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गर्मी में राहत देगा प्याज का ठंडा रायता, 5 मिनट में बनकर होगा तैयार

मई की इस झुलसाने वाली गर्मी और कड़कती धूप में दोपहर के वक्त कुछ भी भारी या मसालेदार खाने का मन नहीं करता. भारी खाना गैस की समस्या को भी दावत दे सकता है. ऐसे में दोपहर के लंच में सादे दाल-चावल या दाल-रोटी के साथ अगर कुछ ठंडा-ठंडा मिल जाए तो खाने का स्वाद और बढ़ जाता है. गर्मियों के इस हैवी लंच को लाइट और रिफ्रेशिंग बनाने का सबसे बेस्ट तरीका है प्याज का ठंडा-ठंडा रायता. दही की ठंडी तासीर पेट को अंदर से राहत देती है और प्रोबायोटिक्स से भरपूर होने के कारण खाने को आसानी से पचाती है. वहीं दूसरी ओर प्याज को आयुर्वेद में लू से बचने का अच्छा तरीका माना जाता है. ऐसे में यहां हम आपको सिर्फ 5 मिनट में तैयार होने वाले इस प्याज के रायते की बेहद आसान और टेस्टी रेसिपी बता रहे हैं जो इस समर सीजन में आपको लू और डिहाइड्रेशन से कोसों दूर रखेगी. प्याज का रायता बनाने की सामग्री ताजा गाढ़ा दही – 2 कप प्याज – 1 बड़ा (बारीक कटा हुआ) हरी मिर्च – 1-2 (बारीक कटी हुई) पुदीने के पत्ते – 8-10 (बारीक कटे हुए) बारीक कटा हरा धनिया – 1 बड़ा चम्मच भुना जीरा पाउडर – 1 छोटा चम्मच काला नमक – आधा छोटा चम्मच सादा नमक – स्वादानुसार लाल मिर्च पाउडर या चाट मसाला – एक चुटकी (सजाने के लिए) बनाने का तरीका सबसे पहले एक बड़े मिक्सिंग बाउल में ताजा और गाढ़ा दही लें. व्हिस्कर या मथनी की मदद से दही को तब तक अच्छी तरह फेंटें जब तक कि वह एकदम स्मूद और मलाईदार न हो जाए. अगर दही बहुत ज्यादा गाढ़ा हो तो आप इसमें 2-3 चम्मच ठंडा पानी भी मिला सकते हैं. अब फेंटे हुए दही में बारीक कटा हुआ प्याज, हरी मिर्च, हरा धनिया और पुदीने के पत्ते डालें. पुदीना डालने से रायते का स्वाद और इसकी कूलिंग प्रॉपर्टीज दोनों बढ़ जाती हैं. इसके बाद बाउल में भुना जीरा पाउडर, काला नमक और सादा नमक डालकर सभी चीजों को चम्मच की मदद से अच्छी तरह मिक्स कर लें. तैयार रायते को कम से कम 15-20 मिनट के लिए फ्रिज में रख दें ताकि यह एकदम चिल्ड हो जाए. सर्व करते समय ऊपर से एक चुटकी भुना जीरा पाउडर, लाल मिर्च पाउडर या चाट मसाला और पुदीने की पत्ती से गार्निश करें. इसे दोपहर के लंच में गरमा-गरम दाल-रोटी या बिरयानी के साथ ठंडा-ठंडा परोसें.

प्याज की बदबू से पाएं छुटकारा, सेब से लेकर नींबू तक ये तरीके आएंगे काम

 खाने में प्याज का इस्तेमाल स्वाद को दोगुना कर देता है. दूसरे मौसमों की अपेक्षा गर्मी के मौसम में प्याज की खपत अधिक होती है क्योंकि ये नेचुरल तरीके से शरीर को अंदर से ठंडा करने में मदद करती है. लेकिन प्याज खाने या काटने की सबसे बड़ी समस्या ये है कि उसमें काफी तेज बदबू आती है. दरअसल, प्याज काटने और खाने के बाद उसमें मौजूद सल्फर कंपाउंड्स मुंह के जरिए फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं, जिससे सांसों से लंबे समय तक स्मेल आती रहती है. हाथों से प्याज काटते वक्त यह स्मेल स्किन में समा जाती है जो साधारण साबुन से नहीं जाती. इसे दूर करने के लिए कुछ साइंटिफिक और घरेलू तरीके बेहद कारगर हैं.   सेब का कमाल हेल्थलाइन के मुताबिक, प्याज खाने के बाद अगर आप एक सेब खाते हैं तो यह काफी मददगार होता है. सेब में मौजूद नेचुरल एंजाइम्स प्याज के सल्फर कंपाउंड्स को ब्रेक करने का काम करते हैं. यदि आप प्याज खाने की थोड़ी देर बाद सेब जैसे फल का सेवन करते हैं तो सांसों की दुर्गंध को कम करने में मदद मिल सकती है. नींबू और साइट्रस फ्रूट्स केयर फ्री डेंटल के मुताबिक, हाथों की बदबू दूर करने के लिए नींबू का रस एक बेहतरीन ऑपशन है. नींबू में मौजूद सिट्रिक एसिड न केवल बैक्टीरिया को मारता है बल्कि प्याज की स्मेल को भी खत्म करता है. नींबू पानी से कुल्ला करना या हाथों पर इसे रगड़ना बदबू को तुरंत कम कर सकता है. ग्रीन टी का सेवन Vinmec Health की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीन टी में पॉलीफेनोल्स नाम के पावरफुल एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं. ये कंपाउंड प्याज में मिलने वाले गंध पैदा करने वाले कंपाउंड्स को खत्म करने में मदद करते हैं. इसलिए खाने के बाद 1 कप गर्म ग्रीन टी पीने से मुंह की ताजगी बनी रहती है और बैक्टीरिया का असर कम होता है. स्टेनलेस स्टील और नमक क्या आप जानते हैं कि हाथों को स्टेनलेस स्टील पर रगड़ने से प्याज की गंध गायब हो जाती है. इसका कारण है कि स्टील के मॉलिक्यूल्स प्याज के सल्फर के साथ बाइंड होकर उसे स्किन से हटा देते हैं. साथ ही हाथों पर थोड़ा नमक रगड़कर धोने से भी स्मेल काफी हद तक कम हो जाती है. बेकिंग सोडा और विनेगर मुंह की स्मेल के लिए एप्पल साइडर विनेगर या बेकिंग सोडा का पानी से कुल्ला करना एक अच्छा उपाय है. यह मुंह के pH लेवल को बैलेंस करता है जिससे बैक्टीरिया नहीं पनपते. WebMD के मुताबिक, बेकिंग सोडा ओरल हाइजीन बनाए रखने और बदबू को कंट्रोल करने में काफी प्रभावी हो सकते हैं.

