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रिकॉर्डतोड़ गर्मी से यूरोप बेहाल! फ्रांस, जर्मनी, इटली और ब्रिटेन में 40°C पार, आखिर क्यों ज्यादा प्रभावित होते हैं यूरोपीय?

लंदन /पेरिस  यूरोप इस समय रिकॉर्डतोड़ हीटवेव की चपेट में है. फ्रांस, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन और कई अन्य देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है. भीषण गर्मी का असर अब सिर्फ लोगों की सेहत तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़कों, रेल नेटवर्क और बिजली व्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है।  सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कई वीडियो में फ्रांस की सड़कों की ऊपरी परत भीषण गर्मी के कारण नरम पड़ती और पिघलती नजर आ रही है. वहीं जर्मनी में अत्यधिक तापमान की वजह से ट्राम की पटरियां टेढ़ी हो गईं, जिसके कारण कई जगह सेवाएं रोकनी पड़ीं या उनकी रफ्तार कम करनी पड़ी।  रॉयटर्स के मुताबिक, यह हीटवेव 20 जून के आसपास शुरू हुई और कुछ इलाकों में सामान्य से 18 डिग्री सेल्सियस तक अधिक तापमान दर्ज किया गया. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति 'ओमेगा ब्लॉक' नाम के मौसमीय पैटर्न और जलवायु परिवर्तन के संयुक्त असर का परिणाम है. सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो वायरल हो रहे हैं, जो यूरोप में गर्मी की भयावह स्थिति को दिखाते हैं।  भारतीयों से ज्यादा यूरोपीय लोगों को क्यों सताता है? जब यूरोप में तापमान 40 डिग्री पहुंचता है तो लोग कहते हैं कि जीवन रुक गया है. अस्पताल भर जाते हैं. मौतें बढ़ जाती हैं. वहीं भारत में कई इलाकों में 40-45 डिग्री आम बात है, लोग काम करते रहते हैं. यह फर्क सिर्फ तापमान का नहीं, बल्कि कई अन्य कारणों की वजह से है. आइए समझते हैं दोनों में अंतर…  नमी का असर – सबसे बड़ा अंतर सबसे महत्वपूर्ण अंतर ह्यूमिडिटी (नमी) का है. भारत में गर्मी के मौसम में नमी बहुत ज्यादा होती है, लेकिन लोग इससे अभ्यस्त हैं. यूरोप में जब 40 डिग्री आता है तो अक्सर सूखी गर्मी होती है, लेकिन कई बार नमी भी बढ़ जाती है. जब नमी ज्यादा होती है तो पसीना सूखता नहीं है. शरीर का तापमान नियंत्रित नहीं हो पाता. इसे वेट बुल्ब टेम्परेचर कहते हैं. यूरोप में 40 डिग्री के साथ अगर नमी 60-70% हो जाए तो इंसान के लिए खतरनाक हो जाता है. भारत में लोग लंबे समय से गर्मी झेल रहे हैं, इसलिए उनका शरीर बेहतर तरीके से ढल जाता है।  ऐसा ही एक वीडियो सामने आया है, जिसमें एयर कंडीशनर (AC) खरीदने के लिए लोगों की लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं. दुकान के बाहर इतनी भीड़ है कि मानो खरीदारी नहीं, बल्कि होड़ मची हो। वहीं एक अन्य वीडियो में भीषण गर्मी के कारण सड़क का डामर नरम पड़ता और पिघलता नजर आ रहा है।  एक और वीडियो में यूरोप के समुद्र तटों (बीच) पर लोगों की भारी भीड़ दिखाई दे रही है. गर्मी से राहत पाने के लिए हजारों लोग समुद्र किनारे पहुंच गए, जिससे वहां मेले जैसा माहौल बन गया। फ्रांस में गर्मी के कारण अस्पतालों पर दबाव बढ़ गया है. कई इलाकों में बिजली आपूर्ति प्रभावित हुई, जबकि गर्म नदियों के कारण कुछ परमाणु बिजली संयंत्रों का उत्पादन भी घटाना पड़ा. इटली, जर्मनी और मध्य यूरोप के कई हिस्सों में भी रेड अलर्ट जारी किया गया है।  विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि यूरोप में कभी 'सदी में एक बार' आने वाली ऐसी भीषण हीटवेव अब जलवायु परिवर्तन की वजह से कहीं ज्यादा बार देखने को मिल सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में ऐसी घटनाएं और गंभीर हो सकती हैं. इमारतें और घर कैसे बने हैं? यूरोप की इमारतें ठंड के लिए बनाई गई हैं. दीवारें मोटी, इंसुलेशन अच्छा पर गर्मी निकालने की व्यवस्था कम. जब 40 डिग्री की गर्मी पड़ती है तो घर के अंदर भी तापमान बहुत बढ़ जाता है. वहां एयर कंडीशनर कम घरों में हैं।  भारत में घरों में छतें ऊंची, खिड़कियां बड़ी, पंखे, कूलर और एसी का इस्तेमाल आम है. लोग दोपहर में आराम करते हैं. शाम को काम करते हैं. यूरोप में ऐसी आदत नहीं है. स्कूल, ऑफिस और अस्पताल भी गर्मी के लिए तैयार नहीं होते।  सूर्य की तीव्रता यूरोप हाई एल्टीट्यूड पर स्थित है, इसलिए वहां गर्मियों में दिन बहुत लंबे (15 से 17 घंटे) हो जाते हैं. साफ आसमान और कम वायु प्रदूषण के कारण सीधी धूप बहुत तेज और चुभने वाली लगती है।  रात का तापमान और आराम यूरोप की हीटवेव में रात का तापमान भी बहुत ऊंचा रहता है. शरीर को ठंडा होने का मौका नहीं मिलता. लगातार गर्मी से थकान, दिल का दौरा और मौतें बढ़ जाती हैं. भारत में दिन में गर्मी ज्यादा होती है लेकिन रात में तापमान काफी गिर जाता है. इससे शरीर को राहत मिलती है. यही वजह है कि भारत में 40 डिग्री सहन करना यूरोप की तुलना में आसान पड़ता है।  लोगों की आदत और स्वास्थ्य भारतीय शरीर गर्मी के लिए ज्यादा तैयार रहता है. बचपन से गर्मी में खेलना, काम करना सिखाया जाता है. पसीना आना, ज्यादा पानी पीना, छाछ-निम्बू पानी जैसी चीजें आम हैं।  यूरोप में ज्यादातर लोग ठंडे मौसम में रहते हैं. उनकी त्वचा पतली, शरीर गर्मी सहने के लिए कम तैयार होता है. खासकर बुजुर्ग और बच्चे जल्दी प्रभावित होते हैं. फ्रांस, जर्मनी, इटली जैसी जगहों पर 40 डिग्री में हजारों अतिरिक्त मौतें हो जाती हैं।  तैयारियां और सरकारी व्यवस्था भारत में हीटवेव एक्शन प्लान है. स्कूलों की छुट्टी, पानी की व्यवस्था, जागरूकता अभियान चलते हैं. लोग जानते हैं कि दोपहर 12 से 4 बजे तक बाहर कम निकलना चाहिए।  यूरोप में अचानक गर्मी आने पर सरकारें भी हैरान रह जाती हैं. अस्पताल तैयार नहीं होते, बिजली की मांग बढ़ने से ग्रिड फेल हो जाते हैं. ट्रेनें रुक जाती हैं, सड़कें पिघल जाती हैं।  जलवायु परिवर्तन का प्रभाव वैज्ञानिक कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन यूरोप को तेजी से गर्म कर रहा है. पहले वहां 40 डिग्री बहुत दुर्लभ था, अब लगभग हर साल हो रहा है. यूरोप अब भी अनुकूलन (Adaptation) की प्रक्रिया में है  भारत गर्म देश है, इसलिए 40-45 डिग्री नया नहीं. लेकिन भारत को भी चिंता करनी चाहिए क्योंकि गर्मी और बढ़ रही है. दिल्ली, राजस्थान में 48-50 डिग्री भी पहुंच रहा है।  क्या सीख सकते हैं दोनों देश?     यूरोप को भारत से सीखना चाहिए- हल्के कपड़े, दिन की आदतें बदलना, … Read more

