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घर की ये 8 जगहें टॉयलेट से भी ज्यादा गंदी होती हैं, सफाई ना करने से बढ़ सकते हैं बीमारियों के खतरे

 नई दिल्ली सभी लोग अपने घरों की खूब साफ-सफाई करते हैं. लेकिन सफाई सिर्फ सुंदरता के लिए नहीं होती, बल्कि घर साफ होने या ना होने आपकी सेहत से भी सीधा जुड़ा होता है. आपके घरों में रोज झाड़ू-पोछा किया जाता है, फर्श चमकाया जाता है, फिर भी कई बार घर में बदबू महसूस होती है. कई बार घर के लोगों में इंफेक्शन फैल जाता है और वो बीमारी पड़ जाते हैं. इसकी बड़ी वजह है घर की कुछ ऐसी जगहें जो रोज इस्तेमाल होती हैं, जिन्हें साफ करना आप लोग अक्सर भूल जाते हैं. ये जगहें गंदी इसलिए नहीं होतीं क्योंकि आप सफाई नहीं करते, बल्कि इसलिए क्योंकि यहां सबसे ज्यादा हाथ लगते हैं. ऐसे में इन्हें हर रोज साफ करने की जरूरत होती है. आइए जानते हैं घर की उन 8 सबसे गंदी जगहों के बारे में, जिन्हें रोज साफ करना बेहद जरूरी है. 1. किचन सिंक और नल के हैंडल किचन सिंक में लगातार बर्तन धुलते हैं, जिसकी वजह से अक्सर लोग सोचते हैं कि ये तो पानी से धुलता रहता है इसलिए ये साफ ही होगा. लेकिन सच्चाई ये है कि किचन सिंक घर की सबसे गंदी जगहों में से एक होता है. कई रिसर्च के मुताबिक, इसमें टॉयलेट सीट से भी ज्यादा बैक्टीरिया होते हैं. क्यों जरूरी है सफाई: कच्ची सब्जी हो, मीट हो या फिर नमी..ये सभी बैक्टीरिया को बढ़ने का मौका देते हैं. रोज सफाई से बदबू और इंफेक्शन से बचा जा सकता है. ऐसे में गर्म पानी और डिसइंफेक्टेंट से सिंक और नल जरूर साफ करें. 2. चॉपिंग बोर्ड चॉपिंग बोर्ड, बाजारों में लकड़ी और प्लास्टिक दोनों तरह के मौजूद होते हैं. इन पर रोज सब्जी, फल से लेकर नॉन-वेज भी काटा जाता है. इसमें छोटे-छोटे कट्स बन जाते हैं, जिनमें खाना फंस जाता है और बैक्टीरिया पनपने लगते हैं. क्यों जरूरी है सफाई: रोज सफाई से फूड पॉइजनिंग का खतरा कम होता है और बदबू नहीं आती. हर बार इस्तेमाल के बाद गर्म पानी और साबुन से धोएं. अगर आप इस पर कुछ नॉन-वेज चॉप कर रहे हैं तो इसे नींबू या सिरके के पानी से साफ करें. 3. मोबाइल फोन और रिमोट  मोबाइल फोन, टीवी या एसी के रिमोट दिनभर आपके हाथ में रहते हैं. आप इन्हें खाते समय, बाहर से आकर और कभी-कभी बिना हाथ धोए भी छूते हैं. रिसर्च के अनुसार मोबाइल फोन पर टॉयलेट सीट से ज्यादा कीटाणु हो सकते हैं. क्यों जरूरी है सफाई: अगर आप इन्हें रोज पोंछते हैं तो हाथों से चेहरे तक पहुंचने वाले कीटाणु कम होते हैं. ऐसे में इन्हें माइक्रोफाइबर कपड़े और 70% अल्कोहल से हल्के हाथों से रोज साफ करना चाहिए. 4. किचन स्पॉन्ज और डिशक्लॉथ बर्तन धोने वाला स्पॉन्ज और कपड़ा बहुत ज्यादा गंदे होते हैं. ये हमेशा गीले रहते हैं और इनमें खाने के कण फंस जाते हैं. क्यों जरूरी है सफाई: इन्हें जब आप रोज साफ करते हैं तो इनमें बदबू नहीं आती और बैक्टीरिया भी नहीं बढ़ते हैं. इन्हें गर्म पानी और डिटर्जेंट में उबालें. स्पॉन्ज हफ्ते में बदलें और डिशक्लॉथ रोज धोएं. 5. बाथरूम के नल और हैंडल जब बाथरूम की बात आती है तो सबसे पहले दिमाग में पानी का नाम आता है. बाथरूम में नमी ज्यादा होती है, जिससे बैक्टीरिया और फंगस जल्दी बढ़ते हैं. नल, हैंडल और साबुन डिस्पेंसर बार-बार छुए जाते हैं, जिससे इंफेक्शन फैलने का खतरा रहता है. क्यों जरूरी है सफाई: अगर आप उन्हें रोज पोंछते हैं तो उससे कीटाणु फैलने से रुकते हैं और फंगस नहीं जमता. दिन के आखिर में डिसइंफेक्टेंट वाइप से साफ करें. 6. टॉयलेट फ्लश हैंडल टॉयलेट फ्लश हैंडल भी कीटोणुओं का घर होता है. वो बहुत ज्यादा गंदा होता है, क्योंकि इसे हाथ धोने से पहले छुआ जाता है. क्यों जरूरी है सफाई: रोज सैनिटाइज करने से खतरनाक बैक्टीरिया खत्म होते हैं. इसे डिसइंफेक्टेंट स्प्रे या वाइप से रोज साफ करें. बाथरूम के दरवाजों के हैंडल भी जरूर साफ करें. 7. पालतू जानवरों के खाने के बर्तन अगर आपके घर में पेट डॉग या और कोई पेट है तो उनके खाने के बर्तन भी जरूर होंगे. जानवरों के खाने और पानी के बर्तनों में लार और खाना जमा हो जाता है, जिससे बैक्टीरिया पनपते हैं. ऐसे में वो बीमारी की वजह बन सकते हैं. क्यों जरूरी है सफाई: रोज पालतू जानवरों के बर्तन धोने से ना केवल उनकी सेहत अच्छी रहती है, बल्कि आपकी भी. उनमें बदबू भी नहीं आती है. हर बार खाने के बाद गर्म पानी और साबुन से बर्तन धोएं और आसपास की जगह भी साफ रखें. 8. लाइट स्विच लाइट स्विच ऐसी चीज है जिसे हर कोई छूता है, लेकिन साफ करने का ध्यान कम ही आता है. क्यों जरूरी है सफाई: जब आप इन्हें रोज साफ करते हैं, पोंछते हैं तो उससे वायरस और बैक्टीरिया फैलने से रुकते हैं. डिसइंफेक्टेंट वाइप से लाइट स्विच और दरवाजों के हैंडल साफ करें.