मोबाइल स्क्रीन और गिरता बर्थ रेट! रिसर्च के दावे से दुनिया में हलचल

 नई दिल्ली दुनिया के कई देशों में एक बड़ी समस्या तेजी से बढ़ रही है. लोग पहले के मुकाबले कम बच्चे पैदा कर रहे हैं. कई देशों में हालात ऐसे हो गए हैं कि वहां की आबादी धीरे-धीरे घटने लगी है। पहले माना जाता था कि इसकी सबसे बड़ी वजह महंगाई, नौकरी का दबाव, छोटे घर और बदलती लाइफस्टाइल है. लेकिन अब रिसर्च में एक नया और चौंकाने वाला एंगल सामने आ रहा है. साइंटिस्ट्स और रिसर्चर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या स्मार्टफोन और सोशल मीडिया भी जन्म दर घटने की बड़ी वजह बन चुके हैं।  सोशल मीडिया बदल रहा है लाइफ फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के दो-तिहाई से ज्यादा देशों में बर्थ रेट उस स्तर से नीचे जा चुकी है, जिसे आबादी को स्टेबल रखने के लिए जरूरी माना जाता है।  आसान शब्दों में कहें तो अब कई देशों में लोग इतने बच्चे पैदा नहीं कर रहे कि अगली पीढ़ी पुरानी आबादी की जगह ले सके. साउथ कोरिया, जापान, चीन, यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में यह प्रॉब्लम पहले से थी, लेकिन अब लैटिन अमेरिका, मिडिल ईस्ट और एशिया के कई देशों में भी यही ट्रेंड तेजी से दिख रहा है।  रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 10-15 साल में बर्थ रेट में अचानक आई गिरावट सिर्फ आर्थिक वजहों से नहीं समझाई जा सकती. रिसर्चर्स का मानना है कि स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने लोगों की जिंदगी जीने का तरीका बदल दिया है।  अब लोग पहले की तरह बाहर मिलना-जुलना कम कर रहे हैं. रिलेशनशिप बनाना मुश्किल हो रहा है और अकेलापन बढ़ रहा है. यही चीज आगे चलकर शादी और बच्चों पर असर डाल रही है।  जहां इंटरनेट फास्ट वहां बर्थ रेट स्लो! एक स्टडी में अमेरिका और ब्रिटेन में 4G इंटरनेट नेटवर्क आने के बाद के डेटा को देखा गया. इसमें पाया गया कि जिन इलाकों में तेज मोबाइल इंटरनेट पहले पहुंचा, वहां बर्थ रेट ज्यादा तेजी से गिरी. रिसर्चर्स का कहना है कि स्मार्टफोन आने के बाद यंगसटर्स का ज्यादा समय ऑनलाइन जाने लगा और आमने-सामने मिलने का समय कम हो गया।  एक्सपर्ट्स का कहना है कि अब डेटिंग, दोस्ती और रिश्तों का बड़ा हिस्सा स्क्रीन तक सीमित होता जा रहा है. सोशल मीडिया पर लोग लगातार दूसरों की परफेक्ट लाइफ देखते रहते हैं, जिससे रिश्तों को लेकर उम्मीदें बदल रही हैं. कई लोग लंबे रिश्ते बनाने से बच रहे हैं. अकेले रहने वाले युवाओं की संख्या भी बढ़ रही है।  रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पहले जन्म दर इसलिए घटती थी क्योंकि शादीशुदा जोड़े कम बच्चे पैदा करते थे. लेकिन अब सबसे बड़ा कारण यह बन रहा है कि रिश्ते ही कम बन रहे हैं. यानी बड़ी संख्या में लोग शादी या लंबे रिलेशनशिप तक पहुंच ही नहीं रहे।  हालांकि एक्सपर्ट्स सिर्फ स्मार्टफोन को ही पूरी तरह जिम्मेदार नहीं मानते. महंगे घर, नौकरी का दबाव, बच्चों की पढ़ाई का खर्च और भविष्य को लेकर डर भी बड़ी वजहें हैं. कई देशों में युवाओं को स्थायी नौकरी और घर खरीदना मुश्किल लग रहा है. ऐसे में वे शादी और बच्चों का फैसला टाल रहे हैं।  सोशल मीडिया का असर मेंटल हेल्थ पर भी देखा जा रहा है. कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि लगातार स्क्रीन पर रहने से अकेलापन, तनाव और डिप्रेशन बढ़ रहा है. इससे लोगों की सोशल लाइफ प्रभावित हो रही है।  कुछ देशों में सरकारें इस गिरती जन्म दर को रोकने के लिए पैसे भी दे रही हैं. जापान और साउथ कोरिया जैसे देशों में बच्चों के लिए आर्थिक मदद, टैक्स छूट और दूसरी योजनाएं चलाई जा रही हैं. लेकिन इसके बावजूद जन्म दर में खास सुधार नहीं दिख रहा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ पैसे देने से समस्या हल नहीं होगी, क्योंकि असली बदलाव लोगों की लाइफस्टाइल और सोशल बिहेवियर में आया है।   