Pakistan-Afghanistan Tension: रात के हमले में 35 की मौत, सीमा पर बढ़ा तनाव, महीनेभर में चौथी बड़ी कार्रवाई

काबुल   पाकिस्तान ने एक बार फिर अफगानिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन किया है. पाकिस्तान ने अफगान सीमा से सटे इलाकों में मिलिट्री ऑपरेशन चलाने का दावा किया है. पाकिस्तान सरकार के मुताबिक सुरक्षा बलों ने पहले खुफिया सूचना के आधार पर जमीनी अभियान चलाया और उसके बाद अफगानिस्तान सीमा के पास आतंकियों के ठिकानों पर सटीक हवाई हमले (कैलिब्रेटेड स्ट्राइक) किए. इस कार्रवाई में कुल 35 लोगों के मारे जाने का दावा किया गया है. यह ऑपरेशन ऐसे समय हुआ है जब एक दिन पहले कराची में पाकिस्तान रेंजर्स के मुख्यालय पर बड़ा आतंकी हमला हुआ था. रिपोर्ट् के मुताबिक पाकिस्तान की ओर से यह एक महीने में चौथा हमला है. इससे पहले 10 जून को पाकिस्तान के हमले में 26 लोग मारे गए थे।  पाकिस्तान के सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बताया कि हाल के दिनों में देशभर में सुरक्षा बलों पर बढ़ते आतंकी हमलों के जवाब में यह अभियान शुरू किया गया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा और आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी।  कराची हमले के बाद हुई कार्रवाई शनिवार को कराची स्थित पाकिस्तान रेंजर्स के क्षेत्रीय मुख्यालय पर हथियारों और विस्फोटकों से लैस आतंकियों ने हमला किया था. इस हमले में तीन पाकिस्तानी सैनिकों की मौत हो गई थी. जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों ने तीन हमलावरों को मार गिराया, जबकि एक हमलावर घायल अवस्था में गिरफ्तार किया गया. पाकिस्तानी सेना के अनुसार गिरफ्तार आरोपी अफगान नागरिक है. इस हमले की जिम्मेदारी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान से जुड़े संगठन जमात-उल-अहरार ने ली थी।  किन ठिकानों को बनाया निशाना? पाकिस्तान के मुताबिक सबसे पहले खैबर पख्तूनख्वा के बाजौर जिले में खुफिया सूचना के आधार पर जमीनी अभियान चलाया गया. इस दौरान पाकिस्तान ने दावा किया कि ‘खान फरोश’ नाम का एक प्रमुख कमांडर समेत चार आतंकवादी मारे गए. इसके बाद अफगानिस्तान सीमा से लगे इलाकों में मौजूद जमात-उल-अहरार और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से जुड़े ठिकानों पर सटीक हमले किए गए. पाकिस्तान का दावा है कि अफगानिस्तान के पक्तिया, पक्तिका और कुनार प्रांतों में स्थित तीन ठिकाने नष्ट कर दिए गए, जहां 25 आतंकवादी मारे गए. इसके अलावा बड़ी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद भी नष्ट करने की बात कही गई है।  पाकिस्तान और अफगानिस्तान में क्यों बढ़ रहा तनाव? पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान में सुरक्षा बलों और पुलिस पर हमले लगातार बढ़े हैं. पाकिस्तान का आरोप है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और उससे जुड़े संगठन अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल कर पाकिस्तान में हमले करते हैं. हालांकि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार इन आरोपों को लगातार खारिज करती रही है. पाकिस्तान इससे पहले भी कई बार सीमा पार कर हवाई हमला करता रहा है। 

Pune Ketan Murder Case: सिया के खाई के किनारे बैठने की वजह से उठा पर्दा, जांच में खुला बड़ा राज

