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रेलवे सुरक्षा में हाईटेक कदम: स्टेशन पर निगरानी करेगा रोबोट ‘ASC अर्जुन’

नई दिल्ली भारतीय रेलवे में अपनी तरह की पहली पहल के तहत विशाखापत्तनम रेलवे स्टेशन पर एक मानवरूपी रोबोट ‘ASC अर्जुन’ को पेश किया है। पूर्वी तट रेलवे (ECR) जोन के वाल्टेयर मंडल ने यात्रियों की सुरक्षा, संरक्षा और सेवा वितरण को बेहतर बनाने के लिए यह कदम उठाया है। रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के तहत में रोबोट को तैनात किया गया है, जो इसके आधुनिकीकरण और डिजिटल परिवर्तन अभियान का हिस्सा है। इसका उद्देश्य सुरक्षा संचालन को मजबूत करना और यात्रियों की सहायता में सुधार करना है।   आरपीएफ के महानिरीक्षक (IG) आलोक बोहरा ने इस पहल की जानकारी दी। उन्होंने बताया, 'पूर्व तट रेलवे जोन के वाल्टेयर डिवीजन ने यात्रियों की सुरक्षा, संरक्षा और सेवा को मजबूत करने के लिए विशाखापत्तनम रेलवे स्टेशन पर ‘एएससी अर्जुन’ नामक एक मानवरूपी रोबोट तैनात किया है।' मंडल रेलवे प्रबंधक (DRM) ललित बोहरा ने कहा कि रोबोट उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IOT) कनेक्टिविटी और वास्तविक समय की निगरानी क्षमताओं से लैस है, जिससे यह आरपीएफ कर्मियों और यात्रियों दोनों के लिए एक स्मार्ट सहायक के रूप में कार्य कर सकता है। रोबोट किस तरह से सुरक्षा में करेगा सहयोग विज्ञप्ति में कहा गया कि एएससी अर्जुन को सुरक्षा निगरानी, ​​भीड़ प्रबंधन, स्वच्छता निगरानी और सुरक्षा जागरूकता में सहयोग करेगा। साथ ही, इसे मानव संसाधन के बोझ को कम करने और प्रतिक्रिया समय में सुधार करने के लिए डिजाइन किया गया है। अधिकारियों ने कहा कि मानवरूपी रोबोट को स्वदेशी नवाचार के माध्यम से पूरी तरह से विशाखापत्तनम में डिजाइन और विकसित किया गया है। इसके लिए आरपीएफ टीम ने सीनियर रेलवे और सुरक्षा अधिकारियों के मार्गदर्शन में एक वर्ष से अधिक समय तक काम किया है।

कंपकंपाती ठंड से बचें, इन गर्म और खूबसूरत जगहों पर जनवरी-फरवरी में करें ट्रिप

नई दिल्ली जनवरी और फरवरी का महीना आते ही भारत के कई हिस्सों में ठंड अपने चरम पर पहुंच जाती है। घना कोहरा, तेज सर्द हवाएं और गिरता तापमान लोगों की दिनचर्या को प्रभावित करने लगता है। ऐसे में बहुत से लोग ठंड से बचने के लिए ऐसी जगहों की तलाश करते हैं, जहां मौसम आरामदायक हो और बिना भारी कपड़ों के घूमने का मजा लिया जा सके। भारत में कुछ डेस्टिनेशन ऐसे भी हैं, जहां सर्दियों के मौसम में भी हल्की गर्माहट बनी रहती है और तापमान सामान्य रूप से 25 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। समुद्र और धूप का बेहतरीन मेल – गोवा सर्दियों के मौसम में गोवा का नाम सबसे पहले सामने आता है। जनवरी और फरवरी में यहां का मौसम न ज्यादा ठंडा होता है और न ही बहुत गर्म। समुद्र के किनारे बैठकर धूप सेंकना, बीच वॉक और शाम के समय सुहावनी हवा का आनंद लेना लोगों को खासा पसंद आता है। यही वजह है कि इस समय गोवा में पर्यटकों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। शहर की रफ्तार में भी गर्माहट – मुंबई मुंबई उन शहरों में शामिल है, जहां ठंड का असर बेहद कम देखने को मिलता है। जनवरी-फरवरी में भी यहां हल्की गर्मी बनी रहती है और स्वेटर या जैकेट की जरूरत नहीं पड़ती। मरीन ड्राइव और जुहू बीच जैसी जगहों पर बैठकर समुद्र की ठंडी लेकिन सुकून देने वाली हवा का आनंद लिया जा सकता है। इसके साथ ही शॉपिंग और स्ट्रीट फूड का अनुभव इस ट्रिप को और खास बना देता है। शांत माहौल और फ्रेंच टच – पुडुचेरी दक्षिण भारत का पुडुचेरी सर्दियों में भी बेहद आरामदायक मौसम के लिए जाना जाता है। जनवरी से फरवरी के बीच यहां का तापमान संतुलित रहता है, जिससे दिनभर घूमना आसान हो जाता है। समुद्री इलाका होने के कारण सुबह और शाम हल्की नमी रहती है, लेकिन कुल मिलाकर मौसम सुकून भरा बना रहता है। शांत सड़कें और समुद्र तट इसे रिलैक्सिंग डेस्टिनेशन बनाते हैं। नीला समंदर और सुकून – लक्षद्वीप अगर आप भीड़-भाड़ से दूर किसी शांत और गर्म जगह की तलाश में हैं, तो लक्षद्वीप एक बेहतरीन विकल्प है। सर्दियों के मौसम में यहां का पानी साफ और मौसम हल्का गर्म रहता है। द्वीपों की प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण इसे जनवरी-फरवरी की ट्रिप के लिए खास बनाता है। परिवार के साथ या सुकून भरी छुट्टियों के लिए यह जगह लोगों को खासा आकर्षित करती है। बीच, एडवेंचर और सादगी – गोकर्ण कर्नाटक का गोकर्ण भी सर्दियों में गर्म रहने वाले डेस्टिनेशन में शामिल है। यहां का मौसम घूमने के लिए अनुकूल रहता है और हल्की गर्माहट बनी रहती है। समुद्र तटों पर समय बिताने के साथ-साथ यहां एडवेंचर एक्टिविटीज और स्थानीय खानपान का अनुभव भी लिया जा सकता है। यह जगह उन लोगों के लिए खास है, जो शांति और प्राकृतिक सौंदर्य दोनों का आनंद लेना चाहते हैं।

