samacharsecretary.com

ट्रंप का वर्चुअल वार! ग्रीनलैंड पर सोशल मीडिया से जताया अमेरिकी दावा, पड़ोसी देशों तक गया संदेश

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार (20 जनवरी) को सोशल मीडिया पर एक नया नक्शा साझा किया है, जिसमें कनाडा, वेनेजुएला और ग्रीनलैंड को अमेरिकी भू-भाग के हिस्से के रूप में दिखाया गया है। यह नक्शा उनके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर पोस्ट किया गया है। ये नक्शा कंप्यूटर या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार किया गया माना जा रहा है।   ट्रंप द्वारा शेयर किए गए इस नक्शे में अमेरिका का आकार काफी बड़ा दिखाया गया है। इसमें पड़ोसी देश कनाडा, दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला और डेनमार्क के अधीन ग्रीनलैंड को अमेरिकी क्षेत्र बताया गया है। इसके साथ ट्रंप ने एक और तस्वीर भी पोस्ट की, जिसमें वह उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस और अपने विदेश मंत्री मार्को रूबियो के साथ ग्रीनलैंड में अमेरिकी झंडा लगाते नजर आ रहे हैं। उस तस्वीर पर लिखा है- “Greenland US Territory Est 2026” यानी ग्रीनलैंड, अमेरिकी क्षेत्र – स्थापना- 2026 कनाडा को लेकर पुराना बयान बता दें कि पिछले साल जनवरी में दूसरी बार राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद ही ट्रंप ने कहा था कि कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाया जाना चाहिए। हालांकि, कनाडा सरकार ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच व्यापार को लेकर तनाव और टैरिफ विवाद बढ़ गया था।   वेनेजुएला पर पहली बार दावा इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी विशेष बलों ने वेनेजुएला में एक अभियान चलाया था, जिसके बाद वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर न्यूयॉर्क ले जाया गया। इसके बाद ट्रंप ने कहा कि अमेरिका वेनेजुएला को चलाएगा और वहां के तेल संसाधनों पर अमेरिकी कंपनियों का नियंत्रण होगा। हालांकि, यह पहली बार है जब ट्रंप ने खुले तौर पर वेनेजुएला को अमेरिकी क्षेत्र के रूप में दिखाया है। ट्रंप ग्रीनलैंड क्यों चाहते हैं? ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की “राष्ट्रीय सुरक्षा” के लिए जरूरी है, क्योंकि यह खनिज संसाधनों से भरपूर और रणनीतिक रूप से अहम इलाका है। जबकि अमेरिका पहले से ही वहां एक सैन्य अड्डा रखता है और डेनमार्क नाटो का सहयोगी देश है। हाल ही में ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्हें अब शांति स्थापना की जिम्मेदारी उनकी नहीं है और न ही यह सोचने की उनकी मजबूरी है। इसके साथ ही उन्होंने ग्रीनलैंड पर “पूरी तरह नियंत्रण” की बात कही थी। उन्होंने ग्रीनलैंड सौदे का विरोध करने वाले यूरोपीय देशों पर भारी टैक्स (टैरिफ) लगाने की चेतावनी भी दी है। ट्रंप कार्ड पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया ट्रंप के इस कदम से यूरोप और नाटो देशों में चिंता बढ़ गई है। कई देशों ने साफ किया है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और उस पर अमेरिका का कोई अधिकार नहीं बनता। विशेषज्ञों का कहना है कि यह नक्शा कोई आधिकारिक घोषणा नहीं है और न ही अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अमेरिका ने इन देशों को अपने अधीन किया है। इसे ट्रंप की राजनीतिक सोच और दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

गाजा प्लान पर ट्रंप को झटका, शक्तिशाली देश ने दिखाई ठेंगा, भारत किस राह पर?