पुणे पुणे के केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच में पुलिस को कई नए अहम सुराग मिले हैं. जांच अधिकारियों के मुताबिक, मुख्य आरोपी सिया गोयल का वारदात के दौरान बैठना केवल अपने कथित प्रेमी चेतन चौधरी को हमला करने का संकेत देना नहीं था, बल्कि यह उसकी अपनी सुरक्षा के लिए भी पहले से बनाई गई योजना का हिस्सा था।  पुलिस के अनुसार, 18 जून को लोहगढ़ किले पर बनाई गई योजना के तहत सिया को पानी पीने या जूते का फीता बांधने के बहाने बैठना था. जैसे ही वह बैठती, यह चेतन चौधरी के लिए संकेत होता कि अब केतन अग्रवाल को पीछे से धक्का दिया जा सकता है. पुलिस का कहना है कि दोनों ने यह तरीका इसलिए चुना ताकि धक्का दिए जाने के दौरान यदि केतन खुद को बचाने के लिए सिया को पकड़ने की कोशिश करे तो वह उसकी पहुंच से दूर रहे और खुद खाई में गिरने से बच जाए।  कार की जगह, स्कूटर से गया चेतन जांच में यह भी सामने आया है कि सह-आरोपी चेतन चौधरी ने अपनी मौजूदगी छिपाने के लिए पूरी तैयारी की थी. पुलिस के मुताबिक, वह 18 जून की सुबह पुणे से करीब 90 किलोमीटर दूर लोहगढ़ किले तक कार की बजाय स्कूटर से गया. अधिकारियों का कहना है कि उसने कार इसलिए नहीं ली क्योंकि टोल प्लाजा पर उसकी पहचान दर्ज होने का खतरा था. पुलिस ने घटना में इस्तेमाल किया गया स्कूटर भी जब्त कर लिया है।  हुडी उतारकर काली टी-शर्ट पहन ली पुलिस के अनुसार, चेतन किले पर चढ़ते समय हुडी पहनकर गया था. बाद में उसने हुडी उतारकर केवल काली टी-शर्ट पहन ली और लौटते समय फिर से हुडी पहन ली. जांचकर्ताओं का मानना है कि उसने पहचान छिपाने और लोगों का ध्यान भटकाने के उद्देश्य से ऐसा किया।   हर कोई सुनना चाहता था सिर्फ इसी सवाल का जवाब  'सिया, आपने आखिर केतन को क्यों मारा ?… ' जैसे ही पुलिस आरोपी सिया गोयल को क्राइम सीन रीक्रिएशन के लिए लोहागढ़ किले पर लेकर पहुंची, सवालों की बौछार शुरू हो गई. हर कोई उसके मुंह से एक जवाब सुनना चाहता था, लेकिन सिया पूरी तरह खामोश रही. उसने न किसी सवाल का जवाब दिया और न ही कोई प्रतिक्रिया दी. इस बीच पुलिस ने जांच में कई नए दावे किए हैं, जिनमें साजिश,  संकेत और पूरी प्लानिंग को लेकर अहम खुलासे शामिल हैं. हालांकि मामले की जांच जारी है।  रविवार को लोहागढ़ किले का माहौल सामान्य दिनों से बिल्कुल अलग था. पुलिस की कई गाड़ियां, अधिकारियों की मौजूदगी और बड़ी संख्या में मीडिया कर्मी किले के प्रवेश द्वार पर पहले से मौजूद थे. सभी की निगाहें एक ही गाड़ी पर टिकी थीं, जिसमें पुलिस आरोपी सिया गोयल को लेकर पहुंचने वाली थी. कुछ ही देर में पुलिस का काफिला वहां पहुंचा. सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच सिया को वाहन से उतारा गया. जैसे ही वह कैमरों के सामने आई, पत्रकारों ने एक साथ सवाल पूछने शुरू कर दिए. सबसे ज्यादा गूंजा एक ही सवाल सिया, आपने आखिर केतन को क्यों मारा?  इसके बाद कई और सवाल पूछे गए. किसी ने पूछा कि क्या उसे अपने किए पर पछतावा है, तो किसी ने जानना चाहा कि कथित साजिश की वजह क्या थी. लेकिन इन सभी सवालों के बीच सिया पूरी तरह शांत रही. उसने किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया और आगे बढ़ गई।  एक शब्द नहीं बोली सिया मीडिया के लगातार सवालों के बावजूद सिया ने न कोई बयान दिया और न ही किसी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त की. कुछ देर बाद वह वापस पुलिस वाहन में बैठ गई. पुलिस सिया गोयल को लोहागढ़ किले पर केवल पूछताछ के लिए नहीं, बल्कि क्राइम सीन रीक्रिएशन के लिए लेकर पहुंची थी. जांच अधिकारियों के मुताबिक, 18 जून को जिस स्थान पर केतन अग्रवाल की मौत हुई थी, वहां घटनाक्रम को दोबारा समझने के लिए यह प्रक्रिया अपनाई गई. डमी (पुतले) की मदद से पुलिस ने उस पूरे घटनाक्रम को दोहराने की कोशिश की, जैसा आरोपियों ने पूछताछ के दौरान बताया है. इस दौरान अधिकारियों ने घटनास्थल पर मौजूद दूरी, रास्तों, चट्टानों की स्थिति और घटनाक्रम के संभावित क्रम का भी बारीकी से परीक्षण किया।  पुलिस का दावा: पहले से बनाई गई थी योजना जांच अधिकारियों का कहना है कि अब तक की पूछताछ में सामने आया है कि यह पूरी घटना कथित तौर पर पहले से बनाई गई योजना का हिस्सा थी. पुलिस के अनुसार, 20 वर्षीय सिया गोयल और 22 वर्षीय चेतन चौधरी ने पहले ही तय कर लिया था कि लोहागढ़ किले पर किस स्थान पर घटना को अंजाम देना है. जांच में यह भी सामने आया है कि सिया को बैठकर चेतन को संकेत देना था. बैठने का बहाना पानी पीना या जूते का फीता बांधना तय किया गया था. जैसे ही वह बैठती, चेतन कथित तौर पर पीछे से आकर केतन अग्रवाल को धक्का देता. पुलिस का दावा है कि दोनों ने इसी योजना के अनुसार कथित वारदात को अंजाम दिया।  बैठने का संकेत क्यों चुना गया? जांच में सामने आई सबसे अहम बात यह है कि बैठने का संकेत केवल इशारा देने का तरीका नहीं था. पुलिस अधिकारियों के अनुसार, पूछताछ में यह जानकारी सामने आई कि आरोपियों को डर था कि यदि धक्का दिए जाने के बाद केतन गिरते समय सिया को पकड़ने की कोशिश करेगा तो वह भी खाई में गिर सकती है. इसी वजह से कथित तौर पर ऐसा संकेत चुना गया, जिसमें सिया कुछ दूरी पर बैठ जाए और धक्का दिए जाने के समय केतन की पहुंच से बाहर रहे. यदि यह दावा जांच में पुष्ट होता है तो यह पूरे मामले की कथित योजना को और अधिक सुनियोजित बताता है।  चेतन ने भी बनाई थी अलग रणनीति पुलिस के मुताबिक, सह-आरोपी चेतन चौधरी ने भी अपनी मौजूदगी छिपाने के लिए पहले से तैयारी कर रखी थी. जांच अधिकारियों का कहना है कि वह पुणे से करीब 90 किलोमीटर दूर लोहागढ़ किले तक कार से नहीं बल्कि स्कूटर से पहुंचा. पुलिस का मानना है कि उसने ऐसा इसलिए किया ताकि टोल प्लाजा के रिकॉर्ड में उसकी कार दर्ज न हो. जांच टीम ने वह … Read more

मुंबई में मानसून का कहर! सड़कों पर भरा पानी, अंधेरी सबवे बंद, ट्रैफिक व्यवस्था चरमराई

मुंबई मुंबई में मॉनसून की जोरदार बारिश ने शहर के कई इलाकों को पानी-पानी कर दिया है. सड़कें तालाब बन गई हैं, ट्रैफिक ठप हो गया है. लोगों को घरों से निकलने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. अंधेरी सबवे (अंडरपास) में इतना पानी भर गया है कि उसे यातायात के लिए बंद कर दिया गया है।  रातभर की बारिश से अंधेरी, बांद्रा, खार, मालाड, गोरेगांव, जुहू, वर्सोवा जैसे इलाकों में सबसे ज्यादा असर देखा गया है. वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर भी पानी भरने से गाड़ियों की रफ्तार धीमी हो गई. बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के मुताबिक, अंधेरी सबवे में पानी भर गया है, जिसके बाद उसे बंद करना पड़ा।  बता दें कि अंधेरी सबवे मुंबई का एक ऐसा रास्ता है जो पूर्व और पश्चिम को जोड़ता है. हर रोज हजारों गाड़ियां और लोग यहां से गुजरते हैं. मॉनसून की बारिश में अंधेरी सबवे में जलजमाव होना पुरानी समस्या है।  शहर के निचले इलाकों में कई जगहों पर भारी जलभराव की तस्वीरें सामने आ रही हैं. जलजमाव को देखते हुए एहतियातन अंधेरी सबवे को देर रात 1:45 बजे से यातायात के लिए पूरी तरह बंद कर दिया गया है. किसी भी अप्रिय घटना या हादसे को रोकने के लिए सबवे के बाहर पुलिस बंदोबस्त किया गया है।  एक तरफ जोरदार बारिश से मुंबईवासियों को उमस और गर्मी से तो बड़ी राहत मिली है, तो वहीं सुबह-सुबह दफ्तर और काम पर जाने वालों को परेशानी का सामना भी करना पड़ सकता है।  भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने मुंबई और आसपास के इलाकों के लिए आज भी बारिश का येलो अलर्ट जारी किया है. मुंबई समेत महाराष्ट्र के कई इलाकों में गरज-चमक और तेज हवाओं के साथ भारी बारिश हो सकती है. बता दें कि मॉनसून इस बार 13 दिन देरी से मुंबई पहुंचा था। 

