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आगर मालवा: सियासी उलटफेर, नगर परिषद अध्यक्ष ने बदला पार्टी दामन

आगर मालवा मध्य प्रदेश के आगर मालवा की नगर परिषद सुसनेर में बड़ा सियासी उलटफेर सामने आया है। नगर परिषद सुसनेर की अध्यक्ष लक्ष्मी राहुल सिसोदिया ने भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया। बताया जाता है कि विधायक भैरोसिंह परिहार एवं अन्य कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी में लक्ष्मी सिसोदिया ने कांग्रेस की सदस्यता ली। इस दौरान कांग्रेस नेताओं ने दुपट्टा पहनाकर उनका स्वागत किया। पार्षदों ने खोला था मोर्चा दरअसल, नगर परिषद की अध्यक्ष लक्ष्मी सिसोदिया के खिलाफ दो दिन पहले तक भाजपा और कांग्रेस के पार्षद अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में थे। बताया जाता है कि कुछ दिन पहले ही भाजपा और कांग्रेस के पार्षदों ने सिसोदिया के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया शुरू की थी। दोनों दल के पार्षदों ने अध्यक्ष लक्ष्मी सिसोदिया पर भ्रस्टाचार के आरोप लगाते हुए पद छोड़ने को लेकर मुहिम चला रखी थी। इसके लिए कलेक्टर कार्यलय समेत एसडीएम को पत्र भी लिखा जा चुका था। कलेक्टर कार्यालय में दिया था आवेदन इन पार्षदों ने कलेक्टर कार्यालय में आवेदन दिया था। शनिवार को इन्हीं पार्षदों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिसोदिया पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। सुसनेर में 15 पार्षद हैं। इनमें से 12 पार्षदों ने अध्यक्ष लक्ष्मी राहुल सिसोदिया के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। पार्षदों ने उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लागते हुए अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया शुरू की थी। इसमे भाजपा के 8 और कांग्रेस के 4 पार्षद शामिल थे। ई-रिक्शा ओर डीजल घोटाले के आरोप शनिवार को रेस्ट हाउस में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पार्षदों ने ई रिक्शा से लेकर डीजल घोटाले के आरोप लगाए थे। पार्षदों का आरोप था कि अध्यक्ष और उनके परिजनों के निजी वाहनों में नगर परिषद से डीजल भरवाया गया। इसके सीसीटीवी फुटेज मौजूद हैं। पार्षदों का आरोप था कि एक व्यक्ति से नौकरी के नाम पर 1 लाख रुपए लिए गए। घोटाले का आरोप पार्षदों का दावा था कि उज्जैन-झालावाड़ राष्ट्रीय राजमार्ग पर बने लाखा प्रवेश द्वार को बेच दिया गया है। ई-रिक्शा कचरा वाहन खरीदी में घोटाला हुआ है। लोकायुक्त की जांच में इसकी पुष्टि हुई है। हाथ ठेला कचरा गाड़ी में भी गबन किया गया है। धार्मिक ग्रंथ ओर देवी देवताओं की खाई कसम प्रेस वार्ता के बाद सभी पार्षदों ने धार्मिक ग्रंथों और देवी-देवताओं की कसम खाकर अध्यक्ष को हटाने का संकल्प लिया था। इस दौरान पार्षद प्रतिनिधि जितेंद्र सांवला ने बताया कि नगर परिषद कार्यालय से एलईडी लैंप चोरी का मामला दर्ज है। नए बसस्टैंड तालाब से जलकुंभी हटाने पर लाखों खर्च किए गए। जलकुंभी कंठाल नदी में फैलकर किटखेड़ी तक पहुंच गई है। इससे नलजल योजना का पानी दूषित हो रहा है। एक दिन पहले हुई थी प्रेस कॉन्फ्रेंस  सुसनेर डाक बंगला स्थित विश्राम गृह पर आयोजित प्रेस वार्ता में सत्तापक्ष के भीतर गहराते असंतोष को को लेकर पार्षदों और उनके प्रतिनिधियों ने एक स्वर में अध्यक्ष पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए उन्हें कुर्सी से हटाने की कसम खाई। उनको कहना था कि अब उनका धैर्य जवाब दे चुका है। वे अध्यक्ष को हटाने के लिए किसी भी हद तक जाएंगे। इस बार विपक्षी कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा के पार्षद भी अध्यक्ष के विरोध में खड़े दिख रहे थे। प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए आरोप प्रेस वार्ता के दौरान पार्षदों ने आरोप लगाया कि परिषद में ई-रिक्शा की खरीदी से लेकर लोहे की हाथ गाड़ियों, एलईडी लाइटों और मरम्मत कार्यों में बड़े पैमाने पर कथित तौर पर अनियमितताएं हुई हैं। पार्षदों ने कहा कि मरम्मत के नाम पर दो वर्षों में लगभग 20 लाख रुपए का भुगतान किया गया, लेकिन सुधार कार्य कहीं दिखाई नहीं दे रहे। लक्ष्मी सिसोदिया ने नकारे आरोप सुसनेर पार्षदों के आरोपों को परिषद अध्यक्ष लक्ष्मी राहुल सिसोदिया सिरे से नकार दिया। उनका कहना है कि पार्षदों के आरोप पूरी तरह निराधार हैं। विकास और निर्माण कार्य नियमानुसार हुए हैं। विधायक भैरोंसिंह परिहार ने कहा कि सिसोदिया को उनकी ही पार्टी के लोग पद से हटाने की कोशिश कर रहे थे। उनके कांग्रेस में शामिल होने से पार्टी और मजबूत होगी।

