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मनोज जरांगे ने BMC चुनाव से पहले दी नई चुनौती, फडणवीस के मंत्री पहुंचे समझाने

मुंबई महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलनकारी मनोज जरांगे ने एक बार फिर राज्य सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हालांकि, राज्य सरकार ने तेजी दिखाते हुए मंत्रियों का एक प्रतिनिधिमंडल भेजकर मनोज जरांगे से बातचीत करने के अपने प्रयास तेज कर दिए हैं। जरांगे बुधवार की सुबह जैसे ही मुंबई के लिए रवाना हुए। राज्य की फडणवीस सरकार ने शिवनेरी में उनसे मिलने के लिए एक मंत्रिस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजा। दरअसल, मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे 29 अगस्त से मुंबई में अपना आंदोलन शुरू करने पर अड़े हुए हैं। उन्होंने संवाददाताओं को बताया कि उन्हें कैबिनेट उप-समिति के प्रमुख और राज्य के मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल का फोन आया था, जिसमें उन्हें बताया गया था कि सरकार की एक टीम चर्चा के लिए पुणे जिले के शिवनेरी पहुंचेगी। जरांगे ने पत्रकारों को बताया, ‘‘विखे पाटिल द्वारा भेजा गया प्रतिनिधिमंडल शिवनेरी आएगा। सरकार ने बातचीत करने की इच्छा जताई है, लेकिन मुंबई आंदोलन पर हमारा रुख अपरिवर्तित है।’’ इस बीच, विखे पाटिल ने कहा कि सोमवार को हुई कैबिनेट उप-समिति की पहली बैठक में मराठा समुदाय के करीबी रिश्तेदारों को आरक्षण का लाभ देने से संबंधित जरांगे की मांगों पर विचार-विमर्श किया गया। उन्होंने बताया कि मराठा आरक्षण पर शिंदे समिति को छह महीने का विस्तार दिया गया है, जिसकी मांग जरांगे ने पहले भी की थी। विखे पाटिल ने कहा, ‘‘उप-समिति ने अपनी पहली ही बैठक में इस मांग को स्वीकार कर लिया।’’ जरांगे मराठा समुदाय को कुनबी जाति (अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल एक जाति) के रूप में मान्यता दिलाने की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं, ताकि उन्हें शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिल सके। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जरांगे से मंगलवार को अनुरोध किया था कि वह 27 अगस्त से शुरू हो रहे गणेश उत्सव के दौरान मुंबई में प्रदर्शन करने की अपनी योजना पर फिर से विचार करें। महाराष्ट्र सरकार द्वारा उन्हें रोकने के प्रयासों के बावजूद जरांगे ने घोषणा की है कि वह 29 अगस्त से मुंबई के आजाद मैदान में मराठा आरक्षण के लिए फिर से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल करेंगे।  

कांग्रेस पर बरसीं शोभा करंदलाजे, कहा- मंदिर को धर्मनिरपेक्ष बताना गलत

बेंगलुरु  कर्नाटक सरकार द्वारा अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका बानू मुश्ताक को मैसूरू के मशहूर दशहरा उत्सव कार्यक्रम का उद्घाटन करने के लिए बुलाने के फैसले पर रार छिड़ा हुआ है। यह मामला राज्य में अब कांग्रेस बनाम भाजपा की सियासी लड़ाई बनती जा रही है। अब केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे भी इस राजनीतिक लड़ाई में कूद पड़ी हैं। उन्होंने उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार द्वारा इस आमंत्रण के समर्थन में की गई टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई है। करंदलाजे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक लंबे पोस्ट में लिखा है, "उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की यह टिप्पणी कि चामुंडेश्वरी मंदिर सिर्फ हिंदुओं की संपत्ति नहीं है, बहुत ही निंदनीय है।" उन्होंने आगे लिखा, “ऐसा लगता है कि वह कांग्रेस आलाकमान को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि कर्नाटक विधानसभा में आरएसएस की प्रार्थना पढ़ने के लिए लगाए गए फटकार की भरपाई कर सकें। कांग्रेस पार्टी का लहजा, तेवर और रुख हमेशा से हिंदू विरोधी और हिंदू हितों के खिलाफ रहा है।” मंदिर 'धर्मनिरपेक्ष स्थान' नहीं केंद्रीय मंत्री ने लिखा है, "जो लोग धर्मनिरपेक्षता का उपदेश देते रहते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि मंदिर 'धर्मनिरपेक्ष स्थान' नहीं हैं, बल्कि वे पवित्र संस्थान हैं जिनका अधिकार हिंदुओं का है।" भाजपा नेता ने लिखा है, “कांग्रेस पार्टी ने अपनी हिंदू विरोधी मानसिकता को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने बानू मुश्ताक को मैसूर दशहरा के उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया, जो खुलेआम हमारे देवताओं को अस्वीकार करती हैं और अब उनके उप-मुख्यमंत्री यह कहने का साहस कर रहे हैं कि चामुंडी हिंदुओं की संपत्ति नहीं है। क्या यही कर्नाटक की आस्था और परंपराओं के प्रति उनका सम्मान है?” चामुंडेश्वरी मंदिर केवल हिंदुओं की संपत्ति नहीं: डीके एक दिन पहले जब इस विवाद पर कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार से पूछा गया था तो उन्होंने कहा था कि मैसुरू स्थित चामुंडी हिल, जहां प्रसिद्ध चामुंडेश्वरी मंदिर स्थित है, केवल हिंदुओं की संपत्ति नहीं है। शिवकुमार ने यह बयान अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित बानू मुश्ताक को इस वर्ष 22 सितंबर को चामुंडी हिल की चोटी पर विश्व प्रसिद्ध 'मैसुरू दशहरा- 2025' समारोह का उद्घाटन करने के लिए दिए गए सरकारी निमंत्रण के विरोध पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए दिया। कांग्रेस के खिलाफ भाजपा ने खोला मोर्चा शिवकुमार ने कहा, ‘‘चामुंडी हिल और देवी चामुंडी हर धर्म की हैं, यह केवल हिंदुओं की संपत्ति नहीं है। सभी समुदायों के लोग चामुंडी हिल जाते हैं और देवी की पूजा करते हैं, यह उनकी आस्था है। हम चर्च, जैन मंदिर, दरगाह, गुरुद्वारे जाते हैं… यह (मुश्ताक का विरोध) पूरी तरह से राजनीति है।’’ शिवकुमार ने कहा था, "हिंदू मंदिरों में अल्पसंख्यक भी जाते हैं। हम मस्जिदों और चर्चों में भी जाते हैं। इसे कौन रोक सकता है?" उनके इस बयान पर विपक्षी दल भाजपा ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। विधानसभा में विपक्ष के नेता आर अशोक ने भी कहा कि चामुंडी पहाड़ी पक्के तौर पर हिंदुओं की संपत्ति है, मुसलमानों की नहीं। मैसुरू के सांसद यदुवीर कृष्णदत्त चामराजा वाडियार ने भी शिवकुमार के बयान की निंदा की है।