वाशिंगटन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के गाजा बोर्ड ऑफ पीस प्लान की शुरुआत अच्छी नहीं रही। खबर है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमेनुएल मैक्रों ने इसमें शामिल होने से इनकार करने की तैयारी कर रहे हैं। दरअसल, ट्रंप के इस बोर्ड को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि फ्रांस के इस फैसले की वजह यह हो सकती है। इधर, स्थायी सदस्यता के लिए 1 बिलियन डॉलर फीस भी सवालों के घेरे में है।   ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में मामले के जानकारों के हवाले से बताया गया कि ट्रंप गुरुवार को दावोस में इसपर दस्तखत चाहते हैं। साथ ही उन्होंने फ्रांस की वाइन और शैंपेन पर 200 फीसदी टैरिफ लगाने की भी धमकी दे दी है। हालांकि, माना जा रहा है कि फ्रांस ने यह फैसला बोर्ड के UNSC के विकल्प या प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभरने के चलते उठाया है। इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। अब अगर मैक्रों की तरफ से न्योता अस्वीकार कर दिया जाता है, तो यह यूरोप के कई देशों के नेताओं के फैसले पर असर डाल सकता है। हालांकि, किसी भी नेता बोर्ड का खुलकर विरोध नहीं किया है। हालांकि, हंगरी एकमात्र ऐसा यूरोपीय देश है, जिसने ट्रंप का न्योता स्वीकार कर लिया है। अमेरिका ने पाकिस्तान, वियतनाम, जॉर्डन, ग्रीस, तुर्की, मिस्र समेत करीब 60 देशों बोर्ड में आने के लिए आमंत्रित किया है। फ्रांस को दे दी टैरिफ की धमकी ट्रंप ने कहा, 'खैर, कोई भी उन्हें नहीं चाहता, क्योंकि वह जल्द ही दफ्तर से बाहर होने वाले हैं।' उन्होंने कहा, 'मैं उनकी वाइन्स और शैंपेन पर 200 प्रतिशत टैरिफ लगाऊंगा और वह शामिल हो जाएंगे।' खास बात है कि 2027 में मैक्रों का दूसरा कार्यकाल खत्म हो रहा है। भारत का क्या प्लान भारत ने गाजा पर अंतरराष्ट्रीय शांति बोर्ड के गठन को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निमंत्रण पर अभी कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की है। हालांकि हिन्दुस्तान से बातचीत में सत्रों ने कहा कि इस पर विचार-विमर्श किया जा रहा है तथा अगले कुछ दिनों में फैसला ले लिया जाएगा। सूत्रों का कहना है कि निमंत्रण का अध्ययन किया जा रहा। अगले कुछ दिनों के भीतर इसमें शामिल होने या नहीं होने पर फैसला लिया जाएगा। ट्रंप ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया। यह निकाय, गाजा में स्थायी शांति लाने और ‘वैश्विक संघर्ष’ के समाधान के लिए ‘‘एक साहसिक नए दृष्टिकोण’’ पर काम करेगा। ट्रंप ने मोदी को एक पत्र लिखा, जिसे भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने सोशल मीडिया पर साझा किया।

अंडरकवर मिशन का किस्सा: पाकिस्तानी की पहचान पर अजीत डोभाल को मिली प्लास्टिक सर्जरी की सलाह

