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संसद में पाकिस्तान का कबूलनामा! रक्षा मंत्री बोले- अमेरिका ने किया फायदा, हमें छोड़ा मुश्किल में

 इस्लामाबाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद में स्वीकार किया है कि अमेरिका ने अपने रणनीतिक हितों के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया और फिर उसे 'टॉयलेट पेपर से भी बदतर तरीके से फेंक दिया'. उन्होंने कहा कि अमेरिका की जंगों में शामिल होने का खामियाजा पाकिस्तान को भारी कीमत चुकाकर उठाना पड़ा. ख्वाजा आसिफ ने 1999 के बाद अफगानिस्तान में पाकिस्तान की दोबारा सक्रिय भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि उस वक्त इस्लामाबाद ने एक बार फिर वॉशिंगटन के साथ खड़े होने का फैसला किया, ताकि अमेरिकी समर्थन हासिल किया जा सके. उन्होंने साफ कहा कि यह फैसला पाकिस्तान के लिए तबाही भरा साबित हुआ. 'जिहाद के नाम पर बड़ी गलती हुई' पाकिस्तान में वर्षों से गढ़ी गई आधिकारिक धारणाओं को खारिज करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि अफगान युद्धों में पाकिस्तान की भागीदारी इस्लाम की रक्षा के लिए नहीं थी. उन्होंने खुलकर स्वीकार किया कि पाकिस्तानियों को जिहाद के नाम पर लड़ने और मरने भेजा गया, जो एक गलत फैसला था. ख्वाजा आसिफ ने यह भी बताया कि इन युद्धों को जायज ठहराने के लिए पाकिस्तान के शिक्षा पाठ्यक्रम तक में बदलाव किए गए और आज भी वे बदलाव पूरी तरह वापस नहीं लिए जा सके हैं. उन्होंने कहा कि 1980 के दशक में सोवियत संघ के खिलाफ अफगान युद्ध धार्मिक कर्तव्य नहीं बल्कि अमेरिकी रणनीति का हिस्सा था. आसिफ के मुताबिक, रूस ने अफगानिस्तान पर इस तरह कब्जा नहीं किया था कि जिहाद का ऐलान जरूरी हो, इसके बावजूद पाकिस्तान उस युद्ध में कूद पड़ा. उन्होंने माना कि उस फैसले के दुष्परिणाम दशकों बाद भी देश भुगत रहा है. 'अमेरिका ने इस्तेमाल किया और छोड़ दिया' रक्षा मंत्री ने कहा कि 1999 के बाद अमेरिका के साथ फिर से खड़े होने की पाकिस्तान को बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी, जिससे देश आज तक पूरी तरह उबर नहीं सका है. उन्होंने पूर्व सैन्य शासकों जिया-उल-हक और परवेज मुशर्रफ पर सीधा हमला करते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने पाकिस्तान को ऐसी जंगों में झोंक दिया, जो उसकी नहीं थीं. संसद में बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान को 'टॉयलेट पेपर से भी बदतर' तरीके से इस्तेमाल किया गया. पहले जरूरत पड़ी तो साथ लिया गया और फिर बेरहमी से छोड़ दिया गया. 11 सितंबर 2001 के बाद के दौर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने अमेरिका के नेतृत्व वाली वॉर ऑन टेरर में तालिबान के खिलाफ मोर्चा लिया. हालांकि बाद में अमेरिका वहां से चला गया, लेकिन उस जंग के दीर्घकालिक दुष्परिणाम आज भी पाकिस्तान झेल रहा है. ख्वाजा आसिफ ने कहा, 'इस नुकसान की भरपाई कभी नहीं हो सकती.' उन्होंने इन फैसलों को अपरिवर्तनीय गलतियां करार देते हुए कहा कि इन्हीं कारणों से पाकिस्तान दूसरों की जंगों में एक मोहरा बनकर रह गया.

206 अरब डॉलर का अमेरिकी बाजार खुला भारत के लिए, कौन-कौन से सेक्टर होंगे फायदे में

