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फर्जी आधार और मलेशियाई करेंसी के साथ 14 बांग्लादेशी नागरिक दबोचे गए, कश्मीर में षड्यंत्र की योजना

जलपाईगुड़ी  भारत में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी नागरिकों के खिलाफ पश्चिम बंगाल और दिल्ली में दो अलग-अलग बड़ी कार्रवाइयां की गई हैं। पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी रोड स्टेशन पर रेलवे सुरक्षा बल (RPF) ने दिल्ली जाने वाली नॉर्थईस्ट एक्सप्रेस ट्रेन से 14 बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया है। पकड़े गए इन लोगों में चार महिलाएं और चार नाबालिग भी शामिल हैं। फर्जी आधार कार्ड का संदेह पकड़े गए इन व्यक्तियों के पास से आधार कार्ड बरामद हुए हैं। ये दस्तावेज फर्जी हैं या अवैध तरीकों से बनवाए गए हैं, इसकी सत्यता जांचने के लिए एक विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है। तलाशी के दौरान इनके पास से फर्जी दस्तावेजों के साथ-साथ मलेशियाई मुद्रा भी बरामद की गई है। पूछताछ के दौरान पकड़े गए लोगों ने बताया कि वे काम की तलाश में कश्मीर जा रहे थे। समाचार एजेंसी ANI से बात करते हुए, आरपीएफ इंस्पेक्टर बिप्लब दत्ता ने बताया कि यह कार्रवाई विशिष्ट सूचनाओं के आधार पर और नियमित ट्रेन चेकिंग के दौरान की गई। उन्होंने कहा, 'सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर, हमारे आरपीएफ कर्मचारियों ने ट्रेनों के निरीक्षण के दौरान कई संदिग्ध व्यक्तियों की पहचान की। उनके आधार कार्ड की जांच करने पर, दस्तावेज़ फर्जी प्रतीत हुए। इसी पर कार्रवाई करते हुए हमने 5 पुरुषों, 5 महिलाओं और 4 बच्चों को हिरासत में लिया। ये सभी बांग्लादेश के निवासी हैं।' दिल्ली पुलिस के 'विदेशी सेल' का बड़ा अभियान इससे पहले 13 मार्च को, दिल्ली पुलिस के बाहरी जिले के विदेशी सेल ने भी अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों के खिलाफ एक सख्त कदम उठाया था। एक विशेष अभियान के तहत, पुलिस ने 10 बांग्लादेशी प्रवासियों को गिरफ्तार किया, जो कथित तौर पर फर्जी मेडिकल वीजा व्यवस्था का उपयोग कर रहे थे। हिरासत में लिए गए इन अवैध नागरिकों को वापस भेजने के लिए विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) द्वारा निर्वासन की कार्यवाही शुरू कर दी गई है। विदेशी सेल की एक विशेष टीम को सत्यापन अभियान के दौरान सूचना मिली थी कि कुछ विदेशी नागरिक (जिनके बांग्लादेशी होने का संदेह था) अपने वीजा की अवधि समाप्त होने के बावजूद इलाके में रह रहे हैं। बुल्गारिया जाने की फिराक में थे जांच में एक और बड़ा खुलासा हुआ कि ये व्यक्ति भारत में रहने के लिए कोई वैध दस्तावेज न होने के बावजूद, बुल्गारिया के लिए मेडिकल वीजा प्राप्त करने का प्रयास कर रहे थे। बाहरी जिले का विदेशी सेल अपने अधिकार क्षेत्र में अवैध प्रवास के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान चला रहा है। इसके तहत पुलिस की टीमें लगातार सत्यापन कर रही हैं, खुफिया जानकारी जुटा रही हैं और बिना वैध भारतीय दस्तावेजों के रहने वाले लोगों की पहचान कर रही हैं।

केंद्र सरकार का अहम फैसला: तेल संकट के दौरान 40 पेट्रोकेमिकल पर कस्टम ड्यूटी की गई शून्य

नई दिल्‍ली ईरान युद्ध के कारण बढ़ते तेल संकट के बीच भारत सरकार ने घरेलू उद्योगों को बचाने के लिए 40 महत्वपूर्ण पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर सीमा शुल्क (Customs Duty) को पूरी तरह से माफ कर दिया है. वित्त मंत्रालय द्वारा गुरुवार, 2 अप्रैल को इस संबंध में एक आदेश जारी किया. इस कदम का उद्देश्य कच्चे माल की कीमतों में होने वाली बेतहाशा वृद्धि से भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सुरक्षित रखना है. मंत्रालय के अनुसार, इन उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी की छूट 30 जून 2026 तक प्रभावी रहेगी।  पेट्रोकेमिकल्स लगभग हर उद्योग में इस्‍तेमाल होते हैं. सरकार के इस फैसले प्लास्टिक, पैकेजिंग, टेक्सटाइल (कपड़ा), फार्मास्युटिकल (दवा), ऑटो कंपोनेंट्स और केमिकल मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों को बड़ा लाभ होगा. ड्यूटी हटने से इन उद्योगों की उत्पादन लागत कम होगी और इनको कीमतें बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. इससे आम आदमी पर महंगाई का बोझ नहीं पड़ेगा।  इन पर शून्‍य हुआ शुल्‍क     केमिकल्स: एनहाइड्रस अमोनिया, टोल्यून, स्टाइरीन, मेथनॉल और फिनोल.     इंडस्ट्रियल कच्‍चा माल: एसेटिक एसिड, प्यूरिफाइड टेरेफ्थैलिक एसिड (PTA), और एपॉक्सी रेजिन।      पॉलिमर: एथिलीन के पॉलिमर और विभिन्न प्रकार के फॉर्मल्डिहाइड।  निर्यातकों को भी राहत ईरान युद्ध के कारण समुद्री व्‍यापार में आई रुकावट को देखते हुए वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने निर्यातकों को भी बड़ी सहायता दी है. पिछले महीने ही सरकार ने सभी पात्र निर्यात उत्पादों के लिए निर्यातित उत्पादों पर शुल्कों और करों की छूट योजना (RoDTEP) के तहत दरें और वैल्यू कैप बहाल कर दिए गए हैं. यह उन निर्यातकों के लिए बड़ी राहत है जो खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते माल ढुलाई (Freight) खर्च और युद्ध से जुड़े जोखिमों के कारण व्यापारिक नुकसान झेल रहे थे।  देश में नहीं ईंधन की कमी सरकार ने देशवासियों को आश्वस्त किया है कि भारत के पास कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल, एटीएफ और एलपीजी का पर्याप्त भंडार मौजूद है. यह रणनीतिक भंडार किसी भी अल्पकालिक आपूर्ति बाधा से निपटने के लिए सक्षम है. सरकार लगातार वैश्विक स्रोतों से ऊर्जा आपूर्ति के वैकल्पिक रास्ते तलाश रही है ताकि देश की विकास दर पर कोई आंच न आए। 

