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निवेशकों के लिए अहम रहेगा नया सप्ताह, भारत-अमेरिका ट्रेड डील और आर्थिक आंकड़ों पर टिकी बाजार की नजर

 नई दिल्ली  भारतीय शेयर बाजार के लिए अगला हफ्ता काफी अहम होने वाला है। भारत-अमेरिका ट्रेड डील, कच्चे तेल की कीमत, एफआईआई का रुझान और घरेलू आर्थिक आंकड़ों से शेयर बाजार की चाल निर्धारित होगी। भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर अगले हफ्ते निवेशकों की निगाहें रहेंगी। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार को कहा था कि भारत और अमेरिका एक व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के करीब हैं। उनका यह बयान अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर से मुलाकात के बाद आया था। दोनों देशों के व्यापारिक संबंध मजबूत होने की उम्मीद इस प्रस्तावित समझौते से दोनों देशों के व्यापारिक संबंध मजबूत होने की उम्मीद है। अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमत निवेशकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। अमेरिका ने शुक्रवार को ईरान पर स्ट्राइक की थी। इसकी वजह ईरान द्वारा हॉर्मुज स्ट्रेट पर मालवाहक जहाज को निशाना बनाना था। हालांकि, हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमत में बड़ी गिरावट देखने को मिली है और ब्रेंट क्रूड 72 डॉलर के आसपास बना हुआ है। घरेलू आर्थिक डेटा भी बाजार की चाल को प्रभावित करेगा। इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन और मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट का डेटा आएगा 29 जून को इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन और मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट का डेटा जारी होगा। 30 जून को मई का राजकोषीय घाटे और व्यापार संतुलन, 1 जुलाई को जीएसटी, ऑटो सेल्स एवं मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई और 2 जुलाई को सर्विसेज और कंपोजिट पीएमआई और विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़े आएगा। बीता हफ्ता शेयर बाजार के लिए कैसा रहा? इस हफ्ते सेंसेक्स 0.39 प्रतिशत बढ़कर 77,100.47 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 0.18 प्रतिशत की बढ़त के साथ 24,056 पर बंद हुआ। इसके अतिरिक्त, कच्चे तेल की कम कीमतों और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में सुधार के संकेतों के कारण इस हफ्ते भारतीय रुपया मजबूत हुआ। हालांकि, निवेशक यूएस फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में और बदलाव की संभावना को लेकर सतर्क बने रहे, क्योंकि इससे ग्लोबल कैपिटल फ्लो पर असर पड़ सकता है।  

FD भुगतान में 11 साल की देरी पर बैंक को झटका, उपभोक्ता को मिला पूरा मुआवजा

नई दिल्ली अगर आपने भी बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) करा रखा है, तो यह खबर आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कई लोग मानते हैं कि FD सबसे सुरक्षित निवेश विकल्प है, लेकिन अगर बैंक ही मैच्योरिटी के बाद आपकी रकम लौटाने में आनाकानी करे तो क्या होगा? ऐसा ही एक मामला सामने आया, जिसमें एक व्यक्ति को अपनी 5 लाख रुपये की FD की रकम पाने के लिए लगभग 11 साल तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। आखिरकार, अदालत ने बैंक को कड़ी फटकार लगाते हुए न केवल पूरी रकम लौटाने, बल्कि 12% ब्याज और 10,000 रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया। यह मामला केरल के त्रिशूर निवासी सेतुमाधवन का है। उन्होंने बैंक में 5 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट कराई थी, जिसकी मैच्योरिटी 2 जून 2015 को पूरी हो गई थी। जब वे अपनी जमा राशि लेने बैंक पहुंचे, तो बैंक ने तकनीकी कारणों का हवाला देकर भुगतान करने से इनकार कर दिया। काफी प्रयासों के बावजूद जब पैसा नहीं मिला, तो उन्होंने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का दरवाजा खटखटाया। उपभोक्ता आयोग ने सभी की जांच के बाद 31 दिसंबर 2021 को बैंक को आदेश दिया कि वह सेतुमाधवन को 5 लाख रुपये के साथ 12% सालाना ब्याज और 10,000 रुपये मुआवजा व मुकदमे का खर्च भी अदा करे। लेकिन, बैंक ने इस आदेश का पालन करने के बजाय अदालत में चुनौती देने का फैसला किया। बैंक ने पहले केरल हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन वह भी 825 दिन की देरी से। बैंक का तर्क था कि उस दौरान उसका प्रबंधन एक प्रशासक के अधीन था, इसलिए समय पर अपील नहीं की जा सकी। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस दलील को खारिज कर दिया और उपभोक्ता आयोग के फैसले को सही ठहराया। इसके बाद भी बैंक पीछे नहीं हटा और मामले को हाईकोर्ट की बड़ी बेंच के सामने ले गया। इस बार बैंक ने दलील दी कि वह एक सहकारी बैंक है और इसलिए इस विवाद का निपटारा उपभोक्ता आयोग नहीं, बल्कि सहकारी समिति कानून के तहत होना चाहिए। हालांकि, 2 जून 2026 को केरल हाईकोर्ट की बड़ी बेंच ने भी बैंक की सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि उपभोक्ता संरक्षण कानून लोगों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया खास कानून है और यह अन्य कानूनों के अतिरिक्त लागू होता है। इसलिए कोई भी बैंक या संस्था उपभोक्ता आयोग के अधिकार क्षेत्र से बच नहीं सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि जनता का पैसा रखने वाले बैंक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी समय पर ग्राहकों को उनका पैसा लौटाना है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बैंक के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब बैंक खुद यह नहीं नकार रहा कि जमा राशि लौटानी है, तब केवल तकनीकी बहानों के आधार पर ग्राहक को परेशान करना बेहद निंदनीय है। अदालत ने कहा कि बैंक जैसे संस्थानों को जनता का विश्वास बनाए रखना चाहिए, न कि ग्राहकों को सालों तक न्याय के लिए भटकाना चाहिए। हालांकि, सुनवाई के दौरान बैंक की ओर से 6 महीने का समय मांगा गया, ताकि वह भुगतान कर सके। अदालत ने यह अनुरोध स्वीकार करते हुए बैंक को 6 महीने के भीतर पूरी राशि, 12% ब्याज और 10,000 रुपये मुआवजा देने का अंतिम मौका दिया। यह फैसला देशभर के करोड़ों FD निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। अगर किसी बैंक या वित्तीय संस्था द्वारा मैच्योरिटी के बाद भी आपकी जमा राशि नहीं लौटाई जाती है, तो आप उपभोक्ता आयोग या अदालत का सहारा ले सकते हैं। अदालतों ने कई बार स्पष्ट किया है कि ग्राहकों के साथ लापरवाही करने वाले बैंकों को कानून के तहत जवाबदेह ठहराया जाएगा। एक्सपर्ट का मानना है कि यह फैसला बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही को और मजबूत करेगा। साथ ही यह भी साबित करता है कि उपभोक्ता अपने अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़कर न्याय प्राप्त कर सकते हैं, भले ही उसमें थोड़ा समय क्यों न लगे।  

अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल में गिरावट के बावजूद घरेलू LPG कीमतें बनी हुईं स्थिर

 नई दिल्ली एक तरफ कच्चे तेल के दाम इंटरनेशनल मार्केट में लगातार गिर रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ एलपीजी सिलेंडर दे दाम स्थिर है। युद्ध शुरू होने के बाद घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में दो बार इजाफा किया गया था। पहली बार सिलेंडर का रेट 7 मार्च 2026 को बढ़ा था। तब एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 60 रुपये की बढ़ोतरी हुई थी। वहीं, दूसरी बार कीमतों में 7 जून को इजाफा हुआ था। तब दाम 29 रुपये की बढ़ोतरी हुई थी। बता दें, आज रविवार को एलपीजी सिलेंडर के दाम में कोई भी बदलाव नहीं हुआ है। कीमतें पुराने स्तर पर ही हैं। कॉमर्शियर सिलेंडर की कीमतों में युद्ध के शुरू होने के बाद तेज इजाफा दर्ज किया है। मौजूदा समय में देश के कई बड़े शहरों में कॉमर्शियल सिलेंडर का रेट 3100 रुपये को क्रॉस कर गया। घरेलू सिलेंडर का क्या है दाम? (LPG Cylinder Rates) नई दिल्ली – 942 रुपये कोलकाता – 968 रुपये मुंबई – 941.50 रुपये चेन्नई – 957.50 रुपये गुरुग्राम – 950.50 रुपये नोएडा – 939.50 रुपये बेंगलुरू – 944.50 रुपये भुवनेश्वर – 968 रुपये चंडीगढ़ – 951.50 रुपये हैदराबाद – 994 रुपये जयपुर – 945.50 रुपये लखनऊ – 979.50 रुपये पटना – 1031.50 रुपये तिरुअनंतपुरम् – 951 रुपये कॉमर्शियल सिलेंडर का क्या है रेट? नई दिल्ली – 3113.50 रुपये कोलकाता – 3255.50 रुपये मुंबई – 3067.50 रुपये चेन्नई – 3283 रुपये गुरुग्राम – 3130 रुपये नोएडा – 3113.50 रुपये बेंगलुरू – 3198 रुपये भुवनेश्वर – 3290 रुपये चंडीगढ़ – 3136 रुपये हैदराबाद – 3367 रुपये जयपुर – 3141 रुपये पटना – 3400 रुपये लखनऊ – 3236 रुपये तिरुअनंतपुरम् – 3152 रुपये स्थिति में हो रहा है सुधार केंद्र सरकार ने बीते दिनों इंडस्ट्री को सप्लाई किए जाने वाले एलपीजी सिलेंडर की लिमिट को हटा लिया है। यानी अब उनके डिमांड के हिसाब से एलपीजी सिलेंडर मिलेंगे। सरकार ने कहा कि हालिया स्तर पर एलपीजी की बेहतर स्थिति के बाद यह फैसला लिया गया है। बता दें, युद्ध शुरू होने के बाद सरकार ने इंडस्ट्रीयल एलपीजी सिलेंडर पर कैप लगा दिया था भारत अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत तक हिस्सा कतर सहित कई अन्य अरब देशों से मंगाता है। लेकिन युद्ध की वजह से सप्लाई चेन टूट गई थी। जिसके बाद देश में एलपीजी की किल्लत देखने को मिली। सरकार ने स्थिति को देखते हुए इंडस्ट्रीयल सप्लाई पर सीमा लगा दिया। वहीं, शहरों और गांवों में बुकिंग एक निश्चित दिन तय कर दिए। इन सबके अलावा केंद्र सरकार ने घरेलू स्तर पर एलपीजी प्रोडक्शन बढ़ाने का भी निर्देश ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को दिया था।

