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एसजीपीसी का 1487 करोड़ का बजट पास, शिक्षा, धर्म प्रचार और सेवा के क्षेत्र पर जोर

 अमृतसर   शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 1487.41 करोड़ रुपये का बजट जयकारों की गूंज के बीच पास कर दिया। तेजा सिंह समुंदरी हाल में आयोजित जनरल इजलास के दौरान इस बजट पर विस्तार से चर्चा की गई और अंत में सर्वसम्मति से इसे मंजूरी दे दी गई। कमेटी के जनरल सेक्रेटरी शेर सिंह मंडवाला ने बजट पेश करते हुए बताया कि इस बार का बजट पिछले वर्ष की तुलना में 100.94 करोड़ रुपये अधिक है। उन्होंने कहा कि कुल बजट में 7.28 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो कमेटी की गतिविधियों के विस्तार और बढ़ती जरूरतों को दर्शाता है। बजट में धर्म प्रचार, शिक्षा और सेवा कार्यों को प्राथमिकता दी गई है। श्रद्धालुओं को अधिक सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर गुरुद्वारों के प्रबंधन को और बेहतर बनाने के साथ-साथ श्रद्धालुओं को अधिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए भी विशेष प्रावधान किए गए हैं। इसके तहत विभिन्न गुरुद्वारों के आसपास सरायों के निर्माण और विस्तार, लंगर व्यवस्था को मजबूत करने तथा धार्मिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की योजनाएं शामिल हैं। इसके अलावा शैक्षणिक संस्थानों के विकास पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। कमेटी द्वारा संचालित स्कूलों और कॉलेजों में सुविधाओं के विस्तार, शिक्षण स्तर को बेहतर बनाने और विद्यार्थियों को अधिक अवसर प्रदान करने के लिए बजट में अलग से प्रावधान रखा गया है। बजट में बहस ना होने पर विरोध अमृतसर में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के बजट इजलास के दौरान बहस न करवाए जाने को लेकर विवाद सामने आया। इजलास के बीच सदस्य बलविंदर सिंह बैंस ने विरोध जताते हुए सभा छोड़ दी। बाहर आकर उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि बजट जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर खुली चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन सदस्यों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताते हुए पारदर्शिता पर सवाल उठाए। बैंस ने कहा कि संगत के हित में हर प्रस्ताव पर विस्तृत विचार-विमर्श जरूरी है, ताकि फैसले संतुलित और जिम्मेदार तरीके से लिए जा सकें।

मार्च के अंत में सक्रिय हुआ नया वेदर सिस्टम और राजस्थान के कई संभागों में 50 किमी की रफ्तार से चलेंगी तेज हवाएं

राजस्थान राजस्थान में पश्चिमी विक्षोभ के असर से मौसम बदला है। कई जिलों में बारिश, आंधी और तेज हवाएं चल रही हैं। इससे गर्मी से राहत मिली, लेकिन गेहूं-सरसों जैसी रबी फसलों पर नुकसान का खतरा बढ़ गया है। राजस्थान में मौसम ने एक बार फिर करवट ली है। फरवरी और मार्च की शुरुआत में जहां तेज धूप और शुष्क हवाओं ने लोगों को परेशान कर रखा था, वहीं अब उत्तर-पश्चिम भारत में सक्रिय पश्चिमी विक्षोभों ने मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल दिया है। पिछले कुछ दिनों से प्रदेश के कई हिस्सों में बारिश, गरज-चमक और तेज हवाओं का दौर जारी है। इससे गर्मी से राहत जरूर मिली है, लेकिन किसानों की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। रबी फसलों पर बढ़ा खतरा 12 मार्च के बाद लगातार सक्रिय हो रहे पश्चिमी विक्षोभों के कारण तापमान में गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि यह बदलाव आमजन के लिए राहत लेकर आया है, लेकिन खेतों में पककर तैयार खड़ी रबी फसलें जैसे गेहूं और सरसों अब जोखिम में हैं। बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि की आशंका ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। तापमान का हाल बीते 24 घंटों में हल्की बारिश का असर देखने को मिला। इस दौरान कोटा प्रदेश का सबसे गर्म शहर रहा, जहां अधिकतम तापमान 38.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। वहीं सिरोही में न्यूनतम तापमान 17.6 डिग्री सेल्सियस रहा, जिससे वहां अपेक्षाकृत ठंडक महसूस की गई। अन्य प्रमुख शहरों में भी तापमान सामान्य से नीचे दर्ज किया गया, जिसमें जयपुर, अजमेर, बीकानेर, जोधपुर और उदयपुर जैसे शहर शामिल हैं। अगले 48 घंटे अहम मौसम केंद्र जयपुर के अनुसार 28 से 30 मार्च के बीच एक नया पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय रहेगा। इसके प्रभाव से राज्य के कई हिस्सों में आंधी और बारिश की संभावना है। मौसम विभाग के अनुमानों के अनुसार 28 मार्च को  जोधपुर, बीकानेर संभाग और शेखावाटी क्षेत्र में दोपहर बाद आंधी और हल्की बारिश हो सकती है। वहीं 29 से 30 मार्च तक जोधपुर, बीकानेर, अजमेर, जयपुर, भरतपुर, उदयपुर और कोटा संभाग में 40 से 50 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने और कहीं-कहीं हल्की से मध्यम बारिश के आसार हैं। राहत और चुनौती साथ-साथ मौसम में आई इस नरमी ने जहां गर्मी से राहत दी है, वहीं किसानों के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण बन गया है। आने वाले दिनों में मौसम का रुख फसलों की स्थिति तय करेगा।

