samacharsecretary.com

नक्सल लीडर का जाल: एक छिपा, दूसरा फरार, कई ने सरेंडर किया, बस अंतिम चोट बाकी

  बस्तर छत्तीसगढ़ में बस्तर के घने जंगलों से इस समय जो खबरें सामने आ रही हैं, वे नक्सल आंदोलन के इतिहास में निर्णायक मोड़ का संकेत दे रही हैं. वर्षों तक सुरक्षाबलों के लिए चुनौती बने शीर्ष नक्सली नेताओं का नेटवर्क अब तेजी से कमजोर पड़ता दिख रहा है. ताजा घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संगठन के भीतर दबाव बढ़ चुका है और नेतृत्व स्तर पर अस्थिरता साफ दिखाई दे रही है।  सूत्रों के अनुसार, नक्सल आंदोलन का बड़ा चेहरा माने जाने वाले गणपति के बारे में देश छोड़कर नेपाल में भागने  की ख़बर है, जबकि उसका करीबी सहयोगी मिशिर झारखंड में छिपा हुआ बताया जा रहा है. सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इन दोनों तक पहुंच बनते ही नक्सल संगठन के शीर्ष नेतृत्व को बड़ा झटका लगेगा. इसी दिशा में केंद्रीय और राज्य स्तर की एजेंसियां समन्वित रणनीति के साथ लगातार अभियान चला रही हैं।  इसी बीच बस्तर से एक और बड़ी खबर सामने आई है. लंबे समय से सक्रिय और प्रभावशाली नक्सली कमांडर पापा राव बुधवार को अपने 18 साथियों के साथ सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर रहा है. यह घटनाक्रम केवल औपचारिक आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि नक्सल आंदोलन के कमजोर पड़ते मनोबल का स्पष्ट संकेत है. वर्षों तक संगठन में सक्रिय रहे पापा राव पर कई गंभीर मामलों में संलिप्तता रही और वह सुरक्षाबलों की वॉन्टेड लिस्ट में शामिल था। सुरक्षा बलों की रणनीति में बदलाव पिछले कुछ वर्षों में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की रणनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. अब केवल मुठभेड़ों पर निर्भर रहने के बजाय खुफिया तंत्र को मजबूत किया गया. स्थानीय लोगों के साथ विश्वास का रिश्ता बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया है. इसका परिणाम यह हुआ कि संगठन के भीतर दरारें उभरने लगी हैं. कई नक्सली अब मुख्यधारा में लौटने का निर्णय ले रहे हैं।  सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हाल के समय में सैकड़ों नक्सली मारे गए हैं. हजारों ने आत्मसमर्पण किया और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां भी हुई हैं. इन आंकड़ों से साफ है कि नक्सल संगठन की ताकत लगातार घट रही है. अब स्थिति यह है कि शीर्ष स्तर के नेता भी खुद को सुरक्षित नहीं मान रहे हैं।  एक समय था जब दंतेवाड़ा, नारायणपुर, बीजापुर और सुकमा जैसे जिले नक्सल गतिविधियों के गढ़ माने जाते थे. अब इन क्षेत्रों में विकास कार्यों ने नई तस्वीर पेश की है. सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर बढ़ने से स्थानीय युवाओं का रुझान हिंसा से हटकर मुख्यधारा की ओर बढ़ रहा है।  क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट? विशेषज्ञों का मानना है कि नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के पीछे दो मुख्य कारण हैं- सुरक्षाबलों की सटीक और निरंतर कार्रवाई, सरकार की पुनर्वास और विकास आधारित नीतियां. सरेंडर करने वाले नक्सलियों को नई शुरुआत का अवसर देने की पहल ने भी इस दिशा में सकारात्मक प्रभाव डाला है।  हालांकि, यह भी सच है कि नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. अभी भी कुछ दूरदराज के इलाकों में इसकी उपस्थिति बनी हुई है. लेकिन जिस तरह से शीर्ष नेतृत्व बिखर रहा है और कैडर टूट रहा है, उससे यह संकेत स्पष्ट है कि संगठन अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रहा है।  सुरक्षा एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इस मौके को निर्णायक सफलता में बदला जाए. इसके लिए खुफिया तंत्र को और मजबूत करना, स्थानीय जनता का विश्वास बनाए रखना और विकास कार्यों की गति को लगातार बनाए रखना आवश्यक होगा।  बस्तर से लेकर झारखंड तक के हालिया घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है. यदि इसी तरह प्रयास जारी रहे, तो निकट भविष्य में इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है।  फिलहाल, पापा राव का आज अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण और गणपति-मिशिर जैसे शीर्ष नेताओं की तलाश ने पूरे नक्सल नेटवर्क में हलचल मचा दी है. आने वाले दिन इस संघर्ष की दिशा तय करने में बेहद अहम साबित होंगे।  नक्सल नेतृत्व तेजी से खत्म देश में चल रहे नक्सल विरोधी ऑपरेशन के चलते अब नक्सली संगठन का टॉप नेतृत्व तेजी से खत्म हो रहा है. सुरक्षा एजेंसियों के ऑपरेशन में कई बड़े नक्सली कमांडर मारे गए हैं. कई बड़े नेता सरेंडर भी कर चुके हैं. स्थिति यह है कि अब कई इलाकों में नक्सलियों के बड़े नेता ही नहीं बचे हैं।  सुरक्षा बलों की रिपोर्ट के अनुसार 2025 में नक्सलियों की सेंट्रल कमेटी के 11 सदस्य मारे गए, जो संगठन के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं. यह नक्सल संगठन के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है।  ये टॉप नक्सली कमांडर ढेर सुरक्षा बलों की  रिपोर्ट के अनुसार जिन बड़े नक्सली नेताओं को ऑपरेशन में मारा गया, उनमें प्रमुख नाम शामिल हैं: सुधाकर हिडमा दामोदर विकास सुदर्शन अनिल रवि मोहन रमेश शंकर अन्य सेंट्रल कमेटी सदस्य (इनमें कई सेंट्रल कमेटी और स्टेट कमेटी स्तर के नेता शामिल थे) गिरफ्तार और सरेंडर रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, अब तक 463 नक्सली मारे गए हैं. 1600 गिरफ्तार किए जा चुके हैं और करीब 2500 ने सरेंडर किया है. ये आंकड़े बताते हैं कि संगठन कमजोर हो रहा है।  बड़े नक्सलियों का सरेंडर 2025-26 में कई बड़े नक्सली नेताओं ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें प्रमुख हैं- पापा राव आज 18 नक्सलियों के साथ  सरेंडर कर रहा (बड़ा नक्सली कमांडर) है. इसके अलावा, कई स्टेट कमेटी, एरिया कमेटी और डिविजनल कमांडर स्तर के नक्सली सरेंडर कर चुके हैं. इनमें  टॉप 5 बड़े नक्सली नेता शामिल हैं।  सुरक्षा बलों की रिपोर्ट के अनुसार, दंतेवाड़ा और नारायणपुर में अब बड़े नक्सली लीडर नहीं बचे. कांकेर-बीजापुर में भी कई एरिया कमेटी खत्म किए जा चुके हैं. बड़े नेता नेपाल और झारखंड भाग रहे हैं. सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि जल्द ही नक्सल नेतृत्व पूरी तरह खत्म हो जाएगा. इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से 31 मार्च 2026 तक की गई है, जिसका मात्र 6 दिन बचा हुआ है।   