जीएसटी सुधार: एमएसएमई के लिए आसान अनुपालन और तेज रिफंड पर सरकार का जोर

 नई दिल्ली  देश में माल एवं सेवा कर (जीएसटी) सिस्टम लागू होने के 10 साल पूरे होने जा रहे हैं। ऐसे में अब सरकार का ध्यान केवल कर संग्रह बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एआई आधारित अनुपालन, तेज रिफंड, डेटा इंटीग्रेशन और टैक्स प्रोसेस को सरल बनाने पर केंद्रित हो गया है। इसका उद्देश्य कारोबार क्षेत्रों, विशेषकर सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए अनुपालन लागत कम करना और कर चोरी पर प्रभावी अंकुश लगाना है। सरकार जीएसटी, आयकर और सीमा शुल्क के डेटाबेस को आपस में जोड़ रही है ताकि जोखिम का बेहतर आकलन किया जा सके, टैक्स चोरी की पहचान आसान हो और मैन्युअल हस्तक्षेप कम किया जा सके। सबसे बड़े आर्थिक सुधारों में गिनती एआई और डेटा विश्लेषण के जरिये अनुपालन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और एफिशिएंट बनाया जा रहा है। जीएसटी को देश के सबसे बड़े आर्थिक सुधारों में गिना जाता है। इसने अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को सरल बनाया है, करदाताओं का दायरा बढ़ाया है, अनुपालन को मजबूत किया है और सरकार के राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि की है। एक जुलाई, 2017 को आधी रात में संसद के केंद्रीय कक्ष में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जीएसटी की शुरुआत की थी। उस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे ‘गुड एंड सिंपल टैक्स’ बताते हुए कहा था कि इससे व्यापारियों और छोटे कारोबारियों को अनावश्यक परेशानियों से राहत मिलेगी। 'एक राष्ट्र, एक टैक्स' की अवधारणा जीएसटी लागू करने से पहले देश में केंद्र और राज्यों के 17 प्रकार के कर तथा 13 तरह के उपकर (सेस) लागू थे। जीएसटी में इन्हें समाहित कर पूरे देश के लिए एक समान अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था लागू की गई, जिससे 'एक राष्ट्र, एक कर' की अवधारणा को बल मिला। इस व्यापक सुधार को लागू करने में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने राज्यों और विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाने के लिए लंबी बातचीत की थी। जेटली ने इसे दुनिया की सबसे जटिल अप्रत्यक्ष कर प्रणालियों में से एक के पुनर्गठन की बड़ी उपलब्धि बताया था। टैक्स रेट में बदलाव जीएसटी लागू होने के समय देश में पंजीकृत करदाताओं की संख्या करीब 66.5 लाख थी, जो वर्ष 2026 तक बढ़कर लगभग 1.6 करोड़ हो गई है। इसे अर्थव्यवस्था के तेजी से संगठित होने का संकेत माना जा रहा है। शुरुआत में जीएसटी में चार कर स्लैब-5, 12, 18 और 28 प्रतिशत थे। वहीं विलासिता वाली वस्तुओं और अहितकर उत्पादों मसलन तंबाकू आदि पर 28 प्रतिशत के कर के अलावा अतिरिक्त उपकर भी लगाया गया। बाद में कर प्रणाली में सुधार के तहत 22 सितंबर, 2025 से नई दो-स्तरीय जीएसटी व्यवस्था लागू की गई। इसके तहत अधिकांश आवश्यक वस्तुओं को पांच प्रतिशत और सामान्य वस्तुओं एवं सेवाओं को 18 प्रतिशत कर स्लैब में रखा गया। वहीं केवल लक्जरी और अहितकर वस्तुओं पर 40 प्रतिशत की उच्च दर लागू रखी गई। सरकार का कहना है कि इस बदलाव से अधिकांश वस्तुएं सस्ती हुई हैं और उपभोक्ताओं के हाथ में अधिक नकदी बच रही है। एवरेज जीएसटी कलेक्शन 1.84 लाख करोड़ रुपये वित्त मंत्री निमला सीतारमण के अनुसार नई जीएसटी व्यवस्था का उद्देश्य आम लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाना है। जीएसटी की दरों का निर्धारण जीएसटी परिषद करती है, जिसमें केंद्र और सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। वर्ष 2017-18 में जीएसटी लागू होने के समय औसत मासिक जीएसटी संग्रह 89,700 करोड़ रुपये था, जो बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 1.85 लाख करोड़ रुपये प्रति माह पर पहुंच गया। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में औसत मासिक संग्रह 1.84 लाख करोड़ रुपये रहा था। पेट्रोलियम उत्पादों पर चर्चा जारी वित्त वर्ष 2025-26 में सकल जीएसटी संग्रह सालाना आधार पर 8.3 प्रतिशत बढ़कर 22.27 लाख करोड़ रुपये हो गया। वहीं, वित्त वर्ष 2024-25 में यह 9.4 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 22.08 लाख करोड़ रुपये रहा था। जीएसटी लागू करते समय केंद्र और राज्यों के बीच इस बात पर सहमति बनी थी कि पेट्रोलियम उत्पादों को भी संविधान संशोधन के तहत जीएसटी के दायरे में शामिल किया जाएगा। हालांकि, यह फैसला जीएसटी परिषद पर छोड़ दिया गया था कि कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल, विमान ईंधन (एटीएफ) और प्राकृतिक गैस को किस तारीख से जीएसटी के तहत लाया जाए। इस संबंध में जीएसटी परिषद में विमान ईंधन (एटीएफ) को जीएसटी के दायरे में लाने पर कुछ चर्चा हुई थी, लेकिन राज्यों ने इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। ऐसे में इस पर कोई सहमति नहीं बन सकी। सरकारी सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार इस मुद्दे पर फिलहाल राज्यों की पहल का इंतजार कर रही है। यानी जब तक राज्य इस संबंध में प्रस्ताव नहीं लाते, तब तक पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने की दिशा में आगे बढ़ने की संभावना नहीं है।  

