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सागर के विकास को नई गति देगा 16000 करोड़ का एक्सप्रेस-वे, 75 किमी दूरी कम होगी

 सागर  आने वाले कुछ सालों में मध्य प्रदेश के सागर से हाईवे का जाल गुजरेगा. करीब चार हाईवे की सुविधा जिले को मिलेगी. इसका फायदा व्यापार में तो मिलेगा ही, शहर में विकास भी तेजी से होगा. जहां से नेशनल हाईवे गुजरेंगे, वहां पर उद्योग की नई-नई यूनिट स्थापित होंगी. होटल, रिसोर्ट, मॉल और बड़ी-बड़ी कालोनियां विकसित होंगी. जमीन के दाम बढ़ेंगे. इसी क्रम में एक और खुशखबरी सामने आई है. सागर, विदिशा और कोटा के बीच ग्रीन फील्ड एक्सप्रेस-वे बनने जा रहा है. इससे दोनों शहरों के बीच की दूरी में 75 किलोमीटर की कमी आ जाएगी. एक्सप्रेस-वे पर वाहन फर्राटा भरेंगे. जिससे 8 घंटे 45 मिनट का सफर 6 घंटे में ही पूरा हो जाएगा. बुंदेलखंड के मुख्यालय सागर, विदिशा होते हुए यह फोरलेन हाईवे कोटा तक जाएगा, जिससे सैकड़ों गांव से भी कनेक्टिविटी होगी. 405 किलोमीटर लंबा यह रास्ता महज 320 किलोमीटर का रह जाएगा. एक्सप्रेसवे बनने से यहां वाहनों की रफ्तार भी बढ़ेगी, जिससे समय की काफी बचत होगी. केंद्र सरकार के द्वारा 16,000 करोड़ के बजट से यह एक्सप्रेस-वे बनाया जा रहा है. बता दें, 17 जनवरी को केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी विदिशा जिले में पहुंचे थे, जहां उन्होंने मध्य प्रदेश के लिए एक लाख करोड़ के नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है. साथ ही उन्होंने 16,000 करोड़ से बनने वाले ग्रीन फील्ड एक्सप्रेस-वे की घोषणा की है. इस एक्सप्रेसवे के लिए सर्वे का कार्य पूरा हो चुका है. बीना-सिरोंज के बीच 52 km लंबी फोरलेन सड़क इसके अलावा ग्वालियर, भोपाल, नागपुर ग्रीन एक्सप्रेस-वे का भी निर्माण किया जाएगा. इस परियोजना में 40 हजार करोड़ की लागत आएगी. यह दोनों एक्सप्रेस-वे बनने से एमपी और राजस्थान, एमपी और नागपुर के बीच में बेहतर सड़क संपर्क हो सकेगा. साथ ही 1200 करोड़ की लागत से बीना से सिरोंज 52 किलोमीटर लंबी फोरलेन सड़क का निर्माण होगा. इसके बनने से दोनों एक्सप्रेस-वे से सीधी कनेक्टिविटी हो जाएगी. सड़कों के जाल से इतने फायदे  सागर की जनता को इन दोनों ही एक्सप्रेसवे का सीधे तौर पर फायदा मिलेगा. क्योंकि, राजस्थान के कोटा जाने के लिए सीधा सागर से एक्सप्रेस-वे होगा तो वहीं सागर से 75 किलोमीटर दूर बीना से सिरोंज मार्ग का इस्तेमाल कर ग्वालियर, भोपाल, नागपुर हाईवे पर पहुंच सकेंगे. इससे यात्रा बेहद सुगम और आरामदायक होगी. इसके अलावा सागर से देश का सबसे लंबा नेशनल हाईवे 44 करीब 154 किलोमीटर का हिस्सा गुजरता है, जिससे उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र पहुंच सकते हैं. इसी के साथ सागर कानपुर 4+2 लाइन का निर्माण कार्य चल रहा है, जिसका करीब 40 प्रतिशत काम भी पूरा हो चुका है. सागर दमोह के करीब 76 किलोमीटर हाईवे के लिए राज्य कैबिनेट से मंजूरी मिल चुकी है. इधर भोपाल-सागर नेशनल हाईवे का निर्माण कार्य भी जोरों पर है.

नौरादेही अभ्यारण्य में अफ्रीकी चीते के लिए काले हिरणों की खास डिश, शिकार की तैयारी शुरू