सर्वे 2025 में दावा: देश में बेरोजगारी घट रही है, 61.3 करोड़ लोग काम पर; महिलाओं का वेतन वृद्धि पुरुषों से ज्यादा

नई दिल्ली देश में बेरोजगारी दर 2025 में थोड़ी घटकर 3.1% हो गई है। यह आंकड़ा 2024 में 3.2% था, यानी मामूली सुधार जरूर हुआ है। यह जानकारी सरकार के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) 2025 में सामने आई है, जिसे सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने जारी किया है। रिपोर्ट बताती है कि रोजगार के मामले में देश में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है और यह सुधार लगभग हर सेक्टर और पुरुष-महिला दोनों में देखने को मिला है। पुरुषों की बेरोजगारी दर 3.3% से घटकर 3.1% हो गई, जबकि महिलाओं की बेरोजगारी दर 3.1% पर ही स्थिर रही।  गांवों में स्थिति ज्यादा बेहतर अगर ग्रामीण और शहरी इलाकों की बात करें तो गांवों में स्थिति ज्यादा बेहतर दिख रही है। ग्रामीण बेरोजगारी दर 2.5% से घटकर 2.4% हो गई, जो यह दिखाता है कि गांवों में लोगों को काम मिलने की स्थिति मजबूत हो रही है। खास बात यह है कि गांवों में महिलाओं की बेरोजगारी दर सिर्फ 2.1% रही, जो पुरुषों (2.6%) से भी कम है। वहीं शहरों में बेरोजगारी दर ज्यादा है, पुरुषों के लिए 4.2% और महिलाओं के लिए 6.4%। लैंगिक और क्षेत्रीय विश्लेषण सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, पुरुषों की बेरोजगारी दर में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है, जो 2024 के 3.3% से घटकर 2025 में 3.1% पर आ गई है. वहीं, महिलाओं के लिए बेरोजगारी दर 3.1% पर स्थिर बनी हुई है।  ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच श्रम अवशोषण की क्षमता में भी अंतर देखा गया. ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 2.4% दर्ज की गई, जो पिछले वर्ष के 2.5% से कम है. विशेष रूप से, ग्रामीण भारत में महिलाओं की बेरोजगारी दर केवल 2.1% रही, जो इसी क्षेत्र के पुरुषों (2.6%) की तुलना में बेहतर स्थिति दर्शाती है. शहरी क्षेत्रों में, पुरुषों के लिए यह दर 4.2% और महिलाओं के लिए 6.4% रही।  रोजगार की प्रकृति में बदलाव: स्वरोजगार से वेतनभोगी नौकरियों की ओर रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू रोजगार की गुणवत्ता में आया सुधार है. आंकड़ों से पता चलता है कि देश में स्वरोजगार की हिस्सेदारी 57.5% से घटकर 56.2% रह गई है. इसके विपरीत, 'नियमित वेतनभोगी नौकरियों' में वृद्धि देखी गई है, जो 22.4% से बढ़कर 23.6% हो गई है. यह वृद्धि पुरुषों (25.4% से 26.5%) और महिलाओं (16.6% से 18.2%) दोनों के लिए समान रूप से दर्ज की गई, जो अर्थव्यवस्था के औपचारिकरण का संकेत है।  क्षेत्रीय बदलाव और आय में वृद्धि औद्योगिक भागीदारी के मामले में, कृषि क्षेत्र अभी भी सबसे बड़ा नियोक्ता बना हुआ है, हालांकि इसकी हिस्सेदारी 44.8% से घटकर 43.0% रह गई है. निर्माण क्षेत्र में भी 12.3% से गिरकर 12% की मामूली गिरावट आई है. दूसरी ओर, विनिर्माण क्षेत्र में सुधार हुआ है, जो 11.6% से बढ़कर 12.1% हो गया है, और सेवा क्षेत्र भी 12.2% से बढ़कर 13.1% पर पहुँच गया है।  श्रमिकों की औसत आय में भी सम्मानजनक वृद्धि देखी गई है. नियमित वेतन पाने वाले पुरुषों की औसत मासिक आय 5.8% की वृद्धि के साथ ₹24,217 हो गई है, जबकि महिलाओं की आय में 7.2% की शानदार वृद्धि दर्ज की गई है, जो अब ₹18,353 है. स्वरोजगार श्रेणी में भी पुरुषों की आय में 6% और महिलाओं की आय में 8.8% का इजाफा हुआ है।  सर्वेक्षण का पैमाना यह व्यापक सर्वेक्षण देश भर के 2,70,472 घरों (1,48,718 ग्रामीण और 1,21,754 शहरी) में किया गया था, जिसमें कुल 11,48,634 व्यक्तियों के डेटा का विश्लेषण किया गया. रिपोर्ट यह निष्कर्ष निकालती है कि श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) ग्रामीण क्षेत्रों में 80.5% (पुरुष) और 45.9% (महिला) के साथ मजबूत बनी हुई है, जो भारत की आर्थिक विकास यात्रा में श्रम शक्ति की सक्रिय भूमिका की पुष्टि करती है।  खेती अभी भी सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र रोजगार के प्रकार में भी बदलाव देखने को मिला है। खुद का काम करने वालों की हिस्सेदारी थोड़ी घटी है, 2024 में 57.5% से घटकर 2025 में 56.2% रह गई। लेकिन अच्छी बात यह है कि नियमित सैलरी वाली नौकरियों में बढ़ोतरी हुई है, जो 22.4% से बढ़कर 23.6% हो गई। इसका मतलब है कि लोगों को ज्यादा स्थायी नौकरियां मिल रही हैं। वहीं दिहाड़ी मजदूरी लगभग 20% के आसपास ही बनी हुई है। सेक्टर के हिसाब से देखें तो खेती अभी भी सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है, लेकिन इसमें थोड़ी गिरावट आई है, 44.8% से घटकर 43%। इसके अलावा मैन्युफैक्चरिंग (कारखानों) में रोजगार बढ़ा है और सर्विस सेक्टर (जैसे होटल, ट्रांसपोर्ट, अन्य सेवाएं) में भी अच्छी बढ़ोतरी हुई है। कंस्ट्रक्शन सेक्टर में हल्की गिरावट देखी गई। पुरुषों और महिलाओं की कमाई भी बढ़ी कमाई के मामले में भी सुधार दिखा है। सैलरी वाले काम में पुरुषों की औसत कमाई करीब 5.8% बढ़कर ₹24,217 हो गई, जबकि महिलाओं की कमाई 7.2% बढ़कर ₹18,353 हो गई। खुद का काम करने वालों और महिलाओं की आमदनी में भी अच्छा इजाफा हुआ है। हालांकि दिहाड़ी मजदूरों में पुरुषों की कमाई लगभग स्थिर रही, जबकि महिलाओं की कमाई थोड़ी बढ़ी। शिक्षा और काम में भागीदारी की बात करें तो शहरों में लोगों की पढ़ाई का स्तर ज्यादा है, जबकि गांवों में थोड़ा कम है। गांवों में पुरुषों की काम में भागीदारी 80.5% और महिलाओं की 45.9% रही, जो पिछले साल के बराबर है। 