ग्रीन एनेस्थीसिया: सिम्स में इलाज के साथ पर्यावरण संरक्षण की नई पहल

रायपुर छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) बिलासपुर में स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देते हुए “ग्रीन एनेस्थीसिया” की पहल की जा रही है। इस पहल के तहत मरीजों को सुरक्षित उपचार प्रदान करने के साथ-साथ पर्यावरण और चिकित्सकों की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। ऑपरेशन थिएटर में उपयोग होने वाली एनेस्थीसिया गैसों के दुष्प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से सिम्स द्वारा आधुनिक और पर्यावरण हितैषी तकनीकों को अपनाया जा रहा है। एनेस्थीसिया गैसें: पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा सर्जरी के दौरान उपयोग की जाने वाली गैसें, जैसे डेसफ्लुरेन और नाइट्रस ऑक्साइड, ग्रीनहाउस गैसों के रूप में जानी जाती हैं। इनका प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना अधिक होता है और ये लंबे समय तक वातावरण में बनी रहती हैं। हर वर्ष बड़ी संख्या में होने वाली सर्जरी से निकलने वाली ये गैसें ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। चिकित्सकों पर भी पड़ता है प्रभाव एनेस्थीसिया का प्रभाव केवल मरीज तक सीमित नहीं रहता। जहां एक मरीज को ऑपरेशन के दौरान एक बार एनेस्थीसिया दिया जाता है, वहीं एनेस्थीसिया विशेषज्ञ चिकित्सक दिनभर में 10 से 12 घंटे तक लगातार कई मरीजों को एनेस्थीसिया प्रदान करते हैं। इस दौरान वे बार-बार इन गैसों के संपर्क में आते हैं, जिससे लंबे समय में उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है। ऐसे में ग्रीन एनेस्थीसिया चिकित्सकों की सुरक्षा के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। क्या है ग्रीन एनेस्थीसिया ग्रीन एनेस्थीसिया एक ऐसी पद्धति है, जिसमें मरीज को सुरक्षित बेहोशी देने के साथ-साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को कम किया जाता है। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाना है। सिम्स में अपनाए जा रहे प्रमुख उपाय सिम्स में इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं— टी.आई.वी.ए. (Total Intravenous Anesthesia) इस तकनीक में प्रोपोफोल, मिडाज़ोलम आदि दवाओं को इंट्रावेनस (रक्त शिरा द्वारा) दिया जाता है, जो बेहद प्रभावी एवं सुरक्षित माना जाता है। इससे गैसों के उपयोग में कमी आती है और पर्यावरण पर दुष्प्रभाव भी कम होता है। लो फ्लो एनेस्थीसिया तकनीक कम मात्रा में गैस देकर भी सुरक्षित एनेस्थीसिया दिया जाता है, जिससे गैस की खपत और प्रदूषण दोनों में कमी आती है। आधुनिक उपकरणों का उपयोग नई तकनीकों के माध्यम से गैस लीकेज को नियंत्रित कर ऑपरेशन थिएटर के बाहर प्रदूषण को कम किया जा रहा है। किफायती और प्रभावी प्रणाली यह पद्धति पर्यावरण के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी लाभकारी (Cost Effective) साबित हो रही है। निश्चेतना में उपयोग होने वाली गैसों का अत्यधिक प्रयोग ग्लोबल वार्मिंग और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ग्रीन एनेस्थीसिया के माध्यम से इन दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सिम्स इस दिशा में निरंतर प्रयासरत है। ग्रीन एनेस्थीसिया सिम्स की एक सराहनीय और दूरदर्शी पहल है, जो यह दर्शाती है कि बेहतर इलाज के साथ पर्यावरण और मानव दोनों की सुरक्षा संभव है। यह प्रयास भविष्य में अन्य चिकित्सा संस्थानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा।