ऑफिस के तनाव से हैं परेशान? अपनाएं ये आसान आदतें और रखें मेंटल हेल्थ फिट

 आज की इस बिजी लाइफस्टाइल में पर्सनल लाइफ के अलावा ऑफिस का स्ट्रेस होना भी सबसे बड़ी प्रॉब्लम्स में से एक बन गया है. हर समय काम का प्रेशर, समय पर अपने सारे टार्गेट्स अचीव करने की टेंशन और घंटों तक स्क्रीन की तरफ ही देखते रहना आपको मेंटली और फिजिकली दोनों ही तरीके से थका देता है. ऐसे में यह काफी जरूरी हो जाता है कि आप इस स्ट्रेस को जितना जल्दी हो सके कम करने की कोशिश करें. अगर आप समय रहते इसे कम नहीं करते हैं, तो इसका सीधा असर आपके हेल्थ, नींद और रिश्तों पर पड़ता है. आज की इस आर्टिकल में हम आपको कुछ ऐसी आसान आदतों के बारे में जिन्हें अपनाकर आप काफी आसानी से ऑफिस के स्ट्रेस को कम कर सकते हैं. तो चलिए इन उपायों के बारे में विस्तार से जानते हैं ताकि आपका मेंटल और फिजिकल हेल्थ एक बार फिर से सही ट्रैक पर वापस आ जाए. काम के बीच लें छोटे-छोटे ब्रेक जब आप घंटों तक एक ही जगह पर बैठकर एक ही तरह का काम करते रहते हैं, तो आपका दिमाग थकना शुरू हो जाता है और स्ट्रेस भी बढ़ने लगता है. अगर आप ऑफिस में बैठकर लगातार काम कर रहे हैं तो हर एक से दो घंटे के बीच एक बार कम से कम 10 मिनट का ब्रेक जरूर लें. इस समय अपनी सीट से उठ जाएं और थोड़ी देर टहलें, पानी पीएं या फिर खिड़की के पास खड़े होकर फ्रेश ऑक्सीजन लें. जब आप ऐसा करते हैं तो आपका दिमाग रिलैक्स हो जाता है और साथ ही दोबारा काम करने में आपका मन लगने लगता है. अपनी डेली रूटीन को रखें व्यवस्थित अक्सर हमारी यह आदत होती है कि हम एक ही समय में कई काम करने की कोशिश करते हैं. आपकी इस आदत की वजह से भी स्ट्रेस काफी ज्यादा बढ़ सकता है. स्ट्रेस से बचने के लिए सुबह सोकर उठते ही अपने सभी जरूरी कामों की लिस्ट तैयार कर लें और उन्हें प्रायोरिटी के हिसाब से सेट करके पूरा कर लें. जब सारे काम व्यवस्थित तरीके से होने लगते हैं, तो आपके दिमाग पर प्रेशर काफी कम पड़ता है और साथ ही आपकी समय भी बेकार की चीजों में बर्बाद नहीं होता है. हेल्दी डाइट और हाइड्रेशन का रखें ख्याल जब आप स्ट्रेस में होते हैं तो इसका काफी गहरा असर आपके खाने-पीने की आदत पर भी पड़ता है. कई लोग स्ट्रेस में होने की वजह से जंक फूड्स खाना शुरू कर देते हैं. इसकी वजह से आपका शरीर और भी ज्यादा सुस्त महसूस करने लगता है. जब आप ऑफिस में काम कर रहे हों तो हमेशा एक हेल्दी और लाइट डाइट ही लें. इसके अलावा फलों, ड्राई फ्रूट्स और सही मात्रा में पानी पीने की आदत को भी अपने डेली रूटीन का हिस्सा बनाएं. जब आपका शरीर हाइड्रेटेड रहेगा तो आपका दिमाग काफी ज्यादा बेहतर तरीके से काम करने लग जाएगा. स्मार्टफोन और स्क्रीन से बनाएं थोड़ी दूरी अगर आप ऑफिस के कामों को खत्म करने के बाद भी लगातार स्मार्टफोन और लैपटॉप में ही घुसे हुए रहते हैं, तो इसकी वजह से आपके दिमाग को आराम करने का बिलकुल भी समय नहीं मिलता है. कोशिश करें कि जब भी आपका काम खत्म हो जाए, तो कुछ देर के लिए स्मार्टफोन और लैपटॉप जैसी चीजों से दूर रहें. आपके लिए बेहतर होगा कि आप अपने परिवार के साथ समयबिताएं , इस समय कोई किताब पढ़ें या फिर अपनी पसंद का कोई काम ही कर लें. जब आप ऐसा करते हैं तो आपका मेंटल स्ट्रेस देखते ही देखते खत्म होने लग जाता है. योगा और मेडिटेशन की ले सकते हैं मदद अगर आप वाकई में ऑफिस में होने वाली स्ट्रेस को कंट्रोल में रखना चाहते हैं, तो अपनी डेली रूटीन में योगा और मेडिटेशन को जरूर शामिल कर लें. जब आप हर दिन कम से कम 15 मिनट मेडिटेशन करना, गहरी सांसें लेना और एक्सरसाइज करना शुरू कर देंगे तो आपका मन काफी ज्यादा शांत रहने लग जाएगा. इससे आपका स्ट्रेस भी कम होगा और साथ ही गुस्सा भी कंट्रोल में रहने लगेगा. यह छोटा सा उपाय आपके कामों को करने की कैपसिटी को भी बढ़ा देता है.