एक किडनी से जीने वाले लोग: इस गांव की चौंकाने वाली सच्चाई जानें

नई दिल्ली क्या आपने कभी किसी ऐसे गांव के बारे में सुना है, जहां अधिकांश लोग सिर्फ एक ही किडनी के सहारे अपनी जिंदगी बसर कर रहे हों? सुनने में यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन भारत के पड़ोस में एक ऐसा ही गांव मौजूद है। आइए जानते हैं इस अनोखे गांव के बारे में। एक किडनी वाला गांव कहां है? हम बात कर रहे हैं होक्से (Hokse Village) की, जिसे लोग किडनी वैली (Kidney Valley) के नाम से भी जानते हैं। यह गांव नेपाल में स्थित है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस गांव में रहने वाले अधिकांश लोगों के पास केवल एक किडनी है और उसी के सहारे वे अपना जीवन चला रहे हैं। इस वजह से उन्हें कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन मजबूरी और गरीबी ने इस स्थिति को जन्म दिया है।   आखिर एक ही किडनी क्यों? शुरुआत में ऐसा लग सकता है कि लोग जन्म से ही एक किडनी के साथ पैदा होते हैं, लेकिन सच कुछ और है। इस गांव में गरीबी बहुत ज्यादा है। लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए मजबूर होकर अपनी किडनी बेच देते हैं। किडनी बेचने से जो पैसा मिलता है, उससे परिवार का भरण-पोषण किया जाता है।   इलाके में अंगों की तस्करी मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस गांव और आसपास के इलाकों में अंगों की तस्करी करने वाले गिरोह सक्रिय हैं। गरीब और भोले-भाले लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर, उन्हें झूठे वादों और लालच में फंसाया जाता है। कई लोगों को यह भरोसा दिलाया जाता है कि एक किडनी निकलवाने के बाद दूसरी खुद बनने लगेगी, जो पूरी तरह गलत और जानलेवा होता है। इस तरह, यह गांव एक दर्दनाक लेकिन सचेत करने वाली कहानी का प्रतीक बन गया है, जहां गरीबी और अवैध अंग व्यापार ने लोगों की जिंदगी को खतरे में डाल दिया है।  

केंद्रीय बजट को लेकर किरेन रिजिजू का बयान, कहा– भविष्य की जरूरतों का रखा जाएगा ध्यान

मुंबई बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) समेत महाराष्ट्र के दूसरे नगर निगमों में भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति ने शानदार कामयाबी हासिल की है। इस जीत पर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन मजबूती के साथ काम कर रही है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने मीडिया से बात करते हुए कहा, "महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना की जीत प्रधानमंत्री मोदी और राज्य में देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई है। अब अजित पवार के भी शामिल होने से इस गठबंधन को लोगों ने खूब पसंद किया है।” बता दें कि महाराष्ट्र में बीएमसी समेत 29 नगर निगमों के चुनाव परिणामों में भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने जीत हासिल की है। अगर सिर्फ बीएमसी चुनाव की बात करें तो यहां कुल 227 सीटें हैं। महायुति (भाजपा और शिंदे गुट) ने कुल 118 सीटें जीती हैं, जो बीएमसी में बहुमत के आंकड़े से चार सीटें ज्यादा हैं। शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट और एमएनएस का गठबंधन बुरी तरह पिछड़ गया। उन्होंने केंद्रीय बजट 2026 पर कहा, "संसद सत्र 28 जनवरी से शुरू होगा और बजट 1 फरवरी को पेश किया जाएगा। पीएम मोदी के नेतृत्व में हर बजट खास होता है, जो समाज, देश और उसके भविष्य का ख्याल रखता है। किसी भी तरह के सरकारी काम में कोई कमी नहीं है। हर फैसला सोच-समझकर लिया जाता है और लागू किया जाता है।” किरेन रिजिजू ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं तब से सरकार हर फैसला सोच समझकर लेती है। इसमें कोई दो राय नहीं है। चाहे आप बजट देखें या कोई योजना देखें, हर चीज पर सरकार सोच समझकर फैसला लेती है। हालांकि, उन्होंने पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया पर कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा कि अभी हम इस पर कुछ नहीं बोलना चाहते हैं। समय आने दीजिए, तब इसका जवाब दिया जाएगा।