GST कलेक्शन में रिकॉर्ड उछाल! सरकार के खजाने से मिलने वाली सुविधाएं जानें

नई दिल्ली  जीएसटी कलेक्शन के मोर्चे पर अच्छी खबर है। मार्च 2026 में देश की GST कलेक्शन को लेकर अच्छी खबर सामने आई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, नेट GST कलेक्शन बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है, जो पिछले महीने के मुकाबले 8.2% ज्यादा है। इससे साफ है कि देश में कारोबार और खपत दोनों में मजबूती बनी हुई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि टैक्स कलेक्शन में यह बढ़ोतरी आर्थिक गतिविधियों के लगातार सुधरने का संकेत देती है। वहीं, अगर ग्रॉस GST कलेक्शन की बात करें तो मार्च में यह 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले 8.8% ज्यादा है। लगातार बढ़ती GST वसूली सरकार के राजस्व को मजबूत कर रही है और आने वाले समय में विकास योजनाओं को रफ्तार देने में मदद मिलेगी। कुल मिलाकर, यह आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माने जा रहे हैं।  इस पैसे से आपको मिलती हैं ये सुविधाएं पिछले कुछ महीनों से भारत सरकार के खजाने में गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) की रिकॉर्ड तोड़ बारिश हो रही है. देश में जीएसटी कलेक्शन लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है. हर महीने सरकार के खजाने में लाखों करोड़ रुपये जमा हो रहे हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी जेब से निकला यह टैक्स, घूम-फिरकर आपके जीवन को ‘वर्ल्ड क्लास’ बनाने में कैसे इस्तेमाल होता है? आइए समझते हैं कि सरकार इस भारी-भरकम पैसे से आम जनता के लिए कौन सी सुविधाएं तैयार कर रही है. 1. हाई-वे और एक्सप्रेसवे का बिछेगा जाल GST से होने वाली कमाई का एक बड़ा हिस्सा इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च किया जाता है. सरकार का लक्ष्य भारत के सड़क नेटवर्क को अमेरिका और यूरोप के स्तर पर ले जाना है. दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे जैसे प्रोजेक्ट्स इसी कमाई के दम पर पूरे हो रहे हैं. जब सड़कें अच्छी होती हैं, तो सामान की आवाजाही सस्ती होती है, जिससे महंगाई कम करने में मदद मिलती है. 2. हेल्थकेयर: अब हर जिले में होंगे ‘सुपर स्पेशलिटी’ अस्पताल टैक्स के जरिए सरकार देश के हेल्थ बजट को बढ़ा रही है. इसका सीधा फायदा आम आदमी को मिलता है. देश के अलग-अलग राज्यों में नए एम्स और मेडिकल कॉलेज खोले जा रहे हैं. आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के जरिए गरीबों को 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज मिलता है, जिसका फंड इसी टैक्स कलेक्शन से आता है. 3. रेल सफर बनेगा ‘हवाई’ सफर जैसा वंदे भारत ट्रेनों की सफलता और रेलवे स्टेशनों का कायाकल्प (जैसे अमृत भारत स्टेशन योजना) GST कलेक्शन की मजबूती का ही परिणाम है. ट्रेनों में ‘कवच’ जैसी सुरक्षा तकनीक और हाई-स्पीड ट्रैक बिछाने के लिए सरकार भारी निवेश कर रही है. रेलवे स्टेशनों पर अब आपको एयरपोर्ट जैसी लिफ्ट, एस्केलेटर और वेटिंग लाउंज देखने को मिल रहे हैं. 4. शिक्षा और डिजिटल इंडिया देश के गांवों तक हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाना हो या सरकारी स्कूलों को ‘स्मार्ट स्कूल’ में बदलना, जीएसटी का पैसा भविष्य की पीढ़ी को तैयार कर रहा है. डिजिटल ट्रांजेक्शन के बढ़ने से पारदर्शिता आई है, जिससे भ्रष्टाचार कम हुआ है और योजनाओं का फायदा डीबीटी के जरिए सीधे जनता के बैंक खातों में पहुंच रहा है. 0.22 लाख करोड़ रुपये के रिफंड जारी किए गए रिफंड्स की बात करें तो मार्च महीने में कुल 0.22 लाख करोड़ रुपये के रिफंड जारी किए गए, जो साल-दर-साल आधार पर 13.8% ज्यादा है। रिफंड बढ़ने के बावजूद सरकार की नेट कमाई मजबूत बनी हुई है, जो 1.78 लाख करोड़ रुपये रही। इससे यह भी संकेत मिलता है कि एक्सपोर्ट और कारोबार से जुड़े सेक्टर्स में गतिविधि तेज हुई है। ग्रॉस रेवेन्यू 1.46 लाख करोड़ रुपये रहा रेवेन्यू के अलग-अलग हिस्सों पर नजर डालें तो घरेलू लेनदेन से मिलने वाला ग्रॉस रेवेन्यू 1.46 लाख करोड़ रुपये रहा, जिसमें 5.9% की बढ़त हुई। वहीं, इंपोर्ट से मिलने वाला रेवेन्यू 0.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसमें 17.8% की तेज बढ़ोतरी देखने को मिली। इसका मतलब है कि देश में आयात गतिविधियां भी काफी मजबूत रही हैं। पूरे वित्त वर्ष 2025-26 की बात करें तो ग्रॉस GST कलेक्शन 8.3% बढ़कर 22.27 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया। वहीं नेट GST रेवेन्यू 7.1% की बढ़त के साथ 19.34 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। राज्यों में महाराष्ट्र ने सबसे ज्यादा योगदान दिया, जहां से करीब 0.13 लाख करोड़ रुपये का टैक्स कलेक्शन हुआ। इसके बाद कर्नाटक और गुजरात का स्थान रहा। कैसे रहे राज्यों के प्रदर्शन राज्यों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो कई राज्यों में GST कलेक्शन में अच्छी ग्रोथ देखने को मिली। इनमें हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश शामिल हैं। वहीं कुछ राज्यों में गिरावट भी दर्ज की गई, जैसे जम्मू-कश्मीर, चंडीगढ़, दिल्ली, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, असम, पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश। कुल मिलाकर, आंकड़े बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था स्थिर और मजबूत दिशा में आगे बढ़ रही है।  