चार महीने बंद रहा होर्मुज, फिर भी नहीं थमी भारत की रफ्तार, जानिए कैसे

नई दिल्ली  मिडिल ईस्ट में संघर्ष और होर्मुज के बंद होने के कारण पूरे विश्व में हाहाकार मचा हुआ था। वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भी भारत सीना तान खड़ा रहा है और अपनी कुशल रणनीति और पूर्व तैयारी के बल पर ईंधन संकट को पूरी तरह टाल लिया। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग के चार महीने तक बंद रहने के बावजूद देश में पेट्रोल पंपों पर कोई लंबी कतारें नहीं लगीं, घरों में एलपीजी सिलेंडर की कमी नहीं हुई और आर्थिक गतिविधियां लगभग सामान्य रहीं। सरकार के दूरदर्शी बुनियादी ढांचा विकास, आपूर्ति विविधीकरण और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता ने इस अभूतपूर्व चुनौती को सफलतापूर्वक पार किया। दरअसल, 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के जवाब में तेहरान ने होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह बंद कर दिया। यह समुद्री जल मार्ग विश्व के कुल तेल परिवहन का लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है। बंदी के तुरंत बाद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में भारी व्यवधान उत्पन्न हो गया और कीमतों में आग लग गई। यहां आपको बता दें कि भारत अपने कच्चे तेल का करीब 90 प्रतिशत और एलपीजी का 60 प्रतिशत आयात करता है, विशेष रूप से प्रभावित होने वाला देश था। देश के कुल तेल आयात का लगभग 50 प्रतिशत और एलपीजी आयात का 90 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता था। संकट लगभग चार महीने तक चला। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश होने के कारण इस संकट का सीधा असर उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका थी। कीमतों में भारी उछाल संकट लंबा खिंचने से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चली गईं। भारतीय कच्चे तेल की कीमतें संकट से पहले के 70 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से बढ़कर चार सप्ताह के अंदर 120 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गईं। ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल के सर्वकालिक उच्चतम स्तर को छू गया। सऊदी अरब में एलपीजी अनुबंध मूल्य में फरवरी से जून के बीच करीब 46 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे 14.2 किलोग्राम वाले सिलेंडर की आयात लागत 1600 रुपये से ऊपर पहुंच गई। युद्ध-जोखिम बीमा दरों में कई गुना वृद्धि हुई, जिससे आयात और महंगा हो गया। भारत की सफल रणनीति सरकार ने संकट शुरू होते ही कुछ ही दिनों में सख्त नियंत्रण आदेश जारी कर दिए। रणनीति के तहत सरकार ने घरेलू उत्पादन में तीव्र वृद्धि की। पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में छूट, आक्रामक आपूर्ति स्रोत विविधीकरण और सक्रिय ऊर्जा कूटनीति पर जो दिया। सरकार ने मांग प्रबंधन पर जोर दिया और फैसला लिया कि लागत का बोझ आम परिवारों पर न डाला जाए, बल्कि इसे सार्वजनिक क्षेत्र की विपणन कंपनियों के माध्यम से वहन किया जाए। इस फैसले से ईंधन की घरेलू उपलब्धता बनी रही। पिछले दस वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए किए गए भारी निवेश ने संकट के समय काम किया। एलपीजी आयात टर्मिनलों की संख्या 2014 में 11 से बढ़कर वर्तमान में 22 हो गई है। आयात क्षमता भी 12 मिलियन टन प्रति वर्ष से बढ़कर 2026 में 32.3 मिलियन टन प्रति वर्ष पहुंच गई। कच्चे तेल की खरीद के स्रोतों में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ। 2014 में 27 देशों से आयात करने वाला भारत अब 2026 में 41 देशों से तेल खरीद रहा है। लीबिया, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और गुयाना जैसे नए आपूर्तिकर्ता जुड़े, जबकि अमेरिका और रूस से आयात में खासी बढ़ोतरी हुई। परिणामस्वरूप, होर्मुज पर निर्भरता पहले की तुलना में काफी कम हो गई। वहीं, एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के विस्तार से भी हर साल कच्चे तेल के आयात में बड़ी बचत हो रही है, जो संरचनात्मक संतुलन बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुआ। आर्थिक प्रभाव और सरकार का खर्च दो महीने से अधिक समय तक खुदरा कीमतों को स्थिर रखने के बाद विपणन कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 7 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की। फिलहाल तेल कंपनियां प्रतिदिन करीब 650 करोड़ रुपये की वसूली में असफल हो रही हैं, जो पहले 1000 करोड़ रुपये के उच्चतम स्तर पर थी। सरकार ने 27 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की, जिससे राजस्व में लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इस तिमाही में तेल और गैस कंपनियों को 1 लाख से 1.2 लाख करोड़ रुपये तक का नुकसान होने का अनुमान है। हालांकि, सरकार का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और होर्मुज के फिर से खुलने से आने वाले महीनों में खुदरा कीमतों में गिरावट आएगी। अन्य देशों की तुलना में भारत का बेहतर प्रदर्शन होर्मुज संकट से निपटने के लिए दुनिया भर के देशों ने अलग-अलग रणनीतियां अपनाईं। कई एशियाई आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को ईंधन की कमी का सामना करना पड़ा। श्रीलंका ने दो सप्ताह में पेट्रोल राशनिंग लागू कर दी और सरकारी कामकाज को चार दिन के सप्ताह में सीमित कर दिया। पाकिस्तान ने स्कूल बंद किए और कार्य सप्ताह छोटा किया। म्यांमार ने विषम-सम ड्राइविंग और क्यूआर कोड आधारित राशनिंग लागू की। बांग्लादेश ने तेल भंडारों पर सेना तैनात कर दी, जबकि इथियोपिया ने कुछ क्षेत्रों में ईंधन आपूर्ति पूरी तरह रोक दी। धनी देशों ने भी रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों का इस्तेमाल किया। जापान ने भंडार कम किए और सब्सिडी दी, दक्षिण कोरिया ने 30 वर्षों में पहली बार कीमतों पर नियंत्रण लगाया। यूरोपीय संघ के 22 सदस्य देशों ने अप्रैल के मध्य तक 9 अरब यूरो से अधिक की राहत पैकेज घोषित किए। इसके विपरीत, भारत ने न तो आपातकाल घोषित किया, न राशनिंग लगाई और न ही स्कूल या कार्य घंटे कम किए। केवल व्यावसायिक और थोक एलपीजी, डीजल तथा एविएशन ईंधन के निर्यात पर अस्थायी प्रतिबंध लगाए गए, ताकि घरेलू जरूरतें पूरी हो सकें। आर्थिक स्थिरता बरकरार संकट के दौरान भारत की विदेशी मुद्रा भंडार 728 अरब डॉलर से अधिक के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया और पूरे संकट काल में स्थिर रहा। जीडीपी वृद्धि दर 7 प्रतिशत के आसपास बनी रही। चालू खाता घाटा नियंत्रण में रहा और खुदरा मुद्रास्फीति रिजर्व बैंक के लक्ष्य के अंदर रही। होर्मुज खुलने के बाद अब क्या? जून में अमेरिका-ईरान शांति समझौते के … Read more