पूर्व CM कमलनाथ बोले, सिंधिया को लगा दिग्विजय सरकार चला रहे थे, इसलिए बगावत

भोपाल  2020 में मध्य प्रदेश कांग्रेस सरकार गिरने की वजह का खुलासा पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पांच साल बाद किया है. कमलनाथ ने कहा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को लगता था कि सरकार दिग्विजय सिंह चला रहे हैं, जिसके चलते उन्होंने कांग्रेस के 22 विधायकों को तोड़कर सरकार गिरा दी. इस बयान ने मध्य प्रदेश की सियासत में हलचल मचा दी है. दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने हाल ही में MPTAK के पॉडकास्ट में बताया कि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच मतभेद विचारधारा (आइडियोलॉजिकल) नहीं, बल्कि व्यक्तिगत (पर्सनालिटी) थे. वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय ने बताया कि उन्होंने कई बार दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की कोशिश की. यहां तक कि एक उद्योगपति के घर डिनर मीटिंग आयोजित कर कई मुद्दों पर सहमति बनाई गई और एक 'विशलिस्ट' तैयार हुई, जिसमें ग्वालियर-चंबल संभाग से जुड़े मुद्दों पर सहयोग का आश्वासन भी था. दिग्विजय सिंह ने कहा कि उन्होंने भी उस लिस्ट पर दस्तखत किए थे, लेकिन बाद में उसका कोई पालन नहीं हुआ. इसी वजह से विवाद बढ़ा और सरकार गिर गई. दिग्विजय ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने सरकार गिरने की चेतावनी पहले ही दी थी, न कि भरोसा दिलाया था कि सरकार बचेगी.  अब दिग्विजय सिंह के इस बयान के बाद राजनीति गरमा गई है. कमलनाथ ने भी कड़ा पलटवार किया है. कमलनाथ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर लिखा, ''मध्य प्रदेश में 2020 में मेरे नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार गिरने को लेकर हाल ही में कुछ बयानबाजी हुई है. मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि पुरानी बातें उखाड़ने से कोई फायदा नहीं. लेकिन यह सच है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया को लगता था कि सरकार दिग्विजय सिंह चला रहे हैं. इसी नाराजगी में उन्होंने कांग्रेस के विधायकों को तोड़ा और हमारी सरकार गिराई.'' 2018 में सरकार बनी, 2020 में गिरी बता दें कि साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 114 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की थी, जबकि BJP को 109 सीटें मिली थीं. बसपा (2), सपा (1) और निर्दलियों (4) के समर्थन से कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनी. लेकिन डेढ़ साल बाद मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने 22 समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर BJP में शामिल हो गए, जिसके बाद कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई और 20 मार्च 2020 को गिर गई.  BJP ने कहा- अब सच्चाई सामने है इस मुद्दे पर BJP ने भी प्रतिक्रिया दी. पार्टी के प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल ने कहा, ''अब सच्चाई सामने है कि कांग्रेस की कमलनाथ सरकार मिस्टर बंटाधार चला रहे थे. सरकार पर माफियाओं और भ्रष्टाचार का शिकंजा था. कुशासन और अव्यवस्था का बोलबाला था. इसलिए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश को बचाने और सुशासन व विकास की पटरी पर लाने के लिए भाजपा की स्थिर सरकार बनाई.''  BJP मीडिया प्रभारी ने यह भी आरोप लगाया कि कमलनाथ का बयान कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी और दिग्विजय सिंह के प्रभाव को उजागर करता है. 