जल संरक्षण और जनकल्याण को दी सर्वोच्च प्राथमिकता

भोपाल  मंत्री  टेटवाल ने सारंगपुर में उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में विकास कार्यों, आधारभूत संरचना, जल संरक्षण और जनकल्याणकारी योजनाओं की प्रगति का समग्र मूल्यांकन किया। बैठक में विभिन्न विभागों की कार्यप्रणाली की विभागवार समीक्षा करते हुए प्रशासनिक दक्षता, समयबद्धता और गुणवत्ता को केंद्र में रखने के निर्देश दिए गए। मंत्री  टेटवाल ने स्पष्ट कहा कि विकास कार्य केवल स्वीकृतियों तक सीमित न रहें, बल्कि धरातल पर परिणाम दिखाई दें। सभी निर्माण कार्य निर्धारित समय-सीमा में पूर्ण हों, पूर्ण परियोजनाओं का त्वरित हस्तांतरण हो और उनका प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने दोहराया कि लापरवाही या अनावश्यक विलंब की स्थिति में जवाबदेही तय की जाएगी। जल संरक्षण को दी रणनीतिक दिशा जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत संचालित जल संरचनात्मक कार्यों की समीक्षा करते हुए मंत्री  गौतम टेटवाल ने वर्षा जल संचयन, नाला उपचार और भू-जल संवर्धन से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता से पूर्ण करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण को जनांदोलन का स्वरूप देना आवश्यक है, जिससे दीर्घकालीन जल सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। नदियों के पुनर्जीवन और श्रमदान आधारित पहलों में व्यापक जनसहभागिता पर बल दिया गया। निर्माण कार्यों में गुणवत्ता और अनुशासन पेयजल, शिक्षा एवं अन्य आधारभूत परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा करते हुए मंत्री  टेटवाल ने लंबित कार्यों को शीघ्र पूर्ण करने के निर्देश दिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि अधूरे या विलंबित कार्य जनता के विश्वास को प्रभावित करते हैं, इसलिए गुणवत्ता और समयबद्धता दोनों पर समान रूप से ध्यान दिया जाए। आवश्यकता होने पर संबंधित एजेंसियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही सुनिश्चित करने को कहा गया। कृषि और पर्यावरणीय संतुलन पर विशेष फोकस प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, किसानों को प्रशिक्षण उपलब्ध कराने और पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों के विस्तार पर जोर दिया गया। नरवाई जलाने पर रोक के लिए प्रभावी जागरूकता अभियान संचालित करने और निगरानी तंत्र को सुदृढ़ करने के निर्देश दिए गए। ‘हरित सारंगपुर’ के लक्ष्य के अंतर्गत व्यापक पौधारोपण को सामाजिक दायित्व के रूप में अपनाने का आह्वान किया गया। जनसेवाओं की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश बैठक में विद्युत, स्वास्थ्य और पेयजल सेवाओं की समीक्षा करते हुए आवश्यक संस्थानों में निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने पर बल दिया गया। स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ करने तथा टीकाकरण जैसे अभियानों को गति देने के निर्देश दिए गए। ग्रीष्मकालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पेयजल स्रोतों की मरम्मत, संरक्षण और वैकल्पिक व्यवस्थाओं की अग्रिम तैयारी सुनिश्चित करने को कहा गया। साथ ही आगामी सामूहिक विवाह एवं निकाह कार्यक्रम की तैयारियों की समीक्षा कर सभी व्यवस्थाएं गरिमापूर्ण और सुव्यवस्थित रूप से सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। मंत्री  गौतम टेटवाल ने कहा कि शासन की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना प्रशासन की मूल प्रतिबद्धता है। उन्होंने अधिकारियों से अपेक्षा की कि वे समन्वित, पारदर्शी और परिणाम आधारित कार्यसंस्कृति के माध्यम से विकास की गति को स्थायी और प्रभावी स्वरूप दें।   