शिवराज सिंह चौहान पर ठहरी निगाहें, भाजपा अध्यक्ष की रेस में अटकलें तेज

नई दिल्ली  भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के नाम पर अब तक मुहर नहीं लग सकी है। साथ ही पार्टी की तरफ से कोई तारीख सार्वजनिक नहीं की गई है। अब कहा जा रहा है कि बीजेपी बिहार विधानसभा चुनाव का शेड्यूल आने से पहले अध्यक्ष के नाम का ऐलान कर सकती है। साथ ही RSS यानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख प्रमुख मोहन भागवत के साथ केंद्रीय मंत्री की मुलाकात ने अटकलें तेज कर दी हैं। हालांकि, भाजपा की तरफ से आधिकारिक तौर पर साफ नहीं किया गया है कि अगले प्रमुख के नाम की घोषणा कब होगी। रिपोर्ट के अनुसार, सूत्र बताते हैं कि पार्टी आलाकमान की तरफ से संभावित उम्मीदवारों की सूची तैयार कर ली गई है। वहीं, इस पर 9 सितंबर को होने वाले उपराष्ट्रपति चुनाव के बाद विचार किया जाएगा। उन्होंने बताया है कि इसके बाद नए अध्यक्ष के चुनाव की जानकारी दी जा सकती है। संभावनाएं जताई जा रही हैं कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों के प्रमुख पहले चुने जाएंगे। रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों ने यह भी कहा है कि अगर अध्यक्ष बिहार चुनाव की घोषणा से पहले नहीं चुना गया, तो नियुक्ति चुनाव के बाद ही की जाएगी। फिलहाल, भाजपा ने अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए किसी शेड्यूल का ऐलान नहीं किया है। दिल्ली में बड़ी मीटिंग रविवार को केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और संघ प्रमुख भागवत की मीटिंग की खबरें हैं। मीडिया रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया कि यह बैठक बंद कमरे में 45 मिनट तक चली। खास बात है कि चौहान को भी अध्यक्ष पद के प्रमुख दावेदारों में से एक माना जा रहा है। खास बात है कि यह मीटिंग दो साल के लंबे अंतराल के बाद हुई थी। इन नामों की भी चर्चा इससे पहले कहा जा रहा था कि केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी, आंध्र प्रदेश की भाजपा प्रमुख डी पुरंदेश्वरी, भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष वनति श्रीनिवासन, केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और भूपेंद्र यादव, भाजपा नेता विनोद तावड़े के नाम की भी चर्चाएं चल रही थीं। हालांकि, इन्हें लेकर भाजपा ने आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा है।  

‘वोटर अधिकार यात्रा’ में प्रियंका गांधी की मौजूदगी, बिहार कांग्रेस ने कहा—सकारात्मक माहौल