बजट 2026 में स्वास्थ्य क्षेत्र को बड़ा फायदा? छोटे शहरों में बेहतर सेवाओं की संभावना

नई दिल्ली:  वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार एक फरवरी को संसद में केंद्रीय बजट 2026-27 पेश करने वाली हैं. इस बार स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के विशेषज्ञों को उम्मीद है कि सरकार दूरदराज के इलाकों और गांवों में बेहतर इलाज की सुविधाओं पर खास ध्यान देगी. विशेषज्ञों का मानना है कि बजट में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और नई तकनीक को बढ़ावा देने वाले फैसलों से आम आदमी के लिए अच्छा इलाज पाना और भी आसान हो जाएगा. नोएडा स्थित प्रकाश अस्पताल के कार्यकारी निदेशक आयुष चौहान ने शुक्रवार को से कहा, "अस्पतालों की कमी, डॉक्टरों और स्टाफ की किल्लत और बीमारियों की सही जांच न हो पाने की वजह से आज भी बहुत से लोगों को अच्छा इलाज नहीं मिल पाता. अगर हम अपने जिला अस्पतालों और गांव-कस्बों के छोटे स्वास्थ्य केंद्रों को बेहतर बनाएं, मोबाइल वैन और फोन पर डॉक्टरी सलाह (टेलीमेडिसिन) की सुविधा बढ़ाएं, तो बड़े शहरों के बड़े अस्पतालों में लगने वाली भीड़ कम होगी और आम लोगों को आसानी से इलाज मिल सकेगा." स्वास्थ्य सेवा केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं भारत की स्वास्थ्य प्राथमिकताओं में क्षमता निर्माण से लेकर दीर्घकालिक प्रणाली मजबूती की ओर बदलाव की उम्मीद करते हुए, चौहान ने कहा, "इस समय, जोर धीरे-धीरे होने वाले खर्च के बजाय परिणामों पर आधारित निवेश पर होना चाहिए, जो सेवा वितरण में सुधार कर सके, बुनियादी ढांचे को मजबूत कर सके और बड़े या छोटे स्तर पर तकनीक को जोड़ सके. आज के दौर में, स्वास्थ्य सेवा केवल एक सामाजिक कर्तव्य नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक आर्थिक आवश्यकता भी है जो रोजगार, उत्पादकता और राष्ट्रीय विकास से बहुत गहराई से जुड़ी हुई है." उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त बजट आवंटित किया जाना चाहिए. क्योंकि स्वास्थ्य क्षेत्र को दी जाने वाली कुल राशि को बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है. खासकर इसलिए क्योंकि भारत अभी भी अन्य देशों की तुलना में अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का बहुत छोटा हिस्सा स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करता है. स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा' (NHA) के अनुमान के अनुसार, हाल के वर्षों में भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च इसके जीडीपी के लगभग 1.8 से 2.0 प्रतिशत के आसपास ही बना हुआ है. चौहान ने कहा- "सरकारी अस्पतालों को आधुनिक बनाया जाना चाहिए, बीमा (इंश्योरेंस) के दायरे को बढ़ाया जाना चाहिए. टियर II और टियर III शहरों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और घरेलू स्तर पर चिकित्सा उपकरणों के निर्माण को भी समर्थन दिया जाना चाहिए." उन्होंने कहा कि इलाज की बढ़ती लागत, गुणवत्ता के अलग-अलग मानक, योग्य कर्मियों की कमी और बिखरा हुआ बुनियादी ढांचा जैसी कई चुनौतियां, मुख्य समस्याएं हैं. उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए नीतिगत स्थिरता, नियामक स्पष्टता, कौशल विकास और सार्वजनिक-निजी सहयोग में वृद्धि आवश्यक होगी. एक भविष्योन्मुखी बजट देश की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को अधिक सुलभ, निष्पक्ष और भविष्य के लिए तैयार बनाने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है. 2025-26 के स्वास्थ्य बजट में वृद्धि साल 2025-26 के लिए, स्वास्थ्य मंत्रालय को 99,859 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. यह 2024-25 के संशोधित अनुमानों से 11 प्रतिशत अधिक है. 