एशिया के मैनचेस्टर में कच्चे माल की भारी किल्लत के साथ ही रेड सी रूट महंगा होने से करोड़ों के ऑर्डर अटके

राजस्थान राजस्थान की कपड़ा नगरी भीलवाड़ा, जिसे एशिया का मैनचेस्टर कहा जाता है, इन दिनों गंभीर संकट से जूझ रही है. ईरान-इजरायल युद्ध का सीधा असर यहां की करीब 80 से 90 हजार करोड़ की टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर दिखने लगा है. करीब 100 साल पुरानी इस इंडस्ट्री में पहली बार इतने खराब हालात बने हैं. उद्योगपतियों के पास अब सिर्फ एक से दो सप्ताह का कच्चा माल ही बचा है, जिससे उत्पादन पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है. महंगा हुआ कच्चा माल, बढ़ी उत्पादन लागत भीलवाड़ा में करीब 400 वीविंग यूनिट्स और 18 स्पिनिंग मिल्स हैं, जहां हर साल लगभग 125 करोड़ मीटर कपड़ा तैयार होता है. यहां का सालाना कारोबार करीब 25 हजार करोड़ रुपये का है. लेकिन युद्ध के कारण पॉलिएस्टर फाइबर, केमिकल और गैस की सप्लाई बाधित हो गई है. रेड सी रूट महंगा होने से कंटेनर फ्रेट 2 से 2.5 गुना तक बढ़ गया है, जिससे यार्न की कीमतें 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं. कपड़े की लागत प्रति मीटर 12 से 14 रुपये तक बढ़ चुकी है. गैस संकट से प्रोसेस हाउस ठप होने की कगार पर भीलवाड़ा सहित पाली, बालोतरा और बाड़मेर के प्रोसेस हाउस गैस की कमी से बुरी तरह प्रभावित हैं. एक प्रोसेस हाउस में रोजाना करीब 250 किलो गैस की जरूरत होती है, जबकि कुल खपत 3 लाख किलो प्रतिदिन है. गैस की कमी के चलते 25 से ज्यादा प्रोसेस हाउस का काम लगभग ठप हो चुका है और आगे 80 प्रतिशत वीविंग यूनिट्स बंद होने का खतरा है. निर्यात पर भी पड़ा असर, हजारों करोड़ के ऑर्डर अटके मिडिल ईस्ट और यूरोप में निर्यात पर भी युद्ध का असर साफ दिख रहा है. करीब 5 हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर अटक गए हैं, जबकि 800 से 1000 करोड़ रुपये का कारोबार पहले ही प्रभावित हो चुका है. हर साल अप्रैल से जून के बीच 5 से 6 करोड़ मीटर कपड़ा मिडिल ईस्ट भेजा जाता है, जो अब संकट में है. वहीं भेजे गए माल का भुगतान भी अटका हुआ है. लाखों लोगों की रोजी-रोटी पर खतरा राजस्थान में 1800 से अधिक टेक्सटाइल यूनिट्स में करीब 18 से 20 लाख लोग काम करते हैं. भीलवाड़ा की 100 से ज्यादा यूनिट्स अब शिफ्ट कम करने की तैयारी में हैं. अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो बड़े पैमाने पर रोजगार पर असर पड़ सकता है.

पश्चिम एशिया के तनाव से रसोई का बजट बिगड़ा, खाद्य तेलों की कीमतों में 20 रुपये तक बढ़ोतरी