नई दिल्ली भारत के एग्रीकल्चर सेक्टर के लिए एक बड़ा मौका सामने आया है. लंबे समय से भारतीय किसान और फूड एक्सपोर्ट करने वाले अमेरिकी मार्केट में अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहते थे, और अब हालात उनके पक्ष में दिख रहे हैं. अमेरिका का कुल कृषि आयात बाजार करीब 206 अरब डॉलर का है, जो दुनिया के सबसे बड़े इम्पोर्ट मार्केट्स में गिना जाता है. नई ट्रेड व्यवस्था के तहत भारत को इस बड़े बाजार में एंट्री आसान होने जा रही है. कुछ भारतीय प्रोडक्ट्स को पूरी तरह जीरो ड्यूटी पर एंट्री मिलेगी, जबकि कई अन्य सामानों पर पहले से कम टैरिफ देना होगा. इसका सीधा असर यह होगा कि भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में ज्यादा किफायती और कॉम्पिटिटिव हो जाएगा. वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, अमेरिका के 46 अरब डॉलर के एग्रीकल्चर इम्पोर्ट सेगमेंट में भारत को जीरो ड्यूटी का फायदा मिलेगा. इसमें मसाले, प्रोसेस्ड फूड, फल, चाय, कॉफी और एसेंशियल ऑयल जैसे अहम प्रोडक्ट शामिल हैं. इसके अलावा करीब 160 अरब डॉलर के बड़े हिस्से में भारतीय सामान 18 प्रतिशत की कम रेसिप्रोकल टैरिफ रेट पर जाएगा. यानी पहले जहां ज्यादा ड्यूटी लगती थी, अब वहां कम शुल्क लगेगा. इससे एक्सपोर्ट की लागत घटेगी और अमेरिकी खरीदारों के लिए भारतीय प्रोडक्ट्स ज्यादा आकर्षक बनेंगे. भारत का होगा ट्रेड सरप्लस आंकड़े भी भारत के पक्ष में संकेत दे रहे हैं. साल 2024 में भारत ने अमेरिका को लगभग 3.4 अरब डॉलर के कृषि उत्पाद निर्यात किए, जबकि आयात 2.1 अरब डॉलर का रहा. इस तरह भारत को करीब 1.3 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस मिला. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर नई टैरिफ व्यवस्था सही समय पर लागू हो जाती है, तो यह सरप्लस और बढ़ सकता है. इसका फायदा सीधे किसानों, प्रोसेसिंग यूनिट्स और एक्सपोर्ट कंपनियों को मिलेगा. यह जीरो ड्यूटी की सुविधा एक इंटरिम ट्रेड एग्रीमेंट पर साइन होने के बाद लागू होगी, जिसकी संभावना मार्च के आसपास जताई जा रही है. वहीं 18 प्रतिशत की कम टैरिफ दर तब प्रभावी होगी, जब अमेरिका इस संबंध में एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी करेगा. उम्मीद है कि यह प्रक्रिया जल्दी पूरी हो सकती है. यानी आने वाले कुछ महीनों में जमीन पर इसका असर दिखने लगेगा. मसालों को मिलेगा सबसे अधिक लाभ अगर प्रोडक्ट कैटेगरी की बात करें तो मसालों के सबसे अधिक लाभ मिलने वाला है. अभी अमेरिका के कुल मसाला आयात में भारत की हिस्सेदारी करीब 18 प्रतिशत है, जिसकी वैल्यू लगभग 2.01 अरब डॉलर है. चाय और कॉफी की हिस्सेदारी फिलहाल 1 प्रतिशत से भी कम है, जबकि पूरा बाजार 9.38 अरब डॉलर का है. इसका मतलब है कि यहां ग्रोथ की बड़ी गुंजाइश मौजूद है. फलों में आम और केले जैसे प्रोडक्ट अमेरिका की कुल खरीद का सिर्फ 0.3 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं. वहीं प्रोसेस्ड फलों का इम्पोर्ट लगभग 759 मिलियन डॉलर का है, जिसमें भारत की हिस्सेदारी करीब 4.6 प्रतिशत है. साफ है कि सही रणनीति के साथ यह आंकड़ा कई गुना बढ़ सकता है. वनों वाले प्रोडक्ट्स जैसे बांस की कोपलें, वेजिटेबल वैक्स, नट्स और बीजवैक्स भी अलग-अलग सेगमेंट में 0.2 प्रतिशत से लेकर 38 प्रतिशत तक हिस्सेदारी रखते हैं. अब जब टैरिफ में राहत मिलेगी, तो इन प्रोडक्ट्स की डिमांड में इजाफा हो सकता है. खास तौर पर वे प्रोडक्ट्स, जिनकी क्वालिटी पहले से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचानी जाती है, उन्हें बड़ा फायदा मिल सकता है. मरीन सेक्टर को भी मिलेगा फायदा 18 प्रतिशत की रेसिप्रोकल टैरिफ व्यवस्था से मरीन सेक्टर को भी बड़ा बूस्ट मिल सकता है. खासकर झींगा जैसे उत्पाद, जिनका अमेरिकी इम्पोर्ट मार्केट करीब 25 अरब डॉलर का है. इसके अलावा बासमती और प्रीमियम चावल, तिल जैसे ऑयलसीड्स और कुछ खास फलों को भी इस रियायत का लाभ मिलेगा. अगर सप्लाई चेन मजबूत रही और क्वालिटी स्टैंडर्ड्स पूरे किए गए, तो भारत इस सेगमेंट में तेजी से आगे बढ़ सकता है. कुल मिलाकर यह कदम भारतीय एग्रीकल्चर एक्सपोर्ट के लिए एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है. लेकिन सिर्फ टैरिफ में छूट काफी नहीं होगी. सरकार और एक्सपोर्टर्स को क्वालिटी कंट्रोल, टाइमली सप्लाई, पैकेजिंग और ब्रांडिंग पर भी फोकस करना होगा. अगर इन पहलुओं पर गंभीरता से काम हुआ, तो आने वाले समय में अमेरिकी बाजार में भारत की हिस्सेदारी कई गुना बढ़ सकती है और इसका सीधा फायदा देश के किसानों और एग्री-बिजनेस से जुड़े लोगों को मिलेगा.