2025-26 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग को मंत्रालय के कुल बजट का 96 प्रतिशत हिस्सा दिया गया है. विभाग का यह आवंटन 2024-25 के अनुमानित खर्च से 11 प्रतिशत ज्यादा है. स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग को 3,901 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो 2024-25 के इसके अनुमानित खर्च से 15 प्रतिशत अधिक है. एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (AiMed) के निदेशक राजीव नाथ के अनुसार, चिकित्सा उपकरण (मेडिकल डिवाइस) क्षेत्र आगामी केंद्रीय बजट को नीतिगत इरादों को ज़मीनी प्रभाव में बदलने के एक निर्णायक अवसर के रूप में देखता है. नाथ ने कहा, "जबकि 2025 में चिकित्सा उपकरण नीति 2023 के इर्द-गिर्द रचनात्मक जुड़ाव देखा गया, अब ध्यान निरंतर निष्पादन पर होना चाहिए. मुख्य अपेक्षाओं में अंशांकित टैरिफ सुधार और लंबे समय से चली आ रही आयात विषमताओं को दूर करने तथा घरेलू विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) का समर्थन करने के लिए मौजूदा 7.5 प्रतिशत से सीमा शुल्क को बढ़ाकर 10-15 प्रतिशत करना शामिल है." नाथ के अनुसार, बजट को गुणवत्ता और मूल्य-आधारित सार्वजनिक खरीद को भी मजबूत करना चाहिए, जिसमें 'आईसीएमईडी' (ICMED) प्रमाणित उपकरणों को प्राथमिकता दी जाए और घरेलू मूल्यवर्धन (डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन) को बढ़ावा दिया जाए. उन्होंने कहा, "ऐसे उपाय जो नियामक पूर्वानुमान (रेगुलेटरी प्रेडिक्टेबिलिटी) को मजबूत करें, एमएसएमई (MSME) की भागीदारी को प्रोत्साहित करें और नवाचार (इनोवेशन) का समर्थन करें, एक लचीला मेडटेक (MedTech) इकोसिस्टम बनाने के लिए महत्वपूर्ण होंगे. यह एक ऐसा तंत्र होगा जो सामर्थ्य, विश्वास और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रदान करेगा." स्वास्थ्य सेवा के लिए चिकित्सा उपकरण अनिवार्य नाथ ने कहा कि चिकित्सा उपकरण स्वास्थ्य सेवा वितरण के लिए अनिवार्य हैं, विशेष रूप से प्राथमिक और माध्यमिक देखभाल स्तरों पर, जहां जांच (डायग्नोस्टिक्स), निगरानी और आवश्यक उपकरण परिणामों में काफी सुधार कर सकते हैं. उन्होंने कहा-"पहुंच बढ़ाने के लिए न केवल बुनियादी ढांचे में निवेश की आवश्यकता है, बल्कि ऐसे नीतिगत ढांचे की भी जरूरत है जो सभी भौगोलिक क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण उपकरणों की किफायती उपलब्धता सुनिश्चित करें." उन्होंने कहा कि सार्वजनिक खरीद के माध्यम से घरेलू स्तर पर निर्मित और आईसीएमईडी (ICMED) प्रमाणित, किफायती चिकित्सा उपकरणों को बढ़ावा देने से आयात पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ क्षेत्रीय अंतर को पाटने में मदद मिल सकती है. नाथ ने कहा, "इसके अतिरिक्त, पारदर्शी लेबलिंग नियम जो घरेलू सामग्री का खुलासा करते हैं और स्थानीय मूल्यवर्धन (लोकल वैल्यू एडिशन) को प्रोत्साहित करते हैं, वे भरोसे और स्वीकार्यता को बढ़ा सकते हैं. देश भर में स्वास्थ्य सेवा को सुलभ, निष्पक्ष और टिकाऊ बनाने के लिए एक मजबूत घरेलू मेडटेक (MedTech) आधार होना अनिवार्य है." कई चुनौतियों का सामना कर रहा स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट आवंटन में अगले 5 वर्षों तक हर साल कम से कम 30 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वृद्धि (compounded increase) करना आवश्यक और सामयिक दोनों है. नाथ ने कहा, "जैसे-जैसे स्वास्थ्य सेवा की मांग बढ़ रही है और प्रणाली विकसित हो रही है, बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, तकनीक को अपनाने और सेवा वितरण में सुधार के लिए निरंतर सार्वजनिक निवेश आवश्यक है. बजट का बढ़ा हुआ आवंटन रणनीतिक रूप से स्वास्थ्य सुविधाओं … Read more

भारत में इंसानों की लंबाई क्यों घट रही है? डॉक्टर्स ने खुलासा किया, छोटे होते भारतीय बच्चे