बांगलादेश से मालदीव तक, इन देशों ने भारत के खिलाफ मोर्चा खोला, अब मदद की गुहार

नई दिल्ली ईरान युद्ध से उपजे वैश्विक तेल और गैस संकट के बीच मालदीव और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश भारत से मदद मांग रहे हैं। जानें कैसे नई दिल्ली पुरानी बगावत को भुलाकर 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति के तहत अपना पड़ोसी धर्म निभा रहा है। 28 फरवरी को ईरान में शुरू हुए अमेरिका-इजरायल युद्ध ने पूरी दुनिया के सामने एक अभूतपूर्व ऊर्जा संकट खड़ा कर दिया है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव के कारण ग्लोबल सप्लाई चेन टूट चुकी है और कच्चे तेल व गैस की कीमतों में लगी आग से वैश्विक अर्थव्यवस्था झुलस रही है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से विश्व का करीब 20% तेल और गैस गुजरता है। यह लगभग पूरी तरह बंद है जिसके कारण दक्षिण एशिया के देशों में पेट्रोल-डीजल, एलपीजी और बिजली संकट गहरा गया है। इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। जिन पड़ोसी देशों- विशेषकर मालदीव और बांग्लादेश ने हाल के वर्षों में अपनी घरेलू राजनीति चमकाने के लिए भारत के खिलाफ मुखर बगावत की थी और 'इंडिया आउट' जैसे अभियान चलाए थे वे आज गहरे तेल और गैस संकट से जूझते हुए उसी भारत से मदद की गुहार लगा रहे हैं। दूसरी ओर, भारत ने अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट' (पड़ोसी प्रथम) नीति और कूटनीतिक बड़प्पन का परिचय देते हुए तमाम कड़वाहटों को दरकिनार कर इन देशों की ओर मदद का हाथ बढ़ाया है। हाल ही में बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव ने भारत से ईंधन सप्लाई करने की मांग की थी। विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, इन पड़ोसी देशों ने भारत से डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति का अनुरोध किया है। बांग्लादेश ने विशेष रूप से डीजल की अतिरिक्त सप्लाई मांगी, जबकि श्रीलंका और मालदीव भी एनर्जी के सेक्टर में सहायता की मांग की थी। आइए, विस्तार से समझते हैं कि किन देशों ने भारत के खिलाफ क्या कदम उठाए थे और आज संकट के समय भारत उनकी किस तरह ढाल बन रहा है। मालदीव: 'इंडिया आउट' से 'इंडिया हेल्प' तक का सफर क्या थी बगावत? नवंबर 2023 में मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने 'इंडिया आउट' अभियान के दम पर सत्ता हासिल की थी। सत्ता में आते ही उन्होंने सबसे पहला काम मालदीव में तैनात भारतीय सैन्य कर्मियों को वापस भेजने का किया। ये कर्मी मुख्य रूप से मेडिकल इवैक्यूएशन के लिए वहां थे। मुइज्जू ने भारत पर आरोप लगाया कि भारतीय सैन्यकर्मी मालदीव की संप्रभुता का उल्लंघन कर रहे हैं। नवंबर 2023 में सत्ता संभालते ही मुइज्जू फरवरी 2024 तक सभी भारतीय सैन्यकर्मियों की वापसी का ऐलान कर दिया और मई 2024 तक सभी भारतीय सैनिक मालदीव छोड़ चुके थे। इसके बाद उन्होंने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत के बजाय चीन को चुना और बीजिंग के साथ कई रक्षा व आर्थिक समझौते किए। मालदीव के कुछ मंत्रियों ने भारतीय प्रधानमंत्री और भारतीयों पर आपत्तिजनक टिप्पणियां भी कीं, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया। हालांकि जब मुइज्जू को लगा कि चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है तो उन्होंने भारत का दौरा किया और भारत को 'सबसे भरोसेमंद साझेदार' बताया। वर्तमान संकट और भारत की मदद- मालदीव अपनी ऊर्जा और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। फरवरी 2026 के युद्ध के बाद वह गहरे संकट में घिर गया। जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से मालदीव में पेट्रोल-डीजल और गैस की भारी किल्लत हो गई। चीन की ओर से तत्काल राहत न मिलने पर मुइज्जू सरकार को अंततः नई दिल्ली का रुख करना पड़ा। भारत का कदम: सूत्रों की मानें तो भारत ने कूटनीतिक परिपक्वता दिखाते हुए मालदीव के लिए आवश्यक वस्तुओं के निर्यात को न सिर्फ जारी रखा, बल्कि आपातकालीन कोटे के तहत मालदीव को पेट्रोल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की विशेष खेप भेजी है, ताकि वहां का पर्यटन उद्योग और बुनियादी ढांचा पूरी तरह ठप न हो जाए। बांग्लादेश: सत्ता परिवर्तन और 'बहिष्कार' के बाद सच्चाई का सामना क्या थी बगावत? अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में डॉ. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। इस सत्ता परिवर्तन के बाद बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतों का उदय हुआ और भारत विरोधी भावनाएं भड़काई गईं। वहां 'बॉयकॉट इंडिया' अभियान चलाकर भारतीय उत्पादों का बहिष्कार किया गया। यूनुस सरकार ने भारत के साथ कई पूर्व समझौतों (जैसे अडानी पावर डील) की समीक्षा करने की धमकी दी और सीमा व नदी जल बंटवारे को लेकर आक्रामक बयानबाजी की। सीमा पर भारत की बाड़बंदी रोक दी; BGB ने BSF को 'बैक टर्न' करने से इनकार कर दिया। यूनुस ने भारत के 'सेवन सिस्टर्स' (नॉर्थईस्ट) को 'लैंडलॉक्ड' बताते हुए चेतावनी दी कि अस्थिर बांग्लादेश भारत को प्रभावित कर सकता है। पाकिस्तान और चीन से संबंध मजबूत किए। यूनुस का मार्च 2025 चीन दौरा और 'ताइवान इंडिपेंडेंस' का विरोध। अल्पसंख्यक (हिंदू) हिंसा पर भारत की चिंता को 'बढ़ा-चढ़ाकर' बताया। लेकिन फरवरी के चुनाव के बाद सत्ता में आई तारिक रहमान के नेतृत्व वाली सरकार ने भारत के अच्छे संबंध बनाने की बात कही। वर्तमान संकट और भारत की मदद: ईरान युद्ध के कारण गैस सप्लाई रुकने से बांग्लादेश का पावर ग्रिड चरमरा गया है। देश के कपड़ा उद्योग, जो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, को बिजली और डीजल की भारी कमी के कारण बंद होने का खतरा पैदा हो गया। बांग्लादेश 95% तेल और 30% गैस मध्य पूर्व से आयात करता है। ईरान युद्ध से देश में LNG की कमी, पैनिक बाइंग और ईंधन राशनिंग शुरू हो गई। विश्वविद्यालय बंद, स्कूलों में छुट्टियां घोषित कर दी गईं। मार्च 2026 में बांग्लादेश ने भारत से डीजल मांगा। भारत का कदम: भारत ने नुमालीगढ़-पार्वतीपुर 'मैत्री पाइपलाइन' के जरिए हाई-स्पीड डीजल की आपूर्ति को बढ़ाकर बांग्लादेश की लाइफलाइन को जिंदा रखा है। इसके अलावा, भारतीय पावर ग्रिड से बांग्लादेश को दी जाने वाली बिजली आपूर्ति को बिना किसी बाधा के जारी रखा गया है, ताकि वहां मानवीय और आर्थिक संकट गहरा न हो। भारत ने 10 मार्च को 5,000 टन डीजल भेजा और अगले सप्ताह 10 हजार टन भेजा। इस महीने 40,000 टन का अतिरिक्त डीजल भेजने का प्लान है। MEA ने पुष्टि की कि बांग्लादेश का … Read more