सुपौल  लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में बिहार में कथित तौर पर वोट चोरी के खिलाफ इंडिया ब्लॉक की वोटर अधिकार यात्रा में मंगलवार को सांसद प्रियंका गांधी भी शामिल हो गईं। वोटर अधिकार यात्रा के 10वें दिन की यात्रा आज सुपौल से शुरू हुई है। सुपौल में इस यात्रा को लेकर लोगों में उत्साह देखा जा रहा है। यात्रा में बड़ी संख्या में कांग्रेस के कार्यकर्ता बड़े-बड़े झंडे लेकर शामिल हुए हैं। वोटर अधिकार यात्रा झंझारपुर होते हुए दरभंगा तक पहुंचेगी। प्रियंका गांधी के इस यात्रा में शामिल होने से कार्यकर्ताओं और समर्थकों में उत्साह का माहौल है। बिहार कांग्रेस ने आज की वोटर अधिकार यात्रा का एक वीडियो जारी करते हुए एक्स पर लिखा, "सुपौल में बन गया माहौल। वोट चोर — गद्दी छोड़।" दरअसल, बिहार में निर्वाचन आयोग द्वारा एसआईआर के तहत 65 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम काटे जाने के खिलाफ इंडिया ब्लॉक द्वारा वोटर अधिकार यात्रा निकाली गई है। इसमें गठबंधन में शामिल राजद के नेता तेजस्वी यादव सहित बिहार के सभी घटक दलों के नेता शामिल हो रहे हैं। आज इस यात्रा के दसवें दिन की शुरुआत सुपौल जिले से हुई है। कल यानी सोमवार को इस यात्रा को ब्रेक दिया गया था। इस साल बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाला है। इस यात्रा के जरिए विपक्षी दल के गठबंधन के लोग लोगों के बीच पहुंच रहे हैं और उन्हें अपनी बात कह रहे हैं। राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा 17 अगस्त को बिहार के सासाराम से शुरू हुई है। इस यात्रा में इंडिया ब्लॉक में शामिल राजद के नेता तेजस्वी यादव सहित घटक दलों के सभी नेता भी शामिल हैं। 16 दिन की यह यात्रा लगभग 20 जिलों से होकर गुजरेगी और 1,300 किलोमीटर का सफर पूरा करेगी। एक सितंबर को पटना में बड़ी रैली के साथ यात्रा का समापन होगा। यह यात्रा अब तक औरंगाबाद, गया, शेखपुरा, कटिहार, पूर्णिया, मुंगेर, भागलपुर होते हुए सुपौल पहुंची है।

DK पर दबाव बढ़ा, RSS प्रार्थना के बाद हाईकमान से ऐक्शन की मांग; सिद्धारमैया समर्थक बढ़त में

बेंगलुरु  कर्नाटक कांग्रेस में सत्ता संघर्ष नई बात नहीं है, लेकिन अब आरएसएस की प्रार्थना के चलते पार्टी में मतभेद है। डिप्टी सीएम शिवकुमार ने श्रद्धा भाव के साथ आरएसएस की प्रार्थना की दो पंक्तियां विधानसभा में पढ़ दी थीं। इसी को लेकर कांग्रेस के कई विधायक नाराज हैं। यही नहीं कोई डीके शिवकुमार से माफी की मांग कर रहा है तो किसी ने हाईकमान से ऐक्शन की बात ही उठा दी है। डीके शिवकुमार ने नेता विपक्ष आर. अशोक से बातचीत के दौरान आरएसएस की ओर से राज्य में स्कूलों और कई सामाजिक संस्थाएं खोलने का जिक्र करते हुए तारीफ की थी। इसके अलावा आरएसएस की प्रार्थना की भी दो पंक्तियां सुनाई थीं। अब इस मामले में वह पार्टी के अंदर ही घिर गए हैं। राज्य के पीडब्ल्यूडी मंत्री सतीश जरकिहोली का कहना है कि हाईकमान और सीएम सिद्धारमैया के ऊपर है कि वह डीके शिवकुमार पर इस हरकत के लिए क्या ऐक्शन लेते हैं। इसके अलावा एमएलसी बीके हरिप्रसाद का कहना है कि डीके शिवकुमार को इसके लिए माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि शिवकुमार पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। कम से कम यह स्पष्ट होना चाहिए कि उन्होंने पार्टी नेता के तौर पर नहीं बल्कि निजी स्तर पर यह प्रार्थना पढ़ी थी। वहीं जरकिहोली ने कहा कि हम अपने स्तर पर तो कुछ नहीं कर सकते। इस मामले में हाईकमान को ही फैसला लेना है। इस मामले के चलते सिद्धारमैया कैंप को भी हावी होने का मौका मिल गया है, जो डीके शिवकुमार की सीएम पद की दावेदारी को लेकर असहज रहा है। जरकिहोली को भी सिद्धारमैया खेमे का नेता माना जाता है। उन्होंने कहा कि यह सवाल तो उठता ही है क्या शिवकुमार ने जो किया, वह राहुल गांधी की लाइन पर है। उन्होंने कहा कि कुछ मामलों को डीके शिवकुमार समझते ही नहीं हैं। उम्मीद है कि वह कुछ सीखेंगे। हालांकि जरकिहोली ने एक दिन पहले ही डिप्टी सीएम का बचाव भी किया था। उन्होंने कहा था कि आरएसएस की प्रार्थना तो मैं भी पढ़ लूंगा। लेकिन क्या वे मुझे सीएम बना देंगे? यही नहीं उन्होंने कहा था कि हमेशा किसी का विरोध ही नहीं किया जा सकता। यह कहना सही नहीं है कि आरएसएस की प्रार्थना पढ़ ली तो अब डीके शिवकुमार भाजपा में ही शामिल हो जाएं। इसमें कुछ गलत नहीं है। वह सब जानते हैं। हमारे पास हमेशा काउंटर इंटेलिजेंस होना चाहिए। यानी विरोधी खेमे के बारे में भी पता होना चाहिए। वहीं हरिप्रसाद ने कहा कि डीके शिवकुमार को जो करना है करें। लेकिन पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते उन्होंने जो किया है, वह गलत था। हम इसका विरोध करते हैं।

कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ीं, साथी दलों ने राहुल गांधी को छोड़कर बढ़ाया कदम खींचने का दबाव

नई दिल्ली सबको जोड़कर चलने की कोशिश में जुटी कांग्रेस एक बार फिर अकेली पड़ती जा रही है. पीएम-सीएम वाले बिल पर विपक्षी एकता का गुब्बारा फुटने लगा है. पीएम-सीएम को हटाने वाले बिल पर जीपीसी में शामिल होने को लेकर इंडिया ब्लॉक में दो फाड़ नजर आ रहा है. इंडिया गठबंधन के प्रमुख साथियों ने कांग्रेस को फंसा दिया है. जेपीसी मामले पर राहुल गांधी अब बीच मझधार फंस चुके हैं. यहां से वह किस ओर जाएंगे, यह आने वाले वक्त में पता चल जाएगा. दरअसल, भ्रष्टाचार यानी आपराधिक मामलों में कम से कम 30 दिनों तक बिना बेल के जेल में रहने वाले प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को हटाने वाले बिलों को जेपीसी के लिए भेजा गया है. इस बिल पर विचार करने के लिए बनने वाली जेपीसी यानी संयुक्त संसदीय समिति में शामिल होने को लेकर ही विपक्षी खेमे यानी इंडिया ब्लॉक मतभेद है. कांग्रेस की क्या प्लानिंग? ET की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि DMK के TKS एलंगोवन ने कहा कि उनकी पार्टी ने बिल के विरोध करने और उसे दर्ज कराने के लिए जेपीसी में शामिल होने का फैसला लिया है। वहीं कांग्रेस के एक सांसद ने कहा, "हमारे पास यह सोचने के उपयुक्त कारण हैं कि जेपीसी में शामिल होना कैसे उपयोगी हो सकता है।" उन्होंने कहा कि हम हर किसी को बीजेपी के खिलाफ एक साथ ले जाना चाहते हैं। विपक्षी दल कह रहे JPC बेमतलब बता दें कि इंडिया गठबंधन में शामिल रही आम आदमी पार्टी ने भी तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की ही तरह जेपीसी में अपने सदस्य नामित नहीं करने का फैसला किया है। हालांकि, वामपंथी दलों ने अपनी स्थिति णअभी स्ष्ट नहीं की है लेकिन माना जा रहा है कि वह इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ है और जेपीसी में अपना विरोध दर्ज कराना चाहते हैं। कई विपक्षी दलों ने कहा है कि इस मुद्दे पर जेपीसी बेमतलब है। विपक्षी एकता में दरार? जब संसद में 130वां संविधान संशोधन विधेयक पेश हुआ तब विपक्षी खेमा एकजुट नजर आया था. मगर अब धीरे-धीरे इस एकता की दीवार ढहने लगी है. पीएम-सीएम वाले बिल पर जेपीसी में हिस्सा लेने को लेकर इंडिया ब्लॉक के प्रमुख दलों में गहरी दरार उभर आई है. अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे से लेकर अरविंद केजरीवाल तक सबने कांग्रेस को फंसा दिया है. सपा, टीएमसी, आप और उद्धव गुट वाली शिवसेना ने जेपीसी से अलग रहने का फैसला किया है. हालांकि, कांग्रेस ने अब तक जेपीसी में शामिल होने के संकेत दिए हैं. इंडिया गठबंधन के सहयोगियों के इस फैसले ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को बीच मजधार में अकेला छोड़ दिया है. अब कांग्रेस के सामने यह मुसीबत है कि वह अकेले जेपीसी में जाएगी या फिर अन्य साथियों की तरह अलग रहने का ही फैसला लेगी? क्या है पीएम-सीएम बिल दरअसल, बीते दिनों संविधान (130वां) संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश हुआ. यह बिल और इसके साथ जुड़े जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन संशोधन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश शासन संशोधन विधेयक में प्रावधान है कि अगर कोई मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री किसी ऐसे अपराध में गिरफ्तार या हिरासत में रहता है, जिसकी सजा पांच साल या उससे अधिक है, और यह हिरासत लगातार 30 दिन तक रहती है, तो वह अपने पद से खुद ब खुद बर्खास्त हो जाएंगे. हालांकि, जेल से आने के बाद वह पद ग्रहण कर सकते हैं. यह विधेयक 20 अगस्त को लोकसभा में पेश हुआ. इस दौरान विपक्षी सांसदों ने इसका विरोध किया. इसके बाद सरकार ने पीएम-सीएम वाले बिल को 31 सदस्यीय जेपीसी यानी संयुक्त संसदीय समिति को भेजने का फैसला किया. जेपीसी में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल होंगे.अभी तक इसका गठन नहीं हुआ है. जानिए किसका क्या स्टैंड ममता बनर्जी की टीएमसी ने भी जेपीसी से अलग होने का फैसला किया है. टीएमसी का कहना है कि यह बिल भाजपा की ‘राजनीतिक साजिश’ है, जो विपक्ष को फंसाने और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उलझाने का प्रयास है. जेपीसी में शामिल होकर टीएमसी भाजपा के खेल में नहीं पड़ेगी. अखिलेश की समाजवादी पार्टी का भी यही स्टैंड है. खिलेश यादव ने इसे ‘संघीय ढांचे पर हमला’ करार दिया. अखिलेश ने कहा कि यह बिल राज्यों की स्वायत्तता को कमजोर करेगा. हमारा फैसला स्वतंत्र है, और इस मामले में हम कांग्रेस के साथ नहीं चलेंगे. वहीं, उद्धव गुट वाली शिवसेना ने भी ममता और अखिलेश की राह अपनाई है. उद्धव ठाकरे ने कहा कि विपक्षी एकता चुनावों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। लेकिन इस बिल पर जेपीसी में शामिल होना मतलब भाजपा की रणनीति को वैधता देना है। हम बाहर रहकर जनता के बीच मुद्दा उठाएंगे. शिवसेना नेता संजय राउत का कहना है कि उद्धव ठाकरे को लगता है कि जेपीसी का कोई मतलब नहीं है. वहीं, अरविंद केजरीवाल की आप के सांसद संजय सिंह ने कहा कि पार्टी जेपीसी में शामिल नहीं होगी, क्योंकि ये बिल भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि विपक्ष के नेताओं को निशाना बनाने के लिए लाया गया है. राजद भी इससे अलग रहने का मन बना रही है. कांग्रेस फंस गई कांग्रेस? इस तरह इन चार दलों के फैसले ने कांग्रेस को मुश्किल में डाल दिया है. हालांकि, कांग्रेस ने अभी तक आधिकारिक फैसला नहीं लिया, लेकिन पार्टी सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी जेपीसी में शामिल होने के पक्ष में हैं, ताकि बिल के कमजोर पक्षों को उजागर किया जा सके. हालांकि, अखिलेश, ममता, अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे के फैसले के बाद कांग्रेस पर दबाव बढ़ गया है. कांग्रेस असमंजस में है. वह क्या करे और क्या नहीं, अभी इस पर मंथन कर रही है. अगर कांग्रेस अकेले जाती है, तो यह इंडिया ब्लॉक की एकता को और कमजोर कर सकता है. साथ ही भाजपा को विपक्ष की कमजोरी का फायदा मिल सकता है. यह स्थिति राहुल गांधी के लिए चुनौतीपूर्ण है और ऐसा लग रहा है कि वह बीच मझधार में हैं. अब देखने वाली बात होगी कि इससे राहुल गांधी कैसे पार पाते हैं.

