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झारखंड में सिविल सेवा प्री सहित सालभर में होंगी 28 परीक्षाएं

रांची. झारखंड लोक सेवा आयोग की संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2025 आठ मार्च को होगी। इस परीक्षा का अप्रैल माह में परिणाम जारी हो सकता है। इसकी मुख्य परीक्षा दो से चार मई तक संभावित है। मई अंतिम सप्ताह में इसका परिणाम जारी हो सकता है। इसके बाद 16 से 19 जून तक साक्षात्कार आयोजित होगा। इस तरह सभी परीक्षाएं समय पर आयोजित हुईं तथा परिणाम जारी हुआ तो जून माह तक यह परीक्षा पूरी हो जाएगी। हालांकि अभी इस परीक्षा के लिए विज्ञापन प्रकाशित नहीं हुआ है। आयोग ने मंगलवार को जून माह तक आयोजित होनेवाली विभिन्न प्रतियाेगिता परीक्षाओं का कैलेंडर जारी करते हुए परीक्षाओं की उक्त संभावित तिथि घोषित की। जारी कैलेंडर के अनुसार, 29 मार्च को झारखंड पात्रता परीक्षा (जेट) आयोजित हो सकती है। यह परीक्षा के तहत दो पत्रों की परीक्षा होगी, जिसमें वस्त़ुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाएंगे। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत बाल विकास परियोजना पदाधिकारियों की नियुक्ति के लिए साक्षात्कार बुधवार से शुरू होगा जो नौ जनवरी तक चलेगा। छठी सीमित उपसमाहर्ता लिखित परीक्षा 10-11 जनवरी को आयोजित होगी। इसी तरह, विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक बैकलाग नियुक्ति प्रतियोगिता के तहत सांख्यिकी, मैथिली और श्रम एवं समाज कल्याण विषय के लिए 18 जनवरी को प्रमाणपत्रों का सत्यापन होगा, जबकि साक्षात्कार 19 जनवरी को होगा। वहीं, सहायक प्राध्यापक नियमित नियुक्ति के तहत जुलाजी तथा अंग्रेेजी विषय के लिए प्रमाणपत्रों की जांच 19 से 21 जनवरी तक होगी। नियमित नियुक्ति के तहत ही हो एवं पंचपरगनिया विषय के लिए प्रमाणपत्रों की जांच तथा साक्षात्कार 10 फरवरी को निर्धारित है। आयोग ने कुल 28 प्रतियोगिता परीक्षाओं की संभावित तिथि घोषित की है, जिससे हजारों पदों पर नियुक्ति का रास्ता साफ होगा। अन्य परीक्षाओं की संभावित तिथि परीक्षा का नाम     परीक्षा की प्रकृति     संभावित तिथि वन क्षेत्र पदाधिकारी नियुक्ति     मुख्य परीक्षा     22-24 जनवरी खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी     साक्षात्कार     29-31 जनवरी यूनिवर्सिटी प्रोफेसर कम चीफ साइंटिस्ट     साक्षात्कार     12 फरवरी एसोसिएट प्रोफेसर कम सीनियर साइंटिस्ट     साक्षात्कार     13 फरवरी आयुर्वेदिक चिकित्सा पदाधिकारी     लिखित परीक्षा     05-07 मार्च होम्योपैथी चिकित्सा पदाधिकारी     लिखित परीक्षा     05-07 मार्च यूनानी चिकित्सा पदाधिकारी     लिखित परीक्षा     05-07 मार्च संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2025     प्रारंभिक परीक्षा     08 मार्च संयुक्त सिविल सेवा बैकलॉग परीक्षा-2025     प्रारंभिक परीक्षा     15 मार्च संयुक्त सिविल सेवा बैकलॉग परीक्षा-2023     प्रारंभिक परीक्षा     22 मार्च झारखंड पात्रता परीक्षा-2024     लिखित परीक्षा     29 मार्च सहायक वन संरक्षक नियुक्ति     मुख्य परीक्षा     04-07 अप्रैल प्रोजेक्ट मैनेजर एवं समकक्ष नियुक्ति     लिखित परीक्षा     18-19 अप्रैल कारखाना निरीक्षक नियुक्ति     लिखित परीक्षा     25-26 अप्रैल संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा-2025     मुख्य परीक्षा     02-04 मई संयुक्त सिविल सेवा बैकलॉग परीक्षा-2025     मुख्य परीक्षा     09-11 मई संयुक्त सिविल सेवा बैकलॉग परीक्षा-2023     मुख्य परीक्षा     16-18 मई ब्वायल इंसपेक्टर नियुक्ति     लिखित परीक्षा     29-30 मई सहायक निदेशक/सीनियर साइंटिफिक ऑफिसर बैकलॉग परीक्षा     लिखित परीक्षा     07 जून सहायक निदेशक/सीनियर साइंटिफिक ऑफिसर बैकलॉग परीक्षा     लिखित परीक्षा     14 जून संयुक्त सिविल सेवा नियमित परीक्षा-2025     साक्षात्कार     16-19 जून संयुक्त सिविल सेवा बैकलॉग परीक्षा-2025     साक्षात्कार     22-23 जून संयुक्त सिविल सेवा बैकलॉग परीक्षा-2023     साक्षात्कार     24 जून

