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सुप्रीम कोर्ट पर टिप्पणी से घिरे दिग्विजय सिंह, इंदौर महापौर ने की कानूनी कार्रवाई की मांग

भोपाल  मध्य प्रदेश में तीन राज्यसभा सीटों पर भाजपा के कब्जे के बाद शुरू हुई राजनीतिक जंग अब बेहद गंभीर मोड़ पर पहुंच गई है। कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज होने के बाद कांग्रेस जहां दिल्ली में विरोध प्रदर्शन कर रही है, वहीं इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। महापौर ने भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को एक शिकायती पत्र लिखकर दिग्विजय सिंह के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत की आपराधिक अवमानना का मुकदमा दर्ज करने की मांग की है। 'चोरी में सुप्रीम कोर्ट भी शामिल' बयान पर आपत्ति महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने सॉलिसिटर जनरल को लिखे पत्र में आरोप लगाया है कि दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस उम्मीदवार का नामांकन रद्द होने को मिली-जुली सीट चोरी करार दिया था। सिंह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है, जिसकी ट्रांसक्रिप्ट भी शिकायत के साथ संलग्न की गई है। वीडियो में कांग्रेस नेता कथित तौर पर कह रहे हैं कि, 'इस चोरी में सभी शामिल हैं। न केवल राज्य बल्कि केंद्र भी, चुनाव आयोग भी और मुझे कहना पड़ रहा है कि सुप्रीम कोर्ट भी।' दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस की याचिका पर सुनवाई में देरी को लेकर अदालत पर यह टिप्पणी की थी। कंटेम्प्ट एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग इंदौर मेयर ने पत्र में स्पष्ट किया है कि दिग्विजय सिंह का यह बयान माननीय न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला और अदालत को बदनाम करने की श्रेणी में आता है। उन्होंने मांग की है कि कांग्रेस नेता के खिलाफ 'कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट 1971' के सेक्शन 15(1)(बी) के तहत सर्वोच्च न्यायालय की आपराधिक अवमानना की सख्त वैधानिक कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए। 'पीड़ित महिला की बद्दुआ का असर है' इस पूरे घटनाक्रम पर महू से भाजपा विधायक उषा ठाकुर ने भी तीखा और विवादित बयान दिया है। उन्होंने मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने को एक पीड़ित महिला की बद्दुआ का असर बताया। ठाकुर ने दावा किया कि तेलंगाना में एक महिला द्वारा कांग्रेस नेता के खिलाफ की गई शिकायत पर नटराजन ने कोई कार्रवाई नहीं की थी, जिसके कारण पीड़ित महिला की बद्दुआ के चलते उनका फॉर्म रिजेक्ट हुआ है। आपराधिक अवमानना क्या होती है? भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए 'कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट 1971' लागू है। इसके तहत यदि कोई व्यक्ति या नेता लिखित, मौखिक या वीडियो के जरिए अदालत की गरिमा को कम करने, उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाने या उसे 'स्कैंडलाइज्ड' करने की कोशिश करता है, तो सॉलिसिटर जनरल या अटॉर्नी जनरल की सहमति से सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेकर आपराधिक अवमानना की कार्रवाई कर सकता है, जिसमें जेल और जुर्माने दोनों का प्रावधान है।  

बंगाल में सियासी हलचल: अभिषेक बनर्जी के घर रेड, मदन मित्रा के ठिकाने पर छापा; दौड़ी-दौड़ी पहुंचीं ममता