फिटमेंट फैक्टर 2 से 4 तक की मांग: 8वें पे कमीशन से बढ़ सकती है बेसिक सैलरी में भारी उछाल

 नई दिल्ली 8वां पे कमीशन इस समय लगातार कर्मचारी और उनके संगठनों से बातचीत कर रहा है। सबसे अधिक किसी एक बात पर निगाह है तो वह फिटमेंट फैक्टर्स है। अधिक फिटमेंट फैक्टर होने की स्थिति में बेसिक पे उतना ही बढ़ जाएगा। जिसकी वजह से कर्मचारी संगठन लगातार अधिक फिटमेंट फैक्टर की डिमांड कर रहे हैं। हालांकि, अभी तक फिटमेंट फैक्टर को लेकर कोई भी आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है। आइए जानते हैं कि फिटमेंट फैक्टर कैसे सैलरी को प्रभावित करेगा। फिटमेंट फैक्टर कैसे प्रभावित करेगा सैलरी मौजूदा समय में लेवल एक के अधिकारियों का बेसिक पे 18000 रुपये है। अगर फिटमेंट फैक्टर 2 रहता है तब की स्थिति में मिनिमम बेसिक पे 36000 रुपये हो सकता है। वहीं, 2.5 फिटमेंट फैक्टर रहने की स्थिति में 45000 रुपये बेसिक पे पहुंच जाएगा। वहीं, फिटमेंट फैक्टर तीन रहने की स्थिति में बेसिक पे 54000 रुपये हो सकता है। वहीं, लेवल 13 के कर्मचारी जिनका बेसिक पे इस समय 123100 रुपये है। 2 फिटमेंट फैक्टर रहने की स्थिति बेसिक पे 246200 रुपये हो सकता है। फिटमेंट 2.5 रहने की स्थिति में मिनिमम बेसिक पे 307750 रुपये हो सकता है। 8वां वित्त आयोग लगातार कर रहा है मीटिंग पे कमीशन की तरफ से देश के अलग-अलग शहरों में मीटिंग हो रही है। दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और फिर उसके बाद उत्तर प्रदेश में 8वे वित्त आयोग की मीटिंग हो चुकी है। आगे बंगाल और उड़ीसा में 8वें पे कमीशन की मीटिंग प्रस्तावित है। बता दें, 8वें वित्त आयोग का गठन नवंबर 2025 किया गया था। इस आयोग के पास 18 महीने का समय पर है। इस दौरान कंपनी को रिपोर्ट जमा कर देना है। फिटमेंट फैक्टर को लेकर उम्मीद जताई जा रही है 8वें पे कमीशन को कर्मचारी सगंठनों की तरफ से जमा किए गए मेमोरेंडम में 4 के करीब फिटमेंट फैक्टर भी रखने की मांग हुई है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि मौजूदा मार्केट के हिसाब से सरकारी कर्मचारियों और बेहतर सैलरी मिलनी चाहिए। अब देखना है कि आयोग कितना फिटमेंट फैक्टर तय करता है। फिटमेंट फैक्टर के अलावा कर्मचारी संगठनों की तरफ से मौजूदा डीए कैलकुलेशन का फॉर्मूले भी बदलाव की डिमांड की जा रही है। बता दें, पे कमीशन का गठन हर 10 साल में किया जाता है।