बांग्लादेश की राजनीति में हलचल, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने वापसी और सजा पर दिया बयान

नई दिल्ली बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और दो साल पहले हुए सत्ता परिवर्तन की वजह से अपना देश छोड़कर भारत आने वाली शेख हसीना ने वापसी को लेकर बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा है कि वह इसी साल बांग्लादेश वापस लौट जाएंगी। उन्होंने अवामी लीग को सिर्फ एक दल नहीं, बल्कि अपनी ताकत बताया। बांग्लादेश में साल 2024 के मध्य में बड़े पैमाने पर विरोध और हिंसा हुई थी, जिसके बाद प्रधानमंत्री आवास तक भीड़ पहुंच गई। इसके चलते उन्हें अपने देश को छोड़कर भागना पड़ा और भारत से अच्छे संबंध होने की वजह से वे नई दिल्ली में तब से रह रही हैं। हसीना ने साफ कर दिया है कि इस साल के आखिरी में वह बांग्लादेश लौट जाएंगी। हसीना को बांग्लादेश में फांसी की सजा मिली हुई है। शेख हसीना के भारत आने के बाद उन्हें प्रधानमंत्री पद से भी हटा दिया गया था। उनके खिलाफ स्थानीय स्तर पर काफी गुस्सा था। हालांकि, बाद में पूरी दुनिया को पता चल गया कि वह आंदोलन कोई बांग्लादेश के भलाई के लिए नहीं, बल्कि उसे और कट्टरता की ओर ले जाने के लिए ही था। हसीना के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार चली, जिसमें जमकर दंगे हुए। हिंदुओं को जमकर प्रताड़ित किया गया। कई को तो जिंदा ही मार डाला गया और ज्यादातर के मंदिरों, घरों को भी नुकसान पहुंचाया गया। इस साल फरवरी में हुए आम चुनाव में बांग्लादेश में यूनुस से बांग्लादेश का पीछा छूटा और तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने। इसके बाद, भारत और बांग्लादेश के संबंध बेहतर होने लगे हैं। ‘मैं इसी साल बांग्लादेश वापस लौट जाऊंगी’ एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में जब शेख हसीना से पूछा गया कि आपने कई बार संकेत दिया है कि आप जल्द ही बांग्लादेश लौट सकती हैं, तो इस पर उन्होंने जवाब दिया, ''मेरी वापसी कोई पर्सनल एम्बिशन का सवाल नहीं है। यह एक बहुत बड़े सवाल से जुड़ा है। बांग्लादेश के लोगों के पॉलिटिकल राइट्स, लोकतंत्र की बहाली, कानून का राज स्थापित करना बहुत जरूरी है। मैं सत्ता के लिए राजनीति नहीं करती हूं और बांग्लादेश के लोगों की भलाई के लिए राजनीति करती हूं। मैं बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान के सोनार बांग्ला बनाने के सपने को पूरा करने के लिए राजनीति में आई और उसे पूरा करने के लिए काम करती हूं। मैं साफ-साफ कह देना चाहती हूं कि हर रुकावट और साजिश को पार करते हुए मैं इस साल अपने देश वापस लौट जाऊंगी।'' मौत की सजा को बताया गैर-कानूनी शेख हसीना ने बांग्लादेश में मिली मौत की सजा पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह फैसला मेरे लिए न्याय नहीं है। यह गैर-कानूनी, गैर-संवैधानिक और राजनीति से प्रेरित है। ज्यूडिशियरी को अवामी लीग की लीडरशिप से बदला लेने के लिए एक जरिया बना दिया गया। इस तरह की कोशिशें पहले भी हुईं, तब भी फेल रहीं, अब भी फेल रहेंगी। उन्होंने आगे कहा कि मैं मौत से नहीं डरती हूं। 1975 में मैंने अपने पिता, अपने भाइयों और लगभग अपने पूरे परिवार को खो दिया। 21 अगस्त को मुझे ग्रेनेड से मारने की कोशिश हुई थी। मेरे खिलाफ कई बार साजिशें रची गईं, लेकिन हर बार उससे बाहर आई। उन्होंने आगे कहा कि मैं बांग्लादेश के लोगों के लिए हमेशा खड़ी रही हूं। पांच बार जनता के वोटों से प्रधानमंत्री चुनी गई और देश के विकास के लिए लगातार काम किया। शेख हसीना ने आगे बताया कि अवामी लीग कोई कागज का संगठन नहीं है। यह एक ऐसी ताकत है, जोकि बंगाल की मिट्टी, बंगाल के लोगों, बंगाल के इतिहास और बंगाली राष्ट्र की पहचान में बसी हुई है। 77 साल के इतिहास में अवामी लीग पर कई बार हमले हुए हैं, कई बार खून भी बहा है और उस पर बैन भी लगाया गया, लेकिन हर बार यह लोगों की ताकत से वापस उठ खड़ी हुई है।