बोकारो स्टील का सबसे मजबूत सुरक्षा सूट: 260°C तक की गर्मी को झेलने की क्षमता, कीमत क्या?

बोकारो अक्सर इंडस्ट्री में काम करने के दौरान कर्मचारियों को कई तरह के सुरक्षा उपकरणों के साथ ड्यूटी करनी पड़ती है. खासतौर पर स्टील इंडस्ट्री, फायर डिपार्टमेंट और बिजली विभाग में कार्यरत कर्मचारियों को आग, चिंगारी और अत्यधिक गर्मी का खतरा हेमशा बना रहता है और इन जोखिम भरे माहौल में फ्लेम रिटार्डेंट सूट कर्मचारियों के लिए विशेष सुरक्षा कवच का काम करता है और उन्हें दुर्घटना से बचाता है. ऐसे में बोकारो इस्पात संयंत्र के सुरक्षा विभाग में कार्यरत सतीश कुमार ने बताया कि बोकारो स्टील प्लांट में कार्यरत कर्मचारियों को आग से बचाने के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए फ्लेम रिटार्डेंट सूट उपलब्ध कराए जाते हैं. यह सूट सामान्य कपड़ों की तरह तुरंत आग नहीं पकड़ता है. बल्कि आग के प्रभाव को सीमित कर देता है, जिससे कर्मचारी को सुरक्षित स्थान तक पहुंचने या रेस्क्यू का कीमती समय मिल जाता है और और बहुत अधिक डैमेज से लोगों का शरीर बच जाता है. 260°C की गर्मी ये सूट कर लेगा सहन इसके अलावा यह सूट खासतौर पर चिंगारी, फ्लैश फायर और अत्यधिक तापमान के खतरे को भी कम करता है. आग के संपर्क में आने से यह जल्दी पिघलता नहीं है और यह इससे जलने की गंभीरता काफी हद तक कम हो जाती है. वहीं, यह सूट विशेष फाइबर और केमिकल से तैयार होता है, जिससे सूट लंबे समय तक सुरक्षा प्रदान करता है. यह गर्मी 150°C से 260°C सीमित समय तक  सुरक्षित रखने में सक्षम है और यह सूट बचाव के लिए बनाया गया है. जानें सूट की कीमत वहीं, फ्लेम रिटार्डेंट सूट की कीमत क्वालिटी के अनुसार ₹3000 रुपये से लेकर 1 लाख रूपये तक होती है. वहीं, इसकी गुणवत्ता को ध्यान रखते हुए हमेशा ISO Certified और फ्लेम रिटार्डेंट सूट का ही उपयोग किया जाता है. यह सर्टिफिकेशन सूट की गुणवत्ता, सुरक्षा मानकों और आग से बचाव की क्षमता को प्रमाणित करता है.