बस्तर के नन्हे ललित की आंखों में लौटी रोशनी जिला अस्पताल में हुआ जन्मजात मोतियाबिंद का सफल ऑपरेशन

रायपुर जिला अस्पताल में हुआ जन्मजात मोतियाबिंद का सफल ऑपरेशन बस्तर के नौ वर्षीय बालक ललित मौर्य के जीवन में अब खुशियों का एक नया सवेरा हुआ है। जिले के विकासखंड बस्तर के अंतर्गत ग्राम पंचायत नदीसागर के आश्रित ग्राम पराली का निवासी ललित जन्म से ही मोतियाबिंद जैसी गंभीर समस्या से जूझ रहा था। इस जन्मजात विकार के कारण वह दुनिया की खूबसूरती देखने में पूरी तरह असमर्थ था और उसका बचपन अंधेरे के साये में बीत रहा था। हालांकि ललित के मोतियाबिंद की पहचान पूर्व में ही हो गई थी, लेकिन सर्जरी को लेकर मन में बैठे डर और संशय के कारण उसके परिजन ऑपरेशन के लिए तैयार नहीं हो रहे थे।       ललित के उजाले की ओर बढ़ने का सफर 20 मार्च को बस्तर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में आयोजित दिव्यांग सशक्तिकरण शिविर से शुरू हुआ, जहाँ वह दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाने पहुँचा था। कलेक्टर  आकाश छिकारा की पहल पर आयोजित इस विशेष शिविर में स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान नेत्र विशेषज्ञों ने ललित की स्थिति को समझा। इस दौरान पलारी के नेत्र सहायक अधिकारी  अनिल नेताम ने विशेष सक्रियता दिखाते हुए परिजनों को ऑपरेशन के महत्व के बारे में विस्तार से समझाया। उनके अथक प्रयासों और निरंतर दी गई समझाइश का ही परिणाम था कि परिजन अंततः सर्जरी के लिए राजी हुए, जिसके बाद ललित को तत्काल बेहतर उपचार के लिए जिला अस्पताल रेफर किया गया।        कलेक्टर बस्तर  आकाश छिकारा के विशेष दिशा-निर्देशों के अनुरूप स्वास्थ्य विभाग ने तत्परता दिखाते हुए इस केस को प्राथमिकता दी। मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सेवा योजना और जिला प्रशासन के कुशल समन्वय से 24 मार्च को जिला महारानी अस्पताल जगदलपुर में डॉ सरिता थॉमस द्वारा ललित का सफल मोतियाबिंद ऑपरेशन संपन्न हुआ। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजय बसाक, सिविल सर्जन डॉ. संजय प्रसाद और जिला कार्यक्रम प्रबंधक कुमारी रीना लक्ष्मी के मार्गदर्शन में मेडिकल टीम ने इस चुनौतीपूर्ण सर्जरी को अंजाम दिया।       इस पुनीत कार्य में नेत्र सहायक अधिकारी कुमारी दिव्या पाण्डे,  सुंकर अमृत राव,  देवकरण व्यास सहित वार्ड इंचार्ज मती अन्नपूर्णा साहू और स्टाफ नर्स मती स्मृता कच्छ व नमिता मौर्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा। साथ ही ऑपरेशन थिएटर में सहायक  डोलेश्वर जोशी की सक्रियता ने इस पूरी प्रक्रिया को सुगम बनाया। ऑपरेशन के बाद जब ललित की आंखों से पट्टी हटाई गई, तो उसके चेहरे पर आई चमक ने पूरी मेडिकल टीम की मेहनत को सफल कर दिया। अब ललित न केवल अपनी आंखों से दुनिया को देख पा रहा है, बल्कि अपने परिजनों और आसपास की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से पहचानने भी लगा है। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की इस संवेदनशीलता ने एक मासूम के जीवन से अंधेरा मिटाकर एक परिवार के घर में उम्मीद का दीया जला दिया है।  