सागर   नौरादेही मध्यप्रदेश सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व के रूप में पहचान बना रहा है. यहां चीतों को भी शिफ्ट करने की तैयारी चल रही है. इससे पहले नौरादेही से खबर ये आ रही है चीतों के आगमन से पहले उनके शानदार भोजन की व्यवस्था हो गई है. नौरादेही में बड़ी संख्या में काले हिरणों के झुंड विचरण करने लगे हैं. कई जिलों से रेस्क्यू कर इन काले हिरणों को यहां छोड़ा गया है. नौरादेही में साल 2017 में सिर्फ 5 काले हिरण थे, जो अब बढ़कर 153 हो गए हैं. नौरादेही में घास के खुले मैदान काले हिरणों को पसंद साल 1975 में जब नौरादेही के जंगलों को वन्यजीव अभ्यारण्य का दर्जा दिया गया था, उससे पहले ही ये इलाका भारतीय भेडिया और काले हिरणों के गढ़ के तौर पर जाना जाता था. यहां के विशाल घास के मैदानों के कारण काले हिरणों की संख्या काफी ज्यादा थी, लेकिन धीरे-धीरे यहां काले हिरण दिखना बंद हो गए. 2014 में जब यहां विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हुई तो अभ्यारण्य के भीतर के गांव खाली होने लगे और घास के मैदान विकसित किए गए. अब यहां से ऐसी तस्वीरें सामने आई है, जो नौरादेही का इतिहास दोहराती नजर आ रही हैं. यहां घास के मैदानों के बीच काले हिरणों के झुंड नजर आने लगे हैं. सबसे पहले एक बाघ और बाघिन को बसाया नौरादेही में जब 2010 में अफ्रीकन चीतों को बसाने के लिए सर्वे किया गया था. उसी समय तय कर लिया गया कि भविष्य में यहां अफ्रीकन चीते बसाए जाएंगे. इसी योजना के तहत 2014 में नौरादेही वन्य जीव अभ्यारण्य में विस्थापन की प्रक्रिया शुरू की गई. विस्थापन की प्रक्रिया शुरू होने के बाद 2018 में पहले नौरादेही वन्य जीव अभ्यारण्य को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण परियोजना में शामिल किया गया. यहां पर एक बाघ और बाघिन को बसाया गया. विस्थापन के बाद नौरादेही में घास के बड़े मैदान विस्थापन की प्रक्रिया चालू होने से अभयारण्य के भीतर के गांव खाली होने लगे. इन गांवों के लोग यहां खेती करते थे. ये खेती की जमीन अभयारण्य प्रबंधन द्वारा घास के मैदानों में तब्दील की गई. सितंबर 2023 में वन्य जीव अभ्यारण्य को टाइगर रिजर्व का दर्जा दे दिया गया और विस्थापन की प्रक्रिया और तेज हो गयी. आज नौरादेही टाइगर रिजर्व के ज्यादातर गांव खाली हो चुके हैं और खेती की जमीन को बड़े-बड़े घास के मैदानों में तब्दील किया जाने लगा है. इससे यहां शाकाहारी जानवरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. नौरादेही के इतिहास को याद करते हुए यहां काले हिरणों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया गया और दूसरे टाइगर रिजर्व या संरक्षित वन जहां काले हिरणों की संख्या ज्यादा थी, वहां से यहां शिफ्ट किया गया. टाइगर रिजर्व प्रबंधन भी खुश नौरादेही टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. ए.ए. अंसारी कहते हैं "काले हिरण का विशेष आवास खुले मैदान में होता है. हाल ही में यहां शाजापुर से रेस्क्यू किए गए हिरण यहां छोडे गए. इसके पहले भी यहां काले हिरण रहे हैं. यहां जो काले हिरण आए हैं, वो ब्रीडिंग कर रहे हैं. उनके लिए बड़ा खुला मैदान है. हम उम्मीद कर रहे हैं कि ये यहां अच्छी तरह से रहेंगे और अपनी संख्या भी बढाएंगे और एक बेहतर आवास के रूप में नौरादेही जाना जाएगा." 

16 फरवरी से शुरू होगा मध्यप्रदेश विधानसभा सत्र, 6 मार्च को होगा समापन

भोपाल मध्य प्रदेश की सोलहवीं विधानसभा का नौवां सत्र 16 फरवरी से शुरू होगा। यह सत्र भोपाल में सुबह 11 बजे राज्यपाल के अभिभाषण के साथ शुरू होगा। इस सत्र में वार्षिक बजट, अनुपूरक मांगें और विधायी कार्यों पर चर्चा होने की संभावना है। मुख्य रूप से विकास, जनकल्याणकारी योजनाओं और आर्थिक सुधारों से जुड़े मुद्दों पर ध्यान दिया जाएगा। राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा और धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस 17 और 18 फरवरी को होगी। इससे संबंधित संशोधन 16 फरवरी शाम 5 बजे तक जमा किए जा सकेंगे। निजी सदस्यों के विधेयक और प्रस्तावों पर शुक्रवार को अंतिम ढाई घंटे चर्चा होगी। यह कार्य 20 फरवरी, 27 फरवरी और 6 मार्च को होगा। इसके लिए नोटिस 4 और 5 फरवरी तक देने होंगे। सत्र से पहले स्थगन प्रस्ताव, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव से जुड़े नोटिस 10 फरवरी से स्वीकार किए जाएंगे। विधानसभा सत्र 6 मार्च तक चलेगा। बैठकें 16 से 20 फरवरी, 23 से 27 फरवरी और 5 व 6 मार्च को होंगी। हर दिन प्रश्नकाल होगा। मंगलवार से गुरुवार तक सरकारी कामकाज पर चर्चा होगी, जबकि शुक्रवार को निजी सदस्यों के विधेयक और प्रस्ताव लिए जाएंगे। शनिवार और रविवार को अवकाश रहेगा। होली के कारण 3 मार्च को छुट्टी होगी, जबकि 2 और 4 मार्च को कोई बैठक नहीं होगी। विधानसभा सचिवालय ने सभी सदस्यों को आचरण नियमों का पालन करने के निर्देश दिए हैं। व्यक्तिगत आरोप लगाने और नोटिस की समय से पहले सार्वजनिकता पर रोक लगाई गई है। सुरक्षा व्यवस्था और मतदान प्रक्रिया को लेकर भी सख्ती बरतने को कहा गया है। विधायकों से अपने पते अपडेट रखने और नोटिस जमा करने के नियमों का पालन करने का आग्रह किया गया है, ताकि सत्र सुचारू रूप से चल सके। मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के तहत होने वाला यह सत्र राज्य से जुड़े अहम मुद्दों पर चर्चा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मध्य प्रदेश की बड़ी आदिवासी और ग्रामीण आबादी को ध्यान में रखते हुए, इस सत्र में समावेशी विकास, बुनियादी ढांचे के विस्तार और कृषि सहायता योजनाओं जैसे पीएम-किसान और आयुष्मान भारत पर जोर रहने की उम्मीद है। पिछले विधानसभा सत्रों में महिला सशक्तीकरण और डिजिटल शासन से जुड़े महत्वपूर्ण कानून पारित हुए हैं और इस सत्र में भी उसी दिशा में आगे बढ़ने की संभावना है। यह आदेश 13 जनवरी को जारी किया गया था और 15 जनवरी को राजपत्र में प्रकाशित किया गया। इसे सभी 230 विधायकों और वरिष्ठ अधिकारियों को भेज दिया गया है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में वर्ष 2026 का यह पहला बड़ा विधानसभा सत्र होगा। विधानसभा में भाजपा के 163 और कांग्रेस के 66 विधायक हैं। कांग्रेस से उम्मीद है कि वह महंगाई, बेरोजगारी और किसानों के मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश करेगी।

