samacharsecretary.com

इंदौर के चौराहे पर 23 मीटर की ऊंचाई पर लटका 400 टन लोहा, इंजीनियरिंग की अनोखी मिसाल

इंदौर   इंदौर के लवकुश चौराहे पर बन रहे डबल डेकर फ्लाईओवर के निर्माण में एक अहम उपलब्धि हासिल की गई है। यहां शहर की सबसे लंबी 65 मीटर की स्टील गर्डर को सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया गया है। करीब 400 टन वजनी इस विशाल गर्डर को जमीन से 23 मीटर ऊंचाई पर लगाने की जटिल प्रक्रिया करीब 12 घंटे तक चली। इस गर्डर के जुड़ने से शहर में यातायात को आसान बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।  तीन विंच मशीनों की मदद से पूरा हुआ चुनौतीपूर्ण काम लवकुश चौराहे पर बो स्ट्रिंग स्पान के निर्माण के दौरान इस भारी गर्डर को हवा में ही जोड़ा गया। इसे सही जगह तक लाने के लिए तीन विंच मशीनों का इस्तेमाल किया गया। इनमें से दो मशीनों से गर्डर को आगे की ओर खींचा गया, जबकि एक मशीन को पीछे से संतुलन बनाए रखने और रोकने के लिए लगाया गया था। अब जैक पुश तकनीक के जरिए इसे दूसरी तरफ के बो स्ट्रिंग स्पान पर ले जाने की तैयारी की जा रही है। पहली गर्डर का काम पूरा होने के बाद अब दूसरी स्टील गर्डर के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इंदौर विकास प्राधिकरण बना रहा भव्य फ्लाईओवर इंदौर विकास प्राधिकरण द्वारा लवकुश चौराहे पर कुल 1452 मीटर लंबा डबल डेकर फ्लाईओवर बनाया जा रहा है। इस परियोजना में 19 सेगमेंटल स्पान, 4 कंपोजिट गर्डर स्पान और एक खास बो स्ट्रिंग स्पान शामिल है। जिस बो स्ट्रिंग स्पान पर यह गर्डर रखी गई है, उसकी लंबाई 65 मीटर है और यहां ऐसी दो स्टील गर्डर लगाई जानी हैं। पहली गर्डर का निर्माण कार्य पूरा कर उसे तय स्थान पर स्थापित कर दिया गया है। रात भर चली गर्डर लगाने की प्रक्रिया गर्डर को स्थापित करने की प्रक्रिया गुरुवार रात 11 बजे शुरू हुई, जो शुक्रवार सुबह 11 बजे पूरी हुई। गर्डर को खींचकर सही जगह तक लाने में ही करीब 5 घंटे लगे। पुलिंग शुरू करने से पहले गर्डर को रीले पर चढ़ाया गया और उसके संतुलन की पूरी जांच की गई। सुरक्षा के लिहाज से इस दौरान नीचे से गुजरने वाले यातायात को पूरी तरह बंद कर दिया गया, ताकि कोई हादसा न हो। शहर का सबसे ऊंचा फ्लाईओवर पॉइंट बना आकर्षण यह 400 टन वजनी गर्डर जिस बो स्ट्रिंग पर रखी गई है, उसकी ऊंचाई 23 मीटर है, जो इंदौर के सभी फ्लाईओवर में सबसे ज्यादा है। इस फ्लाईओवर की खास बात यह है कि इसके नीचे से मेट्रो और एक अन्य फ्लाईओवर गुजर रहा है। इसी वजह से गर्डर को ऊंचाई पर ही जोड़ना पड़ा। इस जटिल काम के लिए 900 टन की कुल क्षमता वाली दो क्रेन का इस्तेमाल किया गया, जिसमें एक 600 टन और दूसरी 300 टन की क्रेन शामिल थी। इन्हीं क्रेन की मदद से भारी एंगल और निर्माण सामग्री को 23 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचाया गया। 

डीप-टेक नवाचार और स्टार्टअप को मिलेगा बढ़ावा संकल्प से समाधान” कार्यक्रम में भी होंगे शामिल

