samacharsecretary.com

ट्रेड डील को लेकर भारत-अमेरिका वार्ता तेज, अमेरिकी राजदूत ने दी बैठक की जानकारी

नई दिल्ली भारत और अमेरिका लगातार ट्रेड डील पर बातचीत कर रहे हैं और अगली बैठक मंगलवार को प्रस्तावित है। यह बयान नई दिल्ली में हाल ही में नियुक्त हुए अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर की ओर से सोमवार को दिया गया। अमेरिकी दूतावास में कार्यभार संभालने के दौरान स्टाफ और पत्रकारों से बातचीत करते हुए गोर ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए शुभकामनाएं भेजी हैं। गोर ने कहा, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच दोस्ती असली है और भारत एवं अमेरिका का रिश्ता केवल आपसी हितों पर केंद्रित नहीं है, बल्कि बल्कि उच्चतम स्तर पर बने रिश्तों से भी बंधे हुए हैं।" उन्होंने आगे कहा,"सच्चे मित्र कई मुद्दों पर असहमत हो सकते हैं, लेकिन आखिर में आपसी मतभेद को सुलझा ही लेते हैं।" गोर के मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार काफी महत्वपूर्ण है और इसके अलावा दोनों देश सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ, एनर्जी, टेक्नोलॉजी, शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर साथ मिलकर काम करना जारी रखेंगे। उन्होंने आगे बताया कि टैरिफ और बाजार पहुंच को लेकर मतभेद होने के बावजूद दोनों देश आपस में संपर्क बनाए रखे हुए हैं। गोर ने यह भी घोषणा की कि अगले महीने भारत को 'पैक्ससिलिका' में पूरे सदस्य के तौर पर शामिल होने के लिए निमंत्रण भेजा गया है। उन्होंने बताया कि 'पैक्ससिलिका' एक नई पहल है जिसे अमेरिका ने पिछले महीने ही शुरू किया है। इसका मकसद जरूरी मिनरल्स और एनर्जी इनपुट से लेकर एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, एआई डेवलपमेंट और लॉजिस्टिक्स तक एक सुरक्षित, खुशहाल और इनोवेशन पर आधारित आपूर्ति श्रृंखला विकसित करना है। उन्होंने आगे कहा, "पिछले महीने इस ग्रुप में शामिल होने वाले देशों में जापान, दक्षिण कोरिया, यूनाइटेड किंगडम और इजराइल शामिल हैं। भारत के शामिल होने से यह ग्रुप और मजबूत होगा।" गोर के बयान से अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक की टिप्पणियों से पैदा हुआ ज्यादातर कन्फ्यूजन दूर हो गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत-अमेरिका व्यापार बातचीत इसलिए रुक गई है क्योंकि पीएम मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप को फोन नहीं किया। विदेश मंत्रालय ने लटनिक के बयान को खारिज करते हुए कहा, "रिपोर्ट में बताई गई बातों में इन चर्चाओं का जो जिक्र किया गया है, वह सही नहीं है।" विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, "भारत दो कॉम्प्लिमेंट्री इकोनॉमी के बीच आपसी फायदे वाले ट्रेड डील में दिलचस्पी रखता है और इसे पूरा करने की उम्मीद करता है।"

चीन का दो टूक संदेश: ईरान के दमन पर साथ, अमेरिका को ग्रीनलैंड मुद्दे पर खुली चुनौती