कोलकत्ता  पश्चिम बंगाल की राजनीति शनिवार को पूरी तरह गरमा गई। एक तरफ कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के आवास पर पुलिस और केंद्रीय बलों की बड़ी टीम ने छापेमारी की, तो दूसरी तरफ नगर पालिका भर्ती घोटाले में ईडी ने टीएमसी विधायक मदन मित्रा के कई ठिकानों पर एक साथ दबिश दी। इन दोनों घटनाओं ने राज्य की राजनीति में जबरदस्त हलचल पैदा कर दी है। पश्चिम मेदिनीपुर जिले के एक थाने में दर्ज एक मामले के सिलसिले में शनिवार तड़के पुलिस और केंद्रीय बलों की टीम कोलकाता के कालीघाट स्थित अभिषेक बनर्जी के आवास पर पहुंची। यह कार्रवाई उस समय हुई जब तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक बनर्जी पहले से ही कई जांच एजेंसियों के समन और पूछताछ का सामना कर रहे हैं। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, पश्चिम मेदिनीपुर के शालबनी थाने और कोलकाता पुलिस के अधिकारी तड़के करीब तीन बजे के बाद अभिषेक बनर्जी के पतुआपारा स्थित घर के बाहर पहुंचे। कुछ ही समय बाद केंद्रीय बलों के जवानों ने पूरे परिसर को घेर लिया और बाहर सुरक्षा व्यवस्था संभाल ली, जबकि पुलिस टीम अंदर दाखिल हुई। तृणमूल कांग्रेस ने इस कार्रवाई पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्टी का कहना है कि पुलिस ने घर का ताला तोड़कर जबरन प्रवेश किया और पूरे घर की तलाशी ली। घटना की जानकारी मिलते ही पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी तुरंत अभिषेक बनर्जी के आवास पर पहुंच गईं। इस पूरे अभियान को लेकर राजनीतिक तनाव और बढ़ गया। देर रात करीब ढाई बजे शुरू हुए इस हाई-वोल्टेज ड्रामे में पुलिस अधिकारियों ने काफी देर तक दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोई जवाब न मिलने पर आखिरकार घर का ताला तोड़कर भीतर प्रवेश किया। इस दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवानों ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर रखी थी। टीएमसी नेता की शिकायत पर की गई कार्रवाई यह सनसनीखेज कार्रवाई शालबनी के एक स्थानीय तृणमूल नेता की शिकायत पर की गई है, जिसमें अभिषेक बनर्जी के निजी सहायक (पीए) सुमित राय पर टिकट दिलाने के नाम पर वित्तीय धोखाधड़ी का आरोप है। मोबाइल टावर लोकेशन ट्रैक करते हुए पुलिस तड़के तीन बजे अभिषेक के घर पहुंची और करीब पांच घंटे तक सघन तलाशी अभियान चलाया। भागी-भागी आईं ममता बनर्जी इस घटना की सूचना मिलते ही पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी सुबह-सुबह गाड़ी से सीधे अभिषेक के घर पहुंचीं, जिससे सियासी हलचल और तेज हो गई। तलाशी को लेकर अभिषेक बनर्जी ने आक्रोश जताते हुए कहा कि पुलिस ने ताला तोड़कर पूरे घर की तलाशी ली है। हमारे पास इसके सारे रिकॉर्डिंग हैं, हमने जांच में पूरा सहयोग किया है। चौतरफा घिरे अभिषेक बनर्जी गौर करने वाली बात यह है कि अभिषेक बनर्जी इस वक्त चौतरफा कानूनी मुकदमों से घिरे हैं। फर्जी हस्ताक्षर मामले में गुरुवार को ही सीआईडी ने उनसे साढ़े पांच घंटे पूछताछ की थी, जिसमें उन्हें रविवार (14 जून) को फिर पेश होना है। इसके अलावा, सोमवार (15 जून) को प्राथमिक भर्ती घोटाले में ईडी ने समन किया है और मंगलवार (16 जून) को धमकी मामले में सीआइडी के सामने उन्हें पेश होना है। इन सबके बीच शनिवार तड़के हुई इस औचक छापेमारी ने राज्य की राजनीति गरमा दी है। यह तलाशी अभियान चार घंटे से अधिक समय तक चला। सुबह तक पुलिस और अधिकारी घर के अंदर मौजूद रहे। बाद में कुछ अधिकारी बाहर निकलते और फिर अंदर जाते देखे गए। घर से बाहर आने के बाद अभिषेक बनर्जी ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके घर का ताला तोड़ा और हर कमरे की गहन तलाशी ली। उन्होंने कहा, “उन्होंने ताला तोड़ा, घर में घुसे और हर कमरे की जांच की।” हालांकि, पुलिस की ओर से इस कार्रवाई के पीछे का कारण स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया। शनिवार को ही पश्चिम बंगाल में दूसरा बड़ा घटनाक्रम नगर पालिका भर्ती घोटाले से जुड़ा सामने आया, जहां प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने तृणमूल कांग्रेस के विधायक मदन मित्रा के कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। यह कार्रवाई मनी लॉन्ड्रिंग यानी धन शोधन की जांच के तहत की गई। ईडी की टीम ने मदन मित्रा और उनसे जुड़े करीब सात परिसरों को निशाना बनाया। मदन मित्रा उत्तर 24 परगना जिले की कामरहाटी विधानसभा सीट से विधायक हैं और वे पहले राज्य सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। जांच एजेंसी का आरोप है कि नगर पालिकाओं में भर्ती के दौरान अयोग्य उम्मीदवारों को नौकरी दिलाने के बदले रिश्वत ली गई। यह रिश्वत नकद और सोने के रूप में बिचौलियों के जरिए दी और ली गई। ईडी के अनुसार, इस पूरे मामले में करीब 125 कथित अवैध नियुक्तियों से मदन मित्रा के संबंध होने की बात सामने आई है। ईडी की टीम फिलहाल दस्तावेजों, बैंक लेन-देन और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड की जांच कर रही है। हालांकि, छापेमारी में क्या बरामद हुआ है, इसकी आधिकारिक जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। इस घोटाले की शुरुआत स्कूल भर्ती घोटाले से जुड़े एक मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के दौरान हुई थी। उस समय ईडी ने तृणमूल कांग्रेस से जुड़े प्रमोटर अयान शील के घर छापेमारी की थी, जहां से कई अहम दस्तावेज मिले थे। वहीं से नगर पालिका भर्ती घोटाले की जांच आगे बढ़ी। बाद में कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने भी इस मामले में समानांतर जांच शुरू की। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, कई राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आने लगे, जिससे राज्य की राजनीति और गरमा गई। इस कार्रवाई से ठीक एक दिन पहले मदन मित्रा ने नगर पालिका के सभी तृणमूल पार्षदों को इस्तीफा देने का निर्देश दिया था और पार्टी कार्यकर्ताओं से विरोध प्रदर्शन करने की अपील की थी। इसी बीच कामरहाटी नगर पालिका के चेयरमैन गोपाल साहा ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद मदन मित्रा ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि गोपाल साहा को लगातार अपमान और उपेक्षा झेलनी पड़ी। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी प्रशासनिक शक्तियां लगभग खत्म कर दी गई थीं, जिससे उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। मदन मित्रा ने कार्यकर्ताओं और पार्षदों से इस घटना के खिलाफ विरोध दर्ज कराने की अपील भी की। इन दोनों बड़ी कार्रवाइयों ने एक बार फिर … Read more

कोयल मल्लिक ने छोड़ी राज्यसभा सीट, TMC की संख्या घटी; ममता बनर्जी की बढ़ी चिंता

कोलकत्ता   पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। तीन राज्यसभा सांसदों के जाने का दुख मना रही ममता को चौथा झटका लगा है। राज्यसभा सांसद कोयल मलिक ने सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। इससे पहले तृणमूल कांग्रेस के सुखेंदु शेखर रे, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बराइक इस्तीफा दे चुके हैं। कोयल मल्लिक चौथी राज्यसभा सांसद हैं, जिन्होंने इस्तीफा दिया है। हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं है कि उन्होंने पार्टी से भी इस्तीफा दिया है या फिर नहीं। बता दें, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी को लगातार झटके लगते जा रहे हैं। पहले तीन दर्जन से ज्यादा विधायकों ने ममता को राजनीतिक हाशिए पर धकेल दिया। इसके बाद एक दर्जन लोकसभा सांसदों ने भी काकोली घोष दास्तीदार के नेतृत्व में ममता का साथ छोड़ने का ऐलान किया था। 13 राज्यसभा सांसदों के साथ केंद्र सरकार को चुनौती देने वाली ममता बनर्जी की मुश्किलें अब राज्यसभा सांसदों ने भी बढ़ाना शुरू कर दी है। पहले शुखेंदु शेखर रे ने 8 जून को इस्तीफा देकर इसकी शुरुआत की और अब हालत यह है कि चार सांसद इस्तीफा दे चुके हैं। सिर्फ दो महीने में अभिनेत्री से नेता बनी कोयल मल्लिक ने दिया इस्तीफा गौरतलब है कि स्टार लोगों को राजनीति में लाने वाली ममता बनर्जी ने बंगाली अभिनेत्री कोयल मल्लिक को इसी साल अप्रैल में राज्यसभा भेजा था। शपथ लेने के बाद उत्साहित नजर आ रही कोयल ने मीडिया से बात करते हुए देश सेवा की बात कही थी। उन्होंने कहा, "मैंने बेहद सोच समझकर यह फैसला लिया है। यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। देश की सेवा और लोगों की सेवा से बढ़कर कुछ नहीं है। कौन हैं कोयल मल्लिक? बंगाली फिल्म इंडस्ट्री की जानी-मानी अभिनेत्री कोयल मल्लिक का असली नाम रुक्मिणी मल्लिक है। दिग्गज बंगाली अभिनेता रंजीत मल्लिक के घर जन्मी कोयल ने शुरुआत से ही फिल्मों में अपना सफर शुरू करने की चाह रखी। 2003 में नाटेर गुरु नामक फिल्म से उन्होंने अपना फिल्मी करियर शुरू किया। इसके बाद उन्होंने बंगाली फिल्म इंडस्ट्री पर राज करना शुरू कर दिया। युवाओं के बीच में मशहूर कोयल को ममता बनर्जी ने राज्यसभा जाने के लिए मनाया और अप्रैल 2026 में उन्हें राज्यसभ का सांसद बना दिया गया। राज्यसभा सांसद बनाए जाने के बाद कोयल ने ममता बनर्जी के प्रति अपना लगाव भी जाहिर किया था। लेकिन 4 मई के बाद हालात बदल गए। लोकसभा के सांसदों के बागी होने के बाद तृणमूल कांग्रेस के तीन राज्यसभा सांसद पद छोड़ चुके थे। इसी क्रम में कोयल घोष ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सूत्रों के मुताबिक, कोयल ने कोलकाता से ईमेल के जरिए अपना इस्तीफा संसद को सौंपा है।