ऑटो सेक्टर में बड़ी हलचल! Volkswagen बंद करेगी 4 प्लांट, 1 लाख नौकरियों पर संकट

 नई दिल्‍ली ऑडी और पोर्श जैसी लग्‍जरी कार बनाने वाली यूरोप की सबसे बड़ी ऑटो कंपनी अब ग्‍लोबल स्‍तर पर लोगों को नौकरी से निकालने की तैयारी कर रही है. फॉक्सवैगन एजी को लग्‍जरी और स्‍पोर्ट्स कार बनाने के बारे में जाना जाता है. लैम्बोर्गिनी (Lamborghini), स्कोडा (Skoda) और डुकाटी (Ducati) को भी इसी कंपनी ने बनाया है।  यह कंपनी करीब 1 लाख लोगों को नौकरी से निकालने पर विचार कर रही है और कई कारखानों को भी बंद किया जा सकता है. मैनेजर मैगजिन की रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोप की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी ज्‍यादा कम्‍प्‍टेटिव बनाने के लिए एक्‍स्‍ट्रा जॉब्‍स में कटौती की योजना बना रही है. छंटनी का ये प्‍लान कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ओलिवर ब्लूम के प्रयासों का हिस्‍सा है।  एक लाख की जाएगी नौकरी ब्‍लूमबर्ग की रिपोर्ट कहा गया है कि इस सप्ताह की शुरुआत में मैनेजिंग बोर्ड की बैठक के दौरान CEO ने एक प्रस्‍ताव पेश किया था, जिसके तहत कर्मचारियों की संख्या में दोगुनी कटौती करके 100,000 तक की छंटनी शामिल है. पोर्श और ऑडी की मालिक कंपनी फॉक्सवैगन ग्रुप में मौजूदा समय में लगभग 657,000 लोग काम करते हैं. सीईओ के इस नए प्रस्ताव को अगले महीने बोर्ड के सामने रखा जाएगा. ऐसे में फैसला अब सिर्फ बोर्ड के ऊपर है कि वह कितने लोगों की छंटनी पर मोहर लगाता है या फिर कोई अन्‍य रास्‍ता तलाश लेता है।  4 प्‍लांट बंद करेगी कंपनी  रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी रणनीति में इस दशक के अंत तक सामान्य खर्चों में 11 अरब यूरो (12.5 अरब डॉलर) की कटौती करना है, जिस कारण इतने बड़े स्‍तर पर छंटनी की तैयारी चल रही है. वहीं मिड टर्म में जर्मनी में चार कारखाने बंद करना भी शामिल है. इनमें नेकरसुलम में ऑडी का एक कारखाना और हनोवर, ज़्विकाऊ और एम्डेन में वीडब्ल्यू के प्‍लांट शामिल हैं।  क्‍यों कंपनी पर आया संकट रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फॉक्‍सवैगन समूह को और अधिक सुव्यवस्थित बनाने के लिए कंपोनेंट प्‍लांटों और सबसे महत्वपूर्ण रूप से वीडब्ल्यू ब्रांड को अलग करने पर भी विचार कर रहे हैं. यह ब्रांड लंबे समय से कम मुनाफे से जूझ रहा है. कंपनी पर यह संकट तक आया है जब कंपनी अमेरिकी टैरिफ, चीन में लगातार कमजोर सेल और यूरोप में BYD और स्टेलेंटिस एनवी समेत कई कम्‍प्‍टेटिव प्‍लेयर आ गए हैं. जिस कारण कंपनी फाइनेंशियल दिक्‍कतों से जूझ रही है।  कंपनी ने अभी तक ये कदम उठाए हैं  अपने फाइनेंशियल कंडीशन को सुधारने के लिए ग्रुप ने कुछ खास कदम उठाए हैं. ब्‍लूमबर्ग की रिपोर्ट में कहा गया है कि कैश जुटाने के लिए कंपनी ने अपनी एवरलेंस समुद्री इंजन इकाई में 51% हिस्सेदारी बेचा है. करीब 28,000 कर्मचारियों ने वीडब्ल्यू छोड़ने पर सहमति जताई है, जो 2030 तक पूरे समूह में 50,000 कर्मचारियों की छंटनी करने के पहले ही हुआ है. कंपनी ने अपनी उत्पादन क्षमता को भी हर साल 12 मिलियन वाहनों से घटाकर 9 मिलियन कर दिया है।  आसान नहीं होगी छंटनी की राह श्रमिक नेताओं ने नई योजनाओं का तुरंत विरोध किया है. कंपनी की श्रमिक परिषद और आईजी मेटाल यूनियन के संयुक्त बयान के अनुसार, ये योजनाएं कर्मचारियों और उन क्षेत्रों में अशांति पैदा करती हैं जहां हम काम करते हैं. अगर ऐसी योजनाओं को आगे बढ़ाया जाता है, तो हम उनका पूरी ताकत से विरोध करेंगे।  खैर रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फॉक्सवैगन में छंटनी करना मुश्किल है. कार निर्माता कंपनी के बोर्ड में आधी सीटें श्रमिक प्रतिनिधियों के पास हैं और जर्मनी के लोअर सैक्सोनी राज्य (जो आमतौर पर श्रमिक संघों का पक्ष लेता है ) के पास दो और सीटें हैं। 

Honda Electric SUV: 400 किमी की रेंज, एडवांस फीचर्स और शानदार डिजाइन के साथ भारत में एंट्री की तैयारी