रेलवे का मास्टरस्ट्रोक! एक ऐप में समाएंगी यात्रा से जुड़ी सभी सुविधाएं

भोपाल रेल यात्रियों की दैनिक जरूरतों को देखते हुए भारतीय रेलवे ने एकीकृत मोबाइल एप के माध्यम से यात्रा से जुड़ी अनेक सुविधाएं एक ही डिजिटल प्लेटफार्म पर उपलब्ध करा दी हैं। इस पहल का उद्देश्य यात्रियों को टिकट बुकिंग से लेकर यात्रा के दौरान जरूरी जानकारियों तक, हर सुविधा एक ही स्थान पर उपलब्ध कराना है, जिससे उन्हें अलग-अलग एप्स और रेलवे काउंटरों के चक्कर न लगाने पड़ें। इस एकीकृत एप के जरिए यात्री आरक्षित टिकट, अनारक्षित टिकट और प्लेटफार्म टिकट की बुकिंग कर सकते हैं। लाइव स्टेटस से लेकर भोजन बुकिंग तक की सुविधा इसके अलावा पीएनआर स्टेटस, लाइव ट्रेन रनिंग स्टेटस, ट्रेन सर्च, कोच और सीट लोकेशन की जानकारी भी आसानी से प्राप्त की जा सकती है। यात्रा के दौरान ट्रेन में भोजन बुकिंग की सुविधा भी इसी प्लेटफार्म पर उपलब्ध है, जिससे यात्रियों को सुविधाजनक और समयबद्ध सेवाएं मिल रही हैं। एक ही एप पर इतनी सुविधाएं मिलने से यात्रा से पहले और यात्रा के दौरान जानकारी जुटाना सरल हो गया है।   डिजिटल पेमेंट पर मिलेगी 3% की छूट तो वहीं डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से रेलवे द्वारा अनारक्षित टिकटों की बुकिंग पर तीन प्रतिशत की छूट दी जा रही है। यह छूट 14 जनवरी से 14 जुलाई तक प्रभावी रहेगी और यूपीआई, मोबाइल वालेट, नेट बैंकिंग, डेबिट और क्रेडिट कार्ड सहित सभी स्वीकृत डिजिटल भुगतान माध्यमों पर लागू होगी। इससे रोजाना यात्रा करने वाले यात्रियों को सीधा आर्थिक लाभ मिल रहा है।

ना फूल–ना बेलपत्र, यहां बैगन से होती है पूजा—बिहार के अनूठे शिवधाम की खास परंपरा

वैशाली वैशाली जिले के जंदाहा प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत वसंतपुर धधुआ स्थित बाबा बटेश्वरनाथ धाम देश का एकमात्र ऐसा मंदिर माना जाता है, जहां वटवृक्ष के कंदरा से प्रकट काले रंग का शिवलिंग विराजमान है। यह प्राचीन और आस्था का केंद्र मंदिर दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के लिए जाना जाता है, जहां बड़ी संख्या में भक्त पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। बैगन चढ़ाने की अनोखी परंपरा बाबा बटेश्वरनाथ धाम के गर्भगृह में स्थापित भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग पर श्रद्धालु प्रसाद के रूप में बैगन (सब्जी) अर्पित करते हैं। क्षेत्र के किसान अपने खेतों में सब्जी की खेती करने के बाद पहली उपज के रूप में बैगन भगवान भोलेनाथ को चढ़ाते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मन्नतें यहां अवश्य पूरी होती हैं और मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु बैगन चढ़ाने जरूर आते हैं। मंदिर के उपाध्यक्ष अनिल कुमार सिंह ने बताया कि यह एक अत्यंत प्राचीन मंदिर है, जिसकी स्थापना का कोई लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है। मान्यता है कि शिवलिंग स्वयं वटवृक्ष के कंदरा से प्रकट हुआ है। मंदिर परिसर में भगवान नंदी महाराज की प्रतिमा भी स्थापित है और यहां शिवलिंग के साथ-साथ नंदी महाराज की भी विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। राजा जनक से जुड़ी ऐतिहासिक मान्यता अनिल कुमार सिंह ने बताया कि एक मान्यता के अनुसार, राजा जनक जब जनकपुर से चंपा घाट स्नान के लिए आते थे, तो उनका हाथी, जिस पर पुष्पक विमान सजा होता था, बाबा बटेश्वरनाथ धाम में रुकता था। राजा जनक यहां भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करने के बाद ही जनकपुर की ओर प्रस्थान करते थे। उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र कृषि प्रधान है। जब किसानों की सब्जी की फसल तैयार होती है, तो वे सब्जियों में से बैगन को प्रसाद और चढ़ावे के रूप में बाबा बटेश्वरनाथ को अर्पित करते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए बिहार के वैशाली, छपरा, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, पटना समेत कई जिलों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके अलावा असम के सिलचर, साथ ही नेपाल और रूस जैसे देशों से भी भक्त यहां आकर आशीर्वाद प्राप्त कर चुके हैं। अनिल कुमार सिंह ने बताया कि रूस से आए एक शिवभक्त ने रूस की मुद्रा चढ़ावे के रूप में अर्पित की थी, जिसे मंदिर संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। मंदिर प्रशासन का दावा है कि पूरे विश्व में इस आकार और स्वरूप का काले रंग का शिवलिंग कहीं और नहीं है, जो वटवृक्ष के कंदरा से प्राकृतिक रूप से प्रकट हुआ हो। यही कारण है कि बाबा बटेश्वरनाथ धाम की पहचान देश-विदेश तक फैली हुई है। महाशिवरात्रि और बसंत पंचमी पर भव्य मेला उन्होंने बताया कि महाशिवरात्रि और बसंत पंचमी के अवसर पर मंदिर परिसर में भव्य मेला लगता है। महाशिवरात्रि पर एक माह तक मेला आयोजित होता है, जिसमें सैकड़ों क्विंटल बैगन भगवान को चढ़ाया जाता है। वहीं, बसंत पंचमी पर एक दिन का मेला लगता है, जिसमें भी बैगन चढ़ाया जाता है, हालांकि मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। मेले में तेजपत्ता और लकड़ी से बने सामानों की खूब बिक्री होती है। इसके अलावा सावन माह में भी पूजा-अर्चना और जलाभिषेक को लेकर शिवभक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। पूरा मंदिर परिसर और आसपास का वातावरण भक्ति और श्रद्धा से सराबोर नजर आता है।