अफ्रीका का सबसे अमीर देश सेशेल्स: पर्यटन और निवेश से बनी समृद्धि की कहानी

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीन दिनी दौरे पर सेशेल्स पहुंच गए हैं. वे वहां 50 वें राष्ट्रीय दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में 29 जून को शामिल होंगे. बीते शनिवार को सेशेल्स की धरती पर उतरते ही वहां के राष्ट्रपति डॉ पैट्रिक हर्मिनी ने उनका स्वागत किया. पीएम मोदी की इस यात्रा के बहाने सेशेल्स और भारत के रिश्ते के बारे में जानेंगे. यह भी कि आखिर यह छोटा सा द्वीपीय देश कैसे अफ्रीका का सबसे अमीर देश बन गया? सेशेल्स एक छोटा द्वीपीय देश है. यह हिन्द महासागर में स्थित है. आबादी महज 1.35 लाख है. क्षेत्रफल लगभग 450 वर्ग किलो मीटर है. यह 115 द्वीपों का एक समूह है. जमीन बहुत कम है. फिर भी यह अफ्रीका का सबसे अमीर देश माना जाता है. हैलो सेफ प्रॉसपेरिटी इंडेक्स 2026 के मुताबिक सेशेल्स अफ्रीका के सबसे अमीर देशों की सूची में टॉप पर है. उसे 98.09 अंक मिले हैं. मॉरीशस और अल्जीरिया इस सूची में क्रमशः दूसरे एवं तीसरे नंबर पर हैं. एजेंसी ने रैंकिंग तय करने में केवल प्रति व्यक्ति आय को महत्व नहीं दिया है. कुल पांच मानकों के आधार पर रैंकिंग तय हुई है. इनमें खरीदने की शक्ति, प्रति व्यक्ति आय, मानव विकास सूचकांक, आय का समान वितरण और सापेक्ष गरीबी को आधार बनाया गया है. प्रति व्यक्ति आय 42110 अमेरिकी डॉलर है. 256 साल पुराना है भारत-सेशेल्स का रिश्ता सेशेल्स छोटा देश भले ही है लेकिन भारत के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है. यहां पहली स्थाई बस्ती साल 1770 में बसाई गई. उस पहली खेप में जो 27 नागरिक यहां पहुंचे, उनमें पांच भारतीय भी थे. बाद में तमिलनाडु, बिहार, गुजरात और देश के अन्य हिस्सों से भी लोग पहुंचे. आज देश का हर आठवां व्यक्ति भारतवंशी मूल का है. 29 जून 1976 को सेशेल्स को ब्रिटेन से आजादी मिली और यह स्वतंत्र देश के रूप में दुनिया के नक्शे पर उभरा. इस छोटे से द्वीपीय देश पर पहले फ्रांसीसी और फिर बाद में ब्रिटेन ने राज किया. समृद्धि की आधारशिला है पर्यटन पर्यटन सेशेल्स की मुख्य कमाई का स्रोत है. यहां के समुद्र, बीच और नेचर पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. यहां लक्जरी रिसोर्ट बन गए हैं. विदेशी पर्यटक महंगा खर्च करते हैं. होटल, यात्रा, खाना और गतिविधियां सरकार को राजस्व देती हैं. निजी निवेशकों ने भी यहां पूंजी लगाई है. पर्यटन ने नौकरियां बढ़ाईं. स्थानीय सेवाओं और कारीगरों को फायदा हुआ. इस देश में हर साल 3.5 से 4 लाख तक विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं. मतलब देश की आबादी से कई गुना ज्यादा पर्यटक आते हैं. यहां सबसे ज्यादा पर्यटक यूरोप से आते हैं. फिर एशिया की बारी है. हाल के वर्षों में भारतीयों की ठीक-ठाक संख्या पहुँच रही है. मत्स्य और समुद्री संसाधन से भी होती है कमाई समुद्री मछली और समुद्री जीवन भी सेशेल्स की आमदनी का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है. पास के जल क्षेत्र में मछली प्रचुर मात्रा में मिलती है. मछली पालन और निर्यात से विदेशी मुद्रा आती है. समुद्री पर्यटन जैसे डाइविंग ने भी योगदान दिया. समुंद्री संरक्षण ने संसाधन को टिकाऊ बनाया. इस माध्यम से सेशेल्स हर साल 30 से 50 करोड़ अमेरिकी डॉलर की कमाई साल भर में करता है. सेशेल्स के कुल घरेलू निर्यात में 90 फीसदी हिस्सा मछली का है. निवेश और आर्थिक नीतियां सरकार ने विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया. निवेशकों को सरल नियम और कर प्रोत्साहन दिए गए. बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेस को विकसित किया गया. कई विदेशी कंपनियों ने यहां शाखाएं खोलीं. छोटे व्यवसायों को समर्थन मिला. नवाचार और सेवा क्षेत्र पर ध्यान दिया गया. यूएई, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, चीन और भारत ने भी यहां निवेश किया हुआ है. यह निवेश मूलतः पर्यटन, अक्षय ऊर्जा, रियल स्टेट, मछली पालन आदि क्षेत्रों में हुए हैं. कैसी है वित्तीय और कर व्यवस्था? सेशेल्स ने कर नीति में लचीलापन रखा. कुछ सेवाओं पर कर कम रखा गया. यह नीति निवेश को आकर्षित करती है. निजी बैंकिंग और निवेश सेवाएं मजबूत हुईं. सरकार ने सार्वजनिक खर्च में समझदारी दिखाई. वित्तीय प्रबंधन ने देश की आय स्थिर रखी. यहां आयकर, व्यावसायिक कर, और वैल्यू एडेड टैक्स लागू है. यह व्यवस्था देशी-विदेशी सब पर समान है. विदेशी सहायता और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध सेशेल्स ने वैश्विक साझेदारों से मदद ली. विकास परियोजनाओं में अनुदान और ऋण मिला. अंतरराष्ट्रीय संबंधों ने पर्यटन और व्यापार को बढ़ाया. राष्ट्रों के साथ द्विपक्षीय समझौते हुए. ये समझौते निवेश और सुरक्षा दोनों में मददगार रहे.सेशेल्स ने स्वास्थ्य और शिक्षा पर ज्यादा जोर दिया. साधारण शिक्षा तक अच्छी पहुंच हुई. स्वास्थ्य सेवाएं भी बेहतर हुईं. इनसे उत्पादकता बढ़ी. छोटी आबादी में कुशल मजदूरी का लाभ मिला. कौशल विकास ने सेवा क्षेत्र को मजबूत किया. सेशेल्स ने प्रकृति को बचाने पर जोर दिया. नेचर और बायोडायवर्सिटी संरक्षण ने पर्यटन को स्थायी बनाया. समुद्री रिज़र्व बनाए गए. पर्यटन और संरक्षण में संतुलन रखा गया. यह नीतियां दीर्घकालिक आमदनी सुनिश्चित करती हैं. चुनौतियां और सीमाएं भी कम नहीं छोटा आकार और सीमित संसाधन सेशेल्स के सामने चुनौतियां हैं. जलवायु परिवर्तन से खतरे बनते हैं. आर्थिक निर्भरता पर्यटन पर जोखिम है. महंगाई और आय असमानता भी समस्याएं हैं. फिर भी सरकार ने योजनाएं बनाकर सुधार किए. प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के क्या हैं मायने? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे ने जोर दिया कि सेशेल्स अफ्रीकी साझेदार है. दौरे ने द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ किया. यह दौरा आर्थिक सहयोग और निवेश पर सकारात्मक संकेत देता है. ऐसे दौरे से व्यापार और पर्यटन में और अवसर बन सकते हैं. सरल शब्दों और संक्षेप में कहें तो सेशेल्स की समृद्धि कई कारणों का मेल है. पर्यटन इसका मुख्य स्तंभ है. समुद्री संसाधन, निवेश-अनुकूल नीतियां और अच्छा प्रशासन भी महत्वपूर्ण हैं. पर्यावरण संरक्षण और मानव विकास ने स्थिरता दी है. छोटी आबादी ने प्रति व्यक्ति आय बढ़ने में मदद की. प्रधानमंत्री मोदी के दौरे जैसे कदम दोस्ती और सहयोग बढ़ाते हैं. हालांकि, आगे की राह एकदम आसान नहीं है. आगे चुनौतियां बनी रहेंगी. पर अपनी सही नीतियों से सेशेल्स टिकाऊ समृद्धि बनाए रख सकता है.       