नई दिल्ली  दुनिया जहां लंबी और बेहतर कद-काठी की ओर बढ़ रही है, वहीं भारत अपने 'रिवर्स गियर' में नजर आ रहा है. आमतौर पर जैसे-जैसे किसी देश की अर्थव्यवस्था बढ़ती है और हेल्थ सुविधाएं बेहतर होती हैं, वहां के लोगों की औसत लंबाई बढ़नी चाहिए जैसा कि चीन, जापान और दक्षिण कोरिया में हुआ है. लैंसेट और NCD रिस्क फैक्टर कोलैबोरेशन के डेटा के मुताबिक, पिछले 100 सालों में दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले भारतीयों की हाइट में वो उछाल नहीं दिखा जो चीन या जापान में दिखा है. भारत के मामले में उल्टा हो रहा है और उनकी औसत हाइट में गिरावट देखी गई है. विश्लेषण से संकेत मिलता है कि भारत में औसत हाइट में अपेक्षित बढ़त नहीं हो पाई है और कुछ उम्र व सामाजिक समूहों में लंबाई में मामूली गिरावट भी दर्ज की गई है, जिसका सबसे बड़ा कारण बचपन का कुपोषण है. 20–30 साल पहले (2005–2006) भारतीय पुरुष आज की तुलना में औसतन 1 से 1.1 सेमी लंबे थे यानी पिछले कुछ दशकों में उनकी हाइट में गिरावट आई है. अब भारतीयों की लंबाई कम होने के क्या कारण हैं, कौन-कौन से फैक्टर्स इसके लिए जिम्मेदार हैं. घटती लंबाई पर क्या कहती हैं रिसर्च? ग्लोबल हाइट स्टडी (1985-2019) के अनुसार भारतीयों की लंबाई में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हुई जिसकी उम्मीद थी. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-3 से NFHS-4, 2005-16) डेटा के विश्लेषण से पता चलता है कि 15-25 साल के पुरुषों की औसत लंबाई 1.10 सेमी और 26-50 साल उम्र वालों की लंबाई 0.86 सेमी कम हो गई है. वहीं यदि 15-25 साल की महिलाओं की बात करें तो उनकी लंबाई में 0.12 सेमी की गिरावट आई है. ट्राइबल महिलाओं में यह आंकड़ा 0.42 सेमी और गरीब तबके वाली महिलाओं की लंबाई 0.57 सेमी तक गिर गई है. PLoS One में पब्लिश भारतीयों की लंबाई घटने पर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) द्वारा की गई रिसर्च (2021) से पता चलता है कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-3 (2005-06) से नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 (2015-16) के बीच पुरुषों की लंबाई 1 से 1.1 सेमी और चुनिंदा महिला ग्रुप्स (एसटी, गरीब) में 0.4 से 0.6 सेमी तक घट गई है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5, 2019-21) के मुताबिक, बचपन और किशोरावस्था में कुपोषण ही लंबाई घटने की सबसे बड़ी वजह बना हुआ है. 5 साल से कम उम्र के 35 प्रतिशत बच्चे नाटे (स्टंटिंग) हैं. दरअसल, हर बच्चे के जेनेटिक्स में एक निश्चित लंबाई तक पहुंचने  की अधिकतम संभावना होती है लेकिन स्टंटिंग इस क्षमता को सीमित कर देता है और उनकी लंबाई पूरी नहीं बढ़ पाती.  रिपोर्ट के मुताबिक, टीम ने 1985 और 2019 के बीच की गई 2000 से अधिक स्टडीज में 5 से 19 वर्ष की उम्र के 6.5 करोड़ से अधिक बच्चों और वयस्कों के डेटा का एनालेसिस किया. सामने आया कि पिछले 35 सालों में बच्चों की औसत ऊंचाई में सबसे अधिक सुधार चीन और दक्षिण कोरिया में देखा गया है. चीन में 19 साल के लड़कों की औसत लंबाई 1985 से 2019 के बीच 8 सेमी बढ़ी पाई गई थी. 2019 में पब्लिश हुई द लैंसेट स्टडी में बताया गया है कि 19 साल की उम्र में सबसे लंबे लड़के नीदरलैंड के थे जिनकी औसत हाइट 183.8 सेमी या 6 फीट थी और वहीं 19 साल की उम्र में सबसे कम लंबाई वाले लड़के तिमोर लेस्ते (दक्षिण पूर्व एशिया का देश) में रहते थे जिनकी औसत हाइट 160.1 सेमी या 5 फीट 3 इंच थी. पेट की बीमारी, मॉडर्न लाइफस्टाइल बच्चे की हाइट के दुश्मन बेंगलुरु के स्पर्श हॉस्पिटल के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. विक्रम बेल्लिअप्पा (MBBS, MS, DNB) ने Aajtak/.in को बताया, 'बार-बार होने वाले संक्रमण और पेट से जुड़ी बीमारियां बच्चों की ग्रोथ को प्रभावित कर सकती हैं. पेट के इंफेक्शन, दस्त या उल्टी की वजह से बॉडी जरूरी न्यूट्रिएंट्स को एब्जॉर्ब नहीं कर पाती. इसका सीधा असर बच्चे के वजन और लंबाई पर पड़ता है. लगातार पेट की खराबी न सिर्फ इम्यूनिटी कमजोर करती है, बल्कि ग्रोथ की रफ्तार को भी सुस्त कर देती है.' मॉडर्न लाइफस्टाइल के कारण बच्चों में अर्ली प्यूबर्टी (Early Puberty) देखने मिल रही है जिसका संबंध हाइट कम रह जाने से हो सकता है. दरअसल, आजकल के बच्चे जंक फूड का सेवन अधिक कर रहे हैं जिसके कारण उनमें मोटापा बढ़ रहा है जिस कारण उनमें समय से पहले हार्मोनल बदलाव (प्यूबर्टी) शुरू हो रहे हैं. डॉ. विक्रम बताते हैं, 'शुरू में तो बच्चा तेजी से लंबा होता दिखता है लेकिन हकीकत में उसकी 'ग्रोथ प्लेट्स' समय से पहले बंद हो जाती हैं. नतीजा यह कि उम्र बढ़ने पर उसकी फाइनल हाइट उम्मीद से काफी कम रह जाती है.' क्या हमारी खराब जीवनशैली और प्रदूषित वातावरण हमारे DNA में ऐसे बदलाव कर रहे हैं जो आने वाली पीढ़ियों की हाइट को परमानेंट तौर पर छोटा कर रहे हैं? बैलेंस डाइट की कमी  जयपुर के कोकून हॉस्पिटल के पीडियाट्रिशियन डॉ. जितेन्द्र जैन (MBBS, DCH, DNB) से Aajtak.in ने पूछा, क्या कारण है कि भारतीयों की नई पीढ़ी की औसत ऊंचाई पिछली पीढ़ी से कम हो रही है? उन्होंने बताया, 'लंबाई में जेनेटिक्स का अहम रोल है लेकिन केवल जेनेटिक्स ही पूरी कहानी नहीं बताते. भारतीयों की नई पीढ़ी की औसत ऊंचाई पिछली पीढ़ी से कम होने के पीछे लाइफस्टाइल, पोषण और पर्यावरण भी जिम्मेदार हैं. 'जंक फूड, कम प्रोटीन और विटामिन्स, बढ़ता मोटापा, अधिक स्क्रीन टाइम और फिजिकल एक्टिविटी में कमी बच्चों की ग्रोथ को धीमा कर रही है. 'गर्भावस्था में माताओं का खराब पोषण, बचपन में बार-बार होने वाले इंफेक्शन, पेट और आंत की बीमारियां और प्रदूषण भी हार्मोनल संतुलन और हड्डियों की ग्रोथ को प्रभावित कर रहे हैं. इसलिए केवल जेनेटिक्स पर निर्भर रहने की बजाय बैलेंस डाइट, साफ पानी, पर्याप्त नींद और एक्टिव लाइफस्टाइल बेहद जरूरी है ताकि बच्चों की लंबाई सही रहे और ओवरऑल ग्रोथ सही तरह से हो.' खराब लाइफस्टाइल और पॉल्यूशन डॉ. विक्रम ने कहा, 'खराब लाइफस्टाइल और प्रदूषण सीधे तौर पर DNA को बदलकर हाइट को स्थायी रूप से प्रभावित नहीं करते लेकिन ये एपिजेनेटिक बदलाव जरूर पैदा कर सकते हैं. लगातार जंक फूड, न्यूट्रिशन की कमी, स्ट्रेस, प्रदूषण और हार्मोन-डिसरप्टिंग केमिकल्स का असर … Read more