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव रविवार आज  को इंदौर में विभिन्न महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में शामिल होंगे। इस दौरान वे सिंहासा आईटी पार्क में स्थापित “लॉन्चपैड : इन्क्यूबेशन एवं इनोवेशन सेंटर” का शुभारंभ करेंगे, दशहरा मैदान में आयोजित “संकल्प से समाधान अभियान” कार्यक्रम में भाग लेंगे और अमृत 2.0 योजना में विभिन्न जल आपूर्ति परियोजनाओं का भूमि-पूजन एवं लोकार्पण भी करेंगे। प्रदेश में डीप-टेक नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र होगा सुदृढ़ सिंहासा आईटी पार्क में स्थापित “लॉन्चपैड : इन्क्यूबेशन एवं इनोवेशन सेंटर” की स्थापना आईआईटीआई दृष्टि सीपीएस फाउंडेशन (आईआईटी इंदौर का टेक्नोलॉजी ट्रांसलेशन एवं रिसर्च पार्क) तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के मध्यप्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एमपीएसईडीसी) के संयुक्त सहयोग से की गई है। इस केंद्र का उद्देश्य डीप-टेक नवाचार को प्रोत्साहित करना, उच्च प्रभाव वाले स्टार्टअप्स को बढ़ावा देना, उन्नत विनिर्माण तथा उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में प्रदेश को सशक्त बनाना और उद्योग एवं अकादमिक जगत के बीच सहयोग को मजबूत करना है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव लॉन्चपैड सेंटर का अवलोकन करेंगे तथा यहां संचालित नवाचार एवं स्टार्टअप गतिविधियों की जानकारी भी प्राप्त करेंगे। यह केंद्र मध्यप्रदेश को डीप-टेक नवाचार आधारित विकास एवं उद्यमिता का अग्रणी केंद्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। “संकल्प से समाधान” अभियान से मजबूत हुआ जनविश्वास मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव दशहरा मैदान में “संकल्प से समाधान अभियान” के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में शामिल होकर हितलाभ वितरण करेंगे। प्रदेश में 12 जनवरी से 31 मार्च 2026 तक संचालित इस अभियान के अंतर्गत इंदौर जिले में 1 लाख 44 हजार 912 आवेदनों का सफलतापूर्वक निराकरण किया गया। अभियान चार चरणों में संचालित हुआ, जिसमें ग्राम पंचायत से लेकर जिला स्तर तक शिविर आयोजित कर विभिन्न विभागों की 100 से अधिक सेवाओं को शामिल किया गया।समस्याओं का मौके पर समाधान सुनिश्चित होने से शासन के प्रति आमजन का विश्वास और अधिक सुदृढ़ हुआ है। अमृत 2.0 के तहत जल आपूर्ति को मिलेगी मजबूती मुख्यमंत्री अमृत 2.0 योजना के अंतर्गत नर्मदा जल प्रदाय योजना के चौथे चरण का भूमि-पूजन करेंगे। इस परियोजना से शहर की जल आपूर्ति व्यवस्था को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप सुदृढ़ किया जाएगा तथा वर्ष 2040 तक की बढ़ती आबादी की मांग को पूरा करने की दिशा में यह महत्वपूर्ण पहल सिद्ध होगी। पैकेज–2 : पाइपलाइन एवं टनल निर्माण पैकेज–2 के अंतर्गत वांचू पॉइंट से राऊ सर्कल तक लगभग 39 किलोमीटर लंबी 2235 मिमी व्यास की पाइपलाइन बिछाई जाएगी। साथ ही लगभग 2870 मीटर लंबाई में आधुनिक तकनीक से टनल निर्माण किया जाएगा तथा राऊ सर्कल पर क्लोरीनेशन सिस्टम स्थापित कर जल की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाएगी।इस पैकेज की लागत लगभग 448.23 करोड़ रुपये है तथा कार्य 30 माह में पूर्ण किया जाएगा। पैकेज–3 : ओवरहेड टैंक एवं वितरण नेटवर्क पैकेज–3 के अंतर्गत 20 नए ओवरहेड टैंक (15 से 35 लाख लीटर क्षमता) बनाए जाएंगे तथा 29 मौजूदा टैंकों का सुदृढ़ीकरण किया जाएगा। इसके साथ ही लगभग 27.4 किमी फीडर पाइपलाइन, 4.7 किमी ग्रेविटी मेन लाइन और 685 किमी वितरण लाइन बिछाई जाएगी।लगभग 1.26 लाख घरेलू जल कनेक्शन तथा 1.08 लाख से अधिक वाटर मीटर स्थापित किए जाएंगे, जिससे 24×7 जल प्रदाय सुनिश्चित होगा। इस पैकेज की लागत लगभग 410.50 करोड़ रुपये है और इसे 36 माह में पूर्ण किया जाएगा। पैकेज–4 : विस्तारित जल वितरण प्रणाली पैकेज–4 के अंतर्गत 20 नए ओवरहेड टैंक एवं 46 मौजूदा टैंकों का उन्नयन किया जाएगा। साथ ही 25.82 किमी फीडर लाइन और 892 किमी वितरण पाइपलाइन बिछाई जाएगी।इस पैकेज के माध्यम से लगभग 1.21 लाख नए घरेलू कनेक्शन और 1.62 लाख से अधिक वाटर मीटर लगाए जाएंगे, जिससे जल वितरण प्रणाली को और अधिक स्मार्ट एवं प्रभावी बनाया जाएगा। इस कार्य की लागत लगभग 497.23 करोड़ रुपये है तथा इसे 36 माह में पूर्ण किया जाएगा। सिरपुर एसटीपी : स्वच्छता और जल पुनः उपयोग की दिशा में बड़ी पहल मुख्यमंत्री सिरपुर क्षेत्र में 20 एमएलडी क्षमता के अत्याधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का लोकार्पण करेंगे। लगभग 62.72 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित इस परियोजना के अंतर्गत 10 प्रमुख सीवर आउटफॉल को ट्रैप कर अशोधित सीवेज को सीधे तालाब में जाने से रोका गया है। परियोजना में 8.5 किमी सीवर लाइन, 5 किमी ट्रीटेड वाटर रीयूज लाइन तथा 0.5 एमएल क्षमता का ओवरहेड टैंक स्थापित किया गया है। इसके माध्यम से उपचारित जल का उपयोग शहर के लगभग 25 उद्यानों, हरित क्षेत्रों एवं अन्य कार्यों में किया जाएगा।  

1 अप्रैल से टोल की दरें बढ़ेंगी, 5-10% तक महंगा होगा सफर, जबलपुर से अन्य शहरों का सफर भी होगा महंगा