कांग्रेस में स्थिरता का संकेत, राहुल गांधी बोले- 6 महीने तक नहीं होंगे बदलाव

भोपाल  लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश के नवनिर्वाचित कांग्रेस जिलाध्यक्षों को किसी का रिमोट न बनने को कहा, साथ ही गुटबाजी और अपनी-अपनी चलाने वाले बड़े नेताओं को समन्वय की नसीहत भी दी है। संगठन सृजन अभियान के अंतर्गत शहर और ग्रामीण मिलाकर बने मध्य प्रदेश के कुल 71 जिलाध्यक्षों के प्रशिक्षण में रविवार को राहुल ने यह भी कहा कि छह महीने तक जिलाध्यक्षों के कामों का मूल्यांकन किया जाएगा, तब तक किसी को भी नहीं बदला जाएगा। उल्लेखनीय है कि जिलाध्यक्षों के चयन को लेकर कई जिलों में किए जा रहे विरोध के बीच राहुल गांधी का यह कहना महत्वपूर्ण है। उन्होंने पार्टी नेताओं और जिलाध्यक्षों से कहा कि गुटबाजी नहीं समन्वय से काम करें। जिलाध्यक्ष सत्ता परिवर्तन नहीं, व्यवस्था परिवर्तन में जुटें। वे देखें कि लोगों को उनके संवैधानिक अधिकार मिल पा रहे हैं या नहीं। किसी वर्ग का हक तो नहीं मारा जा रहा है। उन्होंने जिलाध्यक्षों से कहा, किसी का रिमोट मत बनना। आपको संगठन ने बैठाया है, किसी नेता ने नहीं। नई दिल्ली में हुए इस एक दिनी प्रशिक्षण कार्यक्रम को उन्होंने एक घंटे संबोधित किया। प्रशिक्षण 10 घंटे चला। प्रशिक्षण शिविर में पार्टी की सोशल मीडिया विभाग की प्रमुख सुप्रिया सीनेत ने स्थानीय मु्द्दों को पोस्ट करने के लिए कहा। पहले तीन नेता टिकट बांट देते थे, अब ऐसा नहीं होगा राहुल गांधी ने कहा कि पहले दो-तीन बड़े नेता विधानसभा और लोकसभा के टिकट बांट देते थे। अब ऐसा नहीं होगा। टिकट में जिलाध्यक्षों की अनुशंसा महत्वपूर्ण रहेगी। उनके पास किसी की अनुशंसा के पीछे तर्क और तथ्य रहेंगे। जिलाध्यक्ष कांग्रेस की नींव बनेंगे। उनके नीचे जो संगठन बूथ स्तर तक बनेगा में उसमें युवा, महिला और सभी वर्गों को स्थान दिया जाएगा। हमें विचारधारा के आधार पर सत्ता में आना है। जिलाध्यक्ष का चेहरा अनुशासन वाला हो : खरगे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा जिला अध्यक्ष व उनके नीचे की टीम अनुशासित रहे। कई बार बड़े नेताओं को कठोर और नीतिगत निर्णय लेने पड़ते हैं, जो हमे अच्छे नहीं लगते पर पार्टी के लिए आवश्यक होते हैं। गुटबाजी से दूर रहे हैं। जिलाध्यक्षों का चयन संगठन सृजन के अंतर्गत पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के आधार पर हुआ है। एआईसीसी मुख्यालय के बाहर इंदौर ग्रामीण अध्यक्ष वानखेड़े के विरोध में प्रदर्शन राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे जब दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में जिला अध्यक्षों को अनुशासन का पाठ पढ़ा रहे थे तो बाहर अनुशासन टूट रहा था। 100 से अधिक कार्यकर्ता इंदौर ग्रामीण के अध्यक्ष विपिन वानखेड़े को हटाने के लिए प्रदर्शन कर रहे थे। उनका कहना था कि बाहरी नेता को यह जिम्मेदारी गई है।