ईरान ईरान में जारी जनविरोध और अशांति के बीच चीन ने स्पष्ट रूप से तेहरान सरकार का समर्थन करते हुए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को कड़ा संदेश दिया है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह “आशा करता है कि ईरान अपनी मौजूदा कठिनाइयों से उबर जाएगा” और देश में “स्थिरता” बनी रहेगी। बीजिंग ने इस बयान के साथ ही यह भी दोहराया कि वह किसी भी देश के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करता है। चीन का यह रुख ऐसे समय आया है जब ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर सख्ती, गिरफ्तारियां और कथित मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर पश्चिमी देश चिंता जता रहे हैं।यही नहीं, चीन ने ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र को लेकर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव पर भी अमेरिका को कड़ा संदेश दिया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन का यह बयान केवल ईरान के समर्थन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति में एक व्यापक संदेश है कि सत्तावादी सरकारों द्वारा की जाने वाली कार्रवाई को ‘घरेलू मामला’ मानते हुए उस पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए। चीन का यह रुख अमेरिका और यूरोपीय देशों के लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकार आधारित हस्तक्षेप की सोच से टकराता हुआ नजर आता है। इससे साफ है कि ईरान संकट केवल एक देश का आंतरिक मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन और वैचारिक टकराव का नया मोर्चा बनता जा रहा है। ईरान में दमन को चीन ने खुला समर्थन देकर पूरी दुनिया को सख्त संदेश दिया है “अपने काम से काम रखो।”  हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठोनों और पश्चिमी देशों का कहना है कि ईरान में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हिंसा, गिरफ्तारियां और सख्त कार्रवाई लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। ऐसे में चीन का यह रुख साफ तौर पर दमनकारी नीतियों के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र को लेकर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव पर चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि अमेरिका को अपने “स्वार्थी हितों” के लिए दूसरे देशों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। चीन ने स्पष्ट किया कि आर्कटिक में उसकी गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय कानून के पूरी तरह अनुरूप हैं और किसी भी देश की संप्रभुता के खिलाफ नहीं हैं। बीजिंग के अनुसार, आर्कटिक क्षेत्र में सभी देशों के स्वतंत्र और शांतिपूर्ण गतिविधियों के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए।चीनी विदेश मंत्रालय ने आरोप लगाया कि अमेरिका बार-बार दूसरे देशों और क्षेत्रों को बहाना बनाकर अपने रणनीतिक और सैन्य हित साधना चाहता है। ग्रीनलैंड को लेकर हाल के अमेरिकी बयानों और गतिविधियों ने आर्कटिक को एक बार फिर वैश्विक शक्ति संघर्ष का केंद्र बना दिया है।विशेषज्ञों का मानना है कि आर्कटिक में प्राकृतिक संसाधनों, नए समुद्री मार्गों और रणनीतिक बढ़त को लेकर अमेरिका और चीन आमने-सामने आ रहे हैं। चीन का यह बयान साफ संकेत है कि बीजिंग अब आर्कटिक में अमेरिकी दबदबे को खुली चुनौती देने के मूड में है।  

चुनाव आयुक्तों की सुरक्षा पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट का केंद्र व चुनाव आयोग को नोटिस

नई दिल्ली मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को मुकदमे से जीवन भर संरक्षण देने के कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई हुई। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट वैधता का परीक्षण करने को तैयार है। एनजीओ लोक प्रहरी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून पर कोई रोक नहीं लगाई है। कानून में संशोधन 2023 में किया गया था जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को ये संरक्षण दिया गया है कि उनके आधिकारिक काम को लेकर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता है। सीजेआई सूर्यकांत ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए इसे एक महत्वपूर्ण मुद्दा बताया है। उन्होंने कहा कि वे इस मामले का परीक्षण करेंगे, देखेंगे कि इस प्रावधान से कोई नुकसान हो रहा है या नहीं, और देखेंगे कि क्या संविधान की व्यवस्था के तहत ऐसी छूट दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि फिलहाल स्टे की जरूरत नहीं है। अदालत से प्रावधान पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। याचिकाकर्ता संस्था लोक प्रहरी ने दलील दी कि इतनी व्यापक कानूनी छूट तो भारत के राष्ट्रपति को भी नहीं दी गई है। उन्होंने कहा कि संसद में कानून पर बहस के दौरान मंत्री ने खुद कहा था कि यह विधेयक केवल सेवा शर्तों से संबंधित है। ऐसे में आपराधिक अभियोजन से छूट को सेवा शर्त नहीं माना जा सकता है। याचिका में यह भी कहा गया कि यह प्रावधान स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को नुकसान पहुंचाता है। याचिकाकर्ता ने अदालत से इस प्रावधान पर तुरंत रोक लगाने की मांग की थी। मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए मुकदमों से प्रोटेक्शन दिए जाने को लेकर कानून में संशोधन किए जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। कानून में संशोधन 2023 में किया गया था, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को ये संरक्षण दिया गया है कि उनके आधिकारिक काम को लेकर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता है।