चंडीगढ़  पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब आम आदमी की रसोई तक पहुंच गया है। खाद्य तेलों की कीमतों में पिछले एक महीने में 15 से 20 रुपये प्रति किलो तक का उछाल दर्ज किया गया है। कारोबारियों का कहना है कि यदि हालात जल्द नहीं सुधरे तो कीमतों में और तेजी बनी रह सकती है।  कारोबारियों के अनुसार युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 से 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। इससे बायोडीजल की मांग बढ़ी है, जिसके कारण वनस्पति तेलों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। भारत अपनी जरूरत का करीब 60 से 66 प्रतिशत खाद्य तेल आयात करता है। सामान्य तौर पर देश हर महीने 13 से 14 लाख टन आयात करता है, लेकिन मार्च में यह घटकर करीब 11 लाख टन रहने का अनुमान है। खासतौर पर सूरजमुखी तेल के आयात में भारी गिरावट आई है, जो फरवरी में लगभग 51 प्रतिशत तक कम हो गया। आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता और लगातार बढ़ती कीमतें इसकी मुख्य वजह हैं। युद्ध के कारण समुद्री मार्ग प्रभावित हुए हैं, जिससे जहाजों की आवाजाही और डिलीवरी पर असर पड़ा है। समुद्री किराया भी 60 डॉलर प्रति टन बढ़ा खाद्य तेल कारोबारी संजय विरमानी के मुताबिक समुद्री रास्तों में बाधा और बढ़ते जोखिम के कारण बीमा कंपनियां भी माल कवर करने से हिचक रही हैं। वहीं समुद्री किराया भी प्रति टन करीब 60 डॉलर तक बढ़ गया है। ब्राजील और अर्जेंटीना से आने वाले शिपमेंट भी प्रभावित हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बायोडीजल में बढ़ती खपत से भी बाजार पर दबाव बढ़ा है। राइस ब्रान की उपलब्धता घटने से राइस ब्रान ऑयल का उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसकी कीमत पिछले साल 350 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर अब करीब 700 रुपये तक पहुंच गई है। 20 से 30 प्रतिशत तक हो सकती है वृद्धि इसका असर बाजार में साफ दिख रहा है। सरसों तेल 132.50 से बढ़कर 147 रुपये, सोया रिफाइंड 131.20 से 150.10 रुपये और सनफ्लावर रिफाइंड 160 से 175 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो खाद्य तेलों की कीमतों में 20 से 30 प्रतिशत तक और बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे आम उपभोक्ताओं की परेशानी और बढ़ेगी। 