आगर मालवा: सियासी उलटफेर, नगर परिषद अध्यक्ष ने बदला पार्टी दामन

आगर मालवा मध्य प्रदेश के आगर मालवा की नगर परिषद सुसनेर में बड़ा सियासी उलटफेर सामने आया है। नगर परिषद सुसनेर की अध्यक्ष लक्ष्मी राहुल सिसोदिया ने भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया। बताया जाता है कि विधायक भैरोसिंह परिहार एवं अन्य कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी में लक्ष्मी सिसोदिया ने कांग्रेस की सदस्यता ली। इस दौरान कांग्रेस नेताओं ने दुपट्टा पहनाकर उनका स्वागत किया। पार्षदों ने खोला था मोर्चा दरअसल, नगर परिषद की अध्यक्ष लक्ष्मी सिसोदिया के खिलाफ दो दिन पहले तक भाजपा और कांग्रेस के पार्षद अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में थे। बताया जाता है कि कुछ दिन पहले ही भाजपा और कांग्रेस के पार्षदों ने सिसोदिया के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया शुरू की थी। दोनों दल के पार्षदों ने अध्यक्ष लक्ष्मी सिसोदिया पर भ्रस्टाचार के आरोप लगाते हुए पद छोड़ने को लेकर मुहिम चला रखी थी। इसके लिए कलेक्टर कार्यलय समेत एसडीएम को पत्र भी लिखा जा चुका था। कलेक्टर कार्यालय में दिया था आवेदन इन पार्षदों ने कलेक्टर कार्यालय में आवेदन दिया था। शनिवार को इन्हीं पार्षदों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिसोदिया पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। सुसनेर में 15 पार्षद हैं। इनमें से 12 पार्षदों ने अध्यक्ष लक्ष्मी राहुल सिसोदिया के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। पार्षदों ने उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लागते हुए अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया शुरू की थी। इसमे भाजपा के 8 और कांग्रेस के 4 पार्षद शामिल थे। ई-रिक्शा ओर डीजल घोटाले के आरोप शनिवार को रेस्ट हाउस में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पार्षदों ने ई रिक्शा से लेकर डीजल घोटाले के आरोप लगाए थे। पार्षदों का आरोप था कि अध्यक्ष और उनके परिजनों के निजी वाहनों में नगर परिषद से डीजल भरवाया गया। इसके सीसीटीवी फुटेज मौजूद हैं। पार्षदों का आरोप था कि एक व्यक्ति से नौकरी के नाम पर 1 लाख रुपए लिए गए। घोटाले का आरोप पार्षदों का दावा था कि उज्जैन-झालावाड़ राष्ट्रीय राजमार्ग पर बने लाखा प्रवेश द्वार को बेच दिया गया है। ई-रिक्शा कचरा वाहन खरीदी में घोटाला हुआ है। लोकायुक्त की जांच में इसकी पुष्टि हुई है। हाथ ठेला कचरा गाड़ी में भी गबन किया गया है। धार्मिक ग्रंथ ओर देवी देवताओं की खाई कसम प्रेस वार्ता के बाद सभी पार्षदों ने धार्मिक ग्रंथों और देवी-देवताओं की कसम खाकर अध्यक्ष को हटाने का संकल्प लिया था। इस दौरान पार्षद प्रतिनिधि जितेंद्र सांवला ने बताया कि नगर परिषद कार्यालय से एलईडी लैंप चोरी का मामला दर्ज है। नए बसस्टैंड तालाब से जलकुंभी हटाने पर लाखों खर्च किए गए। जलकुंभी कंठाल नदी में फैलकर किटखेड़ी तक पहुंच गई है। इससे नलजल योजना का पानी दूषित हो रहा है। एक दिन पहले हुई थी प्रेस कॉन्फ्रेंस  सुसनेर डाक बंगला स्थित विश्राम गृह पर आयोजित प्रेस वार्ता में सत्तापक्ष के भीतर गहराते असंतोष को को लेकर पार्षदों और उनके प्रतिनिधियों ने एक स्वर में अध्यक्ष पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए उन्हें कुर्सी से हटाने की कसम खाई। उनको कहना था कि अब उनका धैर्य जवाब दे चुका है। वे अध्यक्ष को हटाने के लिए किसी भी हद तक जाएंगे। इस बार विपक्षी कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा के पार्षद भी अध्यक्ष के विरोध में खड़े दिख रहे थे। प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए आरोप प्रेस वार्ता के दौरान पार्षदों ने आरोप लगाया कि परिषद में ई-रिक्शा की खरीदी से लेकर लोहे की हाथ गाड़ियों, एलईडी लाइटों और मरम्मत कार्यों में बड़े पैमाने पर कथित तौर पर अनियमितताएं हुई हैं। पार्षदों ने कहा कि मरम्मत के नाम पर दो वर्षों में लगभग 20 लाख रुपए का भुगतान किया गया, लेकिन सुधार कार्य कहीं दिखाई नहीं दे रहे। लक्ष्मी सिसोदिया ने नकारे आरोप सुसनेर पार्षदों के आरोपों को परिषद अध्यक्ष लक्ष्मी राहुल सिसोदिया सिरे से नकार दिया। उनका कहना है कि पार्षदों के आरोप पूरी तरह निराधार हैं। विकास और निर्माण कार्य नियमानुसार हुए हैं। विधायक भैरोंसिंह परिहार ने कहा कि सिसोदिया को उनकी ही पार्टी के लोग पद से हटाने की कोशिश कर रहे थे। उनके कांग्रेस में शामिल होने से पार्टी और मजबूत होगी।