चार लेन का मेगा पुल बनेगा गेमचेंजर, एमपी के दो नेशनल हाईवे होंगे सीधे कनेक्ट

बेतुल एमपी के दो नेशनल हाईवे जल्द ही सीधे कनेक्ट हो जाएंगे। बैतूल-खेड़ी मार्ग पर 18 मीटर चौड़ा नया पुल बनाया जा रहा है जिससे दो राज्य भी जुड़ेंगे। मुख्य रूप से बैतूल शहर के लिए यह चार लेन पुल बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। करबला घाट पर माचना नदी पर बननेवाले इस नए पुल के लिए बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष और स्थानीय विधायक हेमंत खंडेलवाल ने भूमिपूजन किया। इस मौके पर आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय राज्य मंत्री दुर्गादास उइके, जिले के अन्य विधायक महेंद्र सिंह चौहान, चंद्रशेखर देशमुख, गंगाबाई उईके व डॉ. योगेश पंडाग्रे भी उपस्थित थे। नया पु​ल, पुराने जर्जर पुल के स्थान पर बनाया जा रहा है जो बैतूल को नेशनल हाईवे से जोड़ेगा। इससे यातायात सुगम होने के साथ ही सुरक्षित भी होगा। इस पुल के बन जाने से बैतूल की हरदा-इंदौर हाईवे और भोपाल-नागपुर हाईवे से सीधी कनेक्टिविटी मिलेगी। इतना ही नहीं, बारिश में माचना नदी में पानी भरने से उत्पन्न यातायात की समस्या भी खत्म हो जाएगी। चार-लेन पुल को 18 महीने में पूरा करने का लक्ष्य करबला घाट पर पुराना पुल करीब 80 साल पहले का है और यह खतरनाक हो चुका है। बैतूल-खेड़ी मार्ग पर नया पुल 100 मीटर लंबा और 18.50 मीटर चौड़ा होगा। इस चार-लेन पुल को 18 महीने में पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया है। बैतूल क्षेत्र के लिए यह एक महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट है जिससे यात्रा और आसान व सुरक्षित होगी। माचना के नए पुल के निर्माण से बैतूल शहर को हरदा-इंदौर नेशनल हाईवे और भोपाल-नागपुर हाईवे से सीधी कनेक्टिविटी मिलेगी। इसी के साथ एमपी की राजधानी भोपाल का महाराष्ट्र से सड़क संपर्क और सुगम हो जाएगा। पुल की प्रशासकीय लागत 18.43 करोड़ रुपए अधिकारियों ने बताया कि पुल की प्रशासकीय लागत 18.43 करोड़ रुपए और तकनीकी लागत 10.80 करोड़ रुपए निर्धारित की गई है। यह पुल चार लेन का होगी।