ट्रंप का गुस्सा: महिला नेता की बात से प्रभावित, देश पर बढ़ाया टैरिफ

वाशिंगटन  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्विट्जरलैंड पर टैरिफ बढ़ा दिया था। अब उन्होंने खुलकर इसकी वजह पर भी बात की है। उन्होंने कहा है कि उन्हें स्विट्जरलैंड की महिला नेता का बात करने का तरीका पसंद नहीं आया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी बताया कि महिला नेता छोटा देश होने का हवाला देते हुए टैरिफ में राहत की मांग भी कर रही थीं। फॉक्स न्यूज से बातचीत में ट्रंप ने स्विस फेडरल काउंसिल की सदस्य कैरिन कैलर सटर से हुई बातचीत का जिक्र किया। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने स्विस नेता को बता दिया कि छोटा देश होने के बाद अमेरिका के साथ उसका 42 बिलियन डॉलर का ट्रेड डेफिसिट है। ट्रंप ने कहा, 'मैंने 30 फीसदी टैरिफ लगाया था, जो काफी कम था। इसके बाद मुझे कॉल आया, जो मुझे लगा कि स्विट्जरलैंड की प्रधानमंत्री का था। और वह बहुत आक्रामक, लेकिन अच्छे से बात कर रहीं थीं। वह बहुत आक्रामक थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि सर हम छोटे से देश हैं। हम ऐसा नहीं कर पाएंगे। हम ऐसा नहीं कर सकते। वह फोन रखने को तैयार ही नहीं थीं।' ट्रंप ने कहा, 'नहीं, नहीं, हम एक छोटा देश हैं। बार-बार एक ही बात। वह फोन रखने के लिए तैयार ही नहीं थीं और टैरिफ 30 फीसदी था। और जिस तरह से उन्होंने मुझसे बात की मुझे अच्छा नहीं लगा। ऐसे में उन्हें रियायत देने के बजाए, मैंने उसे बढ़ाकर 39 प्रतिशत कर दिया था।' उन्होंने दावा किया कि स्विट्जरलैंड अपना सामान अमेरिका निर्यात कर रहा था, लेकिन कोई भी टैरिफ नहीं दे रहा था। पहले भी किया था दावा दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में भी ट्रंप ने स्विट्जरलैंड की नेता से बात करने का दावा किया था। उन्होंने कहा था, 'मुझे लगता है प्रधानमंत्री थीं। मुझे नहीं पता राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री किसका फोन था। एक महिला थीं। वह एक ही बात बार-बार दोहरा रही थीं। वह कह रही थीं, नहीं नहीं आप ऐसा नहीं कर सकते। 30 फीसदी टैरिफ। हम बहुत छोटे देश हैं। लेकिन मैंने कहा कि आप भले ही छोटे हैं, लेकिन डेफिसिट बड़ा है।' खास बात है कि स्विट्जरलैंड में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं होता। यहां सरकार की अगुवाई फेडरल काउंसिल की तरफ से की जाती है, जिसमें सात सदस्य होते हैं। भारत के साथ डील हाल ही में अमेरिका ने भारत के साथ ट्रेड डील की है, जिसके बाद टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत पर आ गया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच 'ट्रुथ सोशल' पर बीते सोमवार को घोषणा की थी कि भारत और अमेरिका एक व्यापार समझौते पर सहमत हुए हैं।