भारत में D2D सैटेलाइट टेक्नोलॉजी पर बड़ा कदम, लेकिन ऐपल-गूगल ने उठाए नियमों और बैटरी खपत पर सवाल

भारत डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) सैटेलाइट कनेक्टिविटी लाने पर काम कर रहा है। बता दें कि यह एक ऐसी टेक्नोलॉजी है, जिसके जरिए स्मार्टफोन उन इलाकों में सीधा सैटेलाइट से जुड़ सकेंगे, जहां मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे सरकार इस टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ रही है ऐपल और गूगल ने इस बारे में सरकार से और क्लियरिटी यानी स्पष्टता मांगी है। कंपनियों ने इसके लिए कई चिताएं जताई हैं। कंपनियों के अनुसार, इस तकनीकी के लिए डिवाइस को अधिक बैटरी या पावर की जरूरत होती है। रिपोर्ट की मानें तो कंपनियों का मानना है कि भारत के नियमों के तहत ये सेवाएं कैसे काम करेंगी। आइये, पूरी खबर डिटेल में जानते हैं। क्या होंगे नियम? इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, कुछ महीने पहले सैटेलाइट कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी पर चर्चा हुई थी। इस दौरान ऐपल ने दूरसंचार विभाग (DoT) के साथ अपने विचार शेयर किए थे। गूगल और कई अन्य शेयरहोल्डर्स ने भी नियामक को अपनी प्रतिक्रिया दी है। कंपनियां जानना चाहती हैं कि भारत में सैटेलाइट के जरिए मैसेज भेजने और मुसीबत के समय इमरजेंसी कॉल या मैसेज करने वाली तकनीक किस तरह काम करेगी और इसके नियम क्या होंगे। क्या है D2D? यह टेक्नोलॉजी भारत में उन जगहों के लिए बहुत उपयोगी है, जहां पहाड़ी राज्यों, घने जंगलों और सीमावर्ती जिलों में मोबाइल कवरेज अभी भी पूरी तरह से उपलब्ध नहीं है। कई दूरदराज के इलाकों में, टेलीकॉम टावर लगाना या तो मुश्किल है या फिर आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं है। कंपनियों द्वारा उठाई गई तकनीकी सवाल रिपोर्ट की मानें तो टेक कंपनियों ने कई तकनीकी और इंजीनियरिंग चुनौतियों के बारे में बताया है। इन्हें सैटेलाइट कनेक्टिविटी को आम स्मार्टफोन पर सैटेलाइट कनेक्टिविटी वाले से पहले हल करना अभी भी बाकी है। सबसे बड़ी चिंताओं में से एक बैटरी का जल्दी खत्म होना है। ट्रेडिशनल मोबाइल नेटवर्क की तुलना में, लो-अर्थ-ऑर्बिट सैटेलाइट से सीधे जुड़ने के लिए काफी ज्यादा बिजली और पावर की जरूरत होती है। दूसरी परेशानी एंटीना की सीमाएं हैं। स्मार्टफोन को पतला और कॉम्पैक्ट डिजाइन के साथ लाया जाता है। इस कारण इनमें स्थिर सैटेलाइट कम्युनिकेशन बनाए रखने के लिए जरूरी हार्डवेयर फिट करने के लिए जगह कम होती है। अन्य चिंताएं इसके अलावा कंपनियों ने देश की कुछ वास्तविक स्थितियां जैसे मुश्किल इलाके और पर्यावरणीय कारकों को भी बाधा बताया है। ऐसे इलाकों में भरोसेमंद कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने में आने वाली कठिनाइयों की ओर भी ध्यान देने को कहा है। इसके अलावा, मौजूदा 4G और 5G मोबाइल नेटवर्क के साथ सैटेलाइट कम्युनिकेशन को इस तरह से जोड़ना कि यूजर्स के अनुभव पर कोई बुरा असर ना पड़े, अभी भी एक और बड़ी चुनौती बनी हुई है।​ TRAI ने भी मांगी राय टेलीकम्युनिकेशन विभाग अभी इंडस्ट्री के लोगों के साथ इनफॉर्मल बातचीत कर रहा है, ताकि आधाकारिक नियम बनाने से पहले D2D सैटेलाइट टेक्नोलॉजी की संभावनाओं और सीमाओं को बेहतर ढंग से समझा जा सके। इसके साथ ही, भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने भी एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया है, जिसमें यह राय मांगी गई है कि क्या ऐसी सेवाओं के लिए डेडिकेटेड सैटेलाइट स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किया जाना चाहिए या मौजूदा मोबाइल नेटवर्क एयरवेव्स का। इन चर्चाओं से समझ आ रहा कि जहां एक तरफ भारत सरकार अमेरिका की तरह डॉयरेक्ट टू डिवाइस टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ रही। वहीं, टेक कंपनियों को अभी कई चिताएं हैं।  

घर के ये 6 डिवाइस चुपचाप खा रहे हैं बिजली, UPPCL ने दी स्टैंडबाय मोड से बचने की सलाह