नई दिल्ली आज भारत के जेम्स बॉन्ड अजीत डोभाल का जन्मदिवस है। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल केवल रणनीति और खुफिया मामलों में माहिर नहीं हैं, उनके जीवन से जुड़े किस्से साहस, चतुराई और रोमांचक अनुभवों से भरी हुई हैं। ऐसे ही एक रोमांचक किस्सों में डोभाल ने एक बार कार्यक्रम में खुद खुलासा किया था कि पाकिस्तान में एक मजार के पास बैठे शख्स ने उनसे कहा था- मुझे पता है कि तुम हिंदू हो।   अजित डोभाल का जन्म 1945 में उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में एक गढ़वाली परिवार में हुआ था। उनके पिता भारतीय सेना के एक अधिकारी थे। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता हेमवती नन्दन बहुगुणा उनकी मां के चचेरे भाई थे। 1968 में केरल कैडर से आईपीएस बने डोभाल 2005 तक इंटेलिजेंस ब्यूरो के मुख्य के पद पर रहे। वे सक्रिय रूप से मिजोरम, पंजाब और कश्मीर में उग्रवाद विरोधी अभियानों में शामिल रहे हैं। पाकिस्तान में सात साल बिताए डोभाल खुद बता चुके हैं कि उन्होंने सात साल पाकिस्तान में बिताए, हालांकि उनके एक जमाने के बॉस और आईबी एवं रॉ के पूर्व प्रमुख एएस.दुलत का कहना है कि कि वह वहां भारतीय उच्चायोग में नियुक्त थे, अंडर कवर एजेंट के तौर पर नहीं। फिर भी उनके अनुभव कुछ ऐसे थे, जो किसी जासूसी कहानी से कम नहीं। एक बार विदर्भ मैनेजमेंट एसोसिएशन के एक समारोह में डोभाल ने पाकिस्तान में उनके साथ हुई एक घटना का जिक्र किया था। डोभाल बताते हैं कि लाहौर में औलिया की एक मजार थी, जहां बहुत से लोग आते थे। मैं एक मुस्लिम शख्स के साथ रहता था। एक दिन मैं उस मजार से गुजर रहा था और मैं भी वहां चला गया। कोने में एक शख्स बैठा था जिसकी लंबी सफेद दाढ़ी थी। उसने मुझसे सवाल किया, 'क्या तुम हिंदू हो?' मैंने जवाब दिया, नहीं।" प्लास्टिक सर्जरी करवा लो, वरना… इसके बाद डोभाल ने बताया कि वह शख्स उन्हें पीछे एक छोटे कमरे में ले गया, दरवाज़ा बंद किया और कहा कि देखो, तुम हिंदू हो, मुझे पता है। डोभाल ने पूछा कि यह कैसे संभव है, तो शख़्स ने कहा कि तुम्हारे कान छिदे हुए हैं। डोभाल ने मुस्कुराते हुए कहा कि हां, बचपन में उनके कान छेद गए थे, लेकिन वह कन्वर्ट हो गए थे। जवाब में शख्स ने कहा कि मुझे पता है कि तुम कंवर्ट नहीं हुए हो, तुन्हें प्लास्टिक सर्जरी करवा लेनी चाहिए, नहीं तो बाहर लोग शक कर सकते हैं। फिर डोभाल ने बताया कि जिस शख्स ने उन्हें पहचाना, उसने कहा कि क्योंकि मैं भी हिंदू हूं, इसलिए मुझे पता है। फिर उस शख़्स ने एक अलमारी खोली, जिसमें शिव और दुर्गा की मूर्तियां रखी थीं और कहा कि मैं इनकी पूजा करता हूं, लेकिन बाहर लोग मुझे एक मुस्लिम धार्मिक व्यक्ति के रूप में जानते हैं।

CM पुष्कर धामी से बैठक के बाद उठे राजनीतिक कदम, उत्तराखंड में क्यों महसूस हो रही हलचल

देहरादून उत्तराखंड में जल्द बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकता है। भाजपा नेताओं ने सीएम पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात के बाद दिल्ली में डेरा डाल दिया है। इस घटनाक्रम ने उत्तराखंड में धड़कनें फिर बढ़ा दी हैं। हालांकि भाजपा ने धामी से विधायकों के मिलने को शिष्टाचार भेंट बताया है, लेकिन बीते अगस्त से चल रही मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाओं को भी हवा मिल गई है। बताया गया है कि नेतागण नितिन नबीन की भाजपा अध्यक्ष पर ताजपोशी के लिए दिल्ली में हैं।   भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन को लेकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के साथ ही सरकार-संगठन के अधिकांश बड़े नेता दिल्ली में डेरा हैं। इस बीच, सोमवार को रायपुर विधायक उमेश शर्मा काऊ, सल्ट विधायक महेश जीना और पुरोला विधायक दुर्गेश्वर लाल ने बारी-बारी से मुख्यमंत्री से भेंट की। इन सभी ने सीएम के साथ विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। मुख्यमंत्री के सोशल मीडिया पेज पर इन मुलाकातों के फोटो अपलोड होते ही उत्तराखंड के सियासी माहौल में थोड़ी गरमी आ गई। मंत्रिमंडल विस्तार के संकेत सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री ने बीते अगस्त में मंत्रिमंडल विस्तार के संकेत दिए थे। उसके बाद ये मामला बार-बार अटकता रहा। माना जा रहा है कि अब मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर निर्णय ले सकते हैं। मालूम हो कि धामी मंत्रिमंडल में मंत्रियों की पांच सीट अरसे से खाली हैं। हालांकि तीन पद वर्ष 2022 से रिक्त रखे गए थे। पर बाद में चंदनराम दास के निधन और प्रेमचंद्र अग्रवाल के इस्तीफे की वजह से रिक्त पदों की संख्या पांच हो गई। नियमानुसार राज्य में मुख्यमंत्री समेत कैबिनेट में अधिकतम 12 सदस्य हो सकते हैं। नितिन नबीन की ताजपोशी के लिए दिल्ली में इकट्ठा हुए नेता उधर, उत्तराखंड भाजपा के बड़े नेता सोमवार को भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन की चयन प्रक्रिया में शामिल हुए हैं। इनमें मुख्यमंत्री धामी के साथ, प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट, केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा, प्रदेश के काबीना मंत्री सतपाल महाराज, हरिद्वार सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत, नैनीताल सांसद अजय भट्ट भी कार्यक्रम में मौजूद रहे। इनके साथ ही विधायक बंशीधर भगत, मदन कौशिक, बिशन सिंह चुफाल, पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल, विजय बहुगुणा, तीरथ सिंह रावत आदि शामिल हुए। मंत्रिमंडल विस्तार सीएम का विशेषाधिकार:खजानदास भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता और राजपुर विधायक खजानदास ने बताया कि वर्तमान में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समेत पार्टी की प्रदेश इकाई के तमाम बड़े नेता, संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन में भागीदारी के लिए दिल्ली में हैं। सोमवार को सभी का फोकस उसी पर रहा। रही बात मंत्रिमंडल विस्तार की तो यह मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। जब उन्हें उचित लगेगा, वो शीर्ष नेतृत्व के निर्देशानुसार उचित निर्णय लेंगे। खजानदास ने कहा, प्रदेश सरकार जनसेवा में समर्पित होकर काम कर रही है। उन्होंने दावा किया कि पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा राज्य में विजय की हैट्रिक लगाते हुए इतिहास रचेगी।

