए 1980 की वोटर लिस्ट में अपना नाम शामिल कराया। याचिका में दावा किया गया था कि सोनिया गांधी ने 30 अप्रैल 1983 को भारतीय नागरिकता प्राप्त की थी, जबकि उनका नाम 1980 की दिल्ली की वोटर लिस्ट में शामिल था। याचिका में यह सवाल उठाया गया था कि 1980 में सोनिया गांधी का नाम वोटर लिस्ट में कैसे आया, जबकि उन्होंने नागरिकता 1983 में हासिल की थी। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया था कि 1982 में उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था। याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया कि 1982 में उनका नाम वोटर लिस्ट से क्यों हटाया गया और इसके पीछे क्या वजह थी। इस याचिका में एक और गंभीर सवाल उठाया गया था कि 1983 में भारतीय नागरिकता हासिल करने के बाद 1980 की वोटर लिस्ट में सोनिया गांधी का नाम किस आधार पर शामिल किया गया? क्या इसके लिए किसी फर्जी दस्तावेज का सहारा लिया गया था? याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की थी कि दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया जाए कि वह इस मामले में मुकदमा दर्ज करे और जांच कर के स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करे। हालांकि, राऊज एवेन्यू कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए इस मामले में आगे किसी भी तरह की जांच की आवश्यकता नहीं मानी। बता दें कि बुधवार की सुनवाई में कोर्ट ने इस फैसले को सुरक्षित रख लिया था, जिसे गुरुवार को खारिज कर दिया गया। यह याचिका विकास त्रिपाठी नामक व्यक्ति ने दाखिल की थी। बुधवार की सुनवाई में कोर्ट ने इस मामले पर गुरुवार की शाम 4 बजे के करीब फैसला सुनाए जाने की बात कही थी।

राजनीतिक दंगल अलौली में: चिराग पासवान vs पशुपति पारस के सिपाही

पटना  अलौली विधानसभा सीट खगड़िया लोकसभा के तहत आता है…अलौली सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। 1962 और 1967 में अलौली सीट पर हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेसी कैंडिडेट मिश्री सदा ने जीत हासिल किया था। 1969 में अलौली सीट से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के कैंडिडेट रामविलास पासवान ने जीत हासिल कर लिया था। वहीं 1972 में अलौली विधानसभा सीट पर कांग्रेसी कैंडिडेट मिश्री सदा ने जनता का भरोसा हासिल किया था। 1977 में अलौली सीट से जनता पार्टी के कैंडिडेट पशुपति कुमार पारस ने जीत का परचम लहरा दिया था। 1980 में कांग्रेसी कैंडिडेट मिश्री सदा ने एक बार फिर खगड़िया में विरोधियों को मात दे दिया था। 1985 में यहां से लोक क्रांति दल के टिकट पर पशुपति कुमार पारस ने जीत हासिल किया था। इसके बाद अलौली सीट पर पशुपति कुमार पारस ने अपना वर्चस्व बना लिया था। 1990 और 1995 में हुए विधानसभा चुनाव में अलौली सीट पर जनता दल के टिकट पर पशुपति कुमार पारस ने जीत हासिल किया था। वहीं 2000 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू के टिकट पर पशुपति कुमार पारस ने जीत का सिलसिला कायम रखा था। 2005 में अलौली सीट से लोजपा कैंडिडेट पशुपति कुमार पारस ने फिर से जीत हासिल कर लिया था। 2010 में जेडीयू के कैंडिडेट राम चंद्र सदा ने अलौली में विरोधियों को मात दे दिया था। वहीं 2015 में आरजेडी कैंडिडेट चंदन कुमार ने अलौली सीट पर जीत हासिल कर लिया था। 2020 में अलौली में आरजेडी कैंडिडेट रामवृक्ष सदा ने विरोधियों को मात दे दिया था। वहीं, 2020 के चुनाव में अलौली सीट पर आरजेडी कैंडिडेट रामवृक्ष सदा ने जीत हासिल किया था। रामवृक्ष सदा को 47 हजार एक सौ 83 वोट मिला था तो जेडीयू कैंडिडेट साधना देवी 44 हजार चार सौ 10 वोट लाकर दूसरे स्थान पर रहीं थीं। इस तरह से रामवृक्ष सदा ने साधना देवी को दो हजार सात सौ 73 वोट के अंतर से हरा दिया था। वहीं एलजेपी कैंडिडेट रामचंद्र सदा 26 हजार तीन सौ 86 वोट लाकर तीसरे स्थान पर रहे थे। वहीं, 2015 के विधानसभा चुनाव में अलौली सीट से आरजेडी कैडिडेट चंदन कुमार ने जीत हासिल किया था। चंदन कुमार को 70 हजार पांच सौ 19 वोट मिला  था तो एलजेपी कैंडिडेट पशुपति कुमार पारस को 46 हजार 49 वोट ही मिल पाया था।इस तरह से चंदन कुमार ने पशुपति कुमार पारस को 24 हजार चार सौ 70 वोट के बड़े अंतर से हरा दिया था। वहीं सीपीआई के कैंडिडेट मनोज सदा, 7 हजार 87 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे थे। वहीं 2010 के विधानसभा चुनाव में अलौली सीट पर जेडीयू कैंडिडेट रामचंद्र सदा ने जीत हासिल किया था। रामचंद्र सदा को 53 हजार सात सौ 75 वोट मिला था तो एलजेपी कैंडिडेट पशुपति कुमार पारस ने 36 हजार दो सौ 52 वोट हासिल किया था। इस तरह से रामचंद्र सदा ने पशुपति कुमार पारस को 17 हजार पांच सौ 23 वोट से हरा दिया था। वहीं एसएचएस के कैंडिडेट हंस कुमार, 4 हजार 17 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे थे। वहीं 2005 के विधानसभा चुनाव में अलौली सीट से एलजेपी कैंडिडेट पशुपति कुमार पारस ने जीत हासिल किया था।  पशुपति कुमार पारस को 40 हजार आठ सौ 70 वोट मिला था तो आरजेडी कैंडिडेट रामवृक्ष सदा को 32 हजार दो सौ 93 वोट मिला था। इस तरह से पशुपति कुमार पारस ने रामवृक्ष सदा को 8 हजार पांच सौ 77 वोट के अंतर से हरा दिया था। वहीं जेडीयू कैंडिडेट राज कुमारी,  14 हजार दो सौ 60 वोट हासिल कर तीसरे स्थान पर रहीं थीं। अलौली सीट पर इस बार पासवान परिवार के दो युवा नेता चुनाव लड़ सकते हैं। चर्चा है कि चिराग पासवान अपने भांजे को यहां से चुनाव लड़ा सकते हैं। वहीं पशुपति पारस अपने बेटे को यहां से चुनाव लड़ाने की तैयारी कर रहे हैं। एक ही परिवार के दो दिग्गज युवा चेहरे में जनता किसे अपना समर्थन देगी ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