रेलवे सुरक्षा में हाईटेक कदम: स्टेशन पर निगरानी करेगा रोबोट ‘ASC अर्जुन’

नई दिल्ली भारतीय रेलवे में अपनी तरह की पहली पहल के तहत विशाखापत्तनम रेलवे स्टेशन पर एक मानवरूपी रोबोट ‘ASC अर्जुन’ को पेश किया है। पूर्वी तट रेलवे (ECR) जोन के वाल्टेयर मंडल ने यात्रियों की सुरक्षा, संरक्षा और सेवा वितरण को बेहतर बनाने के लिए यह कदम उठाया है। रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के तहत में रोबोट को तैनात किया गया है, जो इसके आधुनिकीकरण और डिजिटल परिवर्तन अभियान का हिस्सा है। इसका उद्देश्य सुरक्षा संचालन को मजबूत करना और यात्रियों की सहायता में सुधार करना है।   आरपीएफ के महानिरीक्षक (IG) आलोक बोहरा ने इस पहल की जानकारी दी। उन्होंने बताया, 'पूर्व तट रेलवे जोन के वाल्टेयर डिवीजन ने यात्रियों की सुरक्षा, संरक्षा और सेवा को मजबूत करने के लिए विशाखापत्तनम रेलवे स्टेशन पर ‘एएससी अर्जुन’ नामक एक मानवरूपी रोबोट तैनात किया है।' मंडल रेलवे प्रबंधक (DRM) ललित बोहरा ने कहा कि रोबोट उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IOT) कनेक्टिविटी और वास्तविक समय की निगरानी क्षमताओं से लैस है, जिससे यह आरपीएफ कर्मियों और यात्रियों दोनों के लिए एक स्मार्ट सहायक के रूप में कार्य कर सकता है। रोबोट किस तरह से सुरक्षा में करेगा सहयोग विज्ञप्ति में कहा गया कि एएससी अर्जुन को सुरक्षा निगरानी, ​​भीड़ प्रबंधन, स्वच्छता निगरानी और सुरक्षा जागरूकता में सहयोग करेगा। साथ ही, इसे मानव संसाधन के बोझ को कम करने और प्रतिक्रिया समय में सुधार करने के लिए डिजाइन किया गया है। अधिकारियों ने कहा कि मानवरूपी रोबोट को स्वदेशी नवाचार के माध्यम से पूरी तरह से विशाखापत्तनम में डिजाइन और विकसित किया गया है। इसके लिए आरपीएफ टीम ने सीनियर रेलवे और सुरक्षा अधिकारियों के मार्गदर्शन में एक वर्ष से अधिक समय तक काम किया है।

कंपकंपाती ठंड से बचें, इन गर्म और खूबसूरत जगहों पर जनवरी-फरवरी में करें ट्रिप

नई दिल्ली जनवरी और फरवरी का महीना आते ही भारत के कई हिस्सों में ठंड अपने चरम पर पहुंच जाती है। घना कोहरा, तेज सर्द हवाएं और गिरता तापमान लोगों की दिनचर्या को प्रभावित करने लगता है। ऐसे में बहुत से लोग ठंड से बचने के लिए ऐसी जगहों की तलाश करते हैं, जहां मौसम आरामदायक हो और बिना भारी कपड़ों के घूमने का मजा लिया जा सके। भारत में कुछ डेस्टिनेशन ऐसे भी हैं, जहां सर्दियों के मौसम में भी हल्की गर्माहट बनी रहती है और तापमान सामान्य रूप से 25 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। समुद्र और धूप का बेहतरीन मेल – गोवा सर्दियों के मौसम में गोवा का नाम सबसे पहले सामने आता है। जनवरी और फरवरी में यहां का मौसम न ज्यादा ठंडा होता है और न ही बहुत गर्म। समुद्र के किनारे बैठकर धूप सेंकना, बीच वॉक और शाम के समय सुहावनी हवा का आनंद लेना लोगों को खासा पसंद आता है। यही वजह है कि इस समय गोवा में पर्यटकों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। शहर की रफ्तार में भी गर्माहट – मुंबई मुंबई उन शहरों में शामिल है, जहां ठंड का असर बेहद कम देखने को मिलता है। जनवरी-फरवरी में भी यहां हल्की गर्मी बनी रहती है और स्वेटर या जैकेट की जरूरत नहीं पड़ती। मरीन ड्राइव और जुहू बीच जैसी जगहों पर बैठकर समुद्र की ठंडी लेकिन सुकून देने वाली हवा का आनंद लिया जा सकता है। इसके साथ ही शॉपिंग और स्ट्रीट फूड का अनुभव इस ट्रिप को और खास बना देता है। शांत माहौल और फ्रेंच टच – पुडुचेरी दक्षिण भारत का पुडुचेरी सर्दियों में भी बेहद आरामदायक मौसम के लिए जाना जाता है। जनवरी से फरवरी के बीच यहां का तापमान संतुलित रहता है, जिससे दिनभर घूमना आसान हो जाता है। समुद्री इलाका होने के कारण सुबह और शाम हल्की नमी रहती है, लेकिन कुल मिलाकर मौसम सुकून भरा बना रहता है। शांत सड़कें और समुद्र तट इसे रिलैक्सिंग डेस्टिनेशन बनाते हैं। नीला समंदर और सुकून – लक्षद्वीप अगर आप भीड़-भाड़ से दूर किसी शांत और गर्म जगह की तलाश में हैं, तो लक्षद्वीप एक बेहतरीन विकल्प है। सर्दियों के मौसम में यहां का पानी साफ और मौसम हल्का गर्म रहता है। द्वीपों की प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण इसे जनवरी-फरवरी की ट्रिप के लिए खास बनाता है। परिवार के साथ या सुकून भरी छुट्टियों के लिए यह जगह लोगों को खासा आकर्षित करती है। बीच, एडवेंचर और सादगी – गोकर्ण कर्नाटक का गोकर्ण भी सर्दियों में गर्म रहने वाले डेस्टिनेशन में शामिल है। यहां का मौसम घूमने के लिए अनुकूल रहता है और हल्की गर्माहट बनी रहती है। समुद्र तटों पर समय बिताने के साथ-साथ यहां एडवेंचर एक्टिविटीज और स्थानीय खानपान का अनुभव भी लिया जा सकता है। यह जगह उन लोगों के लिए खास है, जो शांति और प्राकृतिक सौंदर्य दोनों का आनंद लेना चाहते हैं।