एमपी के सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में अब होगी हाईटेक और प्रैक्टिकल आधारित शिक्षा, प्राचार्य तैयार करेंगे भविष्य की नर्सें

 भोपाल  मध्य प्रदेश के सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं अब केवल किताबों तक सीमित नहीं रहेंगे। राज्य सरकार और एम्स भोपाल ने मिलकर एक मास्टर प्लान तैयार किया है, जिसके तहत नर्सिंग छात्रों को आधुनिक मशीनों के संचालन और गंभीर मरीजों की देखभाल में दक्ष बनाया जाएगा। इस योजना के अंतर्गत एम्स भोपाल के विशेषज्ञ प्रदेश के सरकारी नर्सिंग कॉलेजों के प्राचार्यों और शिक्षकों को हाईटेक मेंटर के रूप में प्रशिक्षित करेंगे। वर्तमान में प्रदेश के अधिकांश सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में पढ़ाई का ढांचा पारंपरिक है। छात्रों का अधिक समय थ्योरी पढ़ने और ब्लैकबोर्ड आधारित शिक्षण में ही निकल जाता है। उन्हें बड़े अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली आधुनिक मशीनों और जटिल मेडिकल केसों को नजदीक से देखने का अवसर बहुत कम मिलता है। व्यावहारिक अनुभव की यही कमी दूर करने के लिए यह नई पहल शुरू की गई है। सात दिनों के प्रशिक्षण में सीखेंगे प्रबंधन और तकनीक मास्टर प्लान के पहले चरण में 24 जिलों के नर्सिंग कॉलेजों के प्राचार्यों और शिक्षकों के लिए सात दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम आयोजित किया गया। इस प्रशिक्षण में ‘एडवांस सिमुलेशन लैब’ के माध्यम से डमी (पुतलों) पर वेंटिलेटर, डायलिसिस मशीन और कार्डियक मॉनिटर जैसे उपकरणों का अभ्यास कराया गया। साथ ही कॉलेज प्रबंधन और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां दी गईं, जो अब तक केवल एम्स जैसे बड़े संस्थानों तक सीमित थीं। इस नई पद्धति के जरिए भारतीय नर्सिंग परिषद के नए ‘दक्षता-आधारित पाठ्यक्रम’ को जमीनी स्तर पर लागू किया जा रहा है, ताकि मध्य प्रदेश की नर्सिंग शिक्षा को विश्वस्तरीय बनाया जा सके। छात्रों को ये होगा फायदा इस पहल से छात्रों को पढ़ाई के दौरान ही इमरजेंसी केयर में इस्तेमाल होने वाली मशीनें चलाना आ जाएगा। अस्पताल में ड्यूटी ज्वाइन करते समय उन्हें अलग से प्रशिक्षण लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हाथों-हाथ प्रैक्टिस से उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे मरीजों को बेहतर इलाज दे सकेंगे। साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग मिलने से उनके लिए देश के बड़े निजी अस्पतालों और विदेशों में नौकरी के अवसर भी खुलेंगे। आम नागरिकों को मिलेगा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक डॉ माधवानंद कर ने कहा कि मप्र के नर्सिंग शिक्षकों और प्राचार्यों को नई तकनीकों और पाठ्यक्रमों के प्रति जागरूक किया जा रहा है। इस प्रशिक्षण के माध्यम से सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में शिक्षा को अधिक व्यावहारिक और गुणवत्तापूर्ण बनाया जा रहा है, जिससे आम नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें।

दिल्ली में यमुना अब गंगा जैसी होगी, मेगा प्लान के तहत डेढ़ साल में बदल जाएगी नदी की तस्वीर