‘यह भारत नहीं, हमारी गलियां हैं’—न्यूज़ीलैंड में नगर कीर्तन पर हाका डांस के साथ विरोध

वेलिंग्टन न्यूजीलैंड में धार्मिक सहिष्णुता और बहुसांस्कृतिक मूल्यों पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। सिख समुदाय की शांतिपूर्ण धार्मिक शोभायात्रा नगर कीर्तन को लगातार दूसरी बार दक्षिणपंथी समूह के विरोध का सामना करना पड़ा। यह घटना गुरु गोबिंद सिंह की जयंती के अवसर पर ताउरंगा शहर में सामने आई। 11 जनवरी को सुबह करीब 11 बजे नगर कीर्तन गुरुद्वारा सिख संगत से शुरू होकर कैमरन रोड होते हुए ताउरंगा बॉयज कॉलेज की ओर बढ़ रहा था। यह न्यूजीलैंड है, भारत नहीं इसी दौरान दक्षिणपंथी पेंटेकोस्टल नेता ब्रायन तमाकी और उनके डेस्टिनी चर्च समर्थक नगर कीर्तन के मार्ग में पहुंच गए। प्रदर्शनकारियों ने पारंपरिक माओरी हाका किया और “यह न्यूजीलैंड है, भारत नहीं” तथा “WHOSE STREETS? KIWI STREETS” जैसे नारे लिखे बैनर लहराए। हालांकि, न्यूजीलैंड पुलिस और सिख समुदाय के स्वयंसेवकों की सतर्कता के चलते स्थिति बिगड़ने से बच गई और नगर कीर्तन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। किसी भी अप्रिय घटना से निपटने के लिए पहले से ही सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे।   तमाकी का भड़काऊ बयान घटना के बाद ब्रायन तमाकी ने सोशल मीडिया पर वीडियो साझा करते हुए विरोध को “शांतिपूर्ण प्रतिरोध” बताया। उन्होंने दावा किया कि नगर कीर्तन  के दौरान तलवारें और खंजर लहराए गए और इसे “राष्ट्रीय पहचान के लिए खतरा” करार दिया। तमाकी ने आप्रवासन, बहुसांस्कृतिक नीति और सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि न्यूजीलैंड को “ईसाई मूल्यों वाला देश” बनाए रखने के लिए आंदोलन जारी रहेगा।   पहले भी हो चुका विरोध गौरतलब है कि इससे पहले ऑकलैंड में भी गुरु गोबिंद सिंह के पुत्रों साहिबजादों की शहादत की स्मृति में निकाले गए नगर कीर्तन का विरोध किया गया था। उस घटना के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री, अकाल तख्त के जत्थेदार और SGPC ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। यह ताजा घटना न केवल न्यूजीलैंड के सिख समुदाय को चिंतित कर रही है, बल्कि वैश्विक स्तर पर धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ रही है। SGPC की कड़ी निंदा शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने घटना की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि नगर कीर्तन सिख धर्म की एक पवित्र, शांतिपूर्ण और विश्वभर में सम्मानित परंपरा है। इसे रोकने की कोशिश धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द पर सीधा हमला है। SGPC ने न्यूजीलैंड और भारत सरकार से दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की।

