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न्यूक्लियर फ्यूजन का कमाल: आधा टन का चुंबक और अनलिमिटेड बिजली, सूरज जैसी शक्ति अब इंसानों के पास

नई दिल्ली न्यूजीलैंड की एक छोटी सी कंपनी ओपनस्टार टेक्नोलॉजीज ने न्यूक्लियर फ्यूजन की रेस में पूरी दुनिया को पीछे छोड़ दिया है. इस स्टार्टअप ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसे अब तक नामुमकिन माना जा रहा था. कंपनी ने आधे टन के भारी-भरकम चुंबक को हवा में तैराकर प्लाज्मा को सफलतापूर्वक कंट्रोल किया है. यह दुनिया में अपनी तरह का पहला कमर्शियल प्रयोग है. न्यूक्लियर फ्यूजन को मॉडर्न फिजिक्स का सबसे बड़ा लक्ष्य माना जाता है. अगर यह तकनीक पूरी तरह सफल होती है, तो इंसानों को असीमित बिजली मिल सकेगी. सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें न तो कार्बन उत्सर्जन होता है और न ही खतरनाक रेडियोएक्टिव कचरा निकलता है. हवा में तैरते चुंबक से कैसे पैदा होगी बिजली?     ओपनस्टार के फाउंडर रातु माताइरा ने इस मशीन के काम करने का तरीका समझाया है. उनकी कंपनी ‘लेविटेटेड डायपोल’ नाम की एक खास तकनीक पर काम कर रही है.     इसमें एक शक्तिशाली चुंबक को मैग्नेटिक फील्ड की मदद से हवा में लटकाया जाता है. इसी तैरते हुए चुंबक के चारों ओर प्लाज्मा को रोककर रखा जाता है.     अब तक पूरी इंडस्ट्री को लगता था कि ऐसी मशीन बनाना इंजीनियरिंग के हिसाब से संभव नहीं है. लेकिन न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है.     उन्होंने ‘जूनियर’ नाम के प्रोटोटाइप से यह दिखा दिया कि यह तकनीक न सिर्फ काम करती है, बल्कि इसे बड़े स्तर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है. फ्यूजन और फिशन के बीच क्या अंतर है? आजकल के परमाणु रिएक्टर ‘फिशन’ तकनीक पर चलते हैं. इसमें एटम्स को तोड़ा जाता है, जिससे एनर्जी निकलती है. लेकिन इस प्रोसेस में बहुत सारा खतरनाक कचरा भी पैदा होता है. इसके उलट ‘फ्यूजन’ की प्रक्रिया तारों और सूरज के अंदर होती है. इसमें दो एटम्स के केंद्र को आपस में जोड़ा जाता है. इस प्रोसेस से फिशन के मुकाबले कई गुना ज्यादा ऊर्जा निकलती है. सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इस प्रोसेस को शुरू करने के लिए बहुत ज्यादा बिजली की जरूरत पड़ती थी. ओपनस्टार की नई खोज ने इस मुश्किल को आसान बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. अब कम ऊर्जा खर्च करके ज्यादा बिजली बनाने का रास्ता साफ हो गया है. क्या 2030 तक घर-घर पहुंचेगी परमाणु बिजली? ओपनस्टार की सफलता के बाद अब अगले चरण की तैयारी शुरू हो गई है. कंपनी का अगला प्रोटोटाइप ‘ताही’ होगा, जिसकी मैग्नेटिक फील्ड मौजूदा मशीन से चार गुना ज्यादा ताकतवर होगी. न्यूजीलैंड की सरकार ने भी इस प्रोजेक्ट की अहमियत को समझते हुए 3.5 करोड़ डॉलर की मदद देने का वादा किया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह हाई-एनर्जी फ्लक्स-पंप तकनीक आने वाले समय में रिसर्च की दिशा बदल देगी. कंपनी का लक्ष्य है कि 2030 के दशक तक ऐसे कमर्शियल रिएक्टर तैयार कर लिए जाएं, जो शहरों को बिजली सप्लाई कर सकें. यह सफलता कोल और गैस जैसे पुराने ईंधन पर दुनिया की निर्भरता को पूरी तरह खत्म कर सकती है.

उच्च रक्तचाप के इलाज में क्रांति: वैज्ञानिकों ने खोजा रोज़ाना दवा से छुटकारा दिलाने वाला तरीका