नई दिल्ली दिल्ली में प्रदूषण से अंतिम सांसें गिन रही यमुना नदी को जीवनदान देने की तैयारी हो चुकी है. प्रदूषण से गंदी हो चुकी यमुना को गंगा की तरह साफ करने के लिए मेगा प्लान तैयार कर लिया गया है. यमुना की सफाई योजना के तहत दिल्ली सरकार 518.88 करोड़ रुपये की एक बड़ी परियोजना शुरू करने जा रही है. इस प्रोजेक्ट के तहत न केवल यमुना नदी को साफ किया जाएगा बल्कि गंदे पानी को ट्रीट कर दोबारा उसे यमुना छोड़ने और नदी में पानी का स्तर बनाए रखने की व्यवस्था की जाएगी. दिल्ली सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक यमुना की सफाई योजना में नदी में पैरेलल वाटर सिस्टम, पंपिंग स्टेशन और ऊंचे (एलिवेटेड) चैनल बनाए जाएंगे, ताकि कोरोनेशन पिलर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से पूरी तरह साफ किया गया पानी यमुना नदी तक दोबारा पहुंचाया जा सके. इस परियोजना में जहांगीरपुरी नाले से रोजाना 30 मिलियन गैलन प्रति दिन गंदे पानी को पाइपलाइन के जरिए कोरोनेशन पिलर प्लांट तक लाया जाएगा, जहां उसका ट्रीटमेंट किया जाएगा. अधिकारियों के अनुसार इस काम के लिए बंद पाइप सिस्टम (क्लोज डक्ट सिस्टम), पंपिंग स्टेशन और ऊंचे चैनल बनाए जाएंगे. इससे साफ किया गया पानी वजीराबाद बैराज तक पहुंचाया जाएगा, ताकि यमुना में पानी का बहाव बढ़ सके. यह बहाव ई-फ्लो (पर्यावरणीय प्रवाह) कहलाता है, यानी नदी को जीवित और स्वस्थ रखने के लिए जरूरी न्यूनतम पानी का स्तर बनाए रखा जाएगा. कौन उठा रहा खर्च?  प्रोजेक्ट से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि इस परियोजना की निर्माण लागत केंद्र सरकार देगी, जबकि इसके संचालन और रखरखाव का खर्च दिल्ली सरकार उठाएगी. परियोजना को मंजूरी मिल चुकी है और सबसे बड़ी बात है कि इसे डेढ़ साल में पूरा किया जाएगा. यह फंड राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत दिया गया है. परियोजना में क्या-क्या होगा? . जहांगीरपुरी नाले से बिना साफ किया गया गंदा पानी पाइपलाइन से लाना . 64 मिलियन लीटर प्रतिदिन क्षमता का पंपिंग स्टेशन बनाना . ट्रीटमेंट के बाद साफ पानी को पाइप से यमुना तक पहुंचाना  खबर के मुताबिक जहांगीरपुरी नाले को पार करने के लिए ऊंचे RCC चैनल बनाए जाएंगे. इसके लिए दो पंपिंग स्टेशन होंगे. एक 64 MLD का स्टेशन होगा जो गंदा पानी STP तक लाएगा. जबकि दूसरा 318 MLD का पंप हाउस जो साफ पानी को यमुना तक पहुंचाएगा. इसके अलावा, वजीराबाद तक पानी ले जाने के रास्ते में दो ट्रस ब्रिज भी बनाए जाएंगे. केंद्र सरकार के प्लान में थी यमुना की सफाई 24 जून 2025 को एक रिपोर्ट में बताया गया था कि केंद्र सरकार यमुना को फिर से साफ करने की योजना पर नजर रखे हुए है. खासकर कोरोनेशन पिलर और यमुना विहार प्लांट के जरिए ई-फ्लो बढ़ाने पर. दिल्ली में यमुना का कितना हिस्सा है प्रदूषित? वजीराबाद बैराज से ओखला बैराज तक यमुना का 22 किमी का हिस्सा जो कि पूरी नदी का सिर्फ 2 फीसदी है सबसे ज्यादा प्रदूषित है. नदी में इसी हिस्से से सबसे ज्यादा 76 फीसदी प्रदूषण होता है. विशेषज्ञों और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) के अनुसार यमुना को स्वस्थ रखने के लिए 23 क्यूमेक्स पानी की जरूरत है, जबकि अभी सिर्फ 10 क्यूमेक्स पानी ही बह रहा है. ऐसे में पानी को साफ कर फिर से पानी पहुंचाने से पानी के स्तर को बनाए रखने में सहायता मिलेगी. अधिकारियों ने बताया कि नया सिस्टम खुले नालों को बायपास करेगा, क्योंकि खुले नाले साफ पानी को दोबारा गंदा कर देते हैं. यमुना कार्यकर्ता भीम सिंह रावत ने कहा कि इससे थोड़ा प्रदूषण जरूर कम होगा, लेकिन पानी की मात्रा अभी भी कम है. उन्होंने कहा, ‘साफ किए गए पानी की गुणवत्ता पर खास ध्यान देना होगा. नदी में छोड़ा जाने वाला पानी इनलैंड वाटर स्टैंडर्ड के अनुसार और ज्यादा शुद्ध होना चाहिए.’

मध्यप्रदेश में पेंशन का बड़ा फैसला: अब अविवाहित-तलाकशुदा बेटियों के लिए खत्म हुई एज लिमिट