पुष्पों की रंगीन दुनिया: मुख्यमंत्री डॉ. यादव उद्घाटन करेंगे 30 जनवरी को

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मुख्य आतिथ्य में 30 जनवरी 2026 को राजधानी के हृदय स्थल गुलाब गार्डन में पुष्प महोत्सव का आयोजन किया जाएगा। महोत्सव में 5 हज़ार से अधिक गमले ओर 2 हज़ार से अधिक कट फ्लॉवर में विभिन्न किस्म के पुष्प की सुगंध का आनंद भोपालवासी उठा सकेंगे। महोत्सव की तैयारी की बैठक आयुक्त उद्यानकी ख़ाद्य संस्करण श्री अरविंद दुबे की अध्यक्षता में हुई। बेठक में नेशनल रोज सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष श्री सुशील प्रकाश, मध्यप्रदेश रोज सोसायटी के अध्यक्ष श्री गर्दे सहित अन्य सदस्य गण ओर विभागीय अधिकारी उपस्थित थे। आयुक्त श्री दुबे ने बताया कि राज्य सरकार वर्ष-2026 को कृषि वर्ष के रूप में मना रही है। इसी कड़ी में भव्य पुष्प महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। महोत्सव में भोपाल अलावा प्रदेश अन्य प्रमुख जिलो इंदौर, उज्जैन, नर्मदापुरम, पचमढ़ी, गुना ग्वालियर सहित अन्य जिलों से 5 हजार से अधिक गमलो ओर 2 हज़ार कट फ्लॉवर, प्रदर्शन किया जाएगा, जिलो से आने किसानों के पुष्प स्टॉल, नर्सरी के उत्पाद, आम जन के क्रय करने के लिए उपलब्ध रहेंगे।  

यमुना पर तीन प्रमुख बांध प्रोजेक्ट्स को मिली गति, केंद्र का फैसला दिल्ली के जलसंकट को सुलझाएगा

लखनऊ  कई दशकों से ठंडे बस्ते में पड़े यमुना और उसकी सहायक नदियों पर प्रस्तावित तीन बड़े बांध प्रोजेक्ट अब फिर से रफ्तार पकड़ने जा रहे हैं। केंद्र सरकार ने लखवार, रेणुकाजी और किशाऊ बांध परियोजनाओं की समीक्षा कर इन्हें पुनर्जीवित करने का फैसला लिया है। अधिकारियों के अनुसार, इन परियोजनाओं के पूरा होने से यमुना नदी में जल प्रवाह बेहतर होगा और राजधानी दिल्ली की पीने के पानी की जरूरतें अगले 25 वर्षों तक पूरी की जा सकेंगी। इन परियोजनाओं को लेकर हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और जल मंत्री प्रवेश वर्मा के साथ बैठक हुई थी। बैठक में यमुना के पुनर्जीवन और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में टिकाऊ जल उपलब्धता सुनिश्चित करने की व्यापक रणनीति पर चर्चा की गई। अधिकारियों का कहना है कि इन तीनों बांधों से मिलने वाला पानी दिल्ली की दीर्घकालिक जल समस्या का समाधान बन सकता है। दिल्ली में पानी की कमी, बढ़ती मांग वर्तमान में दिल्ली में औसतन 900 मिलियन गैलन प्रतिदिन (MGD) पानी का उत्पादन होता है, जबकि कुल मांग 1,113 MGD है। इसका मतलब है कि राजधानी को करीब 200 MGD पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, दिल्ली के कम से कम 10 प्रतिशत घरों में आज भी पाइप से पानी की नियमित आपूर्ति नहीं हो पा रही है। दिल्ली को कितना पानी मिलेगा      परियोजनाएं पूरी होने के बाद दिल्ली को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।     लखवार बांध से दिल्ली को लगभग 135 MGD पानी मिलेगा।     रेणुकाजी परियोजना से 275 MGD पानी मिलने की संभावना है।     किशाऊ परियोजना से 372 MGD पानी दिल्ली को उपलब्ध कराया जा सकेगा। इन तीनों परियोजनाओं से कुल मिलाकर पानी की आपूर्ति बढ़ेगी, जिससे मौसमी और अनियमित जल स्रोतों पर निर्भरता कम होगी। अधिकारियों के अनुसार, अगले 5 से 7 वर्षों में इन परियोजनाओं से दिल्ली को पानी मिलना शुरू हो सकता है। पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) में सुधार इन बांधों से केवल पानी की मात्रा ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि यमुना में ई-फ्लो (पर्यावरणीय प्रवाह) भी सुधरेगा। ई-फ्लो का मतलब नदी में पानी की वह मात्रा, समय और गुणवत्ता है, जो स्वस्थ जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और उस पर निर्भर मानव जीवन के लिए जरूरी होती है। अतिरिक्त 1,000 क्यूसेक पानी मिलने से यमुना की जल गुणवत्ता और प्रवाह की स्थिति बेहतर होने की उम्मीद है। परियोजनाओं की मौजूदा स्थिति     लखवार परियोजना (उत्तराखंड): अब तक करीब 12.6 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। इसे 2031 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।     रेणुकाजी परियोजना (हिमाचल प्रदेश): यह फिलहाल टेंडर प्रक्रिया के चरण में है और इसके 2032 तक पूरा होने की उम्मीद है।     किशाऊ परियोजना (उत्तराखंड–हिमाचल सीमा): यह अभी अंतरराज्यीय समझौते और मंजूरी के चरण में है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2033 रखा गया है। कई राज्यों को होगा फायदा इन परियोजनाओं से केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को भी लाभ मिलेगा। जल बंटवारा राज्यों की लागत भागीदारी के आधार पर किया जाएगा। इसके अलावा, इन बांधों से 760 मेगावाट से अधिक जलविद्युत उत्पादन की क्षमता भी विकसित की जाएगी। पहले क्यों रुकी थीं परियोजनाएं अधिकारियों के मुताबिक, इन परियोजनाओं के लंबे समय तक अटके रहने के पीछे कई कारण रहे:-     फंड की कमी     राज्यों के बीच विवाद     पर्यावरण और वन संबंधी मंजूरियों में देरी अब केंद्र सरकार के सक्रिय हस्तक्षेप के बाद इन बाधाओं को दूर करने की कोशिश की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये तीनों परियोजनाएं तय समयसीमा में पूरी हो जाती हैं, तो न केवल दिल्ली की जल आपूर्ति मजबूत होगी, बल्कि यमुना नदी के पुनर्जीवन की दिशा में भी यह एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।  