क्या आप जानते हैं कि घर में कई डिवाइस भले ऑफ दिखें लेकिन वे असल में लगातार बिजली खा रहे होते हैं। इसे लेकर यूपी पावर कॉरपोरेशन ने एक ट्वीट करते हुए अगाह किया है कि कैसे स्टैंडबाय मोड पर टीवी-चार्जर जैसे डिवाइस लगातार बिजली खाते रहते हैं। हमने अपनी पड़ताल में पाया कि ऐसे 6 गैजेट्स आमतौर पर घरों में मिल जाते हैं जो दिखते तो ऑफ हैं लेकिन स्टैंडबाय मोड में बिजली चूसते रहते हैं। UPPCL ने अपने ट्वीट में बताया कि छोटी सी सावधानी बड़े बिल की समस्या को खत्म कर सकती है। यहां सावधानी से मतलब उस आदत से है, जिसके चलते लोग टीवी, चार्जर या सेट टॉप बॉक्स जैसे डिवाइसेज को स्टैंडबाय मोड में छोड़ देते हैं। क्या होता है स्टैंडबाय मोड? स्टैंडबाय मोड एक ऐसी अवस्था है जिसमें डिवाइस भले काम नहीं कर रहा होता लेकिन वह चालू होता है। यह मोड टीवी या सेट टॉप बॉक्स जैसे डिवाइसेज में इसलिए मिलता है ताकि इन्हें इस्तेमाल करने का अनुभव स्मूद बना रहे। दरअसल अगर आप किसी डिवाइस को पूरी तरह से ऑफ करते हैं, तो उसे फिर से पूरी तरह चालू होने में कुछ समय लगता है। इस समय को बचाने का काम स्टैंडबाय मोड करता है, लेकिन इसमें बिजली की खपत होती रहती है। UPPCL के मुताबिक इस तरह के डिवाइसेज को स्टैंडबाय मोड में ना छोड़कर पूरी तरह से बंद करने की आदत डालनी चाहिए। इससे बिजली की बचत होती है और डिवाइसेज की लाइफ भी बढ़ जाती है। अब यह समझना जरूरी है कि कौन से वो डिवाइस या गैजेट्स हैं जो घरों में आमतौर पर स्टैंडबाय मोड में छोड़ दिए जाते हैं। टीवी को करें स्विच ऑफ अगर टीवी को आप रिमोट से ऑफ करें, तो वह टर्न ऑफ नहीं होता बल्कि स्टैंडबाय मोड में चला जाता है। इस मोड में टीवी लगातार बिजली खाता रहता है, भले ही वह चलता हुआ दिख ना रहा हो। ऐसे में टीवी को बंद करने के लिए रिमोट नहीं बल्कि स्विच का इस्तेमाल करना चाहिए। सेट-टॉप बॉक्स को करें ऑफ सेट-टॉप बॉक्स भी टीवी की तरह ही स्टैंडबाय मोड पर लगातार बिजली खाता रहता है। ऐसे में टीवी की तरह ही सेट टॉप बॉक्स का भी स्विच ऑफ करना एक बेहतर आदत मानी जा सकती है। UPPCL की सलाह चार्जर को इस्तेमाल के बाद निकालें टीवी और सेट टॉप बॉक्स के बाद स्टैंडबाय मोड पर रहने वाला सबसे कॉमन डिवाइस चार्जर होता है। इसे भी लोग प्लग में लगा छोड़ देते हैं और चार्जर बिना किसी चीज को चार्ज किए ही बिजली खाता रहता है। ऐसे में चार्जर को इस्तेमाल के तुरंत बाद प्लग से निकालने की आदत डालें। AC को ना करें रिमोट से बंद AC को भी लोग टीवी और सेट टॉप बॉक्स की तरह रिमोट से बंद करके समझ लेते हैं कि वह ऑफ हो गया है। असल में AC का सर्किट भी टीवी और सेट टॉप बॉक्स की तरह ही स्टैंडबाय मोड में बिजली फूंकता रहता है। ऐसे में AC को भी पीछे से जरूर बंद करें। राउटर को बंद करने की आदत डालें Wi-Fi राउटर के साथ भी यह समस्या देखी गई है कि लोग इन्हें एक बार ऑन करके हमेशा-हमेशा के लिए भूल जाते हैं। हालांकि आदत ऐसी होना चाहिए कि आप जब लंबे समय के लिए WiFi इस्तेमाल न करने वाले हों, तो WiFi राउटर को ऑफ कर दें। ऐसा आप रात में सोते समय या फिर घर से बाहर जाते समय करने की आदत बना लें। भर जाए RO तो कर दें बंद अक्सर देखा गया है कि घरों में RO भी स्टैंडबाय मोड में बिजली खाता रहता है। जबकि RO को आप एक बार टैंक फुल करके तब तक के लिए बंद कर सकते हैं, जब तक कि टैंक में पानी कम ना हो जाए। इससे भी आप फिजूल खर्च होने वाली बिजली को बचा सकेंगे।