वंदे मातरम् पर नया सरकारी फैसला: जन गण मन से पहले गायन, पालन होगा जरूरी

नई दिल्ली केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर नया प्रोटोकॉल जारी किया है. इसके तहत राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के छह अंतरों वाला 3 मिनट 10 सेकंड का पूरा संस्करण कई आधिकारिक अवसरों पर बजाया या गाया जाना अब अनिवार्य कर दिया गया है. हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मंत्रालय का यह 10 पन्नों का आदेश 28 जनवरी को जारी किया गया है, जो सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, मंत्रालयों और संवैधानिक संस्थाओं को भेजा जा चुका है. गृह मंत्रालय के आदेश के अनुसार, तिरंगा फहराए जाने के समय, राष्ट्रपति के किसी कार्यक्रम में आगमन और प्रस्थान पर, राष्ट्र के नाम उनके संबोधन से ठीक पहले और बाद में, तथा राज्यपाल या उपराज्यपाल के आगमन-प्रस्थान और भाषणों से पहले-बाद में ‘वंदे मातरम्’ बजाया या गाया जाएगा. अगर किसी कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ दोनों प्रस्तुत किए जाते हैं, तो पहले ‘वंदे मातरम्’ और उसके बाद ‘जन गण मन’ होगा. इस दौरान उपस्थित लोगों को सावधान मुद्रा में खड़े रहना होगा. वंदे मातरम् के समय खड़ा होना अनिवार्य रिपोर्ट के मुताबिक, मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जब ‘वंदे मातरम्’ का आधिकारिक संस्करण बजाया या गाया जाए, तो श्रोताओं को सम्मान में खड़ा होना चाहिए. हालांकि, अगर किसी समाचार फिल्म या डॉक्यूमेंट्री में यह गीत फिल्म का हिस्सा हो, तो दर्शकों से खड़े होने की अपेक्षा नहीं की जाएगी, ताकि कार्यक्रम में अव्यवस्था न हो. दरअसल अब तक ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कोई स्पष्ट आधिकारिक प्रोटोकॉल नहीं था, जबकि राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के लिए समय, धुन और प्रस्तुति के नियम पहले से तय हैं. यह पहली बार है जब छह अंतरों वाले विस्तारित संस्करण को आधिकारिक कार्यक्रमों में शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं. क्या हैं नियम वंदे मातरम को कई आधिकारिक कार्यक्रमों में गाया जाना अनिवार्य किया गया है। इनमें ध्वजारोहण के दौरान, कार्यक्रमों में राष्ट्रपति के आने से पहले और जाने के बाद, राज्यपालों के आने से पहले और जाने के बाद शामिल है। पद्म पुरस्कार जैसे समारोहों के दौरान भी वंदे मातरम गाया जाना जरूरी है। इसके अलावा सरकार ने कार्यक्रमों की सूची भी जारी की है। अंग्रेजों ने की रोक लगाने की कोशिशें PIB के अनुसार, गाने और नारेदोनों के तौर परवंदे मातरम के बढ़ते प्रभाव से घबराकर ब्रिटिश सरकार ने इसके प्रसार को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए। नए बने पूर्वी बंगाल प्रांत की सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों में वंदे मातरम गाने या बोलने पर रोक लगाने वाले परिपत्र जारी किए। शैक्षणिक संस्‍थानों को मान्यता रद्द करने की चेतावनी दी गई, और राजनीतिक आंदोलन में हिस्सा लेने वाले छात्रों को सरकारी नौकरी से निकालने की धमकी दी गई थी। नवंबर 1905 में, बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के 200 छात्रों में से हर एक पर 5-5 रुपये का जुर्माना लगाया गया, क्योंकि वे वंदे मातरम गाने के दोषी थे। रंगपुर में, बंटवारे का विरोध करने वाले जाने-माने नेताओं को स्पेशल कांस्टेबल के तौर पर काम करने और वंदे मातरम गाने से रोकने का निर्देश दिया गया। नवंबर 1906 में, धुलिया (महाराष्ट्र) में हुई एक विशाल सभा में वंदे मातरम के नारे लगाए गए। 1908 में, बेलगाम (कर्नाटक) में, जिस दिन लोकमान्य तिलक को बर्मा के मांडले भेजा जा रहा था, वंदे मातरम गाने के खिलाफ एक मौखिक आदेश के बावजूद ऐसा करने के लिए पुलिस ने कई लड़कों को पीटा और कई लोगों को गिरफ्तार किया। तीन कैटेगरी में बांटे गए कार्यक्रम आदेश में कार्यक्रमों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है. पहली श्रेणी में वे अवसर हैं, जहां राष्ट्रीय गीत केवल बजाया जाएगा, जैसे- नागरिक अलंकरण समारोह, राष्ट्रपति का औपचारिक राजकीय समारोहों में आगमन-प्रस्थान, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले और बाद में, राज्यपाल या उपराज्यपाल का औपचारिक कार्यक्रमों में आगमन-प्रस्थान, परेड में राष्ट्रीय ध्वज लाए जाने के समय आदि. दूसरी श्रेणी में वे कार्यक्रम शामिल हैं, जहां गीत को बजाने के साथ-साथ सामूहिक गायन भी होगा. इसमें राष्ट्रीय ध्वज फहराने के अवसर, सांस्कृतिक और औपचारिक समारोह (परेड को छोड़कर), तथा राष्ट्रपति का किसी सरकारी या सार्वजनिक कार्यक्रम में आगमन और प्रस्थान शामिल है. इसके लिए कोयर, साउंड सिस्टम और आवश्यकता होने पर गीत के बोल वितरित करने की भी सलाह दी गई है. तीसरी श्रेणी में वे अवसर हैं, जहां ‘वंदे मातरम्’ गाया जा सकता है, जैसे स्कूलों के कार्यक्रम. आदेश में कहा गया है कि स्कूलों में दिन की शुरुआत सामूहिक रूप से राष्ट्रीय गीत गाकर की जा सकती है और छात्रों में राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान बढ़ाने के प्रयास किए जाएं. वंदे मातरम् पर नए आदेश की खास बातें केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर क्या नया आदेश जारी किया है? गृह मंत्रालय ने निर्देश दिया है कि अब ‘वंदे मातरम्’ का छह अंतरों वाला, 3 मिनट 10 सेकंड का आधिकारिक संस्करण कई सरकारी और औपचारिक कार्यक्रमों में बजाया या गाया जाएगा. किन-किन मौकों पर ‘वंदे मातरम्’ बजाना या गाना अनिवार्य होगा? राष्ट्रपति के आगमन-प्रस्थान, तिरंगा फहराने, राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले-बाद, राज्यपाल/उपराज्यपाल के कार्यक्रमों और नागरिक अलंकरण समारोहों जैसे अवसरों पर. अगर ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ दोनों बजें तो क्रम क्या होगा? पहले ‘वंदे मातरम्’ और उसके बाद राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ बजाया जाएगा. क्या सभी लोगों के लिए खड़ा होना जरूरी होगा? हां, जब आधिकारिक रूप से गीत बजाया या गाया जाए तो सभी को सावधान मुद्रा में खड़ा होना होगा. क्या हर स्थिति में खड़ा होना अनिवार्य है? नहीं, अगर किसी डॉक्यूमेंट्री या न्यूज़रील में ‘वंदे मातरम्’ फिल्म का हिस्सा हो, तो खड़े होने की जरूरत नहीं होगी. स्कूलों के लिए क्या निर्देश हैं? स्कूलों में दिन की शुरुआत सामूहिक रूप से ‘वंदे मातरम्’ गाकर की जा सकती है. वंदे मातरम् पर सरकार का जोर यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब केंद्र सरकार ‘वंदे मातरम्’ को लोकप्रिय बनाने पर जोर दे रही है. हाल ही में संसद में राष्ट्रीय गीत की 150वीं जयंती पर लंबी बहस हुई थी और इस वर्ष गणतंत्र दिवस परेड का विषय भी ‘स्वतंत्रता का मंत्र – वंदे मातरम्’ रखा गया था. बंगाली साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1870 के दशक में रचित इस गीत के पहले … Read more