हाई ब्लड प्रेशर दुनियाभर में तेजी से बढ़ती गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, इसका खतरा समय के साथ बढ़ता ही जा रहा है। विश्व स्वास्थ संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़ों से पता चलता है कि 2024 में दुनियाभर में 30-79 साल की उम्र के 1.4 बिलियन (140 करोड़) वयस्कों को हाइपरटेंशन की समस्या थी। ये आंकड़ा इस आयु वाले कुल लोगों का करीब 33% है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बच्चों में भी हाइपरटेंशन की दिक्कत बढ़ती जा रही है, जो कम उम्र में ही उन्हें कई प्रकार की क्रॉनिक बीमारियों का शिकार बनाने वाली हो सकती है। हाइपरटेंशन के शिकार मरीजों को डॉक्टर नियमित रूप से दवा लेते रहने की सलाह देते हैं, ताकि उन्हें ब्लड प्रेशर बढ़ने के कारण होने वाली समस्याओं जैसे हार्ट अटैक, स्ट्रोक, किडनी और आंखों की दिक्कतों से बचाया जा सके। मरीजों को जीवनभर ये दवाएं लेनी पड़ सकती हैं। ऐसे लोगों के लिए बड़ी राहत वाली खबर है। वैज्ञानिकों की टीम ने ऐसा तरीका ढूंढ लिया है जिसकी मदद से बिना दवाओं के भी आप ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रख सकते है। शोधकर्ताओं ने बीपी की दवाओं का विकल्प तलाश लिया है। बिना दवाओं के कंट्रोल हो सकेगा ब्लड प्रेशर स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, दशकों से हर दिन बिना गैप किए एक गोली खाते रहने को हाई बीपी का सबसे प्रभावी इलाज माना जाता रहा है। मरीजों को बीपी की दवाओं पर पूरी तरह निर्भर हो जाना पड़ता है। हालांकि अब ऐसे लोगों के लिए राहत वाली खबर सामने आ रही है।       शोधकर्ताओं की टीम ने एक हालिया रिपोर्ट में बताया है कि जल्द ही रोजाना बिना दवा लिए भी आप ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रख पाएंगे।     इसके लिए विकल्प के तौर पर एक इंजेक्शन की काफी चर्चा है, जिसे गोलियों की जगह साल में सिर्फ दो बार लेने से आप बीपी को कंट्रोल में रख पाएंगे।       जिलेबेसिरन नाम के इस इंजेक्शन को विशेषज्ञ भविष्य के लिए काफी असरदार उपाय के तौर पर देख रहे हैं। हाइपरटेंशन और कई गंभीर समस्याओं का कम होगा खतरा द लैंसेट जर्नल में इस इंजेक्शन से बीपी को मरीजों को होने वाले फायदों के बारे में जानकारी दी गई है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस खोज से हाइपरटेंशन को मैनेज करने का तरीका पूरी तरह बदल सकता है, खासकर ऐसे समय में जब दशकों से मौजूद दवाओं के बावजूद हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों की संख्या दुनियाभर में बढ़ती ही जा रही है।     माना जा रहा है कि जिलेबेसिरन इंजेक्शन लंबे समय तक हाइपरटेंशन को कंट्रोल में रखने में मददगार हो सकती है।     इससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक के साथ किडनी-आंख की समस्याओं के खतरे को कम करने में भी मदद मिल सकती है।     हाई ब्लड प्रेशर की समस्या को अगर बेहतर तरीके से कंट्रोल कर लिया जाए तो इसके कारण होने वाली बीमारियों का बोझ भी स्वास्थ्य सेवाओं से कम किया जा सकता है। कैसे काम करेगी ये इंजेक्शन? इस इंजेक्शन को लेकर साझा की गई जानकारियों के मुताबिक फिलहाल ये अपने लेट-स्टेज ग्लोबल ट्रायल में हैं।  साल में दो बार लगने वाले इस इंजेक्शन से हाई बीपी को आसानी से कंट्रोल किया जा सकता है।       रोश और एल्नीलम फार्मास्यूटिकल्स द्वारा विकसित जिलेबेसिरन इंजेक्शन को साल में दो बार लगवाने की जरूरत होगी।     इसमें लिवर में एंजियोटेंसिनोजेन के उत्पादन को कम करने के लिए स्मॉल इंटरफेरिंग आरएनए (siRNA) टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है।     एंजियोटेंसिनोजेन एक प्रोटीन है जो ब्लड प्रेशर रेगुलेशन के लिए जरूरी है।     एंजियोटेंसिनोजेन के उत्पादन को धीमा करके यह इंजेक्शन करीब छह महीने तक ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रख सकती है।     मिड-स्टेज अच्छे नतीजों के बाद अब ये फेज 3 ट्रायल्स में है। क्या कहते हैं विशेषज्ञ? विशेषज्ञ कहते हैं, शुरुआती ट्रायल्स से पता चलता है कि ये इंजेक्शन असरदार हो सकती है, लेकिन शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि हाइपरटेंशन जिंदगी भर चलने वाली बीमारी है और ये थेरेपी अभी क्लिनिकल जांच के तहत हैं। स्टैंडर्ड इलाज यानी रोजाना ली जाने वाली दवाओं की जगह लेने के लिए ये कितनी प्रभावी है, फिलहाल दावा नहीं किया जा सकता है।    

क्या आप जानते हैं? भारत के इन पांच स्थानों पर हवाई जहाज़ उड़ाना है प्रतिबंधित

नई दिल्ली  भारत में हवाई यात्रा तेजी से आधुनिक और सुरक्षित होती जा रही है, लेकिन आज भी देश में कुछ ऐसे इलाके हैं जहां प्लेन उड़ाना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इन क्षेत्रों को नो फ्लाइंग जोन घोषित किया गया है, यानी इनके ऊपर से किसी भी विमान को गुजरने की अनुमति नहीं होती। यs प्रतिबंध किसी तकनीकी कमी की वजह से नहीं, बल्कि सुरक्षा और संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए लगाया जाता है। दरअसल, कई स्थान राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े होते हैं, कुछ जगहों पर महत्वपूर्ण सरकारी गतिविधियां चलती हैं, तो कुछ धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत अहम मानी जाती हैं। ऐसे में सरकार एयरस्पेस को नियंत्रित कर विशेष नियम लागू करती है। चाहे विमान कितने भी आधुनिक और एडवांस क्यों न हों, इन खास इलाकों के ऊपर उड़ान भरना सख्त रूप से मना है। नियमों का उल्लंघन करने पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान भी है। आइए आपतो बताते हैं इन जगहों के बारे में।    राष्ट्रपति भवन     देश के राष्ट्रपति का आधिकारिक निवास होने के कारण यह इलाका देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता है।     यहां बहु-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था तैनात रहती है।      राष्ट्रपति भवन के ऊपर का एयरस्पेस विशेष रूप से प्रतिबंधित श्रेणी में आता है।     यहां किसी भी तरह की अनधिकृत हवाई गतिविधिचाहे वह ड्रोन हो, हेलीकॉप्टर या निजी विमान सख्त रूप से प्रतिबंधित है।     ये व्यवस्था राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लागू की गई है। संसद भवन      भारतीय लोकतंत्र का केंद्र होने के कारण संसद भवन के ऊपर एयरस्पेस अत्यधिक नियंत्रित रहता है।     यहां कानून निर्माण की प्रक्रिया चलती है और देश के शीर्ष नेता मौजूद रहते हैं।      सुरक्षा कारणों से इस क्षेत्र को नो-ड्रोन जोन घोषित किया गया है।      बिना अनुमति उड़ान भरना गंभीर अपराध माना जाता है और इसके लिए कड़ी कानूनी कार्रवाई हो सकती है। प्रधानमंत्री आवास     प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास भी उच्च सुरक्षा घेरे में आता है।     यहां विशेष सुरक्षा समूह (SPG) और अन्य एजेंसियां निगरानी रखती हैं।     यहां का एयरस्पेस पूरी तरह नियंत्रित रहता है और किसी भी प्रकार की निजी या व्यावसायिक उड़ान की अनुमति नहीं है।     यहां ड्रोन उड़ाना भी सख्त रूप से प्रतिबंधित है। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र      मुंबई स्थित यह परमाणु अनुसंधान केंद्र देश की सामरिक और वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था है।     यहां परमाणु अनुसंधान और संवेदनशील परियोजनाएं संचालित होती हैं।     राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से इसके ऊपर का हवाई क्षेत्र पूरी तरह प्रतिबंधित है।     किसी भी संदिग्ध हवाई गतिविधि को तुरंत सुरक्षा एजेंसियों द्वारा रोका जाता है। तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर      दक्षिण भारत के इस प्रसिद्ध मंदिर में प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।     भारी भीड़ और सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए मंदिर परिसर और उसके ऊपर के क्षेत्र को नो-फ्लाइंग जोन घोषित किया गया है।      यहां हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर और ड्रोन उड़ाने की अनुमति नहीं है।     यह प्रतिबंध श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए लागू किया गया है।  