ऑपरेशन सिंदूर: आखिरी वक्त पर टला समुद्री हमला, चौंकाने वाले खुलासे

नई दिल्ली ऑपरेशन सिंदूर में नौसेना की भूमिका के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि अब यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि हम समुद्र के रास्ते पाकिस्तान पर हमला करने से बस कुछ ही मिनट दूर थे, तभी उन्होंने हमले रोकने का अनुरोध किया। लगभग सालभर पहले पाकिस्तान के खिलाफ हुए ऑपरेशन सिंदूर पर नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने कहा है कि भारतीय नौसेना समुद्र के रास्ते पाकिस्तान पर हमला करने से बस कुछ ही मिनट दूर थी, तभी पाकिस्तान ने हमले रोकने का अनुरोध किया। वह नौसेना के अलंकरण समारोह में बोल रहे थे, जहां उन्होंने पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी विशिष्ट सेवा के लिए दो शीर्ष नौसेना अधिकारियों को 'युद्ध सेवा पदक' से सम्मानित किया। नौसेना की भूमिका के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, "अब यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि हम समुद्र के रास्ते पाकिस्तान पर हमला करने से बस कुछ ही मिनट दूर थे, तभी उन्होंने हमले रोकने का अनुरोध किया।" बता दें कि पिछले साल 22 अप्रैल को पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमला किया था, जिसमें कई भारतीय पर्यटकों की जान चली गई थी। उनका धर्म पूछकर गोली मारी गई थी। इससे पूरे देश में पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा था। भारत ने सात मई आधी रात पाकिस्तान पर ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत की और पीओके व पाकिस्तान के कई इलाकों में एयर स्ट्राइक करके 100 से अधिक लश्कर व जैश के आतंकियों को ढेर कर दिया था। इससे दोनों देशों में तनाव बढ़ गया और पाकिस्तान ने भी भारत पर हमला करने की कोशिश की। हालांकि, इन हमलों को भारत ने विफल कर दिया और फिर पाकिस्तान के कई एयरबेस को निशाना बनाया, जिसमें उसकी सेना को काफी नुकसान पहुंचा। चार दिन बाद पाकिस्तान के गिड़गिड़ाने के बाद दोनों देशों के बीच सीजफायर पर सहमति बन गई। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि जब से अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध शुरू हुआ है, तब से इस क्षेत्र में 20 से ज्यादा व्यापारिक जहाजों पर हमले हुए हैं। उन्होंने बताया कि इस शत्रुतापूर्ण माहौल के बीच लगभग 1,900 जहाज फंसे हुए हैं। उन्होंने आगे कहा कि होर्मुज स्ट्रेट से होने वाला दैनिक यातायात तेजी से घटकर छह-सात जहाजों तक रह गया है, जबकि संघर्ष से पहले इसका औसत लगभग 130 जहाज था। एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने आगे कहा, "साथ ही, विकसित होती तकनीक और रणनीतियों ने न केवल इस बात को नया रूप दिया है कि संघर्षों की योजना कैसे बनाई जाती है, उन्हें कैसे शुरू किया जाता है और कैसे जारी रखा जाता है, बल्कि उन्होंने गैर-पारंपरिक चुनौतियों को और भी अधिक जटिल बना दिया है, और उनका मुकाबला करना कम अनुमानित हो गया है। परिणामस्वरूप, मौजूदा समुद्री वातावरण में इन चीजों के सावधानीपूर्वक तालमेल की आवश्यकता है। संगठनात्मक स्तर पर फुर्ती और दूरदर्शिता, यूनिट स्तर पर युद्ध की तैयारी और परिचालन प्रभावशीलता और व्यक्तिगत स्तर पर साहस और सही निर्णय लेने की क्षमता पर आधारित पेशेवर उत्कृष्टता। आज, मैं यहां अत्यंत गर्व और प्रसन्नता के साथ यह कहने के लिए खड़ा हूं कि भारतीय नौसेना ने इन सभी आयामों पर लगातार बेहतरीन प्रदर्शन किया है।''  