भोपाल प्रदेश में 50 साल बाद पेंशन नियम बदलेंगे। आश्रित विधवा, परित्याक्ता, तलाकशुदा और अविवाहित पुत्रियां आजीवन परिवार पेंशन की पात्र होंगी। इसके लिए अधिकतम 25 वर्ष की आयु सीमा समाप्त होगी। आश्रितों के लिए आय सीमा भी बढ़ाई जाएगी। यह न्यूनतम पेंशन और महंगाई राहत मिलाकर होगी। आश्रित बड़ी संतान चाहे वह बेटा हो या बेटी, जो बड़ा होगा, वह परिवार पेंशन का पात्र होगा। साथ ही कई प्रक्रियात्मक परिवर्तन भी प्रस्तावित किए गए हैं। राज्य में चार लाख से ज्यादा पेंशनधारक प्रदेश में चार लाख से अधिक पेंशनधारक हैं। इनके लिए 1976 में पेंशन नियम बनाए गए थे। तब से भारत सरकार कई संशोधन कर चुकी है, जिन्हें प्रदेश के पेंशनरों के लिए लागू करने की मांग पेंशनर्स एसोसिएशन उठाती रही है। मुख्य सचिव अनुराग जैन जब अपर मुख्य सचिव वित्त थे, तब नियमों में परिवर्तन को लेकर सहमति बनी थी, लेकिन प्रक्रिया लंबी खिंचती चली गई। अपर मुख्य सचिव वित्त मनीष रस्तोगी ने समिति बनाई और नियमों में संशोधन के प्रारूप को अंतिम रूप दे दिया। सूत्रों के अनुसार पेंशन नियम में अब यह प्रविधान किया जा रहा है कि आश्रित के लिए आय सीमा में वृद्धि की जाएगी। यह न्यूनतम पेंशन, जो 7,750 रुपये प्रतिमाह होती है, और महंगाई राहत जोड़कर निर्धारित होगी यानी न्यूनतम पेंशन में 55 प्रतिशत महंगाई राहत जोड़ी जाएगी। इसका लाभ यह होगा कि इस सीमा के भीतर यदि आश्रित की आय है तो उन्हें भी परिवार पेंशन की पात्रता होगी। इसके साथ ही एक बड़ा परिवर्तन यह भी किया जा रहा है कि आश्रित में अविवाहित बेटी के लिए आयु सीमा का बंधन समाप्त किया जाएगा। अभी 25 वर्ष से अधिक अविवाहित पुत्री को पात्र नहीं माना जाता है। इसके साथ ही आश्रित विधवा, परित्याक्ता, तलाकशुदा बेटियां भी परिवार पेंशन के दायरे में आएंगी। विभागों के बढ़ेंगे अधिकार पेंशनर किसी भी श्रेणी का हो, अभी पेंशन रोकने के लिए प्रकरण कैबिनेट की स्वीकृति के लिए भेजना पड़ता है। लगभग हर कैबिनेट की बैठक में ऐसे प्रकरण आते हैं। अब यह प्रविधान किया जा रहा है कि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की पेंशन रोकने के मामले में निर्णय प्रशासकीय विभाग ही लेगा। प्रथम और द्वितीय श्रेणी के अधिकारियों के मामले वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत ही कैबिनेट के समक्ष निर्णय के लिए रखे जाएंगे।   केंद्रीय सेवा की अवधि भी जुड़ेगी सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय सेवा से प्रदेश में सेवा देने के लिए आने वाले कर्मचारियों की पेंशन की गणना की प्रक्रिया में भी सुधार होगा। इसमें केंद्रीय सेवा की अवधि को भी जोड़ा जाएगा। इसका स्पष्ट प्रविधान नियम में रहेगा। पेंशनर्स एसोसिएशन के संरक्षक गणेश दत्त जोशी का कहना है कि हम 18 वर्ष से नियम में संशोधन की मांग कर रहे हैं। जो संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं, वे वर्तमान समय के अनुकूल हैं।

रोपवे, पहाड़ियां और भक्ति का संगम: जयपुर का वैष्णो देवी मंदिर क्यों बन रहा है धार्मिक पर्यटन की पहचान

