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कांग्रेस में अंदरूनी वार? शकील अहमद बोले– मजबूत नेताओं से डरते हैं राहुल गांधी

नई दिल्ली. बिहार विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे चुके पूर्व केंद्रीय मंत्री और राजीव और सोनिया गांधी के चहेते रहे शकील अहमद ने राहुल गांधी पर बड़ा प्रहार किया है। उन्होंने राहुल गांधी भारतीय राजनीति का सबसे डरपोक(इनसेक्योर) पॉलिटिशयन बता दिया है। कहा है कि वे मजबूत कांग्रेसियों से डरते हैं और पार्टी में लाए गए नए नेताओं को तरजीह देते हैं। यह भी दावा किया है कि मल्लिकार्जुन खरगे सिर्फ नाम के अध्यक्ष हैं। असली रिमोट राहुल गांधी के हाथ में है। शकील अहमद ने उनके संविधान और मुस्लिम कार्ड को भी फेल बताया। इलेक्ट्रानिक चैनल न्यूज18 के साथ खास वार्ता में शकील अहमद ने कहा कि राहुल जी की पौधा लगाने से ज्यादा उसे उखाड़ देने में रुची है। वे अपनी ही पार्टी के मजबूत नेताओं से डर लगता है। इस वजह से वे दूसरी पार्टी से आए नेताओं को ज्यादा तवज्जो देते हैं। मेरी नजर में राहुल जी से ज्यादा इनसेक्योर पॉलिटिशयन अब तक कोई नहीं दिखा। हिंदी में डरपोक बोलने में खराब लगता है क्योंकि यह गलत शब्द है। लेकिन सच्चाई यही है। अंग्रेजी कुछ इज्जत बचाती है। शकील अहमद ने कहा कि उनके पार्टी छोड़ने के बाद दूसरी पार्टी से आए नेता बड़े पदों पर बने हुए हैं। इसकी वजह यह है कि इन नेताओं की पार्टी में पकड़ नहीं है तो उन्हें जब चाहें उखाड़ कर फेंक सकते हैं। यह पहले से तय रखते हैं कि अमुक नेता पार्टी छोड़ दे तो क्या-क्या बिगाड़ सकता है। वह बॉस वाली फिलींग पसंद करते हैं। उन्हें कांग्रेस मजबूत चाहिए पर कांग्रेसी मजबूर चाहिए। जो उनके अलावे किसी और को नहीं जाने और उनके नियंत्रण में रहे। शकील अहमद ने यह भी कहा कि वे अपने से अधिक उम्र के नेताओं के साथ बैठना पसंद नहीं करते क्योंकि उम्रदराज नेताओं को 'आप' और 'जी' कहना पड़ता है। जहां उनके हाथ में कंट्रोल नहीं रहता है वहां से किनारा कर लेते हैं। वे सीनियर नेताओं को पसंद नहीं करते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनका संविधान बचाओ अभियान भी किसी मतलब का नहीं था। हाथ में संविधान लेकर घूमते रहे और भाषण देते रहे कि बीजेपी और आरएसएस से संविधान को बचाना है। लेकिन, इलेक्शन से कुछ पहले बीजेपी और आरएसएस के 16-17 नेताओं को कांग्रेस में शामिल कराया गया और उन्हें टिकट भी दी गई। इसका वीडियो भी है। शकील अहमद का यह बयान देश की सियासत में भूचाल लाने वाला है।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी का बड़ा कदम: कांग्रेस छोड़, चंद्रशेखर से गठजोड़ की अटकलें