सहमति बनते ही चर्चा में सीट शेयरिंग, जानें चिराग पासवान का संभावित हिस्सा

पटना  बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है, और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में सीट बंटवारे को लेकर चर्चाएं अंतिम चरण में हैं। सूत्रों के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और जनता दल (यूनाइटेड) (जद(यू)) में सीट शेयरिंग को लेकर सहमति बन गई है। दोनों पार्टियों को 243 सीटों में से प्रत्येक को 100-105 सीटें लड़ने को मिल सकती हैं। चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) (एलजेपी (आरवी)) ने 40 सीटों की मांग की है, लेकिन उसे करीब 20 सीटें ही मिलने की संभावना है। बाकी सीटें जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) (एचएएम (एस)) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) को दी जा सकती हैं। जद(यू) की बराबरी की मांग 2020 के विधानसभा चुनाव में जद(यू) ने 115 और बीजेपी ने 110 सीटों पर चुनाव लड़ा था। तब विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) ने 11 और एचएएम (एस) ने 7 सीटों पर चुनाव लड़ा। बीजेपी ने 74 सीटें जीतीं, जबकि जद(यू) को 43 सीटों से संतोष करना पड़ा। इस बार जद(यू) बीजेपी के बराबर सीटें चाहता है, क्योंकि उसका मानना है कि उसकी 10% वोट हिस्सेदारी, खासकर अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) में, उसे गठबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है। एक वरिष्ठ एनडीए नेता ने कहा, 2020 में एलजेपी ने जद(यू) के खिलाफ उम्मीदवार उतारकर उसका नुकसान किया। इस बार नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जा रहा है, और जद(यू) बीजेपी से कम सीटों पर समझौता नहीं करेगा।   चिराग पासवान की बढ़ती मांग एलजेपी (आरवी) ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पांचों सीटें जीतकर और 29 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल कर अपनी ताकत दिखाई थी। चिराग पासवान 40 सीटों की मांग कर रहे हैं, लेकिन बीजेपी इसके ​लिए राजी नहीं है। एक बीजेपी नेता ने कहा कि एलजेपी के पांच सांसद हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में स्थानीय कारक और जमीनी ताकत ज्यादा मायने रखती है। 20 सीटें उनके लिए उचित हैं। 2020 में एलजेपी ने 135 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल एक सीट (मटिहानी) जीती और 5.66% वोट हासिल किए। तब उसने जद(यू) के खिलाफ उम्मीदवार उतारकर 27 सीटों पर उसे नुकसान पहुंचाया। वीआईपी का संभावित पलटवार मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) जो अभी महागठबंधन (आरजेडी-कांग्रेस) का हिस्सा है के एनडीए में शामिल होने की अटकलें हैं। अगर वीआईपी एनडीए में आती है, तो सीट बंटवारे का समीकरण बदल सकता है। 2020 में वीआईपी ने एनडीए के साथ 11 सीटों पर चुनाव लड़ा था। वीआईपी का निषाद समुदाय में प्रभाव है, जो पूर्वी बिहार में महत्वपूर्ण वोट बैंक है। नीतीश के नेतृत्व पर दांव एनडीए की रणनीति नीतीश कुमार को फिर से मुख्यमंत्री बनाने पर केंद्रित है। जद(यू) का कहना है कि नीतीश का ईबीसी और कुर्मी समुदाय में प्रभाव एनडीए की जीत के लिए जरूरी है। दूसरी ओर, चिराग पासवान ने नीतीश सरकार के कानून-व्यवस्था रिकॉर्ड की आलोचना कर सीटों के लिए दबाव बनाया है। एलजेपी (आरवी) का लक्ष्य लंबे समय में 15% वोट हिस्सेदारी हासिल करना है। जातिगत समीकरण और स्थानीय मुद्दे बिहार में जातिगत समीकरण और स्थानीय मुद्दे, जैसे बेरोजगारी और पलायन, चुनाव को जटिल बनाते हैं। एनडीए अपनी सामाजिक गठबंधन रणनीति (ऊंची जातियां, गैर-प्रमुख ओबीसी, और दलित) के साथ मजबूत स्थिति में है। लेकिन, अगर सीट बंटवारे में छोटे सहयोगी नाराज होते हैं, तो नुकसान हो सकता है। दूसरी ओर, महागठबंधन तेजस्वी यादव के नेतृत्व में युवा और पिछड़े वर्गों को लुभाने की कोशिश कर रहा है।