AI-समिट 2026 में नया आविष्कार, 30 मिनट में कैंसर डिटेक्शन संभव

नई दिल्ली हेल्थ सेक्टर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का असर तेजी से दिख रहा है. दिल्ली के भारत मंडपम में चल रहे एआई समिट में एक खास डिवाइस लोगों का ध्यान खींच रहा है. दावा किया गया है कि यह नया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डिवाइस पेट से जुड़ी बीमारियों और खासतौर पर कैंसर का पता आसानी से और समय रहते लगा सकता है, जिससे मरीज को बीमारी के गंभीर होने से पहले इलाज मिल सकेगा. विप्रो की चीफ टेक्निकल ऑफिसर संध्या अरुण के मुताबिक, यह डिवाइस शुरुआती स्टेज में ही कैंसर का पता लगा लेता है. इससे मरीज को समय पर इलाज मिल सकता है और कई मामलों में सर्जरी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.उनका कहना है कि जल्दी पहचान ही सबसे बड़ा फायदा है, क्योंकि बीमारी जितनी जल्दी पकड़ में आ जाएगी, इलाज उतना आसान और असरदार होगा. आइए व‍िस्‍तार से जानते हैं इस ड‍िवाइस के बारे में… कैसे काम करती है मशीन? यह एआई आर्म रोबोटिक एमआरआई मशीन सबसे पहले मरीज के पेट का स्कैन करती है. स्कैन का रिजल्ट रियल-टाइम स्क्रीन पर दिखाई देता है, जिससे डॉक्टर तुरंत समझ सकते हैं कि अंदर क्या समस्या है. कैंसर का कैसे लगाएगी पता स्कैन में अगर ट्यूमर या कैंसर से जुड़ी कोई असामान्यता दिखती है, तो एआई तुरंत उसका विश्लेषण करता है और बताता है कि तस्वीर में दिख रही चीज क्या है. कंपनी का कहना है कि 30–45 मिनट में पूरा स्कैन और रिपोर्ट तैयार हो जाती है. मशीन में क्या है, क्या सिर्फ पेट होगा स्कैन? विप्रो की ओर से बताया गया कि इस एआई मशीन में चार अलग-अलग आर्म लगी हुई हैं और इनसे पूरा शरीर स्कैन हो सकेगा. एक आर्म मिड-बॉडी स्कैन के लिए है और बाकी अलग-अलग हिस्सों के लिए हैं. इससे पूरे शरीर की जांच आसानी से की जा सकती है. और क्या फायदे हैं इस मशीन के दावा किया गया कि इस मशीन से समय और लागत दोनों की बचत होगी. साथ ही यह भारत में बनी पहली AI-संचालित MRI मशीन है, जो स्कैन समय में करीब 37 फीसदी की कमी लाती है. 75 फीसदी तक हीलियम की खपत घटाती है. यानि जांच होगी तेज़, सटीक और सस्ती होगी और मरीज को जल्दी इलाज मिल सकेगा. बता दें क‍ि नई AI तकनीक से मेडिकल जांच का तरीका लगातार बदल रहा है और भविष्य में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का पता लगाना पहले से कहीं ज्यादा आसान हो सकता है.