ताजपोशी मंच से PM मोदी का संदेश: नितिन नवीन के साथ राजनाथ सिंह और गडकरी को क्यों किया याद

नई दिल्ली भारतीय जनता पार्टी के नए अध्यक्ष नितिन नवीन की ताजपोशी हो चुकी है। मंगलवार को उन्हें औपचारिक रूप से अध्यक्ष चुना गया। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपना नया बॉस करार दिया। साथ ही उन्होंने पूर्व में अध्यक्ष रह चुके केंद्रीय मंत्री अमित शाह, नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, जगत प्रकाश नड्डा के कार्यकाल को भी याद किया। नवीन भाजपा के 12वें अध्यक्ष बने हैं।   पीएम मोदी ने मंगलवार को कहा, 'भाजपा एक संस्कार है। भाजपा एक परिवार है। हमारे यहां 'मेंबरशिप' से भी ज्यादा 'रिलेशनशिप' होती है। भाजपा एक ऐसी परंपरा है, जो पद से नहीं प्रक्रिया से चलती है। हमारे यहां पदभार एक व्यवस्था है और कार्यभार जीवन भर की जिम्मेदारी है। हमारे यहां अध्यक्ष बदलते हैं, लेकिन आदर्श नहीं बदलते। नेतृत्व बदलता है लेकिन दिशा नहीं बदलती।' उन्होंने दिवंगत पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर जेपी नड्डा तक के कार्यकाल का जिक्र किया। उन्होंने कहा, 'अटल जी, आडवाणी जी और मुरली मनोहर जोशी जी के नेतृत्व में भाजपा ने शून्य से लेकर शिखर तक का सफर देखा है।' उन्होंने कहा, 'इस सफर में वेंकैया नायडू जी और नितिन गडकरी जी सहित हमारे कई वरिष्ठ साथियों ने संगठन को विस्तार दिया।' राजनाथ सिंह के कार्यकाल में मिला पहला बहुमत PM मोदी ने कहा, 'राजनाथ जी के नेतृत्व में पहली बार भाजपा ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया। फिर अमित भाई के नेतृत्व में देश के कई राज्यों में भाजपा की सरकारें बनीं और लगातार दूसरी बार केंद्र में भाजपा की सरकार बनी।' उन्होंने कहा, 'फिर जेपी नड्डा जी के नेतृत्व में भाजपा पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक और सशक्त हुई और लगातार तीसरी बार केंद्र में भाजपा की सरकार बनी। मैं भाजपा के पूर्व के सभी अध्यक्षों का बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं।' नितिन नवीन बने नए बॉस नवीन ने नड्डा का स्थान औपचारिक रूप से ले लिया है। नवीन ने 14 दिसंबर को भाजपा का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद बिहार सरकार में कानून और न्याय, शहरी विकास और आवास मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। भाजपा के संगठनात्मक चुनावों के निर्वाचन अधिकारी के लक्ष्मण ने संगठनात्मक चुनावों के परिणाम घोषित किए और 45 वर्षीय नवीन को चुनाव प्रमाण पत्र सौंपा, जो पार्टी के शीर्ष पद पर आसीन होने वाले अब तक के सबसे युवा व्यक्ति हैं। इस मौके पर पीएम मोदी, गृहमंत्री शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, सड़क एवं परिवहन मंत्री गडकरी समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे।  