रामनवमी पर बदल जाता है हजारीबाग का रंग, चौक-चौराहों के नाम भी हो जाते हैं खास

हजारीबाग झारखंड के हजारीबाग में मनाई जाने वाली रामनवमी पूरे देश में अपनी अनोखी परंपरा के लिए जानी जाती है। यहां इस पर्व के दौरान पूरे शहर का रूप ही बदल जाता है, जिससे यह अयोध्या की झलक देता है। जिले में रामनवमी का त्योहार बहुत खास तरीके से मनाया जाता है। इस दौरान शहर के अलग-अलग मोहल्लों, चौक-चौराहों और सड़कों के नाम बदल दिए जाते हैं। इन जगहों को नए धार्मिक नाम दिए जाते हैं, जो अयोध्या के स्थानों से प्रेरित होते हैं। रामनवमी के समय शहर के कई प्रमुख चौक नए नामों से जाने जाते हैं। जैसे जादो बाबू चौक को परशुरामगढ़, कुआं चौक को भारतगढ़, झंडा चौक को दशरथगढ़, पंच मंदिर चौक को कृष्णगढ़, गोल चौक को अभिमन्युगढ़, ग्वालटोली चौक को नारायणगढ़ और सुभाष मार्ग को अंगदगढ़ कहा जाता है। इन नए नामों के बोर्ड भी लगाए जाते हैं। खास बात यह है कि रामनवमी जुलूस के दौरान लोग इन जगहों को उनके पुराने नाम से नहीं, बल्कि इन्हीं नए धार्मिक नामों से पुकारते हैं। इससे पूरा शहर एक धार्मिक माहौल में बदल जाता है। यह परंपरा कोई नई नहीं है, बल्कि करीब 100 साल से चली आ रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार, हजारीबाग के राम भक्त इस शहर को अयोध्या के रूप में देखते हैं। इसी वजह से यहां के चौक-चौराहों का नाम अयोध्या की तर्ज पर रखा जाता है। रामनवमी के मौके पर लाखों श्रद्धालु सड़कों पर निकलते हैं और भव्य जुलूस निकालते हैं। इस पूरे आयोजन की जिम्मेदारी रामनवमी महासमिति और अन्य समितियों की होती है, जो हर साल इसे और भव्य बनाने का काम करती हैं। आज भी यह परंपरा उतनी ही जोश और आस्था के साथ निभाई जा रही है। नई पीढ़ी भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है। यही वजह है कि हजारीबाग की रामनवमी देशभर में एक अलग पहचान रखती है।  

स्वास्थ्य विभाग एवं यूनिसेफ छत्तीसगढ़ के तकनीकी सहयोग से बच्चों में गैर-संचारी रोगों पर राज्य स्तरीय परामर्श आयोजित