राजनीतिक विचार भिन्नता लोकतंत्र का हिस्सा, लेकिन अपशब्द अस्वीकार्य—संजय निरुपम

मुंबई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के खिलाफ दर्ज एफआईआर ने देश में सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। इस मुद्दे पर शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने बड़ा बयान दिया है। शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने तेजस्वी यादव की टिप्पणी को अनुचित ठहराते हुए कहा कि राजनीति में वैचारिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन मर्यादा तोड़कर अभद्र टिप्पणियां करना अस्वीकार्य हैं। उन्होंने कहा, “विरोध करना हर नेता का अधिकार है, लेकिन किसी पर व्यक्तिगत लांछन लगाना गलत है। तेजस्वी यादव की टिप्पणी सभ्य समाज के लिए शोभनीय नहीं है। नेताओं को संयमित भाषा का प्रयोग करना चाहिए और इस प्रकार की टिप्पणी से बचना चाहिए।” संजय निरुपम ने सभी नेताओं से संयमित भाषा का उपयोग करने और ऐसी टिप्पणियों से बचने की अपील की। उन्होंने जोर देकर कहा कि राजनीति में मर्यादा और शालीनता बरकरार रखना आवश्यक है, ताकि जनता के बीच सही संदेश जाए। वहीं, कर्नाटक में एक अलग घटनाक्रम ने सियासी हलचल मचा दी है। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने गुरुवार को राज्य विधानसभा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की प्रार्थना गाकर सभी को हैरान कर दिया। इस घटना ने राजनीतिक गलियारों में तमाम तरह की चर्चाओं को जन्म दे दिया हैं। इस पर टिप्पणी करते हुए शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने कहा, “यदि कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री या कोई अन्य व्यक्ति आरएसएस का प्रार्थना गाता है, तो इसमें कोई पाप नहीं है। आरएसएस 1925 से देश में व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्रभक्ति की भावना जगाने का कार्य कर रहा है। यह एक लोकप्रिय और राष्ट्रवादी संगठन है।” उन्होंने कहा कि आरएसएस को गलत ठहराने वाले ज्यादातर वामपंथी और उनके प्रभाव में कांग्रेस से जुड़े लोग हैं। संजय निरुपम ने जोर देकर कहा कि किसी विचारधारा से असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन उसे देशविरोधी करार देना उचित नहीं है।

बिना नाम लिए फडणवीस का हमला, विपक्ष पर लगाया आरोप देश और राज्य की बदनामी का

मुंबई  मुंबई में शनिवार को 'राखी प्रदान' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने महिलाओं को सम्मानित किया। उन्होंने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विपक्ष पर निशाना साधा। सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि अभी भी कुछ लोग संतुष्ट नहीं हुए हैं। वे सुधारने को तैयार नहीं हैं। वे रोज कहते हैं कि वोटर चोरी हो गई, लेकिन इनका दिमाग चोरी हो गया है। ऐसे लोगों को भगवान सद्बुद्धि दे। उन्होंने कहा कि अगर ये लोग सच में हमारी लाडली बहनों के वोटों को चोरी कर रहे हैं तो इनसे बड़ा चोर कोई नहीं है। फडणवीस ने बिना नाम लिए विपक्ष पर हमला करते हुए कहा कि ये लोग पहले विदेश में जाकर भारत की बदनामी कर रहे थे और अब बिहार में जाकर महाराष्ट्र की बदनामी कर रहे हैं, लेकिन इन्हें किसी ने न तो विदेश में पूछा और न ही बिहार में कोई पूछने वाला है। उनकी जो स्थिति महाराष्ट्र चुनाव में हुई थी, वही बिहार में भी होने वाली है। इससे पहले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे ने गुरुवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से उनके आधिकारिक 'वर्षा' बंगले पर मुलाकात की थी। राज ठाकरे ने स्पष्ट किया था कि इस मुलाकात का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था, बल्कि यह पूरी तरह से नगर नियोजन और ट्रैफिक जाम से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने के लिए थी। मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात के बाद कहा कि पिछले कुछ महीनों से मेरी कुछ मुद्दों पर मुख्यमंत्री से चर्चा चल रही थी। टाउन प्लानिंग मेरे लिए एक महत्वपूर्ण विषय है, हालांकि मुझे नहीं पता कि मीडिया को इस मुद्दे में कितनी दिलचस्पी होगी। राज ठाकरे ने कहा कि किसी भी शहर के ट्रैफिक के हालात देखकर उसके भविष्य का अंदाजा लगाया जा सकता है। मुंबई, ठाणे और पुणे या किसी भी अन्य शहर को देख लीजिए, सब जगह प्लानिंग की समस्या है और जनसंख्या बढ़ी है। सड़कों पर अतिक्रमण की समस्या भी विकराल रूप ले चुकी है। उन्होंने कहा, "आज जहां 50 लोग रहते थे, वहां 500 लोग रहते हैं। आबादी बढ़ी है, कारों की संख्या बढ़ी है, और यातायात भी बढ़ा है।कचरा बढ़ गया है, जो अब सड़कों पर आ रहा है और शहर पूरी तरह से अस्त-व्यस्त है।"