पूर्व CM कमलनाथ बोले, सिंधिया को लगा दिग्विजय सरकार चला रहे थे, इसलिए बगावत

भोपाल  2020 में मध्य प्रदेश कांग्रेस सरकार गिरने की वजह का खुलासा पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पांच साल बाद किया है. कमलनाथ ने कहा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को लगता था कि सरकार दिग्विजय सिंह चला रहे हैं, जिसके चलते उन्होंने कांग्रेस के 22 विधायकों को तोड़कर सरकार गिरा दी. इस बयान ने मध्य प्रदेश की सियासत में हलचल मचा दी है. दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने हाल ही में MPTAK के पॉडकास्ट में बताया कि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच मतभेद विचारधारा (आइडियोलॉजिकल) नहीं, बल्कि व्यक्तिगत (पर्सनालिटी) थे. वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय ने बताया कि उन्होंने कई बार दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की कोशिश की. यहां तक कि एक उद्योगपति के घर डिनर मीटिंग आयोजित कर कई मुद्दों पर सहमति बनाई गई और एक 'विशलिस्ट' तैयार हुई, जिसमें ग्वालियर-चंबल संभाग से जुड़े मुद्दों पर सहयोग का आश्वासन भी था. दिग्विजय सिंह ने कहा कि उन्होंने भी उस लिस्ट पर दस्तखत किए थे, लेकिन बाद में उसका कोई पालन नहीं हुआ. इसी वजह से विवाद बढ़ा और सरकार गिर गई. दिग्विजय ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने सरकार गिरने की चेतावनी पहले ही दी थी, न कि भरोसा दिलाया था कि सरकार बचेगी.  अब दिग्विजय सिंह के इस बयान के बाद राजनीति गरमा गई है. कमलनाथ ने भी कड़ा पलटवार किया है. कमलनाथ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर लिखा, ''मध्य प्रदेश में 2020 में मेरे नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार गिरने को लेकर हाल ही में कुछ बयानबाजी हुई है. मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि पुरानी बातें उखाड़ने से कोई फायदा नहीं. लेकिन यह सच है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया को लगता था कि सरकार दिग्विजय सिंह चला रहे हैं. इसी नाराजगी में उन्होंने कांग्रेस के विधायकों को तोड़ा और हमारी सरकार गिराई.'' 2018 में सरकार बनी, 2020 में गिरी बता दें कि साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 114 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की थी, जबकि BJP को 109 सीटें मिली थीं. बसपा (2), सपा (1) और निर्दलियों (4) के समर्थन से कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनी. लेकिन डेढ़ साल बाद मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने 22 समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर BJP में शामिल हो गए, जिसके बाद कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई और 20 मार्च 2020 को गिर गई.  BJP ने कहा- अब सच्चाई सामने है इस मुद्दे पर BJP ने भी प्रतिक्रिया दी. पार्टी के प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल ने कहा, ''अब सच्चाई सामने है कि कांग्रेस की कमलनाथ सरकार मिस्टर बंटाधार चला रहे थे. सरकार पर माफियाओं और भ्रष्टाचार का शिकंजा था. कुशासन और अव्यवस्था का बोलबाला था. इसलिए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश को बचाने और सुशासन व विकास की पटरी पर लाने के लिए भाजपा की स्थिर सरकार बनाई.''  BJP मीडिया प्रभारी ने यह भी आरोप लगाया कि कमलनाथ का बयान कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी और दिग्विजय सिंह के प्रभाव को उजागर करता है. 

कांग्रेस में स्थिरता का संकेत, राहुल गांधी बोले- 6 महीने तक नहीं होंगे बदलाव

भोपाल  लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश के नवनिर्वाचित कांग्रेस जिलाध्यक्षों को किसी का रिमोट न बनने को कहा, साथ ही गुटबाजी और अपनी-अपनी चलाने वाले बड़े नेताओं को समन्वय की नसीहत भी दी है। संगठन सृजन अभियान के अंतर्गत शहर और ग्रामीण मिलाकर बने मध्य प्रदेश के कुल 71 जिलाध्यक्षों के प्रशिक्षण में रविवार को राहुल ने यह भी कहा कि छह महीने तक जिलाध्यक्षों के कामों का मूल्यांकन किया जाएगा, तब तक किसी को भी नहीं बदला जाएगा। उल्लेखनीय है कि जिलाध्यक्षों के चयन को लेकर कई जिलों में किए जा रहे विरोध के बीच राहुल गांधी का यह कहना महत्वपूर्ण है। उन्होंने पार्टी नेताओं और जिलाध्यक्षों से कहा कि गुटबाजी नहीं समन्वय से काम करें। जिलाध्यक्ष सत्ता परिवर्तन नहीं, व्यवस्था परिवर्तन में जुटें। वे देखें कि लोगों को उनके संवैधानिक अधिकार मिल पा रहे हैं या नहीं। किसी वर्ग का हक तो नहीं मारा जा रहा है। उन्होंने जिलाध्यक्षों से कहा, किसी का रिमोट मत बनना। आपको संगठन ने बैठाया है, किसी नेता ने नहीं। नई दिल्ली में हुए इस एक दिनी प्रशिक्षण कार्यक्रम को उन्होंने एक घंटे संबोधित किया। प्रशिक्षण 10 घंटे चला। प्रशिक्षण शिविर में पार्टी की सोशल मीडिया विभाग की प्रमुख सुप्रिया सीनेत ने स्थानीय मु्द्दों को पोस्ट करने के लिए कहा। पहले तीन नेता टिकट बांट देते थे, अब ऐसा नहीं होगा राहुल गांधी ने कहा कि पहले दो-तीन बड़े नेता विधानसभा और लोकसभा के टिकट बांट देते थे। अब ऐसा नहीं होगा। टिकट में जिलाध्यक्षों की अनुशंसा महत्वपूर्ण रहेगी। उनके पास किसी की अनुशंसा के पीछे तर्क और तथ्य रहेंगे। जिलाध्यक्ष कांग्रेस की नींव बनेंगे। उनके नीचे जो संगठन बूथ स्तर तक बनेगा में उसमें युवा, महिला और सभी वर्गों को स्थान दिया जाएगा। हमें विचारधारा के आधार पर सत्ता में आना है। जिलाध्यक्ष का चेहरा अनुशासन वाला हो : खरगे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा जिला अध्यक्ष व उनके नीचे की टीम अनुशासित रहे। कई बार बड़े नेताओं को कठोर और नीतिगत निर्णय लेने पड़ते हैं, जो हमे अच्छे नहीं लगते पर पार्टी के लिए आवश्यक होते हैं। गुटबाजी से दूर रहे हैं। जिलाध्यक्षों का चयन संगठन सृजन के अंतर्गत पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के आधार पर हुआ है। एआईसीसी मुख्यालय के बाहर इंदौर ग्रामीण अध्यक्ष वानखेड़े के विरोध में प्रदर्शन राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे जब दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में जिला अध्यक्षों को अनुशासन का पाठ पढ़ा रहे थे तो बाहर अनुशासन टूट रहा था। 100 से अधिक कार्यकर्ता इंदौर ग्रामीण के अध्यक्ष विपिन वानखेड़े को हटाने के लिए प्रदर्शन कर रहे थे। उनका कहना था कि बाहरी नेता को यह जिम्मेदारी गई है।