रायपुर बच्चों में बढ़ते गैर-संचारी रोगों (एनसीडी), विशेषकर बाल मधुमेह, सिकल सेल रोग एवं जन्मजात हृदय रोग की रोकथाम, शीघ्र पहचान तथा प्रभावी प्रबंधन को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से रायपुर में  संजीव कुमार झा (संचालक, स्वास्थ्य सेवाएं) की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय परामर्श का आयोजन किया गया। इस परामर्श का मुख्य उद्देश्य राज्य में बाल स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त बनाना, बहु-विभागीय समन्वय को बढ़ावा देना तथा गुणवत्तापूर्ण उपचार एवं सुदृढ़ रेफरल सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना रहा। कार्यक्रम के दौरान बच्चों में एनसीडी की वर्तमान स्थिति, प्रमुख चुनौतियों एवं भावी प्राथमिकताओं पर विस्तृत चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने शीघ्र पहचान, दवाओं की सतत उपलब्धता, उपचार अनुपालन तथा मजबूत रेफरल तंत्र को सुदृढ़ करने पर विशेष बल दिया। सिकल सेल रोग प्रबंधन हेतु जशपुर मॉडल को एक प्रभावी एवं अनुकरणीय पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया। पैनल चर्चाओं में बाल मधुमेह एवं सिकल सेल रोग के समग्र प्रबंधन, निजी क्षेत्र की भागीदारी, सामुदायिक सहयोग तथा सामाजिक कलंक को कम करने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। समूह कार्य के माध्यम से प्रतिभागियों ने स्क्रीनिंग बढ़ाने, उपचार अनुपालन सुधारने तथा सेवा वितरण को अधिक प्रभावी बनाने हेतु व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथियों के रूप में AIIMS रायपुर एवं पं. जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय, रायपुर के विशेषज्ञों के साथ-साथ भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) एवं भारतीय शिशु रोग अकादमी (IAP) के प्रतिनिधियों ने भी सक्रिय सहभागिता निभाई। कार्यक्रम का सफल संचालन यूनिसेफ छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. गजेन्द्र सिंह के नेतृत्व में, एकम फाउंडेशन के सहयोग से किया गया। तकनीकी सत्रों में डॉ. खेमराज सोनवानी (उप संचालक, सिकल सेल), डॉ. वी.आर. भगत (उप संचालक, शिशु स्वास्थ्य)एवं  सुबोध धर शर्मा (राज्य सलाहकार, NP-NCD)  सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी एवं सलाहकार उपस्थित रहे। परामर्श में ट्राइबल वेलफेयर विभाग, स्कूल शिक्षा, समाज कल्याण विभाग, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के प्रतिनिधियों की सहभागिता से बहु-विभागीय समन्वय को और सुदृढ़ किया गया। सहयोगी संस्थाओं की ओर से विश्व स्वास्थ्य संगठन, संगवारी, क्लिंटन फाउंडेशन, NASCO, प्रतिनिधि जुवेनाइल डायबिटीज तथा पिरामल फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने भी सक्रिय योगदान दिया। इस राज्य स्तरीय परामर्श में कुल 50 प्रतिभागियों ने भाग लिया। साथ ही राज्य के उच्च प्राथमिकता वाले 8 जिलों—रायपुर, कांकेर, बिलासपुर, दुर्ग, कोरबा, महासमुंद, रायगढ़ एवं राजनांदगांव से जिला स्तर के प्रतिनिधि उपस्थित रहे, जिनमें जिला एनसीडी नोडल अधिकारी, सिकल सेल नोडल अधिकारी तथा एनसीडी सलाहकार/सहायक नोडल अधिकारी शामिल थे। इन प्रतिनिधियों ने अपने-अपने जिलों के अनुभव साझा करते हुए जमीनी स्तर की चुनौतियों एवं संभावित समाधान प्रस्तुत किए। अंत में प्रतिभागियों ने राज्य में बच्चों हेतु एनसीडी सेवाओं को और अधिक सुदृढ़ करने तथा बहु-विभागीय समन्वय के माध्यम से कार्ययोजना को प्रभावी रूप से आगे बढ़ाने की सहमति व्यक्त की गई। कार्यक्रम को सहयोग करने तथा सफल बनाने के लिए राज्य द्वारा यूनिसेफ की सराहना की गई और भविष्य में इस तरह के कार्यक्रम को करने के लिए विशेष सहयोग के लिए कहा गया।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को मिली अग्रिम जमानत, यौन शोषण मामले में कोर्ट का फैसला

प्रयागराज यौन शोषण के मामले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य स्वामी मुकुंदानंद गिरी को इलाहाबाद हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदनंद ब्रह्मचारी को यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत उनके खिलाफ दर्ज मामले में अग्रिम जमानत दे दी। यह आदेश न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा ने अविमुक्तेश्वरानंद और मुकुंदानंद की अग्रिम जमानत याचिका पर दिया है। कोर्ट ने शिकायतकर्ता और याची दोनों को इस संबंध में मीडिया के सामने कोई बयान नहीं देने का निर्देश भी दिया है। आपको बता दें कि आशुतोष ब्रह्मचारी की अर्जी पर विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट के आदेश के क्रम में अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ प्रयागराज के झूंसी थाने में पॉस्को एक्ट व बीएनएस की धाराओं में मुकदमा दर्ज़ किया गया। इस पर गिरफ्तारी से बचने के लिए अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से अग्रिम जमानत अर्जी दाखिल की गई है। पॉक्सो एक्ट की विशेष अदालत के आदेश पर झूंसी थाने में अविमुक्तेश्वरानंद व उनके शिष्य मुकुंदानंद समेत तीन अज्ञात के खिलाफ दर्ज मुकदमे की विवेचना के क्रम में पुलिस ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वालों का मेडिकल परीक्षण करवाया। पुलिस ने मेडिकल परीक्षण कराने की बात स्वीकार की। पुलिस सूत्रों का कहना है कि उम्र के साथ उनके द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोप से संबंधित जांच भी की गई है। पुलिस के मुताबिक इस बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि इस परीक्षण के बाद अभी फोरेंसिक जांच होना बाकी है, निष्कर्ष उसी से निकाला जा सकता है। पुलिस ने बताया कि गुरुवार को ही दोनों का मजिस्ट्रेट के सामने कलमबंद बयान भी हुआ है, जिसके बाद दोनों प्रयागराज से वापस चले गए। बयान में क्या निकला, इस बारे में अधिकृत तौर पर कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं है। फॉरेंसिक एक्सपर्ट व पोस्टमार्टम प्रभारी डॉ. राजीव रंजन ने बताया कि फॉरेंसिक चिकित्सा में 25 साल से कम उम्र की वास्तविक जानकारी के लिए दांत का एक्स-रे किया जाता है। साथ ही भौतिक रूप से दांतों की गिनती की जाती है। वहीं, 25 साल से अधिक उम्र के लोगों में गुस्ताफसन विधि का प्रयोग किया जाता है।  