लखनऊ  उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा से पहले कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है. कांग्रेस से नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने इस्तीफा दे दिया है. नसीमुद्दीन पहले बहुजन समाजवादी (बीएसपी) पार्टी में थे. लेकिन, उन्होंने बीएसपी छोड़कर कांग्रेस ज्वाइन किया था. अब उन्होंने कांग्रेस से भी अलविदा कह दिया है. उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का बेहद करीबी माना जाता है. अपने बयान में उन्होंने कहा कि वह कांग्रेस में अपने सभी साथियों के साथ इसलिए शामिल हुए थे कि जातिवाद और संप्रदायवाद के साथ हो रहे अन्याय की लड़ाई लड़ी जा सके। लेकिन कांग्रेस में यह लड़ाई नहीं लड़ पा रहा हूं।  इसलिए इस्तीफा दे दिया है।  उन्होंने कहा कि जल्द ही नई शुरुआत की जाएगी। नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि कांग्रेस के किसी भी पदाधिकारी से कोई शिकायत नहीं है लेकिन जिस काम के लिए वह पार्टी में आए थे वह नहीं हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि उनके साथ इस्तीफा देने वाले सभी लोगों से मशविरा किया जा रहा है। जिस तरफ सहमति बनेगी उसी दल के साथ मिलकर आगे जनता की लड़ाई लड़ी जाएगी। पूर्व मंत्री के साथ करीब 72 अन्य लोगों ने पार्टी छोड़ दी है। इसमें करीब दो दर्जन पूर्व विधायक भी शामिल हैं।   क्यों छोड़ा ‘हाथ’ का साथ? इस्तीफे के बाद जारी अपने बयान में नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा, ‘मैं कांग्रेस में अपने साथियों के साथ इसलिए शामिल हुआ था ताकि जातिवाद और संप्रदायवाद के खिलाफ हो रहे अन्याय की लड़ाई मजबूती से लड़ी जा सके. लेकिन कांग्रेस में रहते हुए मैं यह लड़ाई नहीं लड़ पा रहा हूं. मेरा मकसद जनता के लिए काम करना है, जो यहां पूरा नहीं हो पा रहा था.’ उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें कांग्रेस के किसी भी पदाधिकारी से व्यक्तिगत शिकायत नहीं है, बल्कि यह निर्णय सैद्धांतिक है. सिद्दीकी ने संकेत दिया कि वे जल्द ही अपने समर्थकों के साथ मशविरा कर नई राजनीतिक पारी की शुरुआत करेंगे. नसीमुद्दीन सिद्दीकी का राजनीतिक सफर नसीमुद्दीन सिद्दीकी मूल रूप से बांदा जिले के स्योंढ़ा गांव के रहने वाले हैं. उनका राजनीतिक सफर 1988 में बांदा नगर पालिका अध्यक्ष पद के चुनाव से शुरू हुआ. हालांकि इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने बसपा ज्वाइन की. 1991 में बसपा के टिकट से नसीमुद्दीन ने बांदा सदर सीट से विधायक का चुनाव जीतकर इतिहास रचा. वे न केवल बांदा के पहले मुस्लिम विधायक बने, बल्कि धीरे-धीरे मायावती के खास और भरोसेमंद नेता भी बन गए. 2007 में जब बसपा की सरकार बनी, तब उनकी राजनीतिक मजबूती और प्रशासनिक क्षमता के कारण उन्हें ‘मिनी मुख्यमंत्री’ भी कहा गया. नसीमुद्दीन का खेलों से जुड़ाव राजनीति में आने से पहले नसीमुद्दीन का झुकाव खेलों की ओर था. वे राष्ट्रीय स्तर के वॉलीबाल खिलाड़ी रह चुके हैं. इसके अलावा उन्होंने रेलवे में कॉन्ट्रैक्टर के रूप में भी काम किया. उनके खेल और व्यवसाय का अनुभव बाद में राजनीतिक नेतृत्व और निर्णय क्षमता में भी मददगार साबित हुआ. जिसने उन्हें पूरे राज्य में एक कद्दावर नेता के रूप एम पहचान दिलाई. कैबिनेट मंत्री बनने का सफर नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बसपा सरकार में कई महत्वपूर्ण पद संभाले. जब मायावती 1995 में पहली बार मुख्यमंत्री बनीं, तब उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया. इसके बाद 21 मार्च 1997 से 21 सितंबर 1997 तक शॉर्ट टर्म गवर्नमेंट में मंत्री रहे. 3 मई 2002 से 29 अगस्त 2003 तक एक साल के लिए वे फिर कैबिनेट का हिस्सा रहे. इसके बाद 13 मई 2007 से 7 मार्च 2012 तक फुल टाइम गवर्नमेंट में मंत्री रहे. उनकी नीतियों और प्रभाव के कारण उन्हें पश्चिमी यूपी में एक मजबूत नेता माना जाता था. चुनावी रिकॉर्ड और परिवार का सियासी रसूख नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपने करियर में चुनावी राजनीति से ज्यादा संगठन और सदन के भीतर अपनी पकड़ मजबूत रखी. पिछले दो दशकों से वे विधान परिषद सदस्य (MLC) रहे हैं. उनकी पत्नी हुस्ना सिद्दीकी भी पांच साल तक एमएलसी रहीं. उनके बेटे अफजल सिद्दीकी ने 2014 में फतेहपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था. दिलचस्प बात यह है कि रसूख बढ़ने के साथ ही उनके परिवार में भी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं जागीं, जिसे लेकर बाद में कुछ विवाद भी हुए. सिद्दीकी ने बताया कि पार्टी ने उन्हें चुनाव लड़ने का ऑफर दिया था, लेकिन अब उनकी इच्छा चुनाव लड़ने की नहीं बल्कि प्रत्याशियों को जिताने के लिए प्रचार करने की है. कांग्रेस में एंट्री के बाद अब इस्तीफा नसीमुद्दीन ने फरवरी 2018 में बसपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा था. जहां उन्होंने पश्चिमी यूपी में प्रांतीय अध्यक्ष पद संभाला. हालांकि अब उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर अपने राजनीतिक सफर में नई दिशा का संकेत दिया है. उनका यह कदम क्षेत्रीय सियासत और पार्टी की रणनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है. अब आगे क्या? बसपा से निष्कासन के बाद कांग्रेस में शामिल हुए सिद्दीकी का अब कांग्रेस छोड़ना यूपी की राजनीति में नए समीकरण बना सकता है. चर्चा है कि वे अपनी पुरानी पार्टी बसपा में वापसी कर सकते हैं या फिर समाजवादी पार्टी का दामन थाम सकते हैं. हालांकि, उन्होंने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं और कहा है कि “जहां समर्थकों की सहमति होगी, वहीं से जनता की लड़ाई लड़ेंगे.”  