बजट 2026 में स्वास्थ्य क्षेत्र को बड़ा फायदा? छोटे शहरों में बेहतर सेवाओं की संभावना

नई दिल्ली:  वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार एक फरवरी को संसद में केंद्रीय बजट 2026-27 पेश करने वाली हैं. इस बार स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के विशेषज्ञों को उम्मीद है कि सरकार दूरदराज के इलाकों और गांवों में बेहतर इलाज की सुविधाओं पर खास ध्यान देगी. विशेषज्ञों का मानना है कि बजट में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और नई तकनीक को बढ़ावा देने वाले फैसलों से आम आदमी के लिए अच्छा इलाज पाना और भी आसान हो जाएगा. नोएडा स्थित प्रकाश अस्पताल के कार्यकारी निदेशक आयुष चौहान ने शुक्रवार को से कहा, "अस्पतालों की कमी, डॉक्टरों और स्टाफ की किल्लत और बीमारियों की सही जांच न हो पाने की वजह से आज भी बहुत से लोगों को अच्छा इलाज नहीं मिल पाता. अगर हम अपने जिला अस्पतालों और गांव-कस्बों के छोटे स्वास्थ्य केंद्रों को बेहतर बनाएं, मोबाइल वैन और फोन पर डॉक्टरी सलाह (टेलीमेडिसिन) की सुविधा बढ़ाएं, तो बड़े शहरों के बड़े अस्पतालों में लगने वाली भीड़ कम होगी और आम लोगों को आसानी से इलाज मिल सकेगा." स्वास्थ्य सेवा केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं भारत की स्वास्थ्य प्राथमिकताओं में क्षमता निर्माण से लेकर दीर्घकालिक प्रणाली मजबूती की ओर बदलाव की उम्मीद करते हुए, चौहान ने कहा, "इस समय, जोर धीरे-धीरे होने वाले खर्च के बजाय परिणामों पर आधारित निवेश पर होना चाहिए, जो सेवा वितरण में सुधार कर सके, बुनियादी ढांचे को मजबूत कर सके और बड़े या छोटे स्तर पर तकनीक को जोड़ सके. आज के दौर में, स्वास्थ्य सेवा केवल एक सामाजिक कर्तव्य नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक आर्थिक आवश्यकता भी है जो रोजगार, उत्पादकता और राष्ट्रीय विकास से बहुत गहराई से जुड़ी हुई है." उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त बजट आवंटित किया जाना चाहिए. क्योंकि स्वास्थ्य क्षेत्र को दी जाने वाली कुल राशि को बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है. खासकर इसलिए क्योंकि भारत अभी भी अन्य देशों की तुलना में अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का बहुत छोटा हिस्सा स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करता है. स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा' (NHA) के अनुमान के अनुसार, हाल के वर्षों में भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च इसके जीडीपी के लगभग 1.8 से 2.0 प्रतिशत के आसपास ही बना हुआ है. चौहान ने कहा- "सरकारी अस्पतालों को आधुनिक बनाया जाना चाहिए, बीमा (इंश्योरेंस) के दायरे को बढ़ाया जाना चाहिए. टियर II और टियर III शहरों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और घरेलू स्तर पर चिकित्सा उपकरणों के निर्माण को भी समर्थन दिया जाना चाहिए." उन्होंने कहा कि इलाज की बढ़ती लागत, गुणवत्ता के अलग-अलग मानक, योग्य कर्मियों की कमी और बिखरा हुआ बुनियादी ढांचा जैसी कई चुनौतियां, मुख्य समस्याएं हैं. उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए नीतिगत स्थिरता, नियामक स्पष्टता, कौशल विकास और सार्वजनिक-निजी सहयोग में वृद्धि आवश्यक होगी. एक भविष्योन्मुखी बजट देश की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को अधिक सुलभ, निष्पक्ष और भविष्य के लिए तैयार बनाने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है. 2025-26 के स्वास्थ्य बजट में वृद्धि साल 2025-26 के लिए, स्वास्थ्य मंत्रालय को 99,859 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. यह 2024-25 के संशोधित अनुमानों से 11 प्रतिशत अधिक है. 