जबलपुर  वाहन चालकों के लिए 1 अप्रैल से सफर महंगा होने जा रहा है। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया द्वारा टोल टैक्स में 5 से 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की जा रही है, जो हर साल की तरह इस बार भी लागू होंगी। इस बढ़ोतरी का सीधा असर जबलपुर से नागपुर, रायपुर, प्रयागराज और भोपाल जैसे प्रमुख शहरों की यात्रा पर पड़ेगा। वाहन चालकों को अब हर टोल प्लाजा पर ज्यादा राशि चुकानी होगी। 5 से 10 रुपए तक बढ़ेगा टोल जानकारी के अनुसार, जबलपुर के आसपास स्थित टोल प्लाजा पर कार चालकों को 5 से 10 रुपए तक अतिरिक्त शुल्क देना पड़ सकता है। वहीं FASTag के जरिए मिलने वाले करीब 3 हजार रुपए के एनुअल पास में भी लगभग 75 रुपए तक की बढ़ोतरी की संभावना है। कैसे तय होता है टोल रेट टोल टैक्स की दरें होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) के आधार पर तय की जाती हैं। हर साल के अंत में इंडेक्स का मूल्यांकन कर सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय नए रेट जारी करता है। टोल की राशि सड़क की लंबाई और उस पर बने इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे फ्लाईओवर, अंडरपास, टनल आदि के आधार पर भी तय होती है। जहां ज्यादा सुविधाएं होती हैं, वहां टोल भी अधिक लगता है। लोगों में नाराज वाहन चालकों का कहना है कि टोल बढ़ाना समझ में आता है, लेकिन सड़कों का मेंटेनेंस भी उतना ही जरूरी है। भोपाल रोड की हालत खराब बताई जा रही है, जबकि बरेला के आगे अभी भी काम जारी है। इसके बावजूद पूरा टोल वसूला जा रहा है, जिससे लोगों में नाराजगी है। कारों के लिए अभी इतना लिया जा रहा है टोल बरगी टोल (नागपुर रोड)    165 रुपए सिहोरा टोल (प्रयागराज रोड)    130 रुपए शहपुरा टोल (भोपाल रोड)    90 रुपए बरेला टोल (रायपुर रोड)    35 रुपए जबलपुर से दमोह, सागर अभी हाईवे घोषित है, लेकिन बना नहीं है, जिसके चलते यह अभी स्टेट हाइवे की श्रेणी में आता है। इसी तरह से जबलपुर से पाटन, तेंदुखेड़ा जबलपुर से गोटेगांव में स्टेट हाईवे को टोल है। वाहन मालिकों का कहना है कि टोल टैक्स बढ़ाए जाना अच्छा है, पर सड़क का मेंटेनेंस भी जरूरी होता है। उनका कहना है कि सड़क को साल भर मेनटेन नहीं किया जाता है। भोपाल रोड अभी भी खराब है। इसके बाद भी टोल पूरा देना पड़ता है। इसी तरह बरेला के आगे काम चल रहा है। एक अप्रैल से सालाना पास के लिए 3075 रुपए देने होंगे NHAI ने कार के लिए बनाए जाने वाले सालाना पास की कीमतों में 75 रुपए की बढ़ोतरी की। ये बढ़ोतरी भी 1 अप्रैल से लागू होगी। अभी सालाना पास 3 हजार रुपए में बनता है, जिसमें 200 टोल बूथ क्रॉस करने की लिमिट होती है। 1 अप्रैल से बनने वाले सालाना पास के लिए अब 3075 रुपए देने पड़ेंगे। सालाना रिवीजन के तहत बढ़ी कीमतें सड़क परिवहन मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, जब फास्टैग एनुअल पास की शुरुआत की गई थी, तभी इसके नोटिफिकेशन में हर साल कीमतों की समीक्षा और बदलाव का प्रावधान रखा गया था। यह बढ़ोतरी उसी सालाना रिवीजन प्रक्रिया का हिस्सा है। देश भर में हाईवे टोल की दरों में बदलाव के लिए जो फॉर्मूला तय है, उसी के आधार पर इस बार 2.5% की वृद्धि की गई है। 52 लाख से ज्यादा लोग इस्तेमाल कर रहे हैं यह पास सरकार ने 15 अगस्त से इस खास एनुअल पास की शुरुआत की थी, जिसे उम्मीद से कहीं ज्यादा बेहतर रिस्पॉन्स मिला है। अब तक 52 लाख से ज्यादा हाईवे कार यूजर्स इस स्कीम से जुड़ चुके हैं। इस पास की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे एक साल में कितनी भी बार रिचार्ज कराया जा सकता है और यह लंबी दूरी तय करने वाले यात्रियों के लिए काफी किफायती साबित होता है। 31 मार्च तक पुराने रेट पर खरीदने का मौका अगर आप अक्सर हाईवे पर सफर करते हैं और इस बढ़ोतरी से बचना चाहते हैं, तो आपके पास अभी मौका है। अधिकारियों ने बताया कि जो यूजर्स 31 मार्च तक अपना पास रिचार्ज करा लेंगे या नया पास खरीदेंगे, उन्हें यह पुराने रेट यानी 3,000 रुपए में ही मिल जाएगा। 1 अप्रैल की सुबह से सिस्टम में नई दरें अपडेट कर दी जाएंगी।