विदेश में सीक्रेट मीटिंग का आरोप, CRPF लेटर पर राहुल गांधी पर बीजेपी का निशाना

नई दिल्ली  सीआरपीएफ ने पत्र लिखकर दावा किया है कि राहुल गांधी ने अपनी आवाजाही के दौरान कथित तौर पर सुरक्षा प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया है। इस पर बीजेपी ने राहुल गांधी पर हमला बोला है और सवाल उठाया है कि आखिर विदेश यात्रा के दौरान ऐसा क्या होता है जिसके चलते राहुल को अपनी ही सुरक्षा पर भरोसा नहीं है। वे वहां कौन सी सीक्रेट मीटिंग करने जाते हैं और वहां से ऐसी कौन सी सामग्री आती है? सीआरपीएफ की वीआईपी सुरक्षा शाखा, लोकसभा में विपक्ष के नेता 55 वर्षीय राहुल गांधी को ‘जेड प्लस (एएसएल)’ सशस्त्र सुरक्षा प्रदान करती है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा, "अगर राहुल गांधी विदेश यात्राओं के दौरान बार-बार सुरक्षा प्रोटोकॉल का उल्लंघन करते हैं, तो कुछ सवाल उठते हैं। विदेशी यात्राओं के दौरान ऐसा क्या होता है कि उन्हें अपनी ही सुरक्षा पर भरोसा नहीं होता और वे प्रोटोकॉल तोड़ते हैं? क्या वहां से कोई मटेरियल, कंटेट आ रहा है? ऐसी बातें या मुलाकातें हो रही हैं, जिनका इस्तेमाल भारत में किया जा रहा है और यह किसी को पता न चले इसीलिए सिक्योरिटी के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है?'' उन्होंने आगे पूछा, ''इससे पहले भी जब उनके पास एसपीजी सुरक्षा थी, तब इस तरह की चिंताएं उठाई गई थीं। वह विदेशी देशों में अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं… अगर कल को कुछ हुआ, तो क्या सुरक्षा एजेंसियों को दोषी ठहराया जाएगा? कांग्रेस को उनसे पूछना चाहिए कि वह विदेशी यात्राओं पर कौन सी गुप्त बैठकें करते हैं जिससे सुरक्षा का उल्लंघन होता है?" अर्धसैनिक बल की वीआईपी सुरक्षा शाखा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को एक पत्र भेजा है, जिसमें कहा गया है कि गांधी ने अपने घरेलू दौरे के दौरान और विदेश जाने से पहले, ‘‘बिना किसी सूचना के कुछ अनिर्धारित गतिविधियां कीं।’’ सूत्रों ने कहा कि नियमित रूप से इस तरह का संचार किया जाता है और सीआरपीएफ सुरक्षा शाखा द्वारा पहले भी राहुल गांधी की सुरक्षा के संदर्भ में ऐसा संचार किया गया था। बल ने रेखांकित किया है कि इस तरह की अघोषित गतिविधियां उच्च जोखिम वाले वीआईपी की सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा करती हैं। उसने कहा कि सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति और उसके कर्मचारियों द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों का अनिवार्य रूप से पालन किया जाना चाहिए।