ब्रिटेन में तिलक लगाने पर 8 साल के हिन्दू छात्र को स्कूल छोड़ने को किया मजबूर

लंदन. ब्रिटेन की राजधानी लंदन से हाल ही में एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां एक प्राइमरी स्कूल में हिन्दू छात्र के साथ हुए भेदभाव के बाद उसे स्कूल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक 8 साल के हिन्दू छात्र को माथे पर तिलक लगाने की वजह से यह सबकुछ झेलना पड़ा है। ब्रिटिश हिंदू और भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले एक सामाजिक आंदोलन और एडवोकेसी संस्था इनसाइट यूके के मुताबिक मामला लंदन के विकर्स ग्रीन प्राइमरी स्कूल का है। एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक स्कूल के स्टाफ ने बच्चे से उसके धार्मिक रीति-रिवाज को समझाने और सही ठहराने के लिए कहा। इस व्यवहार को संगठन ने एक नाबालिग के लिए पूरी तरह से अनुचित बताया है। छात्र के माता-पिता ने अन्य हिंदू माता-पिता के साथ मिलकर, कथित तौर पर हेडटीचर और स्कूल के गवर्नरों को हिंदू रीति-रिवाजों के धार्मिक महत्व के बारे में समझाने की कोशिशें भी कीं लेकिन स्कूल ने इसे खारिज कर दिया। आरोप हैं कि स्कूल की हेडटीचर ने ब्रेक के समय भी बच्चे पर इस तरह से नजर रखी कि बच्चा डर गया, और दोस्तों से भी अलग थलग पड़ गया। यह आरोप भी लगाए गए हैं कि बच्चे को तिलक लगाने की वजह से स्कूल में कुछ पदों से भी हटा दिया। एडवोकेसी समूह ने बताया कि विकर्स ग्रीन प्राइमरी स्कूल में धार्मिक भेदभाव के कारण कम से कम चार बच्चों को स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है। INSIGHT UK के एक प्रवक्ता ने कहा, "किसी भी बच्चे को अपने धर्म के कारण निगरानी में, अलग-थलग या अकेला महसूस नहीं करना चाहिए, खासकर किसी अधिकारी द्वारा नहीं। ऐसे अनुभवों का लंबे समय तक भावनात्मक प्रभाव पड़ सकता है और सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल उठ सकते हैं।"