लोकसभा में गूंजा विदेशी फंडिंग का मुद्दा, सरकार और विपक्ष आमने-सामने

नई दिल्ली विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (एफसीआरए) का कांग्रेस, समाजवादी पार्टी एवं वामदलों ने विरोध किया। विपक्ष का कहना है कि एफसीआरए ईसाइयों, अल्पसंख्यकों और एनजीओ के खिलाफ है। जो एनजीओ भारत के लोगों के लिए अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें इस कानून के जरिए दंडित किया जा रहा है। सरकार पर गुमराह करने का लगाया आरोप विपक्षी दलों के भारी विरोध के चलते यह बिल लोकसभा में पेश नहीं किया जा सका। संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजीजू ने कहा कि विधेयक का उद्देश्य केवल राष्ट्रीय सुरक्षा है। फिलहाल विधेयक टल गया है, लेकिन विवाद बरकरार है। स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि विपक्षी सांसद जिस विधेयक की बात कर रहे हैं, जब वह आएगा, तब विरोध कर सकते हैं। आमने-सामने सरकार और विपक्ष विदेशी चंदे से संबंधित विधेयक पर केंद्र सरकार और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। लोकसभा में बुधवार को भारी हंगामे और विरोध के कारण सरकार को फिलहाल इस विधेयक को पेश करने से पीछे हटना पड़ा। सरकार इसे पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष इसे एनजीओ और नागरिक समाज पर सख्त नियंत्रण की कोशिश बता रहा है। सदन की कार्यवाही जैसे ही शुरू हुई, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और वाम दलों के सांसदों ने विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (एफसीआरए) का जोरदार विरोध शुरू कर दिया। कई सांसद नारेबाजी करते हुए वेल में पहुंच गए। इसके पहले संसद परिसर में भी विपक्ष ने बैनर लेकर प्रदर्शन किया। हंगामे के चलते कार्यवाही पांच मिनट में ही स्थगित करनी पड़ी। हंगामे के बीच संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया कि विधेयक सूची में होने के बावजूद उसे चर्चा के लिए नहीं लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह विधेयक किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है। इसका उद्देश्य राष्ट्र हित की रक्षा और विदेशी फंड का दुरुपयोग रोकना है। यदि विदेशी धन का उपयोग विरोध प्रदर्शनों, गलत सूचना या अवैध गतिविधियों में होता है तो उसे नियंत्रित करना जरूरी है। सरकार ने यह भी कहा कि यह किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है।विवाद का सबसे बड़ा कारण विधेयक का वह प्रविधान है, जिसमें एफसीआरए का पंजीकरण खत्म होने पर एनजीओ की विदेशी फंडिंग से बनी संपत्तियां सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकरण के नियंत्रण में चली जाएंगी। यह स्थिति रद्द, नवीनीकरण न होने या सरेंडर के हालात में भी लागू होगी। कांग्रेस के मनीष तिवारी ने इसे अंसवैधानिक बताया और कहा कि इस कानून से एनजीओ की संपत्तियों पर सरकार का कब्जा हो जाएगा। सरकार इन संपत्तियों को अपने विभागों को सौंप सकती है या बेच सकती है। विपक्ष का कहना है कि विधेयक में कई अन्य बड़े बदलाव भी प्रस्तावित हैं। विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्था अब उस धन को दूसरी संस्था को ट्रांसफर नहीं कर सकेगी। प्रशासनिक खर्च की सीमा 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दी गई है। सभी पदाधिकारियों के लिए आधार अनिवार्य होगा। विदेशी चंदा लेने के लिए सिर्फ एसबीआई की नई दिल्ली शाखा में खाता खोलना होगा। लोकसभा में सांसद डिंपल यादव एवं राज्यसभा में पार्टी नेता रामगोपाल यादव ने कहा कि इससे छोटे और जमीनी स्तर के संगठन प्रभावित होंगे। फंड ट्रांसफर पर रोक से ग्रामीण क्षेत्रों में चल रहे प्रोजेक्ट ठप पड़ सकते हैं। प्रशासनिक खर्च की सीमा घटने से संस्थाएं योग्य कर्मचारियों को नहीं रख पाएंगी। लोक सेवकों को विदेशी फंड लेने पर पूर्ण प्रतिबंध और लोक सेवक की परिभाषा भी विवाद का कारण बनी है। विपक्ष का आरोप है कि इससे शोधकर्ता और सलाहकार भी प्रभावित हो सकते हैं। केरल में चुनावी माहौल के बीच यह मुद्दा और गरमा गया है, जहां विपक्ष ने इसे चर्च और सामाजिक संस्थाओं को निशाना बनाने की भाजपा की कोशिश बताया है।  