भारत-पाक बॉर्डर से सटे इलाकों में पाकिस्तानी सिम और आवाजाही पर 2 माह तक बैन

श्रीगंगा नगर. भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे श्रीगंगानगर जिले के इलाकों में राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तानी लोकल सिम कार्ड के उपयोग पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया गया है। श्रीगंगा नगर जिला मजिस्ट्रेट डॉ. मंजू ने बताया कि सीमा से लगे पाकिस्तानी क्षेत्र में स्थापित मोबाइल टॉवरों का नेटवर्क भारतीय सीमा के भीतर तीन से चार किलोमीटर तक आ सकता है, जिससे सुरक्षा संबंधी खतरे की आशंका बनी रहती है। इसी कारण यह निर्णय लिया गया है। शाम 7 से सुबह 6 बजे तक नो-गो जोन आदेशानुसार भारत-पाक बॉर्डर सटे 3 किमी के दायरे में शाम 7 से सुबह 6 बजे तक लोगों के आवागमन पर पूरी तरह बैन रहेगा। श्रीगंगानगर, श्रीकरणपुर, पदमपुर, रायसिंहनगर, अनूपगढ़ और घड़साना उपखंड से लगती सीमा पर यह नियम लागू होगा। वहीं, सिंचाई के लिए जाने वाले किसानों को बीएसएफ या सेना के अधिकारियों से परमिशन लेनी होगी। आदेश उल्लंघन पर होगी कानूनी कार्रवाई जिला मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए आदेश जारी किया है कि जिले के किसी भी ऐसे क्षेत्र में, जहां पाकिस्तानी नेटवर्क के जरिए संपर्क संभव है। पाकिस्तानी लोकल सिम के उपयोग पर रोक कोई भी व्यक्ति पाकिस्तानी लोकल सिम का उपयोग नहीं करेगा और न ही किसी को इसकी अनुमति दी जाएगी। आदेश का उल्लंघन करने पर दोषी के खिलाफ विधि अनुसार कार्रवाई की जाएगी। यह आदेश 15 जनवरी से आगामी दो माह की अवधि तक प्रभावशील रहेगा।