जयपुर राजस्थान की राजधानी जयपुर सिर्फ ऐतिहासिक किलों और महलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शहर धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में भी तेजी से अपनी अलग पहचान बना रहा है। जयपुर के पूर्वी हिस्से में अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित वैष्णो देवी माता मंदिर आज न केवल आस्था का प्रमुख केंद्र है, बल्कि आसपास मौजूद खोले के हनुमान मंदिर और आधुनिक रोपवे सुविधा के चलते यह पूरा क्षेत्र एक समग्र धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में उभर रहा है। पहाड़ियों में बसा वैष्णो देवी माता मंदिर जयपुर का वैष्णो देवी माता मंदिर जम्मू स्थित माता वैष्णो देवी धाम से प्रेरित माना जाता है। पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचते ही श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति का अनुभव होता है। यहां माता वैष्णो देवी के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं की गुफा रूपी प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो श्रद्धालुओं को उत्तर भारत के प्रमुख तीर्थों की अनुभूति कराती हैं। नवरात्र, नववर्ष और विशेष धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। जयपुर के प्रसिद्ध खोले के हनुमान जी मंदिर परिसर में पहाड़ी की चोटी पर स्थित प्राचीन माता वैष्णो देवी मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी अपनी मनोकामनाएं लिए माता के दर्शन करने पहुंच रहे हैं। रोपवे: श्रद्धा और सुविधा का आधुनिक संगम इस धार्मिक क्षेत्र की सबसे बड़ी खासियत है यहां संचालित रोपवे सेवा, जिसने पर्यटन के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। रोपवे के जरिए श्रद्धालु और पर्यटक कम समय में पहाड़ी तक पहुंच सकते हैं। जैसे-जैसे रोपवे ऊपर चढ़ता है, अरावली की हरियाली, घाटियां और जयपुर शहर का विहंगम दृश्य मन को मोह लेता है। यह सुविधा बुजुर्गों, बच्चों और दूर-दराज से आने वाले पर्यटकों के लिए विशेष रूप से आकर्षण का केंद्र बन गई है। यही कारण है कि रोपवे ने इस पूरे क्षेत्र को पारंपरिक तीर्थ से आगे बढ़ाकर एक आधुनिक पर्यटन स्थल का रूप दे दिया है। 45 मिनट की जगह 5 मिनट का समय श्री नरवर आश्रम सेवा समिति खोल के हनुमान जी प्रन्यास के महामंत्री बृजमोहन शर्मा के मुताबिक खोल के हनुमान जी मंदिर परिसर स्थित माता वैष्णो देवी मंदिर में नवरात्रों के दौरान काफी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। रोपवे की शुरुआत होने से भक्तों और पर्यटकों को काफी सुविधा मिल रही है. श्रद्धालु सैकड़ों सीढ़ियां चढ़कर खोले के हनुमान जी मंदिर की पहाड़ियों पर बने माता वैष्णो देवी मंदिर के दर्शन करते हैं. सीढ़ियों से करीब 45 मिनट का समय लगता है, लेकिन अब रोपवे के जरिए केवल 5 मिनट में माता वैष्णो देवी मंदिर पहुंच सकते हैं। खोले के हनुमान: आस्था का प्राचीन केंद्र वैष्णो देवी माता मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित खोले के हनुमान मंदिर जयपुर के सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन धार्मिक स्थलों में से एक है। मान्यता है कि यहां स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा स्वयं प्रकट हुई थी। हर मंगलवार और शनिवार को यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु खोले के हनुमान के दर्शन के बाद वैष्णो देवी माता मंदिर तक की यात्रा करते हैं, जिससे यह पूरा इलाका एक धार्मिक परिक्रमा मार्ग जैसा अनुभव देता है। पर्यटन की नजर से बढ़ता आकर्षण बीते कुछ वर्षों में यह क्षेत्र केवल स्थानीय श्रद्धालुओं तक सीमित नहीं रहा। देश के अन्य राज्यों और विदेशी पर्यटक भी अब जयपुर के इस धार्मिक सर्किट को अपनी यात्रा सूची में शामिल कर रहे हैं। मंदिर परिसर, पहाड़ी वातावरण, रोपवे की रोमांचक यात्रा और आसपास की प्राकृतिक सुंदरता इसे एक स्पिरिचुअल टूरिज्म डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित कर रही है। सुबह की आरती से लेकर शाम की आराधना तक, यहां का माहौल पर्यटकों को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है। जयपुर के पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान खोले के हनुमान, वैष्णो देवी माता मंदिर और रोपवे—तीनों मिलकर जयपुर को एक नया धार्मिक पर्यटन चेहरा दे रहे हैं। आमेर किला, सिटी पैलेस और हवा महल देखने आने वाले पर्यटक अब इस क्षेत्र को भी अपनी यात्रा में शामिल कर रहे हैं। इससे न सिर्फ धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिल रहा है, बल्कि स्थानीय रोजगार और आसपास के इलाकों के विकास को भी गति मिल रही है। कुल मिलाकर, जयपुर का वैष्णो देवी माता मंदिर और खोले के हनुमान क्षेत्र आज आस्था, प्रकृति और आधुनिक सुविधाओं का ऐसा संगम बन चुका है, जो श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों को भी बार-बार यहां आने के लिए प्रेरित करता है।

खेलों से बदलेगा आदिवासी क्षेत्र का भविष्य, 100 करोड़ के मेगा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स को हरी झंडी

खंडवा  खंडवा के आदिवासी बहुल क्षेत्र हरसूद में प्रदेश स्तरीय स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का निर्माण होगा। इसमें एथलेटिक्स, इंडोर गेम्स और आउटडोर खेलों की सुविधाएं होंगी। ग्रामीण आदिवासी बच्चों को उच्च स्तर पर प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं में भाग लेने का मौका मिलेगा। 100 करोड़ की लागत से हरसूद में स्पोर्ट कॉम्प्लेक्स के निर्माण से निमाड़ क्षेत्र की पहचान खेल के क्षेत्र में बढ़ेगी।   सरकार ने दी सहमति सरकार की सैद्धांतिक सहमति के बाद अफसर योजना को अमली जामा पहनाने में जुटे है। मध्य प्रदेश बिल्डिंग कारपोरेशन के इंजीनियरों ने जिले के हरसूद क्षेत्र में स्थित सेल्दामाल में भूमि का स्थली निरीक्षण के बाद डीपीआर तैयार कर रहे है। सबकुछ योजना के तहत हुआ तो जल्द निर्माण के लिए कागजी प्रक्रिया शुरु होगी। इंजीनियर मयंक राय ने बताया कि हरसूद के सेल्दामाल में स्पोर्ट कॉम्प्लेक्स के लिए 30 एकड़ भूमि अलाट हो गई है। शेष 9 एकड़ भूमि अलाट की कागजी प्रक्रिया चल रही है।   खिलाड़ियों को मिलेंगी ये आधुनिक सुविधाएं प्रदेश स्तरीय स्पोर्ट कॉम्प्लेक्स में खिलाडियों को आधुनिक सुविधाएं मिलेंगी। इसमें मुख्य रुप से प्रशिक्षण और खेल इंफ्रास्ट्रक्चर, इनडोर, आउटडोर कोर्ट में बैडमिंटन, टेबल-टेनिस, बास्केटबॉल, वॉलीबॉल, स्क्वैश के लिए कोर्ट। एथलेटिक्स ट्रैक में सिंथेटिक एथलेटिक ट्रैक (400 मीटर)। कुश्ती, ताइक्वांडो, एरोबिक्स और वेटलिफ्टिंग के लिए हॉल। स्विमिंग पूल में इनडोर और आउटडोर स्विमिंग पूल। अन्य : क्रिकेट पिच, लॉन टेनिस कोर्ट, शूटिंग रेंज, हॉकी टर्फ। खिलाड़ियों के लिए सहायता चयनित प्रशिक्षु के लिए हॉस्टल और पौष्टिक भोजन। वित्तीय सहायता, किट और उपकरण में आधुनिक प्रशिक्षण उपकरण समेत अन्य सुविधाएं जैसे शैक्षिक सहायता शिक्षा संबंधी खर्च, प्रतियोगिता का अवसर मिलेगा। राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने का मौका। मनोरंजक की सुविधाएं प्रस्तावित है।