नई दिल्ली  जापानी कार निर्माता कंपनी Honda अपनी नई 0 Alpha इलेक्ट्रिक SUV के साथ भारत के इलेक्ट्रिक कार मार्केट में कदम रखने के लिए तैयार है। Honda 0 Alpha EV को सबसे पहले 2015 टोक्यो के जापान मोबिलिटी में दिखाया गया था। हाल ही में इस कार के प्रोटोटाइप को मनाली में टेस्टिंग के दौरान देखा गया है। इसके साल 2027 में लॉन्च होने की उम्मीद है। कैसा हो सकता है डिजाइन? साइज के मामले में यह SUV Honda Elevate जैसी ही होने की उम्मीद है। इसका व्हीलबेस बड़ा होगा और फर्श बिल्कुल फ्लैट जिससे अंदर ज्याजा जगह मिल सके। वहीं, इसकी छत ऊंची है और इस इलेक्ट्रिक SUV का आकार बॉक्सी है। इसका अगला हिस्सा सीधा और ऊंचा होगा जिसमें चौकोर LED हेडलाइट्स मिल सकती हैं। इसमें क्लोज्ड ग्रिल होगी और एक काली पट्टी (Black Applique) दोनों हेडलाइटस को जोड़ेगी। कार के पीछे वर्टिकल टेललाइट्स और साफ-सुथरे डिजाइन वाला टेलगेट होने की उम्मीद है। कैसा है इंटीरियर? मनाली में सामने आई तस्वीरों में दिखा कि इसके केबिन में एक बड़ी स्क्रीन लगी है। यह टचस्क्रीन Honda के किसी भी मॉडल में मिलने वाली अब तक की सबसे बड़ी स्क्रीन हो सकती है। तस्वीरो में नीचे से फ्लैट-बॉटम स्टीयरिंग व्हील दिख रहा है जिस पर कंट्रोल बटन दिए गए हैं। ड्राइवर के लिए एक बड़ी और पूरी तरह डिजिटल डिस्प्ले भी दिखाई दे रही है। कार के AC पैनल पर इल्यूमिनेटेड कंट्रोल बटन हैं और यह एक टच पैनल जैसा लगता है। तस्वीरों में दिखी इन चीजों से संकेत मिलता है कि इस कार का केबिन तकनीक के मामले में काफी आधुनिक होने वाला है। बैटरी और रेंज Honda 0 Alpha भारत में होंडा की पहली इलेक्ट्रिक कार होगी। इस कार में एक खास EV प्लैटफॉर्म होगा और इसका आगे के पहियों को पावर देने के लिए एक सिंगल मोटर भी लगी होगी। हालांकि, कंपनी की तरफ से इसके पावरट्रेन को लेकर कोई भी जानकारी सामने नहीं आई है लेकिन उम्मीद है कि इस SUV में 60kWh या 70kWh का बैटरी पैक मिल सकता है। इसके रेंज की बात करें तो यह Alpha 0 Electric SUV एक बार चार्ज होने पर लगभग 400 किमी तक या उससे ज्यादा की रेंज दे सकती है।

मारुति ने बढ़ाए अपनी कारों के दाम, खरीदने से पहले देखें नई प्राइस लिस्ट

 नई दिल्ली मारुति सुजुकी ने अपनी कारों की कीमतों में इजाफे का ऐलान पिछले महीने किया था. जून 2026 से कारों की कीमतें बढ़ गई हैं, लेकिन अब धीरे-धीरे मारुति की कारों की बढ़ी हुई कीमतें सामने आ रही हैं. ब्रांड ने गाड़ियों की कीमतों को 30 हजार रुपये तक बढ़ाने का ऐलान किया है. कई कारों की नई कीमतें सामने आ गई थी और कुछ की अब आ रही हैं।  ब्रांड ने वैगनआर से लेकर जिम्नी तक सभी मॉडल्स की कीमतों में इजाफा किया है. वैगनआर की कीमत कंपनी ने 5 हजार रुपये बढ़ाई है. अब ये कार 4.99 लाख रुपये से 7.24 लाख रुपये की एक्स शोरूम कीमत पर आती है. इसके अलावा कंपनी ने पॉपुलर ऑफ-रोडर जिम्नी (Jimny) की कीमतों को बढ़ा दिया है।  इस कार की कीमत भी 7500 रुपये बढ़ी है. बढ़ोतरी के बाद इसकी कीमत 12.39 लाख रुपये से शुरू होकर 14.36 लाख रुपये तक जाती है. ये ब्रांड की 5-डोर फोर वील ड्राइव एसयूवी है. कीमतों के इजाफे का असर जीटा और अल्फा, मैन्युअल और ऑटोमेटिक के साथ डुअल टोन और मोनोटोन सभी वेरिएंट्स पर पड़ा है।  कई कारों की कीमतें बढ़ी हैं मारुति ने जिम्नी के अलावा दूसरी कारों की कीमतों में भी इजाफा किया है. स्विफ्ट की कीमत 7500 रुपये बढ़ी है. इसकी कीमत 5.79 लाख रुपये से 8.69 लाख रुपये तक है. वहीं बलेनो की कीमत में 7500 रुपये की बढ़ोतरी हुई है, जिसके बाद कार की कीमतें 5.99 लाख रुपये से शुरू होती है और 9.17 लाख रुपये तक जाती है।  वहीं डिजायर की कीमत भी 7500 रुपये बढ़ी है. ये कार अब 6.25 लाख रुपये से 9.36 लाख रुपये तक की कीमत पर आती है. फ्रॉन्क्स के दाम में भी 7500 रुपये का इजाफा हुआ है. मारुति सुजुकी अर्टिगा के लिए अब 10 हजार रुपये ज्यादा खर्च करने होंगे. ये कार 8.85 लाख रुपये से शुरू होकर 12.99 लाख रुपये तक की एक्स शोरूम कीमत पर आती है. एक्सएल 6 भी 10 हजार रुपये महंगी हुई है।  वहीं इनविक्टो का प्राइस 25 हजार रुपये बढ़ा है. ये कार अब 24.97 लाख रुपये से शुरू होती है और 28.60 लाख तक जाती है. ई-विटारा की कीमतों में 30 हजार रुपये और मारुति ईको वैन की कीमत में 5 हजार रुपये का इजाफा हुआ है. वैसे इन सभी गाड़ियों की कीमतें जून में ही बढ़ा दी गई हैं। 