Toll Tax नियमों में नई क्रांति, Fastag से अब होगा स्वचालित भुगतान

नई दिल्ली अगर आप अक्सर हाईवे पर सफर करते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। 1 अप्रैल 2026 से नेशनल हाईवे के टोल प्लाजा पर नकद भुगतान गुजरे जमाने की बात हो जाएगी। केंद्र सरकार ने टोल प्लाजा पर कैश लेन-देन को पूरी तरह बंद करने का फैसला किया है। सिर्फ FASTag और UPI से होगा भुगतान केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के अनुसार, देश को डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने और टोल प्लाजा पर लगने वाली लंबी कतारों को खत्म करने के लिए यह निर्णय लिया गया है। 1 अप्रैल के बाद टोल प्लाजा पर केवल FASTag और UPI ही भुगतान के मान्य माध्यम होंगे। वर्तमान में कई टोल प्लाजा पर FASTag होने के बावजूद लोग कैश लेन का इस्तेमाल करते हैं, जिससे जाम की स्थिति बनी रहती है। नए नियम के लागू होने के बाद:     टोल प्लाजा से कैश लेन पूरी तरह हटा दी जाएगी।     वाहन चालकों को जाम से निजात मिलेगी और यात्रा समय की बचत होगी।     पारदर्शिता बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था पूरी तरह डिजिटल होगी। सरकार 'मल्टी लेन फ्री फ्लो' (MLFF) टोलिंग सिस्टम लाने की तैयारी में है। इसके तहत…     बिना बैरियर के टोल: शुरुआत में देशभर के 25 टोल प्लाजा पर पायलट प्रोजेक्ट के रूप में इसे लागू किया जाएगा।     सेंसर तकनीक: इस सिस्टम में कोई बैरियर नहीं होगा। वाहन बिना रुके गुजरेंगे और ऊपर लगे कैमरे व सेंसर FASTag के जरिए अपने आप टोल काट लेंगे।     सुगम यात्रा: पायलट प्रोजेक्ट सफल होने के बाद इसे पूरे देश में लागू किया जाएगा, जिससे हाईवे पर वाहनों की गति बाधित नहीं होगी।