पत्नी को गुजारा भत्ता देने से बचने छोड़ दी 6 करोड़ की नौकरी

सिंगापुर. तलाक के बाद पत्नी को गुजारा भत्ता देने से बचने के लिए लोग नए-नए तरकीब निकालते रहते हैं। हाल ही में सिंगापुर के एक शख्स ने पत्नी को भरण-पोषण ना देना पड़े, इसके लिए एक ऐसा कदम उठा लिया, जिसे सुनकर अदालत भी दंग रह गई। यह मामला सिंगापुर की फैमिली कोर्ट से सामने आया है। यहां कोर्ट ने एक कनाडाई नागरिक को बड़ा झटका देते हुए उसकी अलग रह रही पत्नी और चार बच्चों को करीब 6.34 लाख सिंगापुर डॉलर का बकाया गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि कोई शख्स अच्छी सैलरी वाली नौकरी छोड़कर और देश छोड़कर अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से नहीं बच सकता। ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के मुताबिक अदालत ने माना कि व्यक्ति ने जानबूझकर अक्टूबर 2023 में सिंगापुर में अपनी एक अच्छी नौकरी छोड़ दी। ठीक उसी समय उसकी पत्नी ने विमेंस चार्टर के तहत मेंटेनेंस की अर्जी दी थी। कोर्ट ने कहा कि नौकरी छोड़ना उसे पत्नी और बच्चों की आर्थिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। पत्नी गृहिणी दोनों पति-पत्नी कनाडा के नागरिक हैं और दिसंबर 2013 में अपने चार बच्चों के साथ सिंगापुर आए थे। पति सिंगापुर में एक मल्टीनेशनल कंपनी के ऑफिस में सीनियर एग्जीक्यूटिव था और 2023 में उसकी सालाना आमदनी करीब 8.60 लाख सिंगापुर डॉलर यानी करीब 6 करोड़ रुपए थी। वहीं उसकी पत्नी गृहिणी थी और डिपेंडेंट पास पर रह रही थी। बच्चे इंटरनेशनल स्कूलों में पढ़ते थे। दोनों के रिश्ते में अगस्त 2023 में दरार आई, जब पति घर छोड़कर एक दूसरी महिला के साथ रहने लगा। अलग होने के बाद शुरुआत में पति ने हर महीने 20 हजार सिंगापुर डॉलर देने की पेशकश की थी, जिसमें किराया, स्कूल फीस और ट्रांसपोर्ट खर्च अलग थे। बाद में यह रकम घटाकर 11 हजार डॉलर कर दी गई। सितंबर 2023 में सपोर्ट और कम होने के बाद पत्नी ने 2 अक्टूबर 2023 को कोर्ट में गुजारा भत्ते की अर्जी दी और कहा कि पति ने सही आर्थिक मदद नहीं दी। नौकरी के साथ देश भी छोड़ा मेंटेनेंस की अर्जी दाखिल होने के कुछ ही दिनों बाद, 9 अक्टूबर 2023 को पति ने सिंगापुर की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद जनवरी 2024 में वह सिंगापुर छोड़कर कनाडा चला गया। कोर्ट की सुनवाई में शामिल ना होने पर उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया गया था। उसने दलील दी कि पत्नी ने उसके ऑफिस में बदनाम करने की कोशिश की, इसलिए उसे नौकरी छोड़नी पड़ी। लेकिन कोर्ट ने इस दावे को खारिज कर दिया और कहा कि उसकी नौकरी पर कोई खतरा नहीं था। कोर्ट ने क्या कहा? जज ने अपने आदेश में कहा कि मेंटेनेंस तय करते समय केवल मौजूदा कमाई नहीं, बल्कि व्यक्ति की कमाने की क्षमता देखी जाती है। अक्टूबर 2024 तक, जब तक उसे कनाडा में नई नौकरी नहीं मिली, उसकी कमाई की क्षमता सिंगापुर वाली सैलरी के आधार पर ही मानी जाएगी। इसके बाद आदेश दिया गया कि अक्टूबर 2024 से आगे बच्चों और परिवार के खर्च में दोनों माता-पिता बराबर योगदान देंगे।

भारतीय मूल का शख्स बोला- ‘पत्नी को मैंने मारा है, कोई कत्ल नहीं किया’

एडिलेड. ऑस्ट्रेलिया में पत्नी का कत्ल करने वाले भारतीय मूल के विक्रांत ठाकुर ने अदालत में अजीबोगरीब दावा किया है। उन्होंने एडिलेड मजिस्ट्रेट कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा कि मैंने ही अपनी पत्नी को मारा है, लेकिन यह कत्ल नहीं है। 42 साल के शख्स ने कहा कि मैं इस मामले में हत्या का दोषी नहीं हो सकता। विक्रांत ठाकुर को 14 जनवरी को इस मामले में दूसरी बार अदालत में पेश किया गया। उस पर बीते साल दिसंबर में अपनी पत्नी सुप्रिया ठाकुर के कत्ल का आरोप है। विक्रांत ठाकुर ने कहा कि मैंने अपनी पत्नी को मारा है, लेकिन यह कत्ल का मसला नहीं है। कहा जा रहा है कि उसने अपनी वकील की सलाह पर ऐसी दलील दी है। विक्रांत ठाकुर ने कहा कि यह मामला manslaughter यानी हत्या का है, लेकिन मर्डर का नहीं है। उसका कहना है कि मैनस्लॉटर की स्थिति वह होती है, जब गुस्से में या मौके पर उत्तेजना के चलते कोई घटना हो जाती है। वहीं मर्डर का मामला वह है, जब किसी की हत्या सोच-समझकर की जाए। इसलिए मेरे खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का केस चलना चाहिए। मर्डर का मामला मेरे ऊपर नहीं चलना चाहिए। माना जा रहा है कि विक्रांत ठाकुर ने ऐसी मांग इसलिए की है ताकि उसकी सजा कम हो सके। हत्या का मामला ज्यादा गंभीर है, जबकि गैर-इरादतन हत्या उससे कम श्रेणी वाला अपराध है। एडिलेड के उत्तरी इलाके में सुप्रिया ठाकुर को 21 दिसंबर को अचेत अवस्था में पाया गया था। इसके बाद पड़ोसियों ने पुलिस को बुलाया था। मौके पर पहुंची पुलिस ने सुप्रिया को सीपीआर देने की कोशिश की थी, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। पुलिस का कहना था कि वह पहले ही मर चुकी थी। इस केस की पहली सुनवाई 22 दिसंबर को हुई थी। विक्रांत ने बेल की अपील नहीं थी। इसके अलावा उसके वकीलों ने मांग की थी कि इस मामले में सबूतों को जुटाने, पोस्टर्माटम रिपोर्ट और डीएनए रिपोर्ट आने तक सुनवाई को 16 सप्ताह तक के लिए रोक लिया जाए। अब इस मामले की सुनवाई अप्रैल में की जाएगी। दोस्तों ने सुप्रिया के बेटे की मदद के लिए जुटाया फंड सुप्रिया के बेटे की मदद के लिए उसके दोस्तों और अन्य लोगों ने एक फंड भी तैयार किया है। उसके समर्थकों द्वारा चलाए जा रहे चैरिटी पेज GoFundMe में लिखा गया कि सुप्रिया ठाकुर एक अच्छी मां थीं। वह खूब मेहनत करती थीं ताकि उनके इकलौते बेटे का भविष्य बन सके। बेटे के लिए उसने सब कुछ किया। वह केयरिंग नेचर की थीं और सबकी चिंता करती थीं। वह कई बार लंबे वक्त तक काम करती रहती थीं और नर्स के पेशे में उनकी पहचान काफी अच्छी थी। इसलिए हम उसके बेटे के लिए एक फंड जुटा रहे हैं।