NCP(SP) में फूट के बीच कांग्रेस का बड़ा ऑफर, क्या शरद पवार लेंगे विलय पर फैसला?

नई दिल्ली महाराष्‍ट्र से बड़ी खबर आ रही है. सूत्रों के मुताबिक- कांग्रेस हाईकमान ने शरद पवार को ऑफर द‍िया है क‍ि वे अपनी पार्टी एनसीपीएस का कांग्रेस में व‍िलय कर दें. ज‍िस वक्‍त यह खबर आई ठीक उसी वक्‍त शरद पवार की पार्टी में फूट भी सामने आ गई. एनसीपीएस के तीन एमएलए महाराष्‍ट्र बीजेपी अध्‍यक्ष से म‍िले हैं और कहा जा रहा है क‍ि वे बीजेपी ज्‍वाइन कर सकते हैं।  इससे पहले उद्धव गुट के नेता ने सुझाव द‍िया था क‍ि कांग्रेस में TMC और NCP का विलय हो जाना चाह‍िए. इस पर जब शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले से पूछा गया तो उन्‍होंने कहा क‍ि संजय राउत मेरे लिए बड़े भाई जैसे हैं, उन्होंने जो सुझाव दिया है, वो अच्‍छा है. अब आगे क्‍या होगा, कैसे होगा, ये वक्‍त बताएगा.  बीजेपी पर हमला करते हुए सुप्र‍िया ने कहा, जो तृणमूल कांग्रेस में हुआ, वो हैरान करने वाला नहीं है. इन लोगों ने पहले श‍िवसेना तोड़ी, उसके बाद एनसीपी तोड़ी, अब तृणमूल कांग्रेस की बारी है. तो हम ये भुगत चुके हैं. इसील‍िए हम तृणमूल के साथ खड़े द‍िख रहे हैं।  अशोक गहलोत भी इसी सुर में बोले राजस्‍थान के पूर्व मुख्‍यमंत्री और कांग्रेस के द‍िग्‍गज नेता अशोक गहलोत ने कहा क‍ि जो पार्टियां कांग्रेस से अलग हुई हैं, उन्हें वापस कांग्रेस में आ जाना चाहिए. सब पार्टियों को एकजुट होना चाहिए. राहुल गांधी को इंडिया अलायंस का नेता मान लेना चाहिए. संजय राउत की बात में दम है।  संजय राउत ने क्‍या कहा था श‍िवसेना उद्धव गुट के नेता संजय राउत ने कहा था क‍ि जो पार्टियां कांग्रेस से अलग हुई हैं, उन्हें कांग्रेस में शामिल हो जाना चाहिए. आज सभी दलों को अपने-अपने राज्यों में लड़ाई लड़ने के लिए कांग्रेस पार्टी की मदद चाहिए।  शरद पवार गुट में बढ़ी बेचैनी, तीन विधायक BJP प्रदेश अध्यक्ष से मिले महाराष्ट्र की सोलापुर विधानसभा सीट पर चुनावी मुकाबले के बीच शरद पवार गुट की एनसीपी में अंदरूनी असंतोष खुलकर सामने आ गया है. पार्टी द्वारा वसंतराव देशमुख को उम्मीदवार बनाए जाने से नाराज तीन विधायकों उत्तमराव जानकर, अभिजीत पाटिल और नारायण पाटिल ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण से मुलाकात की. सोलापुर में महायुति नेताओं की बैठक के दौरान हुई इस मुलाकात ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है. बैठक में सांगोला से शेकप विधायक बाबासाहेब देशमुख भी मौजूद रहे।  दरअसल, सोलापुर विधानसभा सीट पर भाजपा के राजेंद्र राउत का मुकाबला शरद पवार गुट के उम्मीदवार वसंतराव देशमुख से है. टिकट वितरण को लेकर नाराज इन तीनों विधायकों ने पहले भी सार्वजनिक रूप से अपनी आपत्ति जताई थी और भाजपा उम्मीदवार को समर्थन देने के संकेत दिए थे. वसंतराव देशमुख को सांसद धैर्यशील मोहिते पाटिल का करीबी माना जाता है, ऐसे में विधायकों की नाराजगी को मोहिते पाटिल के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। 

TMC-Congress विलय की चर्चा पर बड़ा खुलासा, जानिए क्यों ममता बनर्जी के लिए आसान नहीं है यह फैसला