डब्ल्यूईएफ 2026: ‘AI नौकरियां नहीं छिनेगा, इंसानों के साथ काम करेगा’, एक्सपर्ट्स का बयान

नई दिल्ली  दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) 2026 में शामिल तकनीकी कंपनियों के बड़े अधिकारियों ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) इंसानों की नौकरियां नहीं छीनेगा, बल्कि काम करने के तरीके को बदलेगा। एआई कई कामों को अपने आप कर सकता है, लेकिन यह पूरी नौकरी की जगह नहीं ले सकता। वर्करा के संस्थापक और सीईओ कियान कटानफोरूश ने कहा कि एआई को लेकर भाषा का सही इस्तेमाल बहुत जरूरी है। वे एआई को 'सहकर्मी' कहने के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि एआई कुछ खास काम तो अच्छी तरह कर सकती है, लेकिन इंसानों की तरह पूरी नौकरी नहीं कर सकती। उन्होंने बताया कि इंसान एक साथ सैकड़ों तरह के काम करते हैं, जबकि एआई केवल तय किए गए काम ही कर पाता है। उन्होंने यह भी कहा कि अब तक यह अनुमान गलत साबित हुआ है कि एआई बड़े पैमाने पर लोगों की नौकरियां खत्म कर देगा। हिप्पोक्रेटिक एआई के सह-संस्थापक और सीईओ मुंजाल शाह ने भी कहा कि एआई इंसानों की जगह नहीं लेगा, बल्कि बड़े स्तर पर कर्मचारियों की मदद करेगा। उन्होंने भविष्य की कल्पना करते हुए कहा कि दुनिया में '8 अरब लोग और 80 अरब एआई सिस्टम' होंगे, जो नए कामों को आसान बनाएंगे। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि एक एआई सिस्टम ने गर्मी की लहर के दौरान हजारों लोगों को फोन करके उन्हें ठंडी जगहों पर जाने की सलाह दी और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ऐसे सिस्टम को सही ढंग से लागू करने के लिए कड़े परीक्षण की आवश्यकता होती है। हमारे पास ऐसे मॉडल हैं जो अन्य मॉडल्स की जांच करते हैं और फिर वे मॉडल भी उन्हीं मॉडल्स की जांच करते हैं। अमिनी की संस्थापक और सीईओ केट कैलॉट ने कहा कि एआई अभी भी सिर्फ एक उपकरण है। यह अपने आप सही और गलत का फैसला नहीं कर सकता, क्योंकि इसमें इंसानों जैसी सोच और मूल्य समझने की क्षमता नहीं है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) के सीईओ क्रिस्टोफ श्वाइजर ने कहा कि एआई के साथ काम करने का अनुभव कभी-कभी किसी सहकर्मी के साथ काम करने जैसा लगता है। किसी कंपनी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने काम करने के तरीके को कितना बदलती है, न कि सिर्फ नई तकनीक अपनाने पर। उन्होंने यह भी कहा कि एआई को एक बड़ी प्रबंधन जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए और इसे सिर्फ तकनीकी टीम पर नहीं छोड़ा जा सकता। एचपी कंपनी के अध्यक्ष और सीईओ एनरिक लोरस ने कहा कि एआई का इस्तेमाल संतुलन के साथ होना चाहिए। एचपी के कॉल सेंटरों में कभी-कभी एआई गलत जवाब देता है, लेकिन कुल मिलाकर इसकी सटीकता पहले से बेहतर हुई है और ग्राहकों की संतुष्टि भी बढ़ी है।