पंजाब के छात्रों पर रुपये की गिरावट का असर, विदेश में पढ़ाई अब और महंगी

जालंधर  भारतीय रुपये के लगातार कमजोर होने और डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर (करीब 93 रुपये प्रति डॉलर) तक पहुंच गया है। इसका सीधा असर विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों, खासकर पंजाब के विद्यार्थियों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है।   पहले से ही महंगी विदेशी शिक्षा अब और अधिक बोझिल होती जा रही है, जिससे कई परिवार आर्थिक दबाव में आ गए हैं। रुपये की इस गिरावट ने न केवल कुल शिक्षा बजट को बढ़ाया है, बल्कि सालाना खर्च, लोन की अदायगी और अन्य छिपे हुए शुल्कों के रूप में भी अतिरिक्त बोझ डाल दिया है, जिससे विदेश में पढ़ाई का सपना पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा महंगा हो गया है। विदेशी मुद्रा का कारोबार करने वाले हेमंत का कहना है कि रुपये में गिरावट के कारण विदेश में पढ़ाई का कुल बजट औसतन 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गया है। उदाहरण के तौर पर, जो कोर्स पहले लगभग 1.2 करोड़ रुपये में पूरा हो जाता था, अब उसी पर करीब 1.5 करोड़ रुपये तक खर्च आ रहा है। यह वृद्धि केवल मुद्रा विनिमय दर में बदलाव के कारण हुई है, जिससे अभिभावकों की पहले से बनाई गई वित्तीय योजनाएं प्रभावित हो रही हैं और उन्हें अतिरिक्त संसाधन जुटाने पड़ रहे हैं। डॉलर महंगा होने से छात्रों को हर साल अतिरिक्त राशि चुकानी पड़ रही है। उदाहरण के लिए, 55,000 डॉलर सालाना फीस वाले कोर्स में छात्रों को सिर्फ एक्सचेंज रेट की वजह से करीब 4.11 रुपये लाख अधिक देने पड़ रहे हैं। यह अतिरिक्त खर्च पूरे कोर्स अवधि में लाखों रुपये तक पहुंच जाता है, जो मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका साबित हो रहा है। विदेशी एजुकेशन की माहिर परमजीत का कहना है कि मुद्रा विनिमय के दौरान लगने वाले छिपे हुए शुल्क (हिडन चार्जेज) भी छात्रों के लिए बड़ी समस्या बनकर उभरे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वर्ष 2024 में भारतीय छात्रों को पारदर्शिता की कमी और अतिरिक्त शुल्कों के कारण 1,700 रुपये करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ। इन शुल्कों में बैंक मार्जिन, ट्रांसफर फीस और एक्सचेंज रेट में अंतर जैसी चीजें शामिल हैं, जिनके बारे में अधिकतर छात्रों और अभिभावकों को पहले से स्पष्ट जानकारी नहीं होती। एजुकेशन लोन पर भी असर रुपये के कमजोर होने का असर एजुकेशन लोन पर भी पड़ रहा है। लोन की कुल लागत और उसकी अदायगी पर सालाना 3 से 5 प्रतिशत तक अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है, जिससे छात्रों के लिए पढ़ाई पूरी करने के बाद कर्ज चुकाना और मुश्किल हो सकता है। ब्याज के साथ-साथ मूलधन की राशि भी बढ़ने से कुल देनदारी पहले के मुकाबले काफी अधिक हो जाती है। पंजाब से विदेश जाने वाले छात्रों के रुझान में भी हाल के समय में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। वर्ष 2023 में भारत से करीब 3.19 लाख छात्र कनाडा गए थे, जिनमें से लगभग 1.8 लाख यानी करीब 56 प्रतिशत अकेले पंजाब से थे। लेकिन 2024-25 में सख्त नियमों और बढ़ते खर्च के कारण पंजाब से कनाडा जाने वाले छात्रों के आवेदनों में करीब 50 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि बढ़ती लागत और नीतिगत बदलावों ने छात्रों के फैसलों को सीधे प्रभावित किया है। अमेरिका के मामले में स्थिति कुछ अलग नजर आती है। 2024-25 शैक्षणिक वर्ष में अमेरिका में लगभग 3.63 लाख भारतीय छात्र नामांकित रहे, जो पिछले वर्ष की तुलना में 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। हालांकि, इसके बावजूद 2025 की पहली छमाही में भारतीय छात्रों को जारी किए जाने वाले एफ-1 वीजा में 44 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो भविष्य में वहां जाने वाले छात्रों की संख्या पर असर डाल सकती है। अमेरिका में पढ़ाई पर चार लाख का अतिरिक्त बोझ खर्च के स्तर पर देखा जाए तो अमेरिका में पढ़ाई की औसत वार्षिक लागत 25,000 डॉलर से 55,000 डॉलर के बीच है, जिसमें रुपये की गिरावट के कारण 4 लाख तक का सीधा अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। वहीं कनाडा में ग्रेजुएशन की औसत फीस 33,417 और पोस्ट ग्रेजुएशन की 16,321 डॉलर है, जबकि जीआईसी फंड बढ़कर 20,635 कनाडाई डॉलर यानी करीब 13 लाख रुपये हो गया है, जो छात्रों के लिए शुरुआती निवेश को और भारी बना देता है। विकल्प बदलने लगे छात्र एजुकेशन एक्सपर्ट पूजा सिंह का कहना है कि “रुपये की गिरावट ने विदेशी शिक्षा को मिडिल क्लास परिवारों की पहुंच से धीरे-धीरे दूर कर दिया है। कई छात्र अब अपने विकल्प बदल रहे हैं या अपनी पढ़ाई को टाल रहे हैं। आने वाले समय में छात्र सस्ते देशों की ओर रुख कर सकते हैं या भारत में ही बेहतर अवसर तलाशेंगे।” कुल मिलाकर, डॉलर की मजबूती और रुपये की कमजोरी ने पंजाब के छात्रों के विदेशी शिक्षा के सपनों पर गंभीर आर्थिक दबाव डाल दिया है। यदि यही स्थिति बनी रहती है, तो आने वाले समय में विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में और गिरावट देखने को मिल सकती है, और उच्च शिक्षा के लिए वैश्विक विकल्प चुनना पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।   

Jaipur Mega Stadium: दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा क्रिकेट ग्राउंड निर्माणाधीन, गहलोत के तीखे आरोप