चांदी खरीदने वालों के लिए खुशखबरी! 4% से ज्यादा टूटी कीमत, चीन से जुड़े फैसले का बड़ा असर

नई दिल्ली भारत के बाजार जहां मुहर्रम की वजह से बंद हैं वहीं, इंटरनेशनल मार्केट में चांदी के भाव में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। आज यानी शुक्रवार (26 जून) को कॉमेक्स पर सोने और चांदी की कीमतों में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कॉमेक्स सिल्वर में और भी तेज बिकवाली देखी गई और यह 4.44 प्रतिशत गिरकर 55.77 डॉलर प्रति औंस पर आ गया, जबकि इसका पिछला बंद भाव 58.025 डॉलर प्रति औंस था। वहीं, कॉमेक्स गोल्ड 44.80 डॉलर यानी 1.11 प्रतिशत की गिरावट के साथ 4,002.80 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था। कारोबारी सत्र के दौरान इसने 4,001.20 डॉलर प्रति औंस का निचला स्तर भी छुआ। यह गिरावट सोने के लिए लगातार चौथे साप्ताहिक नुकसान की ओर इशारा करती है। हाल के अमेरिकी मुद्रास्फीति आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कीमतों में दबाव अभी भी बना हुआ है, जिससे निवेशकों का ध्यान फेडरल रिजर्व की नीतिगत दिशा पर केंद्रित हो गया है। क्यों गिर रहे सोने-चांदी के दाम चीन से आई सुस्त मांग की खबर: रॉयटर्स की खबर के मुताबिक चीन के हांगकांग के माध्यम से सोने के शुद्ध आयात में मई के दौरान लगभग 38 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में से एक से भौतिक मांग के कमजोर पड़ने का संकेत है। चीन से कम मांग की खबर ने भी वैश्विक सोने के बाजार पर नकारात्मक प्रभाव डाला है। महंगाई ने बढ़ाई फेड की चिंता: गुरुवार (25 जून) को जारी आंकड़ों से पता चला कि अमेरिका में मई के दौरान महंगाई तीन वर्षों में पहली बार 4 प्रतिशत के स्तर को पार कर गई। इसका मुख्य कारण पश्चिम एशिया में तनाव के चलते बढ़ती ऊर्जा कीमतें रहीं। मुद्रास्फीति में यह तेज वृद्धि उन उम्मीदों को मजबूत करती है कि फेडरल रिजर्व अपनी मौद्रिक नीति को और सख्त करना जारी रख सकता है। फेडरल रिजर्व का सख्त रुख: फेड अधिकारियों ने भी सतर्क रुख अपनाया है। शिकागो फेड प्रेसिडेंट ऑस्टेन गूल्सबी ने कहा कि सेवा क्षेत्र की मुद्रास्फीति में कुछ सुधार के बावजूद, मुद्रास्फीति का दबाव अभी भी ऊंचा बना हुआ है। वहीं, न्यूयॉर्क फेड प्रेसिडेंट जॉन विलियम्स ने स्पष्ट किया कि मुद्रास्फीति केंद्रीय बैंक के 2 प्रतिशत के लक्ष्य से काफी ऊपर है। CME FedWatch के आंकड़ों के अनुसार, ट्रेडर्स अब इस वर्ष तीन ब्याज दर वृद्धि की संभावना जता रहे हैं। पिछले एक सप्ताह में सितंबर में दर वृद्धि की उम्मीदें तेजी से बढ़ी हैं। ब्याज दरों में वृद्धि का सीधा असर सोने-चांदी जैसी गैर-ब्याज देने वाली संपत्तियों पर पड़ता है, क्योंकि निवेशक उनकी बजाय ब्याज देने वाली संपत्तियों की ओर रुख करते हैं। मजबूत डॉलर ने बढ़ाई कीमतों पर मुश्किल: अमेरिकी डॉलर इंडेक्स लगातार दूसरे सप्ताह बढ़त की ओर बढ़ रहा है, जो सोने-चांदी के लिए एक और नकारात्मक संकेत है। डॉलर के मजबूत होने से अन्य मुद्राओं वाले खरीदारों के लिए सोना-चांदी महंगा हो जाता है, जिससे मांग पर दबाव पड़ता है और कीमतों में गिरावट आती है। इसके अलावा, डॉलर की मजबूती वैश्विक बाजारों में निवेशकों के जोखिम उठाने के रुख को भी प्रभावित करती है। जियो-पॉलिटिकल टेंशन का बाजार पर असर: जियो-पॉलिटिकल टेंशन भी निवेशकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। संयुक्त राष्ट्र की अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) ने एक जहाज पर हमले की रिपोर्ट के बाद होर्मुज के माध्यम से जहाजों के संरक्षण अभियानों को रोक दिया है। इस घटना ने अमेरिका-ईरान के नाजुक शांति समझौते को लेकर नई अनिश्चितताएं पैदा कर दी हैं। इस तरह की घटनाओं से ग्लोबल सप्लाई चेन बाधित होने का खतरा बना रहता है, जिससे बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। अमेरिकी PCE डेटा पर टिकी निगाहें: बाजार सहभागी अब आगामी अमेरिकी PCE (व्यक्तिगत उपभोग व्यय) मुद्रास्फीति के आंकड़ों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। यह डेटा ब्याज दरों की उम्मीदों और कीमती धातुओं की दिशा के लिए अतिरिक्त संकेत प्रदान कर सकता है। PCE, फेडरल रिजर्व का पसंदीदा मुद्रास्फीति मापक माना जाता है, इसलिए इसके आंकड़ों का बाजार पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।  