एक्सीडेंट पीड़ितों के लिए बड़ी राहत, ‘PM RAHAT’ में 0 रुपये का बिल और 1.5 लाख तक कवर

नई दिल्ली PM RAHAT Scheme: सड़क हादसे भारत में हर साल हजारों परिवारों की जिंदगी बदल देते हैं. कई बार हादसा जानलेवा इसलिए बन जाता है, क्योंकि घायल को समय पर अस्पताल नहीं मिल पाता या इलाज से पहले पैसों की बात आ जाती है. इसी बड़ी समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने PM RAHAT योजना को मंजूरी दे दी है. इस योजना का मकसद साफ है, सड़क हादसे के शिकार लोगों को बिना किसी देरी और बिना पैसे की चिंता के सही और उचित समय पर इलाज मिल सके.  क्या है PM RAHAT योजना PM RAHAT यानी रोड एक्सीडेंट विक्टिम हॉस्पिटलाइजेशन एंड एश्योर्ड ट्रीटमेंट स्कीम. इसके तहत सड़क हादसे में घायल व्यक्ति को दुर्घटना की तारीख से 7 दिन तक कैशलेस इलाज (Cashless Treatment) की सुविधा मिलेगी. इलाज पर अधिकतम 1.5 लाख रुपये तक का खर्च सरकार की तरफ से कवर किया जाएगा. मरीज की जेब से एक रुपया भी नहीं लिया जाएगा. स्वास्थ्य आंकड़े बताते हैं कि, अगर घायल को पहले एक घंटे के भीतर अस्पताल पहुंचा दिया जाए तो सड़क हादसों में होने वाली करीब आधी मौतों पर लगाम लगाई जा सकती हैं. इस समय को गोल्डन आवर कहा जाता है. अक्सर अस्पताल में भर्ती होने में देरी इसलिए होती है, क्योंकि पैसे और पेमेंट को लेकर असमंजस रहता है. PM RAHAT योजना इसी समस्या को खत्म करने की कोशिश है. योजना में एक और बड़ी दिक्कत को माना गया है. हादसे के बाद आसपास मौजूद लोग कानूनी झंझट के डर से मदद करने से कतराते हैं. PM RAHAT में ऐसे मददगारों को राहवीर या गुड समैरिटन कहा गया है. इसका मतलब है कि जो व्यक्ति घायल की मदद करेगा, उसे कानूनी परेशानियों से डरने की जरूरत नहीं होगी. न उसे किसी कानूनी पचड़े में पड़ना होगा और न ही उसके जेब से पैसे खर्च होंगे. 112 पर कॉल, सीधे मदद हादसे के समय पीड़ित खुद, कोई राहगीर या मौके पर मौजूद कोई भी व्यक्ति 112 नंबर पर कॉल कर सकता है. इस कॉल के जरिए नजदीकी तय अस्पताल की जानकारी मिलेगी और एंबुलेंस बुलाई जा सकेगी. यह पूरा सिस्टम इमरजेंसी रिस्पॉन्स सपोर्ट सिस्टम से जुड़ा है, जिससे पुलिस, एंबुलेंस और अस्पताल आपस में तालमेल से काम कर सकें. योजना के तहत सभी तरह की सड़कों पर हादसे में घायल लोग कवर होंगे. चाहे वो किसी भी शहर की कोई भी सड़क होग. अगर चोट गंभीर नहीं है, तो 24 घंटे तक का स्टेबलाइजेशन इलाज मिलेगा. अगर जान को खतरा है, तो यह समय 48 घंटे तक बढ़ जाएगा. दोनों ही हालात में 7 दिन तक का पूरा इलाज कवर रहेगा. पुलिस की पुष्टि तय समय सीमा में डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए जरूरी होगी. डिजिटल सिस्टम से होगा पूरा काम PM RAHAT योजना दो मौजूदा सरकारी डिजिटल सिस्टम पर बेस्ड है. एक सिस्टम हादसे की पूरी जानकारी दर्ज करता है और दूसरा इलाज और भुगतान से जुड़ा काम संभालता है. पहला है इलेक्ट्रॉनिक डिटेल्ड एक्सीडेंट रिपोर्ट यानी eDAR, जिसे केंद्रीय सड़क परिवहन राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ऑपरेट करता है और दूसरा सिस्टम है ट्रांजैक्शन मैनेजमेंट सिस्टम TMS 2.0, जिसकी जिम्मेदारी नेशनल हेल्थ अथॉरिटी के पास है. इन दोनों सिस्टम का मकसद यह है कि एक्सीडेंट की सूचना मिलते ही पूरी जानकारी एक ही लाइन में आगे बढ़े.  हादसे की रिपोर्ट, अस्पताल में भर्ती, इलाज, क्लेम डालना और फिर अस्पताल को पेमेंट, सब कुछ इसी डिजिटल सिस्टम के जरिए किया जाए, ताकि इलाज में देरी न हो और किसी को बार बार दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें. अस्पतालों को इलाज का पैसा मोटर व्हीकल एक्सीडेंट फंड से मिलेगा. अगर हादसे में शामिल वाहन का बीमा है, तो पेमेंट बीमा कंपनियों के फंड से होगा. हिट एंड रन या बिना बीमा वाले मामलों में केंद्र सरकार बजट से पैसा देगी. क्लेम मंजूर होने के बाद 10 दिन के भीतर अस्पताल को भुगतान करने का वादा किया गया है. अगर योजना से जुड़ी कोई शिकायत होती है, तो उसका निपटारा जिला सड़क सुरक्षा समिति के तहत किया जाएगा. इसकी जिम्मेदारी जिला कलेक्टर या जिला मजिस्ट्रेट के स्तर पर होगी. इससे लोगों को अलग से किसी दफ्तर के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे. PM RAHAT योजना में परिवहन, स्वास्थ्य, बीमा और पुलिस विभाग को एक साथ लाया गया है. इसका असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अस्पताल कितनी संख्या में जुड़ते हैं, 112 नंबर कितनी तेजी से काम करता है और पुलिस के कन्फर्मेशन में इलाज में देरी तो नहीं होती. जिला स्तर पर ये प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ती है और इसे कैसे लागू किया जाता है. आने वाले समय में साफ हो जाएगा कि यह योजना सड़क हादसों में जान बचाने में कितनी कारगर साबित होती है.