ममता की छांव और उम्मीद की नई किरण : अनामिका जैन के सेवा संकल्प की अनकही दास्तान

भोपाल समाज में अक्सर जिन्हें हम 'विक्षिप्त' कहकर अनदेखा कर देते हैं, उनके पीछे छिपी पीड़ा और खोई हुई पहचान को वापस लौटाने का बीड़ा मंदसौर की एक बेटी ने उठाया है। संजीत (मंदसौर) की रहने वाली मती अनामिका जैन आज उन बेसहारा महिलाओं के लिए 'मसीहा' बन चुकी हैं, जिनका अपना कोई ठिकाना नहीं था। एक छोटे से विचार से शुरू हुआ बदलाव का सफर अनामिका जी का सेवा का सफर 17-18 साल पहले उनके पिता के साथ शुरू हुआ था। मास्टर ऑफ सोशल वर्क (MSW) की पढ़ाई कर चुकीं अनामिका ने जब समाज के सबसे उपेक्षित तबके—निराश्रित और विक्षिप्त महिलाओं—की स्थिति देखी, तो उनका मन पसीज गया। शुरुआत में वे सात वर्षों तक इन महिलाओं की देखरेख कर उन्हें इंदौर या उज्जैन के अनाथालयों में भेजती थीं। लेकिन कई बार जगह की कमी के कारण जब उन्हें वहां से वापस लौटा दिया जाता, तो वह बेबसी अनामिका जी को सोने नहीं देती थी। इसी पीड़ा ने 'अनामिका जनकल्याण सेवा समिति विक्षिप्त आश्रय गृह' की नींव रखी। रेवास देवड़ा रोड पर बना 'अपना घर' वर्ष 2018 में प्रशासन के सहयोग से उन्होंने एक शासकीय भवन (500 क्वार्टर, रेवास देवड़ा रोड) में इस आश्रय गृह की स्थापना की। यह मध्य प्रदेश का ऐसा पहला आश्रम बना, जो न केवल महिलाओं को छत देता है, बल्कि उनके पुनर्वास (Rehabilitation) पर केंद्रित है।इन महिलाओं को दवा से ज्यादा एक परिवार और प्यार की जरूरत होती है," अनामिका जी कहती हैं। उनके आश्रम में त्यौहार केवल रस्म नहीं, बल्कि खुशियों का संगम होते हैं, जहाँ इन महिलाओं को पूरी तरह पारिवारिक माहौल दिया जाता है। तकनीक और ममता का मेल: गूगल से मिलाते हैं बिछड़े परिवार अनामिका जी का कार्य केवल आश्रय देने तक सीमित नहीं है। पुलिस विभाग द्वारा लाई गई महिलाओं का वे इलाज करवाती हैं और उनकी याददाश्त वापस लाने के लिए खेल-खेल में गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। • सफलता का आँकड़ा: अब तक 54 महिलाओं को ठीक कर उनके अपनों से मिलवाया जा चुका है। • डिजिटल मदद: गूगल मैप्स और ऑनलाइन माध्यमों से वे उन महिलाओं के पते ढूंढती हैं जो वर्षों से अपने घर का रास्ता भूल चुकी थीं। चुनौतियों को बनाया ताकत: मिला 'रानी अवंती बाई राज्य स्तरीय पुरस्कार' इस कठिन मार्ग में अनामिका जी को अपने पति का भी भरपूर सहयोग मिला। उनके कार्यों की गूंज शासन तक भी पहुंची। महिला उत्पीड़न को रोकने, बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ लड़ने और वंचितों के पुनर्वास के लिए उन्हें राज्य सरकार द्वारा 'रानी अवंती बाई राज्य स्तरीय वीरता पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। भविष्य का सपना: आत्मनिर्भरता का केंद्र अनामिका जैन केवल आश्रय ही नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता का सपना देखती हैं। वे कुष्ठ बस्ती और गाडोलिया बस्ती में स्कूल चलाने, महिलाओं की शराब छुड़वाने और विधवाओं को कौशल प्रशिक्षण देने का कार्य भी कर रही हैं। उनका लक्ष्य एक ऐसा विशाल पुनर्वास केंद्र बनाना है, जहाँ हर महिला को शिक्षा और रोजगार मिल सके।"महिलाओं की संवेदनशीलता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। अगर हम एक-दूसरे का हाथ थाम लें, तो कोई भी समाज असहाय नहीं रहेगा।"  

प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की कला सिखाने शिक्षकों को दी गई प्रकृति शिक्षा

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश सरकार प्रकृति संरक्षण, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन को सुदृढ़ बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत है। इसी दिशा में प्रकृति संरक्षण और पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से संचालित मध्यप्रदेश प्रकृति संरक्षण शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम (एमपीटीटीएनसी 2025–2028) के अंतर्गत शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया। प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी द्वारा वर्ष 2021 में हुए कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़-26 में प्रारंभ किए गए मिशन LiFE (लाइफ स्टायल फॉर एनवारनमेंट) के उद्देश्यों से प्रेरित यह प्रशिक्षण डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया, वन विहार राष्ट्रीय उद्यान (भोपाल) और पीसीपीसी के संयुक्त सहयोग से आयोजित किया गया। इसका लक्ष्य प्रकृति के अविवेकपूर्ण उपभोग के स्थान पर सचेत और विचारशील उपयोग को बढ़ावा देना है। शिक्षक प्रशिक्षण का उद्देश्य शिक्षकों को प्रकृति संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली के संबंध में प्रशिक्षित कर विद्यार्थियों को जिम्मेदार और जागरुक नागरिक के रूप में विकसित करना है। पन्ना नेचर कैंप्स के अनुभव से मिली प्रेरणा शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम की परिकल्पना पूर्व में आयोजित पन्ना नेचर कैंप्स की सफलता से प्रेरित हो कर की गई है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के सहयोग से संचालित इन शिविरों ने पन्ना टाइगर पुनर्स्थापन परियोजना की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लगभग 15 वर्षों तक चले इस प्रयास ने यह सिद्ध कर दिया कि संरक्षण कार्यों में समाज और समुदाय की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पर्यावरण संरक्षण के संवैधानिक दायित्व पर फोकस शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम में इस तथ्य पर विशेष जोर दिया गया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48(क) राज्यों को पर्यावरण की रक्षा और सुधार का दायित्व देता है, जबकि अनुच्छेद 51A(ग) प्रत्येक नागरिक को प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करने और सभी जीवों के प्रति करुणा रखने का मौलिक कर्तव्य सौंपता है। इसके अंतर्गत वन, झील, नदियाँ और वन्यजीवों की सुरक्षा को सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में रेखांकित किया गया है। प्रकृति संरक्षण की चुनौतियों पर चर्चा शिक्षक प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम में प्रकृति संरक्षण से जुड़ी वर्तमान चुनौतियों पर भी विस्तृत चर्चा की गई है। इसमें तेजी से बढ़ती जनसंख्या, आर्थिक विकास की तीव्र गति और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को प्रमुख कारण बताया गया। विकास की प्रक्रिया में पारिस्थितिकी सुरक्षा के उपायों को शामिल करना भी आवश्यक है, जिससे प्रकृति स्वयं को पुनर्जीवित कर सके। ‘ईको-सिटीजन’ तैयार करने में शिक्षकों की भूमिका शिक्षक प्रशिक्षण में बताया गया कि विद्यार्थी समाज में सकारात्मक परिवर्तन के सबसे प्रभावी वाहक होते हैं। शिक्षक उनके साथ सबसे अधिक समय बिताते हैं और उन्हें सही दिशा में प्रेरित कर सकते हैं। प्रशिक्षित शिक्षक विद्यार्थियों में भी प्रकृति संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता विकसित कर सकेंगे और ये विद्यार्थी भविष्य में जिम्मेदार और संवेदनशील ईको-सिटीजन के रूप में समाज में योगदान दे सकेंगे।