अभियान अंतर्गत गतिविधियों की विभागवार प्रगति की समीक्षा

भोपाल  पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव  दीपाली रस्तोगी ने कहा है कि जल गंगा संवर्धन अभियान-2026 के लक्ष्यों का समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने अधिकारियों को जल गंगा संवर्धन अभियान के लिये शासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप कार्य करते हुए उद्देश्यों को प्रभावी रूप से पूरा करने के निर्देश दिए। अपर मुख्य सचिव  रस्तोगी विकास भवन, भोपाल में आयोजित समीक्षा बैठक में “जल गंगा संवर्धन अभियान-2026” के अंतर्गत संचालित गतिविधियों की विभागवार प्रगति की समीक्षा कर रही थीं। बैठक में आयुक्त म.प्र. राज्य रोजगार गारंटी परिषद  अवि प्रसाद ने सहभागी विभागों के उपस्थित अधिकारियों को बताया कि अभियान की प्रभावी मॉनिटरिंग एवं रिपोर्टिंग के लिए एक सिंगल डैशबोर्ड विकसित किया जा रहा है। इससे विभागों की प्रगति की नियमित समीक्षा के साथ विभागवार रैंकिंग भी की जाएगी।सहभागी विभागों द्वारा अभियान अंतर्गत संचालित गतिविधियों की जानकारी प्रस्तुत की गई। एमआईएस पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर विभागों ने अपने कार्यों की प्रगति से अवगत कराया। बैठक में जल संरक्षण, जल संवर्धन एवं जल प्रबंधन से संबंधित गतिविधियों को और अधिक प्रभावी बनाने और  जनभागीदारी बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। अधिकारियों ने बताया कि अभियान के तहत निर्धारित कार्यों की सतत निगरानी की जा रही है। “जल गंगा संवर्धन अभियान-2026” का प्रदेशभर में क्रियान्वयन 19 मार्च 2026 से प्रारंभ हो चुका है। अभियान का उद्देश्य जल संरक्षण एवं प्रबंधन से जुड़े कार्यों को जनसहभागिता के साथ प्रभावी रूप से लागू करना है। बैठक में पंचायत एवं ग्रामीण विकास, नगरीय प्रशासन, वन, जल संसाधन, नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, उद्यानिकी, किसान कल्याण एवं कृषि विकास, औद्योगिक नीति एवं निवेश प्रोत्साहन, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, पर्यावरण, महिला एवं बाल विकास, स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा, राजस्व, संस्कृति, जन अभियान परिषद एवं जनसंपर्क विभाग के अधिकारी उपस्थित रहे।

शून्य दुर्घटना पर कार्यशाला में दिया गया जोर

रायपुर शून्य दुर्घटना पर कार्यशाला में दिया गया जोर औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग द्वारा आज बिलासपुर के पं. देवकीनंदन दीक्षित सभागृह में आयोजित एकदिवसीय औद्योगिक सुरक्षा जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम में औद्योगिक इकाइयों में सुरक्षा को सर्वाेच्च प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया। कार्यक्रम में बिलासपुर के संभागायुक्त  सुनील जैन, कलेक्टर  संजय अग्रवाल, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक  रजनेश सिंह, आईएचएस के संचालक  मनीष वास्तव ने संबोधित किया। कार्यशाला में औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के डिप्टी डायरेक्टर विजय कुमार सोरी, प्रदेश के विभिन्न जिलों से औद्योगिक इकाइयों के प्रबंधन एवं कर्मचारी बड़ी संख्या में शामिल हुए। इस कार्यशाला का उद्देश्य क्षेत्र की स्पॉन्ज आयरन फैक्ट्रियों में सुरक्षा मानकों के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित करना था।       कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संभागायुक्त  सुनील जैन ने स्पष्ट कहा कि औद्योगिक सुरक्षा में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि उद्योगों का उद्देश्य केवल लाभ अर्जित करना नहीं, बल्कि देश के विकास में योगदान देने के साथ-साथ श्रमिकों के जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। दुर्घटनाएं भले ही क्षणिक होती हैं, लेकिन उनके दुष्परिणाम लंबे समय तक प्रभावित करते हैं। इसलिए औद्योगिक इकाइयों में जोखिम की पहचान कर समय रहते उचित प्रबंधन, आधुनिक सुरक्षा उपकरणों की स्थापना, नियमित प्रशिक्षण एवं मेंटेनेंस सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है।         कलेक्टर  संजय अग्रवाल ने कहा कि उद्योग देश के विकास और रोजगार सृजन का प्रमुख माध्यम हैं, लेकिन किसी भी दुर्घटना से न केवल आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि संस्थान की साख भी प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि प्रबंधन और श्रमिकों के सामूहिक प्रयास से ही सुरक्षित कार्य वातावरण निर्मित किया जा सकता है। श्रमिकों को नियमित प्रशिक्षण देने, सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित करने तथा उनमें स्वामित्व की भावना विकसित करने पर उन्होंने विशेष बल दिया।           कार्यक्रम में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक  रजनेश सिंह ने कहा कि औद्योगिक क्षेत्र में छोटी-छोटी लापरवाहियां बड़ी दुर्घटनाओं का कारण बनती हैं। सुरक्षा उपकरणों का उपयोग न करना गंभीर घटनाओं को जन्म देता है, जिसमें मानव लापरवाही प्रमुख कारण होती है। उन्होंने “जीरो टॉलरेंस” नीति अपनाने तथा किसी भी घटना की स्थिति में उसे छुपाने के बजाय तत्काल प्रशासन को सूचित करने की आवश्यकता बताई। कार्यक्रम में औद्योगिक इकाइयों द्वारा सुरक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे नवाचारों पर प्रस्तुतियां दी गईं तथा नुक्कड़ नाटक के माध्यम से श्रमिकों एवं प्रबंधन को जागरूक किया गया। पावर पॉइंट प्रस्तुति एवं संवादात्मक सत्रों के जरिए प्रतिभागियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया गया। कार्यशाला में सुरक्षा की शपथ भी ली गई। इस आयोजन के माध्यम से औद्योगिक सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने और जिम्मेदारी की भावना विकसित करने का प्रयास किया गया।