2025-26 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग को मंत्रालय के कुल बजट का 96 प्रतिशत हिस्सा दिया गया है. विभाग का यह आवंटन 2024-25 के अनुमानित खर्च से 11 प्रतिशत ज्यादा है. स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग को 3,901 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो 2024-25 के इसके अनुमानित खर्च से 15 प्रतिशत अधिक है. एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (AiMed) के निदेशक राजीव नाथ के अनुसार, चिकित्सा उपकरण (मेडिकल डिवाइस) क्षेत्र आगामी केंद्रीय बजट को नीतिगत इरादों को ज़मीनी प्रभाव में बदलने के एक निर्णायक अवसर के रूप में देखता है. नाथ ने कहा, "जबकि 2025 में चिकित्सा उपकरण नीति 2023 के इर्द-गिर्द रचनात्मक जुड़ाव देखा गया, अब ध्यान निरंतर निष्पादन पर होना चाहिए. मुख्य अपेक्षाओं में अंशांकित टैरिफ सुधार और लंबे समय से चली आ रही आयात विषमताओं को दूर करने तथा घरेलू विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) का समर्थन करने के लिए मौजूदा 7.5 प्रतिशत से सीमा शुल्क को बढ़ाकर 10-15 प्रतिशत करना शामिल है." नाथ के अनुसार, बजट को गुणवत्ता और मूल्य-आधारित सार्वजनिक खरीद को भी मजबूत करना चाहिए, जिसमें 'आईसीएमईडी' (ICMED) प्रमाणित उपकरणों को प्राथमिकता दी जाए और घरेलू मूल्यवर्धन (डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन) को बढ़ावा दिया जाए. उन्होंने कहा, "ऐसे उपाय जो नियामक पूर्वानुमान (रेगुलेटरी प्रेडिक्टेबिलिटी) को मजबूत करें, एमएसएमई (MSME) की भागीदारी को प्रोत्साहित करें और नवाचार (इनोवेशन) का समर्थन करें, एक लचीला मेडटेक (MedTech) इकोसिस्टम बनाने के लिए महत्वपूर्ण होंगे. यह एक ऐसा तंत्र होगा जो सामर्थ्य, विश्वास और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रदान करेगा." स्वास्थ्य सेवा के लिए चिकित्सा उपकरण अनिवार्य नाथ ने कहा कि चिकित्सा उपकरण स्वास्थ्य सेवा वितरण के लिए अनिवार्य हैं, विशेष रूप से प्राथमिक और माध्यमिक देखभाल स्तरों पर, जहां जांच (डायग्नोस्टिक्स), निगरानी और आवश्यक उपकरण परिणामों में काफी सुधार कर सकते हैं. उन्होंने कहा-"पहुंच बढ़ाने के लिए न केवल बुनियादी ढांचे में निवेश की आवश्यकता है, बल्कि ऐसे नीतिगत ढांचे की भी जरूरत है जो सभी भौगोलिक क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण उपकरणों की किफायती उपलब्धता सुनिश्चित करें." उन्होंने कहा कि सार्वजनिक खरीद के माध्यम से घरेलू स्तर पर निर्मित और आईसीएमईडी (ICMED) प्रमाणित, किफायती चिकित्सा उपकरणों को बढ़ावा देने से आयात पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ क्षेत्रीय अंतर को पाटने में मदद मिल सकती है. नाथ ने कहा, "इसके अतिरिक्त, पारदर्शी लेबलिंग नियम जो घरेलू सामग्री का खुलासा करते हैं और स्थानीय मूल्यवर्धन (लोकल वैल्यू एडिशन) को प्रोत्साहित करते हैं, वे भरोसे और स्वीकार्यता को बढ़ा सकते हैं. देश भर में स्वास्थ्य सेवा को सुलभ, निष्पक्ष और टिकाऊ बनाने के लिए एक मजबूत घरेलू मेडटेक (MedTech) आधार होना अनिवार्य है." कई चुनौतियों का सामना कर रहा स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट आवंटन में अगले 5 वर्षों तक हर साल कम से कम 30 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वृद्धि (compounded increase) करना आवश्यक और सामयिक दोनों है. नाथ ने कहा, "जैसे-जैसे स्वास्थ्य सेवा की मांग बढ़ रही है और प्रणाली विकसित हो रही है, बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, तकनीक को अपनाने और सेवा वितरण में सुधार के लिए निरंतर सार्वजनिक निवेश आवश्यक है. बजट का बढ़ा हुआ आवंटन रणनीतिक रूप से स्वास्थ्य सुविधाओं … Read more

भारत में इंसानों की लंबाई क्यों घट रही है? डॉक्टर्स ने खुलासा किया, छोटे होते भारतीय बच्चे