कोलकाता  तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की मुलाकात के बाद टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की मुलाकात के बाद दोनों पार्टियों का आपस में विलय की अटकलें शुरू हो गई. इन मुलाकातों के बाद कांग्रेस की ओर से अपने तमाम प्रदेश अध्यक्ष को मीटिंग के लिए बुलावा भेजे जाने के बाद टीएमसी का कांग्रेस में विलय की अटकलें और तेज हो गई. हालांकि टीएमसी की तरफ से इन अटकलों को खारिज कर दिया गया है और कांग्रेस ने भी प्रदेश अध्यक्षों के साथ अपनी बैठक को टाल दिया है. अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा हो रही है कि कांग्रेस और टीएमसी के बीच विलय को लेकर बातचीत में किसी बिंदु पर गतिरोध है. इन चर्चाओं के बीच विशेषज्ञों ने अपनी बात सामने रखी है. संविधान विशेषज्ञ का कहना है कि ममता बनर्जी के चाहने के बावजूद वह अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में नहीं कर पाएंगी।  सुप्रीम कोर्ट के वकील ने समझाया पार्टियों के विलय का पूरा समीकरण सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी दुबे ने कहा कि राजनीतिक दलों का विलेय दो तरह से होता है. एक विधायी विलय, जिसको हम लेजिस्लेटिव मर्जर कहते हैं. दूसरा होता है ऑर्गेनाइजेशनल मर्जर, जिसको हम सांगठनिक विलय कहते हैं. दोनों परिस्थितियों में दो तिहाई बहुमत होना जरूरी है. जब आप विधायी विलय करते हैं तो लोकसभा, राज्य सभा और विधानसभा के दो तिहाई सदस्यों का सहमति पत्र होना चाहिए. वहीं सांगठनिक विलय में भी तमाम राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय और जिला स्तरीय पार्टी पदाधिकारियों का दो तिहाई समर्थन चाहिए।  उन्होंने कहा की तारीख में ममता बनर्जी पार्टी प्रमुख होने के नाते अगर टीएमसी का विलय करना भी चाहती हैं तो उन्हें सबसे पहले इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया को यह आश्वस्त करना होगा कि उनके इस फैसले के साथ पार्टी पदाधिकारी या सांसद-विधायकों में दो तिहाई समर्थन प्राप्त है।  वरिष्ठ अधिवक्ता इसके अलावा विलय के लिए दोनों दलों के मुख्य संगठन माने पार्टी हाईकमान आपस में औपचारिक विलय का प्रस्ताव पारित करते हैं. मूल पार्टी के कम से कम दो तिहाई सदस्यों की सहमति से विलय होता है. तभी एंटी डिफेक्शन लॉ (दल-बदल विरोधी कानून) और मर्जर क्लॉज कॉन्स्टिट्यूशनल वैलिडिटी (विलय की संवैधानिक वैधता) कार्यान्वयन में मदद करेगा. इसके बिना लेजिसलेटिव मर्जर कर देते हैं और दो तिहाई सदस्य नहीं है तो वह भी नहीं माना जाएगा. संगठन का विलय कर देते हैं तो भी नहीं माना जाएगा।  उन्होंने समझाया कि विलय में यह भी देखना होगा कि जिन लोगों ने खुद को अलग गुट घोषित कर दिया है, वह कहां हैं. चुनाव आयोग को आश्वस्त होना पड़ेगा कि विलय के समय ब्लॉक से लेकर केंद्रीय स्तर के संगठन और उसके जो ऑफिस बियरर्स हैं वो किसके साथ है. क्योंकि वो रिप्रेजेंट करते हैं कितनी मेंबरशिप है. तभी यह ऐसा हो सकता है और हमने हाल ही में महाराष्ट्र के केस में दोनों पॉलिटिकल पार्टीज के केस में इलेक्शन कमीशन का फैसला देखा भी है. क्योंकि संगठन और विधायिका दोनों के मर्जर के बाद इलेक्शन कमिशन ने जो निर्णय लिया था।  अश्विनी दुबे ने बताया कि अयोग्यता केवल लोकसभा, राज्य सभा और विधानसभा सदस्यों का कहा सकता है. लेकिन संगठन के लोगों का डिसक्वालीफिकेशन नहीं हो सकता है. दूसरी पार्टी की मान्यता तब मिलेगी जब उसमें भी दो तिहाई सदस्य जो पार्टी के सदस्य हैं वो वो तैयार हो जाएं करें।  उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में शिवसेना की टूट और एनसीपी की टूट सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कह दिया था कि सिर्फ अगर विधायक चाहे और सांसद चाहें तो वो अपने हिसाब से पार्टी को ले जाकर मर्ज नहीं कर सकते. अलग पार्टी नहीं बना सकते तो वो विलय भी नहीं कर सकते।  कहा कि चाहे लोकसभा हो, चाहे राज्यसभा हो, चाहे विधानसभा हो, इनसाइड द हाउस तो बागी गुट अपना नेता चुन सकता है अपने फैसले ले सकता है, लेकिन पार्टी का वो रिप्रेजेंटेटिव नहीं माना जाएगा. ये नहीं माना जाएगा कि बाहर भी वो पार्टी का रिप्रेजेंटेटिव है. लेकिन जैसे लोकसभा के अंदर विधानसभा के अंदर जो तो तिहाई बहुमत वो बहुमत अगर पार्टी जो मूल पार्टी है मूल पार्टी पर दावा करते हैं कि हम ही यहां विधानसभा या लोकसभा में रिप्रेजेंट करते हैं. कहेंगे कि ये हमारे चुनाव में जीते हुए लोगों के नंबर हैं, तो वहां उनकी वैद्यता मानी जाएगी. लेकिन बाहर संगठन में वो रिप्रेजेंट नहीं कर सकते. संगठन के रिप्रेजेंटेशन के लिए संगठनिक विलय और संगठनिक विलय के लिए ऑर्गेनाइजेशनल मर्जर के लिए वह जो सदस्यों की संख्या है वो इंश्योर करना जरूरी है रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट के मुताबिक तो अंदर वो कर सकते हैं बाहर नहीं और यही सुप्रीम कोर्ट में अभी मामला पेंडिंग है।  . कहां से शुरू हुई टीएमसी और कांग्रेस के विलय की खबरें बता दें कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के महज 80 सीटों पर सिमटने के बाद पार्टी में भगदड़ मच गई है. ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में 58 विधायकों ने बागी गुट बना लिया और पश्चिम बंगाल विधानसभा में अपनी अलग मान्यता प्राप्त कर ली है. उनका दावा है कि उनके बागी गुट में अब तक तृणमूल कांग्रेस 65 विधायक आ चुके हैं. लोकसभा में काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में 20 सांसदों की सूची स्पीकर ओम बिरला को सौंपे जाने का दावा किया गया है. दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के इन बागी सांसदों ने एनडीए सरकार का सपोर्ट करने की बात कही है. उधर, राज्य सभा में अब तक टीएमसी के तीन सांसदों सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बराइक अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं।  इन राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच विपक्षी दलों के संगठन इंडिया ब्लॉक की बैठक में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुंची ममता बनर्जी ने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कीं. इसके अलावा टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की, जिसके बाद खबरें उड़ने लगी कि तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय होने जा रहा है. हालांकि करीब 24 घंटे बाद कांग्रेस की तरफ से जयराम रमेश और तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने ऐसे किसी विलय से इनकार कर दिया है।   