आम बजट का सफर: फाइलों के दौर से ऑनलाइन प्रेज़ेंटेशन तक की कहानी

नई दिल्ली देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी 2026 को केंद्रीय बजट पेश करने जा रही हैं। यह उनका लगातार नौवां बजट होगा, और इसी के साथ वह लगातार 9 बार बजट पेश करने वाली देश की पहली वित्त मंत्री बन जाएंगी। वहीं, भारत के इतिहास का यह 80वां केंद्रीय बजट होगा। भारत का केंद्रीय बजट केवल आय-व्यय का दस्तावेज नहीं, बल्कि देश की आर्थिक सोच और नीतिगत दिशा का आईना भी होता है। आजादी के बाद से लेकर अब तक बजट की तारीख, समय, प्रस्तुति की शैली और उसकी प्राथमिकताओं में कई बड़े बदलाव हुए हैं। समय के साथ भारत की अर्थव्यवस्था बदली और उसी के साथ बजट की परंपराएं भी आधुनिक होती चली गईं। भारत में पहली बार बजट 7 अप्रैल 1860 को पेश किया गया था। हालांकि उस समय देश ब्रिटिश शासन के अधीन था। आजाद भारत का पहला केंद्रीय बजट 26 नवंबर 1947 को पेश किया गया था। इसे तत्कालीन वित्त मंत्री आर.के. शनमुखम चेट्टी ने संसद में प्रस्तुत किया। यह बजट आजादी के बाद की शुरुआती आर्थिक चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था, जिसमें देश के पुनर्निर्माण और बुनियादी जरूरतों पर फोकस था। इसके बाद से अब तक बजट की प्रक्रिया में कई बड़े और ऐतिहासिक बदलाव हुए हैं। लंबे समय तक भारत में केंद्रीय बजट हर साल 28 फरवरी को पेश किया जाता रहा। यह परंपरा ब्रिटिश काल से चली आ रही थी। लेकिन साल 2017 में मोदी सरकार ने एक ऐतिहासिक बदलाव करते हुए बजट की तारीख 1 फरवरी कर दी। इसका मकसद यह था कि बजट से जुड़ी योजनाएं नए वित्त वर्ष की शुरुआत यानी 1 अप्रैल से पहले ही लागू की जा सकें और राज्यों को भी अपनी योजनाएं बनाने के लिए ज्यादा समय मिल सके। साल 2019 से पहले बजट को चमड़े के ब्रीफकेस में संसद लाया जाता था। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस परंपरा को बदलते हुए बजट को लाल रंग के कपड़े में लपेटकर पेश किया। पहले बजट दस्तावेज भारी-भरकम कागजी फाइलों में पेश किए जाते थे। लेकिन साल 2021 में पहली बार भारत का केंद्रीय बजट पूरी तरह डिजिटल फॉर्म में पेश किया गया। इसके साथ ही 'बजट ऐप' भी लॉन्च किया गया, जिससे आम लोग आसानी से बजट से जुड़ी जानकारी प्राप्त कर सकें। आजादी के बाद कई दशकों तक भारत में अलग से रेल बजट पेश किया जाता था। लेकिन साल 2017 में रेल बजट को केंद्रीय बजट में ही शामिल कर दिया गया। सरकार का तर्क था कि इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और रेलवे के विकास को समग्र आर्थिक नीति से जोड़ा जा सकेगा। एक समय ऐसा था जब भारत का बजट शाम 5 बजे पेश किया जाता था। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार (वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा) ने बजट की टाइमिंग बदलकर सुबह 11 बजे कर दी। तब से लेकर आज तक बजट इसी समय पेश किया जाता है। वहीं आम बजट 2026-27 को लेकर चर्चाएं तेज हैं, खासकर इसलिए क्योंकि इस बार बजट की तारीख 1 फरवरी 2026 को रविवार है। इसे लेकर असमंजस की स्थिति जरूर है, लेकिन संसदीय इतिहास बताता है कि जरूरत पड़ने पर शनिवार और रविवार जैसे अवकाश वाले दिन भी कार्यदिवस घोषित किए जा चुके हैं। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि इस पर अंतिम फैसला संसदीय मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति द्वारा सही समय पर लिया जाएगा। अगर 1 फरवरी को बजट पेश होता है, तो यह कोई नई बात नहीं होगी। 2020 में कोविड महामारी के दौरान रविवार को संसद की कार्यवाही हुई थी। वर्ष 2015 और 2016 में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने शनिवार को बजट पेश किया था। 2025 में निर्मला सीतारमण ने भी शनिवार को बजट प्रस्तुत किया था। शुरुआती दौर में बजट का फोकस कृषि, सिंचाई और बुनियादी ढांचे पर था। समय के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, स्टार्टअप, डिजिटल इंडिया, ग्रीन एनर्जी और सामाजिक कल्याण जैसे विषय बजट की प्राथमिकताओं में शामिल होते गए। आज का बजट आत्मनिर्भर भारत, रोजगार सृजन और समावेशी विकास पर केंद्रित नजर आता है। केंद्रीय बजट में हुए ये बदलाव दिखाते हैं कि भारत की आर्थिक नीति समय के साथ अधिक व्यावहारिक, पारदर्शी और आधुनिक होती गई है। तारीख से लेकर समय और प्रस्तुति के तरीके तक, हर बदलाव का उद्देश्य देश के विकास को गति देना और नीतियों को जमीन पर जल्दी उतारना रहा है।