शशि थरूर ने दी सफाई, कहा- ‘मैं पार्टी लाइन से कभी नहीं हटा’

नई दिल्ली  कांग्रेस में जारी अंतर्कलह के बीच पार्टी के सीनियर लीडर और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने अपनी चुप्‍पी तोड़ी है. उन्‍होंने आलोचकों को दो टूक जवाब देते हुए कहा कि उन्‍होंने कभी भी पार्टी लाइन का उल्‍लंघन नहीं किया. कांग्रेस सांसद ने ऑपरेशन सिंदूर पर ऐसी बात कही है, जिससे पार्टी लीडरशिप खासकर राहुल गांधी के लिए इसे पचा पाना मुश्किल होगा. ऑपरेशन सिंदूर पर शशि थरूर के रुख से पार्टी में कलह की धार और तेज हो सकती है. बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर को लेकर राहुल गांधी काफी क्रिटिकल रहे हैं. कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने शनिवार 24 जनवरी 2026 को कहा कि उन्होंने संसद में कभी भी पार्टी लाइन का उल्लंघन नहीं किया है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर उनका रुख हमेशा देशहित को प्राथमिकता देने वाला रहा है. केरल साहित्य महोत्सव के दौरान कोझिकोड में एक संवाद सत्र में बोलते हुए थरूर ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक रूप से उन्होंने केवल ‘ऑपरेशन सिंधूर’ के मुद्दे पर सैद्धांतिक असहमति जताई थी और उस रुख को लेकर उन्‍हें कोई पछतावा नहीं है. उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व के साथ उनके कथित मतभेदों को लेकर अटकलें तेज हुई हैं. मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि कोच्चि में हाल ही में हुए एक कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा मंच पर मौजूद नेताओं के नाम लेने के क्रम में थरूर का नाम न लिए जाने से वे आहत हुए थे. इसके अलावा राज्य स्तर पर कुछ नेताओं द्वारा उन्हें लगातार हाशिए पर रखने की कोशिशों की बातें भी सामने आई हैं. जिम्‍मेदारी से अपनी राय रखी – थरूर इन अटकलों के बीच थरूर ने अपने पक्ष को विस्तार से रखते हुए कहा कि बतौर सांसद और लेखक उन्होंने हमेशा जिम्मेदारी के साथ अपनी राय रखी है. उन्होंने बताया कि पहलगाम की घटना के बाद उन्होंने एक अखबार में लेख लिखकर कहा था कि इस तरह की घटनाओं को बिना जवाब के नहीं छोड़ा जाना चाहिए और आतंकवादी ढांचों के खिलाफ सीमित तथा निर्णायक कार्रवाई जरूरी है. थरूर ने कहा कि उनका मानना था कि भारत विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है और उसे पाकिस्तान के साथ किसी लंबे सैन्य संघर्ष में उलझना नहीं चाहिए, लेकिन आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाने जैसी सीमित कार्रवाई उचित होगी. अगर भारत नहीं रहेगा तो कौन बचेगा? थरूर ने यह भी कहा कि उन्हें आश्चर्य हुआ जब केंद्र सरकार ने लगभग वही कदम उठाए जिनकी उन्होंने सिफारिश की थी. उन्होंने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से सही दिशा में उठाया गया कदम बताया. थरूर ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय हितों से जुड़े मामलों में राजनीति को पीछे छोड़ देना चाहिए. उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रसिद्ध कथन का हवाला देते हुए कहा, ‘अगर भारत नहीं रहेगा तो कौन बचेगा?’ उनका कहना था कि जब देश की सुरक्षा और विश्व में उसकी स्थिति का सवाल हो, तो भारत सबसे पहले आता है. उन्होंने यह भी जोड़ा कि राजनीतिक दलों के बीच मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं और ये एक बेहतर भारत के निर्माण की प्रक्रिया में सहायक होते हैं. लेकिन जब बात राष्ट्रीय हितों की हो, तब पार्टी से ऊपर देश को रखा जाना चाहिए. थरूर ने स्पष्ट किया कि संसद में उन्होंने कभी पार्टी के आधिकारिक रुख से हटकर बयान नहीं दिया और उनकी सार्वजनिक टिप्पणियां भी जिम्मेदार और संतुलित रही हैं. क्‍यों अहम थरूर का बयान? कांग्रेस के भीतर उनके कथित मतभेदों को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच थरूर का यह बयान पार्टी नेतृत्व के लिए भी एक संदेश माना जा रहा है कि वे संगठन के भीतर रहते हुए भी स्वतंत्र विचार रखने से पीछे नहीं हटेंगे, लेकिन देशहित से जुड़े मुद्दों पर उनकी प्राथमिकता हमेशा राष्ट्रीय हित ही रहेगी. यह बयान ऐसे समय आया है जब पार्टी आंतरिक एकजुटता और रणनीतिक दिशा को लेकर कई चुनौतियों का सामना कर रही है, और थरूर का रुख कांग्रेस के भीतर विचार-विमर्श और बहस की संस्कृति को रेखांकित करता है.