TMC में बढ़ी अंदरूनी कलह! कल्याण बनर्जी के अल्टीमेटम से ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ीं

कोलकाता पश्चिम बंगाल की सत्ता का 15 साल तक सिरमौर रहीं ममता बनर्जी और उनकी अगुवाई वाली पार्टी तृणमूल कांग्रेस मुश्किल में हैं. एक के बाद एक नेता टीएमसी से किनारा कर रहे हैं. 60 से ज्यादा विधायक बागी हो गए हैं. दिल्ली में लोकसभा सदस्यों ने भी पार्टी में बगावत का बिगुल फूंक दिया है. वहीं, ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका अब कल्याण बनर्जी का ताजा रुख है।  ममता बनर्जी ने जिन कल्याण बनर्जी को चीफ व्हिप बनाने के लिए 40 साल पुरानी सहयोगी काकोली घोष को पद से हटा दिया, अब वही कल्याण बनर्जी भी बगावत का झंडा बुलंद करते दिख रहे हैं. कल्याण बनर्जी ने टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी को यह अल्टीमेटम दे दिया है कि या तो वह अभिषेक को चुन लें, या फिर मेरे जैसे वफादारों को।  कल्याण बनर्जी ने कहा है कि ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी को हटाएं. नहीं तो हम पार्टी में नहीं रह सकते. उन्होंने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ फर्जी हस्ताक्षर केस से भी खुद को अलग करने का ऐलान किया और कहा कि अभिषेक बनर्जी ने कभी भी मुझपर भरोसा नहीं किया और आगे भी नहीं करेंगे. कल्याण बनर्जी ने कहा कि हम कल अभिषेक के केस के लिए तैयारी कर रहे थे और आधी रात मुझे बताया गया कि वकील बदल दिया गया है।  उन्होंने कहा कि यह बहुत ही अपमानजनक है. अभिषेक बनर्जी को वरिष्ठों का सम्मान करना नहीं आता. कल्याण बनर्जी ने अभिषेक को घमंडी व्यक्ति बताया और तल्ख लहजे में कहा कि वह हैं कौन? अभिषेक बनर्जी की वजह से पार्टी को नुकसान पहुंचा है. उन्होंने कहा कि मैं ममता बनर्जी के साथ हूं. लेकिन दीदी को अब फैसला करना होगा कि उनको पार्टी और वफादार नेता चाहिए या बच्चा और परिवार।  कल्याण का बागी रुख ताबूत में आखिरी कील? कल्याण बनर्जी की गिनती ममता बनर्जी के विश्वस्त नेताओं में होती है. पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद कल्याण बनर्जी कई अहम मामलों में कोर्ट के भीतर भी टीएमसी से जुड़े मामलों की पैरवी करते नजर आए हैं. फर्जी हस्ताक्षर से संबंधित जिस केस में अभिषेक बनर्जी भी आरोपी हैं, उस मामले में भी कल्याण बनर्जी ही वकील थे. कल्याण बनर्जी के बागी रुख को टीएमसी के ताबूत में आखिरी कील की तरह देखा जा रहा है।  बिछड़ रहे सब बारी-बारी ममता बनर्जी और उनकी पार्टी से सांसद-विधायक और नेता बारी-बारी बिछड़ रहे हैं. कल्याण बनर्जी के बागी रुख अख्तियार करने से कुछ घंटे पहले ही ममता बनर्जी को दो बड़े झटके लगे. पहले प्रकाश चिक बराइक ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. वहीं, कल तक ममता बनर्जी के साथ खड़े नजर आए प्रसून बनर्जी भी बागी काकोली गुट के साथ हो लिए. काकोली गुट को लोकसभा में अलग गुट के तौर पर मान्यता देने की मांग वाले पत्र पर प्रसून बनर्जी ने हस्ताक्षर भी कर दिए हैं।   

बंगाल की राजनीति में हलचल: TMC सांसद प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे से मचा सियासी भूचाल