बढ़े टैरिफ के बीच नए साझेदारों की तलाश में पोलैंड

नई दिल्ली. पोलैंड के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री रादोस्लाव सिकोरस्की ने कहा है कि बढ़ते वैश्विक टैरिफ के चलते पोलैंड नए व्यापारिक साझेदारों की तलाश कर रहा है और इस दिशा में भारत ने सहयोग के लिए तत्परता दिखाई है। भारत दौरे के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने मुक्त और नियम-आधारित वैश्विक व्यापार की जरूरत पर जोर दिया। दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान सिकोरस्की ने कहा जब दुनिया के कुछ हिस्सों से हमें बढ़े हुए टैरिफ का सामना करना पड़ता है, तब हम नए व्यापारिक साझेदार तलाशते हैं। भारत ने हमारे साथ जुड़ने की इच्छा दिखाई है। हमें दुनिया को यह दिखाना होगा कि आज भी कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जो मुक्त व्यापार में विश्वास रखते हैं। बढ़ते टैरिफ और नए विकल्प गौरतलब है कि पिछले वर्ष अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच हुए एक व्यापार समझौते के तहत अधिकांश यूरोपीय संघ उत्पादों पर 15 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया गया था। पोलैंड, जो यूरोपीय संघ का सदस्य है, इस फैसले से प्रभावित हुआ है। ऐसे में भारत जैसे उभरते बाजार पोलैंड के लिए अहम साझेदार बनकर सामने आ रहे हैं। भारत-ईयू एफटीए को लेकर आशावाद सिकोरस्की ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच चल रही मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वार्ता को लेकर भी सकारात्मक रुख जताया। उन्होंने कहा कि भारत और ईयू के बीच सहयोग की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने बताया कि कुछ उद्योग संवेदनशील जरूर हैं, लेकिन भारत और यूरोपीय संघ के कृषि क्षेत्र काफी हद तक एक-दूसरे के अनुकूल हैं। यूरोपीय संघ एक स्थिर और पूर्वानुमानित सिंगल मार्केट है, जो व्यापार और निवेश के लिए आकर्षक बनाता है। पोलिश उप-प्रधानमंत्री ने उम्मीद जताई कि भारत-ईयू एफटीए वार्ता सफल निष्कर्ष तक पहुंचेगी, जिससे दोनों पक्षों को लाभ होगा। 27 जनवरी को हो सकता है बड़ा एलान सूत्रों के अनुसार, भारत-ईयू एफटीए को अंतिम रूप 27 जनवरी को होने वाले 16वें भारत-ईयू शिखर सम्मेलन के दौरान दिया जा सकता है। इस अवसर पर यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन भारत दौरे पर रहेंगी। इससे पहले सिकोरस्की ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की। बैठक में पड़ोसी क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों और वैश्विक हालात पर चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने सीमा पार आतंकवाद की कड़ी निंदा की। जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता होनी चाहिए और किसी भी तरह के आतंकी ढांचे को समर्थन नहीं मिलना चाहिए। इस पर सहमति जताते हुए सिकोरस्की ने कहा कि पोलैंड भी हाल ही में आतंकवादी गतिविधियों का शिकार हुआ है, जब एक चलती ट्रेन के नीचे रेलवे लाइन उड़ाने की कोशिश की गई।