शशि थरूर ने कांग्रेस बैठक से बनाई दूरी, खुली बड़ी वजह

केरल केरल विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस के भीतर मतभेद नजर आए। पार्टी हाईकमान द्वारा बुलाई गई अहम बैठक में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर केरल विधानसभा चुनाव के लिए शुक्रवार को होने वाली पार्टी की एक रणनीतिक बैठक में शामिल नहीं होंगे क्योंकि वह इस बात से 'आहत' हैं कि राहुल गांधी ने हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान मंच पर उनके मौजूद होने के बावजूद उनके नाम का उल्लेख नहीं किया और राज्य के नेताओं द्वारा बार-बार उन्हें 'दरकिनार' करने की कोशिश की जा रही है। सूत्रों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। खरगे शुक्रवार को केरल के वरिष्ठ नेताओं के साथ विधानसभा चुनाव की रणनीति को लेकर बैठक करेंगे। आगामी मार्च-अप्रैल महीने में विधानसभा चुनाव संभावित हैं। उन्होंने कहा कि थरूर को अपने साथ किए गए व्यवहार से निराशा हुई, लेकिन अहम बात यह थी कि राहुल गांधी ने 19 जनवरी को कोच्चि में स्थानीय निकाय के चुनाव में जीतने वालों को सम्मानित करने के लिए आयोजित 'महापंचायत' में उनका उल्लेख नहीं किया।   सूत्रों ने कहा कि राहुल गांधी ने मंच पर अन्य वरिष्ठ नेताओं का उल्लेख किया और उनके नाम भी लिए, लेकिन चार बार के सांसद और कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य थरूर का उल्लेख नहीं किया, जबकि वह मंच पर मौजूद थे। हालांकि थरूर के कार्यालय ने कहा कि उन्होंने कोझिकोड में केरल साहित्य महोत्सव में अपनी पूर्व प्रतिबद्धताओं के कारण बैठक में शामिल होने में असमर्थता के बारे में पार्टी को सूचित कर दिया है। हालांकि, उनके करीबी सूत्रों के अनुसार, वह पार्टी द्वारा उनके साथ किए गए व्यवहार से बहुत आहत हैं, जबकि थरूर ने खासकर आगामी राज्य विधानसभा चुनाव के लिए रणनीति तैयार करने के मकसद से केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा आयोजित शिविर के मौके पर मतभेद दूर करने का प्रयास किया था।   उस कार्यक्रम के बाद थरूर ने कहा था कि वह कभी भी पार्टी के रुख से अलग नहीं हटे हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। केरल कांग्रेस नेताओं द्वारा वायनाड में आयोजित उस शिविर से आगामी विधानसभा चुनावों में वाम लोकतांत्रिक मंच (LDF) का मुकाबला करने के लिए एकजुट आह्वान किया गया था। उसमें कथित तौर पर यह सहमति बनी कि थरूर विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे बल्कि पूरे राज्य में चुनाव प्रचार करेंगे। हालांकि, कुछ दिनों बाद राज्य इकाई के भीतर मतभेद फिर से उभर आए हैं और थरूर हाल ही में कोच्चि में अपने साथ किए गए व्यवहार से खुश नहीं हैं।   थरूर ने पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और केरल प्रभारी दीपा दास मुंशी सहित पार्टी के प्रमुख पदाधिकारियों को भी संदेश भेजा है जिसमें उनके साथ हुए ‘गलत व्यवहार' की ओर इशारा किया गया है। थरूर के बयानों और लेखों की हाल के दिनों में राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कांग्रेस नेताओं ने तीखी आलोचना की थी। पिछले साल भारत-पाकिस्तान संघर्ष और पहलगाम हमले के बाद राजनयिक संपर्क के प्रयासों को लेकर उनकी टिप्पणियों पर विवाद खड़ा हो गया था। उनकी टिप्पणियां कांग्रेस के रुख से भिन्न थीं और पार्टी के कई नेताओं ने उनके इरादों पर सवाल उठाते हुए उन पर कटाक्ष किया था। हालांकि, थरूर ने कहा है कि विदेश नीति पर रुख में कोई भिन्नता नहीं है।  