अब दिल बोलेगा पहले: एआई तकनीक बताएगी हार्ट अटैक का संकेत समय रहते

नई दिल्ली हृदय रोग-हार्ट अटैक हर साल दुनियाभर में लाखों लोगों की मौत का कारण बन रहा है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) की रिपोर्ट के मुताबिक अकेले साल 2023 में, कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों (सीवीडी) की वजह से दुनिया भर में लगभग 19.2 मिलियन (1.92 करोड़) लोगों की मौत हो गई, इसमें इस्केमिक हार्ट डिजीज के कारण 24 करोड़ लोग प्रभावित हुए। भारतीय आबादी में भी हृदय रोगों की समस्याएं तेजी से बढ़ती जा रही हैं, जिसको लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार चिंता जताते रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं,  भारत में स्थिति और भी चिंताजनक है, यहां तेजी से बदलती जीवनशैली, तनाव, गड़बड़ खानपान, मोटापा, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसे कारक हृदय रोगों के खतरे को बढ़ा रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई मामलों में हार्ट अटैक अचानक होता है और मरीज को पहले से कोई स्पष्ट चेतावनी नहीं मिलती। अच्छी खबर ये है कि आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ऐसे मामलों में नई उम्मीद बनकर उभर रहा है।  हार्ट अटैक के जोखिमों का पहले से अनुमान लगाने में एआई को मददगार माना जा रहा है। साइलेंट हार्ट अटैक का पता लगाने वाला एआई टूल अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट्स में हमने बताया है कि गर्भधारण को आसान बनाने के साथ, कैंसर जैसी बीमारियों का पता लगाने तक के लिए एआई को तैयार किया जा रहा है। इसी क्रम में अब विशेषज्ञों की टीम एक ऐसे एआई टूल के बारे में जानकारी दी है जो इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ईसीजी) के जरिए दिल के सिग्नल रिकॉर्ड करने में मदद करता है।     एआई एल्गोरिदम उन पैटर्न को एनालाइज करते हैं जिससे पता चल सकता है कि कहीं आपको पहले से कोई साइलेंट हार्ट अटैक तो नहीं हुआ है?     एक छोटा इलेक्ट्रॉनिक पैड ईसीजी के जरिए पिछले अटैक का पता लगा सकता है, इसे मोबाइल फोन पर एआई से जोड़ा जा सकता है।     इस डिवाइस और एआई टूल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसकी मदद से डॉक्टरों को ऐसे मरीजों का पता लगाने में मदद मिल सकती है जो पहले साइलेंट हार्ट अटैक का शिकार रहे चुके हैं।     ऐसे मरीजों का समय पर इलाज करके दूसरी बार हार्ट को रोकने और जान बचाने में मदद मिल सकती है। साइलेंट हार्ट अटैक होता है खतरनाक साइलेंट हार्ट अटैक या साइलेंट मायोकार्डियल इन्फार्क्शन हृदय की गंभीर समस्या मानी जाती है। इसमें रोगी को दिल का दौरा तो पड़ता है पर उसे लक्षण महससूस नहीं होते।     इस तरह के हार्ट अटैक में सीने में तेज, हाथों में दर्द या सांस फूलने जैसे आम चेतावनी के संकेत नहीं दिखते हैं।     जिन लोगों को ये होते हैं, उनमें से अधिकतर लोग मेडिकल मदद नहीं लेते, जिससे दिल की मांसपेशियों को होने वाला नुकसान समय के साथ चुपचाप बढ़ता रहता है।     इससे भविष्य में हार्ट फेलियर, हार्ट अटैक से जान जाने का खतरा काफी बढ़ जाता है।     उम्रदराज लोगों, डायबिटीज के शिकार, हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल वाले मरीजों में साइलेंट मायोकार्डियल इन्फार्क्शन का खतरा अधिक देखा जाता रहा है। कैंसर के मरीजों में हार्ट अटैक का पता लगाने वाला टूल हृदय रोग और हार्ट अटैक के बढ़ते जोखिमों के बीच एआई टेक्नोलॉजी को गेम-चेंजर के तौर पर देखा जा रहा है। एआई और दिल की बीमारियों के खतरे को कम करने की दिशा में एक अन्य खोज में यूके स्थित लीसेस्टर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके कैंसर मरीजों में सेकेंडरी हार्ट अटैक के खतरे का पता लगाने के लिए एक नया टूल बनाया है।     कमजोर कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम की वजह से कैंसर के  मरीजों में  हार्ट अटैक का खतरा अधिक रहता है।     अब तक, डॉक्टरों के पास ऐसे मरीजों के इलाज में गाइड करने के लिए कोई स्टैंडर्ड टूल नहीं था     अब विशेषज्ञों ने पहले से ही खतरे को बताने वाला मॉडल विकसित किया है, जो खास तौर पर उन कैंसर मरीजों के लिए मददगार हो सकता है जिनमें दिल की बीमारियों का जोखिम ज्यादा होता है।     ONCO-ACS नाम का यह टूल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके कैंसर से जुड़े फैक्टर्स को स्टैंडर्ड क्लिनिकल डेटा के साथ मिलाकर छह महीने के अंदर कार्डियक घटना का अनुमान लगा सकता है। जन्मजात हृदय रोगा वाल बच्चों के लिए एआई टूल एक अन्य खोज में  माउंट सिनाई क्राविस चिल्ड्रन्स हार्ट सेंटर के शोधकर्ताओ ने ऐसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल विकसित करने के बारे में जानकारी दी है, जो जन्मजात हृदय रोग के शिकार बच्चों के लिए मददगार साबित हो सकती है।     कई अन्य संस्थानों के साथ मिलकर विशषज्ञों ने जो टूल तैयार किया है वह  टेट्रालॉजी ऑफ फैलोट वाले मरीजों में हार्ट की समस्या, हार्ट डैमेज का पता लगाने में मदद कर सकती है।     टेट्रालॉजी ऑफ फैलोट का पता अक्सर जन्म के तुरंत बाद चल जाता है। इसके कारण आपके बच्चे की त्वचा नीली या ग्रे दिख सकती है। स्टेथोस्कोप से बच्चे के दिल की धड़कन सुनते समय फुसफुसाहट जैसी आवाज (हार्ट मर्मर) आती है।     यह टूल स्टैंडर्ड इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ईसीजी) को एनालाइज कर सकता है ताकि जोखिमों का पता लगाया जा सके। आमतौर पर इस खतरे का पता लगाने के लिए कार्डियक एमआरआई की जरूरत होती है।  

क्या पुरुष ट्रैफिक पुलिसकर्मी महिलाओं से वाहन जांच नहीं कर सकते?