लू और गर्मी से बचाएगी सत्तू की छाछ, जानें देसी सुपर ड्रिंक की रेसिपी

इन दिनों सूरज की तपिश और झुलसाने वाली गर्मी और लू ने लोगों का हाल बेहाल किया हुआ है. कड़कती धूप और उमस के कारण शरीर का हाइड्रेशन लेवल तेजी से गिरता है जिससे थकान, चक्कर आना और पेट में जलन-एसिडिटी जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं. ऐसे में बहुत से लोग सुबह नाश्ते में चाय या हैवी पराठे खा लेते हैं जो पेट की गर्मी को और बढ़ा देते हैं. अगर आप इस चुभती-जलती गर्मी से खुद को बचाना चाहते हैं तो सुबह के नाश्ते में सत्तू की नमकीन छाछ को जरूर शामिल करें. भुने चने से बना सत्तू जहां प्रोटीन और फाइबर का पावरहाउस है. वहीं छाछ यानी मट्ठा पेट के लिए बेहतरीन प्रोबायोटिक का काम करती है. इन दोनों का यह देसी और पारंपरिक मेल न केवल आपके पेट को अंदर से बर्फ जैसी ठंडक पहुंचाता है बल्कि भयंकर लू और डिहाइड्रेशन से लड़ने के लिए दिनभर शरीर को भरपूर एनर्जी भी देता है. सत्तू की छाछ बनाने के लिए सामग्री भुने चने का सत्तू – 3 बड़े चम्मच ताजा दही या मट्ठा (छाछ) – 1 बड़ा गिलास ठंडा पानी – आधा गिलास (अगर दही का इस्तेमाल कर रहे हैं) पुदीने के पत्ते – 8-10 (बारीक कटे या क्रश किए हुए) हरी मिर्च – 1 छोटा चम्मच (बारीक कटी हुई, वैकल्पिक) भुना जीरा पाउडर – 1 छोटा चम्मच काला नमक – आधा छोटा चम्मच नींबू का रस – 1 चम्मच बर्फ के टुकड़े बनाने का तरीका अगर आप दही ले रहे हैं तो एक बड़े बर्तन या ब्लेंडर जार में दही और थोड़ा पानी डालकर उसे अच्छी तरह मथ लें ताकि वो पतला होकर छाछ की तरह बन जाए. अगर आप छाछ ले रहे हैं तो उसे फेंटने की जरूरत नहीं है. अब छाछ में 3 बड़े चम्मच सत्तू डालें. मथनी या व्हिस्कर की मदद से इसे अच्छी तरह मिलाएं ताकि सत्तू की कोई गुठली न रहे और यह पूरी तरह स्मूदी जैसा एकसार हो जाए. इस गाढ़े घोल में भुना जीरा पाउडर, काला नमक, बारीक कटे पुदीने के पत्ते, हरी मिर्च और नींबू का रस डालकर एक बार फिर अच्छी तरह मिक्स कर लें. अब एक सर्विंग ग्लास में 2-3 आइस क्यूब्स डालें और ऊपर से तैयार सत्तू की छाछ पलटें. ऊपर से थोड़े से भुने जीरे और पुदीने की पत्ती से सजाकर सुबह नाश्ते के साथ या धूप में निकलने से ठीक पहले इसका आनंद लें.

धारीदार या चिकना तरबूजम,कौन सा ज्यादा मीठा और रसीला होता है? जानें सच

लाल और रसीले तरबूज गर्मियां आते ही बाजार में बिकने शुरू हो जाते हैं, जिन्हें देखकर ही मुंह में पानी आने लगता है. गर्मियों में तो तरबूज सबसे ज्यादा मार्केट में देखने को मिलते हैं और लोग उनको काफी खाते भी हैं. लाल और रसीले के अलावा लोगों के मन में तरबूज खरीदते समय यह भी सवाल आता है कि हरा चिकना या धारीवाला यानी लाइनों वाले तरबूज में से कौन-सा खाना ज्यादा फायदेमंद होगा. धारीवाला और चिकना हरा तरबूज में से कौन ज्यादा मीठा और रसीला होता है, इसे लेकर लोगों के मन में काफी सवाल आते हैं. अगर आप भी इसी कन्फ्यूजन में रहते हैं, तो आइए आपकी इस उलझन का हल कर देते हैं. अगली बार जब भी आप तरबूज खरीदने जाएं तो बिना किसी झंझट के सही और लाल-रसीला तरबूज ही खरीदकर लाएंगे. दोनों तरबूज में क्या फर्क होता है? धारीदार तरबूज की बाहरी सतह पर हल्की और गहरी ग्रीन कलर री लाइन्स बनी होती है. वहीं बिना धारी वाले तरबूज का कलर डार्क ग्रीन कलर का होता है और वो चिकना होता है. यह असल में दोनों अलग-अलग किस्म के तरबूज होते हैं, लेकिन दोनों एक ही फैमिली से आते हैं. इन दोनों में सिर्फ इतना ही फर्क होता है कि इनका ऊपरी डिजाइन अलग होता है, टेस्ट में थोड़ा बहुत फर्क हो सकता है, सेहत के फायदे लगभग एक जैसे ही होते हैं. इतना ही नहीं इन दोनों तरह के तरबूज में पोषण लगभग बराबर मात्रा में मौजूद होते हैं. तरबूज में 90 प्रतिशत से ज्यादा पानी होता है, जो शरीर को गर्मी में हाइड्रेट रखने में मदद करता है. इसके अलावा इसमें विटामिन C, विटामिन A,एंटीऑक्सीडेंट और लाइकोपीन पाए जाते हैं. लाइकोपीन के फायदे? लाइकोपीन दिल की सेहत के लिए अच्छा माना जाता है, इसके साथ ही तरबूज कम कैलोरी वाला फल है. इसलिए यह उन लोगों के लिए बहुत फायदेमंद होता है जो वेट लॉस कर रहे हैं. कौन सा तरबूज ज्यादा मीठा होता है? कई लोग मानते हैं कि धारीदार तरबूज ज्यादा मीठा होता है, जबकि बिना धारी वाला थोड़ा कम मीठा और सख्त हो सकता है. जबकि मिठास इस बात पर निर्भर करती है कि तरबूज कितना पका हुआ है और उसे कैसे उगाया गया है.यानी सिर्फ धारियों को देखकर यह फैसला नहीं किया जा सकता कि कौन सा तरबूज ज्यादा मीठा होगा. इसलिए दोनों ही तरबूज अच्छे हैं और गर्मी में बिना किसी झंझट के दोनों को आराम से आप खा सकते हैं. अच्छा तरबूज खरीदते समय किन बातों का ध्यान रखें?     तरबूज में नीचे पीला धब्बा हो, जिसका मतलब फल प्राकृतिक तरीके से पका है.     तरबूज अपने आकार के हिसाब से भारी लगे     थपथपाने पर गहरी खोखली आवाज आए     कटे, दबे या नरम हिस्सों वाला तरबूज न लें  