नई दिल्ली  दुनिया जहां लंबी और बेहतर कद-काठी की ओर बढ़ रही है, वहीं भारत अपने 'रिवर्स गियर' में नजर आ रहा है. आमतौर पर जैसे-जैसे किसी देश की अर्थव्यवस्था बढ़ती है और हेल्थ सुविधाएं बेहतर होती हैं, वहां के लोगों की औसत लंबाई बढ़नी चाहिए जैसा कि चीन, जापान और दक्षिण कोरिया में हुआ है. लैंसेट और NCD रिस्क फैक्टर कोलैबोरेशन के डेटा के मुताबिक, पिछले 100 सालों में दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले भारतीयों की हाइट में वो उछाल नहीं दिखा जो चीन या जापान में दिखा है. भारत के मामले में उल्टा हो रहा है और उनकी औसत हाइट में गिरावट देखी गई है. विश्लेषण से संकेत मिलता है कि भारत में औसत हाइट में अपेक्षित बढ़त नहीं हो पाई है और कुछ उम्र व सामाजिक समूहों में लंबाई में मामूली गिरावट भी दर्ज की गई है, जिसका सबसे बड़ा कारण बचपन का कुपोषण है. 20–30 साल पहले (2005–2006) भारतीय पुरुष आज की तुलना में औसतन 1 से 1.1 सेमी लंबे थे यानी पिछले कुछ दशकों में उनकी हाइट में गिरावट आई है. अब भारतीयों की लंबाई कम होने के क्या कारण हैं, कौन-कौन से फैक्टर्स इसके लिए जिम्मेदार हैं. घटती लंबाई पर क्या कहती हैं रिसर्च? ग्लोबल हाइट स्टडी (1985-2019) के अनुसार भारतीयों की लंबाई में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हुई जिसकी उम्मीद थी. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-3 से NFHS-4, 2005-16) डेटा के विश्लेषण से पता चलता है कि 15-25 साल के पुरुषों की औसत लंबाई 1.10 सेमी और 26-50 साल उम्र वालों की लंबाई 0.86 सेमी कम हो गई है. वहीं यदि 15-25 साल की महिलाओं की बात करें तो उनकी लंबाई में 0.12 सेमी की गिरावट आई है. ट्राइबल महिलाओं में यह आंकड़ा 0.42 सेमी और गरीब तबके वाली महिलाओं की लंबाई 0.57 सेमी तक गिर गई है. PLoS One में पब्लिश भारतीयों की लंबाई घटने पर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) द्वारा की गई रिसर्च (2021) से पता चलता है कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-3 (2005-06) से नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 (2015-16) के बीच पुरुषों की लंबाई 1 से 1.1 सेमी और चुनिंदा महिला ग्रुप्स (एसटी, गरीब) में 0.4 से 0.6 सेमी तक घट गई है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5, 2019-21) के मुताबिक, बचपन और किशोरावस्था में कुपोषण ही लंबाई घटने की सबसे बड़ी वजह बना हुआ है. 5 साल से कम उम्र के 35 प्रतिशत बच्चे नाटे (स्टंटिंग) हैं. दरअसल, हर बच्चे के जेनेटिक्स में एक निश्चित लंबाई तक पहुंचने  की अधिकतम संभावना होती है लेकिन स्टंटिंग इस क्षमता को सीमित कर देता है और उनकी लंबाई पूरी नहीं बढ़ पाती.  रिपोर्ट के मुताबिक, टीम ने 1985 और 2019 के बीच की गई 2000 से अधिक स्टडीज में 5 से 19 वर्ष की उम्र के 6.5 करोड़ से अधिक बच्चों और वयस्कों के डेटा का एनालेसिस किया. सामने आया कि पिछले 35 सालों में बच्चों की औसत ऊंचाई में सबसे अधिक सुधार चीन और दक्षिण कोरिया में देखा गया है. चीन में 19 साल के लड़कों की औसत लंबाई 1985 से 2019 के बीच 8 सेमी बढ़ी पाई गई थी. 2019 में पब्लिश हुई द लैंसेट स्टडी में बताया गया है कि 19 साल की उम्र में सबसे लंबे लड़के नीदरलैंड के थे जिनकी औसत हाइट 183.8 सेमी या 6 फीट थी और वहीं 19 साल की उम्र में सबसे कम लंबाई वाले लड़के तिमोर लेस्ते (दक्षिण पूर्व एशिया का देश) में रहते थे जिनकी औसत हाइट 160.1 सेमी या 5 फीट 3 इंच थी. पेट की बीमारी, मॉडर्न लाइफस्टाइल बच्चे की हाइट के दुश्मन बेंगलुरु के स्पर्श हॉस्पिटल के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. विक्रम बेल्लिअप्पा (MBBS, MS, DNB) ने Aajtak/.in को बताया, 'बार-बार होने वाले संक्रमण और पेट से जुड़ी बीमारियां बच्चों की ग्रोथ को प्रभावित कर सकती हैं. पेट के इंफेक्शन, दस्त या उल्टी की वजह से बॉडी जरूरी न्यूट्रिएंट्स को एब्जॉर्ब नहीं कर पाती. इसका सीधा असर बच्चे के वजन और लंबाई पर पड़ता है. लगातार पेट की खराबी न सिर्फ इम्यूनिटी कमजोर करती है, बल्कि ग्रोथ की रफ्तार को भी सुस्त कर देती है.' मॉडर्न लाइफस्टाइल के कारण बच्चों में अर्ली प्यूबर्टी (Early Puberty) देखने मिल रही है जिसका संबंध हाइट कम रह जाने से हो सकता है. दरअसल, आजकल के बच्चे जंक फूड का सेवन अधिक कर रहे हैं जिसके कारण उनमें मोटापा बढ़ रहा है जिस कारण उनमें समय से पहले हार्मोनल बदलाव (प्यूबर्टी) शुरू हो रहे हैं. डॉ. विक्रम बताते हैं, 'शुरू में तो बच्चा तेजी से लंबा होता दिखता है लेकिन हकीकत में उसकी 'ग्रोथ प्लेट्स' समय से पहले बंद हो जाती हैं. नतीजा यह कि उम्र बढ़ने पर उसकी फाइनल हाइट उम्मीद से काफी कम रह जाती है.' क्या हमारी खराब जीवनशैली और प्रदूषित वातावरण हमारे DNA में ऐसे बदलाव कर रहे हैं जो आने वाली पीढ़ियों की हाइट को परमानेंट तौर पर छोटा कर रहे हैं? बैलेंस डाइट की कमी  जयपुर के कोकून हॉस्पिटल के पीडियाट्रिशियन डॉ. जितेन्द्र जैन (MBBS, DCH, DNB) से Aajtak.in ने पूछा, क्या कारण है कि भारतीयों की नई पीढ़ी की औसत ऊंचाई पिछली पीढ़ी से कम हो रही है? उन्होंने बताया, 'लंबाई में जेनेटिक्स का अहम रोल है लेकिन केवल जेनेटिक्स ही पूरी कहानी नहीं बताते. भारतीयों की नई पीढ़ी की औसत ऊंचाई पिछली पीढ़ी से कम होने के पीछे लाइफस्टाइल, पोषण और पर्यावरण भी जिम्मेदार हैं. 'जंक फूड, कम प्रोटीन और विटामिन्स, बढ़ता मोटापा, अधिक स्क्रीन टाइम और फिजिकल एक्टिविटी में कमी बच्चों की ग्रोथ को धीमा कर रही है. 'गर्भावस्था में माताओं का खराब पोषण, बचपन में बार-बार होने वाले इंफेक्शन, पेट और आंत की बीमारियां और प्रदूषण भी हार्मोनल संतुलन और हड्डियों की ग्रोथ को प्रभावित कर रहे हैं. इसलिए केवल जेनेटिक्स पर निर्भर रहने की बजाय बैलेंस डाइट, साफ पानी, पर्याप्त नींद और एक्टिव लाइफस्टाइल बेहद जरूरी है ताकि बच्चों की लंबाई सही रहे और ओवरऑल ग्रोथ सही तरह से हो.' खराब लाइफस्टाइल और पॉल्यूशन डॉ. विक्रम ने कहा, 'खराब लाइफस्टाइल और प्रदूषण सीधे तौर पर DNA को बदलकर हाइट को स्थायी रूप से प्रभावित नहीं करते लेकिन ये एपिजेनेटिक बदलाव जरूर पैदा कर सकते हैं. लगातार जंक फूड, न्यूट्रिशन की कमी, स्ट्रेस, प्रदूषण और हार्मोन-डिसरप्टिंग केमिकल्स का असर … Read more