जयपुर. राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वर्तमान भजनलाल सरकार के खिलाफ अपना हमला तेज कर दिया है। गहलोत ने अपनी चर्चित 'इंतज़ारशास्त्र' सीरीज के छठे अध्याय में जयपुर के चौंप में बन रहे विश्व के तीसरे सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम की बदहाली का मुद्दा उठाया है। एक वीडियो संदेश के साथ गहलोत ने आरोप लगाया है कि राजनीतिक द्वेष के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर का यह प्रोजेक्ट अब 'ठंडे बस्ते' में चला गया है। जो विश्व रिकॉर्ड बनना था, वो अब 'लापरवाही' का शिकार अशोक गहलोत ने अपनी पोस्ट में दर्द साझा करते हुए लिखा कि कांग्रेस सरकार ने राजस्थान को वैश्विक खेल मानचित्र पर लाने के लिए जयपुर के पास चौंप गांव में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम बनाने की आधारशिला रखी थी। इस स्टेडियम का काम 2024 तक पूरा होना था, लेकिन गहलोत का दावा है कि 36 महीने बीत जाने के बाद भी यह प्रोजेक्ट अधर में लटका हुआ है। गहलोत ने सवाल उठाया कि जनता के करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद खिलाड़ियों को अपनी ही धरती पर अंतरराष्ट्रीय मैच देखने और खेलने का मौका क्यों नहीं मिल रहा? RCA चुनाव और क्रिकेट की राजनीति पर कटाक्ष पूर्व मुख्यमंत्री ने केवल इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं, बल्कि खेल प्रशासन पर भी प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) के चुनाव पिछले दो वर्षों से नहीं हो सके हैं। गहलोत के अनुसार, प्रशासनिक शून्यता और सरकार की अरुचि के कारण राजस्थान में क्रिकेट का भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। खिलाड़ियों के सपनों से खिलवाड़ बंद करे सरकार' गहलोत ने एक वीडियो साझा किया है जिसमें स्टेडियम की वर्तमान स्थिति (कथित रूप से रुका हुआ काम) को दिखाया गया है। उन्होंने भजनलाल सरकार से मार्मिक अपील करते हुए कहा: "राजनीतिक द्वेष छोड़िए, खिलाड़ियों के भविष्य से खिलवाड़ बंद कीजिए!" क्या है 'इंतज़ारशास्त्र' सीरीज? पिछले कुछ हफ्तों से अशोक गहलोत सोशल मीडिया पर एक विशेष सीरीज चला रहे हैं जिसे उन्होंने 'इंतज़ारशास्त्र' नाम दिया है। उद्देश्य: इस सीरीज के माध्यम से वे उन प्रोजेक्ट्स को उजागर कर रहे हैं जो उनकी सरकार के समय शुरू हुए थे लेकिन वर्तमान सरकार के कार्यकाल में कथित तौर पर ठप्प पड़े हैं। खेल-विरोधी सोच बनाम विकास का दावा गहलोत का आरोप है कि भाजपा सरकार केवल नाम बदलने या पुराने प्रोजेक्ट्स को रोकने में लगी है। उन्होंने 'इंतज़ारशास्त्र' के शीर्षक में सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया— ''खेल-विरोधी सोच ने डुबोया राजस्थान का नाम!''। इस बयान ने राजस्थान के खेल हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या वाकई बजट या मंशा की कमी के कारण चौंप स्टेडियम का काम रुका है?

पहली बार पूरी तरह हाईटेक होगी जनगणना की प्रक्रिया और झालावाड़ की 12 तहसीलों सहित 1619 गांवों में शुरू होगा महाअभियान