रॉयल राजस्थान: घूमने की 10 शानदार जगहें, जो आपकी ट्रैवल लिस्ट में जरूर हों

जयपुर राजस्थान को यूं ही राजाओं की धरती नहीं कहा जाता। किले, महल, झीलें, रेगिस्तान और वन्यजीवन—यहां का हर रंग यात्रियों को अलग अनुभव देता है। इतिहास की गूंज, परंपराओं की खुशबू और प्रकृति की भव्यता राजस्थान को भारत के सबसे खास पर्यटन राज्यों में शामिल करती है। अगर आप भारत में घूमने की योजना बना रहे हैं, तो राजस्थान की ये 10 जगहें आपकी लिस्ट में जरूर होनी चाहिए। आमेर किला, जयपुर जयपुर की पहाड़ियों पर स्थित आमेर किला राजपूत शौर्य और स्थापत्य कला का शानदार उदाहरण है। ऊंचे दरवाजे, नक्काशीदार दीवारें और शीश महल इसकी पहचान हैं। दिन के समय इसकी भव्यता और शाम को रोशनी में नहाया किला इतिहास को जीवंत कर देता है। सर्दियों का मौसम यहां घूमने के लिए सबसे बेहतर माना जाता है। उदयपुर सिटी पैलेस झीलों के शहर उदयपुर का सिटी पैलेस राजस्थानी और मुगल स्थापत्य का खूबसूरत संगम है। महल के आंगन, बालकनियां और संग्रहालय मेवाड़ राजघराने की शाही जिंदगी की झलक दिखाते हैं। पिछोला झील के किनारे बना यह महल सितंबर से मार्च के बीच सबसे ज्यादा आकर्षक लगता है। जैसलमेर किला थार रेगिस्तान के बीच खड़ा जैसलमेर किला आज भी आबाद है। सुनहरे पत्थरों से बना यह किला सूरज की रोशनी में अलग ही रंग बिखेरता है। इसकी गलियों में घूमते हुए सदियों पुरानी जीवनशैली को करीब से महसूस किया जा सकता है। सर्दियों में यहां का मौसम घूमने के लिए आदर्श रहता है। रणथंभौर नेशनल पार्क वन्यजीवन प्रेमियों के लिए रणथंभौर किसी सपने से कम नहीं। यहां खुले जंगल में बाघ को देखने का रोमांच अलग ही स्तर का होता है। इसके साथ ही पक्षी, हिरण और ऐतिहासिक खंडहर इस पार्क को खास बनाते हैं। अक्टूबर से जून तक का समय सफारी के लिए उपयुक्त माना जाता है। पुष्कर झील और ब्रह्मा मंदिर अरावली की गोद में बसा पुष्कर आध्यात्मिक शांति का केंद्र है। पवित्र झील के चारों ओर बने घाट और ब्रह्मा मंदिर इस शहर की पहचान हैं। यहां की गलियों में घूमते हुए संस्कृति और भक्ति का अनोखा संगम देखने को मिलता है। अक्टूबर से मार्च के बीच पुष्कर सबसे ज्यादा जीवंत रहता है। मेहरानगढ़ किला, जोधपुर नीले शहर जोधपुर के ऊपर स्थित मेहरानगढ़ किला राजस्थान के सबसे प्रभावशाली किलों में से एक है। इसकी ऊंचाई से पूरा शहर एक अलग ही रंग में नजर आता है। किले के भीतर मौजूद संग्रहालय और शाम का लाइट एंड साउंड शो पर्यटकों को खास अनुभव देता है। हवा महल, जयपुर जयपुर का हवा महल अपनी अनोखी बनावट के लिए दुनियाभर में मशहूर है। सैकड़ों झरोखों वाली यह इमारत राजघराने की महिलाओं के लिए बनाई गई थी। सुबह की रोशनी में इसका गुलाबी रंग बेहद आकर्षक दिखाई देता है। चित्तौड़गढ़ किला राजपूती वीरता और बलिदान की गाथाओं का प्रतीक चित्तौड़गढ़ किला भारत का सबसे बड़ा किला माना जाता है। विजय स्तंभ और मंदिरों से सजा यह किला इतिहास प्रेमियों को गहराई से प्रभावित करता है। सर्दियों में यहां घूमना सबसे आरामदायक रहता है। थार रेगिस्तान और कैमल सफारी रेत के टीलों के बीच ऊंट सफारी राजस्थान के सबसे यादगार अनुभवों में से एक है। सूर्यास्त के समय बदलते रंग और रात में तारों से भरा आसमान रेगिस्तान को जादुई बना देता है। अक्टूबर से मार्च तक का समय इसके लिए सबसे अच्छा माना जाता है। केवलादेव घना नेशनल पार्क, भरतपुर भरतपुर स्थित यह पक्षी अभयारण्य प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग जैसा है। सर्दियों में यहां प्रवासी पक्षियों का जमावड़ा देखने को मिलता है। शांत वातावरण और हरियाली इसे खास बनाती है। राजस्थान क्यों है खास राजस्थान सिर्फ किलों और महलों तक सीमित नहीं है। यहां के मेले, लोक संगीत, रंगीन बाजार और पारंपरिक खानपान हर यात्रा को यादगार बना देते हैं। चाहे इतिहास में रुचि हो या प्रकृति से लगाव, राजस्थान हर यात्री को कुछ न कुछ खास जरूर देता है।