कृषि एवं विज्ञान में नवाचार विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन का किया शुभारंभ

भोपाल  उप मुख्यमंत्री  राजेन्द्र शुक्ल ने कृषि महाविद्यालय रीवा में विकसित भारत 2047 के लिए विज्ञान और कृषि में नवाचार विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन शुभारंभ किया। इस अवसर पर उप मुख्यमंत्री ने कहा कि खेती हमारी अर्थव्यवस्था का आधार है। हम वर्तमान में विपुल अन्न और फल सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं। उत्पादन बढ़ाने के लिए हमने खाद और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग किया है, जिसके कारण धरती माता बीमार हो गई हैं। धरती माता को स्वस्थ रखना और भावी पीढ़ी को स्वस्थ जीवन देने के लिए प्राकृतिक खेती इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है । गोपालन पर आधारित प्राकृतिक खेती से ही हमें अच्छे स्वास्थ्य की नेमत मिलेगी। हर किसान अपनी कुल जमीन के दस प्रतिशत भाग पर प्राकृतिक विधि से अनाज फल और सब्जी का उत्पादन करें जिससे कम से कम उसके परिवार को रसायन रहित पौष्टिक आहार मिल सके। सेमिनार का आयोजन कृषि महाविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर, एकेएस यूनिवर्सिटी तथा श्याम दुलारे तिवारी शिक्षा एवं शोध संस्थान द्वारा किया जा रहा है। उप मुख्यमंत्री ने कहा कि देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए लगातार किसानों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले ही देश के गृहमंत्री  अमित शाह जी ने बसामन मामा गौ अभ्यारण्य में प्राकृतिक खेती के प्रकल्प का शुभारंभ किया। उन्होंने प्राकृतिक खेती के लिए किया जा रहे प्रयासों की सराहना की। कृषि वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्ताओं के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि अन्न उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ ऐसी किस्म का विकास करें जिससे माटी की उर्वरा शक्ति बनी रहे, धरती बीमार न हो और पौष्टिक अनाज से हम सब भी स्वस्थ रहें। समारोह में सांसद  जनार्दन मिश्र ने कहा कि वर्ष 2047 की अनुमानित जनसंख्या को ध्यान में रखकर प्राकृतिक खेती तथा अनाज उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित करना होगा। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के स्थान पर जैविक विधि से बनाई गई खाद तथा कीटनाशकों का उपयोग करना होगा, जिससे धरती का स्वास्थ्य और मानव के लिए हितकारी जीवाणु, कीट और पक्षी रह सकें। सेमिनार में जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के कुलगुरू प्रोफेसर पी.के. मिश्रा ने कहा कि कोरोना काल ने हमें प्रकृति की ओर लौटने और प्राकृतिक खेती को अपनाने के स्पष्ट संकेत दिए हैं। हमारा अस्तित्व तभी तक है जब तक हम प्रकृति के अनुसार आचरण करेंगे। निर्माण कार्यों, बड़े बांध, खनन परियोजनाओं से वनों का विनाश होने के साथ-साथ खेती की जमीन घट रही है। साथ ही पूरी दुनिया में जल संकट की आहट है। युवा, कृषि वैज्ञानिक और शोधकर्ताओं के कंधों पर इन संकटों को दूर करने की जिम्मेदारी है। हमारे पूर्वजों ने बहुत सोच समझकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से खेती के साथ गोपालन को जोड़ा और धरती तथा गौ को माता के समान आदर दिया। हमें पुन: उसी तरफ चलने की आवश्यकता है। सेमिनार में उप मुख्यमंत्री ने कृषि महाविद्यालय की पत्रिका हरियाली, प्राकृतिक खेती की पुस्तिका तथा गौ आधारित प्राकृतिक खेती एवं 17 शोध पत्रों के संकलन का विमोचन किया। सेमिनार में एकेएस विश्वविद्यालय के चांसलर  अनंत सोनी ने ऊर्जा संरक्षण तथा खेती में नवाचार के संबंध में विचार व्यक्त किए। कृषि महाविद्यालय के डीन डॉ. एसके त्रिपाठी ने प्राकृतिक खेती के लिए महाविद्यालय में किए जा रहे शोध की जानकारी दी। सेमिनार में प्रोफेसर डॉ. आरके तिवारी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सेमिनार में  एके जैन, डॉ. एसके पाण्डेय, प्रोफेसर एके शर्मा तथा वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक एवं शोधकर्ता शामिल हुए। सेमिनार में आठ राज्यों के कृषि वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं।  