सहमति बनते ही चर्चा में सीट शेयरिंग, जानें चिराग पासवान का संभावित हिस्सा

पटना  बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है, और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में सीट बंटवारे को लेकर चर्चाएं अंतिम चरण में हैं। सूत्रों के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और जनता दल (यूनाइटेड) (जद(यू)) में सीट शेयरिंग को लेकर सहमति बन गई है। दोनों पार्टियों को 243 सीटों में से प्रत्येक को 100-105 सीटें लड़ने को मिल सकती हैं। चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) (एलजेपी (आरवी)) ने 40 सीटों की मांग की है, लेकिन उसे करीब 20 सीटें ही मिलने की संभावना है। बाकी सीटें जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) (एचएएम (एस)) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) को दी जा सकती हैं। जद(यू) की बराबरी की मांग 2020 के विधानसभा चुनाव में जद(यू) ने 115 और बीजेपी ने 110 सीटों पर चुनाव लड़ा था। तब विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) ने 11 और एचएएम (एस) ने 7 सीटों पर चुनाव लड़ा। बीजेपी ने 74 सीटें जीतीं, जबकि जद(यू) को 43 सीटों से संतोष करना पड़ा। इस बार जद(यू) बीजेपी के बराबर सीटें चाहता है, क्योंकि उसका मानना है कि उसकी 10% वोट हिस्सेदारी, खासकर अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) में, उसे गठबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है। एक वरिष्ठ एनडीए नेता ने कहा, 2020 में एलजेपी ने जद(यू) के खिलाफ उम्मीदवार उतारकर उसका नुकसान किया। इस बार नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जा रहा है, और जद(यू) बीजेपी से कम सीटों पर समझौता नहीं करेगा।   चिराग पासवान की बढ़ती मांग एलजेपी (आरवी) ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पांचों सीटें जीतकर और 29 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल कर अपनी ताकत दिखाई थी। चिराग पासवान 40 सीटों की मांग कर रहे हैं, लेकिन बीजेपी इसके ​लिए राजी नहीं है। एक बीजेपी नेता ने कहा कि एलजेपी के पांच सांसद हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में स्थानीय कारक और जमीनी ताकत ज्यादा मायने रखती है। 20 सीटें उनके लिए उचित हैं। 2020 में एलजेपी ने 135 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल एक सीट (मटिहानी) जीती और 5.66% वोट हासिल किए। तब उसने जद(यू) के खिलाफ उम्मीदवार उतारकर 27 सीटों पर उसे नुकसान पहुंचाया। वीआईपी का संभावित पलटवार मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) जो अभी महागठबंधन (आरजेडी-कांग्रेस) का हिस्सा है के एनडीए में शामिल होने की अटकलें हैं। अगर वीआईपी एनडीए में आती है, तो सीट बंटवारे का समीकरण बदल सकता है। 2020 में वीआईपी ने एनडीए के साथ 11 सीटों पर चुनाव लड़ा था। वीआईपी का निषाद समुदाय में प्रभाव है, जो पूर्वी बिहार में महत्वपूर्ण वोट बैंक है। नीतीश के नेतृत्व पर दांव एनडीए की रणनीति नीतीश कुमार को फिर से मुख्यमंत्री बनाने पर केंद्रित है। जद(यू) का कहना है कि नीतीश का ईबीसी और कुर्मी समुदाय में प्रभाव एनडीए की जीत के लिए जरूरी है। दूसरी ओर, चिराग पासवान ने नीतीश सरकार के कानून-व्यवस्था रिकॉर्ड की आलोचना कर सीटों के लिए दबाव बनाया है। एलजेपी (आरवी) का लक्ष्य लंबे समय में 15% वोट हिस्सेदारी हासिल करना है। जातिगत समीकरण और स्थानीय मुद्दे बिहार में जातिगत समीकरण और स्थानीय मुद्दे, जैसे बेरोजगारी और पलायन, चुनाव को जटिल बनाते हैं। एनडीए अपनी सामाजिक गठबंधन रणनीति (ऊंची जातियां, गैर-प्रमुख ओबीसी, और दलित) के साथ मजबूत स्थिति में है। लेकिन, अगर सीट बंटवारे में छोटे सहयोगी नाराज होते हैं, तो नुकसान हो सकता है। दूसरी ओर, महागठबंधन तेजस्वी यादव के नेतृत्व में युवा और पिछड़े वर्गों को लुभाने की कोशिश कर रहा है।