रीवा के मोहन लाल द्विवेदी, 50 साल से बिना नींद के, डॉक्टरों के लिए अनसुलझी पहेली

 रीवा कहते हैं, बिना नींद के जिंदगी संभव नहीं. शरीर को स्वस्थ रखने के लिए नींद सबसे जरूरी मानी जाती है. लेकिन मध्य प्रदेश के रीवा में एक शख्स ऐसा भी है, जिसने पिछले 50 सालों से नींद नहीं ली, फिर भी वह पूरी तरह स्वस्थ है. इस अनोखे मामले ने डॉक्टरों को भी हैरानी में डाल दिया है. रीवा के रहने वाले रिटायर्ड ज्वाइंट कलेक्टर मोहन लाल द्विवेदी की उम्र करीब 75 साल है. मोहन लाल बताते हैं कि उन्होंने आखिरी बार इमरजेंसी के दौर में चैन की नींद ली थी, उसके बाद से आज तक उन्हें नींद नसीब नहीं हुई. हालात ऐसे हैं कि पलकें तो बंद होती हैं, लेकिन आंखों में नींद नहीं आती. न झपकी, न गहरी नींद… पिछले 50 सालों से उनकी आंखों से नींद जैसे गायब हो चुकी है. हैरत की बात ये है कि नींद न लेने के बावजूद मोहन लाल पूरी तरह स्वस्थ हैं. न थकान, न कमजोरी, न मांसपेशियों में दर्द. वह एक ही मुद्रा में घंटों बैठ सकते हैं और लंबे समय तक लगातार काम कर सकते हैं. मोहन लाल द्विवेदी ने बताया, ''मुझे नींद आती ही नहीं है. रात को लेट तो जाता हूं, लेकिन नींद नहीं आती. किताबें पढ़ता हूं, टहलता रहता हूं. अब तो यही दिनचर्या बन गई है.'' नौकरी के दिनों में उनकी कार्यशैली भी चर्चा का विषय रहती थी. उनके अधीनस्थ कर्मचारी उनके साथ काम करने से घबराते थे, क्योंकि मोहन लाल लगातार कई-कई घंटों तक बिना रुके काम करते थे. बाणसागर बांध परियोजना के दौरान वह कई किलोमीटर पैदल चलते थे, लेकिन उन्हें थकान महसूस नहीं होती थी. नींद न आने की इस समस्या को लेकर उन्होंने मुंबई और दिल्ली के बड़े-बड़े डॉक्टरों से भी सलाह ली, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला. योग, प्राणायाम से लेकर झाड़-फूंक तक सब कुछ आज़माया, मगर नींद फिर भी नहीं आई. मोहन लाल द्विवेदी बताते हैं, ''शुरुआत में परेशान था, लेकिन अब आदत हो गई है. शरीर साथ दे रहा है, यही बड़ी बात है.'' 50 साल बिना नींद के जिंदगी… विज्ञान के लिए भी ये एक रहस्य है. मोहन लाल द्विवेदी का यह अनोखा मामला आज भी डॉक्टरों के लिए एक सवाल बना हुआ है.