2 अप्रैल की सुनवाई से पहले हाईकोर्ट जजों ने भोजशाला की जमीनी हकीकत परखी

धार शहर की ऐतिहासिक भोजशाला से जुड़े प्रकरण में मप्र हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने शनिवार को दोपहर में आकस्मिक रूप से स्थल का निरीक्षण किया। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला एवं न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच धार पहुंचे और लगभग एक घंटे तक भोजशाला परिसर का बारीकी से अवलोकन किया बाहरी और आंतरिक परिसर का लिया जायजा इस दौरान न्यायमूर्तिगण ने भोजशाला के बाहरी एवं आंतरिक दोनों परिसरों की स्थिति और व्यवस्थाओं का जायजा लिया। सर्वे की सारी प्रक्रिया के बारे में सूक्ष्मता से जानकारी ली। इस दौरान कलेक्टर, एसपी सहित प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी मौजूद रहे। आयोजनों और सर्वे की ली जानकारी मिली जानकारी के अनुसार न्यायमूर्तिगण ने परिसर में होने वाले मंगलवार और शुक्रवार के आयोजनों की जानकारी भी ली, कहां और किस प्रकार आयोजन होते हैं, इसकी विस्तृत जानकारी अधिकारियों से प्राप्त की। इंदौर खंडपीठ न्यायमूर्तिगण ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किए गए सर्वे के संबंध में भी अधिकारियों से स्थानीय जानकारी ली। एएसआइ के अधिकारी ने मौके पर उपस्थित रहकर पूरी स्थिति से अवगत कराया। 16 मार्च को कहा था विवादित स्थल खुद देखेंगे बता दें कि ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ की याचिका पर इंदौर हाई कोर्ट में विचाराधीन है। इसमें भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को स्पष्ट किया जाना है। प्रकरण में गत 16 मार्च को हुई सुनवाई के दौरान इंदौर खंडपीठ ने सभी पक्षों को सुनने के दौरान विवादित स्थल का स्वयं निरीक्षण करने की बात कही थी। इसी क्रम में करीब 12 दिन बाद न्यायाधीशों ने भोजशाला का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। शनिवार दोपहर लगभग 1:52 बजे न्यायाधीशों का वाहनों का काफिला भोजशाला परिसर पहुंचा और करीब 2:50 बजे तक निरीक्षण जारी रहा। इसके बाद वाहनों का काफिला वापस रवाना हो गया। इस मौके पर कलेक्टर प्रियंक मिश्रा व एसपी मयंक अवस्थी मौजूद रहे। आगे होगी नियमित सुनवाई गौरतलब है कि आगामी 2 अप्रैल से इस मामले में नियमित सुनवाई प्रस्तावित है। ऐसे में न्यायमूर्तिगण का यह स्थल निरीक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि मौके का प्रत्यक्ष अवलोकन उन्हें वास्तविक स्थिति समझने में सहायक होगा और आगे की सुनवाई में यह एक मजबूत आधार बन सकता है। पहले क्या हुआ था धार स्थित भोजशाला में 22 मार्च 2024 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा वैज्ञानिक और तकनीकी आधार पर सर्वे कार्य शुरू किया गया। यह सर्वे लगातार 98 दिनों तक चला। जुलाई 2024 में सर्वे रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत कर दी गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक के कारण आगे की कार्रवाई लंबित रही। वर्ष 2026 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उक्त रोक हटाए जाने के बाद अब मामले में आगे की प्रक्रिया का रास्ता साफ हो गया है।

CM का मेगा ऐलान: अब हर घर पहुंचेगा नर्मदा का पानी 24×7, ₹1356 करोड़ की योजना लॉन्च

इंदौर  शहर में बढ़ती पानी की जरूरत पूरी करने की कवायद शुरू होने जा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव रविवार को 1356 करोड़ की नर्मदा चतुर्थ परियोजना का दशहरा मैदान में भूमिपूजन करेंगे। पेयजल व्यवस्था के लिए टनल निर्माण, क्लोरीनेशन सिस्टम भी बनेगा। सीएम सिरपुर में 20 एमएलडी के एसटीपी प्लांट का भी लोकार्पण करेंगे। वर्ष 2029 से इंदौर को चौथे चरण का पानी देने की योजना है। परियोजना के संबंध में भाजपा कार्यालय में नगर अध्यक्ष सुमित मिश्रा, महापौर पुष्यमित्र भार्गव, एमआइसी सदस्य अभिषेक शर्मा आदि ने मीडिया को जानकारी दी। 24 घंटे पानी की सप्लाई और 29 गांवों में बिछेगी पाइपलाइन इंदौर महापौर भार्गव ने बताया कि नर्मदा के चौथे चरण की योजना पूरी होने से शहर में करीब 900 एमएलडी पानी की सप्लाई होगी। अमृत 2.0 योजना के तहत इस परियोजना से शहर में 24 घंटे जलापूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। 29 गांवों के 10 वार्ड में पाइप लाइन बिछाई जाएगी। दो लाख से ज्यादा नए नल कनेक्शन से पानी सह्रश्वलाई होगा। 40 नई टंकियों का निर्माण कर जल वितरण होगा। चौथे चरण में यशवंत सागर की क्षमता 30 से बढ़ाकर 45 एमएलडी कर रहे हैं। पैकेज 2     पैकेज-2 के तहत वांचू पाइंट से राऊ सर्कल तक 2235 एमएम की 39 किमी लंबी ग्रेविटीमेन पाइपलाइन बिछाकर तीन जगह 2870 मीटर लंबाई में टनल निर्माण किया जाएगा। राऊ सर्कल पर क्लोरिनेशन सिस्टम बनेगा। 448.23 करोड़ रुपए में लगभग 30 महीने में काम पूरा करने का लक्ष्य है। पैकेज 3     पैकेज-3 और 4 के तहत 40 नए ओवरहेड टैंक बनेंगे, 76 टैंकों का नवीनीकरण किया जाएगा। पैकेज-3 में 15 से 35 लाख लीटर क्षमता के 20 नए ओवरहेड टैंक का निर्माण कर 29 मौजूदा टैंकों का सुदृढ़ीकरण होगा। इन टैंकों को जोड़ने के लिए 400 से 600 एमएम की 27.4 किमी लंबी फीडर पाइपलाइन तथा 1200 मिमी व्यास की 4.7 किमी ग्रेविटी मेन व 685 किमी डिस्ट्रीब्यूशन लाइन बिछाई जाएगी।     1 लाख 26 हजार पानी के कनेक्शन घरों में देकर 1 लाख 8 हजार से अधिक वाटर मीटर लगाए जाएंगे। इससे 24 घंटे प्रेशर के साथ पानी सह्रश्वलाई होगी। यह काम 36 महीने में 410.50 करोड़ में किया जाएगा। स्मार्ट मॉनिटरिंग से लीकेज व पानी की बर्बादी पर नियंत्रण किया जाएगा।     यहां बनेंगी 40 नई टंकियां, पैकेज-3 के तहत पुराने रजिस्ट्रार ऑफिस का गार्डन, खालसा चौक, आइडीए गार्डन, लवकुश विहार, निरंजनपुर मंडी, कबीटखेड़ी, रेवेन्यू नगर, ट्रेजर टाउन, कावेरी परिसर, कैलोद करताल, लिंबोदी टैंक, पालदा इंडस्ट्रीज एरिया, आरटीओ पत्थर मुंडला, ओमेक्स हिल, देवगुराडिय़ा, कु्हेड़ी, पंचवटी कॉलोनी, अरंडिया, मायाखेड़ी, शक्करखेड़ी, रेवती। पैकेज 4     पैकेज-4 में 20 नए ओवरहेड टैंक का निर्माण तथा 892 किमी लंबी वितरण पाइपलाइन बिछाई जाएगी।     साईं गंगौत्री, लक्ष्मीबाई मंडी, एकेवीएन कैंपस, मैकेनिक नगर, पीयू 4 गार्डन, विजय नगर, सयाजी होटल के पीछे, हाट बाजार के सामने कंचनबाग, महल कचहरी, शिवाजी नगर, कलेक्टोरेट पार्क आदि।