  नई दिल्ली हाल ही में सोशल मीडिया पर ट्रैफिक पुलिसकर्मी का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वो बाइक पर महिला राइडर देखकर उसे छोड़ देता है. इस वीडियो के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही थी कि क्या पुरुष पुलिसकर्मी किसी महिला राइडर को रोक सकते हैं या नहीं. इस सवाल पर कई तरह के कमेंट आ रहे हैं. कुछ लोगों का कहना है कि शाम को पुलिसकर्मी नहीं पकड़ सकते हैं तो कई लोगों का कहना है कि शराब वाला टेस्ट पुरुष पुलिसकर्मी नहीं कर सकते हैं. ऐसे में जानते हैं कि आखिर सच्चाई क्या है… क्या कहते हैं नियम? नियमों के अनुसार, भारतीय ट्रैफिक कानून पुरुष पुलिसकर्मियों को दस्तावेज़ जांच या उल्लंघन के लिए गाड़ी चला रही महिलाओं को रोकने की अनुमति देते हैं. सभी राज्यों में पुलिस के निर्देश पुरुष और महिलाओं के लिए एक ही है. ये बात सच है कि सूर्यास्त के बाद महिला अधिकारियों की तैनाती अनिवार्य है, लेकिन ये नियन केवल गिरफ्तारी या हिरासत के मामलों में ही लागू होते हैं.  ऐसे में सामान्य यातायात जांच के मामलों में ये लागू नहीं होते हैं. ऐसे में रात में भी पुरुष पुलिसकर्मी महिला चालकों से पूछताछ कर सकते हैं. सरल शब्दों में कहें तो, किसी वाहन को रोकना, कागजात की जांच करना या चालान जारी करना गिरफ्तारी नहीं माना जाता है.  इसके अलावा, एएसआई या उससे ऊपर के रैंक के ट्रैफिक ऑफिसर चालक के लिंग की परवाह किए बिना, ड्राइविंग लाइसेंस, वाहन के कागजात मांगने या चालान जारी करने के लिए अधिकृत हैं. रात के समय में कई राज्य सुरक्षा और जनता की सुविधा के लिए, जहां तक संभव हो, महिला अधिकारियों को तैनात करना पसंद करते हैं. लेकिन यह एक प्रथा है, कानून नहीं. पुरुष पुलिस अधिकारियों पर अभी भी रात के अंधेरे में महिला चालकों को रोकने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है. साल 2015 में, नवी मुंबई पुलिस ने गोल्फ क्लब रोड पर लापरवाही से गाड़ी चलाने सहित यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाली महिला चालकों के खिलाफ सख्त अभियान चलाया. महिला कांस्टेबलों की कम संख्या के कारण, पुरुष अधिकारियों ने जुर्माना लगाया. कानून पुरुषों और महिलाओं में कोई भेद नहीं करता.

मिडिल ईस्ट तनाव से घिरा, क्या युद्ध या संकट के समय इंश्योरेंस कंपनियों से मिलेगा क्लेम? जानें शर्तें