मोटापे और खर्राटों पर बड़ा दावा! एक इंजेक्शन ने स्टडी में दिखाया असरदार परिणाम

आगरा मोटापा से मधुमेह, खर्राटे, युवतियों में मासिक धर्म अनियमित होने के साथ ही फैटी लिवर की समस्या तेजी से बढ़ी है। एसएन मेडिकल कॉलेज में मोटापे के साथ इन बीमारियों से पीड़ित मरीजों पर स्टडी की गई, मरीजों को तीन महीने तक हर सप्ताह तिरजेपाइड इंजेक्शन दिया गया। तीन महीने में 10 प्रतिशत तक वजन वजन कम हो गया। इसके साथ ही खर्राटे की समस्या और पाली सिस्टिक ओवरी डिसऑर्डर (पीसीओएस ) से मासिक धर्म अनियमित होने की समस्या भी ठीक हो गई। यह स्टडी इसी वर्ष जर्नल ऑफ मिड टर्म में प्रकाशित हुई है। एसएन मेडिकल कॉलेज में 93 मरीजों पर की गई स्टडी के चौंकाने वाले नतीजे मधुमेह रोगियों में शुगर का स्तर नियंत्रित रखने के लिए तिरजेपाइड इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है। यह इंजेक्शन सप्ताह में एक बार लेना होता है। मरीज को दवाएं और इंसुलिन लेने की जरूरत नहीं पड़ती है। इससे वजन भी कम होता है। एसएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के डॉ. प्रभात अग्रवाल ने बताया कि मोटापे के कारण मधुमेह, खर्राटे, पीसीओएस, फैटी लिवर से पीड़ित 18 वर्ष से अधिक आयु के 93 मरीजों पर स्टडी की गई। इसमें मधुमेह रोगी 23 मरीज थे जबकि 70 मरीजों को मधुमेह नहीं था उन्हें खर्राटे सहित अन्य बीमारियां थी। इन्हें तीन महीने तक हर सप्ताह तिरजेपाइड इंजेक्शन दिया गया, पहले महीने 2.5 एमजी, दूसरी महीने 5 एमजी और तीसरे महीने 7.5 एमजी दिया गया। तीन महीने तक एक इंजेक्शन हर सप्ताह देने से सात किलोग्राम तक वजन हुआ कम डॉक्टर प्रभात अग्रवाल ने बताया कि तीन महीने में जिन मरीजों को मधुमेह की समस्या नहीं थी उनका सात किलोग्राम से अधिक वजन (10 प्रतिशत ) और जिनको मधुमेह की समस्या थी उनका वजन छह किलोग्राम तक कम हो गया। इससे खर्राटे और फैटी लिवर की समस्या में आराम मिल गया। एसएन की स्त्री रोग विभाग की डॉ. रुचिका गर्ग ने बताया कि स्टडी में 10 प्रतिशत युवतियों को शामिल किया गया था, इन्हें पीसीओ के कारण वजन अधिक होने से मासिक धर्म अनियमित थे। वजन कम होने से मासिक धर्म की समस्या भी ठीक हो गई। 72 सप्ताह में 20 प्रतिशत तम वजन हो सकता है कम डॉ. प्रभात अग्रवाल ने बताया कि इंजेक्शन 72 सप्ताह तक लिया जाए तो 20 प्रतिशत तक वजन कम हो सकता है। इसके साथ ही जीवनशैली में बदलाव, चिकनाई युक्त भोजन ना लेने और नियमित व्यायाम करने से इंजेक्शन बंद करने के बाद वजन बढ़ने से भी रोका जा सकता है। रक्त शर्करा, इंसुलिन और चयापचय पर प्रभाव वजन घटाने वाले इंजेक्शन आपके शरीर के रक्त शर्करा के प्रबंधन को भी बेहतर बनाते हैं।  ये इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार करते हैं, जिससे कोशिकाएं ऊर्जा का अधिक कुशलता से उपयोग कर पाती हैं। इससे पूरे दिन रक्त शर्करा का स्तर स्थिर रहता है। इंसुलिन प्रतिरोध होने पर , ग्लूकोज ऊर्जा के रूप में उपयोग होने के बजाय रक्तप्रवाह में ही रहता है। शरीर अधिक इंसुलिन का उत्पादन करके प्रतिक्रिया करता है, जिससे शरीर वसा-भंडारण मोड में बना रहता है। इंसुलिन प्रतिरोध से पीड़ित कई लोगों के लिए, अस्थिर रक्त शर्करा के कारण वजन कम करना बहुत मुश्किल हो जाता है। शरीर वसा-भंडारण मोड में बना रहता है। इंसुलिन प्रतिक्रिया में सुधार करके, वजन घटाने वाले इंजेक्शन अतिरिक्त इंसुलिन के स्तर को कम करने में मदद करते हैं जो शरीर को वसा-भंडारण मोड में बनाए रखता है। जब इंसुलिन संकेत अधिक संतुलित हो जाते हैं, तो कोशिकाएं ऊर्जा के लिए संग्रहित वसा का अधिक आसानी से उपयोग कर पाती हैं, जिससे वजन कम करना अधिक स्थिर और लंबे समय तक बनाए रखना आसान हो जाता है। एक सिरिंज पकड़े हुए हाथ और एक संदेश जिसमें लिखा है "वजन घटाने वाले इंजेक्शन कितनी जल्दी असर करते हैं" वजन घटाने वाले इंजेक्शन कितनी जल्दी असर दिखाना शुरू कर देते हैं? वजन घटाने वाले इंजेक्शन अक्सर पहले एक से दो हफ्तों में असर दिखाना शुरू कर देते हैं। शुरुआती बदलाव आमतौर पर आंतरिक होते हैं, न कि वजन मापने वाली मशीन पर दिखाई देते हैं।  जैसे-जैसे हार्मोन और चयापचय स्थिर होने लगते हैं, अगले कुछ हफ्तों में वजन में स्पष्ट कमी आने लगती है।   सप्ताह 1-2: भूख में कमी आमतौर पर पहले एक से दो हफ्तों में ही लक्षण दिखने लगते हैं।  भूख में कमी अक्सर शुरुआत में ही शुरू हो जाती है। शोध परीक्षणों में, जिन लोगों को सेमाग्लूटाइड का इंजेक्शन दिया गया, उन्होंने जानबूझकर कैलोरी कम किए बिना भी अपनी कैलोरी की मात्रा में 24-35% की कमी देखी। आपको पाचन क्रिया में भी शुरुआती बदलाव नज़र आ सकते हैं।  जल्दी पेट भर जाना या लंबे समय तक पेट भरा रहना आम बात है। कई लोगों के लिए, यही वह पल होता है जब उन्हें एहसास होता है कि भूख कम होने में अब महीनों नहीं लगे हैं। यह अक्सर दिखने वाले पहले बदलावों में से एक होता है।   सप्ताह 3-6: वजन में स्पष्ट कमी शुरू होती है तीसरे और छठे सप्ताह के बीच, शारीरिक बदलाव अक्सर अधिक स्पष्ट होने लगते हैं।  यही वह समय होता है जब वजन घटाने वाले इंजेक्शन के परिणाम वास्तविक लगने लगते हैं। वजन में लगातार बदलाव आना शुरू हो सकता है। कपड़े पहले की तरह फिट होने लग सकते हैं। कुछ लोगों को रक्त शर्करा के स्थिर होने के साथ-साथ ऊर्जा में वृद्धि का अनुभव होता है। पहले महीने में आपका कितना वजन कम होता है,  यह अलग-अलग हो सकता है। शुरुआती वजन, इंसुलिन प्रतिरोध और जीवनशैली में बदलाव जैसे कारक महत्वपूर्ण होते हैं।    सप्ताह 8-12 और उसके बाद: स्थायी वसा हानि पहले दो से तीन महीनों के बाद, वज़न कम होना ज़्यादा स्थिर और अनुमानित लगने लगता है।  वसा का कम होना तेज़ गति के बजाय ज़्यादा नियमित हो जाता है। यही वो समय होता है जब दीर्घकालिक वज़न प्रबंधन आकार लेना शुरू करता है। चयापचय में समय के साथ सुधार होता रहता है। भूख का नियंत्रण स्थिर हो जाता है। रक्त शर्करा नियंत्रण में सुधार होता है। क्योंकि यह एक साप्ताहिक इंजेक्शन द्वारा ली जाने वाली वज़न घटाने की दवा है, इसलिए खुराक का समायोजन परिणामों और सहनशीलता दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सही तरीके से इस्तेमाल करने पर, … Read more