झालावाड़ झालावाड़ जिले में करीब 15 साल बाद जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है। इस बार जनगणना दो चरणों में आयोजित की जाएगी और विशेष बात यह है कि पहली बार इसे पूरी तरह डिजिटल माध्यम से किया जाएगा। अब तक की जनगणनाएं ऑफलाइन होती रही हैं, लेकिन इस बार मोबाइल एप के जरिए घर-घर जाकर जानकारी एकत्रित की जाएगी।   4000 कार्मिक जुटेंगे, गांव और शहरी वार्ड दोनों कवर होंगे जिले के सांख्यिकी विभाग के अनुसार इस जनगणना में करीब 4000 प्रगणक (कर्मी) लगाए जाएंगे। ये कर्मी जिले के 1619 गांव और शहरी क्षेत्र के 240 वार्ड में घर-घर जाकर प्रत्येक परिवार का विस्तृत विवरण जुटाएंगे। जिले की 12 तहसीलों के गांवों और आठ नगर निकायों के वार्डों को इसमें शामिल किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी तहसीलदार और नगर निकायों के ईओ स्तर के अधिकारी करेंगे।   समय-सारिणी और प्रश्नों का दायरा तय जनगणना दो चरणों में संपन्न होगी, जिसमें पहला चरण 1 मई से 15 जून तक और दूसरा चरण 1 मई से 15 मई तक चलेगा। पहले चरण में मकान की स्थिति, पानी, बिजली, नल, शौचालय, वेस्ट वाटर लाइन जैसी सुविधाओं के साथ परिवार के सदस्यों की संख्या सहित करीब 34 प्रश्नों की जानकारी मोबाइल एप के माध्यम से एकत्रित की जाएगी।   प्रशिक्षण की व्यापक तैयारी, अप्रैल में होगा आयोजन जनगणना से पहले प्रगणकों की नियुक्ति और प्रशिक्षण का कार्य अप्रैल माह में किया जाएगा। मास्टर ट्रेनर का प्रशिक्षण पहले जयपुर में आयोजित होगा, इसके बाद झालावाड़ के 56 फील्ड ट्रेनर को प्रशिक्षित किया जाएगा। ये प्रशिक्षित फील्ड ट्रेनर जिले के 4000 कर्मियों को जनगणना की बारीकियों से अवगत कराएंगे। 2001 और 2011 के आंकड़ों से मिलेगा तुलना का आधार विभाग के अनुसार जिले में 2001 की जनगणना में जनसंख्या 11 लाख 80 हजार 323 दर्ज की गई थी। वहीं 2011 में यह बढ़कर 14 लाख 11 हजार 129 हो गई थी, जिसमें 11 लाख 81 हजार 835 ग्रामीण और 2 लाख 29 हजार 291 शहरी आबादी शामिल थी। अब नई जनगणना से ताजा आंकड़े सामने आएंगे।   मोबाइल एप से आमजन भी कर सकेंगे सहयोग इस बार जनगणना के लिए एक मोबाइल एप लॉन्च किया जाएगा, जिसके माध्यम से प्रगणक डेटा एकत्रित करेंगे। आमजन भी इस एप के जरिए अपनी जानकारी दर्ज कर सकेंगे। हालांकि, एप के माध्यम से दी गई जानकारी का सत्यापन करने के लिए प्रगणक प्रत्येक परिवार तक पहुंचकर विवरण की पुष्टि करेंगे।

Naxalism Debate: संसद में 30 को होगी चर्चा, बस्तर में 96% इलाका नक्सल प्रभाव से आजाद

रायपुर/जगदलपुर. पांच दशकों से भी अधिक समय से बस्तर के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर रहा नक्सलवाद आज समाप्ति की है. यह नराकात्मक विनाशकारी विचारधारा ने न केवल बस्तर के विकास को अवरुद्ध किया, बल्कि निर्दोष आदिवासियों की जान भी ली. लेकिन मजबूत राजनीतिक इरादे की बदौलत आज बस्तर का 96 प्रतिशत क्षेत्र नक्सली गतिविधियों से मुक्त हो चुका है. विषय पर 30 मार्च को लोकसभा में अहम चर्चा होगी. 1967 में जो चिंगारी बंगाल के नक्सलबाड़ी में फूटी थी, उसने आने वाले दशकों में बस्तर के जंगलों को आग में बदल दिया, इस आग ने हजारों जिंदगियां लीं, अनगिनत घर उजाड़े, और एक पूरे क्षेत्र को बदल कर रख दिया. लेकिन बस्तर ओलम्पिक 2024 के मंच से देश के गृहमंत्री अमित शाह ने एक ऐसा बयान दिया, जिसने इस कहानी को एक तय समयसीमा दे दी, उन्होंने कहा कि 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा, यह पहली बार था जब इस लंबे संघर्ष के अंत की एक तारीख सामने आई, एक ऐसा वादा, जो सिर्फ शब्द नहीं बल्कि दशकों से चली आ रही इस लड़ाई का निष्कर्ष माना जा रहा है. अब जब 31 मार्च 2026 की तारीख जब करीब है, तो माहौल बदल चुका है. वो घोषणा सच्चाई में बदलती नजर आ रही है. इन 2 वर्षों में कुल 3000 नक्सली मुख्यधारा में जुड़ जाते हैं, 2000 नक्सली गिरफ्तार कर लिए जाते हैं, अभियान इतना तेज होता है कि 500 से अधिक नक्सली ढेर कर दिए जाते हैं, जिसमें नक्सलियों का महासचिव भी शामिल रहता है. कुल मिलाकर 5000 से अधिक नक्सली कम हो गए, हालांकि, नक्सल के इतिहास में 1987 से 2026 तक 1416 जवान शहीद हुए है. जबकि 1277 आईडी ब्लास्ट हुए, जिसमें 443 जवान शहीद और 915 जवान घायल हुए हैं. इसके अलावा 4580 आईडी बरामद की गई है. छत्तीसगढ़ सरकार के आंकड़ों के अनुसार, आज बस्तर संभाग के पांच जिलों में से दंंतेवाड़ा में अब महज एक नक्सली सक्रिय है, वहीं नारायणपुर में दो, सुकमा में 5, बीजापुर में 11 और कांकेर में गिनती के 19 नक्सली सक्रिय है. हालांकि, तय संकल्प में सशस्त्र नक्सलवाद का खत्मा तो हो गया है, लेकिन अभी भी सबसे बड़ा चुनौती जवानों के लिए जंगलों में बिछी बारूद है. समय के साथ यह भी खोजकर निकाल लिए जाएंगे, और नष्ट कर दिए जाएंगे. गृहमंत्री विजय शर्मा ने कहा है कि अब हम बस्तर के प्रत्येक गांव को ODF की तरह IED फ्री गांव बनाएंगे. अब बस्तर की आग बुझ गई, और बस्तर के जंगल, जो कभी डर का दूसरा नाम थे, एक बार फिर अपनी असली पहचान, अपनी शांति, और अपनी खूबसूरती के लिए जाने जाएंगे. अब बस्तर अपनी खूबसूरती के लिए पहचाने जाएगा. संसद में 30 मार्च को होगी चर्चा नक्सलमुक्त भारत के लिए निर्धारित मार्च 2026 की समय सीमा से पहले लोकसभा में नक्सलवाद उन्मूलन पर महत्वपूर्ण चर्चा होगी. लोकसभा की कार्यसूची के अनुसार, नक्सलवाद उन्मूलन के प्रयासों पर चर्चा के लिए 30 मार्च का समय आवंटित किया गया है. चर्चा की शुरुआत शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे करेंगे.