कलकत्ता पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और पार्टी में भगदड़ मची हुई है. पार्टी के राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक ने आज राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है।   प्रकाश चिक बराइक से पहले टीएमसी के दो और कद्दावर राज्यसभा सांसद- सुखेंदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव भी संसद के उच्च सदन से इस्तीफा दे चुके हैं. एक के बाद एक हुए इन तीन बड़े इस्तीफों के बाद राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस की ताकत काफी कम हो गई है. आज बराइक के इस्तीफे के बाद अब उच्च सदन में टीएमसी के सांसदों की संख्या घटकर केवल 10 रह गई है।  आने वाले दिनों में और बढ़ सकती हैं मुश्किलें सूत्रों और राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं के अनुसार, टीएमसी के भीतर यह असंतोष यहीं थमने वाला नहीं है. कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले एक हफ्ते के भीतर टीएमसी के तीन और राज्यसभा सांसद अपने पदों से इस्तीफा दे सकते हैं।  अगर ये अटकलें सच साबित होती हैं, तो संसद में ममता बनर्जी की पार्टी का ग्राफ और नीचे गिर जाएगा.फिलहाल इन इस्तीफों के पीछे के स्पष्ट कारणों का खुलासा नहीं हो पाया है, लेकिन विपक्षी दल इसे टीएमसी के भीतर बढ़ती कलह और असंतोष के रूप में देख रहे हैं।  आ गई TMC के बागी सांसदों की लिस्ट! कुछ नाम तो चौंका देंगे अब तक कयास लगाए जा रहे थे क‍ि ममता का साथ क‍ितने सांसद छोड़ने वाले हैं. कोई 10 कह रहा था तो कोई 20… लेकिन अब 19 सांसदों की ल‍िस्‍ट सामने आ गई है. इसमें काकोली घोष दस्‍तीदार के साथ यूसुफ पठान, शत्रुघ्न सिन्हा समेत कई चौंकाने वाले नाम हैं. गौर करने वाली बात है क‍ि इसमें सयानी घोष जैसे कई नाम भी हैं, ज‍िनकी अटकलें लगाई जा रही थीं।  1. यूसुफ पठान (बहरामपुर) क्रिकेटर से नेता बने यूसुफ पठान ने कांग्रेस के गढ़ बहरामपुर में अधीर रंजन चौधरी को हराकर बड़ा उलटफेर किया था. लेकिन राजनीति की पिच पर यूसुफ को दीदी के लोकल नेताओं से वैसी मदद नहीं मिल रही थी, जैसी उम्मीद थी. बहरामपुर के स्थानीय संगठन से उनकी दूरी अब खुलकर सामने आ रही है।  2. जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया (कूचबिहार) कूचबिहार की सीट हमेशा से उत्तर बंगाल की राजनीति का केंद्र रही है. जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया यहां टीएमसी के मजबूत राजबंशी चेहरा माने जाते हैं. लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और स्थानीय गुटबाजी के कारण उनके सुर बदले हुए नजर आ रहे हैं. क्षेत्र में अपनी पकड़ के बावजूद संगठन से अनबन की खबरें हैं।  3. खलीलुर रहमान (जंगीपुर) मुर्शिदाबाद जिले के जंगीपुर से आने वाले खलीलुर रहमान बीड़ी कारोबारी से राजनेता बने हैं. मुस्लिम बहुल इस इलाके में उनका अच्छा-खासा प्रभाव है. हालांकि, केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में आने और स्थानीय लीडरशिप से तालमेल की कमी के चलते उनके टीएमसी से दूर जाने की चर्चाएं तेज हैं।  4. अबू ताहेर खान (मुर्शिदाबाद) मुर्शिदाबाद के कद्दावर नेता अबू ताहेर खान का इस लिस्ट में होना चौंकाता है. कांग्रेस से टीएमसी में आए अबू ताहेर का क्षेत्र में मजबूत जनाधार है. पिछले कुछ समय से जिला स्तर पर हो रही उपेक्षा और नए नेताओं को तरजीह दिए जाने से वह काफी नाराज बताए जा रहे हैं।  5. पार्थ भौमिक (बैरकपुर) बैरकपुर जैसी हाई-प्रोफाइल और हिंसा प्रभावित सीट से जीतने वाले पार्थ भौमिक ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते थे. लेकिन अर्जुन सिंह के साथ चलने वाली अंदरूनी खींचतान और पार्टी के भीतर गुटीय समीकरणों के बदलने से पार्थ भौमिक का मोहभंग होता दिख रहा है, जिससे बगावती सुर उठे हैं।  6. काकोली घोष दस्तीदार (बारासात) डॉ. काकोली घोष दस्तीदार टीएमसी की बेहद सीनियर और तेजतर्रार नेता हैं. संसद में अपनी बात मजबूती से रखने वाली काकोली के बारे में कहा जा रहा है कि वह पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और युवा ब्रिगेड के फैसलों से असहज महसूस कर रही हैं, जिससे दूरियां बढ़ी हैं।  7. बापी हलदार (मथुरापुर) मथुरापुर (SC) सीट से चुनकर आए बापी हलदार जमीनी स्तर के नेता हैं. दक्षिण 24 परगना के सुंदरबन इलाके में उनकी मजबूत पकड़ है. स्थानीय पंचायत चुनावों और विकास कार्यों के फंड को लेकर जिला नेतृत्व के साथ उनकी अनबन अब बगावत के मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है।  8. सायोनी घोष (जादवपुर) टीएमसी की युवा विंग की अध्यक्ष रहीं सायोनी घोष हमेशा से ममता बनर्जी की फेवरेट रही हैं. जादवपुर जैसी प्रतिष्ठित सीट से जीतकर संसद पहुंचने वाली सायोनी की बगावत की खबरें हैरान करने वाली हैं. बताया जा रहा है कि संगठनात्मक फेरबदल और कुछ आंतरिक फैसलों से वह खुश नहीं हैं।  9. माला रॉय (कोलकाता दक्षिण) कोलकाता दक्षिण सीट खुद ममता बनर्जी का पुराना गढ़ रही है, जहां से माला रॉय सांसद हैं. माला रॉय का नाम इस लिस्ट में आना टीएमसी के लिए सबसे बड़ा झटका है. कोलकाता नगर निगम और सांसद फंड के इस्तेमाल को लेकर पार्टी आलाकमान से उनके मतभेद गहरे हो चुके हैं।  10. मिताली बाग (आरामबाग) आरामबाग की बेहद करीबी मुकाबले वाली सीट से जीत दर्ज करने वाली मिताली बाग एक साधारण पृष्ठभूमि से आती हैं. लेकिन सांसद बनने के बाद स्थानीय स्तर पर पार्टी के पुराने क्षत्रपों ने उन्हें काम नहीं करने दिया. इसी आंतरिक कलह और उपेक्षा के कारण मिताली ने अपने रास्ते अलग करने का मन बनाया है।  11. देव अधिकारी (घाटाल) बांग्ला सिनेमा के सुपरस्टार दीपक अधिकारी उर्फ देव के बागी तेवर नए नहीं हैं. वह पहले भी राजनीति छोड़ने की इच्छा जता चुके थे. ममता के मनाने पर वह माने तो थे, लेकिन घाटाल के स्थानीय टीएमसी नेताओं के भ्रष्टाचार और दखलअंदाजी से तंग आकर अब वह आर-पार के मूड में हैं।  12. कालीपद सोरेन (झाड़ग्राम) आदिवासी बहुल झाड़ग्राम सीट से सांसद कालीपद सोरेन संथाली साहित्यकार और प्रतिष्ठित चेहरा हैं. टीएमसी ने इन्हें आदिवासी कार्ड के तौर पर उतारा था. लेकिन क्षेत्र में आदिवासियों की बुनियादी समस्याओं पर पार्टी के ढुलमुल रवैए और वादों से मुकरने के कारण कालीपद सोरेन ने बगावती रुख अख्तियार कर लिया है।  13. जून मालिया (मेदिनीपुर) मेदिनीपुर से सांसद और मशहूर अभिनेत्री जून मालिया को टीएमसी का ग्लैमरस लेकिन गंभीर चेहरा … Read more

विपक्षी दलों में बढ़ती खींचतान का BJP को फायदा? जानिए परिसीमन बिल पर क्या बन रहे समीकरण