फेक AI कंटेंट पर सख्ती: सरकार ने जारी की नई डिजिटल नियमावली

नई दिल्ली  भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ ही फर्ज़ी वीडियो, डीपफेक, ऑनलाइन ठगी और गलत जानकारी का खतरा भी बढ़ा है. इन्हीं समस्याओं पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने आईटी नियमों में बड़ा बदलाव किया है. भारत सरकार ने इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी ((Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) रूल्स, 2021 में संशोधन करते हुए नए नियम नोटिफाई किए हैं, जो 20 फरवरी 2026 से लागू होंगे. इन नए नियमों के तहत अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, मैसेजिंग ऐप्स, वीडियो शेयरिंग साइट्स और एआई टूल्स को यह साफ बताना होगा कि कोई कंटेंट एआई से बना है या उसमें एआई का इस्तेमाल किया गया है. भारत सरकार का साफ कहना है कि यूजर्स को यह जानने का हक है कि वो जो भी देख या सुन रहे हैं, वह असली है या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई टेक्नोलॉजी की मदद से बनाया गया है. एआई और सिंथेटिक कंटेंट की नई परिभाषा भारत सरकार ने एआई-जनरेटेड कंटेंट और सिंथेटिक कंटेंट की परिभाषा को पहले से ज्यादा बेहतर बना दिया है. अब फोटो, वीडियो, ऑडियो, ग्राफिक्स या किसी भी डिजिटल कंटेंट को, अगर कंप्यूटर या एआई टेक्नोलॉजी से इस तरह बदला गया है कि आम यूज़र को उसमें फर्क न समझ आए, तो उसे सिंथेटिक कंटेंट माना जाएगा. इसका सीधा निशाना डीपफेक कंटेंट है, जिसमें किसी व्यक्ति की नकली वीडियो या आवाज़ बनाकर उसे गलत तरीके से पेश किया जाता है. ऐसे कंटेंट को अब गैरकानूनी जानकारी की कैटेगिरटी में रखा जाएगा. हालांकि, सरकार ने यह भी साफ किया है कि सामान्य फोटो एडिटिंग, कलर करेक्शन, सबटाइटल जोड़ना, ट्रांसलेशन, पढ़ाई या एक्सेसिबिलिटी से जुड़े काम सिंथेटिक कंटेंट नहीं माने जाएंगे, जब तक कि वो लोगों को गुमराह न करें.     AI कंटेंट पर लेबलिंग होगी जरूरी: नए नियमों के मुताबिक एआई से बने या बदले गए कंटेंट पर साफ लेबल लगाना अनिवार्य होगा. वीडियो में ऑन-स्क्रीन टैग दिखेगा और ऑडियो कंटेंट की शुरुआत में यह बताया जाएगा कि यह एआई से तैयार किया गया है. इसके अलावा कंटेंट में मेटाडेटा भी जोड़ा जाएगा, जिससे यह पता चल सके कि वह किस प्लेटफॉर्म या टूल से बनाया गया है.     कंटेंट हटाने की समय सीमा बेहद कम: अब किसी भी गैरकानूनी या नुकसानदेह कंटेंट को हटाने के लिए प्लेटफॉर्म्स को पहले की तरह 36 घंटे नहीं, बल्कि सिर्फ 3 घंटे का समय मिलेगा. आपातकालीन शिकायतों पर कार्रवाई का समय भी घटाकर 2 घंटे कर दिया गया है.     बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सख्ती: Facebook, Instagram, YouTube, X जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स को अब पोस्ट अपलोड करते वक्त यूजर्स से यह घोषणा लेनी होगी कि कंटेंट AI से बना है या नहीं. प्लेटफॉर्म्स को तकनीकी तरीकों से इस दावे की जांच भी करनी होगी और AI कंटेंट को साफ तौर पर अलग दिखाना होगा. नियमों का पालन न करने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है.     हर तीन महीने यूजर्स को चेतावनी जरूरी: डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को अब हर तीन महीने में यूजर्स को यह याद दिलाना होगा कि नियम तोड़ने पर अकाउंट सस्पेंड या बंद हो सकता है. ये नोटिस अंग्रेजी या भारत की 22 आधिकारिक भाषाओं में दिए जा सकते हैं. गंभीर मामलों में प्लेटफॉर्म्स को पुलिस या जांच एजेंसियों को सूचना देना भी अनिवार्य होगा.     AI टूल देने वाली कंपनियों की जिम्मेदारी: जो प्लेटफॉर्म एआई या डीपफेक बनाने के टूल देते हैं, उन्हें यूजर्स को साफ चेतावनी देनी होगी कि गलत इस्तेमाल करने पर जेल और कानूनी कार्रवाई हो सकती है. अगर कोई नियम तोड़ता है, तो प्लेटफॉर्म को कंटेंट हटाने, अकाउंट बंद करने, सबूत सुरक्षित रखने और जरूरत पड़ने पर जानकारी शेयर करने की जिम्मेदारी निभानी होगी. कुल मिलाकर, ये नए नियम भारत में एआई कंटेंट को लेकर अब तक की सबसे सख्त और व्यापक पहल माने जा रहे हैं, जो डिजिटल दुनिया को ज्यादा सुरक्षित बनाने की दिशा में बड़ा कदम हैं.