फाइटर जेट इंजन में विदेशी निर्भरता बनी चुनौती, GE की कीमत बढ़ने से बढ़ी भारत की चिंता

 नई दिल्ली  भारत अपना खुद का पांचवीं पीढ़ी का अत्याधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमान (AMCA) बनाने के सपने पर तेजी से काम कर रहा है। लेकिन इस बीच देश के सामने एक पुरानी और बड़ी चुनौती फिर से खड़ी हो गई है और वह है, लड़ाकू विमान का इंजन बनाना। इस बात को ऐसे समझिए कि भारत ने फाइटर जेट का ढांचा, रडार और हथियार तो खुद बना लिए हैं, लेकिन विमान का सबसे जरूरी हिस्सा यानी 'इंजन' के लिए हम आज भी विदेशों पर निर्भर हैं। ऐसे में अब अमेरिकी कंपनी द्वारा अचानक दाम बढ़ा दिए जाने से भारत के इस ड्रीम प्रोजेक्ट पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अब सवाल अमेरिकी कंपनी की जरूरत क्यों? लड़ाकू विमान के इंजन की कीमतों में भारी उछाल के बाद यह सवाल दोबारा खड़ा हो गया है कि आखिर भारत को इस प्रोजेक्ट के लिए अमेरिकी बैसाखी की जरूरत क्यों पड़ रही है? अच्छा सवाल यह भी है कि क्या अमेरिकी कंपनी द्वारा बनाए गए इंजन की जरूरत केवल भारत को है या फिर अन्य देशों को भी? इस बात का जवाब है कि नहीं, सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि तुर्किए, दक्षिण कोरिया और स्वीडन जैसे देश भी अपने स्वदेशी लड़ाकू विमानों के लिए पूरी तरह अमेरिकी तकनीक पर निर्भर हैं। ऐसे में अब सवाल यह है कि भारत अपने लड़ाकू विमान के इंजन की बनावट को लेकर क्या कदम उठाने वाला है? पहले समझिए क्या है पूरा विवाद बता दें कि भारत के फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स के लिए अमेरिका की मशहूर कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) से F414 इंजन खरीदने की बातचीत चल रही थी। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह बातचीत अब खटाई में पड़ती दिख रही है। इसका कारण है कि DRDO के सूत्रों के मुताबिक, जिस F414 इंजन की कीमत पहले प्रति यूनिट 70 से 80 करोड़ रुपये तय की जा रही थी, अमेरिकी कंपनी GE ने अब उसके दाम करीब तीन गुना बढ़ाकर बताए हैं। दाम बढ़ने के बाद बजट मुख्य चुनौती अमेरिकी कंपनी की तरफ से दाम तीन गुणा बढ़ाने के दावों के बाद समझौता अब अधर में पड़ता दिख रहा है। इस बात को ऐसे समझिए कि भारत सरकार ने इस विमान के शुरुआती 5 मॉडल बनाने के लिए 15000 करोड़ रुपये का बजट रखा है। ऐसे में इंजन महंगा होने से यह पूरा बजट गड़बड़ा सकता है। अब समझिए भारत के सामने क्या है मजबूरी? दाम बढ़ाने के बाद अब डिजाइन को लेकर सबसे बड़ी समस्या भारत के सामने खड़ी हो रही है। इस बात को ऐसे समझिए कि भारत की वैमानिकी विकास एजेंसी (ADA) ने AMCA लड़ाकू विमान का पूरा ढांचा इसी अमेरिकी F414 इंजन के हिसाब से डिजाइन किया है। इस मोड़ पर आकर इंजन बदलना बिल्कुल भी आसान नहीं है। दूसरी ओर प्रोजेक्ट में देरी की संभावना भी चिंता का विषय बन सकता है। कारण है कि भारत को शुरुआती टेस्टिंग के लिए 15 इंजनों की जरूरत है। अगर बातचीत में देरी हुई, तो विमान के आने का समय और आगे खिसक सकता है। हालांकि वैसे उम्मीद है कि यह विमान 2034 या 2035 तक भारतीय वायुसेना में शामिल हो पाएगा। इसका असर तेजस विमानों पर भी होगा? तो इस सवाल का जवाब है, हां शायद। रिपोर्ट की माने तो इंजनों के दाम बढ़ाने का असर सिर्फ लड़ाकू विमान AMCA ही नहीं, भारत का नया तेजस Mk2 विमान भी इसी इंजन पर चलने वाला है। वहीं, पुराने तेजस Mk1A के लिए भी अमेरिका से इंजनों की सप्लाई में देरी हो रही है, जिससे वायुसेना को विमान मिलने में लेट हो रहा है। सिर्फ भारत नहीं, दुनिया के ये बड़े देश भी हैं मजबूर अच्छा सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि इंजन के मामले में सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई और ताकतवर देश भी अमेरिका के भरोसे हैं। इस बात ऐसे समझिए कि तुर्किए का अपना पांचवीं पीढ़ी का विमान 'KAAN' भी शुरुआत में अमेरिकी GE F110 इंजन से ही उड़ेगा, क्योंकि उनका खुद का इंजन बनने में अभी कई साल लगेंगे। दूसरी ओर दक्षिण कोरिया का नया 'KF-21' लड़ाकू विमान भी अमेरिकी F414 इंजन की मदद से ही उड़ रहा है। स्वीडन का मशहूर 'ग्रिपेन' (Gripen E) विमान भी अमेरिकी इंजन पर निर्भर है। इसका नुकसान यह है कि स्वीडन अपनी मर्जी से इसे किसी दूसरे देश को बेच नहीं सकता, क्योंकि इसके लिए अमेरिका की मंजूरी (ITAR नियम) जरूरी होती है। अब सवाल- आखिर लड़ाकू विमान का इंजन बनाना इतना मुश्किल क्यों? गौरतलब है कि फाइटर जेट का इंजन बनाना दुनिया की सबसे जटिल और कठिन तकनीकों में से एक है। इन इंजनों को बहुत कम वजन और कम ईंधन में आसमान चीरने वाली ताकत पैदा करनी होती है। कारण है कि इंजन के अंदर का तापमान इतना ज्यादा होता है कि आम धातुएं तुरंत पिघल जाएं। इसके लिए खास 'सिंगल-क्रिस्टल ब्लेड्स' और अत्याधुनिक धातुओं की जरूरत होती है। ऐसे में फिलहाल दुनिया के सिर्फ 5 देश अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन के पास ही स्वतंत्र रूप से फाइटर जेट इंजन बनाने की तकनीक है। हालांकि इस बात में भी कोई दोहराई नहीं है कि भारत ने सालों पहले खुद का 'कावेरी इंजन' बनाने की कोशिश की थी, लेकिन वह लड़ाकू विमान को उड़ाने लायक ताकत नहीं दे पाया। अब उस इंजन के बदले हुए रूप का इस्तेमाल भारत के 'घातक' ड्रोन में किया जाएगा।