आर्कटिक की जंग: रूस-चीन के बढ़ते असर पर ब्रिटेन-NATO का कड़ा प्लान

लंदन ब्रिटेन ने आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन से उत्पन्न बढ़ते खतरों को लेकर नाटो के अपने सहयोगी देशों के साथ बातचीत शुरू की है। सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा कि इन चर्चाओं का मकसद आर्कटिक में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करना है। ब्रिटेन की परिवहन मंत्री हाइडी एलेक्जेंडर ने रविवार को बताया कि यह बातचीत नाटो की “सामान्य प्रक्रिया” का हिस्सा है और इसे हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में लेने की धमकियों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि, ट्रंप ने शुक्रवार को कहा था कि अमेरिका नाटो सहयोगी डेनमार्क के अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए समझौता करना चाहता है, ताकि रूस या चीन वहां अपना प्रभाव न बढ़ा सकें। ट्रंप ने यह भी कहा था, “हम ग्रीनलैंड को लेकर कुछ करने जा रहे हैं, चाहे वे इसे पसंद करें या नहीं।”करीब 57,000 की आबादी वाला ग्रीनलैंड डेनमार्क के संरक्षण में है और उसकी सैन्य क्षमता अमेरिका की तुलना में काफी सीमित है। ग्रीनलैंड में अमेरिका का एक सैन्य अड्डा भी मौजूद है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं कि ग्रीनलैंड पर किसी भी तरह का कब्जा नाटो की एकता के लिए खतरा होगा।   ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप प्रशासन की लगातार चेतावनियों के बाद अमेरिका और डेनमार्क के रिश्तों में तनाव बढ़ गया है। अमेरिका में डेनमार्क के राजदूत जेस्पर मोलर सोरेनसन ने ग्रीनलैंड में नवनियुक्त अमेरिकी दूत जेफ लैंड्री के उस बयान का कड़ा जवाब दिया, जिसमें कहा गया था कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने ग्रीनलैंड की संप्रभुता की रक्षा की थी। सोरेनसन ने कहा कि डेनमार्क हमेशा अमेरिका के साथ खड़ा रहा है, खासकर 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद, और ग्रीनलैंड के भविष्य पर फैसला करने का अधिकार केवल वहां के लोगों को है। मंत्री हाइडी एलेक्जेंडर ने कहा कि ब्रिटेन इस बात से सहमत है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है और यह नाटो के लिए गंभीर चुनौती है। ब्रिटेन के पूर्व अमेरिकी राजदूत पीटर मैंडेलसन ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि ट्रंप बलपूर्वक ग्रीनलैंड पर कब्जा करेंगे। उन्होंने कहा, “ट्रंप मूर्ख नहीं हैं। आर्कटिक को चीन और रूस से सुरक्षित करना जरूरी है और अगर इस प्रयास का नेतृत्व कोई करेगा, तो वह अमेरिका ही होगा।” आर्कटिक क्षेत्र अब ऊर्जा संसाधनों, नए समुद्री मार्गों और सैन्य रणनीति के कारण वैश्विक राजनीति का अहम केंद्र बनता जा रहा है, जहां आने वाले समय में महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा और तेज होने की आशंका है।    