नई दिल्ली इजराइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने दुनिया भर के लोगों को चिंता में डाल दिया है. खासकर भारतीय यात्रियों, विदेश में काम करने वालों और व्यापार करने वाली कंपनियों की मुश्किल बढ़ गई है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इंश्योरेंस कंपनियां क्या कवर देती हैं? क्या आपकी सामान्य यात्रा बीमा या स्वास्थ्य बीमा इस युद्ध जैसी स्थिति में नुकसान की भरपाई करेगी? या बिजनेस के लिए कोई अलग सुरक्षा है? इस समय कई भारतीय परिवार और व्यापारी इसी उलझन में हैं क्योंकि मिडिल ईस्ट भारत का बड़ा व्यापारिक पार्टनर है और वहां लाखों भारतीय काम करते हैं. सामान्य तौर पर ज्यादातर यात्रा और स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी में युद्ध, सिविल अनरेस्ट या आतंकवाद से होने वाले नुकसान को पूरी तरह बाहर रखा जाता है. यह पॉलिसी के एक्सक्लूजन क्लॉज में साफ लिखा होता है. अगर कोई इलाका बाद में अनसेफ घोषित हो जाए तो वहां जाने वाले लोगों को खुद सावधानी बरतनी पड़ती है. यानी अगर फ्लाइट कैंसल हो, होटल खर्च बढ़े या स्वास्थ्य समस्या युद्ध की वजह से आए तो बीमा कंपनी पैसे नहीं देगी. सिर्फ सामान्य स्वास्थ्य समस्या जैसे दिल का दौरा पड़ना, जो युद्ध से जुड़ा न हो, तो कुछ कंपनियां मदद कर सकती हैं. लेकिन युद्ध का सीधा असर हो तो कवर नहीं मिलता. एक्सक्लूजन क्लॉज में होता है वॉर या सिविल अनरेस्ट PlusCash के फाउंडर और CEO प्रणव कुमार के मुताबिक, जब किसी देश या क्षेत्र में युद्ध, दंगे या आतंकी घटनाएं होती हैं, तो ज्यादातर ट्रैवल और हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियां ऐसे हालात में होने वाले नुकसान को कवर नहीं करती हैं. इन पॉलिसियों में पहले से ही “वॉर या सिविल अनरेस्ट” को एक्सक्लूजन क्लॉज में रखा जाता है. इसलिए अगर कोई व्यक्ति ऐसे इलाकों में यात्रा की योजना बना रहा है, जिन्हें बाद में असुरक्षित घोषित कर दिया जाता है, तो उसे पहले अपनी इंश्योरेंस पॉलिसी की शर्तें ध्यान से पढ़ लेनी चाहिए और पूरी सावधानी बरतनी चाहिए. क्या महंगे प्लान में सब कवर होता है? भारत में भी इंश्योरेंस रेगुलेटर आईआरडीएआई के नियमों के तहत यही प्रैक्टिस है. अगर आप मिडिल ईस्ट घूमने या काम पर जा रहे हैं तो अपनी पॉलिसी अच्छे से पढ़ लें. कई बार लोग सोचते हैं कि महंगा प्लान ले लिया तो सब कवर हो जाएगा, लेकिन युद्ध जैसी बड़ी घटना में यह गलतफहमी महंगी पड़ सकती है. खासकर शिपिंग, ऑयल और एक्सपोर्ट बिजनेस करने वालों के लिए तो स्थिति और गंभीर है. होर्मुज स्ट्रेट जैसे इलाकों में शिपिंग रूट प्रभावित हो रहे हैं, इसलिए सामान्य मरीन इंश्योरेंस भी पर्याप्त नहीं रहता. ऐसे में बिजनेस वाले लोगों को अलग तरह के स्पेशल बीमा प्रोडक्ट्स की जरूरत पड़ती है. जैसे पॉलिटिकल रिस्क इंश्योरेंस, वॉर रिस्क इंश्योरेंस और मरीन वॉर रिस्क कवर. ये प्रोडक्ट्स खासतौर पर बनाए गए हैं ताकि संपत्ति को नुकसान, बिजनेस रुकने या सरकार द्वारा संपत्ति छीनने जैसे खतरे से बचाया जा सके. लेकिन इनकी कीमत भी ज्यादा होती है और हर कोई आसानी से नहीं ले पाता. कंपनियों को मिलता है कवर? Vibhvangal Anukulakara Private Limited के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर सिद्धार्थ मौर्य के अनुसार, जो कंपनियां राजनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों में काम करती हैं, उनके लिए खास तरह के इंश्योरेंस कवर बेहद जरूरी हो जाते हैं. इनमें पॉलिटिकल रिस्क इंश्योरेंस, वॉर रिस्क इंश्योरेंस और मरीन वॉर रिस्क कवर शामिल हैं. ये पॉलिसियां संपत्ति को नुकसान, बिजनेस रुकने (बिजनेस इंटरप्शन) और जबरन अधिग्रहण जैसे जोखिमों से सुरक्षा देने के लिए बनाई गई हैं. हालांकि, ऐसे कवर लेने की कीमत भी ज्यादा होती है. भारतीय कंपनियां जो मिडिल ईस्ट से तेल, गैस या दूसरे सामान का आयात-निर्यात करती हैं, उन्हें अब इन स्पेशल कवर की तलाश करनी पड़ रही है. कुछ इंटरनेशनल इंश्योरेंस ग्रुप्स ने पर्सियन गल्फ में वॉर रिस्क कवर रोक भी दिया है, जिससे शिपिंग कंपनियों की मुश्किल बढ़ गई है. कुछ कंपनियां टेररिज्म के लिए अलग ‘टेररिज्म राइडर’ या ऐड-ऑन कवर प्रदान करती हैं, लेकिन युद्ध के लिए बहुत कम ऑप्शन हैं. इस समय जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है, भारतीय व्यापारियों को अपनी पॉलिसी अपडेट करानी चाहिए. घरेलू स्वास्थ्य बीमा या लाइफ इंश्योरेंस में भी युद्ध से जुड़े नुकसान बाहर रहते हैं. एक्सपर्ट्स के अनुसार, पॉलिसी खरीदते समय सिर्फ प्रीमियम नहीं, बल्कि एक्सक्लूजन क्लॉज को ध्यान से पढ़ना बेहद जरूरी है.