दलाई लामा ने की अपील: मिडिल ईस्ट, रूस और यूक्रेन में शांति हो

धर्मशाला   बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने मिडिल ईस्ट के साथ-साथ रूस और यूक्रेन में भी शांति की अपील की है। उन्होंने कहा कि हिंसा से समस्या का समाधान नहीं निकलता संवाद से मामले सुलझाए जा सकते हैं। दलाई लामा के आधिकारिक एक्स अकाउंट से ये खत साझा किया गया है, जिसमें 90 साल के धार्मिक गुरु ने पोप लियो चौदहवें की शांति अपील का समर्थन किया है। सर्वोच्च तिब्बती धर्म गुरु ने कहा, "मैं दिल से होली फादर पोप लियो की पाम संडे के दिन की गई शांति अपील का समर्थन करता हूं। हथियार डालने और हिंसा छोड़ने की उनकी गुजारिश मेरे दिल को छू गई, क्योंकि यह सभी बड़े धर्मों की शिक्षाओं का सार बताती है। सभी धर्म के सार को आगे समझाते हुए उन्होंने कहा कि असल में, चाहे हम ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, इस्लाम, हिंदू धर्म, यहूदी धर्म या दुनिया की किसी भी महान आध्यात्मिक परंपरा को देखें, संदेश असल में एक ही है: प्यार, दया, सहनशीलता और आत्म-संयम। इनमें से किसी में भी हिंसा को कोई जगह नहीं दी गई है। इतिहास ने हमें बार-बार दिखाया है कि हिंसा से सिर्फ और ज्यादा हिंसा ही पैदा होती है और यह कभी भी शांति की पक्की नींव नहीं होती। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता ने आगे कहा, "मिडिल ईस्ट या रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष का समाधान संवाद, कूटनीति और आपसी सम्मान पर आधारित होना चाहिए—इस समझ के साथ कि, हम सब भाई-बहन हैं (मानव परिवार का हिस्सा हैं)। शांति अपील करते हुए उन्होंने अंत में कहा, "मैं अनुरोध करता हूं और प्रार्थना करता हूं कि हिंसा और संघर्ष पर जल्द ही विराम लगाया जाए।" बता दें कि वेटिकन में पाम संडे मास के दौरान पोप लियो चौदहवें ने ईरान संघर्ष तुरंत खत्म करने की अपील करते हुए बाइबल को कोट किया था। उन्होंने बाइबल के एक अंश का हवाला देते हुए कहा, "यीशु उन लोगों की प्रार्थनाएं नहीं सुनते जो युद्ध छेड़ते हैं, बल्कि उन्हें अस्वीकार कर देते हैं, यह कहते हुए कि 'भले ही तुम कितनी भी प्रार्थनाएं करो, मैं नहीं सुनूंगा: तुम्हारे हाथ खून से सने हैं।'

इजरायल के सामने लेबनानी सेना ने किया सरेंडर, भागे हथियार डालकर, इजरायल का कब्जा अब तक किस पर?

बेरूत  ट्रंप अब ईरान के साथ समझौते की रणनीति पर उतर आए हैं लेकिन इजरायल लगातार अपनी जंग लड़ रहा है. मिडिल ईस्ट के कई देशों में चल रही खौफनाक बमबारी के बीच लेबनान की सेना ने हथियार डाल दिए हैं. 1 महीने लंबी लड़ाई लड़ने के बाद लेबनानी सेना दक्षिणी लेबनान के दो प्रमुख शहरों, रमीश (Rmeish) और ऐन एबेल (Ain Ebel) से अपने कदम पीछे खींचते हुए चली गई है. सेना का हटना इस बात का बड़ा संकेत है कि इजरायली डिफेंस फोर्सेस (IDF) अब मिडिल ईस्ट में अपना मकसद मजबूत करती जा रही है।  क्या लेबनान ने सच में ‘हथियार डाल दिए’ हैं? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबित लेबनान की आधिकारिक सेना हिजबुल्लाह के मुकाबले काफी कमजोर और कम संसाधनों वाली है. वो इजरायल की आधुनिक मशीनरी और एयरफोर्स का सामना करने की स्थिति में नहीं है. रमीश और ऐन एबेल जैसे शहरों से पीछे हटना इजरायल को लेबनान के भीतर घुसने का ‘खुला निमंत्रण’ देने जैसा है।  लेबनानी सेना के पीछे हटने का सीधा मतलब ये है कि नेतन्याहू का संकल्प पूरा हुआ. इजरायल लंबे समय से दक्षिण लेबनान में एक बफर जोन बनाना चाहता है ताकि हिजबुल्लाह के रॉकेट हमलों को रोका जा सके. लेबनान की सेना के हटते ही अब वहां सिर्फ हिजबुल्लाह के लड़ाके और इजरायली टैंक ही आमने-सामने होंगे।  अब तक लेबनानी सेना की मौजूदगी एक ‘बैरियर’ का काम करती थी लेकिन अब हिजबुल्लाह को अपनी रक्षा खुद करनी होगी. इजरायल के लिए अब इन इलाकों पर कब्जा करना और भी आसान हो गया है।  मिडिल ईस्ट की जंग में इसके बड़े मायने गाजा और ईरान के बाद अब लेबनान में इजरायल को बिना लड़े ही रास्ता मिल रहा है. ये बेंजामिन नेतन्याहू के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और सैन्य जीत है. हिजबुल्लाह ईरान का सबसे बड़ा और ताकतवर प्रॉक्सी ग्रुप है. लेबनान की सरकारी सेना का पीछे हटना यह दिखाता है कि लेबनान के भीतर भी अब हिजबुल्लाह को लेकर समर्थन कम हो रहा है या वहां का प्रशासन अब और तबाही नहीं झेलना चाहता।  सेना के हटते ही इन इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों में भारी खौफ है. लोग घर छोड़कर उत्तर की ओर भाग रहे हैं, जिससे लेबनान में एक बड़ा मानवीय संकट खड़ा हो सकता है।  अगला कदम क्या होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि लेबनानी सेना का हटना इस बात की पुष्टि है कि अगले 24 से 48 घंटों में इजरायली टैंक रमीश और ऐन एबेल की सड़कों पर नजर आ सकते हैं. इजरायल अब लेबनान के भीतर ‘क्लीन-अप ऑपरेशन’ चलाएगा ताकि हिजबुल्लाह के ठिकानों और सुरंगों को जड़ से मिटाया जा सके।  1948 से शुरू हुआ सीमाओं का विस्तार इजरायल के नक्शे का इतिहास युद्धों की कहानियों से भरा पड़ा है. साल 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने जब विभाजन की योजना पेश की थी, तब इजरायल के लिए केवल 14,500 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र प्रस्तावित किया गया था, लेकिन 1948 में इजरायल की स्थापना के तुरंत बाद शुरू हुए पहले अरब-इजरायल युद्ध ने सब कुछ बदल दिया. इस जंग के खत्म होने तक इजरायल ने अपनी प्रस्तावित सीमाओं को तोड़ते हुए लगभग 20,700 वर्ग किलोमीटर के इलाके पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था. यहीं से इजरायल के भौगोलिक विस्तार के उस दौर की शुरुआत हुई, जिसने मध्य-पूर्व की राजनीति को हमेशा के लिए अस्थिर कर दिया।  सिक्स डे वॉर और कब्जे का सबसे बड़ा दौर इजरायल के इतिहास में 1967 की सिक्स डे वॉर मील का पत्थर साबित हुई. इस छोटी सी लेकिन भीषण जंग में इजरायल ने अपने पड़ोसी देशों को चौंकाते हुए वेस्ट बैंक, गाजा पट्टी, गोलन हाइट्स और सिनाई प्रायद्वीप जैसे विशाल क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया. इस युद्ध के बाद इजरायल का आकार कई गुना बढ़ गया था. हालांकि बाद में शांति समझौतों के तहत सिनाई प्रायद्वीप को मिस्र को वापस लौटा दिया गया, लेकिन गोलन हाइट्स और वेस्ट बैंक जैसे इलाके आज भी विवाद और कब्जे के केंद्र में बने हुए हैं. यही वे इलाके हैं, जिनके लिए आज भी खून बह रहा है।  ईरान-इजरायल युद्ध और मौजूदा हालात आज के दौर में जब ईरान और इजरायल के बीच सीधी जंग छिड़ी हुई है, तो जमीन का यह विवाद और भी गहरा गया है. ईरान लगातार इजरायल पर फिलिस्तीनी और अरब जमीनों पर अवैध कब्जे का आरोप लगाता रहा है. मौजूदा संघर्ष में जहां इजरायल को अमेरिका का खुला समर्थन प्राप्त है, वहीं ईरान इसे अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई बता रहा है. जानकारों का मानना है कि इजरायल द्वारा समय-समय पर अपनी सीमाओं को आगे बढ़ाना ही ईरान और उसके सहयोगियों के गुस्से की सबसे बड़ी वजह है. इस युद्ध में इजरायल को कड़ी चुनौती मिल रही है, जिससे उसकी विस्तारवादी नीति पर सवाल उठने लगे हैं।  कितना बढ़ गया इजरायल का कुल क्षेत्रफल? आंकड़ों की नजर से देखें तो इजरायल का विस्तार काफी चौंकाने वाला है. जिस देश की शुरुआत करीब 14,000 वर्ग किलोमीटर से होनी थी, उसका आधिकारिक क्षेत्रफल आज लगभग 22,072 वर्ग किलोमीटर होने का अनुमान है. इसमें गोलन हाइट्स जैसे वे इलाके भी शामिल हैं, जिन्हें इजरायल ने अंतरराष्ट्रीय विरोध के बावजूद अपने नक्शे में मिला रखा है. इजरायल का यह बदलता नक्शा न केवल क्षेत्र में उसकी सैन्य शक्ति को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि भविष्य के युद्धों के पीछे जमीन की यह पुरानी लड़ाई ही सबसे बड़ी और मुख्य जड़ है।  ग्रेटर इजरायल की विचारधारा और इसका विवाद इजरायल के इर्द-गिर्द घूमने वाला सबसे बड़ा विवाद ग्रेटर इजरायल की विचारधारा है. यह कोई आधिकारिक सरकारी योजना नहीं है, लेकिन एक ऐसी विचारधारा है जो इजरायल के विस्तार की वकालत करती है. इस विचारधारा के समर्थक बाइबिल के आधार पर प्राचीन यहूदी राज्य की उन सीमाओं की कल्पना करते हैं जो आधुनिक इजरायल से कहीं ज्यादा बड़ी हैं. इस विचार के तहत फिलिस्तीन, लेबनान और सीरिया जैसे पड़ोसी देशों के हिस्सों को भी इजरायल के दायरे में लाने की बात की जाती है. यही वह विचारधारा है जिसे ईरान और अन्य अरब देश क्षेत्र की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं।  मध्य-पूर्व और अमेरिका की रणनीतिक भागीदारी इस पूरे भौगोलिक विस्तार और युद्धों के पीछे अमेरिका … Read more