करूर भगदड़ मामला: चार्टर्ड प्लेन से दिल्ली आए विजय, CBI पूछताछ के दौरान ऑफिस के बाहर हंगामा

नई दिल्ली तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) प्रमुख व अभिनेता विजय करूर भगदड़ मामले में सीबीआई के समक्ष पूछताछ के लिए सोमवार को पेश हुए। अधिकारियों ने यह जानकारी दी। तमिल सुपरस्टार सुबह 11:29 बजे काली रेंज रोवर में भारी सुरक्षा घेरे में CBI मुख्यालय पहुंचे। आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद, उन्हें एजेंसी की भ्रष्टाचार रोधी इकाई की टीम के पास ले जाया गया जो 27 सितंबर 2025 को तमिलनाडु के करूर में हुई भगदड़ मामले की जांच कर रही है। इस भगदड़ में 41 लोगों की जान चली गई और 60 से अधिक लोग घायल हो गए थे।   अभिनेता-राजनेता के समर्थकों की भारी भीड़ जुटने की आशंका के मद्देनजर सीबीआई कार्यालय भवन के आसपास दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की कई इकाइयों को तैनात किया गया था। कुछ प्रशंसक CBI कार्यालय के बाहर जमा मीडियाकर्मियों के बीच से निकलकर अभिनेता की एक झलक पाने में कामयाब रहे। नोएडा में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाले प्रशंसक अय्यनार ने को बताया, ‘हम सभी दिल्ली में रहते हैं। हम लगभग 40 प्रशंसक हैं जो अभिनेता की एक झलक पाने के लिए यहां आए हैं। हम सभी विजय के बहुत बड़े प्रशंसक हैं।’ चार्टर्ड विमान से चेन्नई से दिल्ली के लिए रवाना पार्टी सूत्रों के अनुसार विजय अपने सहयोगियों के साथ सुबह 7 बजे चार्टर्ड विमान से चेन्नई से दिल्ली के लिए रवाना हुए थे। सीबीआई ने इस मामले में पार्टी के कई पदाधिकारियों से भी पूछताछ की है। अधिकारियों के अनुसार, सीबीआई ने तमिलनाडु के पूर्व एडीजी (कानून एवं व्यवस्था) एस डेविडसन देवसिरवथम को भी तलब किया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने एसआईटी से यह मामला अपने हाथ में ले लिया था और वह सबूत जुटा रही है।  

यूनुस का विवादित फैसला: ट्रंप की खुशामद में गाजा भेजना चाहते हैं सेना, अपने ही देश में विरोध तेज