टिमरनी में RSS कार्यक्रम में भाग लेने पर कांग्रेस विधायक पर उठे सवाल, आला कमान ने लिया संज्ञान

टिमरनी  मध्य प्रदेश के हरदा जिले की टिमरनी सीट से कांग्रेस विधायक अभिजीत शाह का आरएसएस के हिंदू कार्यक्रम में शामिल होना उनके लिए अब बड़ी राजनीतिक मुसीबत बन गया है। बताया जा रहा है कि, मामले पर अब सीधे तौर पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी यानी एआईसीसी तक ने संज्ञान ले लिया है, जिसके चलते पार्टी ने विधायक शाह से इस पूरे घटनाक्रम पर जवाब मांगा है। मध्य प्रदेश कांग्रेस ने प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी को मामले की पूरी रिपोर्ट सौंप दी है। साथ ही विधायक से इस संबंध में जवाब मांगा है। बता दें कि, अभिजीत शाह हरदा जिले के टिमरनी से विधायक हैं। बढ़ता जा रहा विवाद बीते दिनों टिमरनी विधानसभा के रहटगांव तहसील मुख्यालय पर आरएसएस का कार्यक्रम हुआ था। उस कार्यक्रम में कांग्रेस विधायक अभिजीत शाह शामिल हुए थे। कार्यक्रम में शामिल होने के बाद उनके ऐसा करने पर सबसे पहले हरदा जिले के कांग्रेस नेताओं ने आपत्ति जताई थी, तभी से ये मामला प्रदेश कांग्रेस की गंभीर चर्चा में जुड़ गया है। अब इस मामले में आलाकमान भी जुड़ गई है। देखना दिलचस्प होगा कि, इसपर टिमरनी विधायक की ओर से क्या प्रतिक्रिया दी जाती है।

राहुल गांधी: मनरेगा को मजबूत करने के लिए किसान-मजदूर मिलकर आगे आएं

नई दिल्ली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम' (मनरेगा) की जगह लाए गए ‘विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम' को लेकर बृहस्पतिवार को भारतीय जनता पार्टी तथा केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला और लोगों का आह्वान किया कि वे सरकार के इस कदम के खिलाफ एकजुट होकर खड़े हों। उन्होंने कांग्रेस के प्रकोष्ठ 'रचनात्मक कांग्रेस' द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘मनरेगा बचाओ मोर्चा' में यह आरोप भी लगाया कि भाजपा ने तीनों ‘काले' कृषि कानून लाकर किसानों के साथ जो किया था, वही अब वह मनरेगा को खत्म कर मजदूरों के साथ करना चाहती है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने यह भी कहा कि भाजपा एक ऐसा हिंदुस्तान चाहती है जिसमें एक राजा सारे फैसले करे तथा देश के गरीब, अदाणी और अंबानी पर पूरी तरह निर्भर हो जाएं। राहुल गांधी ने कहा, ‘‘मनरेगा ने गरीबों को अधिकार दिया था। इसके पीछे यह सोच थी कि जिसे भी काम की जरूरत हो, वह सम्मान के साथ काम मांग सके। मनरेगा को पंचायती राज के तहत चलाया जाता था। मनरेगा में लोगों की आवाज थी, उनका अधिकार था- जिसे नरेन्द्र मोदी खत्म करने में लगे हैं।'' उन्होंने कहा, ‘‘कुछ साल पहले भाजपा ने 'तीन काले कृषि कानून' लाकर किसानों पर आक्रमण किया था लेकिन किसानों और हम सबने नरेन्द्र मोदी पर दबाव डाल कर उसे रोक दिया। अब उसी तरह का हमला मजदूरों पर करने की कोशिश हो रही है।'' उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि उन्हें नए अधिनियम का नाम भी नहीं याद है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने दावा किया कि मनरेगा की जगह लाए गए नए कानून के तहत केंद्र सरकार निर्णय लेगी कि किस राज्य को कितना पैसा भेजा जाएगा। उनका कहना था, ‘‘भाजपा शासित राज्य में ज्यादा पैसा जाएगा और विपक्ष शासित राज्य में कम पैसा जाएगा। केंद्र सरकार ही तय करेगी कि कब कहां काम होगा, किसको कितनी मजदूरी मिलेगी। जो अधिकार मजदूरों को मिलते थे, अब वह ठेकेदारों को मिलेंगे। भाजपा की विचारधारा है कि देश का धन, संपत्ति चुने हुए हाथों में हो और वही लोग इस देश को चलाएं।'' राहुल गांधी ने इस बात पर जोर दिया, ‘‘भाजपा चाहती है कि देश से लोकतंत्र, संविधान और 'एक व्यक्ति-एक वोट' की परिकल्पना खत्म हो जाए। ये लोग आजादी से पहले वाला हिंदुस्तान फिर से लाना चाहते हैं। भाजपा वाले डरपोक लोग हैं, इन्हें रोकने के लिए हमें एक साथ खड़ा होना होगा।'' कांग्रेस नेता ने कहा कि जिस दिन सब एकजुट हो गए, उस दिन मनरेगा फिर से बहाल हो जाएगा।  