गर्मियों में AC यूज करने के 5 जरूरी नियम, कूलिंग भी बढ़ेगी और बिजली भी बचेगी

AC चलाने का तरीका दिल्ली-NCR समेत देश में कई शहरों और कस्बों में लोग गर्मी से राहत पाने के लिए एयर कंडीशनर (AC) का यूज करते हैं. हालांकि AC चलाने की वजह से भारी बिजली का भी सामना करना पड़ता है. AC चलाने में करते हैं गलतियां AC चलाने में बहुत से लोग कॉमन गलतियां करते हैं. इसकी वजह से ना सिर्फ उनको भारी बिजली बिल का सामना करना पड़ता है बल्कि उनका AC भी खराब हो सकता है. रूल नंबर-1 AC को हमेशा सही टेम्प्रेचर पर रखकर चलाना चाहिए, जो 24-25 डिग्री सेल्सियस होता है. 18 डिग्री सेल्सियस पर टेम्प्रेचर सेट करके AC को नहीं चलाना चाहिए. इससे बिजली बिल और AC दोनों पर असर पड़ता है. रूल नंबर-2 AC की रेगुलर मेंटेनेंस करानी चाहिए. इसके लिए AC मैकेनिक को घर बुलाएं और AC को क्लीन कराएं. AC को 2 महीने में एक बार जरूरी क्लीनिंग करा लेना चाहिए.   रूल नंबर-3 AC के वायरिंग को रेगुलर चेक करें. अगर बिजली का तार खराब, टूट रहा है या फिर उसमें कट गया है तो तुरंत मैकेनिक को बुलाकर उसको चेंज कराएं. ध्यान रखें कि AC की वायरिंग पूरी एक सिंगल पीस में हो. कई बार तार दो तार को जोड़कर उनपर टेप लगा दिया जाता है.   रूल नंबर-4 AC से बेहतर कूलिंग और एयर फ्लो पाने के लिए एयर फिल्टर को रेगुलर क्लीन करें. इसको हर सप्ताह क्लीन करना चाहिए. इससे AC पर लोड कम पड़ेगा और वह बेहतर कूलिंग भी प्रोवाइड कराएगा.   रूल नंबर-5 AC की हवा जल्दी से पूरे कमरे में सर्कुलेट नहीं हो पाती है, इसके लिए सबसे कम स्पीड पर सीलिंग फैन का यूज कर सकते हैं. ये ट्रिक्स रूम के टेम्प्रेचर को कम करने में मदद करती है.  (Photo: Unsplash)