ढाका बांग्लादेश की अंतरिम सरकार मुहम्मद यूनुस द्वारा गाजा में प्रस्तावित इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स में शामिल होने की रुचि जाहिर करने के बाद फिलिस्तीन समर्थक संगठन पैलेस्टाइन सॉलिडैरिटी कमेटी, बांग्लादेश ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। संगठन ने सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी है कि वह इस फोर्स में किसी भी प्रकार की भागीदारी से दूर रहे, क्योंकि यह बांग्लादेश की ऐतिहासिक और नैतिक नीति के खिलाफ होगा। द डेली स्टार की रिपोर्ट के अनुसार, कमेटी ने बयान जारी कर अंतरिम सरकार की इस कथित रुचि की कड़ी निंदा की। सदस्य-सचिव प्रोफेसर मोहम्मद हारुन-ओर-रशीद ने कहा कि इस फोर्स का मुख्य उद्देश्य इजरायल की सुरक्षा के नाम पर गाजा के स्वतंत्रता सेनानियों को निरस्त्र करना और फिलिस्तीनी प्रतिरोध आंदोलन को समाप्त करना होगा।   कमेटी ने क्या कहा? पैलेस्टाइन सॉलिडैरिटी कमेटी, बांग्लादेश के सदस्य-सचिव प्रोफेसर मोहम्मद हारुन-ओर-रशीद ने कहा कि इस स्थिरीकरण बल का मुख्य उद्देश्य इजरायल की सुरक्षा के बहाने गाजा के स्वतंत्रता सेनानियों को हथियार छीनना और फिलिस्तीनी प्रतिरोध आंदोलन को पूरी तरह खत्म करना है। बयान में कमेटी ने दावा किया कि बांग्लादेश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार खलीलुर रहमान ने अमेरिका दौरे के दौरान वाशिंगटन में अमेरिकी अधिकारियों के साथ बैठक में गाजा स्टेबिलाइजेशन फोर्स में बांग्लादेश की रुचि जाहिर की थी। यह जानकारी मुख्य सलाहकार मुहम्मद युनूस के प्रेस विंग के बयान के हवाले से सामने आई थी। कमेटी ने जोर दिया कि बांग्लादेश के लोग हमेशा फिलिस्तीनी अधिकारों और स्वतंत्रता के समर्थन में खड़े रहे हैं और आगे भी खड़े रहेंगे। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश खुद संघर्ष और आजादी की लड़ाई से जन्मा देश है, इसलिए यहां की जनता उत्पीड़न और कब्जे के खिलाफ लड़ने वालों के दर्द को अच्छी तरह समझती है। इस दौरान संगठन ने याद दिलाया कि बांग्लादेश ने संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फिलिस्तीन के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया है और इजरायली कब्जे की लगातार निंदा की है। क्यों हो रहा विरोध? दरअसल, पाकिस्तान की तर्ज पर बांग्लादेश ने भी गाजा में सेना भेजने पर सैद्धांतिक चर्चा की थी, लेकिन अब देश में इस पर विरोध बढ़ गया है। कमेटी का मानना है कि इस फोर्स में शामिल होना बांग्लादेश की नैतिक और कूटनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता है, खासकर जब गाजा गंभीर मानवीय संकट से गुजर रहा है। हालांकि सरकार की ओर से इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है।

भारत-जर्मनी संबंधों को नई गति: पीएम मोदी ने चांसलर मर्ज से की अहम बातचीत

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने सोमवार को द्विपक्षीय साझेदारी के समग्र विस्तार के लिए व्यापक बातचीत की और इसी के साथ दोनों देशों ने शिक्षा क्षेत्र में रिश्तों का विस्तार करने के लिए एक बड़ा रोडमैप तैयार किया। दोनों नेताओं ने रूस-यूक्रेन संघर्ष, गाजा के हालात और अन्य ज्वलंत वैश्विक चुनौतियों पर भी चर्चा की। मोदी ने कहा कि भारत ने हमेशा सभी समस्याओं और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया है। जर्मनी के चांसलर मर्ज भारत की दो दिवसीय यात्रा पर आज सुबह अहमदाबाद पहुंचे। यह जर्मन चांसलर के रूप में मर्ज की पहली एशिया यात्रा है। मोदी ने एक वक्तव्य में कहा, ‘‘आज उच्च शिक्षा पर बना समग्र रोडमैप शिक्षा के क्षेत्र में हमारी साझेदारी को नई दिशा देगा।'' प्रधानमंत्री ने जर्मनी के विश्वविद्यालयों को भारत में अपने परिसर खोलने के लिए भी आमंत्रित किया।   मोदी ने कहा कि वह और मर्ज इस बात पर एकमत हैं कि आतंकवाद पूरी मानवता के लिए एक गंभीर खतरा है। उन्होंने कहा,‘‘भारत और जर्मनी इसके विरुद्ध एकजुट होकर पूरी दृढ़ता से लड़ाई जारी रखेंगे।'' प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘आज हमने यूक्रेन और गाजा सहित कई वैश्विक तथा क्षेत्रीय मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।'' उन्होंने कहा, ‘‘भारत सभी समस्याओं और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का पक्षधर रहा है और इस दिशा में किए जा रहे सभी प्रयासों का समर्थन करता है।''   मोदी ने कहा, ‘‘भारत और जर्मनी की जनता के बीच ऐतिहासिक और गहन संबंध हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचनाओं ने जर्मनी के बौद्धिक जगत को नई दृष्टि दी। स्वामी विवेकानंद की विचारधारा ने जर्मनी सहित पूरे यूरोप को प्रेरित किया। और मैडम कामा ने जर्मनी में पहली बार भारत की आजादी का ध्वज फहराकर हमारी स्वतंत्रता की आकांक्षा को वैश्विक पहचान दी।''  