एयरपोर्ट ड्रग्स शॉक: साबुन के बॉक्स से मिली 6.8 करोड़ की हेरोइन, यात्री गिरफ्तार

 अहमदाबाद अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर एक बार फिर नशीले पदार्थों की तस्करी का बड़ा मामला सामने आया है. एयर इंटेलिजेंस यूनिट और कस्टम्स विभाग की संयुक्त टीम ने एक यात्री के पास से 6.8 किलोग्राम संदिग्ध हेरोइन बरामद की, जिसकी अनुमानित कीमत 6.8 करोड़ रुपये है. कस्टम अधिकारी ने बताया, ये हेरोइन कुदरती और हर्बल साबुन के पैकेट्स में चालाकी से छिपाई गई थी. आरोपी यात्री कुतुब सिहाबुद्दीन अब्बास अली जो चेन्नई का निवासी है, कुआलालंपुर से एयर एशिया की फ्लाइट AK91 से अहमदाबाद पहुंचा था. अधिकारियों ने बताया कि एयरपोर्ट के इंटरनेशनल टर्मिनल पर उतरने के बाद यात्रियों की प्रोफाइलिंग के दौरान कुतुब ग्रीन चैनल से गुजर रहा था. उसकी हरकतों पर शक होने के कारण कस्टम्स टीम ने उसे रोका. अधिकारियों ने उसे डोर मेटल डिटेक्टर से गुजरने को कहा और पूछताछ की, लेकिन कुतुब ने कोई प्रतिबंधित सामान होने से इनकार कर दिया. हालांकि, जब उसका बैग एक्स-रे स्कैन किया गया तो प्रतिबंधित सामान होने की आशंका बढ़ गई. बैग की गहन जांच में 29 पैकेट मिले जो बाहर से कुदरती और हर्बल साबुन के लग रहे थे. इन पैकेट्स को काटकर जांचने पर अंदर नशीला पदार्थ छिपा हुआ पाया गया. इसके अलावा आरोपी के पास से सिल्वर फॉयल और कार्बन पेपर में लपेटे हुए तीन सफेद कवर भी मिले, जिनमें ड्रग्स का जत्था छिपाया गया था.जिसका सैंपल एफएसएल को भेजा गया है. अधिकारियों ने बताया कि कड़ी पूछताछ के दौरान कुतुब सिहाबुद्दीन ने कबूल किया कि ये पार्सल उसे उसके दोस्त पानीर ने दिया था. उसे इस पार्सल को पहुंचाने के बदले एक बड़ी रकम देने का वादा किया गया था. पुलिस और कस्टम विभाग अब इस अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स नेटवर्क की चेन खंगालने में जुटी है. आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है और उससे पूछताछ कर ये पता लगाया जा रहा है कि ये नशे की खेप भारत में किसे सप्लाई की जानी थी.र्ट पर साबुन के बॉक्स से निकली 6.8 करोड़ की हेरोइन, यात्री गिरफ्तार

बीमारी और तंगी में पीड़ा: पहली पत्नी ने लगाया उदित नारायण पर झूठा साजिश का आरोप

सुपौल  मशहूर पार्श्व गायक उदित नारायण झा एक बड़े विवाद में फिर से घिर गए हैं. उनकी पहली पत्नी रंजना नारायण झा ने सुपौल महिला थाना में उनके, उनके दो भाइयों और दूसरी पत्नी के खिलाफ आपराधिक आरोपों सहित एक गंभीर शिकायत दर्ज कराई है. रंजना ने आरोप लगाया कि उनका गर्भाशय आपराधिक साज़िश के तहत इलाज के बहाने बिना जानकारी निकलवा दिया गया और उन्होंने धोखा, उत्पीड़न और वादाखिलाफी जैसे आरोप भी लगाए हैं. रंजना अब बीमारी और आर्थिक तंगी के बीच न्याय की उम्मीद लेकर थाने का दरवाजा खटखटा रही हैं. 1984 की शादी, फिर दूरी उदित नारायण की पहली पत्नी रंजना झा के अनुसार, उनकी शादी 7 दिसंबर 1984 को पारंपरिक रीति रिवाज से उदित नारायण से हुई थी. शादी के कुछ समय बाद उदित अपने करियर के लिए मुंबई चले गए. रंजना का कहना है कि इसके बाद उनके वैवाहिक जीवन में दूरी बढ़ती गई. उन्हें बाद में मीडिया के जरिए पता चला कि उदित ने दूसरी शादी कर ली है. जब उन्होंने इस बारे में सवाल किया तो उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं मिला. इलाज के नाम पर बड़ा आरोप रंजना झा ने अपने आवेदन में सबसे गंभीर आरोप 1996 की एक घटना को लेकर लगाया है. उनका कहना है कि उन्हें इलाज के लिए दिल्ली के एक बड़े अस्पताल ले जाया गया. वहां उनके अनुसार बिना उनकी स्पष्ट सहमति के उनका गर्भाशय निकाल दिया गया. उन्हें इस बात की जानकारी बहुत बाद में दूसरे इलाज के दौरान हुई. रंजना इसे एक सुनियोजित साजिश बताती हैं और कहती हैं कि इस घटना ने उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ दिया. रिश्तों में तनाव और अलगाव रंजना झा का कहना है कि बाद के वर्षों में जब वह मुंबई गईं तो उन्हें पति के घर में सम्मानजनक स्थान नहीं मिला. उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें घर में प्रवेश तक नहीं करने दिया गया. इसके बाद वह नेपाल स्थित ससुराल पहुंचीं, लेकिन वहां भी उन्हें सहारा नहीं मिला. थक हारकर वह अपने मायके में रहने को मजबूर हो गईं. बीमारी और आर्थिक तंगी का दर्द रंजना झा अब 61 वर्ष की हो चुकी हैं और अब उम्र के इस पड़ाव पर आकर वह स्वास्थ्य समस्याओं और आर्थिक तंगी से जूझ रही हैं. उनका कहना है कि लगातार आश्वासन के बावजूद उन्हें ठोस सहायता नहीं मिली. इसी कारण उन्होंने एक बार फिर महिला थाना में आवेदन दिया है. उनका कहना है कि वह किसी बदले की भावना से नहीं, बल्कि अपने सम्मान और अधिकार के लिए लड़ रही हैं. सुपौल पुलिस मामले की जांच करेगी! सुपौल महिला थाना में दिए गए आवेदन के बाद अब पुलिस जांच की प्रक्रिया शुरू करेगी. आरोप गंभीर हैं और कानूनी रूप से हर पहलू की जांच जरूरी होगी. दूसरी ओर, उदित नारायण या उनके परिवार की ओर से इस नए आरोप पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है. बहरहाल, इस आरोप की सच्चाई की जांच अब पुलिस प्रक्रिया के तहत होगी. फिलहाल यह एक पक्ष का दावा है और कानूनी रूप से इसकी पुष्टि होना बाकी है. भरोसा, अधिकार और सम्मान जैसे सवाल बता दें कि यह विवाद नया नहीं है. पहले भी परिवार न्यायालय और महिला आयोग में मामला पहुंच चुका है. रंजना का दावा है कि एक समय पर उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया गया था और समझौते की बात हुई थी, लेकिन व्यवहार में उन्हें वह सम्मान और सहयोग नहीं मिला जिसकी वह अपेक्षा करती थीं. दरअसल, यह मामला केवल एक सेलिब्रिटी विवाद नहीं है, बल्कि एक ऐसे रिश्ते की कहानी है जिसमें भरोसा, अधिकार और सम्मान जैसे सवाल खड़े हो गए हैं.