 नई दिल्ली केंद्र की बीजेपी सरकार को विधानसभा चुनावों के बीच बड़े जोर का झटका लगा था. लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन बिल गिर गया था. कांग्रेस के विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण राहुल गांधी भले ही क्रेडिट लें, लेकिन असल बात तो यह है कि तब तमिलनाडु में डीएमके और पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका थी।  तृणमूल कांग्रेस और डीएमके के नए सिरे से जिक्र की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि दोनों ही दल अपने अपने राज्यों में सत्ता से बेदखल हो गए हैं. और, बेदखल ही नहीं हुए हैं. विधायकों के बाद टीएमसी के सांसद भी बगावत पर उतर आए हैं, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मॉनसून सत्र में मिल सकता है।  रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी मॉनसून सत्र में फिर से महिला आरक्षण संशोधन बिल और परिसीमन विधेयक संसद में पेश कर सकती है – सवाल यह है कि बदले राजनीतिक हालात में दोनों विधेयकों के पास होने की कितनी संभावना है।  मॉनसून सेशन में महिला आरक्षण – परिसीमन बिल की संभावना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीते 12 साल के कार्यकाल में पहला मौका था जब केंद्र सरकार की तरफ से पेश कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक सदन में गिरा हो. संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए कानून में संशोधन और परिसीमन विधेयक के समर्थन में 298 मत पड़े, जबकि बिलों के विरोध में 230 मत पड़े थे. दरअसल, महिला आरक्षण लागू करने के लिए लोकसभा क्षेत्रों की संख्या फिर से निर्धारित करने के मकसद से लाया गया परिसीमन विधेयक भी महिला आरक्षण संशोधन के साथ जुड़ा हुआ था।  बीजेपी वैसे तो विधानसभा चुनावों के बीच मिले जोरदार झटके की पूरी तरह भरपाई कर चुकी है, लेकिन नेतृत्व को मिशन तब तक अधूरा लग रहा होगा, जब तक कि दोनों विधेयक संसद से पास नहीं हो जाते – और यही वजह है कि बीजेपी सरकार मॉनसून सत्र में फिर से दोनों बिल लाने और उन्हें पास कराने के लिए प्रयासरत है।  पश्चिम बंगाल की चुनावी जीत का तो बीजेपी को लंबे समय से इंतजार था. कई बार के गंभीर प्रयासों के बाद जीत संभव भी हो पाई. तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन के साथ भले ही थलपति विजय की सरकार बन गई हो, लेकिन डीएमके की हार तो बीजेपी को सुकून देने वाली ही है. AIADMK अगर सत्ता में लौट पाती तो गठबंधन पार्टनर बीजेपी के लिए और अच्छी बात होती. डीएमके ने तो संसद में बिल गिर जाने को वोटिंग से पहले ही जीत की तरह जश्न मनाया था, और चुनाव कैंपेन की स्ट्रैटेजी तक बदल डाली थी।  तृणमूल कांग्रेस में जो तबाही का दौर शुरू हुआ, चल ही रहा है. डीएमके नेतृ्त्व भी सशंकित है. वैसे भी आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों के छोड़कर चले जाने के बाद तो विपक्षी खेमे के शायद ही कोई राजनीतिक दल होगा जो डरा हुआ न हो. खबर है कि बीजेपी ने क्षेत्रीय दलों से नए सिरे से संपर्क किया है. और, इस मामले में डीएमके की तरफ से भी नरम रुख अपनाए जाने की बात सामने आई है. वैसे भी गठबंधन तोड़कर कांग्रेस के मुख्यमंत्री विजय की टीवीके के साथ चले जाने के बाद डीएमके नए रास्ते और समीकरण तलाशने के लिए आजाद भी हो गई है. सुनने में आया है कि डीएमके केंद्र सरकार के बिल के नए ड्राफ्ट और लिखित प्रस्ताव का इंतजार कर रही है. अचानक डीएमके के लिए पलटना तो संभव भी नहीं होगा, लेकिन बीच का रास्ता तो निकाला ही जा सकता है।  राज्यसभा चुनाव से कितना फर्क पड़ेगा देश के 10 राज्यों में राज्यसभा की 24 सीटों के लिए 18 जून को चुनाव होने जा रहे हैं. और, इनमें से 10 सीटों पर पहले से ही बीजेपी की जीत पक्की मानी जा रही थी. अब इसमें मध्य प्रदेश से एक सीट और भी जुड़ रही है. मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद मध्य प्रदेश से बीजेपी को राज्यसभा की 3 सीटें मिलना पक्का माना जाने लगा है. गुजरात से राज्यसभा की चारों सीटें बीजेपी को मिलना पक्का है. राजस्थान से 2 सीटें मिल सकती हैं. मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश से 1-1 सीटें मिलने वाली हैं. झारखंड में नंबर कम होने के कारण बीजेपी नेता बाबूलाल मरांडी ने निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन देने की घोषणा कर रखी है।  राज्यसभा में बीजेपी के पास 113 सांसद हैं. और, पूरे एनडीए की बात करें तो ये नंबर 148 है. फिर भी दो तिहाई बहुमत के लिए 15 सीटें कम पड़ रही हैं. राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत के लिए 163 सांसदों की जरूरत पड़ती है. मुद्दे की बात यह है कि टीएमसी के दो सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है, फिर तो बहुमत का आंकड़ा भी घट जाएगा. टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के बाद सुष्मिता देव ने भी इस्तीफा दे दिया है. सुष्मिता देव ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से मुलाकात भी की है, जिससे आगे का प्लान स्पष्ट हो गया है।  लोकसभा में बदल रहा नंबर गेम बदले माहौल में लोकसभा में नंबर गेम भी बदल रहा है. तृणमूल कांग्रेस के सांसदों की बगावत के बाद तो पक्का ही हो गया है. टीएमसी के बागी सांसदों ने काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में स्पीकर को अलग बैठने और अलग गुट के रूप में मान्यता देने के लिए पत्र भी दे दिया है।  काकोली घोष दस्तीदार को नेता मानने वाले ऐसे ही 19 सांसदों की लिस्ट सामने आई है, जिनमें यूसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा  के साथ सयानी घोष का नाम भी शामिल है. जिस तरह से काकोली घोष प्रशासनिक मीटिंग में इलाके के विधायकों के साथ मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ शामिल हुई थीं, इरादे तभी साफ हो गए थे।  अब अगर डीएमके सपोर्ट के लिए तैयार हो जाए, और टीएमसी के बागी सांसदों का साथ हो जाए तो बीजेपी के लिए दोनों बिल पास कराना आसान हो जाएगा. अगर कुछ कम पड़ा तो उसे भी मैनेज करने की कोशिश हो ही सकती है। 