Hemant Soren in Assam: JMM का चुनावी बिगुल आज, सोरेन संभालेंगे कमान

रांची. असम विधानसभा चुनाव को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने अपनी राजनीतिक सक्रियता तेज कर दी है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन शुक्रवार शाम असम पहुंच गए, जहां वे 28 मार्च से पार्टी के चुनावी प्रचार अभियान की औपचारिक शुरुआत करेंगे। उनका पहला कार्यक्रम कोकराझार जिले के गोसाई गांव विधानसभा क्षेत्र में प्रस्तावित है, जहां वे एक बड़ी जनसभा को संबोधित करेंगे। झामुमो के लिए यह चुनाव महज विस्तार का प्रयास नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की रणनीतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री अगले कुछ दिनों तक असम में ही रहेंगे और विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी प्रत्याशियों के समर्थन में लगातार सभाएं करेंगे। हेमंत सोरेन के नेतृत्व में अभियान को धार पार्टी अध्यक्ष के रूप में हेमंत सोरेन खुद पूरे चुनावी अभियान की कमान संभाल रहे हैं। झामुमो ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह असम में अपने दम पर चुनाव लड़ रही है और इसके लिए संगठन को जमीनी स्तर पर सक्रिय किया गया है। पार्टी महासचिव विनोद पांडेय असम में लगातार कैंप कर रहे हैं और चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उनके नेतृत्व में स्थानीय समीकरणों और मुद्दों के आधार पर प्रचार की रूपरेखा तैयार की जा रही है। स्टार प्रचारकों की तैनाती, संगठन हुआ सक्रिय झामुमो ने अपने 20 स्टार प्रचारकों की सूची चुनाव आयोग को सौंप दी है। इसमें हेमंत सोरेन के अलावा डा. सरफराज अहमद, सुप्रियो भट्टाचार्य, जोबा मांझी, दीपक बिरुआ, चमरा लिंडा, कल्पना मुर्मू सोरेन, अभिषेक प्रसाद और डा. महुआ माजी जैसे प्रमुख नेता शामिल हैं। पार्टी के कई मंत्री और विधायक जैसे दीपक बिरुआ, चमरा लिंडा और आलोक सोरेन, एमटी राजा पहले ही असम पहुंचकर स्थानीय स्तर पर चुनावी गतिविधियों को गति दे रहे हैं। चुनिंदा क्षेत्रों पर फोकस, स्थानीय मुद्दों पर जोर झामुमो की रणनीति असम के चुनिंदा विधानसभा क्षेत्रों में अपने प्रभाव को मजबूत करने पर केंद्रित है। पार्टी स्थानीय सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को प्रमुखता देते हुए मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। हेमंत सोरेन की सभाएं झामुमो कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के साथ-साथ पार्टी को नए क्षेत्रों में पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभा सकती है।