किला रायपुर में 11 साल बाद लौटेगा बैलगाड़ी रेस, ग्रामीण ओलंपिक में वापसी, DC ने नियमों का ध्यान रखने का दिया आश्वासन

चंडीगढ़  पंजाब में लुधियाना के किला रायपुर ग्रामीण ओलिंपिक में एक बार फिर से बैलगाड़ी दौड़ की वापसी होने जा रही है। किला रायपुर में जो खेल शुरू होंगे उनमें बैलगाड़ी की दौड़ का भी आयोजन इस बार किया जाएगा। जिला प्रशासन, आयोजक और ग्रामीणों में इसे लेकर उत्साह है। 30 जनवरी से एक फरवरी तक ये गेम्स करवाई जानी हैं। डीसी हिमांशु जैन ने आज प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि यमों और कानून मुताबिक बैलगाड़ी की दौड़ होगी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2014 में किला रायपुर गेम्स में बैलगाड़ी की दौड़ बंद करवा दी थी। पंजाब सरकार ने 11 जुलाई को विधानसभा में बिल पास करके बैल गाड़ियों की दौड़ फिर से करवाने का रास्ता साफ कर दिया। सरकार के इस फैसले से इस बैलगाड़ी दौड़ शुरू होने का रास्ता साफ हुआ है। पिछले कुछ सालों से पंजाब सरकार इन खेलों का आयोजन कर रही है। किला रायपुर खेलों की रौनक हो गई थी खत्म बैल गाड़ियों की दौड़ शुरू से किला रायपुर खेलों में आकर्षण का मुख्य केंद्र रही हैं। जब किला रायपुर में बैलगाड़ियों की दौड़ पर प्रतिबंध लगा तो खेलों की रौनक ही खत्म हो गई। देश विदेश से पर्यटकों ने आना बंद कर दिया। इन शर्तों पर शुरू करवाई जाएगी बैलगाड़ियों की दौड़ किसी भी तरह की मारपीट, नुकीले औजार या क्रूरता पूरी तरह प्रतिबंधित होगी अत्यधिक गर्मी या खराब मौसम में दौड़ नहीं करवाई जाएगी सभी प्रतिभागियों और बैलों का पूर्व पंजीकरण जरूरी होगा नियमों का उल्लंघन करने पर कड़ी कार्रवाई और प्रतिबंध लगाया जाएगा कैसे ग्रामीण ओलिंपिक बने किला रायपुर की खेल, जानिए 1933 में इंदर ग्रेवाल ने शुरू किया: किला रायपुर की ग्रामीण खेलों की शुरुआत साल1933 में हुई। इनको शुरू करने का श्रेय लुधियाना के किला रायपुर के इंदर सिंह ग्रेवाल को जाता है। इन खेलों को शुरू करने के पीछे उद्देश्य पंजाब के किसानों को एक प्लेटफार्म पर एकत्रित करना था। इनके मनोरंजन के लिए खेलें शुरू की गईं जो आगे चलकर पूरे पंजाब में फेमस हो गईं और इन्हें पंजाब का मिनी ओलिंपिक कहा जाने लगा। रायपुर के हॉकी में सिल्वर कप जीतने से हुई शुरुआात: साल 1933 में पहली बार रायपुर की हॉकी टीम ने जालंधर में सिल्वर कप जीता। इसी जीत से प्रेरित होकर ग्रेवाल जट्‌ट समुदाय ने गांवों के बीच वॉलीबॉल, कबड्डी और एथलेटिक्स की शुरुआत हुई और उसी साल "ग्रेवाल स्पोर्ट्स एसोसिएशन" बनाई गई। 1944 में पहली बार हुई बैल दौड़: साल 1940 में 440 गज का ट्रैक बनाकर एथलेटिक्स के मुकाबले शुरू हुए और साल 1944 में बाबा बक्शी के प्रयासों से बैलगाड़ी दौड़ शामिल की गई। साल 1950 में महिलाओं के लिए खेल आयोजनों की शुरुआत हुई, जो साल 1953 में औपचारिक रूप से शामिल किए गए। दुनियाभर को दिखाई जाती है पंजाब की विरासत: इंदर सिंह ग्रेवाल के प्रयासों के कारण, यह खेलें त्योहार की तरह बन गईं और हर साल आयोजित होने लगीं। अब ये खेलें दुनिया भर से लोगों को आकर्षित करती हैं। यह न केवल एक खेल आयोजन है, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव भी है जो पंजाब की समृद्ध विरासत को दुनियाभर में दिखाता है। बैलों को पिलाते हैं देसी घी, खिलाते हैं ड्राई फ्रूट्स: बैलगाड़ी दौड़ में हिस्सा लेने वाले बैलों की कीमत लाखों रुपए तक होती है और उनकी देखभाल बच्चों की तरह की जाती है। पंजाब के पशुपालक बताते हैं कि वे अपने बैलों को देसी घी, ड्राई फ्रूट्स, चुनिंदा अनाज और पोषक आहार खिलाकर उन्हें ताकतवर बनाते हैं। अब जानें क्यों लगा बैलों की दौड़ पर प्रतिबंध जीत के लिए बैलों को नशे की गोलियां खिलाने के लगे आरोप: इन खेलों में बैल दौड़ पर सवाल उठने शुरू हो गए। कुई पशु प्रेमियों ने पशु क्रूरता को लेकर कोर्ट का रुख किया। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि कुछ मालिक अपने बैलों को दौड़ के दौरान तेज भगाने के लिए नशे की गोलियां खिलाते हैं और लोहे की नुकीली 'क्रिच' से मारते हैं, जिससे बैल दर्द से भागने लगता है। बैलों पर क्रूरता का हवाला देकर लगी थी रोक: साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद किला रायपुर समेत देशभर में बैलगाड़ी दौड़ों पर रोक लग गई थी। अदालत ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 का हवाला देते हुए कहा था कि इस तरह की दौड़ों में जानवरों के साथ क्रूरता की आशंका रहती है। इसके बाद किला रायपुर रूरल ओलिंपिक में यह प्रतियोगिता बंद कर दी गई। 2014 के बाद से फीका पड़ा खेल उत्सव: साल 2014 के आदेश और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश के बाद कानूनी रूप से बैल दौड़ पर बैन लगने के बाद किला रायपुर में खलों का आकर्षण फीका पड़ने लगा। धीरे-धीरे यहां आने वाले लोगों की संख्या भी कम होने लगी। विवादों से भी जुड़ा किला रायपुर ग्रामीण ओलिंपिक: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की रोक के आदेश को 11 साल बीत चुके हैं और कभी भी यहां बैल दौड़ देखने को नहीं मिली। बैल दौड़ के जाने के बाद यहां और भी विवाद पैदा हुए और ये खेल आयोजन कुछ सालों में ही बंद हो गया। विवाद उस समय और गहरा गया जब आयोजन स्थल की जमीन को लेकर कानूनी मसला खड़ा हो गया, जिससे साल 2018 के बाद खेल आयोजन पूरी तरह रुक गया। साल 2023 में गांव के पट्टी सुहाविया गुट के पक्ष में फैसला आने के बाद आयोजन को दोबारा शुरू करने की राह साफ हुई। साल 2024 से पंजाब सरकार ने खेलों के आयोजन की जिम्मेदारी अपने हाथ में ली। पहले भी इसे शुरू करने के दो प्रयास हो चुके: पंजाब सरकार ने 2019 में विधानसभा में एक संशोधन विधेयक पारित किया था, जिससे बैल दौड़ को कानूनी मान्यता मिल सके। इसके तहत पशुओं की देखभाल और सुरक्षा से जुड़े विशेष प्रावधानों के साथ पारंपरिक खेल को संरक्षित करने की बात कही गई थी। 2024 में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी से मुलाकात कर इस खेल को दोबारा शुरू कराने की मांग भी की थी। अब 2025 में राज्य सरकार ने इस दिशा में अंतिम कदम बढ़ा दिया है। पंजाब विधानसभा ने सर्वसम्मति से विधेयक को पारित कर दिया है। राज्यपाल की मंजूरी मिलते ही … Read more