मुख्यमंत्री ने अपने जन्म दिवस पर भी इस प्रतिबद्धता को दोहराया

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रदेश के वन और जल स्त्रोतों को समृद्ध बनाकर वन्य प्राणियों तथा जंगली जीवों के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। जन्म दिवस वाले दिन कछुओं को विमुक्त कर उन्होंने जैव विविधता संरक्षण के प्रति अपनी संवेदनशीलता प्रकट की। उल्लेखनीय है कि जल संरचनाओं को स्वच्छ बनाए रखने और जलीय जैव विविधता के संतुलन में यह कछुएं महत्वपूर्ण भूमिका हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने अपने जन्म दिवस पर सागर जिले के वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व नौरादेही में संरक्षित प्रजाति के कछुओं को जल में विमुक्त किया। इस दिन चीतों के पुनर्वास के लिए बनने वाले विशेष बाड़े का पूजन भी किया गया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने प्रकृति और वन्य जीवों की सेवा को ही ईश्वर की सेवा के समान माना है। उनका मानना है कि वन्य और जलीय जीव, जैव विविधता के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके साथ ही इनकी उपस्थिति से वनों और जल संरचनाओं के संरक्षण में भी मदद मिली है तथा प्रदेश के पर्यटन को भी प्रोत्साहन मिलता है। यह गतिविधियां रोजगार सृजन का माध्यम बनती हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव के इस दृष्टिकोण का परिणाम है कि अपने जन्मदिवस पर भी उन्होंने प्रदेश के वन विकास और जल संरचनाओं के संरक्षण के लिए गतिविधियां संचालित कीं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव का कहना है कि नदियां प्रदेश के वन केवल राज्य ही नहीं, अपितु राष्ट्र की महत्वपूर्ण धरोहर हैं, क्योंकि प्रदेश के वन देश की कई प्रमुख नदियों के उद्गम क्षेत्र हैं। इस दृष्टि से हमारे वनों से निकली नदियां कई राज्यों की जल सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं। वनों की सुरक्षा केवल पर्यावरणीय दायित्व ही नहीं है अपितु यह हमारी सामाजिक और आर्थिक अनिवार्यता भी है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव सामुदायिक सहभागिता से वनों के प्रबंधन पर विशेष बल देते हैं। इसके दृष्टिगत प्रधानमंत्री  मोदी के आत्मनिर्भर भारत@2047 के लक्ष्य की पूर्ति में प्रदेश की ओर से हरसंभव योगदान देने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. यादव द्वारा विजन@2047 री-इमेजिनिंग फॉरेस्ट रिसोर्सेस फॉर द क्लाइमेट रेसिलियंट फ्यूचर नामक डॉक्यूमेंट का गति‍दिवस विमोचन किया गया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव द्वारा वन प्रबंधन में बदलते वर्षा पैटर्न, बढ़ते तापमान, भूमि उद्योग के दबाव के दृष्टिगत पारिस्थितिकी आधारित, जलवायु अनुकूल, विज्ञान आधारित दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया जा रहा है। प्रदेश में वन आश्रित समुदायों को केवल लाभार्थी के रूप में नहीं अपितु वन संसाधनों के सहप्रबंधक और संरक्षक के रूप में देखा जा रहा है। व्यवस्थाएं इस आधार पर विकसित की जा रही हैं कि जब समुदायों को वनों से प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होगा तो वे वनों के सर्वाधिक सशक्त संरक्षक बनेंगे। यह विचार समावेशी विकास को बढ़ावा देगा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव के नेतृत्व में वनों के प्रबंधन में डिजिटल प्रौद्योगिकी, पारदर्शिता, कार्यकुशलता और जवाबदेही पूर्ण व्यवस्था को भी सशक्त किया जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव की वनों के प्रति इस संवेदनशीलता के परिणामस्वरूप राज्य सरकार वनों को आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ उत्पादक और सम-सामयिक दृष्टि से उपयोगी संसाधनों के स्त्रोत के रूप में सौंपना चाहती हैं। इसी का परिणाम है कि प्रदेश में वन्य जीव संरक्षण, वन संरक्षण के साथ ही सामुदायिक वानिकी और आजीविका, पर्यावरण, पर्यटन और प्रकृति शिक्षा, कार्बन एवं पारिस्थितिकीय तंत्र, वन भूमि के बाहर हरित आच्छादन बढ़ाने की दिशा में वैज्ञानिक रणनीति से गतिविधियां संचालित की जा रही है।  