गौतम गंभीर की सराहना पड़ी भारी? थरूर पर कार्रवाई को लेकर BJP का कांग्रेस से सवाल

नागपुर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भारतीय क्रिकेट कोच गौतम गंभीर की तारीफ कर दी। नागपुर में हुई इस मुलाकात को लेकर अब भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर सवाल उठाए हैं। भाजपा का कहना है कि अब कांग्रेस इसके चलते थरूर के खिलाफ फतवा जारी कर सकती है। कांग्रेस सांसद ने कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद गंभीर के पास सबसे मुश्किल काम है।   भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने लिखा, 'पता नहीं कांग्रेस को कौन सी बात ज्यादा गुस्सा दिलाएगी। थरूर का नागपुर जाना, थरूर का गौतम गंभीर से मिलना और उनकी तारीफ करना या थरूर का इस बात को मानना की भारत में पीएम मोदी के पास सबसे मुश्किल काम है। यह देखते हुए कि भारत के हितों से पहले परिवार के हितों को रखने वाला विपक्ष उनपर सवाल उठाता है।' पूनावाला ने लिखा, 'ऐसा लगता है कि यह तीसरा पॉइंट हो सकता है। क्या थरूर के खिलाफ एक और कांग्रेस फतवा जारी होने वाला है?' थरूर ने की थी गंभीर की तारीफ क्रिकेट के शौकीन थरूर ने नागपुर में न्यूजीलैंड के खिलाफ पहले टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच से पहले गंभीर के साथ एक सेल्फी साझा की और पूर्व भारतीय सलामी बल्लेबाज की लगातार आलोचनाओं के बावजूद अपने काम पर ध्यान केंद्रित करने के लिए उनकी तारीफ की। उन्होंने लिखा था, 'नागपुर में पुराने दोस्त गौतम गंभीर के साथ खुलकर और अच्छी बात हुई, जो भारत के प्रधानमंत्री के बाद सबसे मुश्किल काम करने वाले इंसान हैं। लाखों लोग रोज उनके फैसलों पर सवाल उठाते हैं, लेकिन वह शांत रहते हैं और बगैर डरे आगे बढ़ते हैं। उनकी शांत दृढ़ता और नेतृत्व तारीफ के काबिल हैं। उन्हें सभी सफलताओं के लिए शुभकामनाएं।' गंभीर ने इस पर देर रात जवाब दिया और उन कुछ चर्चाओं का जिक्र किया जो उनके कार्यकाल में हावी रही हैं। गंभीर ने एक्स पर लिखा, 'डॉ शशि थरूर आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। जब मामला शांत हो जाएगा तब कोच के कथित ‘असीमित अधिकार’ को लेकर सच्चाई और तर्क स्पष्ट हो जाएंगे। तब तक मुझे खुद के खिलाफ खड़ा देखकर हंसी आ रही है।'

कांग्रेस ने किया बड़ा फैसला: खैरागढ़ में पहली बार मंडल कांग्रेस कमेटियों का गठन, 28 अध्यक्ष नियुक्त