लोकसभा में अलग ब्लॉक की मांग, TMC में 20 सांसद बागी गुट में शामिल

पश्चिम बंगाल TMC लोकसभा सांसद प्रसून बनर्जी पार्टी के बागी 'काकोली ग्रुप' में शामिल हो गए हैं. उन्होंने संसद में एक अलग ब्लॉक बनाने की मांग वाले पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. उनके इस कदम से तृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल में विभाजन का संकट और गहरा गया है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) में चल रही बगावत रूकने का नाम नहीं ले रही है. बुधवार तक जो लोकसभा सांसद प्रसून बनर्जी ममता के साथ खड़े थे उन्होंने अब पार्टी आलाकमान के खिलाफ बगावती रुख अपनाते हुए बागी सांसदों के 'काकोली ग्रुप' का दामन थाम लिया है. प्रसून बनर्जी ने संसद में एक अलग गुट बनाने की मांग करने वाले पत्र पर अपने हस्ताक्षर (साइन) भी कर दिए हैं. टीएमसी के भीतर का बागी गुट लोकसभा में खुद को एक अलग ब्लॉक के रूप में मान्यता दिलाने की कोशिशों में जुटा है. इस गुट में अभी तक प्रसून को मिलाकर 20 लोकसभा सांसद शामिल हो चुके हैं. वहीं अब ममता के खेमे में 8 सांसद बचे हैं. बागी गुट अपने कुनबे को बढ़ाने के लिए लगातार सांसदों का समर्थन जुटा रहा है. प्रसून बनर्जी हावड़ा से लगातार तीसरी बार सांसद चुने गए हैं और खेल जगत के साथ-साथ राजनीति में भी उनका बड़ा कद है. TMC के बागी सांसदों की लिस्ट आई सामने! शत्रुघ्न सिन्हा और यूसुफ पठान का भी नाम इससे पहले राज्यसभा से कई सांसदों के इस्तीफे और कुछ अन्य सांसदों के बागी गुट के संपर्क में होने की खबरें आई थीं. हालांकि, कुछ सांसदों ने इन खबरों का खंडन भी किया था, लेकिन प्रसून बनर्जी के इस कदम ने बागी गुट के दावों को मजबूत कर दिया है. 

ममता को एक और बड़ा झटका? देर रात बागी नेताओं ने शुभेंदु से की मुलाकात, सायोनी घोष की मौजूदगी से बढ़ी चर्चा

नई दिल्‍ली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस तिनका-तिनका होती नजर आ रही है. विधायकों के एक बड़े ग्रुप के ऋतब्रत बनर्जी के साथ जाने के बाद अब टीएमसी लोकसभा सांसदों का एक ग्रुप भी ममता बनर्जी का साथ छोड़ने जा रहा है, जल्‍द ही इसका ऐलान हो सकता है. बीती रात टीएमसी सांसद प्रतिमा मंडल, माला रॉय, मिताली बाग और सायोनी घोष केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पहुंचे. इस बैठक में पश्चिम बंगाल के मुख्‍यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी पहुंचे, जिससे नई अटकलों का दौर शुरू हो गया है. क्‍या टीएमसी के बागी लोकसभा सदस्‍य बीजेपी का हाथ थामने जा रहे हैं? भूपेंद्र यादव के घर एक घंटा चली बागी TMC सांसदों की बैठक  भूपेंद्र यादव के घर मुख्‍यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ हुई बागी टीएमसी सांसदों की बैठक में क्‍या बात हुई, ये तो सामने नहीं आई है. लेकिन इतने जरूर संकेत मिल रहे हैं कि टीएमसी बिखर रही है और जल्‍द ही कोई बड़ा ऐलान हो सकता है. बताया जा रहा है कि सायोनी घोष समेत 4 से 5 टीएमसी सांसद इस बैठक में शामिल हुए. ये बैठक लगभग एक घंटे तक चली. हैरानी की बात ये रही कि इस बैठक में टीएमसी के बागी लोकसभा सांसदों का नेतृत्‍व करने का दावा कर रहीं काकोली घोष इस बैठक में नहीं पहुंचीं. सूत्रों की मानें तो अब टीएमसी के बागी ग्रुप में ज्‍यादा से ज्‍यादा समर्थन जुटाने पर जोर है. टीएमसी के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से 19 बागी हो गए हैं।  बागियों में शत्रुघ्‍न सिन्‍हा और यूसुफ पठान का भी नाम!   सूत्रों की मानें तो आने वाले दिनों में बीजेपी संग टीएमसी नेताओं की और भी बैठकें हो सकती हैं. बता दें कि बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को हस्ताक्षर करके एक पत्र भी सौंपा है, जिसमें 19 सांसदों के नाम हैं. इन नामों में शत्रुघ्‍न सिन्‍हा और यूसुफ पठान का भी नाम है. काकोली घोष इस बागी सांसदों के ग्रुप का नेतृत्‍व कर रही हैं. हालांकि, तृणमूल कांग्रेस की ओर से ऐसी कोई लिस्‍ट जारी नहीं की गई है, जिसमें ये कहा गया हो कि उनकी पार्टी के सांसद बागी हो रहे हैं।  ममता बनर्जी ने 1 जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की. उन्होंने देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के नेतृत्व पर पश्चिम बंगाल में तत्कालीन सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ आंदोलन संगठित करने में अनिच्छा का आरोप लगाया था।  क्‍या TMC का कांग्रेस में होने जा रहा विलय? ममता बनर्जी की दिल्ली में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से हुई मुलाकात के बाद दोनों पार्टियों के संभावित गठजोड़ को लेकर चर्चा तेज हो गई हैं. इसी बीच टीएमसी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने इन चर्चाओं पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि अभी हमारे पास 64 विधायक है और आगे ये संख्या बढ़ेगी, लेकिन कोई भी कांग्रेस में शामिल होने वाले नहीं है. ममता बनर्जी की कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से हुई बैठक और बुधवार को नई दिल्ली में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से अभिषेक बनर्जी की अलग से हुई बैठक के बाद टीएमसी के कांग्रेस में पुनर्विलय की अटकलों को बल मिला. ममता बनर्जी के कोलकाता लौटने के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर इंतजार कर रहे मीडियाकर्मियों ने उनसे तृणमूल कांग्रेस के कांग्रेस में पुनर्विलय की संभावना के बारे में पूछा. हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री बिना कुछ कहे जल्दी से अपनी गाड़ी में बैठकर वहां से चली गईं।