राजनीति और उद्योग जगत का मेल: रेवती पवार करेंगी बिजनेसमैन सारंग से शादी

 नागपुर एनसीपी (शरद पवार) की नेता और सांसद सुप्रिया सुले की बेटी रेवती सुले जल्द ही शादी के बंधन में बंधने वाली हैं. रेवती की शादी नागपुर के प्रतिष्ठित बिजनेसमैन के बेटे सारंग लखानी से तय हुई है. इस खबर की पुष्टि परिवार के सदस्यों और करीबी दोस्तों की ओर से सोशल मीडिया पर शेयर किए गए बधाई संदेशों से हुई है. लोकसभा सांसद के बेटे विजय सुले ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर बधाई मैसेज पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने बहन रेवती और सारंग की एक फोटो शेयर की, जिसके साथ कैप्शन था, "बधाई हो बहन और जीजाजी," साथ में दिल और अंगूठी वाले इमोजी भी थे. कांग्रेस लीडर सुशील कुमार शिंदे की बेटी स्मृति शिंदे ने भी सोशल मीडिया पर ऐसा ही मैसेज और फोटो शेयर किया. रेवती सुले ने मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से इकोनॉमिक्स में बैचलर किया और बाद में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर डिग्री हासिल की. वहीं, सारंग लखानी अभी विश्वराज ग्रुप में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं, जो उनके पिता की फर्म है. सारंग ने यूनाइटेड स्टेट्स के कोलंबिया बिजनेस स्कूल से मैनेजमेंट की पढ़ाई की है. साथ ही सारंग लखानी एक कुशल बैडमिंटन खिलाड़ी भी रह चुके हैं.  खुशी की इस खबर के बीच परिवार के वरिष्ठ सदस्य और दिग्गज नेता शरद पवार के स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता बनी हुई है. उन्हें सीने में संक्रमण के चलते सोमवार को पुणे के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया है. उम्मीद की जा रही है कि वे जल्द स्वस्थ होकर पोती के विवाह समारोहों में शामिल होंगे.

टंबलर रिज स्कूल फायरिंग: कनाडा में बड़ा हमला, कई की जान गई, दर्जनों जख्मी

टंबलर रिज कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया (BC) प्रांत के टंबलर रिज शहर से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है. मंगलवार को एक माध्यमिक स्कूल और एक रिहायशी घर में गोलीबारी हुई, जिसमें हमलावर समेत कुल 7 लोगों की मौत हो गई. वहीं, इस फायरिंग में 25 लोग घायल भी हो गए.  रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) के मुताबिक, दोपहर लगभग 1:20 बजे 'टंबलर रिज सेकेंडरी स्कूल' में एक सक्रिय शूटर के होने की रिपोर्ट मिली. पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए इलाके में 'पुलिस इनिशिएटेड पब्लिक अलर्ट' (PIPA) जारी किया और स्कूल को चारों ओर से घेर लिया. स्कूल में दाखिल होने पर पुलिस अधिकारियों को 7 लोगों के शव मिले. पुलिस अधिकारी ने बताया कि एक संदिग्ध के मारे जाने की आशंका है, लेकिन अभी इस बात की जांच की जा रही है कि क्या कोई दूसरा हमलावर भी इस घटना में शामिल है.  स्कूल और घर से 9 शव बरामद जांच में स्कूल से जुड़ी इस घटना के तार एक स्थानीय निवास से भी जुड़ा पाए गए. वहां तलाशी के दौरान पुलिस को दो और लोगों के शव बरामद हुए. स्थिति को काबू में देख पुलिस ने शाम 5:45 बजे पब्लिक अलर्ट वापस ले लिया था और अब आगे की जांच जारी है. पुलिस हमलावर के मकसद पता लगाने की कोशिश कर रही है. लोगों को घरों में रहने की सलाह इस मामले की गंभीरता को देखते हुए 'BC RCMP मेजर क्राइम' विभाग ने जांच की कमान संभाल ली है. इलाके में इमरजेंसी रिस्पांस टीम और फ्रंटलाइन अधिकारियों के साथ-साथ विक्टिम सर्विसेज को भी तैनात किया गया है, ताकि प्रभावित परिवारों को मानसिक और सामाजिक सहायता प्रदान की जा सके. कस्बे की करीब 2400 की आबादी को घरों के अंदर रहने की सलाह दी गई है, क्योंकि पड़ोसी इलाकों से अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया है. बंद किए गए सेकेंडरी और एलिमेंट्री स्कूल सुरक्षा के मद्देनजर टंबलर रिज के सेकेंडरी और एलिमेंट्री दोनों स्कूलों को फिलहाल बंद कर दिया गया है. स्थानीय विधायक लैरी न्यूफेल्ड ने जानकारी दी है कि समुदाय की मदद के लिए बड़ी संख्या में पुलिस (RCMP) और एम्बुलेंस की टीमें तैनात की गई हैं. उन्होंने सुरक्षा कारणों से फिलहाल ज्यादा जानकारी साझा करने से मना किया है, ताकि चल रहे ऑपरेशन में कोई परेशानी न आए. 

ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनें शबाना महमूद, तो कश्मीर पर असर कैसा होगा?

लंदन   शबाना महमूद यह नाम विश्व की राजनीति पर हाल ही में चर्चा का केंद्र बन गया है, क्योंकि ऐसी संभावना जताई जा रही है कि शबाना महमूद ब्रिटेन की पहली मुस्लिम प्रधानमंत्री बन सकती हैं. शबाना महमूद पाकिस्तानी मूल की ब्रिटिश नागरिक हैं और उन्होंने आर्टिकल 370 को हटाने जाने का विरोध किया था. उन्होंने कश्मीर को लेकर कई बार भारत विरोधी तेवर दिखाया है, ऐसे में उनके प्रधानमंत्री बनने से क्या भारत और यूके के संबंधों पर असर पड़ सकता है? कौन है शबाना महमूद? शबाना महमूद लेबर पार्टी की तेज तर्रार नेता हैं. वह महज 45 साल की हैं. उनका जन्म इंग्लैंड के बर्मिंघम में हुआ है और वे एक पाकिस्तानी मूल के माता–पिता की संतान हैं. शबाना ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की है और शुरुआत में पेशे से वकील रही हैं और बाद में उन्होंने राजनेता बनने की ओर कदम बढ़ा दिया. शबाना का परिवार पीओके के मीरपुर से वास्ता रखता है. उनके पिता सिविल इंजीनियर हैं. शबाना ने शादी नहीं की है और अपने 4 भाई-बहनों में वो सबसे बड़ी हैं. 2010 में वे पहली बार संसद सदस्य (MP) के रूप में चुनी गईं. शबाना महमूद लेबर पार्टी की सदस्य हैं और कई महत्वपूर्ण पदों पर भी रह चुकी है. वर्तमान में वो होम सेक्रेटरी के तौर पर कार्यरत हैं. ब्रिटेन में होम सेक्रेटरी को भारत के गृहमंत्री के समकक्ष माना जा सकता है, लेकिन उसकी भूमिका विदेश नीतियों में भी अहम होती है. 2024 में शबाना ने न्याय मंत्री (Justice Secretary) और लॉर्ड चांसलर (Lord Chancellor) के रूप में भी सेवा दी. ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर की कुर्सी पर खतरा क्यों मंडराया? ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर सुपरमेरी जीत(बड़ी जीत) के साथ 5 जुलाई 2024 को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने थे, लेकिन एपस्टीन फाइल्स ने उनके लिए परेशानी खड़ी कर दी है. दरअसल कीर स्टारमर की परेशानी की वजह हैं पीटर मैंडेलसन. पीटर मैंडेलसन को कुछ समय पहले अमेरिका में ब्रिटिश राजदूत नियुक्त किया गया था और मैंडेलसन के संबंध जेफ्री एपस्टीन से थे. एपस्टीन फाइल्स में यह बताया गया है कि कि मैंडेलसन ने कई संवेदनशील जानकारी एपस्टीन को मेल की थी. इस मुद्दे को लेकर ब्रिटेन में बड़ा बवाल मचा हुआ है और प्रधानमंत्री की इस बात को लेकर आलोचना हो रही है कि आखिर उन्होंने ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति क्यों की. पीटर मैंडेलसन को पद से हटा दिया गया है, लेकिन ब्रिटेन में प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग हो रही है. हालांकि कीर स्टारमर ने इस्तीफा देने से मना किया है, लेकिन उनपर इस्तीफे का दबाव बहुत बढ़ गया है. शबाना महमूद अगर ब्रिटेन की पीएम बनी, तो भारत के साथ बिगड़ेंगे संबंध? शबाना महमूद पाकिस्तानी मूल की राजनेता हैं. इसी वजह से एक आम भारतीय के मन में यह सवाल है कि क्या शबाना महमूद के प्रधानमंत्री बनने से भारत के साथ ब्रिटेन के संबंध बिगड़ सकते हैं? इस शंका के बीच हमें कुछ बातों को समझना होगा. सबसे बड़ी बात यह है कि किसी भी देश की राजनीति और वहां की नीतियां राष्ट्रीय हित के अनुसार तय होती हैं ना कि किसी व्यक्ति के धर्म और उसके सोच के आधार पर. इस स्थिति में अगर शबाना महमूद ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बन भी जाती हैं, तो उनकी व्यक्तिगत राय का असर भारत और ब्रिटेन के संबंधों पर पर पड़ेगा इसकी संभावना शून्य है.