सरकार की योजना: अब कारों की माइलेज टेस्ट में AC चालू रहेगा, नए नियम जल्द लागू

नई दिल्ली भारत सरकार नई कारों के लिए कुछ नए सख्त नियम लाने की तैयारी कर रही है. जानकारी के अनुसार आगामी, 1 अक्टूबर, 2026 से, भारत में बिकने वाली पैसेंजर कारों को ज़्यादा सख्त फ्यूल-एफिशिएंसी टेस्टिंग नियमों को पूरा करना पड़ सकता है. इन नियमों के अनुसार, माइलेज को एयर-कंडीशनिंग चालू होने पर मापा जाएगा. बता दें कि यह प्रस्ताव केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय ने पेश किया है और इसका मकसद ऑफिशियल माइलेज के दावों और रोज़ाना ड्राइविंग के एक्सपीरिएंस के बीच के अंतर को कम करना है. क्या दिया जा रहा प्रस्ताव? सेंट्रल मोटर व्हीकल्स रूल्स में एक ड्राफ्ट संशोधन के अनुसार, सभी M1 कैटेगरी की गाड़ियों, जिनमें स्थानीय रूप से बनी या इम्पोर्ट की गई कारें शामिल हैं, जिनका टेस्ट AIS-213 स्टैंडर्ड के तहत किया जाएगा. इस स्टैंडर्ड के तहत एक बड़ा बदलाव यह है कि फ्यूल की खपत को AC चालू होने पर मापा जाएगा. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मौजूदा समय में कारों का माइलेज AC बंद करके किए जाता है. जनता से मांगा गया फीडबैक केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय ने इस प्रस्ताव पर लोगों से फीडबैक मांगा है और नियमों को फाइनल करने से पहले आपत्तियों और सुझावों के लिए 30 दिन का समय दिया है. सरकार क्यों करना चाहती है बदलाव सरकार के इस फैसले के पीछे की वजह बताते हुए अधिकारियों ने कहा कि फ्यूल-एफिशिएंसी के आंकड़ों को आम ड्राइविंग स्थितियों को ज़्यादा सही तरीके से दिखाना चाहिए. क्योंकि ज़्यादातर कार मालिक रेगुलर एयर-कंडीशनिंग का इस्तेमाल करते हैं, खासकर भारतीय मौसम में, इसलिए सर्टिफिकेशन टेस्ट के दौरान माइलेज पर इसके असर को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. मौजूदा समय में कैसे मापी जाती है फ्यूल एफिशिएंसी मौजूदा समय की बात करें तो भारत में कार बनाने वाली कंपनियां बिना AC चलाए किए गए टेस्ट के आधार पर फ्यूल-एफिशिएंसी के आंकड़े ग्राहकों को बताती हैं. मैन्युफैक्चरर्स लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि यह तरीका यूरोपियन टेस्टिंग नॉर्म्स के हिसाब से है. हालांकि, सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस तरीके से अक्सर ऐसे माइलेज के आंकड़े मिलते हैं, जो असल दुनिया में इस्तेमाल की तुलना में ज़्यादा अच्छे लगते हैं, जिसकी वजह से टेस्टिंग की ज़रूरतों में बदलाव करने पर ज़ोर दिया जा रहा है.

श्रद्धालुओं के लिए खुशखबरी! बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की तारीख तय, 23 अप्रैल से खुलेंगे

नई दिल्ली उत्तराखंड की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र माने जाने वाले बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की तारीख का ऐलान कर दिया गया है। बसंत पंचमी के पावन अवसर पर टिहरी जिले के नरेंद्र नगर स्थित राजदरबार में शास्त्रों और पंचांग गणना के बाद यह फैसला लिया गया कि बदरीनाथ धाम के कपाट 23 अप्रैल को खोले जाएंगे। जानकारी के मुताबिक, राजदरबार में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम के दौरान महाराजा मनु जयेंद्र शाह ने स्वयं कपाट खुलने की तिथि की घोषणा की। इस मौके पर राजपुरोहित आचार्य कृष्ण प्रसाद उनियाल ने पंचांग, ग्रह-नक्षत्र और शुभ योगों का अध्ययन कर बताया कि 23 अप्रैल को सुबह 6 बजकर 15 मिनट का समय कपाट खोलने के लिए शुभ है। वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक अनुष्ठानों के बाद विधिवत रूप से तिथि घोषित की गई।   कैसे खुलते हैं बदरीनाथ धाम के कपाट, क्या-क्या होती हैं खास परंपराएं बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की प्रक्रिया पूरी तरह शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार होती है। कपाट खुलने से पहले भगवान बदरीविशाल की पूजा-अर्चना विशेष विधि से की जाती है। सबसे पहले मंदिर परिसर को फूलों से सजाया जाता है और सिंहद्वार पर पारंपरिक ढंग से पूजा होती है। कपाट खुलने के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में गणेश पूजा के साथ कार्यक्रम की शुरुआत होती है। इसके बाद शंखनाद और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मंदिर के मुख्य द्वार के ताले खोले जाते हैं। जैसे ही कपाट खुलते हैं, मंदिर परिसर “जय बद्री विशाल” के जयकारों से गूंज उठता है। कपाट खुलने के बाद सबसे पहले भगवान बदरीनाथ के अखंड दीप के दर्शन कराए जाते हैं, जो शीतकाल में भी निरंतर जलता रहता है। इसके बाद भगवान की महाभिषेक पूजा होती है और विशेष श्रृंगार किया जाता है। कपाट खुलने के पहले दिन केवल सीमित समय के लिए ही श्रद्धालुओं को दर्शन की अनुमति दी जाती है। परंपरा के अनुसार, कपाट खुलने के समय डिमरी समाज के प्रतिनिधि और मंदिर के मुख्य रावल विशेष भूमिका निभाते हैं। कपाट खुलने के बाद नियमित पूजा, दर्शन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं। क्यों खास है कपाट खुलने का दिन मान्यता है कि बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने के साथ ही चारधाम यात्रा की औपचारिक शुरुआत हो जाती है। इस दिन दर्शन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु इस शुभ पल के साक्षी बनने के लिए बदरीनाथ पहुंचते हैं।