सीएम समेत कई दिग्गज OBC नेता जाएंगे बिहार, चुनावी मैदान में MP का असर

भोपाल  बिहार की सियासत पर जैसे-जैसे चुनावी रंग गहराता जा रहा है, वैसे-वैसे दूसरे राज्यों के बड़े नेता भी वहां की जमीन पर उतरने लगे हैं। मध्य प्रदेश इस बार ख़ास में है, क्योंकि यहां के ओबीसी चेहरे चुनावी मैदान में अहम भूमिका निभाने वाले है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने प्रचार और प्रबंधन की कमान अपने-अपने भरोसेमंद नेताओं को सौंपने की रणनीति बनाई है।  भाजपा से सीएम मोहन और मंत्री शिवराज होंगे स्टार प्रचारक भाजपा सीएम मोहन यादव को बिहार के यादव वोटबैंक के सामने बड़ा चेहरा बनाने की की योजना बना रही है। यूपी-बिहार की राजनीति में यादव वंश के प्रभाव को चुनौती देने का जिम्मा मोहन यादव के कन्धों पर होगा। सीएम यादव इससे पहले महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में प्रचार कर चुके है। वहीँ, केंद्रीय कृषि मंत्री और पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान की किसान हितैषी और संवेदनशील नेता की छवि बिहार में भाजपा के लिए हथियार साबित हो सकती है। मखाना किसानों के लिए उनके प्रयास और गरीबों के प्रति लगाव उन्हें वहां विशेष लोकप्रियता दिलाता है। कांग्रेस चलेगी यादव-पटेल कार्ड दूसरी ओर कांग्रेस भी ओबीसी समीकरण को साधने में कोई कसार नहीं छोड़ना चाहती। कांग्रेस ने एमपी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव और उनके भाई सचिन यादव को बिहार चुनावी अभियान में अहम भूमिका देने की तैयारी की है। इसके अलावा राज्य सभा सांसद अशोक सिंह(यादव), पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल, वरिष्ठ नेता सत्यनारायण पटेल और दिनेश गुर्जर भी चुनावी मैदान में उतरेंगे। कांग्रेस ने बिहार के ओबीसी बहुल इलाकों को टारगेट करने की रणनीति बनाई है। इन नेताओं को लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा की जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं।

पूजा पाल ने अखिलेश यादव को लिखी चिट्ठी, जताया खतरे का संकेत, सपा पर लगाया जिम्मेदारी का आरोप