दिव्यांग बच्चों ने केक काटने के साथ हैप्पी बर्थ डे टू यू गाकर किया मुख्यमंत्री डॉ. यादव का अभिनंदन

भोपाल  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने जन्म दिवस पर दिव्यांग बच्चों के साथ सुखद संवाद करते हुए रवीन्द्र भवन परिसर एमपीटी कैफे कल्चर हाउस का शुभारंभ किया। इस अवसर पर बच्चों ने मुख्यमंत्री डॉ. यादव के जन्म दिवस का केक काटा, हैप्पी बर्थडे टू यू का गीत गाकर बधाई दी और उन्हें एक पेंटिंग भेंट की। इस अवसर पर बालिका सिहायना तिवारी ने जन्म दिवस पर कविता सुनाकर मुख्यमंत्री डॉ. यादव का अभिनंदन किया। कु. सिहायना ने प्रभु राम के संघर्ष पर भी कविता पाठ किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने दिव्यांग बच्चों को प्रोत्साहन स्वरूप 5 लाख रूपए और कविता पाठ करने वाली बालिका कु. सिहायना तिवारी को पृथक से 21 हजार रूपए प्रदान करने की घोषणा की। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि बच्चों की प्रतिभा को प्रोत्साहित करने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा। यह बच्चे बाल निकेतन और आरूषि संस्थान से जुड़े हैं। इस अवसर पर पर्यटन, संस्कृति और धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)  धर्मेंद्र भाव सिंह लोधी भी उपस्थित थे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने बच्चों से संवाद में बताया कि रवीन्द्र भवन प्रदेश की सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है। वर्षों से इस स्थान से कलाकारों, साहित्यकारों और संस्कृति प्रेमियों का जुड़ाव रहा है। यहां सांस्कृतिक और ग्राम्य जीवन की थीम पर विकसित कैफे कल्चर हाउस प्रदेश की सांस्कृतिक समृद्धि और पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह स्थान कला, संस्कृति और स्थानीय परंपराओं को प्रोत्साहित करने का एक सशक्त मंच बनेगा। यह मध्यप्रदेश पर्यटन का एक अनूठा प्रोजेक्ट है। इसमें प्रकृति, संस्कृति और विभिन्न प्रकार के विशेष भोजन का संयोजन है। इस प्रकार की पहल न केवल पर्यटन को बढ़ावा देती हैं, बल्कि स्थानीय व्यंजनों और संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। रवीन्द्र भवन परिसर स्थित एमपीटी कल्चर कैफे हाउस में लगभग 85 लोगों की बैठने की क्षमता है। यह कैफे आगंतुकों को शांत और सुकून भरा वातावरण प्रदान करता है। यहां का मेन्यू प्रदेश की समृद्ध क्षेत्रीय व्यंजनों की झलक प्रस्तुत करता है, जिसमें भुट्टे का कीस, अन्न को प्रोत्साहन देते हुए रागी बालूशा और कोदो अरंचिनी जैसे पारंपरिक एवं नवाचारी व्यंजन शामिल हैं। इसे एक लैंडस्केप-आधारित कैफ़े के रूप में डिज़ाइन किया गया है। हरी-भरी हरियाली और प्राकृतिक बनावटों को आधुनिक वास्तुशिल्प ढाँचे में समाहित करते हुए, यह कैफ़े रवीन्द्र भवन में आने-जाने वालों के लिए अनोखा अनुभव प्रदान करेगा। कैफे में हाथ से तराशी गई लकड़ी की बैठकों से लेकर विशेष रूप से तैयार टेराकोटा, पत्थर, लकड़ी, बांस और जूट के कलात्मक कार्य प्रदेश के सृजनकर्ताओं की सृजनशीलता को दर्शाते हैं। कैफे का इंटीरियर प्रदेश की हस्तशिल्प और कलाकृतियों से सुसज्जित है, जो भोजन के अनुभव को और भी यादगार बनाएगा। यहाँ का वातावरण 'क्रिएटिव हब' के रूप में विकसित किया गया है। उद्घाटन अवसर पर पर्यटन सचिव एवं मध्य प्रदेश टूरिज्म बोर्ड के प्रबंध संचालक डॉ. इलैयाराजा टी, अपर प्रबंध संचालक डॉ. अभय अरविंद बेडेकर, वरिष्ठ अधिकारी एवं बड़ी संख्या में आमजन उपस्थित थे।  