पर्यावरण नेतृत्व की मान्यता: पीएम मोदी को सेशेल्स ने दिया शीर्ष सम्मान

विक्टोरिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास में नेतृत्व के लिए सेशेल्स की ओर से देश का सर्वोच्च सम्मान ‘गार्डियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ प्रदान किया गया है। रविवार को राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी ने उन्हें ये सम्मान दिया। 'गार्डियन ऑफ द ब्लू होराइजन' सम्मान प्रधानमंत्री मोदी की लंबे समय से जारी उस नीति और दृष्टिकोण को मान्यता देता है, जिसमें सतत विकास, हरित विकास और पर्यावरण-अनुकूल नीतियों पर जोर दिया गया है। पीएम मोदी के 'ग्रीन विजन' को मान्यता यह उपाधि उन कई वैश्विक मान्यताओं में नवीनतम है, जो प्रधानमंत्री मोदी को जलवायु परिवर्तन, सतत विकास और हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए मिल चुकी हैं। पिछले महीने मई 2026 में, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने उन्हें कृषि क्षेत्र को मजबूत करने, खाद्य सुरक्षा बढ़ाने और सतत कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए एग्रीकोला मेडल प्रदान किया था। सेशेल्स द्वारा दिया गया यह सम्मान प्रधानमंत्री मोदी के वैश्विक पर्यावरणीय नेतृत्व और “ग्रीन विज़न” को और अधिक मजबूत मान्यता के रूप में देखा जा रहा है। भारत के पीएम तीन दिवसीय आधिकारिक दौरे पर शनिवार को सेशेल्स पहुंचे। जहां राष्ट्रपति हर्मिनी ने उनका औपचारिक स्वागत किया। सेशेल्स के राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय वार्ता रविवार को स्टेट हाउस में प्रधानमंत्री को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई। दोनों ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपसी हितों से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल, विदेश सचिव विक्रम मिस्री और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। नेशनल एसेंबली को संबोधित कर रचेंगे इतिहास पीएम मोदी भारतीय समुदाय की ओर से आयोजित कार्यक्रम में भी शामिल होंगे और सेशेल्स की नेशनल असेंबली को संबोधित करेंगे। जिसके साथ ही वे दुनिया के पहले ऐसे भारतीय प्रधानमंत्री बन जाएंगे जिन्होंने 20 देशों की संसद या नेशनल असेंबली को संबोधित किया है। सेशेल्स रवाना होने से पहले पीएम मोदी ने खुद इसकी जानकारी दी थी। एक्स पर उन्होंने लिखा, "मुझे सेशेल्स की नेशनल असेंबली को संबोधित करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बनने का सम्मान प्राप्त होगा। यह ऐतिहासिक अवसर उन सशक्त लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय परंपराओं का प्रतीक है, जो हमारे दोनों देशों को एक-दूसरे से जोड़ती हैं

उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा पारिवारिक रहस्य! किम जोंग उन की मां की पहचान पर क्यों है सन्नाटा?

प्योंगयांग उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन से जुड़े कई रहस्यों पर अक्सर बात होती है। इनमें से एक बड़ा रहस्य उनकी मां के बारे में है। अपने 15 साल के शासनकाल में किम ने कभी भी सार्वजनिक रूप से अपनी मां का जिक्र नहीं किया है। उत्तर कोरिया जैसे देश में जो अपनी वंशानुगत शुद्धता पर गर्व करता है, किम की मां की पहचान ना केवल एक रहस्य की तरह है। इसकी वजह उनकी मां के परिवार की जड़ों को माना जाता है। किम के मातृपक्ष का वंश जापान से जुड़ा है। जापान के ओसाका शहर में किम की मां को योंग हुई का जन्म हुआ था। को हुई का जन्म 1952 में ओसाका में हुआ लेकिन उनके माता-पिता मूल रूप से जेजू द्वीप के रहने वाले थे, जो आज के दक्षिण कोरिया के दक्षिणी तट के पास स्थित है। वह करीब 10 साल की थीं, तो को का परिवार उत्तर कोरिया आ गया। दक्षिण कोरिया और जापान उत्तर कोरिया के दुश्मन मुल्क माने जाते हैं। योंग राजपरिवार का हिस्सा कैसे बनीं उत्तर कोरिया में आए लोगों को ईर्ष्या की नजर से देखा जाता था और जैपो कहा जाता था। यह एक अपमानजनक शब्द है। उत्तर कोरियाई समाज में ऊंच-नीच बहुत ज्यादा है। सख्त सामाजिक वर्गीकरण में जैपो लोग वेवरिंग क्लास में आते हैं। नॉर्दर्न रिसर्च एसोसिएशन के किम ह्युंग-सू कहते हैं कि शासन की पैकटू वंशावली को पवित्र माना जाता है। इसलिए सुप्रीम नेता के किसी जैपो का बेटा होने की बात सोचना भी नामुमकिन है। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, योंग हुई को उस वक्त किम जोंग-इल (किम जोंग उन के पिता) ने देखा था, जब उनको सत्ता संभालने के लिए तैयार किया जा रहा था। हालांकि उनकी शादी पहले ही किम यंग-सूक से हो चुकी थी लेकिन वह योंग हुई के भी करीब आ गए। दोनों साथ रहे और किम जोंग समेत तीन बच्चे हुए। इन बच्चों को लाइमलाइट ले दूर रखा गया क्योंकि उत्तर कोरिया में शादी के बिना बच्चों को बुरा माना जाता है। साल 2004 में निधन साल 2004 में पेरिस के एक अस्पताल में ब्रेस्ट कैंसर से हुई का निधन हो गया। उत्तर कोरियाई सरकारी मीडिया ने उनकी मौत के बारे में खबर नहीं दी। इसकी वजह उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि को माना गया। इसके उलट उनके बच्चों की किस्मत अलग थी। किम की पत्नी किम यंग सूक ने दो लड़कियों को जन्म दिया। ऐसे में उत्तराधिकार योंग हुई के बेटे किम को मिला। किम जोंग उन युवावस्था में ही अपने पिता के पसंदीदा बन गए थे, जिसका मुख्य कारण उनकी नेतृत्व क्षमता और प्रतिस्पर्धी स्वभाव था। उन्होंने कुछ समय के लिए स्विट्जरलैंड में विदेश में पढ़ाई भी की थी। इसलिए जब 2011 में किम जोंग-इल का निधन हुआ तो उस समय 27 साल के किम जोंग-उन ने सत्ता की बागडोर संभाल ली। मां के नाम से दूरी की वजह किम जोंग उन ने सत्ता संभालने के बाद दादा और पिता के जन्मदिन की तरह मांग के जन्मदिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित नहीं किया गया है। वह अपनी मां पर कोई बात नहीं करते हैं। एक्सपर्ट का कहना है कि अगर इस पर चर्चा होगी कि किम की मां जापान से कोरियाई मूल की थीं तो यह उनकी वैधता को हिला देगा। इसका उत्तर कोरियाई समाज पर बहुत असर होगा