कौशांबी  यूपी में कौशांबी जिले की चायल सीट से विधायक पूजा पाल ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को चिट्ठी लिखी है. इस चिट्ठी में उन्होंने अपनी हत्या की आशंका जताई है. उन्होंने साफ कहा है कि यदि मेरी हत्या होती है तो इसके लिए समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव जिम्मेदार होंगे. पूजा पाल ने अपनी चिट्ठी में उल्लेख किया है कि उन्होंने जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य हासिल कर लिया है. उनके पति की हत्या के दोषियों को सजा मिल चुकी है. उन्होंने लिखा, मैंने अपना वास्तविक लक्ष्य प्राप्त कर लिया है, मेरे पति के हत्यारों को सजा मिल गई है. अब मुझे मौत भी मिले तो भी गर्व ही होगा. पत्र के अंतिम हिस्से में उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए लिखा कि अखिलेश यादव ने उन्हें बीच रास्ते में अपमानित करके छोड़ दिया है. इस कारण समाजवादी पार्टी के अपराधी समर्थकों का मनोबल काफी बढ़ गया है और ठीक वैसे ही जैसे उनके पति की हत्या हुई थी, वैसे ही उनकी हत्या भी हो सकती है. पूजा पाल ने पत्र में कहा, यदि ऐसा होता है तो मैं सरकार और प्रशासन से मांग करती हूं कि मेरी हत्या की वास्तविक दोषी समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव को ही माना जाए. कौन हैं पूजा पाल? पूजा पाल की शादी 16 जनवरी 2005 को राजू पाल से हुई थी. राजू इलाहाबाद (पश्चिमी) विधानसभा सीट से बसपा विधायक थे. शादी के महज 9 दिन बाद 25 जनवरी 2005 को राजू की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई. यह हत्या इलाहाबाद की सियासत में भूचाल लाने वाली घटना थी. पूजा पाल ने अपने पति की हत्या के बाद अतीक अहमद और उसके गुर्गों के खिलाफ FIR दर्ज कराई, जिसके चलते वो 'अतीक गैंग से लोहा लेने वाली' नेता के रूप में उभरीं. पति की हत्या के बाद उन्होंने उपचुनाव लड़ा लेकिन हार गईं. उसके बाद 2007 और 2012 में इलाहाबाद शहर (पश्चिम) से BSP से विधायक चुनी गईं. हालांकि 2017 में वे हार गईं. बाद में 2022 में सपा के टिकट पर चायल विधानसभा सीट से विधायक बनीं.