खैरागढ़   छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने संगठन को जमीनी स्तर तक मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल करते हुए प्रदेश के सभी जिलों में पहली बार मंडल कांग्रेस कमेटियों के अध्यक्षों की नियुक्ति की है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव एवं छत्तीसगढ़ प्रभारी सचिन पायलट की सहमति के बाद मंडल अध्यक्षों की जिलेवार सूची जारी की। प्रदेशभर में कुल 1370 मंडल कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं। कांग्रेस का दावा है कि इस फैसले से पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूती मिलेगी और आगामी चुनावों में इसका सीधा लाभ मिलेगा। इसे भाजपा की तर्ज पर मंडल स्तर तक संगठनात्मक ढांचे को सशक्त करने की कांग्रेस की रणनीतिक पहल माना जा रहा है। पार्टी के प्रभारी महामंत्री मलकीत सिंह गैदू ने बताया कि मंडल अध्यक्षों को अपने-अपने क्षेत्रों की स्पष्ट जिम्मेदारी दी गई है। वे बूथ, सेक्टर और मंडल स्तर पर संगठन को सक्रिय करेंगे, जनसमस्याओं को प्रमुखता से उठाएंगे और पार्टी की नीतियों को आम जनता तक पहुंचाएंगे। उनके अनुसार यह नई संरचना कांग्रेस को अधिक अनुशासित, सक्रिय और चुनावी रूप से प्रभावी बनाएगी। इसी क्रम में खैरागढ़ जिले में कुल 28 मंडल कांग्रेस कमेटी अध्यक्षों की नियुक्ति की गई है। खैरागढ़ नगर, छुईखदान, मुढ़ीपार और गंडई विकासखंडों में मंडलवार अध्यक्ष घोषित किए गए हैं। पार्टी नेतृत्व ने सभी वर्गों और क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया है, जिससे संगठन में संतुलन और क्षेत्रीय सहभागिता सुनिश्चित हो सके। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति से संगठन को नई धार मिलेगी और स्थानीय मुद्दों को अधिक प्रभावी ढंग से उठाया जा सकेगा। खासकर केसीजी जिले जैसे क्षेत्र में मंडल स्तर पर संगठन का विस्तार कांग्रेस की चुनावी रणनीति को मजबूत करने वाला कदम माना जा रहा है।

जीतू पटवारी के खिलाफ वारंट जारी, पुलिस तलाश में जुटी, जानें पूरा मामला

ग्वालियर  मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मंत्री जीतू पटवारी के खिलाफ एमपी-एमएलए मजिस्ट्रेट कोर्ट ने जमानती वारंट जारी कर दिया है। वारंट की राशि 500 रुपये है। पुलिस को पटवारी की तलाश है, क्योंकि वे कोर्ट में पेश नहीं हो रहे। मामला लोकसभा चुनाव 2024 से जुड़ा है। 4 मई 2024 को भिंड जिले के उमरी थाना पुलिस ने जीतू पटवारी के खिलाफ मामला दर्ज किया था। आरोप था कि चुनाव प्रचार के दौरान पटवारी ने बसपा प्रत्याशी देवाशीष जरारिया पर भाजपा से साठगांठ करने का आरोप लगाया था। 16 जनवरी 2026 को कोर्ट ने पटवारी को प्रकरण में उपस्थित होने के लिए नोटिस जारी किया था।पटवारी गैरहाजिर रहे, इसलिए कोर्ट ने अब जमानती वारंट जारी किया। पुलिस को पटवारी नहीं मिल रहे हैं। अगली सुनवाई: 20 फरवरी 2026 को तय की गई है। यह वारंट जमानती है, यानी पटवारी 500 रुपये जमा करके या जमानत पर रिहा हो सकते हैं, लेकिन कोर्ट में पेश होना अनिवार्य है। जीतू पटवारी के खिलाफ दोबारा वारंट  कोर्ट ने 16 जनवरी को इस मामले में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए तलब किया था, लेकिन कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष पेश नहीं हुए। इसके बाद एमपी-एमएलए कोर्ट ने 500 रुपये का जमानती वारंट जारी करते हुए एक बार फिर उन्हें तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 20 फरवरी को निर्धारित की गई है।   यह प्रकरण लोकसभा चुनाव के दौरान का है। चुनाव प्रचार के समय कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी ने बसपा प्रत्याशी देवाशीष जरारिया पर भाजपा से सांठगांठ करने का आरोप लगाया था। इस बयान के बाद बसपा प्रत्याशी के निर्वाचन अभिकर्ता अशोक गुप्ता की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज किया था। इस प्रकरण में केवल जीतू पटवारी को ही आरोपी बनाया गया है। इससे पहले भी करीब आठ महीने पूर्व कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ जमानती वारंट जारी किया जा चुका है। कोर्ट में पेश होने पर जारी हुआ जमानती वारंट अब इस मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट ने पटवारी को गुजरी 16 जनवरी 2026 को न्यायालय में उपस्थित होने के लिए नोटिस जारी किया था। लेकिन, पटवारी कोर्ट में पैश नहीं हुए। ऐसे में अब एमएलए कोर्ट ने उनके खिलाफ जमानती वारंट जारी किया है। पुलिस को पटवारी नहीं मिल रहे हैं। 20 फरवरी को अगली सुनवाई इस मामले में जीतू पटवारी की अगली सुनवाई 20 फरवरी 2026 को होनी है। ये वारंट जमानती है, यानी जीतू पटवारी 500 रुपए जमानत राशि कोर्ट में जमा करके जमानत पर रिहा हो सकते हैं, लेकिन सुनवाई के दौरान उन्हें कोर्ट में पेश होना अनिवार्य है।