खेजड़ी संरक्षण की लड़ाई तेज हुई, बीकानेर में 2 फरवरी को होगा महापड़ाव

जोधपुर राजस्थान में खेजड़ी सहित अन्य हरे वृक्षों के संरक्षण को लेकर चल रहा ‘खेजड़ी बचाओ अभियान’ अब तेज़ी से जनआंदोलन का रूप लेता जा रहा है। जोधपुर संभाग समेत प्रदेश के विभिन्न जिलों में जनसंपर्क अभियान तेज कर दिया गया है। मुकाम में आयोजित महापंचायत के निर्णय के अनुसार आगामी 2 फरवरी 2026 को बीकानेर जिला मुख्यालय पर विशाल महापड़ाव एवं आंदोलन आयोजित किया जाएगा।  अभियान के तहत साधु-संतों के सानिध्य में बाड़मेर, सांचौर, जालौर और जोधपुर सहित कई क्षेत्रों में व्यापक जनसंपर्क किया गया। पर्यावरण प्रेमियों, ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों से संवाद कर उन्हें आंदोलन से जोड़ा गया। इस दौरान खेजड़ी वृक्ष के पर्यावरणीय, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को लेकर लोगों में गहरी चिंता और जागरूकता देखने को मिली। बिश्नोई समाज के साथ-साथ अन्य पर्यावरण प्रेमी भी इस बार आर-पार की लड़ाई के मूड में नजर आए। मीडिया से बातचीत में आंदोलन संयोजक परसराम बिश्नोई ने सरकार को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि बिश्नोई समाज और पर्यावरण प्रेमियों की ताकत को कमतर नहीं आंका जाए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि खेजड़ी और अन्य हरे वृक्षों की कटाई रोकने के लिए सख्त और प्रभावी कानून नहीं बनाए गए, तो आंदोलन और अधिक उग्र होगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी। परसराम बिश्नोई ने दो टूक कहा कि हरे पेड़ों की कटाई किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने खेजड़ी की रक्षा के लिए मां अमृता देवी के नेतृत्व में दिए गए 363 बलिदानों का स्मरण करते हुए कहा कि यह परंपरा आज भी समाज को संघर्ष और बलिदान की प्रेरणा देती है। अभियान के तहत बाड़मेर, सांचौर, भीनमाल और जोधपुर के कई गांवों में जनसंपर्क किया गया है। साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ताओं से चर्चा कर आंदोलन को कानूनी मजबूती देने की रणनीति भी तैयार की गई है। आने वाले दिनों में यह अभियान फलोदी, नागौर, बीकानेर के साथ-साथ हरियाणा और पंजाब तक विस्तारित किया जाएगा। खेजड़ी बचाओ अभियान अब केवल एक मांग नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की लड़ाई बनता जा रहा है।