गोल्ड मेडल की उम्मीद थी, PIL में निकला बेटा—BJP नेता पर CJI का व्यंग्य

नई दिल्ली देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ आज (सोमवार, 12 जनवरी को) एक ऐसी जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर ही थी, जिसे एक लॉ स्टूडेन्ट ने फाइल की थी और उस मामले की पैरवी उसके ही वकील पिता कर रहे थे। इस याचिका में केंद्र सरकार को ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज़ (आपत्तिजनक विज्ञापन) एक्ट, 1954 के प्रावधानों की समीक्षा और अपडेट करने का निर्देश देने की मांग की गई है। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह कानून अब मौजूदा वैज्ञानिक ज्ञान या मेडिकल प्रैक्टिस को नहीं दिखाता है। इसके अलावा आयुष डॉक्टरों को एलोपैथिक डॉक्टरों के बराबर कानून के तहत 'रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर' घोषित करने का निर्देश देने की मांग की गई है।   शीर्ष अदालत ने इस मामले की सुनवाई करते हुए केंद्रीय कानून, स्वास्थ्य और आयुष मंत्रालयों से इस जनहित याचिका पर जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान, बेंच ने औपचारिक रूप से नोटिस जारी करने से पहले याचिकाकर्ता के कम उम्र में PIL दायर करने और उसकी पैरवी उसके ही पिता द्वारा करने पर चुटकी ली और हल्के-फुल्के कमेंट्स किए। दरअसल, ये याचिका नितिन उपाध्याय नाम के लॉ स्टूडेंट ने दायर की है, जो भाजपा नेता और वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय के बेटे हैं। याचिका पर सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने पैरवी कर रहे वकील अश्विनी उपाध्याय से पूछा, "क्या यह आपका बेटा है?' इस पर अश्विनी उपाध्याय ने कहा, "जी हाँ।" तभी CJI ने चुटकी ली और कहा, "हमने सोचा था कि उसे कुछ गोल्ड मेडल वगैरह मिलेंगे, लेकिन अब तो ये PIL फाइल करने लगा है।" उन्होंने नितिन से भी पूछा, "अब तुम पढ़ाई क्यों नहीं करते?" इसी बीच, पीठ के दूसरे जज जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा, "नोटिस जारी कर रहे हैं। सिर्फ़ आपके बेटे के लिए। ताकि वह अच्छे से पढ़ाई कर सके।" बता दें कि इस जनहित याचिका में 1954 के एक्ट के शेड्यूल की समीक्षा और उसे आज के वैज्ञानिक विकास के अनुसार अपडेट करने के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी के गठन की भी मांग की गई है। इसमें तर्क दिया गया है कि हालांकि यह एक्ट जनता को गुमराह करने वाले विज्ञापनों से बचाने के लिए बनाया गया था, लेकिन धारा 3(d) कुछ बीमारियों से संबंधित विज्ञापनों पर पूरी तरह से बैन लगाती है, बिना गुमराह करने वाले दावों और सच्ची, सबूत-आधारित जानकारी के बीच अंतर किए। याचिका में कहा गया है कि चूंकि आयुष और अन्य गैर-एलोपैथिक प्रैक्टिशनर एक्ट की धारा 14 में दिए गए छूट के तहत नहीं आते हैं, इसलिए उन्हें गंभीर बीमारियों के लिए वैध दवाओं का विज्ञापन करने से प्रभावी रूप से रोक दिया गया है, जिससे जनता में अज्ञानता फैल रही है। याचिका में दावा किया गया है कि पुराना कानून बीमारियों के निदान, रोकथाम और उपचार से संबंधित जानकारी के अधिकार को असमान रूप से प्रतिबंधित करता है। इसलिए, आधुनिक चिकित्सा ज्ञान के आलोक में एक्ट की व्यापक समीक्षा की मांग की गई है।