अन्न उत्पादन को बढ़ावा देगा मप्र

भोपाल  मध्यप्रदेश की तीन फसलों सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी और बैंगनी अरहर को शीघ्र ही जी आई टैग मिलने जा रहा है। तीनों फसलों के प्रस्ताव तैयार कर परीक्षण के लिए भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री चैन्नई भेज दिए गए है। कृषक कल्याण वर्ष 2026 में राज्य सरकार अन्न उत्पादन बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जनजातीय बहुल क्षेत्रों में पारंपरिक कोदो-कुटकी को बचाने और उत्पादन करने के लिये किसानों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। औषधीय गुणवत्ता और पौष्ट‍िकता के कारण अब दुनिया अन्न की ओर लौट रही है। ग्लोबल मार्केट में अन्न की मांग बढ़ रही है। अन्न अब किसानों के लिये आर्थ‍िक लाभ देने वाली फसल बन गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर रानी दुर्गावती  अन्न प्रोत्साहन योजना में किसानों से 1,000 प्रति क्विंटल पर कोदो कुटकी की खरीदी हो रही है। कोदो-कुटकी की खरीद के लिए 22,000 से ज्यादा किसानों का रजिस्ट्रेशन किया गया है। इन किसानों का 21,000 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है। इस योजना में 16 जिलों में पहली बार खरीद की जा रही है। इन जिलों में जबलपुर, कटनी, मंडला, डिंडोरी, छिंदवाड़ा, शहडोल, अनूपपुर, उमरिया, रीवा, मऊगंज, सतना, मैहर, बालाघाट, सिवनी, सीधी और सिंगरौली शामिल हैं । सिताही कुटकी सिताही कुटकी एक कम अवधि (60 दिन) वाली 'लिटिल मिलेट' (छोटी बाजरा) की देशी किस्म है। यह वर्षा-आधारित क्षेत्रों और देर से बुवाई की स्थितियों के लिए उपयुक्त है। यह सूखे की मार, नमी की कमी, और प्रमुख कीटों (शूट फ्लाई), 'ग्रेन स्मट' व 'ब्राउन स्पॉट' जैसी बीमारियों का सामना करने में सक्षम है। इस प्रकार, यह किसानों को एक स्थिर पैदावार दिलाने में मददगार साबित होती है। सिताही कुटकी की मध्यम ऊँचाई और मोटे तने के कारण फसल के गिरने की समस्या नहीं रहती। इसे पहाड़ी, ऊबड़-खाबड़ तथा कमज़ोर मिट्टी वाली स्थितियों में भी उगाया जा सकता है। डिण्डोरी के 'बैगा' तथा 'गोंड' जनजातियों के किसानों के लिए अच्छी आय दे सकती है। डिंडोरी में 'सिताही कुटकी' की खेती की 10,395 हेक्टेयर क्षेत्र में बढ़ोतरी और 10-11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की स्थिर पैदावार से इस क्षेत्र में लोगों की आजीविका, भोजन और पोषण सुरक्षा में मदद मिली है। जनजातीय ज़िलों के लगभग 60,000 आदिवासी किसान—खासकर डिंडोरी, मंडला, अनूपपुर, छिंदवाड़ा, शहडोल, उमरिया, बालाघाट और जबलपुर के कुछ हिस्सों के किसान पैदावार बढ़ाकर आर्थिक ले सकते हैं। डिंडोरी के पहाड़ी और मुश्किल इलाकों के 54 गाँवों के किसानों को मुनाफ़ा हुआ है। इन इलाकों में दूसरी रबी फ़सलों की खेती नहीं होती। जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर ने 'भौगोलिक संकेतक' (GI) टैग के लिए दस्तावेज़ तैयार किया है। इससे राष्ट्रीय स्तर पर 'सिताही कुटकी' का एक ब्रांड नाम स्थापित होगा। बाज़ार के नए अवसर खुलेंगे। इससे बाजरे की खेती करने वाले जनजातीय किसानों को आर्थ‍िक लाभ होगा। नागदमन कुटकी डिंडोरी जिले में उगाई जाने वाली कुटकी की एक विशिष्ट स्थानीय किस्म है। यह अपने औषधीय गुणों और उच्च पोषण मूल्य के लिए जानी जाती है। बैंगनी अरहर दरअसल अरहर की विशेष किस्म है। इसमें पौधे या फलियों पर बेंगनी रंग की झलक हेती है। इसमें भरपूर प्रोटीन होता है। रोगों से लड़ने की जबरदस्त क्षमता होती है। अच्छी देखभाल होने पर 15 से 20 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उत्पादन हो सकता है। जीआई टैग से लाभ : औषधीय गुणों और उच्च पोषण मूल्य के लिए जानी जाती है। जीआई टैग मिलने से इस फसल की शुद्धता और गुणवत्ता की गारंटी मिलेगी। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी मांग बढ़ेगी। वैश्विक स्तर पर पहचान मिलेगी। इससे बिक्री बढेगी। यह साबित होगा कि फसल स्थापित मानकों के अनुरूप है। जनजातीय क्षेत्रों में उत्पादन जनजातीय जिलों में किसानों को कोदो-कुटकी की सभी प्रकार की किस्मों को बचाने और उनका उत्पादन बढ़ाने के लिये प्रात्साहित किया जा रहा है। सीधी, जबलपुर, डिंडोरी, मंडला, छिंदवाड़ा जैसे जिलों में किसानों को जोड़ा गया है। सहरिया-बहुल श्योपुर जिले में जनजातीय बच्चों में कुपोषण दूर करने के लिए मिलेट आधारित व्यंजनों का उपयोग किया जा रहा है। आंगनवाड़ी कार्यकताओं और एकीकृत बाल विकास योजना के अमले को मिलेट के व्यंजन बनाने की जानकारी दी गई है और इसके पौष्ट‍िक गुणों से परिचित कराया गया है। जिले में 130 एकड़ में कोदो कुटकी की खेती हो रही है। करीब 200 किसानों को इसमें जोड़ा गया है। इस पहल का परिणाम यह रहा कि 2000 बच्चों का पोषण स्तर बढ़ गया और उनके स्वास्थ्य में सुधार आया। डिण्डोरी के समनापुर ब्लाक की महिला किसानों को कोदो-कुटकी उत्पादन से जोड़ा गया है। प्रत्येक महिला किसान के पास औसत ढाई एकड़ खेती है। इससे 32 गांवों की 1250 महिला किसान जुड़कर खेती कर रही है। पिछले दो सालों में कोदो कुटकी उत्पादन बढ़ा है।