Toll Tax नियमों में नई क्रांति, Fastag से अब होगा स्वचालित भुगतान

नई दिल्ली अगर आप अक्सर हाईवे पर सफर करते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। 1 अप्रैल 2026 से नेशनल हाईवे के टोल प्लाजा पर नकद भुगतान गुजरे जमाने की बात हो जाएगी। केंद्र सरकार ने टोल प्लाजा पर कैश लेन-देन को पूरी तरह बंद करने का फैसला किया है। सिर्फ FASTag और UPI से होगा भुगतान केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के अनुसार, देश को डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने और टोल प्लाजा पर लगने वाली लंबी कतारों को खत्म करने के लिए यह निर्णय लिया गया है। 1 अप्रैल के बाद टोल प्लाजा पर केवल FASTag और UPI ही भुगतान के मान्य माध्यम होंगे। वर्तमान में कई टोल प्लाजा पर FASTag होने के बावजूद लोग कैश लेन का इस्तेमाल करते हैं, जिससे जाम की स्थिति बनी रहती है। नए नियम के लागू होने के बाद:     टोल प्लाजा से कैश लेन पूरी तरह हटा दी जाएगी।     वाहन चालकों को जाम से निजात मिलेगी और यात्रा समय की बचत होगी।     पारदर्शिता बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था पूरी तरह डिजिटल होगी। सरकार 'मल्टी लेन फ्री फ्लो' (MLFF) टोलिंग सिस्टम लाने की तैयारी में है। इसके तहत…     बिना बैरियर के टोल: शुरुआत में देशभर के 25 टोल प्लाजा पर पायलट प्रोजेक्ट के रूप में इसे लागू किया जाएगा।     सेंसर तकनीक: इस सिस्टम में कोई बैरियर नहीं होगा। वाहन बिना रुके गुजरेंगे और ऊपर लगे कैमरे व सेंसर FASTag के जरिए अपने आप टोल काट लेंगे।     सुगम यात्रा: पायलट प्रोजेक्ट सफल होने के बाद इसे पूरे देश में लागू किया जाएगा, जिससे हाईवे पर वाहनों की गति बाधित नहीं होगी।

डब्ल्यूईएफ 2026: ‘AI नौकरियां नहीं छिनेगा, इंसानों के साथ काम करेगा’, एक्सपर्ट्स का बयान