रेगिस्तान में नजर आया कैराकल, जैसलमेर बना वन्यजीव संरक्षण का नया केंद्र

जैसलमेर राजस्थान के पश्चिमी छोर पर स्थित भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे शुष्क मरुस्थलीय इलाकों में एक बेहद अहम वन्यजीव खोज सामने आई है। विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके दुर्लभ वन्य जीव कैराकल की मौजूदगी ने वन विभाग और वैज्ञानिकों में नई उम्मीद जगा दी है। जैसलमेर के सीमावर्ती क्षेत्र में इस प्रजाति की लगातार गतिविधियों के प्रमाण मिलने से यह इलाका अब संरक्षण के लिहाज से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, जैसलमेर का यह पूरा क्षेत्र शुष्क मरुस्थलीय घासभूमि (डेजर्ट ग्रासलैंड) का हिस्सा है, जो कैराकल के प्राकृतिक आवास के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है। यहां खुले मैदान, कम वनस्पति और छोटे शिकार जीवों की उपलब्धता इस प्रजाति के लिए आदर्श परिस्थितियां बनाती हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय से यह प्रजाति मानव गतिविधियों और आवास खत्म होने के कारण नजर नहीं आ रही थी, लेकिन अब इसके फिर से दिखने से संकेत मिलते हैं कि यह क्षेत्र उनके लिए सुरक्षित ठिकाना बन सकता है। निगरानी के लिए हाईटेक इंतजाम इस दुर्लभ जीव की मौजूदगी की पुष्टि के बाद वन विभाग और Wildlife Institute of India ने मिलकर संरक्षण प्रयासों को तेज कर दिया है। क्षेत्र में कुल 9 मोशन सेंसिंग कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं, जो दिन-रात गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं। इन कैमरों से मिले फुटेज ने कई अहम जानकारियां सामने रखी हैं, जिनमें कैराकल की आवाजाही, उसके शिकार के तरीके और रहने के पैटर्न को समझने में मदद मिल रही है। रेडियो कॉलर से हो रही ट्रैकिंग वन विभाग ने दो महीने पहले एक नर कैराकल को पकड़कर उसे रेडियो कॉलर लगाया और फिर सुरक्षित तरीके से जंगल में छोड़ दिया। इसके बाद उसकी हर मूवमेंट को ट्रैक किया जा रहा है। रेडियो कॉलर से प्राप्त डेटा के अनुसार, यह कैराकल भारत-पाकिस्तान सीमा से लगे विस्तृत क्षेत्र में विचरण कर रहा है। इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि इस प्रजाति का आवास सीमाओं से परे फैला हुआ है, जो संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत को भी दर्शाता है। तीन कैराकल की पुष्टि, बढ़ी उम्मीद अब तक मिले कैमरा ट्रैप फुटेज में रेडियो कॉलर लगे कैराकल के अलावा एक अन्य नर और एक मादा कैराकल की मौजूदगी दर्ज की गई है। इस तरह क्षेत्र में कुल तीन कैराकल के होने की पुष्टि हो चुकी है। इसके अलावा एक गुफा में दो नर कैराकल के एक साथ रहने के संकेत भी मिले हैं, जो इस प्रजाति के व्यवहार को समझने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आमतौर पर कैराकल एकाकी जीवन जीते हैं, ऐसे में यह व्यवहार शोध का विषय बन गया है। फूड चेन की भी हो रही पहचान निगरानी के दौरान वैज्ञानिकों ने कैराकल की फूड चेन को भी आंशिक रूप से पहचान लिया है। यह जीव मुख्यतः छोटे स्तनधारियों, पक्षियों और सरीसृपों का शिकार करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्र में शिकार की पर्याप्त उपलब्धता इस प्रजाति के टिके रहने का एक बड़ा कारण हो सकती है। संरक्षण के लिए बढ़ी सक्रियता वन विभाग की टीमें लगातार क्षेत्र में गश्त कर रही हैं और कैराकल की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। साथ ही स्थानीय लोगों को भी इस दुर्लभ जीव के महत्व के बारे में जागरूक किया जा रहा है, ताकि किसी प्रकार का खतरा न उत्पन्न हो।