गांदरबल में सुरक्षाबलों का ऑपरेशन, मुठभेड़ में एक आतंकी ढेर, दो अब भी पकड़े नहीं गए

श्रीनगर जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले में मंगलवार शाम सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ हुई. अरहामा इलाके में हुई इस कार्रवाई में एक आतंकी मारा गया है. भारतीय सेना की चिनार कॉर्प्स और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने खुफिया जानकारी के आधार पर यह संयुक्त ऑपरेशन शुरू किया था. सुरक्षाबलों को सूचना मिली थी कि इलाके में 2 से 3 आतंकी छिपे हो सकते हैं, जिसके बाद पूरे क्षेत्र की घेराबंदी की गई।  जब सुरक्षाबलों की संयुक्त टीम ने अरहामा के संदिग्ध ठिकानों की घेराबंदी शुरू की, तो वहां छिपे आतंकियों ने फायरिंग शुरू कर दी. इसके बाद जवानों ने जवाबी कार्रवाई की, जिसमें एक आतंकी मारा गया. शुरुआती मुठभेड़ के बाद पूरे इलाके में सर्च ऑपरेशन जारी है और अतिरिक्त जवान मौके पर तैनात किए गए हैं।  अंधेरे और रिहायशी इलाके की चुनौती के बीच घेरा सख्त सेना ने इस मिशन को ऑपरेशन अरहामा नाम दिया है. चिनार कॉर्प्स के मुताबिक, सर्च ऑपरेशन अभी भी जारी है क्योंकि अंदेशा है कि 1-2 आतंकी अभी भी इलाके में छिपे हो सकते हैं. चूंकि यह इलाका रिहायशी और थोड़ा जटिल है, इसलिए सुरक्षाबल बेहद सावधानी से आगे बढ़ रहे हैं ताकि किसी नागरिक को नुकसान न पहुंचे. रात के अंधेरे का फायदा उठाकर आतंकी भाग न सकें, इसके लिए पूरे घेरे को टाइट कर दिया गया है।  स्थानीय प्रशासन ने एहतियात के तौर पर मुठभेड़ स्थल की ओर जाने वाले रास्तों को ब्लॉक कर दिया है. पिछले कुछ हफ्तों में घाटी में आतंकियों के खिलाफ अभियानों में काफी तेजी आई है. गांदरबल की यह मुठभेड़ उसी रणनीति का हिस्सा है जिसमें आतंकियों को उनके छिपने के ठिकानों पर ही घेरा जा रहा है. अधिकारियों का कहना है कि जब तक आखिरी आतंकी का खात्मा नहीं हो जाता, यह सर्च ऑपरेशन और घेराबंदी जारी रहेगी।