AIADMK के पूर्व मंत्री का बड़ा कदम, MLA पद से इस्तीफा देकर DMK में शामिल

चेन्नई ओराथानाडु विधानसभा क्षेत्र के विधायक वैथिलिंगम ने आज सुबह अपने पद से इस्तीफा दे दिया और बाद में मुख्यमंत्री स्टालिन की मौजूदगी में डीएमके में शामिल हो गए. ओराथानाडु के विधायक वैथिलिंगम एआईएडीएमके (AIADMK) के ओ. पन्नीरसेल्वम (OPS) के समर्थक थे. उन्होंने आज अपने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने खुद अपना इस्तीफा विधानसभा स्पीकर अप्पावु को सौंपा. एआईएडीएमके के जनरल सेक्रेटरी एडप्पादी पलानीस्वामी ने साफ कहा था कि ओ. पन्नीरसेल्वम और उनके समर्थकों को पार्टी में दोबारा शामिल करने का कोई सवाल ही नहीं है. ओ. पन्नीरसेल्वम के समर्थक दूसरी पार्टियों में शामिल होते जा रहे हैं. इसी तरह कुछ हफ्ते पहले, ओ. पन्नीरसेल्वम के समर्थक विधायक मनोज पांडियन ने अपने विधायर पद से इस्तीफा दे दिया था और डीएमके में शामिल हो गए थे. कुछ दिन पहले, ओ. पन्नीरसेल्वम के पक्के समर्थक वकील सुब्बुराथिनम डीएमके में शामिल हो गए थे, और अब वैथिलिंगम ने अपने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया है. वह सीधे सेक्रेटेरिएट से अन्ना अरिवालयम यानी डीएमके हेडक्वार्टर गए और चीफ मिनिस्टर स्टालिन की मौजूदगी में डीएमके में शामिल हो गए. इस दौरान करूर डिस्ट्रिक डीएमके सेक्रेटरी सेंथिल बालाजी समेत डीएमके हेडक्वार्टर के ऑफिस के लोग मौजूद थे. तंजावुर, थिरुवरूर, नागपट्टिनम और त्रिची जैसे जिलों में वैथिलिंगम के असर को देखते हुए, उनका डीएमके में शामिल होना आने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए फायदेमंद माना जा रहा है. पिछले विधानसभा चुनाव में डीएमके ने तंजावुर समेत डेल्टा जिलों में पहले ही काफी सीटें जीती हैं, ऐसे में वैथिलिंगम के आने से डीएमके को और मजबूती मिलने की उम्मीद है. इस बीच, उम्मीद है कि वैथिलिंगम आने वाले असेंबली इलेक्शन में डीएमके के टिकट पर ओराथनडू सीट से फिर से चुनाव लड़ेंगे. वैथिलिंगम कौन हैं? तंजावुर जिले के रहने वाले है और उनका डेल्टा इलाके में एआईएडीएमके का एक जाना-माना चेहरा थे. उन्होंने 2001 में एआईएडीएमके सरकार के दौरान इंडस्ट्री मिनिस्टर के तौर पर काम किया. वह 2011 में भी एआईएडीएमके सरकार में मिनिस्टर बने रहे. 2016 के असेंबली इलेक्शन में हारने के बाद, वह उसी साल एआईएडीएमके पार्टी के कैंडिडेट के तौर पर राज्यसभा के लिए चुने गए. इसके बाद, 2021 के इलेक्शन में ओराथनडू सीट जीतने के बाद, उन्होंने अपनी राज्यसभा मेंबरशिप से इस्तीफा दे दिया.