नई दिल्ली  दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) 2026 में शामिल तकनीकी कंपनियों के बड़े अधिकारियों ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) इंसानों की नौकरियां नहीं छीनेगा, बल्कि काम करने के तरीके को बदलेगा। एआई कई कामों को अपने आप कर सकता है, लेकिन यह पूरी नौकरी की जगह नहीं ले सकता। वर्करा के संस्थापक और सीईओ कियान कटानफोरूश ने कहा कि एआई को लेकर भाषा का सही इस्तेमाल बहुत जरूरी है। वे एआई को 'सहकर्मी' कहने के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि एआई कुछ खास काम तो अच्छी तरह कर सकती है, लेकिन इंसानों की तरह पूरी नौकरी नहीं कर सकती। उन्होंने बताया कि इंसान एक साथ सैकड़ों तरह के काम करते हैं, जबकि एआई केवल तय किए गए काम ही कर पाता है। उन्होंने यह भी कहा कि अब तक यह अनुमान गलत साबित हुआ है कि एआई बड़े पैमाने पर लोगों की नौकरियां खत्म कर देगा। हिप्पोक्रेटिक एआई के सह-संस्थापक और सीईओ मुंजाल शाह ने भी कहा कि एआई इंसानों की जगह नहीं लेगा, बल्कि बड़े स्तर पर कर्मचारियों की मदद करेगा। उन्होंने भविष्य की कल्पना करते हुए कहा कि दुनिया में '8 अरब लोग और 80 अरब एआई सिस्टम' होंगे, जो नए कामों को आसान बनाएंगे। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि एक एआई सिस्टम ने गर्मी की लहर के दौरान हजारों लोगों को फोन करके उन्हें ठंडी जगहों पर जाने की सलाह दी और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ऐसे सिस्टम को सही ढंग से लागू करने के लिए कड़े परीक्षण की आवश्यकता होती है। हमारे पास ऐसे मॉडल हैं जो अन्य मॉडल्स की जांच करते हैं और फिर वे मॉडल भी उन्हीं मॉडल्स की जांच करते हैं। अमिनी की संस्थापक और सीईओ केट कैलॉट ने कहा कि एआई अभी भी सिर्फ एक उपकरण है। यह अपने आप सही और गलत का फैसला नहीं कर सकता, क्योंकि इसमें इंसानों जैसी सोच और मूल्य समझने की क्षमता नहीं है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) के सीईओ क्रिस्टोफ श्वाइजर ने कहा कि एआई के साथ काम करने का अनुभव कभी-कभी किसी सहकर्मी के साथ काम करने जैसा लगता है। किसी कंपनी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने काम करने के तरीके को कितना बदलती है, न कि सिर्फ नई तकनीक अपनाने पर। उन्होंने यह भी कहा कि एआई को एक बड़ी प्रबंधन जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए और इसे सिर्फ तकनीकी टीम पर नहीं छोड़ा जा सकता। एचपी कंपनी के अध्यक्ष और सीईओ एनरिक लोरस ने कहा कि एआई का इस्तेमाल संतुलन के साथ होना चाहिए। एचपी के कॉल सेंटरों में कभी-कभी एआई गलत जवाब देता है, लेकिन कुल मिलाकर इसकी सटीकता पहले से बेहतर हुई है और ग्राहकों की संतुष्टि भी बढ़ी है।

सरकार की योजना: अब कारों की माइलेज टेस्ट में AC चालू रहेगा, नए नियम जल्द लागू

नई दिल्ली भारत सरकार नई कारों के लिए कुछ नए सख्त नियम लाने की तैयारी कर रही है. जानकारी के अनुसार आगामी, 1 अक्टूबर, 2026 से, भारत में बिकने वाली पैसेंजर कारों को ज़्यादा सख्त फ्यूल-एफिशिएंसी टेस्टिंग नियमों को पूरा करना पड़ सकता है. इन नियमों के अनुसार, माइलेज को एयर-कंडीशनिंग चालू होने पर मापा जाएगा. बता दें कि यह प्रस्ताव केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय ने पेश किया है और इसका मकसद ऑफिशियल माइलेज के दावों और रोज़ाना ड्राइविंग के एक्सपीरिएंस के बीच के अंतर को कम करना है. क्या दिया जा रहा प्रस्ताव? सेंट्रल मोटर व्हीकल्स रूल्स में एक ड्राफ्ट संशोधन के अनुसार, सभी M1 कैटेगरी की गाड़ियों, जिनमें स्थानीय रूप से बनी या इम्पोर्ट की गई कारें शामिल हैं, जिनका टेस्ट AIS-213 स्टैंडर्ड के तहत किया जाएगा. इस स्टैंडर्ड के तहत एक बड़ा बदलाव यह है कि फ्यूल की खपत को AC चालू होने पर मापा जाएगा. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मौजूदा समय में कारों का माइलेज AC बंद करके किए जाता है. जनता से मांगा गया फीडबैक केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय ने इस प्रस्ताव पर लोगों से फीडबैक मांगा है और नियमों को फाइनल करने से पहले आपत्तियों और सुझावों के लिए 30 दिन का समय दिया है. सरकार क्यों करना चाहती है बदलाव सरकार के इस फैसले के पीछे की वजह बताते हुए अधिकारियों ने कहा कि फ्यूल-एफिशिएंसी के आंकड़ों को आम ड्राइविंग स्थितियों को ज़्यादा सही तरीके से दिखाना चाहिए. क्योंकि ज़्यादातर कार मालिक रेगुलर एयर-कंडीशनिंग का इस्तेमाल करते हैं, खासकर भारतीय मौसम में, इसलिए सर्टिफिकेशन टेस्ट के दौरान माइलेज पर इसके असर को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. मौजूदा समय में कैसे मापी जाती है फ्यूल एफिशिएंसी मौजूदा समय की बात करें तो भारत में कार बनाने वाली कंपनियां बिना AC चलाए किए गए टेस्ट के आधार पर फ्यूल-एफिशिएंसी के आंकड़े ग्राहकों को बताती हैं. मैन्युफैक्चरर्स लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि यह तरीका यूरोपियन टेस्टिंग नॉर्म्स के हिसाब से है. हालांकि, सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस तरीके से अक्सर ऐसे माइलेज के आंकड़े मिलते हैं, जो असल दुनिया में इस्तेमाल की तुलना में ज़्यादा अच्छे लगते हैं, जिसकी वजह से टेस्टिंग की ज़रूरतों में बदलाव करने पर ज़ोर दिया जा रहा है.