सैलरी अकाउंट बदला है? PF क्लेम से पहले EPFO में यह काम करना न भूलें

नई दिल्ली आपने अपना सैलरी अकाउंट बदल लिया है. हो सकता है आपके नए इंप्लॉयर ने ऐसा करने पर ज़ोर दिया हो. हो सकता है आप बेहतर सर्विस या कम शुल्क चाहते हों. या फिर कोई दूसरी मजबूरी हो. लेकिन एक बात जो अक्सर लोग भूल जाते हैं, वह यह है कि EPFO ​​अभी भी आपका प्रोविडेंट फंड का पैसा आपके UAN से जुड़े बैंक अकाउंट में भेजता है. अगर वह अकाउंट बंद है या इनैक्टिव है तो आपका क्लेम वापस आ सकता है. और आपको इसका पता तभी चलेगा जब आप पैसे निकालने की कोशिश करेंगे. कुछ भी करने से पहले यह चेक कर लें सबसे पहले, EPFO ​​मेंबर ई-सर्विस पोर्टल पर लॉग इन करें और देखें कि वर्तमान में आपका UAN किस बैंक अकाउंट से जुड़ा है. कई लोग सोचते हैं कि नौकरी बदलने पर यह अपने आप अपडेट हो जाता है. ऐसा नहीं है. यह भी चेक कर लें कि आपका आधार वेरिफाई है या नहीं. अगर आधार, पैन और बैंक डिटेल पूरी तरह से मैच नहीं करते हैं – यहां तक ​​कि छोटी सी स्पेलिंग मिस्टेक भी – तो अपडेट अस्वीकार हो सकते हैं. अगर कुछ भी मैच नहीं करता है तो पहले उसे ठीक करें. अन्यथा, सिस्टम आगे नहीं बढ़ेगा. बैंक अकाउंट कैसे बदलें लॉग इन करने के बाद, “मैनेज” सेक्शन में जाएं और “केवाईसी” पर क्लिक करें. आपको वहां अपना बैंक अकाउंट दिखाई देगा. अपना नया अकाउंट नंबर और IFSC कोड ध्यान से डालें. नंबरों को दोबारा जांच लें – ज्यादातर गलतियां यहीं होती हैं. यदि आवश्यक हो, तो कैंसल किए गए चेक की एक स्पष्ट छवि अपलोड करें. सबमिट करने के बाद, रिक्वेस्ट सीधे आगे नहीं बढ़ता. यह अनुमोदन के लिए आपके इंप्लॉयर के पास जाता है. यही वह बात है जिसे लोग नहीं समझते. यदि एचआर इसे अनुमोदित नहीं करता है, तो कुछ भी नहीं बदलेगा. इसलिए यदि मामला अटक जाता है, तो अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा करने के बजाय सैलरी डिपार्टमेंट से संपर्क करें. यह क्यों जरूरी है यदि आप विड्रॉल क्लेम करते हैं और बैंक डिटेल गलत हैं, तो EPFO पेमेंट प्रोसेस्ड नहीं करेगा. क्लेम रिजेक्ट हो सकता है, और आपको फिर से शुरुआत करनी होगी. नौकरी छोड़ने के बाद या पीएफ एडवांस के लिए आवेदन करते समय पैसे निकालना तनावपूर्ण हो जाता है. जब कोई जल्दबाजी न हो, तो अकाउंट को अभी अपडेट करना कहीं अधिक आसान है. महत्वपूर्ण बात याद रखें आपके यूएएन के तहत एक समय में केवल एक ही बैंक अकाउंट सक्रिय हो सकता है. और नौकरी बदलने पर आपका यूएएन नहीं बदलता – यह आपके पूरे करियर में आपके साथ रहता है. इसलिए जब भी आपका सैलरी बैंक बदले, EPFO ​​को अपनी चेकलिस्ट में शामिल करें. यह पांच मिनट का काम है जो बाद में हफ्तों की परेशानी से बचाता है.

अंतरिक्ष में तबाही का संकेत? दानव तारे में हो सकता है विस्फोट, वैज्ञानिक सतर्क

ब्रह्मांड के सबसे बड़े ज्ञात तारों में से एक WOH G64 में वर्ष 2014 के बाद बड़ा परिवर्तन दर्ज किया गया है। नए शोध के अनुसार यह तारा अब अपने जीवन के अंतिम चरण में प्रवेश कर सकता है और भविष्य में महाविस्फोट (सुपरनोवा) की संभावना है। यह अध्ययन National Observatory of Athens के वैज्ञानिक गोंजालो मुन्योस-सांचेज के नेतृत्व में किया गया और प्रतिष्ठित जर्नल Nature Astronomy में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह तारा अपनी पारंपरिक लाल अतिविशाल अवस्था से निकलकर दुर्लभ पीली अतिविशाल अवस्था में पहुंच चुका है। आमतौर पर यह परिवर्तन तारे के जीवन के अंतिम चरण का संकेत माना जाता है। इस अवस्था के बाद तारा अक्सर महाविस्फोट के साथ समाप्त होता है।  कहां स्थित है यह तारा? WOH G64 की खोज 1970 के दशक में Large Magellanic Cloud में हुई थी, जो हमारी आकाशगंगा के पास स्थित एक बौनी आकाशगंगा है। यह तारा अत्यंत चमकीला और असाधारण रूप से विशाल है। इसका आकार सूर्य की त्रिज्या से लगभग 1,500 गुना अधिक आंका गया है। तुलना करें तो हमारा सूर्य लगभग 4.6 अरब वर्ष पुराना है, जबकि WOH G64 की आयु 50 लाख वर्ष से भी कम मानी जाती है यानी ब्रह्मांडीय पैमाने पर यह अभी “युवा” है। मिली चौंकाने वाली तस्वीर 2024 में अत्यंत शक्तिशाली दूरबीन इंटरफेरोमीटर की मदद से इसकी विस्तृत तस्वीर ली गई। इसमें तारे के चारों ओर धूल का घना आवरण दिखाई दिया, जिससे संकेत मिला कि यह तेजी से अपना द्रव्यमान खो रहा है। नए अध्ययन के मुताबिक 2014 में इसकी सतह का बड़ा हिस्सा बाहर निकल गया था। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह किसी सहचर तारे के साथ अंतःक्रिया के कारण हो सकता है। वर्णक्रमीय विश्लेषण से सहचर तारे की मौजूदगी के संकेत भी मिले हैं।  ‘सुपरविंड’ अवस्था की संभावना एक अन्य संभावना यह है कि यह तारा महाविस्फोट से पहले की ‘तीव्र पवन’ (सुपरविंड) अवस्था में प्रवेश कर चुका है, जिसमें आंतरिक कंपन के कारण बाहरी परतें तेज गति से अंतरिक्ष में फेंकी जाती हैं।इस प्रक्रिया में तारे की बाहरी परतें फैलती हैं, जबकि उसका केंद्र सिकुड़ता जाता है जो अंततः सुपरनोवा विस्फोट की ओर ले जा सकता है।   क्यों महत्वपूर्ण यह खोज ? आमतौर पर तारे करोड़ों या अरबों वर्षों तक स्थिर रहते हैं। किसी बाहरी आकाशगंगा में इतने स्पष्ट और तेज बदलाव का दर्ज होना अत्यंत दुर्लभ है। यदि आने वाले वर्षों में WOH G64 में महाविस्फोट होता है, तो यह खगोलीय दृष्टि से अद्भुत दृश्य होगा और वैज्ञानिकों को तारों के जीवन चक्र तथा सुपरनोवा प्रक्रिया को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी देगा।