कमलनाथ सरकार गिरने की वजह बताते हुए दिग्विजय सिंह ने किया व्यक्तिगत खुलासा

भोपाल  पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश में 5 साल पहले कांग्रेस सरकार गिरने पर खुलकर बातचीत की और कमलनाथ को जिम्मेदार ठहराया है. दिग्विजय ने आरोप लगाया कि कमलनाथ ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की वो मांग नहीं मानी, जिस पर डिनर के दौरान सहमति बनी थी. इसी कारण सरकार गिर गई. बातचीत में दिग्विजय ने कहा, इस बात का दुख है कि हमें जिन पर पूरा भरोसा था, उन लोगों ने धोखा दे दिया. आइडियोलॉजिकल क्लैश नहीं था. ये क्लैश ऑफ पर्सनालिटी हो गया. दिग्विजय से जब पूछा गया कि अगर कमलनाथ ग्वालियर-चंबल संभाग से जुड़ी मांगें मान लेते तो शायद यह नौबत नहीं आती? इस पर उन्होंने स्वीकार किया कि शायद फिर यह नौबत नहीं आती.  दरअसल, मध्य प्रदेश में 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बहुमत हासिल किया था और 15 साल के लंबे इंतजार के बाद सत्ता में वापसी की थी. पार्टी ने तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाया था. हालांकि, अंदरखाने नाराजगी की खबरें आती रहीं. इस बीच, 15 महीने बाद सिंधिया ने बगावत कर दी और बीजेपी में शामिल हो गए. कई विधायकों ने भी कांग्रेस छोड़ दी और सिंधिया खेमे में चले गए. जिससे कांग्रेस सरकार अल्पमत में आ गई और कमलनाथ को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा. दिग्विजय ने बताया- कैसे गिरी थी कमलनाथ सरकार? सियासी गलियारों में यह चर्चा जोरों पर रही कि दिग्विजय और सिंधिया के बीच लड़ाई के कारण कांग्रेस सरकार गिर गई. अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने कयासों पर विराम लगाया है. MPTak के साथ विशेष पॉडकास्ट में दिग्विजय ने पहली बार इस मामले में चुप्पी तोड़ी और बताया कि कमलनाथ की सरकार कैसे गिरी थी. उन्होंने एक इंडस्ट्रियलिस्ट के घर सिंधिया और कमलनाथ के डिनर की वो कहानी भी बताई. दिग्विजय से जब पूछा गया कि कहा जाता है कि आपकी वजह से कमलनाथ सरकार गिरी? इस पर उन्होंने कहा, ये प्रचारित किया गया कि मेरी और सिंधिया की लड़ाई की वजह से कमलनाथ की सरकार गिर गई. लेकिन सच्चाई ये नहीं है. मैंने चेताया था कि ऐसी घटना हो सकती है. दिग्विजय का कहना था कि मेरा दुर्भाग्य है कि शायद मेरी कुंडली में यह है कि मुझ पर हमेशा वह आरोप लगेगा जिसमें मैं दोषी नहीं हूं.  दिग्विजय ने सुनाई डिनर की वो कहानी दिग्विजय का कहना था कि एक बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट हैं. मैं उनका नाम नहीं लेना चाहूंगा. कमलनाथ और सिंधिया दोनों से उनके अच्छे संबंध हैं. मैं उनके पास गया और कहा कि देखिए इन दोनों की लड़ाई में हमारी सरकार गिर जाएगी. आप जरा संभालिए, क्योंकि आपके दोनों से अच्छे संबंध हैं. दिग्विजय ने बताया कि उनके घर डिनर रखा गया और मैं भी उसमें शामिल हुआ. मैंने बहुत कोशिश की कि ये मामला निपट जाए. वहां पर सभी इश्यूज को लेकर एक लिस्ट तैयार हुई, लेकिन उसका पालन नहीं हो पाया. ये बात सच है कि तमाम प्रयासों के बावजूद कमलनाथ सरकार नहीं बच पाई. मेरा ना माधवराव सिंधिया से कोई विवाद था, ना ज्योतिरादित्य से कोई विवाद था. दिग्विजय से पूछा गया कि डिनर मीटिंग में कौन-कौन मांगें रखी गईं थीं? उन्होंने कहा, छोटी-मोटी बातें हुईं थी. ये हुआ था कि ग्वालियर-चंबल संभाग में जैसा हम दोनों कहेंगे, वैसा कर देंगे. हम दोनों ने दूसरे दिन विशलिस्ट बनाकर दे दिया, मैंने भी दस्तखत किए. लेकिन विशलिस्ट का पालन नहीं हुआ. 

बिहार में मतदाता सूची विवाद: कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का किया समर्थन

नई दिल्ली बिहार की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम काटे जाने (एसआईआर मुद्दे) को लेकर कांग्रेस पार्टी ने आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। कांग्रेस ने कहा कि यह फैसला लोकतंत्र पर हुए एक कठोर हमले से देश को बचाने वाला है और चुनाव आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली को पूरी तरह उजागर कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश 14 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि काटे गए मतदाताओं की पूरी सूची सार्वजनिक की जाए। इसके साथ ही सूची के साथ-साथ नाम काटने की वजह भी बताई जाए। कोर्ट ने या भी कहा कि जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, वे आधार कार्ड को पहचान पत्र के तौर पर दिखाकर मतदान कर सकें। आज अदालत ने अपने ही आदेश को दोहराते हुए साफ कहा कि चुनाव आयोग को आधार कार्ड को वैध पहचान पत्र मानना ही होगा। कोर्ट के फैसले पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया कांग्रेस ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा, 'आज सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र को सुरक्षित किया है। चुनाव आयोग ने अब तक बाधा डालने वाली और मतदाताओं के अधिकारों के खिलाफ काम करने वाली भूमिका निभाई थी। लेकिन अब अदालत ने राजनीतिक दलों को भी इस पूरी प्रक्रिया में शामिल करने का रास्ता खोल दिया है। यह एक ऐतिहासिक कदम है।' कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अब उन्हें एक लागू होने योग्य अधिकार मिल गया है जिसे चुनाव आयोग अनदेखा नहीं कर सकता। चुनाव आयोग पर तीखा हमला कांग्रेस ने सीधे चुनाव आयोग पर निशाना साधते हुए कहा- 'आज चुनाव आयोग पूरी तरह बेनकाब और बदनाम हो चुका है। उसके पीछे के 'जी-2 कठपुतली संचालक' भी पूरी तरह पराजित हो गए हैं।'