डोनाल्ड ट्रंप के नारे की टोपियां लगाकर ग्रीनलैंड में मजाक बना रहे लोग

कोपेनहेगन. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड से जुड़े बयानों और दावों पर जमकर मजाक उड़ाया जा रहा है। ग्रीनलैंड और डेनमार्क में लोग ट्रंप के प्रसिद्ध MAGA नारे का मजाक उड़ाते हुए लाल रंग की बेसबॉल टोपियां पहन रहे हैं, जिन पर लिखा है। इन टोपियों पर लिखा है- अमेरिका यहां से चले जाओ। यह टोपियां अब विरोध का प्रमुख प्रतीक बन गई हैं, खासकर पिछले कुछ दिनों में कई बड़े प्रदर्शनों हुए हैं। क्या है पूरा मामला? डोनाल्ड ट्रंप का प्रसिद्ध चुनावी नारा 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' (MAGA) पूरी दुनिया में मशहूर है, जिसे वे अपनी लाल टोपी पर लिखकर पहनते हैं। ग्रीनलैंड के प्रदर्शनकारियों ने इसी स्टाइल को कॉपी करते हुए ट्रंप पर तंज कसा है। वहां के लोग अब वैसी ही लाल टोपियां पहन रहे हैं, लेकिन उन पर 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' की जगह 'मेक अमेरिका गो अवे' लिखा हुआ है। हिंदी में इसका अर्थ है- अमेरिका यहां से दूर रहे या अमेरिका वापस जाओ। कुछ टोपियों में ग्रीनलैंड की राजधानी Nuuk पर खेलते हुए लिखा है- Nu det NUUK, जिसका मतलब- अब बहुत हो गया। इन पर ग्रीनलैंड का झंडा भी छपा होता है। टोपियों का स्टॉक खत्म हो गया ये टोपियां कोपेनहेगन के एक विंटेज कपड़ों की दुकान के मालिक जेस्पर राबे टोननेसेन ने बनाईं। पिछले साल ये ज्यादा नहीं चलीं, लेकिन ट्रंप की हालिया धमकियों के बाद इनकी मांग इतनी बढ़ गई कि स्टॉक खत्म हो गया और दुकान को सैकड़ों नई छपवानी पड़ीं। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि ये टोपियां अब चैरिटी के लिए बेची जा रही हैं, और अमेरिका से ही सबसे ज्यादा खरीदारी हो रही है। कोपेनहेगन निवासी एक प्रदर्शनकारी लार्स हरमनसेन ने कहा- मैं ग्रीनलैंड का समर्थन करना चाहता हूं और दिखाना चाहता हूं कि मुझे अमेरिका के राष्ट्रपति पसंद नहीं। ये टोपियां सोशल मीडिया पर वायरल हो गई हैं। X पर कई पोस्ट में लोग इसे ट्रंप के खिलाफ मजाकिया लेकिन तीखा तंज बता रहे हैं। ग्रीनलैंड और डेनमार्क के लोग साफ कह रहे हैं- हम अमेरिकी नहीं हैं और कभी नहीं होंगे। विरोध का कारण यह विरोध तब तेज हुआ जब डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दोबारा संकेत दिया कि वे दुनिया के सबसे बड़े द्वीप 'ग्रीनलैंड' को खरीदने में रुचि रखते हैं। ग्रीनलैंड डेनमार्क देश का एक स्वायत्त क्षेत्र है। साल 2019 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने का विचार रखा था, जिसे डेनमार्क की सरकार ने बेतुका बताकर खारिज कर दिया था। उस समय ट्रंप ने इसे एक बड़े रियल एस्टेट सौदे की तरह बताया था। अमेरिका ग्रीनलैंड में इसलिए दिलचस्पी रखता है क्योंकि यह आर्कटिक क्षेत्र में है और यहां दुर्लभ खनिज का भंडार है, जो चीन के प्रभुत्व को कम करने के लिए अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण हैं। टोपियों के जरिए दिया कड़ा संदेश ग्रीनलैंड के लोगों का कहना है कि उनका देश कोई बिकाऊ जमीन का टुकड़ा नहीं है। वे अपनी स्वायत्तता और पहचान के साथ खुश हैं। इन लाल टोपियों के जरिए वे ट्रंप को यह संदेश दे रहे हैं कि उनकी डॉलर की ताकत यहां नहीं चलेगी।