आज से बदल गए LPG के नियम! कच्चे तेल की कीमत घटते ही सरकार का बड़ा ऐलान, जानिए क्या बदला

 नई दिल्‍ली एलपीजी को लेकर सरकार ने बड़ा ऐलान किया है. अभी तक जो भी नियम कायदे और पाबंदियां लागू थीं, उसे अब खत्‍म कर दिया गया है. लेकिन यह सिर्फ इंडस्ट्रियल और कमर्शियल LPG ग्राहकों के लिए ही है. सरकार ने नॉन-डोमेस्टिक पैक्ड LPG की सप्लाई पर लगी सभी सेक्टर-वाइज पाबंदियां हटा दी हैं और सप्लाई को वेस्ट एशिया संकट से पहले के स्तर पर बहाल कर दिया है।  पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कहा कि संकट की शुरुआत में रोकी गई बल्क LPG की सप्लाई में भी ढील दी गई है. इसे संकट से पहले की खपत के स्तर का 50% कर दिया गया है, जिससे कमर्शियल और इंडस्ट्रियल कस्‍टमर्स को काफी राहत मिली है. यह बहाली LPG सप्लाई की स्थिति में हाल ही में हुए सुधार के बाद की गई है.  सरल शब्‍दों में कहें तो 50 फीसदी एलपीजी की सप्‍लाई अब कमर्शियल और इंडस्‍ट्री कस्‍टमर्स को की जाएंगी।  वेस्ट एशिया संकट के दौरान, घरेलू LPG उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार ने 'आवश्यक वस्तु अधिनियम' के तहत आदेश जारी किए थे. इन आदेशों के तहत C3-C4 स्ट्रीम्स का इस्तेमाल सिर्फ़ LPG उत्पादन के लिए करना जरूरी कर दिया गया था और उन्हें पेट्रोकेमिकल व अन्य डाउनस्ट्रीम इस्तेमाल से हटाकर LPG उत्पादन में लगाया गया था।  C3-C4 स्ट्रीम्स को लेकर बदलाव पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कहा कि घरेलू LPG उत्पादन में सुधार और इम्पोर्टेड LPG कार्गो की अनुमानित उपलब्धता को देखते हुए, सरकार ने LPG पूल में C3/C4 स्ट्रीम्स के डायवर्जन को कम करने का भी फैसला किया है. नॉन-LPG इस्तेमाल के लिए C3-C4 स्ट्रीम्स का बढ़ा हुआ आवंटन लागू किया जाएगा, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि घरेलू LPG की उपलब्धता पर कोई असर न पड़े।  घरेलू एलपीजी पर कोई असर नहीं सरकार ने साफ किया है कि पेट्रोकेमिकल सेक्टर के लिए C3-C4 गैसों का आवंटन बढ़ाने के बावजूद आम जनता के लिए घरेलू एलपीजी की उपलब्‍धता को कम नहीं किया जाएगा. सरकार यह तय करेगी कि घरेलू एलपीजी का उत्‍पादन कम से कम 40 टीएमटी हर दिन बना रहे. इसका मतलब है कि रसोई एलपीजी गैस की सप्‍लाई बनी रहेगी। कच्‍चे तेल के दाम में बड़ी गिरावट  जंग शुरू होने से पहले कच्‍चा तेल जिस लेवल पर पहुंचा था, अब उससे भी नीचे आ चुका है. ब्रेंट क्रूड की कीमत अब 72 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रही है. तेल की कीमतों में यह गिरावट तब आई है, जब होर्मुज को फिर से खोल दिया गया है और जहाज तेजी से होर्मुज पार कर रहे हैं।