यात्रियों को बड़ी सौगात: गणतंत्र दिवस पर शुरू हुईं 12 नई एसी लोकल

मुंबई मुंबई के लाखों लोकल ट्रेन यात्रियों के लिए राहत भरी खबर है। यात्रियों के बीच बढ़ती लोकप्रियता और लगातार बढ़ रही मांग को देखते हुए पश्चिम रेलवे (Western Railway) ने एसी लोकल ट्रेनों की संख्या बढ़ाने का फैसला किया है। आज से मुंबई उपनगरीय खंड में 12 नई एसी लोकल ट्रेन सेवाएं शुरू की जाएंगी। इसके बाद पश्चिम रेलवे पर एसी लोकल ट्रेनों की कुल संख्या 109 से बढ़कर 121 हो जाएगी। खास बात यह है कि ये सभी सेवाएं सप्ताह के सातों दिन उपलब्ध रहेंगी। भीड़ से मिलेगी राहत, कुल सेवाओं में नहीं होगा बदलाव पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी विनीत अभिषेक के अनुसार, एसी ट्रेनों में यात्रियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। इसी को ध्यान में रखते हुए मौजूदा 12-डिब्बों वाली नॉन-एसी लोकल ट्रेनों के स्थान पर ये नई एसी सेवाएं शुरू की जा रही हैं। रेलवे ने स्पष्ट किया है कि कुल लोकल सेवाओं की संख्या 1406 ही रहेगी। नई शुरू होने वाली 12 सेवाओं में से 6 अप (चर्चगेट की ओर) और 6 डाउन (विरार/बोरीवली की ओर) में चलेंगी।   नई शुरू की जा रही 12 एसी लोकल ट्रेनों में से 6 अप दिशा और 6 डाउन दिशा में होंगी। अप दिशा में विरार-चर्चगेट और गोरेगांव-चर्चगेट के बीच दो-दो ट्रेनें चलेंगी। इसके अलावा बोरीवली-चर्चगेट और भायंदर-चर्चगेट के बीच एक-एक एसी लोकल सेवा शामिल है। वहीं डाउन दिशा में चर्चगेट-विरार और चर्चगेट-गोरेगांव के बीच दो-दो ट्रेनें, जबकि चर्चगेट-भायंदर और चर्चगेट-बोरीवली के बीच एक-एक एसी लोकल ट्रेन चलाई जाएगी। टाइमटेबल के अनुसार, सुबह और शाम के व्यस्त समय के साथ-साथ दिन के मध्य भी एसी लोकल सेवाएं उपलब्ध रहेंगी, जिससे नौकरीपेशा यात्रियों के साथ-साथ अन्य यात्रियों को भी सहूलियत मिलेगी। रेलवे अधिकारियों का मानना है कि इन अतिरिक्त एसी लोकल ट्रेनों से भीड़ का दबाव कम होगा और यात्रियों को ज्यादा आरामदायक सफर का विकल्प मिलेगा।

ओडिशा के कोरापुट में विवाद के बाद फैसला पलटा, 26 जनवरी पर मांसाहार बिक्री पर अब नहीं रहेगी पाबंदी

भुवनेश्वर ओडिशा के कोरापुट जिले में 26 जनवरी को 77वें गणतंत्र दिवस समारोह के अवसर पर मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री पर एक दिन के प्रतिबंध से जुड़ा आदेश वापस ले लिया गया है। जिले के कलेक्टर मनोज सत्यवान महाजन ने रविवार को अपने पहले के आदेश को निरस्त करते हुए सभी तहसीलदारों, ब्लॉक विकास अधिकारियों (बीडीओ) और अन्य कार्यकारी अधिकारियों को इस संबंध में नया पत्र जारी किया। कलेक्टर मनोज महाजन ने पत्र में स्पष्ट किया कि मांस, चिकन, मछली, अंडे और अन्य मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री पर रोक लगाने का निर्णय जिला स्तरीय गणतंत्र दिवस तैयारी समिति के सुझाव के आधार पर लिया गया था। हालांकि, इस फैसले को लेकर विभिन्न स्तरों पर आई प्रतिक्रियाओं और गहन विचार-विमर्श के बाद 23 जनवरी को जारी आदेश को वापस लेने का निर्णय किया गया है। रविवार को जारी आदेश में कहा गया है कि कोरापुट जिले में 77वें गणतंत्र दिवस समारोह के अवसर पर मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने संबंधी 23 जनवरी का आदेश तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाता है। आदेश में यह भी उल्लेख किया गया है कि यह निर्देश समिति के सुझाव पर जारी किया गया था, इसलिए व्यापक विचार के बाद इसे वापस लिया जा रहा है। इससे पहले 23 जनवरी को कलेक्टर ने सभी तहसीलदारों, बीडीओ और अन्य कार्यकारी अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में आधिकारिक अधिसूचना जारी कर 26 जनवरी को मांस, चिकन, मछली, अंडे और अन्य मांसाहारी वस्तुओं की बिक्री पर रोक सुनिश्चित करें। उस आदेश में अधिकारियों से त्वरित कार्रवाई करने को भी कहा गया था। कलेक्टर के इस आदेश के सामने आने के बाद जिले ही नहीं, बल्कि राज्य स्तर पर भी व्यापक और मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं। कई लोगों ने फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा था कि गणतंत्र दिवस एक राष्ट्रीय पर्व है, न कि कोई धार्मिक अवसर, ऐसे में खाद्य पदार्थों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध उचित नहीं है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर भी इस निर्णय को लेकर बहस छिड़ गई थी। अब आदेश वापस लिए जाने के बाद प्रशासन ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। माना जा रहा है कि प्रशासन ने जनभावनाओं और व्यावहारिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया है। फिलहाल कोरापुट जिले में 26 जनवरी को मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री पर कोई प्रतिबंध लागू नहीं रहेगा।